गीत चतुर्वेदी : छह कविताएं

Photo :Tim Walker :  Georgina and Mice









गीत चतुर्वेदी की प्रस्तुत छह कविताएं समालोचन पर  पहली बार प्रकाशित हो रही हैं.  गीत हिंदी कविता के अब एक तरह से वैश्विक पहचान बन चुके हैं. उनकी कविताओं का चौदह भाषाओँ में अनुवाद हो चुका है और इन अनुवादों को सराहा गया है.

गीत की कविताएँ इक्कीसवीं सदी की कविताएँ हैं, उनकी कविताओं का मिजाज़ और मुहावरा दोनों  समय के साथ बदला है और समुचित हुआ है.  ये कविताएँ और अधिक कविता हुई हैं.  इनमें आभासी और यांत्रिक समय के मनुष्य और  उसके होने के लगातार हो रहे कत्लेआम का बहता ठंडा लहू है.  इसमें दरअसल कलाओं का वह उजास है जिसमें हम अपना आदमी होना देख पाते हैं.

कविताएँ खास समालोचन के पाठकों के  लिए.



गीत चतुर्वेदी                                                                   


छह कविताएं 



सुसाइड बॉम्‍बर 

कविता को उपयोगितावादी दृष्टिकोण से देखना मुझे नहीं पसंद. 

फिर भी मन में कई बार आता है ख़याल 
कि कोई मानव-बम
बटन दबाना भूल जाए 
कि उस समय वह कविता पढ़ रहा था 

उसके बाद अपना बम उतार कर 
ख़ुद एक मानव-कविता बन जाए 
ताकि दूसरे बम उसे पढ़ सकें.



बड़े पापा की अंत्‍येष्टि


फूल चढ़ाने के बाद उस लाश को घेरकर हम खड़े हो गए थे. 
सम्‍मान से सिर झुकाए. उसका चेहरा निहारते. 
हममें से कई को लगा कि पल-भर को लाश के होंठ हिले थे. 
हां, हममें से कई को लगा था वैसा, पर हम चुप थे. 
एक ने उसके नथुनों के पास उंगली रखकर जांच भी लिया था. 

उसके दाह के हफ़्तों बाद तक लोगों में चर्चा थी कि 
मरने के बाद भी उस लाश के होंठ पल-भर को हिले थे. 
कैफ़े चलाने वाली एक बुढि़या, जो रिश्‍ते में उसकी कुछ नहीं लगती थी
बिना किसी भावुकता के उसने एक रोज़ मुझसे कहा
मुझे विश्‍वास था, वह आएगा, मरने के बाद भी आएगा 
अपना अधूरा चुंबन पूरा करने. 
53 साल पहले जब वह 17 का था 
गली के पीछे टूटे बल्‍ब वाले लैंपपोस्‍ट के नीचे 
एक लड़की का चुंबन अधूरा छोड़कर भाग गया था. 






यासुजिरो ओज़ू की फिल्मों के लिए


अगर तुम एक देश बनाते, तो वह एक मौन देश होता : तुम्हारे रचे शब्दकोश मौन होते : तुमने कभी देवताओं के आगे हाथ नहीं जोड़ा : ताउम्र तुम एक दृश्य रचते रहे : उनमें तुम मानसिक आंसुओं की तरह अदृश्य रहे

अर्थ की हर तलाश अंतत: एक व्यर्थ है : इस धरती पर जितने बुद्ध, जितने मसीहा आए, इस व्यर्थ को कुछ नए शब्दों में अभिव्यक्त कर गए : मां की तरफ़ से मैं पीड़ा का वंशज हूं : पिता की तरफ़ से अकेलेपन का : जब भी मैं घर की दहलीज़ लांघता हूं : मैं एकांत का इतिहास लांघता हूं 

गुप्त प्रेमी मरकर कहां जाते हैं?
सड़क की तरफ़ खुलने वाली तुम्हारी खिड़की के सामने
लगे खंभे पर बल्ब बनकर चमकते हैं
उनके मर चुकने की ख़बर भी बहुत-बहुत दिनों तक
नहीं मिल पाती

मृत्यु का स्मरण
तमाम अनैक्य का शमन करता है
मेरी आंखें मेरे घुटनों में लगी हैं
मैंने जीवन को हमेशा
विनम्रता से झुककर देखा 

थके क़दमों से एक बूढ़ा सड़क पर चला जा रहा
वह विघटित है
उसके विघटन का कोई अतीत मुझे नहीं पता
मैं उसके चलने की शैली को देख
उसके अतीत के विघटन की कल्पना करता हूं
वह अपनी सज़ा काट चुका है
कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता कि जज साहब उसे
बाइज़्ज़त बरी कर दें 

जो कहते हैं भविष्य दिखता नहीं, मैं उन पर यक़ीन नहीं करता
मैं अपने भविष्यों को सड़कों पर भटकता देखता हूं
उसी तरह मेरे भविष्य
मुझे देख अपना
अतीत जान लेते हैं 

मैं वह शहर हूं जिसकी वर्तनी व उच्चारण
बार-बार बदल देता
एक ताक़तवर राजा 

यह मेरी देह का भूगोल है :
मैं आईने के सामने जब भी निर्वस्त्र खड़ा होता हूं,
मुझे लगता है,
मैं एक भौगोलिक असफलता हूं


कृति : Sunil Gawde 


मेरी भाषामेरा भविष्‍य

शहर के बाहर पुल के नीचे कचरे के ढेर के बीचोंबीच 
मेरी भाषा का सबसे बूढ़ा कवि चाय में डबलरोटी डुबोकर खाता है 

उसने अफ़ज़़ाल से भी पहले शायरी ईजाद की थी 
सारे देवता जूं बनकर उसकी दाढ़ी में रहते हैं 
उसके शरीर पर जितने बाल हैं, वे उसकी अनलिखी कविताएं हैं 

वह उंगलियों से हवा में शब्‍द उकेरता है 
इस तरह, हर रात अपने अतीत को लिखता है एक चिट्ठी 
जो लिफ़ाफ़ा खोजने से पहले ही खो जाती है

मरने से पहले एक बार 
कम से कम एक बार
उस औरत का सही नाम और चेहरा याद करना चाहता है 
जो किसी ज़माने में उसकी कविताओं की किताब 
अपने तकिए के नीचे दबाकर सोती थी 





मैंने कहा, तू कौन है? उसने कहा, आवारगी *

बहुत सारी रातें मैंने काम करके बिताई हैं 
लिखते हुए, पढ़ते हुए.
हमेशा अकेला ही रहा, इसलिए महज़ ख़ुद से लड़ते हुए. 
लेकिन मैं याद करता हूं उन रातों को 
जब मैंने कुछ नहीं किया, पैरों को मेज़ पर फैलाकर बैठा 
दीवार पर बैठे मच्‍छर को बौद्ध-दर्शन की किताब से दबा दिया.  
कांच के गिलास को उंगलियों से खिसकाकर फ़र्श पर गिरा दिया
महज़ यह जानने के लिए कि 
चीज़ों के टूटने में भी संगीत होता है.

एक रात बरामदे में झाड़ू लगाया और उसी बहाने आधी सड़क भी साफ़ कर दी 
किताबों से धूल हटाने की कोशिश की तो जाना- 
साहित्‍य और धूल में वर-वधू का नाता है.
बाक़सम, इस बात ने मुझे थोड़ा विनम्र बनाया. 
मैंने धूल को साहित्‍य और साहित्‍य को धूल जितना सम्‍मान देना सीखा. 

कुछ गोपनीय अपराध किए 
तीस साल पुरानी एक लड़की को फेसबुक पर खोजता रहा 
और जाना कि पुरानी लड़कियां ऐसे नहीं मिलतीं - 
शादी के बाद वे अपना नाम-सरनेम बदल लेती हैं. 

सीटी बजाते हुए सड़कों पर तफ़रीह की 
और एक बूढ़े चौकीदार के साथ सूखी टहनियां तलाशीं 
ताकि वह अलाव ताप सके. 
एक रात जब सिगरेट ख़त्‍म हो गई तब बड़ी मेहनत से ढूंढ़ा उस चौकीदार को. 
उसने मुझे पहचान लिया और अपनी बीड़ी का आधा बंडल मुझे थमा दिया. 

एक औरत से मैंने सिर्फ़ एक वक़्त की रोटी का वादा किया था 
जवाब में दूसरे वक़्त भूखी रहती थी वह. 
आधी रात मैं उसे कार में बिठाता और शहर से बहुत दूर ढाबे में ले जाता. 
वह आधी अंगड़ाई जितनी थी, आधी रोटी जितनी, आधी खुली खिड़की जितनी
आधे लगे नारे जितनी. 
खाना खाने के बाद हम प्रॉपर्टी के रेट्स पर बहसें करते
और मिट्टी पर मंटो का नाम लिखते थे. 

एक रात एक पुलिसवाले ने मुझे ज़ोर से डांटा कि क्‍यों घूम रहा है इतनी रात को
मैंने भी उसे चमका दिया कि लोग मुझे हिंदी का बड़ा कवि मानते हैं, तुम ऐसे मुझे डांट नहीं सकते. 
बिफरकर वह बोला, साले, चार डंडे मारूंगा तेरे पिछवाड़े. घर जाकर सो जा. 
मैंने उसके साथ बैठकर तीन सिगरेटें पीं. वह इस बात से परेशान था 
कि उसका साहब एक नंबर का चमड़ी है 
और वह अपनी बेटी को पुलिस में नहीं आने देगा. 
अपनी मोटरसाइकिल पर बिठाकर मुझे घर छोड़ गया.

एक रात जब मैं पैदल भटक रहा था, कुछ कुत्‍ते भौंकने लगे मुझ पर.
मैंने दोस्‍तोयेव्‍स्‍की का एक हार्ड-बाउंड मोटा उपन्‍यास उन्‍हें दे मारा.
पर कुछ पल बाद ही कुत्‍ते फिर से भौंकने लगे.
मैंने इसे फ़्योदोर की एक और नाकामी मानी
और मन ही मन सोचा :
यह दुनिया माईला... नाम्‍या ढसाळ का गांडूबगीचा है.

जिन रातों को मैंने मोटी-मोटी किताबें पढ़ीं
कुछ कवियों को सराहा, कई पर नाक-भौं सिकोड़ी
जिन रातों को बैठकर मैंने अपनी कविताएं सुधारीं गद्य लिखे - 
मैं उन रातों को कभी याद नहीं करता 
न ही वे चीज़ें याद आती हैं जो मैंने लिखी हैं - 
वे बेशक भूल जाने लायक़ हैं. 
पर जो चीज़ मैं नहीं भूल पाता, वह है अपनी रातों की आवारगी. 
न पैसा न दमड़ी, न किताब न कविता 
जब मरूंगा, छाती से बांध के ले जाऊंगा ये अपनी आवारगी.

और हां, जाने कितनी रातें मैंने छत पर गुज़ारी हैं. 
कभी रेलिंग से टिककर धुआं उड़ाते. कभी नंगी फ़र्श पर चित लेटे 
आकाश निहारते. 
ख़ुद से कहा है बारहा - लोग तुम्‍हें कितना भी रूमानी कहें गीत चतुर्वेदी 
आंसू, गुलाब और सितारे से कभी बेवफ़ाई मत करना. 
कविता ख़राब बन जाए, वान्‍दा नहीं 
पर दिल को इन्‍हीं तीनों से मांजना - हमेशा साफ़ रहेगा. 
अंतत: ख़ुद कवि को ही करनी होती है 
अपनी बेचैनियों की हिफ़ाज़त. 


 (शीर्षक पंक्ति मोहसिन अली नक़वी की एक ग़ज़ल से है.
‘गांडूबगीचा’ मराठी कवि नामदेव ढसाळ के एक कविता-संग्रह का नाम है)




सबसे प्रसिद्ध प्रश्‍न 'मैं क्‍या हूं' के कुछ निजी उत्‍तर

रोटी बेलकर उसने तवे पर बिछाई 
और जिस समय उसे पलट देना था रोटी को 
ठीक उसी समय एक लड़की का फ़ोन आ गया.
वह देर तक भूले रहा रोटी पलटना. 
मैं वही रोटी हूं. 
एक तरफ़ से कच्‍ची. दूसरी तरफ़ से जली हुई.

उस स्‍कूल में कोई बेंच नहीं थी, कमरा भी नहीं था विधिवत 
इमारत खंडहर थी. 
बारिश का पानी फ़र्श पर बिखरा था और बीच की सूखी जगह पर 
फटा हुआ टाट बिछाकर बैठे बच्‍चे हिंदी में पहाड़ा रट रहे थे. 
सरसराते हुए गुज़र जाता है एक डरावना गोजर 
एक बच्‍चे की जांघ के पास से. 
अमर चिउंटियों के दस्‍ते में से कोई दिलजली चिउंटी 
निकर के भीतर घुसकर काट जाती है.
नहीं, मैं वह स्‍कूल नहीं, वह बच्‍चा भी नहीं, गोजर भी नहीं हूं 
न अमर हूं, न चिउंटी. 
मैं वह फटा हुआ टाट हूं. 

गोल्‍ड स्‍पॉट पीने की जि़द में घर से पैसे लेकर निकला है एक बच्‍चा. 
उसकी क़ीमत सात रुपए है. बच्‍चे की जेब में पांच रुपए. 
मां से दो रुपए और लेने के लिए घर की तरफ़ लौटता बच्‍चा 
पांच बार जांचता है जेब में हाथ डाल कि 
पांच का वह नोट सलामत है. 
घर पहुंचते-पहुंचते उसके होश उड़ जाते हैं कि जाने कहां 
गिर गया पांच रुपए का वह नोट. वह पांच दिन तक रोता रहा. 
हां, आपने सही समझा इस बार
मैं वह पांच रुपए का नोट हूं. 
उस बच्‍चे की आजीवन संपत्ति में 
पांच रुपए की कमी की तरह मैं हमेशा रहूंगा. 

मैं भगोने से बाहर गिर गई उबलती हुई चाय हूं. 
सब्‍ज़ी काटते समय उंगली पर लगा चाक़ू का घाव हूं. 
वीरेन डंगवाल द्वारा ली गई हल्‍दीराम भुजिया की क़सम हूं 
अरुण कोलटकर की भीगी हुई बही हूं. 

और... 
और... 
चलो मियां, बहुत हुआ. 
अगले तेरह सौ चौदह पन्‍नों तक लिख सकता हूं यह सब.
‘मैं क्‍या हूं’ के इतने सारे उत्‍तर तो मैंने ही बता दिए 
बाक़ी की कल्‍पना आप ख़ुद कर लेना 
क्‍योंकि मैं जि़म्‍मेदारी से भागते पुरुषों की 
सकुचाई जल्‍दबाज़ी हूं, अलसाई हड़बड़ाहट हूं

चलते-चलते बता दूं
ठीक इस घड़ी, इस समय
मैं दुनिया का सबसे सुंदर मनुष्‍य हूं 
मेरे हाथ में मेरे प्रिय कवि का नया कविता-संग्रह है. 

कवि की तस्‍वीर: © ज़ाहिद मीर, 2012. 
__________





1977 में मुंबई में जन्‍मे गीत चतुर्वेदी के खाते में छह लिखी हुई और कई अधूरी-अनलिखी किताबें दर्ज हैं. उनका पहला कविता संग्रह ‘आलाप में गिरह’ 2010 में राजकमल प्रकाशन से आया और दूसरा संग्रह ‘न्‍यूनतम मैं’ भी जल्‍द ही वहीं से आने वाला है. 

उन्‍हें कविता के लिए भारत भूषण अग्रवाल पुरस्‍कार, गल्‍प के लिए कृष्‍ण प्रताप कथा सम्‍मान मिल चुके हैं. ‘इंडियन एक्‍सप्रेस’ सहित कई प्रकाशन संस्‍थानों ने उन्‍हें भारत के सर्वश्रेष्‍ठ लेखकों में शुमार किया है. 

उनकी कविताएं देश-दुनिया की चौदह भाषाओं में अनूदित हो चुकी हैं. उनके नॉवेला ‘सिमसिम’ के अंग्रेज़ी अनुवाद के लिए उनकी अनुवादक अनिता गोपालन को प्रतिष्ठित ‘पेन-हैम ट्रांसलेशन ग्रांट 2016’ अवार्ड हुआ है. सोलह साल तक पत्रकारिता करने के बाद अब वह अपना अधिकांश समय लेखन को देते हैं. इन दिनों भोपाल रहते हैं. उनका ईमेल पता है :  
geetchaturvedi@gmail.com

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  1. Ashutosh Dubey7/9/16, 9:04 am

    गीत को पढ़ना हमेशा ही एक समृद्धकारी , विलक्षण काव्य अनुभव से गुज़रना है. बहुत अच्छी कविताएँ.

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  2. पिछली कविताओं की अपेक्षा इन कविताओं से गीत जी ने नए तरह के संदर्भ रचे हैं. कवि का यह बदलाव उसकी निरंतर यात्रा का संकेत है. कवि एक जैसा नहीं रह सकता. उसका पतन ही उत्थान है.

    यहाँ उन्होने कई निजी प्रश्नों, सम्बन्धों को अपनी काव्य चेतना में ढाला है, यह सबके लिए भिन्न हो सकते है. लेकिन उजास वही है. जो हम सबमें होता हैं.

    गीत भाई को बधाई. समालोचन का शुक्रिया.

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  3. अद्भुत कवितायें.वैसे गीत की कवितायें हमेशा इतनी अद्भुत होती हैं कि पढ़कर आप सिर्फ सन्न रह सकते हैं.आपको कुछ सूझेगा ही नहीं कि कहें क्या ? गीत आपसे सारे शब्द छीन लेते हैं.अच्छी कविताओं के साथ एक त्रासदी यह भी है कि उन पर कुछ कहा नहीं जा सकता.उन्हें और अच्छा कहना एक किस्म से झेंपना है.मानव बम पर इससे अच्छी कविता की कल्पना भी असम्भव है.इन कविताओं को बार बार पढ़कर जिया मरा जा सकता है.अरुणदेव आपका दिल से शुक्रिया इतनी अच्छी कवितायें पढवाने के लिए.

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  4. इन कविताओं से गीत के रचनाकर्म के प्रति नयी उत्सुकता बन रही है।

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  5. वन्दना शुक्ल7/9/16, 10:38 am

    पिछले दिनों संदिग्ध कवियों और हाहाकारी कविताओं के इस अजीबोगरीब माहौल में ये लग रहा था कि हिन्दी कविताओं का शायद सबसे बुरा समय शुरू हो चूका है | लिहाजा इस ‘’काल’ से बाहर आ जाना ही श्रेयस्कर होगा लेकिन घुप्प अंधेरों में भी कोई न कोई ध्वनी और रोशनी की संध हमेशा गुंजाइश की तरह खुली रहती है सो हताशा के उस एन वक्त गीत की ये सुन्दर कवितायें समालोचन में देकर आपने वापस कविता जगत में लौटने पर विवश कर दिया | आभार अरुण जी |.. नई कविताओं का स्वागत और बधाई गीत तुम्हे

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  6. अनाम7/9/16, 10:50 am

    गीत चतुर्वेदी की कविताओं में लंबे समय बाद एक बदलाव दिखा है, कहन की कलाबाजी से थोड़ा हटकर, किंचित सहजता की तरफ। 'सुसाइड बॉम्बर' और 'बड़े पापा की अन्त्येष्टि' बहुत अच्छी कविताएं हैं।

    -राहुल राजेश, कोलकाता।

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  7. गीत की ये कवितायेँ क्रिएटिव विस्फोट हैं जो नयेपन और शिल्प से विस्मय में डाल देती हैं. पार्लियामेंट पर हमले में सुसाइड बॉम्‍बर्स की लाशें कई दिन तक हांट करती रही थी.तब मुझे लगा था जीवन की इससे बड़ी बर्बादी और कोई नहीं. वे कवितायें लिखते तो सुन्दरता पर सोचते.'बड़े पापा की अंत्‍येष्टि' कविता बहुत मार्मिक है.जाने वाला अनकही बातें मन में लेकर विदा हो जाता है.'यासुजिरो ओज़ू की फिल्मों के लिए' में मौन, मृत्यु, पीड़ा, अकेलापन और अनिश्चितता है.'मेरी भाषा, मेरा भविष्‍य' पढ़कर एक असफल और अनिद्रा के मारे बुजुर्ग लेखक द्वारा उंगलियों से हवा में कुछ लिखने का कारुणिक दृश्य याद आता है. पता नहीं मन में अतीत का क्या-क्या चल रहा होगा. आंसू, गुलाब और सितारे के वफादार लेखक को आवारगी परिभाषित करती है. वह उसके संघर्ष और रूमानियत की साक्षी है.'सबसे प्रसिद्ध प्रश्‍न 'मैं क्‍या हूं' के कुछ निजी उत्‍तर' कविता सबसे सुन्दर है. कवि खुद को हर वंचना और रिक्त स्थान में मौजूद पाता है और स्वयं उनका बिम्ब बन जाता है. यह कविता बेहद पॉजिटिव नोट पर समाप्‍त होती है. अपने प्रिय कवि की नई किताब हाथ में आते ही हम किस क़दर ख़ुश हो जाते हैं, ख़ुद को और मनुष्‍य पाने लगते हैं.

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  8. गीत चतुर्वेदी इन कविताओं में भी मेरे प्रिय कवि हैं लेकिन यदि हम यह शिकायत करते हैं कि आज की ऐसी श्रेष्ठ कविता के भी आम पाठक नहीं हैं तो प्रश्न यह उठता है कि आज के लगभग सारे अच्छे-बुरे कवि अपने या व्यापक कविता(-कर्म ) से इतने obsessed क्यों हैं ? कविता के हवालों से भरी इन कविताओं का पाठकों के लिए क्या महत्व और अर्थ है ? हिंदी कविता के लिए ही क्या प्रासंगिकता है ? लगता है ''कवि'' होते ही यानी खुद को कवि समझते ही अधिकांश हिंदी ''कवियों'' को वहाँ गुदगुदी होने लगती है जहाँ से ज्ञानरंजन के कालजयी शब्दों में इंसान की दुम लाखों वर्षों पहले झड़ गई थी.पिछले दिनों एक एकदम नए कवि या कवयित्री की पहली ही प्रकाशित कविताएँ कविता-कविता की काँव-काँव से भरी हुई थीं.ऐसे कवि-कवयित्रियों की अकाल-मृत्यु सुनिश्चित और श्रेयस्कर है.कविता के हवाले कविता में मुरलीधरन की ''दूसरा'' की तरह या पुराने उस्ताद ''फ़र्जी'' गुप्ते की लैग-ब्रेक की तरह आने चाहिए.मैं कविता में ''कविता'' का आत्ममुग्ध शब्द पढ़ते ही उसे अपने से अधिकतम दूरी पर फेक देता हूँ.यदि अभी से आपके पास देखने और लिखने को कुछ और नहीं है तो भैयाजी-भैनजी आप घुस क्यों आए इधर ? इसी तरह मैं कुछ आलोचकों के प्रति हिंदी जगत के दास्यभाव से आतंकित हूँ.जब तुम कथित सर्जनात्मक लेखकों को ही कोई आम पाठक न पढ़ रहा है न खरीद रहा है तो इन कमबख्त आलोचकों को तो कोई जानता ही नहीं है.तो तुम ingratiating पिल्लों की तरह कूँ-कूँ करते हुए इनके जूतों पर क्यों लोट और लार बहा रहे हो ?

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  9. अद्भुत कविताएँ... ये कविताएँ बताती हैं कि क्यों गीत हमारे सबसे खास कवि हैं।

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  10. अगर लेखन एक धर्म है....अगर साहित्य ग्रंथ है तो....गीत चतुर्वेदी को पढ़ के नास्तिक भी आस्तिक हो।

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  11. Mandan Jha7/9/16, 5:31 pm

    छः सात बार पढ़ चुका हूँ। सारी अच्छी हैं, जरूरी हैं। बड़े पापा की अंत्येष्टि मेरी पर्सनल फेवरेट। ��

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  12. सुशील सुमन7/9/16, 5:32 pm

    बहुत अच्छी कविताएँ हैं गीत जी।
    आत्म जिस तरह हाशिये पर और हाशिये के साथ खड़ा है और एक मनुष्य के रूप में जो होने की तमन्ना है और एक कवि की निर्माण प्रक्रिया किस प्रकार से अलहदा होती है, इन सबकी गजब काव्यात्मक अभिव्यक्ति सम्भव हुई है इन कविताओं में।

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  13. Narendra Pundrik7/9/16, 5:33 pm

    pdhi bhai umda kvitaao ke liye bdhai

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  14. Sudeep Sohni7/9/16, 5:39 pm

    मैं दुनिया का सबसे सुंदर मनुष्‍य हूं
    मेरे हाथ में मेरे प्रिय कवि का नया कविता-संग्रह है.
    इन छः कविताओं में बहुत सारा समय, दुनिया और नरम अहसास हैं। इन्हें पढ़ना जैसे वक़्त को रोककर अलग -अलग कोनों से देखना है। अरुण जी और गीत भाई आप दोनों का बहुत सारा शुक्रिया

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  15. Geet..बहुत सुंदर कविताएँ हैं आपकी....शुभकामनाएं

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  16. सब अच्छी लगीं। अंतिम तो अद्भुत! क्‍लासिक!!

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  17. गीत को पढ़ना हमेशा आपको आनंद देता है । कुछ कविताएँ बेहद अच्छी । शुक्रिया समालोचन ।

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  18. Geet sir ka bahut Bahut Abhar itni sunder kavitaye kahne ke liye. Arun Dev ji apka shukriya share karne ke liye.

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  19. आपकी इस प्रस्तुति का लिंक 08-09-2016 को चर्चा मंच पर चर्चा - 2459 में दिया जाएगा
    धन्यवाद

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  20. पाठकों के लिए इन कविताओं का महत्त्व है। शोर, बयानबाज़ी, विज्ञापन से बचा ले जाती हैं ये कविताएँ। कवि का बहुपठित होना और उसका गज़ब का आत्मविश्वास मुग्ध करता है।

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  21. महज ये जांनने के लिये कि चिजो क तुटणे में भी संगीत होता है.…

    दादा आपकी ये सभी कविताये ग्रेट है..इनमे इंसान को बहुत सवालो के जवाब मिलते है..
    आप माष्टर हो ..येसे हि लिखते रहिये इनमे आत्मा कि आवाज आती है....💐💐

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  22. कविता का इस तरह का शिल्प कम ही देखने को मिलता है। गीत चतुर्वेदी जी को पढ़ना हमेशा नया अनुभव रहता है।

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  23. गीत को पढ़ते हुये हर बार नए अनुभव और नयी दृस्टी का अहसाह होता है। गीत कविता में वहाँ ले जाते हैं जहां पढ़ते हुये ठिठकना पड़ता है कि इस तरह भी सोचा और लिखा जा सकता है।

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  24. Jui Kulkarni8/9/16, 1:44 pm

    कमाल करतोस तू !

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  25. कमाल की कविताएँ... एक बार पढ़ने पर जी नहीं भरता। कई कई बार पढ़ी जाने वाली कविताएँ...

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  26. जितना सघन उतना ही तरल भी, आज का दिन बन गया इनको पढ़ के। कई कई बार और कई कई दिनों तक लौटूंगा इनमें डूबने के लिए

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  27. वाह.....क्या बात है।

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  28. कविता को जी रहे हैं आप

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  29. Geet ye kya hai, gajab se bhi aage ka kuch kyon likh dete ho. हमें शब्द ढूंढने की फुर्सत तो दो बेटे। कमाल है

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  30. ये दिल ये पागल दिल तेरा और आवारगी , दोनो बहुत पसन्द आये। मुश्किल समय मे तिनके के सहारे सा साथ कवि का वो भी , धन्यवाद लिखने के लिये ।

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  31. मुझे गीत चतुर्वेदी की कविताओं से प्रेम है ...बहुत बहुत बहुत ज्यादा ... उनकी कविताओं में डूबना.. कमाल का है ये कवि..

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  32. धन्यवाद । ऐसे पाँच रुपए बहुत याद रहते हैं। मार्मिक कवितायें।

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  33. गीत चतुर्वेदी जी की कविताएं अद्भुत हैं .अन्तिम कविता तो अभिभूत कर देने वाली है. ये कविताएं उनके लिये मिसाल हैं जो ताजगी और नएपन के नाम पर कुछ भी और अश्लीलता की हद तक लिख मारते हैं .

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  34. Geet this time your poems are absolutely in a new flavor, diction and quite experimental, especially यासुजिरो ओज़ू की फिल्मों के लिए & मैंने कहा, तू कौन है? उसने कहा, आवारगी * touched me . Yet again in Joy Goswami's words, "Some poets speak in the same voice all their lives. Some keep changing the voice they speak in. Some poets are ventriloquists' dummies, in the sense that through their work you hear the voices of the poets they are imitating." On the theory of this he says - Imagine a man hiding behind a rock. He hides behind the rock, he peeps out, he shoots from under its cover, he hides, he saves himself. Then he races to the next rock and so on. The bullets hit the rock but not the man. Now imagine a man walking into the clearing where all the rocks are. As he walks bullets hit him, part of his body fall, he is hurt yet he keeps walking. The first man is the weak poet, who needs theory to hide behind. Each rock is a theory he shields himself with. The second man is the poet who is willing to risk walking unarmed towards life, towards the blows of experience, the man who is willing to risk himself as he walks." Hope you understand what I mean. Hope you constantly strive to be the second man in your journey of writing....................best wishes.......amrita
    I must say Samalochan is one of the best blogs where you can find contents of substance, pure literature...................thanks to Arun Dev ji for his constant efforts to maintain it's high standard.

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  35. बहुत अच्छी कविताएँ, गीत! तुम्हारी कविताओं में ढसाल, कोलटकर आदि मराठी कवियों के के सन्दर्भ बड़े प्यारे लग रहे है. (युरोपिय कविता से मिलते) एक अलग narrative के करीब आप पहुचते दिख रहे हो. बधाई!

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  36. गीत की कविताओं के बारे में उनके प्रशंसकों ने बहुत पहले ही कह दिया है। मैं भी उनकी रचनाओं को जब भी जितना भी पढता हूँ प्रशंसा किये बगैर नहीं रह पाता। मैं इतना ही कहना चाहता हूँ हर बार उनकी कविताएं चौकाती है, अपने भाषा शिल्प, कहन और अंदाज़ से। हर बार लगता है ये कैसा कवि है जिसके दिमाग़ में शब्दों का रक्त पानी नहीं है। यहाँ सोच की टहनियों में शब्द फूलों के रख रखाव की नै कोंपले हैं। ताज़ा हवा का झोंका है लेकिन प्रसंग हमारे अपने हैं या वो हैं जिनसे कभी शायद हम भी गुज़रे हैं। मैं इस मायने भी खुशनसीब हूँ कि पत्रकारिता का मेरा एक अंतराल उनके साथ रोज़ ब रोज़ अखबार की बातें करते गुज़रा है। -शकील अख़्तर

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  37. ठहर कर लिखना चाहिए इन कविताओं के बारे में कुछ भी

    आपकी कवितायेँ तो अच्छी लगती ही हैं लेकिन जो और एक दुर्लभ बात अच्छी लगती है कि शीघ्र स्खलन वाले इस समय में आप कविताओं को धीमी आँच पर धैर्य से पकाते हैं। मुहब्बत गीत भाई

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  38. गीत को पढ़ना मुझे भाता रहा है । उनकी कविता और गद्य दोनों हमेशा अचंभित करते रहें हैं । ताजगी और अनोखापन उनकी विशेषताएं हैं जो हर दफा कुछ नया सिखाती भी हैं ।

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  39. बहुत अच्छी कविताएँ !

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  40. सचमुच गीत भाई और मनोज कुमार झा बेमिसाल हैं !

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  41. Anurag Tiwari9/9/16, 12:53 am

    Geet sir ka bahut Bahut Abhar itni sunder kavitaye kahne ke liye. Arun Dev ji apka shukriya share karne ke liye.

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  42. रमेश शर्मा9/9/16, 7:49 am


    गीत जी के पास एक पैना आैर साफ विजन है आैर सहजता के साथ कविता में अपनी बात कह पाने का सामर्थ्य भी ! ये सारी बातें किसी कवि काे एक अलग स्थान पर रखकर आकलन करने का अवसर देती हैं ! यद्यपि इनके बिना पर भी कविताएं खूब रची जा रही हैं पर इन सारी बाताें के बिना कविता बेमानी लगती हैं ! इन कविताआें में कुछ कविताएं बहुत प्यारी हैं ! आखिर की कविता बहुत सुंदर ! बधाई गीत जी काे आैर समालाेचन काे भी

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  43. Ranendra Ranendra9/9/16, 7:51 am

    गीत को पढ़ना मुझे भाता रहा है । उनकी कविता और गद्य दोनों हमेशा अचंभित करते रहें हैं । ताजगी और अनोखापन उनकी विशेषताएं हैं जो हर दफा कुछ नया सिखाती भी हैं ।

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  44. कविताओं को पढ़ कर सिर्फ आह! आहा! किया जा सकता है कुछ कहने से बेहतर है कुछ न कहना! दुबारा या तीबारा पढ़ने से पहले गीत को बधाई और समालोचन का शुक्रिया।

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  45. गीत हमेशा ही अपनी कविताओं के ज़रिये एक ऐसे दृश्य संसार का निर्माण करते हैं, जो सर्वथा हमारे आसपास की चीज़ों से ही आकार लेता है लेकिन वे जिस तरह कवि के द्वारा निर्मित संसार को तरतीब देते हैं, वह हमें एक अदेखे जगत में ले जाता है, जो हमें भीतर तक समृद्ध करता है. दुनिया को बेहतर बनाने के सपने शायद ऐसे ही देखे जाते हैं. गीत को बहुत बधाई और शुभकामनाएँ. समालोचन का आभार.

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  46. मनीष सक्सेना8/3/18, 3:43 am

    अगर ऐसा कहा जाए कि सन 2000 के बाद जितने कवि हिंदी में आए हैं, गीत चतुर्वेदी उनमें सर्वश्रेष्ठ हैं, तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी।

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  47. मैंने भी उसे चमका दिया..अयहय

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  48. अनाम9/3/18, 8:26 pm

    जबरदस्त कविताएं। मैं गीत चतुर्वेदी को खोज खोज कर पढती हूं और हर बार चमत्कृत रह जाती हूं। उनके शब्दों में अदभुत आकर्षण है।

    सुमन सिंह

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  49. गणेश विसपुते9/4/18, 8:20 pm

    <>
    गीत, अतीत, इतिहास और भूगोल के साथ साथ आप तो पुरी भारतीयता को भी समेट लेते हो.
    बहुत बधाई.

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  50. सुबह सुबह इन कविताओं को पढ़ना अचम्भित और आशान्वित करता है...तुरत फुरत इनपर बोलना सम्भव नहीं,ये बार बार अपनी ओर आकर्षित करती हैं।'मैं क्या हूँ' वाली कविता तो गज़ब की है,छलछल करती नदी जैसी।
    यादवेन्द्र

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  51. कवितायों को पढ़ना यूं लग रहा है ज्यों कोई बस जी ही रहा है ये कविताएँ।

    गीत मेरे भी प्रिये कवि हैं।
    आपको पढ़ना खुद के दिल को पढ़ने जैसा है।

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