मंगलाचार : सोमेश शुक्ल

Posted by arun dev on मई 20, 2019






































हिंदी कविता की दुनिया में विविधता उसी तरह है जिस तरह इस समाज में है. एक ही समय में तमाम चीजें एक साथ चलती रहती हैं. आप अपने लिए कोई सी जगह चुन सकते हैं किसी भी स्वर में कह सकते हैं. शोर में शामिल होने का दबाव साहित्य में नहीं है. सोमेश शुक्ल जरा अपने अंदर उतरते हैं और चुप्पियों को सुनते हैं. इस युवा की कुछ कविताएँ आपके लिए.





सोमेश शुक्ल की कविताएँ                            





(एक)

सोमेश में शुक्ल घुसा हुआ है
जैसे आकस्मिकता में घुसी होती है ऐतिहासिकता

हमें पता होना चाहिये
किसी चीज का आकार हमेशा उस चीज से छोटा होता है
घटना बड़ी होती है घटना के समय से
मन इतना तक छोटा हो सकता है कि हो ही न

कहने के लिये जब कुछ नहीं होता
तब कुछ कहना कितना जरूरी हो जाता है

मैं जब किसी से मिलता हूँ तो बीच में
एक आदमी जितनी दूरी बनाकर रखता हूँ

जमीन देखकर चलना मैंने छोड़ दिया है
कहीं कुछ भी पाने की इच्छा अब मुझमें नहीं रही





(दो)

होना हो सकता है

चुपचाप!
अकेले अकेले बात करती दो वस्तुओं के बीच
बातों का कोई अंत नहीं

मौन को सुन लिये जाने के अलावा भी उसमें कुछ हो सकता है
देखने को संसार में दृश्यों के अलावे भी कुछ हो सकता है
कुछ भी हो सकता है
दुनिया का सबसे निर्दयी हत्यारा मेरा पता जान चुका है
वह जैसे संसार के उस कोने से मेरी हत्या करता हुआ चला आ रहा है
उसके साथ उसका साथ भी हो सकता है

जो लोग जान चुके हैं कि उन्हें कुछ पता नहीं
तो उनके साथ अब कभी भी कुछ भी हो सकता है

एक जगर देर तक छूने में 'वहाँ' छुअन नहीं रहती
बाकी कहीं कुछ भी हो सकता है

होता सब है, कभी न कभी
अचानक, लेकिन पंक्तिबद्ध
जानवर कहीं भी जा सकते हैं लेकिन जंगल में
कोई कुछ भी कह सकता है लेकिन बातों में
यह सच है कि हर आकार को तोड़ा जा सकता है
अर्थ को उसके पीछे की ओर मोड़ा जा सकता है और प्रश्न में जोड़ा जा सकता है
कुछ नहीं में भी थोड़ा आ सकता है

जितना दूर उतना भीतर की ओर
जितना गहरा उतना सतही
बाकी सिर्फ बीच है जो कहीं भी हो सकता है





(तीन)

चलने से कभी मैंने ये नहीं सोचा कि मेरा रास्ता पूरा हो
मैं बस चलने को पूरा करना चाहता था

जीवन भर मैं जहां जहां गया
उन जगहों को वहां वहां से अपने साथ ले आया,

अब कहीं न जाने के लिये भी कोई जगह नहीं बची है.





(चार)


अपने आप से बंधे हुऐ मवेशियों की तरह
मैं चरता हूँ अपने होने की जगह

रोटी नहीं कि पता नहीं भूख नहीं
इतना भिखरा हुआ एकांत
कि पड़ोस में कोई पड़ोस नहीं

मन के भीतर कुछ है जो मन को लीलता है
स्मृतियों को छोड़ देता है

एक अज्ञात थकान में
मैं चलाता हूँ और चलने का रास्ता छोड़ देता हूँ

जैसे एक आधार अपनी धार में लगातार
सिर्फ मुझको बहाता है मेरा सबकुछ छोड़ देता है





(पांच)

जब मैं अपनी ही शक्ल देखता हूँ
मुझसे थकी हुई मुझ तक
उन्हीं आँखों से उन्हीं में देखना
कितना बड़ा हिस्सा मेरा असंतुष्ट पड़ा है.

मैं सिर्फ इन पत्थरों को संतुष्ट कर सकता हूँ
इस मिट्टी को, कण-कण संतुष्ट कर सकता हूँ
अंतरिक्ष के इस क्षण-क्षण रिक्त को संतुष्ट कर सकता हूँ

इन्हें कहीं से भी, मैं कुछ भी पुकार सकता हूँ
और ये यदि नहीं सुनते तो और अधिक संतुष्ट होंगे

मैं इन्हीं से इन्हें पुकारता हूँ
सबकुछ अपनी-अपनी ओर ही तो लौट रहा है.



________________________________________


someshshukl@gmail.com