फर्नांडो सोरेंटिनो : जीवनशैली : कैफ़ी हाशमी



अर्जेंटीना के लेखक फर्नांडो सोर्रेंटिनो (जन्म: 8 नवंबर, 1942) स्पेनिश भाषा में लिखते हैं. अब तक उनके छह कहानी-संग्रह प्रकाशित हुए हैं जिनका पन्द्रह से अधिक  भाषाओं में अनुवाद हो चुका है.

फर्नांडो आम जीवन से कथानक उठाते हैं और कल्पना, फैंटसी, गहरी विडंबना के सहारे उसे विस्मित कर देने वाले अंत तक पहुंचा देते हैं.

इस कहानी का ‘A Lifestyle’ शीर्षक से अंग्रेजी में अनुवाद ‘Thomas C. Meehan’ ने किया है. कैफ़ी हाशमी का यह अनुवाद इसी पर आधारित है.  इस अनुवाद को बेहतर बनाने में आलोचक-अनुवादक शिव किशोर तिवारी से  मदद ली गई है.  

किसी महानगर में किसी अपार्टमेंट की दसवीं मंजिल पर आप अकेले रह रहें हों और किसी दिन अंदर से दरवाज़ा खोलने की कोशिश में लॉक के अंदर ही चाभी टूट जाए तो आपके साथ अधिकतम क्या हो सकता है?

इसका जवाब यह कहानी देगी. 

 


फर्नांडो सोरेंटिनो
जीवनशैली                                      
अनुवाद : कैफ़ी हाशमी

 

 

पनी जवानी के दिनों में, एक किसान और पशुपालक बनने से पहले मैं एक बैंक का कर्मचारी था और यह सब कुछ इस प्रकार घटित हुआ.

उस वक्त मैं चौबीस साल का था और कहने को मेरा कोई भी करीबी रिश्तेदार नहीं था. मैं कैनिंग और आरोज़ के मध्य, सांता फे अवेन्यु  पर स्थित  इस छोटे से अपार्टमेंट में रहता था.

अब जबकि यह सिद्ध हो चुका है कि दुर्घटनाएं कहीं भी हो सकती हैं किसी छोटी सी जगह में भी. मेरे मामले में, यह एक छोटी सी दुर्घटना ही थी. जब मैंने काम पर जाने के लिए दरवाजे को खोलने की कोशिश की, चाबी लॉक के अंदर ही टूट गई.

स्क्रूड्राइवर और प्लायर की मदद से बेकार कोशिशें करने के बाद, मैंने एक तालासाज की दुकान पर फ़ोन करने का फैसला किया. तालासाज का इंतज़ार करने के दौरान मैंने बैंक वालों को बता दिया कि मुझे आने में थोड़ी देरी होगी.

सौभाग्य से, ताला बनाने वाला बहुत जल्दी आ गया. उस आदमी का ध्यान करते हुए, मुझे बस इतना याद है कि भले ही वह जवान दिख रहा था लेकिन उसके बाल बिलकुल सफ़ेद थे. दरवाजे में लगे कांच के झरोखे से मैंने उससे कहा, “ मेरी चाभी लॉक के अंदर ही टूट गई है.”

वह झुंझलाहट के अंदाज़ में तुरंत बोला, “अंदर टूट गई ? अगर ऐसा है, तो बहुत मुश्किल खड़ी हो गई है. इसमें मुझे कम से कम तीन घंटे लग जाएंगे और मुझे इसकी कीमत लेनी होगी तक़रीबन  …”

उसने बहुत ज़्यादा कीमत बताई.

“मेरे पास अभी घर में इतने पैसे नहीं है” मैंने जवाब दिया. “लेकिन जैसे ही मैं बाहर निकलता हूँ, मैं बैंक जाऊँगा और फिर तुम्हें पैसे दूंगा.”

उसने तिरस्कार की भावना से भरी आँखों से मुझे देखा, जैसे मैंने उसे कुछ अनैतिक कह दिया हो, “मुझे माफ़ कीजिएगा, श्रीमान.” उसने उपदेशात्मक शिष्टता से कहा, “मैं सिर्फ ‘अर्जेंटीना तालासाज संघ’ का विशिष्ट सदस्य ही नहीं हूँ बल्कि हमारे संघ के आधारभूत सिद्धांत के निर्माताओं में से एक हूँ. इसके अनुसार रियायत देने की कोई गुंजाइश ही नहीं है. अगर आप इस प्रेरणात्मक दस्तावेज़ को पढ़ने का कष्ट करेंगे तो आपको पता चलेगा कि ‘आधारभूत नियमावली’ अध्याय के अनुसार, एक अच्छे ताला बनाने वाले के लिए काम के बाद मेहनताना लेना निषिद्ध है.”

 

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मैं संदेह के साथ मुसकुराया, “तुम ज़रूर मज़ाक कर रहे हो.”

“मेरे प्यारे श्रीमान, ‘अर्जेंटीना ताला मज़दूर संघ’  के आधारभूत सिद्धांत कोई मज़ाक की चीज़ नहीं है. हमारे संघ के सिद्धांत,जिसमें किसी छोटी बात को भी अनदेखा नहीं किया गया है और जिसके विभिन्न पाठ बुनियादी नैतिक सिद्धांतों से चालित हैं, इसे हमने बरसों के कड़े अध्ययन के बाद तैयार किया है. ज़ाहिर है, हर कोई इसे नहीं समझ सकता, जैसा कि हम अधिकांशतः प्रतीकात्मक अथवा गूढ़ भाषा का प्रयोग करते हैं. फिर भी, मुझे विश्वास है कि हमारे दस्तावेज़ के परिचय में वर्णित अनुच्छेद 7 को आप समझेंगे, “ दौलत से दरवाज़े खुलते हैं और दरवाज़े उनका स्वागत करते हैं.”

मैंने इस पागलपन को स्वीकार न करते हुए उसे मनाने की कोशिश की, “सुनो” मैंने उससे कहा, “थोड़ी तो वाजिब बात करो. एक बार यह दरवाज़ा खुलने दो, उसके बाद मैं तुम्हारा मेहनताना ज़रूर दूँगा.”

“मुझे माफ़ कीजिएगा श्रीमान, लेकिन हर व्यवसाय के कुछ उसूल होते हैं और हमारे व्यवसाय में ये उसूल अपरिवर्तनीय है. आपका दिन शुभ हो, श्रीमान.”

और इसके साथ ही, वह चला गया.

मैं कुछ क्षण के लिए बेसुध सा वहीं खड़ा रहा. इसके बाद मैंने बैंक में दोबारा फ़ोन किया और उन्हें बताया कि शायद आज मैं न आ पाऊँ. बाद में मैंने उस सफ़ेद बालों वाले तालासाज के बारे में सोचा और खुद से कहा, “वह आदमी पागल है. मैं तालासाज की किसी दूसरी दुकान को फ़ोन करने जा रहा हूँ और किसी भी हाल में, मैं नहीं बताऊंगा कि मेरे पास पैसे नहीं है जब तक वे दरवाज़ा खोल नहीं देते.

मैंने टेलीफोन डायरेक्टरी में नंबर ढूँढा और फ़ोन मिलाया.

 “किस पते पर ?“ एक औपचारिक जनाना आवाज़ ने मुझसे पूछा.

 “3653 सांता फे, अपार्टमेंट 10-ए.”

वह क्षणभर के लिए हिचकिचाई, मुझसे पता दोहरवाया और कहने लगी, “नामुमकिन, श्रीमान. ‘अर्जेंटीना तालासाज संघ’ की नियमावली हमें इस पते पर किसी भी प्रकार का कार्य करने की इजाज़त नहीं देती.

मैं क्रोध की ज्वाला में जल उठा, “ सुनो तुम, पागलपन म…”

मेरे शब्द के पूरा होने से पहले ही उसने फ़ोन रख दिया.

 

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फिर मैंने दोबारा टेलीफोन डायरेक्टरी उठा ली और तालासाजी के तक़रीबन बीस दुकानों पर फ़ोन किया. जैसे ही वे पता सुनते, वे काम करने से साफ़ तौर पर मना कर देते.

 “हाँ-हाँ, ठीक है” मैंने खुद से कहा, “ मैं कहीं और से इसका हल निकाल लूँगा.”

मैंने बिल्डिंग के चौकीदार को फ़ोन किया और उसे समस्या बताई.

“दो बातें हैं.” उसने जवाब दिया, “पहली यह कि मुझे नहीं पता कि लॉक कैसे खोलते हैं और दूसरी बात यह कि अगर मुझे आता भी तो मैं नहीं खोलता. जैसा कि आप जानते हैं कि मेरा कार्य इस स्थान की सफाई करना है न कि संदिग्ध पंछियों को पिंजड़े से उड़ जाने देना है. और हाँ, आपने मुझे खुलेदिल से बख्शीश देने में कभी दिलचस्पी नहीं दिखाई है.”

इसके बाद मैं बहुत परेशान हो गया और एक के बाद एक कई सारे बेकार और अजीबोगरीब काम करने लगा. मैंने एक कप कॉफ़ी खत्म की, सिगरेट पी, बैठा, खड़ा हुआ, कुछ कदम चला, अपने हाथ धोये, एक गिलास पानी पिया.

इसके बाद मुझे मोनिका दीशियावे का ख्याल आया, मैंने उसका नंबर मिलाया, इंतज़ार किया और उसकी आवाज़ सुनी, “मोनिका” दिखावटी मिठास और स्थिरता के साथ मैंने कहा, “ कैसी हो, प्रिये ? कैसा चल रहा है सब? ”

उसके जवाब ने मुझे कंपकंपा दिया, “तो तुम्हें आखिरकार फ़ोन करने की याद आ गई ? मैं बता सकती हूँ, तुम सच में मुझसे बहुत प्यार करते हो. लगभग दो हफ्तों से तुम्हारा कुछ अता-पता जो नहीं है.”

महिलाओं से तर्क-वितर्क करना मेरी क्षमता से परे की चीज़ है, खासकर इस मनोवैज्ञानिक हीनता की स्थिति में, जिसमें मैं फंसा हुआ था. फिर भी, मैंने उसे जल्दी से समझाने की कोशिश की कि मेरे साथ क्या हो रहा  है. मुझे नहीं पता कि वह मुझे समझ नहीं पायी या मुझे सुनने से इनकार कर दिया. जो आखिरी चीज़ उसने फ़ोन रखने से पहले कही, वह थी, “ मैं किसी का खिलौना नहीं हूँ.”    

अब मुझे बेकार और अजीबोगरीब काम करने की दूसरी श्रृंखला को पूरा करना था.

फिर मैंने बैंक में फ़ोन किया, इस आशा में कि कोई सहकर्मी आए और दरवाज़ा खोल दे. किस्मत ख़राब; मेरे हिस्से एंज़ो पेरेदेस से बात करना आया, एक मंदबुद्धि जोकर जिससे मुझे नफरत थी, “तो तुम अपने घर से बाहर नहीं निकल सकते ?” वह वाहियात तरीके से चिल्लाया, “तुम्हारे काम पर न आने के बहाने कभी खत्म नहीं होते.”

 

4

उसकी बातें सुन कर मुझे मानव हत्या जैसे विचारों ने गिरफ़्तार कर लिया था. मैंने फ़ोन काट दिया, फिर से मिलाया और माइकलएंजेलो लपोर्ता से बात करनी चाही, जो थोड़ा होशियार था. निश्चित रूप से कह सकता हूँ कि वह समाधान निकालने का इच्छुक था, “बताओ मुझे, चाभी टूटी है या लॉक ?”

“चाभी.”

“और क्या वह अंदर रह गई है ?”

“इसका आधा हिस्सा अंदर रह गया है.”  पहले ही इस पूछताछ से हताश होकर मैंने उत्तर दिया , “और बाकी का बाहर.”

“क्या तुमने अंदर फँसे हुए उस छोटे हिस्से को स्क्रूड्राइवर से बाहर निकालने की कोशिश नहीं की ?”

“हाँ, बिलकुल मैंने कोशिश की है, लेकिन उसे निकाल पाना असंभव है.”

“ओह! अच्छा फिर तो तुम्हें ताला बनाने वाले को बुलाना पड़ेगा ?”

“मैं पहले ही कॉल कर चुका हूँ.” मैंने प्रतिवाद किया, उस गुस्से को दबाते हुए जो मेरा दम घोट रहा था, “लेकिन वे एडवांस में पैसे चाहते हैं.”

“तो एडवांस दे दो और परेशानी खत्म.”

“तुम्हे अब तक समझ नहीं आया कि मेरे पास पैसे नहीं हैं.”

फिर वह ऊब गया, “ मेरे पनौती मित्र, सच में तुम्हारी समस्याएँ बहुत विकट होती हैं.”

मैं तुरंत उसका कोई उत्तर नहीं दे पाया. मुझे उससे कुछ पैसे माँगने चाहिए थे. लेकिन उसकी टिप्पणी ने मुझे चकरा दिया और मैं कुछ भी सोच नहीं पाया.

और इस तरह दिन खत्म हुआ.

अगले दिन मैं जल्दी उठ गया ताकि सहायता के लिए ज़्यादा फ़ोन कर सकूं. लेकिन हर बार का वही रोना- आदतन टेलीफोन ने काम करना बंद कर दिया. एक और हल न हो पाने वाली समस्या: बिना फ़ोन कॉल के रिपेयर सर्विस को फ़ोन ठीक करने के लिए आखिर कैसे कहता ?

मैं बाहर बालकनी में आ गया और लोगों को देखकर चिल्लाने लगा जो सांता फे अवेन्यु पर चल रहे थे. सड़क का शोर कान फोड़ने वाला था, दसवीं मंजिल से चिल्लाने वाले शख्स को कौन सुन पाता ? ज़्यादा से ज़्यादा एक अनजान आदमी अपना सिर ऊपर उठा देता और फिर वापस चलने लगता .


 

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इसके बाद मैंने टाइपराइटर में पाँच कागज़ और चार कार्बन लगाए और यह संदेश टाइप किया: “श्रीमान अथवा श्रीमती, मेरी चाभी लॉक के अंदर टूट गई है. मैं दो दिन से घर में बंद हूँ कृपया मुझे यहाँ से बाहर निकालने के लिए कुछ कीजिए. 3653 सांता फे, अपार्टमेंट 10-ए.”

मैंने रेलिंग से पाँचों कागज़ गिरा दिए. इतनी ऊँचाई से, सीधा नीचे गिरने की संभावना बहुत कम थी. विकराल हवा के झोंके में, वे लम्बे समय तक इधर-उधर तैरते रहे. तीन सड़क पर गिरे और लगातार आवाजाही करते वाहनों से कुचले जाने के बाद काले पड़ गए. चौथा वाला एक दुकान के पंडाल के ऊपर गिरा. लेकिन सबसे आखिरी वाला पाँचवां कागज़ फुटपाथ पर गिरा. तभी एक नाटे व्यक्ति ने उसे उठाया और पढ़ने लगा. फिर उसने अपने उलटे हाथ से आँखों पर छाया करते हुए ऊपर ताका. मैंने दोस्ताना लहज़े से उसकी और देखा. उस सज्जन पुरुष ने कागज़ को कई सारे छोटे टुकड़ों में फाड़ा और चिढ़ चिढ़ाते हुए गटर में फेंक दिया

कम शब्दों में कहूँ तो, कई और हफ़्तों तक मैंने हर तरह के प्रयास जारी रखें. मैंने बालकनी से सैकड़ों संदेश फेंकें; या तो उन्हें पढ़ा नहीं गया और अगर पढ़ा गया तो गंभीरता से नहीं लिया गया.

एक दिन मैंने एक लिफाफा देखा जिसे मेरे अपार्टमेंट के दरवाज़े से नीचे खिसकाया गया था; टेलीफ़ोन कंपनी बिल न भरने के कारण अपनी सेवाएँ बंद कर रही थी और फिर आगे बढ़ते हुए उन्होंने मेरा गैस, बिजली और पानी का कनेक्शन काट दिया.

शुरुआत में, मैंने अपने राशन को बेढंगे तरीके से खत्म किया लेकिन समय रहते मुझे एहसास हुआ कि ऐसे नहीं चल सकता. मैंने बारिश के पानी को इकट्ठा करने के लिए बालकनी में भगोने रखे. मैंने फूल के पोधों को नोच डाला और उन गमलों में टमाटर, दालें और दूसरी सब्जियाँ उगानी शुरू की, जिनकी देखभाल मैं प्रेम और मेहनत से किया करता था. लेकिन मुझे प्रोटीन के लिए मांस की ज़रूरत भी थी, इसलिए मैंने कीड़े, मकड़ियों और चूहों का प्रजनन करना सीखा खासकर उन्हें कैद करके प्रजनन कैसे कराया जाए; कभी-कभी मैं मौसमी गौरेया या कबूतर भी पकड़ लिया करता था.

जब धूप होती थी तब मैग्नीफाइंग ग्लास और कागज़ की मदद से आग जला लेता था. ईंधन के लिए, मैं धीरे-धीरे किताबें, फर्नीचर और फ्लोरबोर्ड जला रहा हूँ. मुझे लगता है घर में हमेशा ज़रूरत से ज़्यादा ही सामान रहता है.

 

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मैं बड़े आराम से रहता हूँ हालाँकि कुछ चीज़ों की कमी खलती है उदाहरण के लिए मुझे नहीं पता कि बाहर क्या चल रहा है; मैं अखबार नहीं पढ़ता और मैं टीवी और रेडियो को काम करने लायक नहीं बना सकता.

बालकनी से मैं बाहर की दुनिया को देखता हूँ और मैंने कुछ बदलाव महसूस किए हैं. किसी एक ख़ास बिंदु पर ट्रॉली ने चलना बंद कर दिया था, लेकिन मुझे नहीं पता ऐसा कब हुआ. मैंने समय को याद रखने की क्षमता खो दी है, लेकिन आईना, मेरा गंजापन, मेरी लंबी सफ़ेद दाढ़ी और मेरे जोड़ों का दर्द मुझे बताता है कि मैं बूढ़ा हो गया हूँ.

मनोरंजन के लिए मैं अपने विचारों को कल्पना के संसार में खुला छोड़ देता हूँ. मुझे कोई भय नहीं है न ही कोई महत्वाकांक्षा है.

एक शब्द में कहूँ तो अपेक्षाकृत सुखी हूँ.

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कैफ़ी हाशमी

(जन्म 29 अक्टूबर 1994)


कहानी  'टमाटर होता है फल' के लिए लल्लनटॉप का एक  लाख का पुरस्कार मिला है. कुछ कहानियाँ प्रकाशनाधीन


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  1. अनुवाद अच्छा है । ‘मेरे प्यारे श्रीमान ‘ की बजाय केवल ‘महोदय’ से काम चल सकता था। कहानी पढ़ कर बचपन में पढ़ी हिंदी कहानी ‘चार आने पैसे’ याद आ गयी। शायद सुदर्शन की थी।

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  2. कहानी पढ़कर लगा ही नहीं कि अनुवाद है, बहुत बढ़िया अनुवाद किया है

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  3. Impressive. It feels the translation preserves the rough simplicity of the original. Good read!

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  4. दया शंकर शरण8/1/21, 9:19 pm

    फर्नांडो सोरेंटिनो की कहानी-जीवन शैली,शुरू से अंत तक दिलचस्प है । रोजमर्रे की जिंदगी में इसतरह की छोटी-मोटी चीज़ें तो आये दिन होती रहती हैं,लेकिन यह भी एक कथा-वस्तु हो सकती है,सोचकर चकित हूँ।इसतरह का कथानक हिन्दी कहानी की प्रकृति और परंपरा से मेल नहीं खाता और बनावटी-सा लगता है । इस रूढ़ीबद्ध खाँचे से निकलने की जरूरत है। अनुवाद अच्छा लगा।

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  5. वाह ! बहुत प्रभावशाली कहानी

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  6. माधव राठौड़15/1/21, 11:36 am

    आज फ़ुर्सत से,तबियत से इस कहानी को पढ़ा। जैसा भूमिका में लिखा हुआ था कि बंद कमरे में आदमी की कहानी है तो उत्सुकता बनी हुई थी। छोटी लेकिन अच्छी कहानी। अनुवाद भी बेहतरीन है । Tewari Shiv Kishore सर ने उसे और भी पोलिश कर दिया।

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