अंकिता आनंद की कविताएँ

Posted by arun dev on दिसंबर 25, 2019

















‘निकले तख़्त की खातिर दर-ब-दर
सर झुका रहमत माँगने के इरादे से,
उतरे खुदाई का फर्क बताने पर,
खुदा बन गए, मुकरना ही था वादे से.’

अंकिता आनंद की कविताओं में रंगमंच की हरकत करती हुई जानदार भाषा है. आपने पहले भी उन्हें पढ़ा है.
कुछ नई कविताएँ प्रस्तुत हैं.



अंकिता आनंद की कविताएँ              



नमक अदायगी
वर्दी की दलील ये कि उसकी ज्यादतियाँ ज़ाती नहीं
वो बस अपना काम कर रही है
पेट भरने का इंतज़ाम कर रही है
पर क्या हमेशा ही यही था उसका काम?
फिर कौन थे उसके गाँव में बो रहे थे धान,
जिनका खून खेत-गोदामों में सड़ गया,
मंडियों में कौड़ियों के भाव चढ़ गया?
कौन खाता गया थाली में छेद करते हुए,
शहरों में धकेला फेफड़ों में ज़हर भरते हुए
ज़मीन लील कर जिन्होंने खोली दे दी
गमछों के फंदे बने, बच्चों को वर्दी-गोली दे दी
आज उस वर्दी का फ़र्ज़ करते अदा
कहो किस नमक का कर्ज़ तुमने भरा?



इधर-उधर की बात
तालीम वो भी कि इम्तिहान पास कर कोई निकल जाए
सीखता वो भी है जो सवाल कर ताउम्र दे इम्तिहान
ताकत उसकी भी जो पीठों पर लाठियाँ तोड़े
और रोकती हुई उस एक उंगली में भी
मज़बूती 
कायदे उनके भी हैं जिनके पास ठहरी कुर्सियाँ
जो सड़कों पर लेटे हुए ज़िद है उनकी भी कोई
सब्र उनमें भी है जिनकी जमा एक-पर-एक मुफ़्त गोलियाँ
इंतज़ार उनका भी जो खोने की चीज़ें और डर हैं गँवा बैठे
दौलत उनकी भी जो कर रहे ईमान की ख़रीद 
पूँजी उनकी भी जो कमा ला रहे दुआ और ग़ैरत
खेल उनका भी है जो खेले हैं जीत की ख़ातिर
खिलाड़ी वो भी जिन्हें जीतना है जीने के लिए.



तरक्की
निकले तख़्त की खातिर दर-ब-दर
सर झुका रहमत माँगने के इरादे से,
उतरे खुदाई का फर्क बताने पर,
खुदा बन गए, मुकरना ही था वादे से.


 
निकास द्वार पीछे की ओर हैं
हम "बाहरवालों" को चेताते हैं
उन्हें अपने-अपने घर भगा दिया जाएगा,
भूल जाते हैं कि हम सब अपने घरों से भागे हुए हैं,
कोशिश तो की है कम-से-कम.
चाहे दीवार फाँद दूसरी तरफ पहुँचें हों,
या उसे खरोंचते हुए भीतर ही रह गए हों.
बहुत ज़रूरी है
एक-दूसरे में हमें घर मिल सके,
वरना दरवाज़े जो औरों का प्रवेश रोकेंगे,
एक दिन हमारा निकास भी.



खुदकुशी
जो रात-दिन रहता परेशान है,
सोचता रहता है कि वो कौन है,
जब मिलता नहीं उसे जवाब आसान,
पकड़ लेता है कोई भी अंजान गिरेबान,
और बेलगाम चीखता है, "क्या तू नहीं जानता मैं हूँ कौन?"
सामनेवाला नहीं जानता, नहीं जान सकता, रहता है मौन.
इस परिभाषा के अभाव में पूछनेवाले का बाँध टूट जाता है,
बेतहाशा अपने खाली हाथों को धर्म-जात की रस्सी थमा झूल जाता है.
न वो खुद को, न उसका कोई सगा ही उसे रोक लेता है,
राह में जो टकराए अंधाधुंध वो उसका गला घोंट देता है.
सोचता है वो कर रहा अपना रास्ता साफ़ है,
कि खुद की हिफ़ाज़त करते हुए सौ खून माफ़ है.
अपनी जूनूनी तबाही में कहाँ ही उसे ये ध्यान है,
कि जिसे ढूँढ़ रहा, जो नहीं रहा, उसके अंदर का इंसान है.



नज़राना
अपने हर हर्फ़ की कीमत चुकाऊँ है ये कहीं बेहतर,
न हो ऐसा मेरी ख़ामोशी किसी और को मँहगी पड़े.
आज ग़र दरख़्तों के सहारे सीधी है अपनी भी कमर
कल हम भी तो हों अपने जिगरों के वास्ते यूँ खड़े. 




पोस्ट-मार्टम
हम विचलित होते हैं
फैसला सुनकर:
"किसी इंसान ने
नहीं मारा
किसी इंसान को."
हमारी नाराज़गी है
उनके कहने से
"इंसान मरा है
भूख
खंजर
बमगोलों
चोट
लाठियों
जैसे सामान से,
तो कैसे सज़ा दें
इंसान को?”
पर सच है,
कैसे मार सकता है
इंसान इंसान को
(सिर्फ़ इसलिए
क्योंकि वो मार सकता है,)
और रह सकता है
फिर भी इंसान?
अतः
सिद्ध हुआ
इंसान कभी नहीं मारता
इंसान को,
इंसान मरता है
उस सब कुछ से
जो इंसान न हो.
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अंकिता आनंद पत्रकारितालेखन व रंगकर्म के क्षेत्रों से जुड़ी हैं, हिंदी और अंग्रेज़ी में लिखती हैं और दिल्ली में रहती हैं. 

anandankita2@gmail.com