पुरुषार्थवती देवी एवं रामेश्वरी देवी गोयल: सुजीत कुमार सिंह




इतिहास कुछ लोगों के लिए बेरहम होता है, चाहे वह साहित्य का ही क्यों न हो. पुरुषार्थवती देवी एवं रामेश्वरी देवी गोयल दोनों छायावाद की कवयित्रियाँ हैं. दोनों का जन्म १९११ में हुआ था.  

सुजीत कुमार सिंह गहरे और गम्भीर शोध अध्येता हैं. जिन कवयित्रियों के न कहीं संग्रह मिलते हैं न कोई ढंग का चित्र, उनके कवि-कर्म को आज उन्होंने आलोकित कर दिया है. बहुत ही मेहनत से लिखा गया लेख है जो  छायावाद की साहित्यिक गतिविधियों से होता हुआ स्मृतिहीनता की इस विडम्बना तक पहुंचता है.


आलेख प्रस्तुत है.


पुरुषार्थवती देवी एवं रामेश्वरी देवी गोयल
आज रो-रोकर सुनाऊँगी, व्यथा की मैं कहानी                  
सुजीत कुमार सिंह



बीते दस साल में तमाम साहित्यकारों के शताब्दी वर्ष धूमधाम से मनाये गए. लेखक संगठनों ने अपने-अपने हिसाब से अज्ञेय, नागार्जुन, शमशेरबहादुर सिंह, केदारनाथ अग्रवाल, गोपालसिंह नेपाली, फैज़ अहमद फैज़, मुक्तिबोध, त्रिलोचन, श्रीपत राय इत्यादि को याद किया. देश भर में बड़े-बड़े संगोष्ठी आयोजित किये गए. अज्ञेय को सात समंदर पार भी याद किया गया. हिंदी पत्रिकाओं ने मोटे-मोटे विशेषांक निकाले. प्रकाशकों की भी चाँदी रही. वाद-विवाद भी हुआ, जब नामवर सिंह ने अज्ञेय को सर्वश्रेष्ठ कवि घोषित किया. इस कोरोना-काल में भी हिंदी संसार फणीश्वरनाथ रेणु और काशी हिंदू विश्वविद्यालय के हिंदी-विभाग को शताब्दी वर्ष पर फेसबुक आदि माध्यम से याद कर रहा है.

उपर्युक्त बातों को लेकर दुःख नहीं है बल्कि ख़ुशी है कि हिंदी के लोग इतनी तन्मयता से रचनाकारों को याद किये या याद कर रहे हैं. अफ़सोस यह है कि जो लोग इतिहास में नहीं हैं, उन्हें हम क्यों भूल जाते हैं? मुख्यधारा के अतिरिक्त हमें हाशिये के लोगों को भी स्मरण करना चाहिए. यह हमारी बड़ी ज़िम्मेदारी है.

हिंदी साहित्य का इतिहास अभिजात्यों का इतिहास है. इसमें दलित और स्त्री नदारद हैं. इसमें उन्हीं लोगों को तवज़्ज़ो दी गयी है जिनकी आर्थिक, सामाजिक व राजनैतिक हैसियत ऊँची रही है. पहले व्यवस्थित इतिहासकार रामचन्द्र शुक्ल ने ‘साहित्य के इतिहास का सच्चा अध्ययन’ करने की बात कही है लेकिन अपने इतिहास में इसका निर्वाह करते नज़र नहीं आते. बंगमहिला, महादेवी वर्मा, सुभद्राकुमारी चौहान– यही तीन स्त्री रचनाकार हैं जिन्हें शुक्ल जी अपने इतिहास में ‘आधुनिक-काल’ के अंतर्गत स्थान देते हैं.

‘मिश्रबंधु-विनोद’ के चौथे खंड (यह भले ही ‘बड़ा भारी कवि-वृत्त-संग्रह’ हो) में मिश्रबंधुओं ने स्त्री रचनाकारों के प्रति थोड़ी-बहुत सहानुभूति रखी है. उन्होंने आधुनिक-काल की पचास से अधिक महिला-रचनाकारों को अपने ‘विनोद’ में जगह दी है. परन्तु इनकी इतिहास-दृष्टि सतर्क और सतेज नहीं थी. इन्होंने दो महादेवी वर्मा और दो सुभद्राकुमारी चौहान का उल्लेख किया है. पहली महादेवी वर्मा (4368) का जन्मकाल संवत् 1968 है तो दूसरी (4533) का संवत् 1964. दोनों ने ‘नीहार’ और ‘रश्मि’ की रचना की है. पहली महादेवी वर्मा का विवरण देते हुए लिखा है: 

“स्त्री-कवियों में आजकल इनका स्थान अच्छा है. प्राय: छायावादी कविता करती हैं. होनहार लेखिका हैं.”  


यही गलती सुभद्रा जी के साथ हुई है. स्पष्ट है कि उस दौर के इतिहासकार स्त्री-रचनाकारों के प्रति उदासीन थे. इसे उदासीनता ही कहूँगा कि ‘मिश्रबंधु-विनोद’ (भाग-चार) में पुरुषार्थवती देवी (1911-1931) एवं रामेश्वरी देवी गोयल (1911-1935) अनुपस्थित हैं.

आख़िर हमारा हिंदी-समाज इन दो महत्त्वपूर्ण लेखिकाओं को शताब्दी वर्ष में याद करने से क्यों रह गया? इसके तह में जाने की आवश्यकता नहीं. ‘स्त्री-कवि-कौमुदी’ (गांधी हिंदी पुस्तक भंडार, प्रयाग : 1931) में रामशंकर शुक्ल ‘रसाल’ की उस टिप्पणी को याद करें जिसे हिंदी में स्त्रियों के काव्य-साहित्य के ऐतिहासिक विकास के क्रम में लिखा है : 


आजकल यदि सच पूछिए तो युग है विज्ञापन का. विज्ञापन-कला-कुशल चाहे वह किसी भी क्षेत्र में कार्य्य करने वाला क्यों न हो और चाहे वह भला-बुरा कैसा भी कार्य्य क्यों न करता हो, अवश्यमेव प्रसिद्धि-प्रसाद-प्राप्त कर लेता है और उन सत्पुरुषों की अपेक्षा अधिक प्राप्त करता है.

प्रस्तुत लेख में पुरुषार्थवती देवी आर्य एवं रामेश्वरी देवी गोयल का, जिनका अज्ञेय आदि के साथ ही शताब्दी-वर्ष था, परिचय देने का एक नम्र प्रयास किया गया है. दरअसल इस लेख का एक कच्चा ड्राफ्ट मैंने दस साल पहले ही तैयार कर लिया था किन्तु रोज़ी-रोटी के चक्कर में इसे कहीं छपने के लिए भेज न पाया. इसे दस साल बाद प्रस्तुत करते हुए शर्मिंदगी भी महसूस हो रही है.




(एक)

पुरुषार्थवती देवी की कवितायें तत्कालीन प्रमुख पत्रिकाओं में प्रतिष्ठा के साथ छपती थीं. मुझे पुरुषार्थ की कुछ रचनाएँ– मनोरमा (इलाहाबाद), सुधा (लखनऊ), विशाल भारत (कलकत्ता) और चाँद (इलाहाबाद) में मिलीं. इनकी कविताओं का एकमात्र संकलन ‘अंतर्वेदना’ है.

पुरुषार्थवती का जन्म 8 अक्टूबर 1911 को और निधन 11 फरवरी 1931 को हुआ. यानी बीस साल भी पूर्ण न कर पायी थीं कि वह इस दुनिया से चल बसीं. अगस्त 1931 की ‘सुधा’  के अनुसार : 


देवी पुरुषार्थवती का जन्म श्रीनगर (काश्मीर) के एक प्रसिद्ध आर्य सामाजिक कुल में हुआ था. उनके पिता श्रीयुत लाला चिरंजीतलाल जी वहाँ की आर्यसमाज के प्रधान हैं. उनकी दो बड़ी बहनें श्रीमती सत्यवती देवी तथा श्री उर्मिला देवी सार्वजनिक सेवा में बहुत भाग लेती हैं. श्री उर्मिला देवी सत्याग्रह-संग्राम में मेरठ से जेल-यात्रा की थी...पर इन सब बहनों में देवी पुरुषार्थवती को जैसी प्रतिभा प्राप्त हुयी थे, वह असाधारण थी. उन्हें संस्कृत की अच्छी योग्यता थी. हिन्दी लिखने में, छोटी आयु में ही, उन्हें अच्छी सफलता प्राप्त हुई थी. कविता तो उनके लिए जन्मसिद्ध चीज़ थी, और छोटी-सी आयु में कवि-सम्मेलनों से उन्हें पदक भी प्राप्त हुए थे.

पुरुषार्थ के निधन से तत्कालीन हिंदी समाज स्तब्ध रह गया था और विद्वतजनों ने इसे अपूरणीय क्षति बतालाया था. ‘सुधा’ ने अपनी संपादकीय में लिखा : 


देवी पुरुषार्थवती का देहावसान जिस प्रकार अकस्मात् और सहसा हुआ, उसे याद करते ही आज भी हृदय में एक साथ करुणा, आश्चर्य, निराशा और भय के भाव फूट पड़ते हैं. हमें उनके दर्शन प्रथम और अंतिम बार लाहौर-कांग्रेस में हुए थे. सुधा के प्रेमी पाठक भी देवी पुरुषार्थवती के नाम से अपरिचित न होंगे. कारण, वह सुधा की सुन्दर, सरस, होनहार कवि थीं. उनकी कमनीय कवितायें समय-समय पर सुधा तथा हिन्दी की दूसरी उच्चकोटि की मासिक पत्रिकाओं में निकलती रहती थीं. हिन्दी-संसार को उनसे बड़ी आशा थी.

मार्च 1933 की ‘सुधा’ में ही पृथ्वीपाल सिंह ने लिखा : 


होनहार कवयित्री थी. अपनी अलौकिक प्रतिभा की प्रथम प्रभा दिखाकर चल बसी. इस बाला-कवयित्री की असामयिक मृत्यु से हिंदी-साहित्य को भारी क्षति पहुँची. ***नन्हीं-सी आयु में ही उन्होंने संसार से नाता तोड़ दिया. इसी बीच में उन्होंने जो कुछ भी लिखा है, खूब लिखा है. इस बाल-कवयित्री की रचनाएँ ‘जुगा’ कर रखने की चीज़ है.

पुरुषार्थवती देवी का मूल्यांकन न तब हो सका और न अब. सुमन राजे आदि ने तो घोर अन्याय ही किया है. ‘हिंदी साहित्य का आधा इतिहास’ में जन्मतिथि गलत है तो जगदीश्वर चतुर्वेदी/सुधा सिंह संपादित ‘स्त्री-काव्यधारा’ में जन्मतिथि गायब है. इसका कारण यह है कि इन दोनों पुस्तकों में शोध दृष्टि का अभाव है, खोज-बीन की कमी है. नीरजा माधव ने ‘हिंदी साहित्य का ओझल नारी इतिहास’ में पुरुषार्थ को सोलह पंक्तियों में निपटा दिया है. हाँ, डा.(श्रीमती) उमेश माथुर लिखित ‘आधुनिक युग की हिंदी लेखिकाएं’ एक प्रामाणिक कृति कही जा सकती है जिसमें पुरुषार्थवती देवी का मूल्यांकन उस दौर में उपलब्ध सामग्री के आधार पर किया गया है. माथुर लिखित किताब का पुनर्प्रकाशन भी समय की माँग है क्योंकि नवजागरणकालीन स्त्री-लेखन को समझने के लिए यह किताब मील का पत्थर है.
(पुरुषार्थवती देवी)

सुमन राजे ने पुरुषार्थवती के मूल्यांकन में गिरिजादत्त शुक्ल बी.ए. और ब्रजभूषण शुक्ल विशारद लिखित ‘हिंदी काव्य की कोकिलायें’ (साहित्य मंदिर, प्रयाग : 1933) को आधार बनाया है. ‘हिंदी काव्य की कोकिलायें’ की सीमा यह है कि लेखकद्वय ने पुरुषार्थ-संबंधित, जो लम्बी टिप्पणी किसी की उद्धृत की है, उसका नाम नहीं दिया है. वही टिप्पणी हू-ब-हू सुमन राजे ने ‘आधा इतिहास’ (पृष्ठ : 256-57) में उतार लिया है. सुमन जी ने लिखा है : 


इसी प्रकार पुरुषार्थवती जिनका असमय निधन हो गया था, की गिरिजादत्त शुक्ल ने बहुत प्रशंसा की है. आलोचक का नाम दिए बिना उनकी टिप्पणी उद्धृत की है.

मैं भी गिरिजादत्त शुक्ल व सुमन राजे द्वारा उद्धृत टिप्पणी को यहाँ देना चाहूँगा. उद्धृत अंश यों है :


पंतजी के ‘पल्लव’ और ‘वीणा’ के बाद, हिन्दी की कविताओं का ऐसा अच्छा संकलन हमें कहीं अन्यत्र देखने को नहीं मिला. हमें अत्यंत खेद एवं लज्जा के साथ स्वीकार करना पड़ता है कि लेखिका के नाम से और उनकी कविताओं से हम आज पहले-पहल परिचित हुए हैं. एक आश्चर्यमयी प्रतिभाशालिनी स्त्री कवि ऐसी सुन्दर, सरस और भावुकता पूर्ण कविताओं को लिखकर इहलोक से सिधार भी चुकी और हम उसके नाम से भी परिचित न रहे, इस अक्षम्य दोष के लिए हमारी उदासीनता बहुत कुछ अंश में दायी हो सकती है. तथापि हिंदी के उन ‘प्रोपेगेंडिस्ट’ आलोचकों का भी इसमें कुछ कम दोष नहीं है, जो अपने किसी विशेष गुट्ट के लेखक अथवा लेखिकाओं की प्रशंसा में ‘अहोरूपमहोध्वनि:’ के नारे लगाते रहते हैं और पक्षपातहीन होकर वास्तविक योग्यता की खोज के लिए कभी लालायित नहीं रहते.

उपर्युक्त अंश को सुमन जी ने ठीक से उद्धृत भी नहीं किया है. दरअसल यह सब जल्दी-जल्दी काम करने का नतीज़ा है. जहाँ तक उक्त टिप्पणी की बात है, तो यह टिप्पणी कलकत्ता से निकलने वाली मासिक पत्रिका ‘विश्वमित्र’ के जनवरी, 1933 के अंक में प्रकाशित है. ‘विश्वमित्र’ के संपादक थे– डा. हेमचंद जोशी डी.लिट्. और इलाचंद जोशी. संपादकद्वय में से किसी एक ने ‘दीमक’ छद्म नाम से ‘अंतर्वेदना’ की समीक्षा की थी. अत: ‘हिंदी काव्य की कोकिलायें’ में समीक्षक का नाम जाने से रह गया और छान-बीन न करने के कारण सुमन राजे ‘दीमक’ तक न पहुँच सकीं.

पुरुषार्थ की बड़ी बहन सत्यवती मलिक ने नवम्बर 1937 के ‘विशाल भारत’ में ‘श्रीमती पुरुषार्थवती देवी’ शीर्षक एक बड़ा ही मार्मिक संस्मरण बनारसीदास चतुर्वेदी के कहने पर लिखा था. सत्यवती मलिक भी जानी-मानी लेखिका थीं. अज्ञेय भी सत्यवती के लेखन से प्रभावित थे और उनकी कृति ‘दो फूल’ (देखें– ‘त्रिशंकु’) की समीक्षा भी की थी. इस संस्मरण में ‘अंतर्वेदना’ के समीक्षकों के उन प्रश्नों का भी ज़वाब है जिन्होंने यह आश्चर्य प्रकट किया था कि 


इतनी अल्पावस्था में ही ऐसे विषादपूर्ण भाव पुरुषार्थवती के मन में क्योंकर उदित हुए? उस मस्ती के युग में, उमंग भरे यौवन के प्रभातकाल में ही निराशापूर्ण करुण गान क्यों?

माता-पिता की गोद में पुरुषार्थ का शैशव कैसे बीता था – इसका संक्षिप्त परिचय देने के बाद सत्यवती मलिक लिखती हैं :


पुरुषार्थ अभी तेरह वर्ष की ही थी कि प्रिय जननी के देहांत का असामयिक समाचार उसके कानों में पहुँचा. नन्हें बच्चे मातृ-शोक से विह्वल हो उठे. यही नहीं, उसी वर्ष ही प्राय: दो-दो मास का अंतर छोड़ हमारी अत्यंत निकट की तीन युवती बहनों की मृत्यु हो गई, जिनका प्रेम पुरुषार्थ से घनिष्ठ था. समय बीत गया; किन्तु हंसी-खुशी के उस उपवन में वे दुखद स्मृतियाँ एक गंभीर रेखा-सी छोड़ गईं. प्रियजनों के वियोग का दुःख किसको नहीं सताता? लेकिन कवि के कोमल चित्त में ऐसी दुर्घटनाएँ समस्याओं का रूप धारण कर लिया करती हैं. संभवतः पुरुषार्थ की कविताओं का आरंभ इन्हीं दिनों हुआ. अल्पावस्था में ही विषाद की छाया-सी भी इसी तरह उनकी कविताओं में आ गयी, यही मेरा अनुमान है.

सत्यवती मलिक आगे लिखती हैं :

याद आ रहा है कई वर्ष पूर्व का वह एक प्रभात, जब आठ-दस कन्याएं मिलकर जेहलम नदी के किनारे, सफेदों से घिरी सड़क पर, हंसती-खेलती जा रहीं थीं, और ठीक वैसे ही ऊपर आकाश में भी मुर्गावियों का एक समूह चहचहाता हुआ उड़ा जा रहा था कि अकस्मात् ठां... की आवाज़ के साथ एक करुण चीत्कार चहुँ ओर गूँज उठी. बेचारा पक्षी लंगड़ाता हुआ साथियों से पीछे रह गया. शिकारी सफेदों की ओट में खड़ा था. सभी कन्याओं के चेहरे पर क्रोध एवं करुणा के भाव उत्पन्न होकर रह गए; किन्तु पुरुषार्थ ने घर आते ही ‘बधिक के प्रति’ शीर्षक एक हृदय-विदारक कविता लिखी. ***पतझड़ के दिन हैं. सगाई के कुछ दिवस बाद ही चन्द्रगुप्त जी श्रीनगर आये हैं – संकोचवश पुरुषार्थ की भेंट उनसे नहीं हो सकी है. उनकी विदाई के समय दूर से ही प्रेमाश्रु नेत्रों में भरकर पुरुषार्थ अपनी कापी में लिख रही है – ‘अतिथि क्या ले जाओगे भेंट, यही दो अश्रु भरे नि:श्वास.

सत्यवती जी ने यह भी बताया है कि पुरुषार्थ गृहकार्य, सीना-पिरोना आदि कार्यों में बड़ी निपुण थी. सीने-पिरोने की यह दक्षता वह पत्र-पत्रिकाओं में भी लिख भेजती थीं. ऐसा ही एक लेख मुझे जुलाई 1926 की ‘चाँद’ में ‘शिल्पकुंज स्तंभ’ में ‘तारकशी का काम (जालीदार फीता)’ शीर्षक मिला है. पुरुषार्थ की रुचियाँ विभिन्न थीं. व्यायाम, खेल, लाठी-गदा का शौक तो था ही, उनके लेख बहुत सुन्दर होते थे, गला सुरीला था और संस्कृत काव्य-ग्रंथों को बड़ी तन्मयता से पढ़ती थीं.

छायावादियों ने ‘आँसू’ पर तमाम कवितायें लिखी हैं. पुरुषार्थ ने भी ‘आँसू’ शीर्षक एक कविता लिखी, जिस पर राजासाहब कालाकांकर की ओर से पदक मिला था. वह सेवा, प्रेम, सहिष्णुता की सजीव मूर्ति थी. किसी बच्चे अथवा किसी नौकर-चाकर पर कभी भी क्रोध प्रकट नहीं किया : 


पिताजी के पास एक बार एक अनाथ लड़की पहुंचाई गई. उसकी दुर्दशा यहाँ तक हो रही थी कि उसके सिर में कृमि पड़ जाने के कारण घाव हो रहे थे. तमाम बदन जुंओं से भरा पड़ा था. नौकर-चाकर कोई भी उसके समीप जाने में हिचकिचाते थे. पुरुषार्थ ने उसी क्षण अपने वस्त्र उतार, स्वयं एक धोती पहन और अपने कपड़े उस निरीह बच्ची को पहनाकर उसके वस्त्र जला डाले और फिर अपने हाथों से उसके घावों को धोकर पट्टियां बाँधीं. कुछ ही दिनों में वह लड़की स्वस्थ हो गई और पुरुषार्थ के साथ खूब हिलमिल गई.

पुरुषार्थ के एकमात्र काव्य-संकलन ‘अंतर्वेदना’ की समीक्षा उस दौर की समस्त पत्रिकाओं में मिलती है. ‘सरस्वती’, ‘हंस’, ‘विश्वमित्र’, ‘हिंदी-सन्देश’, ‘सुधा’ ने मुक्त कंठ से ‘अंतर्वेदना’ की प्रशंसा की है. अप्रैल 1933 की ‘सरस्वती’ में ‘पुस्तक-परिचय’ स्तंभ में मुंशी कन्हैयालाल ने लिखा है : 

"उनकी रचनाओं के इस संग्रह में अनेक रचनायें सुन्दर कल्पनाओं से तथा उच्च भावों से ओत-प्रोत हैं.”

कानपुर के ‘प्रताप’ ने लिखा :

"संग्रह की अनेक कविताएँ अत्यंत भावपूर्ण और हृतंत्री को निनादित करने वाली है. ***अपनी जरा-सी उम्र में ही वह प्रतिभाशालिनी बाला कवयित्री यह जान गई थी किजगत के सुख दुःख क्या हैं; महानाविक शक्तिशाली है. जीवन सर्वांग सुखी नहीं, गुलाब कंटकाकीर्ण है..."

‘अंतर्वेदना’ का प्रकाशन विश्व-साहित्य-ग्रंथमाला, मैक्लेगन रोड, लाहौर से हुआ था. इसके प्रकाशन के पीछे पुरुषार्थ के पति चन्द्रगुप्त विद्यालंकार का हाथ था. पृथ्वीपाल सिंह के अनुसार, 


अपनी प्रतिभाशालिनी स्वर्गीया पत्नी की अनमोल कृतियों को सुंदर दूध-से श्वेत कागज़ पर मोती-से अक्षरों में बड़े चाव से सजाया है. इस गुलदस्ते के बीच-बीच में कवयित्री के तीन-चार भव्य चित्र भी हैं. छपाई-सफ़ाई के विषय में कुछ कहना भी अन्याय करना है. पति ने अपनी पत्नी के भावों को, कल्पनाओं को सुन्दर-से-सुन्दर रूप में प्रकाशित करके हिन्दी-संसार के सामने उपस्थित किया है.”(सुधा, मार्च 1933)


‘हंस’ (फरवरी 1933) के ‘नीरक्षीर’ स्तंभ में प्रेमचंद ने जिस शैली में ‘अंतर्वेदना’ की समीक्षा की है, उससे यह प्रतीत होता है कि वे नारी-शक्ति को भली-भांति पहचान चुके थे. प्रेमचंद लिखते हैं : 


हिन्दी साहित्य के निर्माण में देवियाँ जो स्थान लेती जा रही हैं, वह उसके लिए गौरव की बात है. पद्य-रचना में तो उनका स्थान मर्दों से जौ-भर भी कम नहीं. जहाँ भावों की कोमलता ही प्रधान वस्तु है, जहाँ मनोवेदना ही का राज्य है, वहाँ तो कहना ही क्या!

‘पद्य-रचना में उनका स्थान मर्दों से जौ-भर भी कम नहीं’– इसे पढ़कर मुझे सुभद्राकुमारी चौहान का वह भाषण याद आ रहा है, जिसे अट्ठाईसवें हिन्दी साहित्य सम्मलेन (बनारस) में अपने सभानेत्रित्व में ‘महिला-सम्मलेन’ में दिया था. सुभद्रा जी ने अपने भाषण में कहा था : 


यह समानता का युग है. जीवन के प्रत्येक क्षेत्र – शिक्षा, समाज, राजनीति आदि में स्त्रियाँ केवल आपस में ही नहीं; किन्तु पुरुषों के साथ भी समानता का दावा कर रही हैं. अभी तक स्त्रियों में शिक्षा का अभाव था. इसलिए पुरुषों को ही स्त्रियों की मनोभावनाओं, उनके हृदय के उद्वेगों, उनके प्रेम और विरह, उनकी आकांक्षाओं और अभय की वाणी देनी पड़ी है. इसमें संदेह नहीं कि यह कार्य उन्होंने आशातीत सफलता से किया है. किन्तु अब स्त्रियाँ इस योग्य हो चली हैं कि वे अपने हृदय के गीतों को अपने ही शब्दों में गा सकें. अब हमें अपनी मनोभावों की अभिव्यक्ति के लिए पुरुषों की लेखनी की आवश्यकता नहीं रह गई है.

श्रीमती चौहान का यह भाषण ‘साहित्य-जगत्’ स्तंभ में नवम्बर 1939 के ‘विश्वमित्र’ में प्रकाशित है.

ध्यातव्य है कि तत्कालीन समाज में अपने को स्थापित करने के लिए महिलायें पितृ-सत्तात्मक व्यवस्था से पूरे जोर-शोर से लड़ रही थीं. पढ़ने-लिखने की दुनिया में भी अपना एक स्थान बनाने के लिए वे जद्दोजहद कर रही थीं. नवजागरणकालीन हिन्दी लोकवृत्त में स्त्री-पुरुष का भेद-भाव चरम पर था. अत: 1933 में महिला विद्यापीठ (प्रयाग) में एक स्त्री-कवि-सम्मलेन सुभद्राकुमारी चौहान के सभापतित्व में हुआ. इसमें तोरन देवी ‘लली’ (लखनऊ), विष्णुकुमारी देवी (कानपुर) और राजकुमारी (झांसी) की रचनाओं की विशेष रूप से प्रशंसा की गई. महत्त्वपूर्ण बात यह थी कि दूसरे दिन इस सम्मलेन में पुरुष भी आमंत्रित किये गये. सभानेत्री श्रीमती चौहान ने कहा : 


कविता के मैदान में स्त्रियाँ पुरुषों से बहुत आगे जा सकती हैं क्योंकि उनकी शरीर-रचना और मन पुरुषों की अपेक्षा कहीं अधिक परिष्कृत हैं और उनमें पुरुषों की अपेक्षा भावुकता भी अधिक होती है.
(सरस्वती, मई 1933).

बहरहाल... हम बात प्रेमचंद लिखित समीक्षा की कर रहे थे. पुरुषार्थ की कविताओं को पढ़कर आश्चर्यचकित प्रेमचंद लिखते हैं :


‘अंतर्वेदना’ को देखकर हम कह सकते हैं कि उनमें असाधारण रचना-शक्ति थी और अपने कुमारी-जीवन में ही उन्होंने ऐसी आत्मानुभूति प्राप्त की, जो प्रौढ़ कवियों को भी गौरव प्रदान कर सकती है. ***पुस्तक को हाथ में लेते ही एक क्षण के लिए हाथ और हृदय दोनों में सिहरन-सी हो उठती है और इन कविताओं में जो वेदना है वह शतगुण हो जाती है.

पुरुषार्थ हिंदी की प्रमुख पत्र-पत्रिकाओं में छप रही थीं परन्तु प्रकाशित समीक्षाओं को देखने से ज्ञात होता है कि हिन्दी-जगत् उनके नाम से अनभिज्ञ था. प्रेमचंद के अनुसार, 

"एक दो महीने पहले तक हिंदी-संसार, देवी पुरुषार्थवती के नाम से अपरिचित-सा था.” 

‘विश्वमित्र’ में ‘दीमक’ नामधारी ने लिखा

“हमें अत्यंत खेद तथा लज्जा के साथ स्वीकार करना पड़ता है कि लेखिका के नाम से और उनकी कविताओं से हम आज पहले-पहल परिचित हुए हैं.” 

नवयुग प्रेस, लाहौर से प्रकाशित ‘हिन्दी-सन्देश’ में ‘अंतर्वेदना’ की समीक्षा ‘पंजाबी महिला का चमत्कारी महत्त्व’ शीर्षक से छपा है. उसमें लिखा है


स्वर्गीया पुरुषार्थवती का नाम पंजाब के साहित्यिक जगत् में नया नहीं है, परन्तु इसमें सन्देह नहीं कि पंजाब के बाहर उन्हें अपने जीवनकाल में वह ख्याति नहीं प्राप्त हो सकी थी, जिसकी वह अधिकारिणी थीं.”
(हिन्दी-सन्देश, 28 फरवरी 1933) आईये, आगे बढ़ते हैं.

‘दीमक’ महाशय लिखते हैं :


श्रीमती पुरुषार्थवती की एक-एक कविता हमें “अनाघ्रातं पुष्पम्” की तरह नवीन और निष्कलंक लगी है. उनकी सरसता और कमनीयता जैसे अतुलनीय है, विचारों की प्रौढ़ता और भावों की विचित्रता में भी उनका स्थान उसी प्रकार निराला है. ***परवर्ती कविताओं में रहस्मय भावों की गंभीरता हमें और भी आश्चर्यचकित करती है. उनके “रोमांटिक” भाव रहस्मय हैं, सन्देह नहीं; तथापि अमावस्या के गहन तिमिर के आवरण-जाल के भीतर स्वच्छ, तरल तारकाओं की तरह टिम-टिम करते हैं.

‘विश्वमित्र’ के संपादक छायावादी कविता के घोर विरोधी थे. यह विरोध इस समीक्षा में भी प्रकट है : 


प्रारंभ की दो चार कवितायेँ शायद एकदम अपक्क्वास्था में लिखी गयी थीं, इसलिए उनमें हिन्दी की अर्थहीन कवितायें के “छायावादी महाकवियों” की छाया स्पष्ट रूप में पायी जाती है. पर पीछे की सब कविताओं में लेखिका का अपनापन, उसकी निगूढ़, भावुक अन्तरात्मा से नि:सृत अपूर्व, अकलंक, शुभ्र फेनोच्छ्वसित निर्झर-धारा ही प्रवाहित हुई है.

‘हिन्दी-सन्देश’ में ‘पारखी’ छ्द्मनामधारी ने लिखा है :

कवितायें सभी की सभी भावपूर्ण हैं, भाषा प्रांजल है, और छन्द उपयुक्त तथा सरल है.

‘पारखी’ महोदय ने विभिन्न पत्रिकाओं में प्रकाशित समीक्षाओं के अंश भी उद्धृत किये हैं.
दिसंबर 1934 की ‘चाँद’ में शांतिप्रिय द्विवेदी का एक लेख ‘नवीन काव्य-क्षेत्र में महिलाएं’ शीर्षक से प्रकाशित है. उसमें लिखा है :

पुरुषार्थ खिलने के पहले एक मुरझा जाने वाली कलिका थीं. उनकी कविताओं में निराशा और उदासीनता का स्वर है, कहीं-कहीं संसार से विरक्ति और एकांत में शांत भाव से पड़े रहने का भी सुन्दर भावना है.

अपने इसी लेख में द्विवेदी जी ने रामेश्वरी देवी की कविताओं को महादेवी वर्मा की पथानुगामिनी बताते हुए कहा है कि इनकी कविताओं में प्रेममय जीवन का प्रणयोच्छ्वास है.



(दो)

रामेश्वरी देवी गोयल के निधन पर जनवरी 1936 की ‘सुधा’ में संपादक ने लिखा :

सुधा की अपनी लेखिका तथा हिन्दी-जगत् की एक होनहार कवयित्री श्रीमती रामेश्वरी गोयल अब इस संसार में नहीं हैं, यह जानकर किसे दुःख नहीं होगा. 25 वर्ष की इस छोटी-सी अवस्था में ही उन्हें इस नश्वर जगत् से उठाकर विधि ने अपने अवैध विधान का ही परिचय दिया है. सुधा, हिन्दी-साहित्य तथा उनके परिवार की जो क्षति उनके इस असामयिक स्वर्गवास से हुई है, वह किसी प्रकार भी भुलाई नहीं जा सकती.

‘स्त्री-काव्यधारा’ में रामेश्वरी देवी गोयल को कवयित्री के साथ-साथ कहानीकार भी बतलाया गया है परन्तु प्रमुख पत्रिकाओं की छान-बीन करने के बाद मुझे गोयल लिखित कोई कहानी नहीं प्राप्त हुई. ‘स्त्री-काव्यधारा’ में इनका जन्म सन् 1911 ई. लिखा है, लेकिन मृत्यु-तिथि का कोई उल्लेख नहीं है. ज्ञानमंडल (बनारस) से प्रकाशित ‘हिन्दी साहित्य कोश’ के दूसरे भाग में लक्ष्मीकांत वर्मा ने जन्म 1910 व मृत्यु 1935 ई. बताया है. ‘मिश्रबंधु-विनोद’ के चौथे खंड में रामेश्वरी गोयल को स्थान नहीं दिया गया है. यही स्थिति सुमन राजे के ‘आधा इतिहास’ में भी है. नीरजा माधव ने शकुंतला सिरोठिया/महाश्वेता चतुर्वेदी संपादित ‘हिन्दी काव्य को नारी की देन’ से गोयल की तीन कविताओं को सीधे-सीधे उतार लिया है.

रामेश्वरी गोयल के जीवन में झाँकने का प्रयास किसी ने नहीं किया है. संपादक ‘सुधा’ के अनुसार रामेश्वरी देवी एम.ए. का जन्म झाँसी के एक प्रसिद्ध राष्ट्रीय परिवार, प्रसिद्ध राष्ट्रीय कार्यकत्री पिस्तादेवी के उदर से हुआ था :

श्रीमती पिस्तादेवी को अपने पिता श्रीयुत प्रिंसिपल लक्ष्मणप्रसाद जी एम.ए., डी.ए.वी., देहरादून से जो राष्ट्रीय तथा सामाजिक भावनाएँ दहेज़ मिली थीं, उन्हें आपने प्राय: पूरे रूप से गर्भ-काल से ही अपनी पुत्री के हृदय में अंकित कर दिया था. तभी तो बचपन से ही उनकी यह पुत्री भारतीय नारी-आन्दोलन की वर्तमान रूप-रेखा का बहुत कुछ अनुभव झाँसी में कराती रही, और बड़ी होकर प्रयाग के साहित्यिक युवक-युवती-संप्रदाय में भी उसने अपना एक विशिष्ट स्थान बना लिया.
(सुधा, जनवरी 1936)

रामेश्वरी देवी को हिन्दी का शौक बचपन से ही था. वह एक अच्छी तथा तेज़ छात्रा थीं. दिल्ली विश्वविद्यालय से प्रथम श्रेणी में एफ.ए. पास किया. फिर इलाहाबाद के क्रास्थवेट गर्ल्स कॉलेज में रहकर बी.ए. और एम.ए. की परीक्षायें उत्तीर्ण कीं. तत्पश्चात इलाहाबाद के ही आर्य-कन्या-पाठशाला हाईस्कूल की मुख्याध्यापिका रहीं. रामेश्वरी जी ने ‘सहेली’ का संपादन किया तथा उसका एक सुन्दर विशेषांक भी निकाला था.

रामेश्वरी देवी गोयल का विवाह आगरा सेंट जोंस कॉलेज के अध्यापक प्रकाशचन्द गुप्त के साथ हुआ था. प्रथम पुत्रोत्पत्ति के बाद ही श्रीमती गोयल का निधन हो गया. निधन का समाचार सुनकर झाँसी का प्रत्येक हृदय स्तंभित रह गया :


राष्ट्रीय तथा सामाजिक कार्य करने वाली युवक-मंडली पर मानो वज्रपात ही हो गया क्योंकि श्रीमती रामेश्वरी अथवा ‘कोमा’ इन आन्दोलनों की निश्चित प्राणदात्री थीं. नगर के सैकड़ों नागरिक उनके अंतिम सम्मान के लिए श्मशान तक गए, और खाली हाथ लौटे. सायंकाल एक बड़ी सार्वजनिक सभा ने अपने नगर की इस योग्यपुत्री के लिए शोकांजलि प्रदान की, और उनकी माता के साथ सहानुभूति प्रदर्शित की.

पुरुषार्थवती की तरह रामेश्वरी गोयल की कविताओं का संग्रह ‘जीवन का सपना’ उनके निधन के बाद प्रकाशित हुआ. सुप्रसिद्ध लेखक परमेश्वरीलाल गुप्त ने उनकी रचनाओं को बड़े श्रम के साथ एकत्र कर प्रभात साहित्य कुटीर (आज़मगढ़) से प्रकाशित कराया. अमरनाथ झा के अनुसार, 
इन कविताओं में अद्भुत भाव भरे हैं. मर्मभेदी भावनायें हैं. आशा और निराशा के बहुरूपी चित्र हैं. एक-एक शब्द से सत्य की स्पष्ट ध्वनि सुनाई देती है. मिथ्या कल्पना का तो कहीं भी चिह्न नहीं है.
फरवरी 1938 की ‘सरस्वती’ में ‘नई पुस्तकें’ स्तंभ में ज्योतिप्रसाद मिश्र ‘निर्मल’ ने लिखा :


गोयल की कविताओं पर सामाजिक नवीन काव्य की भावनाओं और विचार-धाराओं का सुन्दर प्रभाव पड़ा था और इसी प्रेरणा से प्रेरित होकर वे कविताएँ लिखती थीं. कवितायेँ प्राय: हृदयस्पर्शी, सुन्दर और भावपूर्ण हैं. गद्य-काव्य में भी कल्पना, अनुभूति और भावना का सुन्दर सामंजस्य प्रदर्शित होता है

निर्मल जी ने अपनी ‘स्त्री-कवि-कौमुदी’ में पुरुषार्थवती व रामेश्वरी देवी की एक-एक कवितायेँ सम्मिलित की हैं.

अप्रैल 1938 की ‘सरस्वती’ में ‘जीवन का सपना’ शीर्षक से ही एक काव्यात्मक लेख रुस्तम सैटिन का छपा है. सैटिन के लेख ‘हंस’ आदि में प्रमुखता से प्रकाशित होते थे. ‘आधुनिक हिन्दी-काव्य में दु:खवाद’ (हंस,अप्रैल 1936) लेख का परिचय देते हुए इनके संबंध में प्रेमचंद ने लिखा है :

आप बंबई-प्रांत के रहने वाले पारसी युवक हैं. आप हिन्दू-यूनिवर्सिटी के छात्र हैं; पर आप में आलोचना शक्ति का अच्छा विकास हुआ है. आपका यह लेख किसी प्रौढ़ लेखनी से निकलकर उसकी गौरव बढ़ाता.
बहरहाल...

रुस्तम सैटिन का रामेश्वरी देवी से परिचय था और बरसों उनके निकट रहने का अवसर भी मिला था. सैटिन के लेख की पहली ही पंक्ति है :
जीवन का सपना’ में एक विप्लवकारी हृदय का वास्तविक चित्र है.

आखिर रामेश्वरी जी के हृदय में कैसी उथल-पुथल थी? इसे स्पष्ट करते हुए रुस्तम सैटिन ने लिखा है


हमारा सामाजिक जीवन इतना दूषित हो चुका है कि संलग्न होकर चेष्टा करने पर भी जीवन का साधारण सुख अप्राप्य ही रहता है. वर्तमान समाज का मूल-मंत्र ‘स्वार्थ’ है. रूढ़ि के रूप में या सुधार के नाम से यह विष हमारी उच्च से उच्च भावना की जड़ों तक फ़ैल चुका है.

यह वह दौर था, जब अछूत, किसान, मज़दूर और विधवा समस्या पर राष्ट्रीय स्तर पर बहस हो रही थी. देश में ऐसे लोगों का बाहुल्य था जो नहीं चाहते थे कि अछूत समस्या खत्म हो, किसान लगान देना बंद करें, मज़दूर हड़ताल करें, विधवाओं का पुनर्विवाह हो. ऐसे स्वार्थी और रूढ़िवादी नेताओं व कार्यकर्ताओं से रामेश्वरी जी दुखी रहा करती थीं. यहाँ यह भी कहना चाहूँगा कि चिन्तन के स्तर पर वह प्रेमचंद, प्रसाद, निराला और महादेवी के समकक्ष थीं.

रुस्तम सैटिन का कहना है कि रामेश्वरी जी का सरल हृदय सांसारिक स्वार्थमय आडंबर से व्याकुल हो उठता था. उन्हें वर्तमान जीवन की असत्यता ने इतना प्रभावित कर दिया था कि कभी-कभी वह बहुत गंभीरतापूर्वक सोचने लगती थीं कि कवि-कथित स्वार्थरहित सच्चे प्रेम का कोई वास्तविक अस्तित्व है भी या नहीं. रामेश्वरी गोयल लिखती हैं :

यहाँ विचित्र व्यापार है– कोई वस्तु, अथवा व्यक्ति, तुम्हारी रुचि के अनुकूल होने पर भी तुम उस भाव को व्यक्त करने के अधिकारी नहीं हो. तुम्हें स्नेह-भाव दिखाना ही होगा. लाख अनिच्छा होने पर भी हृदयगत पीड़ा को छिपाकर तुम्हें मुस्कराना ही होगा– रोते हुए हृदय से भी होठों पर कुछ सुख की झलक दिखानी ही होगी! अच्छा यह जीवन है!! संसार में इस ढोंग का कितना अधिक महत्त्व है, यह देखकर हँसी आती है और दुःख भी होता है.

रामेश्वरी देवी में स्वदेश-प्रेम कूट-कूट कर भरा था. जिन दिनों देश में स्वाधीनता-संग्राम चल रहा था, उनका भावुक हृदय देशानुराग से पागल-सा हो उठा था. रुस्तम सैटिन के अनुसार उस दौर में लिखी जा रहीं हजारों राष्ट्रीय कविताओं में सिर्फ़ गोयल की कवितायें स्थाई महत्त्व की हैं. सैटिन ने सही लिखा है :

रामेश्वरी जी की राष्ट्रीय कविताओं में भाव, भाषा और संगीत का इतना अच्छा सम्मिश्रण हुआ है कि उनकी राष्ट्रीय कवितायें सर्वकालीन और सर्वदेशीय होने का गौरव प्राप्त कर सकती हैं.

‘हिन्दी साहित्य कोश’ के दूसरे खंड में रामेश्वरी गोयल के परिचय के क्रम में लक्ष्मीकान्त वर्मा ने उनका समुचित मूल्यांकन किया है :

रामेश्वरी गोयल छायावादी युग की उन सशक्त कवयित्रियों में से हैं जिनका कवि-व्यक्तित्व और सौन्दर्य-दृष्टि उस युग के अधिकांश कवियों की अपेक्षा अधिक स्पष्ट और संयमित और संवेदनपूर्ण रही है. रामेश्वरी गोयल के गीतों में व्याप्त करुणा और एक मर्मान्तक वेदना हमें उसी कोटि और उतनी ही हृदयग्राह्य रूप में मिलती है जितनी कि अंग्रेजी के कवि कीट्स की कविताओं में. अनुभूति की गहराई के साथ-साथ बिम्बों और अनुभूतियों के मानवीय वैयक्तिक स्वर को जो संवेदना हमें गोयल की कविताओं में मिलती है, वह इस बात की सूचक थी कि वे आगे चलकर हिन्दी के गीत-साहित्य को नया स्वर और नयी भावभूमि प्रदान करतीं. लेकिन जैसा कि होना था, उनकी मृत्यु इतने अल्पकाल में हो गयी कि उनकी प्रतिभा का पूर्ण योगदान हिन्दी की गीत-शैली को नहीं मिल सका.

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सुजीत कुमार सिंह
उच्च शिक्षा गोरखपुर और बनारस से.

शिल्पायन (दिल्ली) से ‘अछूत’  (राष्ट्रवादयुगीन दलित समाज की कहानियाँ) तथा ‘हंस का रेखाचित्रांक’ का संपादन. आजकल 1900-1920 के दौरान स्त्रियों द्वारा लिखित कविताओं पर स्वतंत्र कार्य कर रहे हैं.

sujeetksingh16@gmail.com
मोबाइल : +91 94543 51608

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  1. बहुत शोध,तन्मयता और सहानुभूति पूर्वक लिखा गया लेख

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  2. प्रज्ञा पाठक26 अग॰ 2020, 10:30:00 am

    सुजीत कुमार सिंह का पुरुषार्थवती देवी एवं रामेश्वरी देवी गोयल पर लिखा गया लेख एक सांस में पढ़ा। दोनों के रचना-कर्म से परिचित होने के बावजूद मेरे लिए भी इस लेख में अनेक नई जानकारियां हैं। इसका श्रेय सुजीत के ईमानदारी से किए गए शोध को जाता है। हिंदी की गुमनाम लेखिकाओं के संदर्भ में स्त्री-केंद्रित इतिहास लेखन भी अपर्याप्त और अधूरा है। ऐसे गंभीर शोध प्रयास इस क्षेत्र में महत्त्वपूर्ण साबित होंगे।लेखक और संपादक दोनों को साधुवाद ।

    शीर्षक में 'रोना' न होता तो यकीन जानिए इस लेख का महत्त्व कम न होता ।
    -प्रज्ञा पाठक

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  3. शोधपरक आलेख। आपने इस आलेख में जिन पुस्तकों की आलोचना की है, वे आलोचना योग्य हैं। लगभग सारी पुस्तकें जल्दबाजी में निपटाई गई हैं।

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  4. दयाशंकर शरण26 अग॰ 2020, 12:16:00 pm

    दोनों कवयित्रियों का अल्प जीवनकाल मन और हृदय को व्यथित कर गया । किसी ने ठीक हीं कहा है कि जीवन की लंबाई नहीं गहराई हीं मायने रखती है । तत्कालीन रूढ़ियों,अंधविश्वासों और सामंती मूल्यों-मान्यताओं में सदियों से पीसती-घुटती स्त्री जाति की दारून व्यथा को उस काल की कविताओं में जिन लेखिकाओं ने सशक्त अभिव्यक्ति दी -उनमें इन दोनों का योगदान ऐतिहासिक और अभूतपूर्व है । गुमनामी के अंधेरे और साहित्य के हाशिए से उठाकर इनके साहित्यक अवदान को हिंदी समाज के समक्ष प्रस्तुत करने के लिए सुजीत जी को साधुवाद !

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  5. आपकी इस प्रस्तुति का लिंक 27.8.2020 को चर्चा मंच पर दिया जाएगा। आपकी उपस्थिति मंच की शोभा बढ़ाएगी|
    धन्यवाद
    दिलबागसिंह विर्क

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  6. शुभनीत कौशिक27 अग॰ 2020, 6:36:00 am

    पुरुषार्थवती देवी और रामेश्वरी देवी गोयल के व्यक्तित्व व कृतित्व से परिचित कराने के लिए सुजीत भाई का बहुत-बहुत आभार। हिंदी लोक वृत्त में महिलाओं की सशक्त उपस्थिति को रेखांकित करता हुआ विचारोत्तेजक लेख।

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  7. शोधार्थी का सच्चा धर्म आपकी प्रस्तुत समालोचना में परिलक्षित है आदरणीय 🙏🏻
    प्रसिद्धि पर तो दुनिया प्रकाश डालती है ऐसे में आपको साधुवाद कि उन अनछुए आवश्यक पहलुओं पर अपने प्रमाणित तथ्यों और आधार वाक्यों के साथ प्रकाश डाला जिसमें सच्ची संवेदना और साहित्यकार मौजूद रहा।
    अभिभूत हूं आपके प्रयास से, सराहनीय क़दम 🙏🏻

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  8. पुरुषार्थवती देवी और रामेश्वरी गोयल पर लिखे इस लेख के लिए साधुवाद। यह लेख पढ़ते हुए मुझे याद आया कि शमशेरजी ने कई बार रामेश्वरी देवी गोयल का ज़िक्र किया था। उनके पिता की संस्था का भी ज़िक्र किया था। उन्होंने रूस्तम सैटिन का भी ज़िक्र किया था। लेख पढ़कर अच्छा लगा। शोध परक तो है ही। पर इसमें कुछ काव्य पंक्तियाँ भी होतीं तो बड़ा अच्छा लगता। पर यह काम दूसरे भी करें। यानी कि हम खुद अगर हमें पढ़नी है तो। बहरहाल।

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    1. पुरुषार्थवती देवी और रामेश्वरी देवी गोयल की कुछ कविताएँ आप यहाँ पढ़ सकते हैं :


      https://hindinavjagaran.blogspot.com/2020/08/blog-post_15.html?m=1

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