उमा नेहरु और स्त्रियों के अधिकार
ललिता यादव
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चूंकि अब
स्त्रियां आलोचना एवं इतिहास लेखन के क्षेत्र में उतर आई हैं अतः अतीत की गर्द में
धुंधला गए अथवा सितारों की भीड़ में अनचीन्हें रह गए नामों का सामने आना तय है, इसलिए अपनी बात की शुरुआत उलाहने
से नहीं स्मृति के एक छोटे से खंड से करूंगी. सन् 1984 में इंदिरा गांधी की हत्या का
समाचार गांव में रेडियो पर सुन रहे लोगों की भीड़ में उपस्थित एक चाची चिहुंक कर पूछ
बैठी थी- ‘इंदिरा गांधी सचमुच की औरत थी?’
जनवरी
2020 में प्रकाशित ’उमा नेहरू ओर स्त्रियों के अधिकार’ पुस्तक का पाठ चाची जैसी चिहुंक
और पुलक से सराबोर कर गया कि सचमुच 1910-1935 के मध्य हिंदी क्षेत्र में एक ऐसी चिंतक
सक्रिय थी जो दुनिया के ज्ञान विज्ञान और विकास के आलोक में अपने देश, समाज और घर को
देखने की सामर्थ्य रखती थी. जिसके पास भारत के भविष्य, समाज और स्त्री के लिए बेहतर
मंसूबे ही नहीं कार्य योजनाएं एवं उनको जमीन पर उतारने के संकल्प भी थे.
स्त्री लेखन
के इतिहास में लुप्तप्राय इस ’दमदार स्त्री’ का नाम प्रमुखता से जोड़ने का कार्य किया है, दुःखिनीबाला लिखित ‘सरला एक विधवा
की आत्मजीवनी’ प्रकाश में लाने वाली प्रज्ञा पाठक ने. उमा नेहरू के साहित्यिक अवदान
के रूप में 1910 से 1935 की अवधि में विभिन्न पत्र पत्रिकाओं में छपे लेखों के अलावा
1929 में प्रकाशित ’बिपता’ नामक एक पुस्तक है जो जॉन मेजफील्ड के अंग्रेजी
नाटक- ‘ट्रेजिडी आफ नैन’ का हिंदी अनुवाद है. उमा नेहरू ने कैथरीन मेयो लिखित
बहुचर्चित पुस्तक ‘मदर इंडिया’ का भी अनुवाद किया था. वह बहुत जागरूक लेखक और स्त्री
अधिकारों के लिए संघर्ष करने वाली सामाजिक कार्यकर्ता थी. लेखन उनके लिए समाज को बदलने
का माध्यम था- ‘लिखने का कुछ फायदा हो तो लिखें
वर्ना खामोश रहें’ जैसी उक्ति उनकी इस मंशा को सहज ही प्रमाणित कर देती है.
उमा नेहरू के लेखन के संदर्भ में पुस्तक की भूमिका में प्रज्ञा पाठक कहती हैं-
“बीसवीं शताब्दी के आरम्भ के तीन दशकों में स्त्रियों की दशा और दिशा को लेकर गम्भीर बहस चल रही थी. इस बहस में अपनी बेबाक बयानी, अग्रगामी सोच, दुनिया भर की स्त्रियों की स्थिति का ज्ञान और भारतीय स्त्री की जमीनी हकीकत से परिचय के साथ उमा नेहरू एक नया और सुस्पष्ट दृष्टिकोण लेकर सामने आती हैं. यह वो समय है जहां स्त्रियों के मुद्दों पर स्वयं स्त्रियां सबसे ज्यादा सक्रिय दिखाई देती हैं. ऐसे में उमा नेहरू का चिन्तन, सदियों की रूढ़ि ग्रस्त परम्पराओं को झकझोरता हुआ समानता और स्वतंत्रता की नयी राहों की खोज का आवाहन है. वे डरती नहीं हैं, झिझकती नहीं हैं, ठीक उसी बिंदु पर हाथ रखती हैं जो समाज में असमानता का केन्द्र है. तरीका भी कबीर सा-अक्खड़ और बैलोस.’’
आगरा में
जन्मी उमा नेहरू का विवाह जवाहरलाल नेहरू के चचेरे भाई श्यामलाल नेहरू के साथ हुआ था.
आपकी राजनीतिक सक्रियता के संदर्भ में हरवंशराय बच्चन ने अपनी आत्मकथा में लिखा है
कि- मोतीलाल अथवा जवाहरलाल नेहरू की अनुपस्थिति में राजनीतिक सभाओं का नेतृत्व उमा
नेहरू ही किया करतीं थीं.
असहयोग आंदोलन, नमक कानून भंग करना, प्रभात फेरी लगाना, जुलूस निकालना, विदेशी कपड़ों और शराब की दुकानों पर धरना देना जैसे अनेक कार्यों के अलावा 1942 में भारत छोड़ो आन्दोलन में इलाहाबाद से जेल भी गई. वह आल इंडिया विमेंस कॅान्फ्रेंस की ब्रांच अध्यक्ष रहीं. स्वतंत्र भारत में वह सीतापुर से पहली और दूसरी लोकसभा की सदस्य निर्वाचित हुई थीं.
‘‘रखियो गालिब
मुझे इस तल्ख नवाई से मुआफ
आज कुछ दर्द
मेरे दिल में सिवा होता है’’
‘स्त्री दर्पण’,
मार्च 1918 में ‘हमारे समाज सुधारक’ शीर्षक लेख की शुरुआत उमा नेहरू गालिब के इस जोरदार
शेर के साथ करती हैं. एक ही समय और लगभग एक ही रंग रूप में संसार के समस्त सभ्य भागों
में उपस्थित विप्लवकारी आंदोलन से उद्भूत व्यक्तित्व चेतना और स्वतंत्रता प्रेम के
कारण भारत की प्राचीन समाज-व्यवस्था की भी नींवें हिल गईं, इस आंदोलन ने 'भारत जैसे
वनवासी योगी को अपनी सहस्रवर्षी समाधि' छोड़ कर भौतिक संसार की ओर उन्मुख हो, उन्हीं
प्रश्नों का उत्तर देने, उन्हीं आदर्शों को परखने के लिए बाध्य किया जो उस समय समस्त
संसार के सामने उपस्थित थे. भारत की दीर्घ आध्यात्मिक समाधि को वह एक बड़ी भूल के रूप
में देखती हैं.
अपने समय में राष्ट्रीय और राजनीतिक प्रश्नों के अतिरिक्त जो महान प्रश्न वह संसार के सामने देखती हैं वह है- 'आने वाले समय में स्त्री के अधिकार क्या होंगे, उसे कौन सी पदवी दी जायेगी?’
राष्ट्रीय
और अन्य राजनीतिक प्रश्नों के समान इस प्रश्न को हल करने में भी वह भारत को पीछे देखती
हैं. बदल रहे संसार के बरक्स रामायण, महाभारत
युग की वापसी के 'आकाश पुष्पी' स्वप्न में लीन भारत के पास यथार्थ में उपस्थित
स्त्री के प्रश्नों के कोई जवाब नहीं हैं और वह उनके प्रत्युत्तर में ’अपने परम्परा-पूजकों
की भजन मंडली’ का मुखापेक्षी हो कह उठता है- ‘अपनी मृदंग और जोर से बजाओ.’
भारत आर्थिक
और राजनीतिक मामलों में पश्चिमी सिद्धांतों को पूर्ण रीति से स्वीकार कर अपने संगठन
में स्थापित करने के बावजूद स्त्री-पुरुष संबंधी विषयों में पश्चिम की वर्तमान स्थितियों
के प्रति उदासीन है. वह देखती हैं-
जब संसार के युवक युवतियां अपने सम्मिलित परिश्रम से उन्नति
के अन्तिम सोपानों को छूने को तत्पर हैं 'भारतीय नारी एक शक्तिहीन पक्षी के समान पुरुषरूपी
बिल्लियों के भय से घर में छुपी बैठी है.’
यहां उल्लेखनीय है कि ये संवाद किसी एकालाप का हिस्सा
नहीं हैं, बाकायदा विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं के माध्यम से चल रहीं बहसो की बोलती बंद करने वाले उत्तर-प्रत्युतर हैं, जिनके संदर्भ यथा सम्भव लेखिका अथवा पुस्तक की संपादिका ने उपलब्ध
कराए हैं. पुस्तक की लम्बी भूमिका द्वारा प्रज्ञा पाठक ने तत्समय के स्त्री लेखन और उसके परिदृश्य को गंभीरता से प्रस्तुत किया है, जिसके आलोक में
उमा नेहरू के चिंतन की धार साधारण पाठक का ध्यान खींचने में सक्षम होगी.
स्त्रियों की अत्यधिक हीन दशा और अत्यल्प सुधार के प्रयत्नों पर भी वह संतुलित बात करती दिखती हैं, जिनका आधार हमेशा ज्ञान और तर्क होते हैं. इसी तरह के संतुलन की एक रोचक बानगी है-
’’परदा उठाऊं
अथवा न उठाऊं
और उठाऊं
तो कितना उठाऊं’
स्थितियों की भयावहता पेश कर अपने सुधारकों की लानत-मलामत करने की भावना उनमें कहीं नहीं दिखती, थोड़े से बात बन जाए तो बहुत की जरूरत ही कहां है? भारतीय शिक्षित महिला के कुमार्ग पर चलने के लांछन पर वह खुलकर अपनी नाराजगी प्रकट करतीं हैं. इतना ही नहीं पश्चिमी धारा के बहाव में बही जा रही तत्कालीन पुरुष जाति को फटकारती हैं- 'जिनकी स्वयं की नस नस में पश्चिमी सभ्यता का रुधिर दौड़ रहा हो, उनका भारतीय शिक्षित महिला को दोषी ठहराना एक 'निर्लज्ज छलनी का सुई के नाके' का उपहास करने के समान है.'
वह विस्तार से पश्चिमी प्रभाव की सामाजिक मनोवैज्ञानिक व्याख्या प्रस्तुत करती हैं-'पुरुष-स्त्री की रचना में प्रकृति द्वारा मानसिक तथा हार्दिक भेद उत्पन्न नहीं किए गए हैं अतः आवश्यक नहीं कि संसार के व्यवहार और रहन सहन में दोनों भिन्न-भिन्न जीवन प्रणालियां ग्रहण करें. एक जीवन प्रणाली जो एक के लिए श्रेष्ठ है, वह दूसरे के लिए हीन कैसे हो सकती है? एक स्वतंत्र और दूसरा बंदी, एक स्वाधीन और दूसरा आश्रित यह स्थिति स्त्री को 'अशान्त' और दुखी नहीं करेगी तो क्या करेगी? '
पुस्तक में
संगृहीत लेख 'हमारे सामाजिक सांचे' में वे विवाह संस्था की खामियों को उजागर करती हुई
स्त्री के लिए समाज निर्मित चार सांचों का वर्णन कथात्मकता के साथ करती हैं.
1 प्राचीनी
2 तुरुक 3 विलायती और 4 मिश्रित विशेषता वाला सांचा जिसे वह 'शेखचिल्ली सांचा' कहती
हैं. ’विलायती श्रेणी में स्त्रियों को अन्य श्रेणियों से अधिक स्वतंत्रता प्राप्त
थी, किन्तु इसका मतलब यह नहीं था कि इस श्रेणी ने स्त्री के 'स्वत्व और अधिकारों' को
ग्रहण कर लिया था, बल्कि इसलिए कि वह स्त्री
को अपनी रुचि मुताबिक हंसने-बोलने, खाने-पीने और खेल-तमाशों में शामिल कर सकें. मन मुताबिक दी गई स्वतंत्रता के दूरगामी
परिणामों में भी वह देख पाती हैं कि-
इस समय पश्चिमी
स्त्री में एक घोर परिवर्तन उपस्थित कर रहे वे आर्थिक और नैतिक नियम, जो भारत को स्वीकार्य
नहीं हैं. अनजाने में ही उन नियमों की स्थापना भारत में विलायती जीवन शैली पसंद पुरुषों
द्वारा भली भांति की जा रही है. परंतु जब तक उन्हें इस बात का बोध होगा वे नियम भारतीय
समाज में अपनी पैठ बना चुके होंगे.
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| (प्रज्ञा पाठक) |
मजे की बात
यह भी कि स्त्री के 'नेत्र, जबान, शरीर, विचारों
और अभिलाषाओं की स्वतंत्रता' छीन लेने वाले सभी सांचे समाज में एकसाथ प्रचलित थे, और
एक दूसरे को मूर्ख और असभ्य सिद्ध करते रहते थे. एक श्रेणी की स्त्री आए दिन दूसरी
श्रेणी में ब्याह दी जाती थी और दुर्गति को प्राप्त होती. इन सांचों को तैयार करते हुए बिल्कुल ध्यान नहीं
दिया जाता था कि विवाह कर आने वाली स्त्री एक हृदय भी साथ लेकर आएगी जिसमें अपनी इच्छानुसार
जीवन जीने की आकांक्षाएँ दहक रहीं होंगी.
अच्छी स्त्री की छवि से आक्रान्त अपने समय की स्त्री के लिए वह सीता, दमयंती, द्रौपदी जैसी शिकायत न करने वाली स्त्रियों की उपमाओं को पसंद नहीं करतीं, उनके अनुसार- प्रत्येक काल के नर नारियों के चरित्र का संगठन अपने युगानुरूप होता है अतः रामायण महाभारत युगीन चरित्रों की सृष्टि वर्तमान युग में सम्भव नहीं.
स्त्री के संदर्भ में भारतीय समाज की तुलना वह प्रोक्रस्तस नामक डाकू के पंलग से करती हैं. प्रोक्रस्तस भूले भटके यात्रियों को लूटने के इरादे से अपने पलंग पर ला सुलाता था. यात्री का कद पलंग से छोटा हुआ तो खींचकर बड़ा कर देता और बड़ा हुआ तो उतना अंग काट देता था. इस प्रकार लोगों को हत्या कर लूट लेता था. डाकू के पास एक ही पलंग था अत्याचारी भारतीय समाज के पास कई-कई पलंग हैं- जिन पर वह अपने बेबस शिकारों को बारम्बार खींचता और काटता है. इतना अंतर और है कि प्रोक्रस्तस अपने शिकारों के कद स्वयं छोटे- बड़े नहीं बनाता था जबकि भयंकर अत्याचारी हमारा समाज ऐसा भी करता है.
वस्तुतः स्वतंत्रता, समता, न्याय की कसौटी पर
खरी खरी कहने वाली स्त्री का नोटिस न लिया जाना इतिहास की कोई बड़ी घटना नहीं है.
समाज सुधारकों
की अपेक्षित योग्यता में वह 'उदार हृदय, विशाल दृष्टि और गूढ़ बुद्धि के साथ संसार की
गति अनुभव करने और समझने की सामर्थ्य' को आवश्यक मानती हैं. तत्कालीन समाज के नवयुवक जिन आधारों पर समाज सुधार
के स्वप्न देख रहे थे, उसे वह 'सामाजिक सुधार नहीं बल्कि स्त्री संहार' कहती हैं.
कमोबेश यह
उमा नेहरू के चिंतन को समझने की कसौटी या सामर्थ्य भी थी, जिसके अभाव में उमा नेहरू
के अग्रगामी चिंतन को तमाम तर्कहीन आरोपों
के द्वारा खारिज करने का प्रयास किया गया. उन तमाम तर्कहीन आरोपों के जवाब इस पुस्तक
में निहित हैं.
इस पुस्तक में संगृहीत लेख 'हमारे हृदय' के माध्यम से 1918 में उमा नेहरू के माध्यम से अपना हृदय खोल रही स्त्री का चर्चा एक शताब्दी बाद ही सही आकृष्ट करता है-
‘‘संसार निवासियों! हमारे भी एक हृदय है, और यह हृदय उन सारी उमंगों से परिपूर्ण है जो तुम्हारे हृदयों में तरंगें ले रही हैं. इसमें संदेह नहीं कि यह विचित्र वाणी तुम्हें आश्चर्यजनक और अविश्वसनीय प्रतीत होती होगी, परन्तु यह सत्य है.’’
अत्युक्ति न होगी कि इस संबोधन में कुटिल खलकामी पुरुष समाज को वर्षों बाद 1967 में कृष्णा सोबती के माध्यम से बोली मित्रों की ध्वनि का भान हुआ हो और उसने हट हट, दुर दुर वाली भूमिका को संभाल लिया हो, किन्तु उमा नेहरू के सामाजिक सरोकार इतने प्रबल हैं कि उन्हें एक संकुचित मर्यादा में देखने की हिमाकत नहीं की जा सकती. स्त्री-पुरुष के वास्तविक प्रेम एवं विवाह संबंध के लिए 'दो स्वतंत्र और समान हृदय' की जरूरत होती है. 'दासी और स्वामी के प्रेम को वह घृणामय, अस्थिर और अप्राकृतिक मानती हैं. स्त्री-पुरुष संबंध को अधिक विशाल, उच्च और पवित्र बनाने के लिए उसमें मित्र भाव उत्पन्न होने की आवश्यकता को उन्होंने शिद्दत से महसूस किया था.
स्त्री के लिए आत्मत्याग की महिमा गढ़ने वाले समाज से वह इस प्राचीन कहानी को खत्म करने की बात करती हैं- 'जो आत्मत्याग अपनी आत्मा, शरीर और हृदय का विनाश करता हो, जो दूसरों को स्वार्थी, अन्यायी और अत्याचारी बनाता हो और अपनी संतान के मार्ग में कांटे और विष बोकर समाज के सम्मिलित जीवन को दुर्बल और हीन बनाता हो, उसे वह 'आत्म त्याग नहीं, आत्महत्या' मानती हैं.'
उन्हें बार-बार
कहना पड़ता हैं 'हम नयन विहीन विदेशी आदर्शों की अनुगामी नहीं हैं,' जाति द्रोही नहीं
हैं और न ही, अपनी जाति के ‘स्वर्गीय आनन्द’ को कष्ट और दुख में परिवर्तित करना चाहती
हैं.
वह तो स्त्री के 'अन्नदाता' को उसके ‘आनन्द’ की वास्तविक दशा दर्शाना चाहती हैं. स्वतंत्रता जनक शंख फूंकने में उनका उद्देश्य स्त्री को ‘अशान्त’ करना नहीं अपितु उसको मृत्यु-निद्रा से जगाना है क्योंकि 'स्त्री-जागृति के बिना संसार अपने अन्तिम विकास को प्राप्त नहीं हो सकता.’
मर्दों को
स्त्रियों के भीतरी हालात की प्रामाणिक जानकारी
देने के उद्देश्य से 'मर्यादा' पत्रिका के फरवरी 1914, स्त्री केंद्रित अंक
के निवेदन में वह औरतों की कहानी औरतों की जबानी कहलवाने की चर्चा करती हैं. क्योंकि ‘स्त्री के हृदय की गति स्त्री से अधिक
पुरुष नहीं जान सकता.'
प्रकारान्तर एवं कालान्तर से ‘श्रृंखला की कड़ियां’ में इस चिंतन की आवृत्ति देखी जा सकती है. भले ही ‘ध्वंस के लिए ध्वंस’ महादेवी वर्मा का सिद्धांत न हो, पर ध्वंस तो उमा नेहरू के चिंतन का भी अंग नहीं दिखता. महादेवी वर्मा बिना कोई नाम लिए ‘घर और बाहर’ नामक अपने पहले लेख में लिखती हैं-
“भविष्य के स्त्री समाज की रूप-रेखा हमें इन्हीं विदुषियों से मिलेगी, जिन्हें हम अभी अल्प-संख्यक जानकर जानना नहीं चाहते, जिन्हें हम अपवाद मानकर समझना नहीं चाहते. वे अपवाद हो सकती हैं, परंतु क्रमागत व्यवस्था के विरुद्ध किसी नवीन परिवर्तन को ले आने का श्रेय ऐसे अपवादों को ही मिलता है, क्योंकि ऐसे व्यक्तियों के बिना हम असंभाव्य को साधारण या संभव समझ ही नहीं पाते.’’
उमा नेहरू निःसंदेह अपने समय की ऐसी ही अल्प-संख्यक विदुषी हैं. भारतीय स्त्री के मानस को कई विवादित स्त्री प्रश्नों के लिए तैयार न देख, तमाम जरूरी मुद्दों की चर्चा वह लगातार स्थगित करतीं, उन पर चर्चा हो सकने की जमीन तैयार होने की प्रतीक्षा करने की बात करती हैं.
सृष्टि के
आरम्भ से ही स्त्री का सुख-दुख अव्यक्त रहा है.
वह दीपक के समान धीरे-धीरे जलती है,
संसार इसके इस 'विचित्र मौन को आनन्द, सुख और शान्ति' समझता आया है.
स्त्री के स्वतंत्रता-प्रेम की अग्नि को क्रोध और अत्याचार से नहीं बुझाया जा सकता, स्वतंत्रता के मंदिर की नींवें स्वतंत्रता-प्रेमियों के रक्त से ही दृढ़ होती हैं. अपने समय की स्वतंत्रता उपासक स्त्रियों के हृदयों में वह इस रुधिर का अभाव नहीं देखतीं. वह समय भी उन्हें निकट दिखाई देता है जिसमें 'स्त्रियां पशु की श्रेणी से निकल, मानवी गौरव प्राप्त कर लेंगी.’
‘हमारी सूरत’ लेख में वह सौन्दर्य के दुरादर्श पर गम्भीरता से विचार करती हैं- उनकी 'सम्मति में पुरुष की सौन्दर्य पूजा और स्त्री की सौन्दर्य बढ़ाने की चेष्टा', दोनों ने मानवी समाज के लिए बड़े हानिकारक आदर्श प्रस्तुत किए हैं.
भले ही खूबसूरती
एक विचित्र शक्ति है, वह देखने वाले को प्रसन्न, व्याकुल कर मोह लेती है किन्तु चिरस्थायी
नहीं है. संसार ने खूबसूरती को फिजूल ही वह स्थान दे रखा है जिसके वह योग्य नहीं. सौन्दर्य
के बेवजह महत्व के कारण सुन्दर, औसत और असुन्दर सभी स्त्रियां त्रास पाती हैं. ‘भार्य्या
रूपवती शत्रु’ है और वह जिन्हें प्रकृति ने स्वरूपवती नहीं बनाया उनका तो जीवन ही संकट
में पड़ जाता है. इस तथ्य को वह बहुत संवेदनशीलता के साथ व्याख्यायित करती हैं.
पुरुष को अधम बनाने और समाज की आधी जनसंख्या स्त्री को मिटाने वाले सौन्दर्य सम्पादन को वह सम्मिलित जीवन के लिए लाभकारी नहीं मानतीं.
कुशिक्षा
और कुरीतियों के मिटाए नवयुवकों की सौन्दर्य- पुकार और विचारपूर्ण, स्वतंत्रता उपासक
स्त्री का तिरस्कार उन्हें आहत करता है.
एक ओर संसार
की गति समझ, उसका मुकाबला कर, उस पर विजय प्राप्त करने की योग्यता और सामर्थ्य से रहित
स्त्री अपनी सूरत और शरीर को किसी ग्राहक के हाथ सदा के लिए बेच आश्रित बनने को विवश
होती है, तो दूसरी ओर सौन्दर्य की विषमय कटार से घायल स्त्री का दुख तब और बढ़ जाता
है जब उसका स्वार्थी ग्राहक उसे हीन दासी से भी हीन सारे कर्तव्य निर्वाह के लिए विवश
कर देता है. विवश स्त्री के पास ऐसा कोई विकल्प नहीं होता कि वह अपने पूजन की वास्तविक
दशा अपने स्वामी को दर्शा सके.
इसी पुस्तक का एक महत्वपूर्ण लेख ‘स्त्रियों के अधिकार’ जनवरी, 1919 में 'मर्यादा' पत्रिका में प्रकाशित हुआ था.
उस समय तक
‘समाज में एक श्रेणी ऐसे सज्जनों की उत्पन्न हो गई थी जो धार्मिक और नैतिक नियमों को हानिकर समझने लगी थी और पुराने विचारों के लोग भी सभाओं में और साधारण अवसरों पर स्त्री को पुरुष
से हीन और नीच कहते शरमाने लगे थे. किन्तु
स्त्रियों के अधिकारों का विरोध बंद नहीं हुआ था. धार्मिक और नैतिक नियमों पर नहीं
अब यह विरोध सामाजिक और राजनीतिक कारणों के आधार पर किया जाता था.
इस लेख में
उमा नेहरू उन एतराजों के करारे जवाब देती दिखती हैं जो भारतीय स्त्रियों के कौंसिल
के मेम्बर चुनने और कौंसिल के मेम्बर बनने में किए जाते हैं-
1- समाज परिवर्तन
के लिए तैयार नहीं.
2- भारतीय
महिलाएं अशिक्षित हैं, उनमें पर्दा है और राजनैतिक अधिकारों के व्यवहार का ज्ञान नहीं
है.
3- यदि भारतीय
स्त्रियों को वोट देने और सभासद बनने का अधिकार दे दिया गया तो वे पश्चिमी स्त्रियों
के समान मर्दानी हो जाएंगी.
4- जब भारतीय स्त्रियां स्वयं कुछ नहीं मांगतीं या अधिकार लेना नहीं चाहती तो यह अधिकार देकर उनका कष्ट क्यों बढ़ाना.
तीसरे एतराज के जवाब में वह कहती हैं- पश्चिमी स्त्रियों को अपने सामाजिक, राजनैतिक अधिकारों के लिए वहां के पुरुषों से लड़ना पड़ा जिसके कारण वह मर्दानी हुई हैं, यदि स्त्रियों को मर्दानी बनने से रोकना है तो एकमात्र उपाय उनको उनके अधिकार दे देना है.
चौथे एतराज के जवाब में कटाक्ष करती कहती हैं- ‘‘हम पर एतराज करने वालों को क्या उन सैकड़ों भारतीय पुरुषों की खबर नहीं जो इन दिनों सरकार की हां में हां मिलाकर यह कह रहे हैं कि भारत अभी स्वराज के लिए तैयार नहीं है.’’
इस एक लेख से उमा नेहरू के चिंतन के ताप और दूरदर्शी सरोकारों की झलक ली जा सकती है.
‘भारतीय पुनर्जागरण में अग्रणी महिलाएं’ नामक अपनी पुस्तक की भूमिका में कमला मनकेकर लिखती हैं- ब्रिटिश एवं कुछ अन्य औद्योगिक दृष्टि से विकसित देशों की महिलाओं द्वारा चलाए गये मताधिकार- आंदोलन की तरह भारतीय महिलाओं को कोई आंदोलन नहीं चलाना पड़ा.
इस बात के प्रति पक्ष को उमा नेहरू के उपरोक्त लेख के आलोक में देखें तो कुछ दिमागी जाले अवश्य झड़ जाएंगे. यहां स्पष्ट करना जरूरी है कि कमला नेहरू, रामेश्वरी नेहरू को स्थान देने वाली इस महत्त्वपूर्ण किताब में उमा नेहरू की प्रसंगवश भी कहीं चर्चा नहीं. क्या आंदोलन हमेशा सड़कों पर ही स्थान पाते हैं? विचार-विमर्श द्वारा प्रतिरोध कर रहे कलम के सिपाही का कोई महत्व नहीं? चाहे उग्रनारीवादिनी ही कह लो हिंदी क्षेत्र में स्त्रियों के सम्मान एवं अधिकारों का संरक्षण कर रही एक विदुषी के महत्व को न देखना- आंकना, उसी प्रवृति से परिचालित होता दिखता है जिसकी आधीनतावश हिंदी आलोचना के शिखर पुरुष को एक जुमला फेकना पड़ता है कि-‘मैं अमुक पत्रिका नहीं पढ़ता.’
बीबीसी पर 17 अगस्त, 2020 को प्रकाशित नसीरुद्दीन के लेख के अनुसार- 9 दिसम्बर, 1932 में अपनी मृत्यु से चंद घंटे पहले रुकैया सखावत ने ‘नारीरो ओधिकार’ अर्थात स्त्रियों के अधिकार नामक लेख की शुरुआत की थी, जबकि उमा नेहरू का 'स्त्रियों के अधिकार' विषयक लेख 1919 में छप चुका था. उमा नेहरू और बंगाल की बहुचर्चित नारीवादी विचारक रुकैया सखावत का लेखन समय और शुरुआती जीवन वृत लगभग समान है. उम्र में रुकैया, उमा नेहरू से महज चार वर्ष बड़ी थीं. दोनों का विवाह सत्रह-अठारह की समान उम्र में हुआ था. विवाह के फलस्वरूप रुकैया को सखावत हुसैन जैसे तरक्की पसंद व्यक्ति का साहचर्य मिला तो उमा नेहरू को पूरा परिवेश ही अपनी क्षमताओं को मांजने के लिए उपलब्ध हुआ. दोनों लेखिकाओं का चिंतन सिर्फ स्त्री तक केंद्रित नहीं है. वे दोनों पारस्परिकता का एक ऐसा समाज चाहती हैं जिसमें स्त्री के हाथों में भी रोजगार हो. रुकैया का ‘सुल्तानाज ड्रीम’ 1905 में छप चुका था जबकि उमा नेहरू का पहला लेख प्रज्ञा पाठक की किताब के हिसाब से 1910 में आता है . भारतेंदु ने उमा नेहरू के जन्म वर्ष में निबन्ध के माध्यम से पूछा था कि भारतवर्षोंन्नति कैसे हो सकती है? उमा नेहरू का समस्त लेखन और उनके समस्त कार्य कलाप जैसे उसी के प्रत्युत्तर में कहते हैं- स्त्रियों की उन्नति से.
विवाहित स्त्री
और आभूषण धारण करने की अनिवार्यता पर भी आपने 'हमारे जेवर' नामक दो लेखों में बड़े विस्तार
से लिखा है. बात रामायण काल से शुरु होती हैं जहां सीता ही नहीं राम भी आभूषण पहनते
हैं किन्तु बाद में पुरुषों द्वारा आभूषण न पहनने की प्रतिष्ठा हो गई.
‘अज्ञान कुरीतियों
को दीर्घजीवी बना देता है.'
सूत्रवाक्य
देकर आचार्य शुक्ल की शैली में आभूषण धारण करने-कराने का पूरा मनोविज्ञान सामने रख
देती हैं कि आप सहमत हुए बिना नहीं रह सकते.
‘जेवर पहनने की मर्यादा को वह स्त्री के शारीरिक पतन की अन्तिम सीमा’ कहती हैं. ‘इस मर्यादा की सुवर्णमय जंजीरों ने स्त्री की स्वतंत्रता अपहरण को भी स्वर्णमय बना दिया है.’ लेख के दूसरे भाग में वे दुनिया जहान से तमाम उद्धरण देतीं परिहास पूर्ण नाटकीय शैली में अपनी पाठिकाओं से सीधा संवाद करती हैं.
उमा नेहरू
समाज को एक प्राकृतिक संस्था मानती हैं. इसमें जीवित व्यक्ति की तरह शरीर, जीव, दिमाग
जैसे सब लक्षण होते हैं अतः उसे जीवित जागृत व्यक्ति के रूप में देखती हैं. स्त्री-पुरुष
इसके दो अंग हैं. इन दोनों की शक्ति, सहानुभूति, प्रेम और त्याग समाज के संगठन के लिए
जरूरी हैं. समाज की उन्नति इन दोनों की उन्नति पर निर्भर थी किन्तु सामाजिक जाल बुनने
का कार्य पुरुष ने अकेले किया अतः इसमें ऐसी गांठें पड़ गई कि उन्हें सुलझाना असम्भव
हो गया. पुरुष की दुर्गति समाज को उतनी हानि
नहीं पहुंचाती जितनी स्त्री की दुर्गति पहुंचा
सकती है.
दुर्बल और खराब सेहत वाली स्त्रियों का समाज कभी
अच्छी दशा को प्राप्त नहीं हो सकता. स्त्रियों की मूर्खता अर्थात अशिक्षा भी समाज की
उन्नति में बड़ी बांधा है.
‘स्त्री के
सदाचार के प्रश्न को समाज ने पागलों और अभियुक्तों के सदाचार के सदृश हल किया है’
अतः वह नैतिक जिम्मेदारी और सदाचार से इतनी हीन हो गई कि किसी काम की नहीं रही. स्त्रियों को असहाय दुर्बल और निकम्मा बनाकर पुरुष का स्वयं इन दुर्गुणों से बचे रहना असंभव था, क्योंकि बालक किसी भी दशा में अपनी माता के प्रभाव से मुक्त नहीं रह सकता. वास्तव में संसार की असल शासनकर्ता स्त्रियां हैं. भावी संतानों की किस्मत उनके हाथ में होती है अतः स्त्री को काम करने के अवसर मिलने चाहिए जिससे उनका चरित्र संगठित हो सके. काम के अवसर के बिना उनमें उन मानसिक और शारीरिक गुणों का विकास नहीं हो सकता जो संतान को सुशिक्षित और होनहार बनाने के लिए आवश्यक हैं. स्त्री का कार्य 'पुरुष की सुख पात्र' होने तक सीमित नहीं है.
'सामाजिक
विवाह में स्त्रियों का स्थान' 1935 में चांद में छपे इस अन्तिम लेख में वह समाज एवं
राष्ट्र के लिए अन्तर जातीय व अन्य जातीय विवाह को लाभदायक मानती हैं. अंध परम्परा
पूजकों से मुखातिब हो कहती हैं-
‘‘हमारे पूर्वजों
ने अपने-अपने समय में जो प्रबंध किए, खूब किए, और यदि वे लोग आज उपस्थित होते तो संसार
गति को देख, फिर ऐसे प्रबन्ध करते कि हमारी अभागिनी जाति एक जीवित राष्ट्र बन जाती.
परन्तु वे यह नहीं जानते थे कि हम अभागों के पास अपनी गांठ की कुछ भी बुद्धि न होगी.
रही व्यक्तित्व की बात, सो परिवर्तन का द्वार बंद कर देने से, हिन्दू जाति का अस्तित्व
ही मिट गया, मिट रहा है. व्यक्तित्व की कौन कहे!’’
स्त्री के दृष्टिकोण से भी अन्तर जातीय व अन्य जातीय विवाह को लाभदायक मानती कहती हैं- मानव समाज में विवाह यदि स्त्री की जीविका है तो जातीय विवाह उसकी जीविका के अवसरों को कम करता है.
खद्दर और
चर्खा के प्रति स्त्रियों का रुझान न होने से विचलित उमा नेहरू ने 1926 में 'गृहलक्ष्मी'
पत्रिका को लेख न लिख सकने के इंकार में लिखा था- ‘जो विपरीती हम स्त्रियों की चर्खें
की ओर रही है उसे देखते हुए मुझे इस विषय पर कुछ लिखने की हिम्मत नहीं पड़ती. और वास्तव
में अब कहने सुनने का समय भी नहीं बहुत कहा जा चुका ........ कहानियां, लेक्चर और लेख
सुनते-सुनते उनका रस भी जाता रहा और हमारे काम करने की शक्ति भी. अब तो जो कुछ हो सके
आदमी करके दिखावे …….’
सम्पूर्ण
लेख का विकल्प बनकर पत्रिका में छपे इस इनकार पत्र से अपने समय में उमा नेहरू के कद
और लोकप्रियता का अनुमान सहज ही लग जाता है. खामोश होकर जमीनी काम को प्राथमिकता देने
वाली उमा नेहरू बीस वर्ष के अंतराल बाद संसद में बोलती दिखती हैं. तेवर वही हर हाल
में सूरत बदलनी चाहिए. मार्च, 1955 की संसद में वह कह रही हैं-
‘‘मैं अभी
चीन होकर आई हूं और वहां पर मैंने देखा कि हमसे छोटे-छोटे हाथ पैर वाली औरतें बराबर
स्टील और लोहे से काम कर रही हैं. इसी तरह से मैं आपसे यह कहूंगी बंदूक चलाना कोई मुश्किल
चीज नहीं है. मैं फिर आपसे कहूंगी आपके कैन्टोनमेंट्स में जितनी सरविसेज हैं.........सब
औरतों के लिए खुली होनी चाहिए.’’
'उमा नेहरू
संसद में' शीर्षक से किताब के अंत में संसद की कार्यवाहियों में उमा नेहरू की सक्रिय
भागीदारी के दस्तावेज अर्थात उनके अनेक वक्तव्य संकलित हैं. स्त्री स्वास्थ्य, रोजगार
के अवसर, बालकों की शिक्षा, जात-पात मुक्त भारत पर, कल्याणकारी राज्य की पुलिस पर, सुधार कानूनों पर,
स्त्री नागरिकता पर, दहेज, रोजगार सुरक्षा, छात्र राजनीति, विश्वविद्यालयों में अनुशासन,
सेंसर बोर्ड, बाल फिल्म, सहकारी खेती, सामुदायिक विकास, अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति,
अपराधी परिवीक्षा, समान वेतन, भाषा विवाद, मातृत्व लाभ जैसे तमाम मुद्दों पर अपनी बेबाक
राय रखतीं हैं. संसद में दिए गए उमा नेहरू के भाषणों में उनके चिंतन के विस्तार को
देखा जा सकता है.
इस पुस्तक के माध्यम से प्रज्ञा पाठक ने बीसवीं सदी के शुरुआती
लेखन में सक्रिय एक अल्प ज्ञात प्रखर लेखिका उमा नेहरू के व्यक्तित्व और उनके लेखन को समग्रता से खोज
कर प्रस्तुत किया है. हिंदी क्षेत्र में स्त्री
लेखन एवं स्त्री आंदोलन की चुप्पी के रूप में चिन्हित समय से निकली यह पुस्तक निश्चित
ही नारी आंदोलन व स्त्री लेखन के इतिहास में एक सार्थक हस्तक्षेप है. दो चार लेखों
के आधार पर किसी लेखक एवं उसकी वैचारिकी को समझने के अपने जोखिम होते हैं अतः न्याय सम्मत तो समग्रता
में देखना ही हो सकता है. आने वाले समय में उत्सुक शोधार्थियों, पारखी विषय विशेषज्ञों
की परख, शोध, आलोचना द्वारा उमा नेहरू के व्यक्तित्व एवं चिंतन के विविध आयाम खुलेंगे
जो स्त्री लेखन के इतिहास में इनका मुकाम तय करेंगे.



ललिता यादव का समीक्षात्मक आलेख ,जो स्त्री-अस्मिता के सवालों पर उमा नेहरू के व्यक्तित्व और कृतित्व के अछूते पहलुओं को प्रज्ञा पाठक द्वारा संपादित पुस्तक में वर्णित है, आज के इस स्त्री-विमर्श के दौर में एक महत्वपूर्ण विषय है। इस इक्कीसवीं सदी में जबकि स्त्री की स्वाधीनता के रास्ते अब भी अवरूद्ध हैं और उनपर अनगिनत पहरे और पाबंदियां हैं , बीसवीं सदी के प्रारंभिक दशकों में उनके द्वारा किये गये प्रयासों और उनके साहित्यिक अवदान को याद करना कई अर्थों में मूल्यवान है ।
जवाब देंहटाएंबहुत बढ़िया लिखा ललिता जी पुस्तक की खूबियो को आपने बखूबी उकेरा है।
जवाब देंहटाएंइतनी ईमानदारी की मेहनत से जुटाये गयी दुर्लभ सामग्री पर प्रज्ञा पाठक जी को बहुत साधुवाद।
बहुत ही उम्दा लेख मैम। वर्तमान परिस्थिति में अत्यंत मूल्यवान है,क्योंकि आज भी स्त्री का शोषण उसी अनुपात में हो रहा है बस उसका स्वरूप बदल गया है। उमा नेहरू के बारे में ज्ञान वर्धक जानकारी देने के लिए आपको बहुत बहुत धन्यवाद।
जवाब देंहटाएंप्रज्ञा पाठक की यह पुस्तक उमा नेहरू को आरंभिक भारतीय स्त्री- चिंतक के रूप में प्रतिष्ठित करती है। ऐसे शोध- लेखन हिन्दी जगत में निर्णायक अहमियत रखते हैं। ललिता यादव की इस समीक्षा में भी उनकी स्त्री- दृष्टि अन्तर्व्याप्त है। तभी वे विभिन्न स्त्री मुद्दों पर पुस्तक से उमा नेहरू के विचारों की सिलसिलेवार ओर तार्किक प्रस्तुति करती हैं। हिन्दी स्त्री- साहित्य में यह पुस्तक एक मूल्यवान अवदान है।
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