औरत की दुनिया (नासिर शर्मा ) : शिप्रा किरण

Posted by arun dev on अप्रैल 18, 2019





















हिंदी की वरिष्ठ और महत्वपूर्ण लेखिका नासिरा शर्मा का लेखन विपुल और विविध है. आधुनिक पर्शियन साहित्य तथा समकालीन ईरानी समाज, संस्कृति और राजनीति विषयक मामलों पर उनका  विशेष कार्य है. हिन्दी, उर्दू, अंग्रेजी, पर्शियन, पश्तो आदि विभिन्न भाषाओं के साहित्य का उनका गहरा अध्ययन है. कहानियाँ, उपन्यास, वैचारिकी, संस्मरण, अनुवाद, आलोचना और संपादन की उनकी लगभग ५० से अधिक किताबें प्रकाशित हैं.

‘औरत की दुनिया’ उनके लेखों का संग्रह है जिस पर विस्तार से बात कर रहीं हैं शिप्रा किरण.

 औरत की दुनिया का विस्तार                   
शिप्रा किरण






“सांस्कृतिक रूपों की अभिव्यक्ति का सबसे सशक्त माध्यम साहित्यिक अभिव्यक्ति के रूप में है. स्त्री का लिखना अपने आप में प्रतिरोध को व्यक्त करता है. लिखकर वह विभिन्न मसलों पर अपनी राय, अपना पक्ष जाहिर करती है जो अधिकतर सांस्कृतिक विमर्श के दायरे से अनुपस्थित किया गया पक्ष और राय होती है. इसकी संभावना पूरी है कि यह प्रचलित सांस्कृतिक विमर्श के ठहरे और ठिठके हुए रूप को उलटा पुल्टा कर दे...स्त्री ने उन्हीं विषयों पर लिखा है जिन पर पुरुष ने भी विचार किया है. पर स्त्री लेखन में समस्या का स्वरुप, ट्रीटमेंट और निष्कर्ष बदल जाता है.”1

नासिरा शर्मा का पूरा साहित्य स्त्री लेखन के विषय में कही गई इस बात को सच साबित करता है. यह सच है कि नासिरा कभी किसी बने बनाए खांचे या किसी वाद से नहीं जुड़ींना ही उन तक सीमित रहीं पर उनके लेखन के सरोकार, उस सरोकार के विस्तार से इनकार नहीं किया जा सकता. उन्हें पढ़ते हुए हम एक गंभीर लेखन के सरोकारों, उसके अनुभवों से गुजरते हुए लेखन के वास्तविक उद्देश्यों से होकर गुजरते हैं.




नासिरा की लेखकीय जीवन की विविधता का उदहारण है. इस किताब के शीर्षक से यह समझने की भूल हरगिज नहीं करनी चाहिए कि औरत की दुनिया सिर्फ औरत या स्त्री विमर्श तक ही सीमित है. नासिरा की अन्य कई किताबों की तरह यह किताब भी स्त्री विषयक मुद्दों के साथ-साथ समाज और राजनीति से जुड़े दूसरे मसलों पर भी एक तार्किक और वैश्विक दृष्टि का परिचय देती है. सही मायने में यही औरत की दुनिया है जिसमें सारा संसार समाया हुआ है. लेकिन यह विडंबना ही कही जाएगी कि उसके विस्तार को सीमाओं में कैद किया जाता रहा है. नासिरा की विविधता मनुष्य की किसी एक प्रजाति या किसी लिंग विशेष तक ही सीमित नहीं बल्कि उससे कहीं आगे जाकर अपने पूरे परिवेश, समाज, राजनीति, प्रकृति से भी जुड़ जाती है. जिस गहराई और तीव्रता से वह स्त्री मुद्दों पर लिखती हुई स्त्रियों पर होने वाले तमाम अत्याचारों का विरोध करती हैं ठीक उसी तरह अंतर्राष्ट्रीय राजनीति के फलक पर घट रही घटनाओं पर भी उनकी नज़र है. यही कारण है कि उसी तीव्रता व संवेदनशीलता से वह विकसित और धनी देशों द्वारा विकासशील देशों के खिलाफ चलाई जा रहे मुहीम का विरोध भी करती हैं. वास्तव में लेखक वही है जिसकी कलम किसी एक ही विषय तक सीमित न रहकर अपने दायरे का विस्तार करे. नासिरा के यहाँ उस दायरे का विस्तार दिखाई देता है.

‘औरत की दुनिया’ नासिरा के विभिन्न विषयों पर लिखे गए स्तंभों का संकलन है. जैसा कि पुस्तक की भूमिका ‘अपनी बात’ में उन्होंने लिखा है-

“यह सारे स्तम्भ उन समस्याओं पर लिखे गए हैं जो गुबार बनकर मेरे दिल में उठते हैं. जिनके हल ना मिलने पर मैं उन्हें कागज़ पर उतार देती हूँ ताकि वह पीड़ा मेरे दिल व दिमाग से निकलकर पाठकों को सोचने पर मजबूर करे और वह भी इन गुत्थियों को सुलझाने की कोशिश करे क्योंकि एक आवाज जब कई आवाजों के संग उठती है तो वह अवाम की पुकार में बदल जाती है.”2

ध्यान देने वाली बात है कि भूमिका को पढ़ते ही हमें एक लेखक की अनुभूतियों का अहसास होता है, स्थितियों पर उसकी चिंता या उसकी पीड़ा, उसके साथ-साथ हमें भी परेशान करती है. बतौर पाठक हम सचमुच उन समस्याओं को सुलझाने में लेखक के साथ हो लेते हैं. नासिरा के इसी कथन में ‘अवाम’ का ज़िक्र किसी लेखक के लोकतान्त्रिक सोच को बयान करता है. जाहिर है कि उनके लेखन के केंद्र में वही अवाम है जिसके दुःख दर्द को उनकी लेखनी लगातार अभिव्यक्त करती रही है.


‘औरत की दुनिया’ मूलतः पांच खण्डों में विभक्त है. वह हैं- समय सन्दर्भ-पर्यावरण, समय सन्दर्भ–परिवेश, रिलेशनशिप–सम्बन्ध, समाज–जिंदगी, औरतनामा–आईना.



पहले भाग ‘पर्यावरण’ में लेखों की संख्या सर्वाधिक है. इसमें कुल इक्कीस लेख हैं  जो किसी न किसी रूप में पर्यावरण और उसके संरक्षण के मुद्दे से जुड़े हैं. इन छोटे छोटे लेखों में लेखिका की पर्यावरण के प्रति गहरी चिंता की झलक मिलती है. इस खंड के लेख सिर्फ किसी तत्कालीन व प्रासंगिक मुद्दे पर लिखने की खानापूर्ति भर नहीं बल्कि ये गहरी संवेदनशीलता से भरकर लिखे गए लेख हैं. ये लेख पर्यावरण के प्रति लेखिका के जुड़ाव को बेहतर तरीके से रेखांकित करते हैं. इस किताब में चाहे भले ही इस पहले खंड का शीर्षक पर्यावरण हो और भले ही इस खंड के सभी लेख या स्तम्भ उसी विषय पर केन्द्रित हों किन्तु पुस्तक के अन्य खण्डों में भी नासिरा का प्रकृति प्रेम और पर्यावरण के प्रति उनकी स्वाभाविक चिंता दिखाई दे ही जाती है. प्रकृति और पर्यावरण से जुड़े ये लेख हमें देश के अलग अलग क्षेत्रों, जंगलों की यात्रा पर ले जाते हैं. हमारा वास्ता एक बिल्कुल ही अलग और नई दुनिया से पड़ता है और इन्हें पढ़ते हुए यह चिंता भी सताने लगती है कि यदि इसी गति से पेड़ कटते रहे, जंगलों से जानवर लुप्त होते रहे तो क्या स्थिति रह जाएगी पृथ्वी की. बतौर पाठक हम एक अजीब से अपराधबोध से भर उठते हैं, एक बेचैनी सी छा जाती है कि क्यों हम अब तक अपनी पृथ्वी को इस तरह अनदेखा करते रहे.

आज तक प्रकृति के हित में कोई सार्थक योगदान क्यों नहीं दे पाए. आए दिन विश्व के अलग अलग देशों में पर्यावरण की चिंता में जो सम्मलेनों का आयोजन किया जाता रहता है. उन सम्मेलनों के मायने क्या रह जाते हैं जब इस तीव्रता से जंगल गायब हो रहे हैं. क्यों पेड़ों की जगह कंक्रीट के जंगल बसाए जा रहे हैं? इन प्रश्नों को रफा-दफा कर आगे नहीं बढ़ा जा सकता. नासिरा इन प्रश्नों को सजगता से उठाती हैं- “देवदार के वे हसीन उमरदार पेड़ यह अहसास दिलाते हैं कि कल जब यह भी खड़े खड़े धाराशायी हो जाएँगे तो इनकी खाली जगह कौन भरेगा? मॉल की दुकानें, होटल, इमारतें? जिसकी चर्चा करते न स्थानीय लोग थकते हैं ना पर्यटक, मगर कोई नहीं ढूँढता, पेड़ों, झाड़ियों, लतरों से उलझा ऐसा कुञ्ज जहां बैठकर वनस्पति की गंध को सूंघते हुए गर्म चाय का प्याला घूँट घूँट पीया जाए.”3

आज के उपभोक्तावादी दौर में एक ऐसी आंधी चली है कि हम अपने परिवेश, अपने प्रकृति से कटकर एक कृत्रिम दुनिया में उड़ चले हैं. जो दूर से बहुत सुन्दर और आकर्षक है पर वास्तविकता कुछ और ही है. मृगमरीचिका जैसी इस नकली व बनावटी दुनिया के आकर्षण में उलझे हम उसके करीब अवश्य जाते हैं पर हमारे हाथ कुछ भी नही लगता. अंततः हम अपनी जड़ों की तरफ ही वापस आते हैं. प्रकृति के साथ हो रहे अन्याय ने न सिर्फ हमसे हमारे पूर्वज पेड़ों को ही छीना है बल्कि रंग बिरंगे पक्षियों, तितलियों व उनकी चहचहाहट को भी हमसे छीन लिया है. गौरैया तो विलुप्त हो ही रही हैं इसके साथ ही हाथी, जुगनू और तितलियाँ भी गायब होने की कगार पर हैं. जब उनका निवास ही उनसे छीन लिया जाएगा तो वे रहें भी तो कहाँ? वृक्षों, पशुओं, पक्षियों के विलुप्त हो जाने की यह प्रक्रिया कहीं न कहीं हमारी मानवीयता के भी छीजते जाने की प्रक्रिया का आरम्भ है. अपने पर्यावरण, अपनी प्रकृति के ही खिलाफ खड़ा मनुष्य जिस विकास की बात कर रहा है उसका आधार वह स्वयं नष्ट करने पर तुला है. वनों को काटकर मोहल्लो और शहरी कॉलोनियों के हर कोने में बनाए जा रहे पार्क और उनमें लगी कृत्रिम घास और सजावटी पेड़ ना तो हमें बेहतर स्वस्थ्य दे पाएंगे ना ही एक मजबूत सुरक्षा. बल्कि पार्कों के निर्माण की यह प्रक्रिया राजनीतिक दलों का एक अघोषित एजेंडा ही है. जिसे आम आदमी की बुद्धि पकड़ पाने में सक्षम नहीं हो रही. आम व्यक्ति की बुद्धि वहाँ तक पहुँच ही नहीं पा रही कि छायादार वृक्षों को काटकर क्षेत्र विशेष का वोट बटोरने के लिए बनाए जा रहे यह पार्क आने वाली पीढ़ियों को कोई लाभ नहीं देने वाले बल्कि पार्कों के नाम पर कट रहे वृक्ष हमें एक खतरनाक भविष्य की तरफ ले जा रहे हैं. नासिरा लिखती हैं- “जिस मुल्क में आठ माह गरमी पड़ती हो उस मुल्क में ऐसे पार्क नागरिकों को क्या सुख दे पाएंगे.”4

प्रकृति से न जाने कितनी ही भारतीय परम्पराएं जुड़ी हैं. यह यूं ही नहीं है कि यहाँ वृक्षों और नदियों की पूजा की जाती है. दरअसल यह पूजा किसी ख़ास नदी या किसी वृक्ष विशेष की नहीं होती बल्कि यह सम्पूर्ण प्रकृति की पूजा होती है. यह प्रतीक है. इस माध्यम से हम हमें जन्म देने वाली, हमारा भरण पोषण करने वाली प्रकृति के प्रति आभार व्यक्त कर रहे होते हैं. वैशाखी, होली, नौरोज जैसे त्यौहार भी असल में प्रकृति और ऋतुओं के प्रति हमारा स्नेह ही है. लेकिन अब जबकि ना तो परम्पराएं उस रूप में रहीं, ना ही मनुष्य में प्रकृति के प्रति वह आदर ही बचा. ना ही उसने आधुनिकता को सही सन्दर्भों में समझा. आधुनिकता का अर्थ हमने अपनी परम्पराओं से मुंह मोड़ लेने के अर्थ में लिया. लेखिका इस बात को ऐसे समझाती हैं- “आधुनिकता से जीना और सोचना अच्छी और जरूरी बात है मगर अपनी जमीन को भूल जाना ठीक नहीं है. विदेशी चीजों के प्रयोग पर मनाही नहीं होनी चाहिए क्योंकि अनुभव इंसानी जीवन को सदा विकास की तरफ ले जाता है मगर इसकी चाह इतनी न बढ़ जाए कि अपने पेड़, फल और त्यौहार आपको अर्थहीन लगने लगें.”5

आधुनिकता और परंपरा का यह समन्वय ही मनुष्यता को उसके विकास के क्रम में शीर्ष पर ले जाएगा. इतिहास साक्षी है कि अपने अतीत, अपने इतिहास से कटकर हर सभ्यता नष्ट ही हुई है. अपनी परम्पराओं को साथ लेकर ही हम सही मायने में आधुनिक भी हो सकते हैं. वरना मनुष्यता का इकहरा व एकतरफा विकास हमने एक अंधकूप में ले जाकर छोड़ देगा. स्त्रीवाद की एक शाखा है- ‘ईको फेमिनिज्म या नारीवादी पर्यावरणवाद.’ जिसमें स्त्री और प्रकृति या पर्यावरण के संबंधों पर विचार किया गया है. पुरुषों की तुलना में पर्यावरण के साथ स्त्री के सम्बन्ध अधिक आत्मीय होते हैं. औरतें प्रकृति के ज्यादा करीब हैं. “शेरी ओर्तनर ने माना है कि औरत और प्रकृति के संबंधों की जड़ पुनरुत्पादन की जैविक प्रक्रिया में है.”6

नासिरा ने सदैव खुद को साहित्य के किसी भी वाद से दूर रखा. पर्यावरण के प्रति उनकी चिंताओं को हम भले ही किसी वाद के खांचे में न रखें लेकिन प्रकृति के प्रति स्त्री की स्वभाविक चिंता उसके स्त्रीत्व का एक अहम् हिस्सा है. और स्त्री का यह पक्ष किसी वाद का मोहताज नहीं. नासिरा ने लिखा भी है- “औरत कायनात की बेहद खूबसूरत तोहफा है. उसका मिज़ाज प्रकृति की तरह ही है. उसकी ज़िंदगी में भी चार ऋतुएँ आती हैं. बचपन, जवानी, अधेड़पन और बुढ़ापा.”7 कितनी सुन्दर और सटीक तुलना है यह स्त्री और प्रकृति की.

यूं तो पशुओं के पास हम इंसानों के समान ना तो बुद्धि है ना ही ऐसी ज़बान जिससे वे अपनी बात या अपने दुःख दर्द बाँट सकें पर वफ़ादारी में वह इंसानों से बढ़कर हैं. मनुष्य और पशु जब कुछ समय साथ बिता लेते हैं तो उनके बीच का सामंजस्य दो व्यक्तियों के मध्य के संबंधों से भी अधिक प्रगाढ़ हो जाता है. एक समय ऐसा भी आता है जब- “पालतू जानवर की जबान भी समझना आसान हो जाता है तभी उनकी जुदाई सही नहीं जाती क्योंकि खामोश संवाद जो संकेत द्वारा होता है उसके लिए हम ज्यादा उनके करीब अपने को महसूस करते हैं.”8 प्रेमचंद की प्रसिद्ध कहानी ‘दो बैलों की कथा’ के हीरा-मोती और महादेवी के संस्मरणों के कुछ पशु-पक्षियों को इस सन्दर्भ में याद किया जा सकता है. जहां एक समय ऐसा आता है जब मनुष्य और पशु भावनात्मक स्तर पर एकसामान हो जाते हैं. ‘ज़बान और बेज़बान का रिश्ता’ शीर्षक लेख में नासिरा ने रविंद्र कालिया की एक कहानी ‘सुंदरी’ के माध्यम से मनुष्य और पशु के बीच के स्नेहिल संबंधों का विश्लेषण किया है. कहानी में पशु के मनोविज्ञान का भी सुन्दर चित्रण किया गया है. सिर्फ मनुष्य ही नहीं कई बार पशुओं में भी अवसाद की भावना घर कर जाती है. सभ्यता के प्रारंभ से आमतौर पर यह देखा गया है कि पशुओं और मनुष्यों के बीच लाभ का सम्बन्ध रहा है. लेकिन कालिया जी की इस कहानी सुंदरी में जब सुंदरी नामक घोड़ी की एक आँख फूट जाती है और वह गहरे अवसाद में चली जाती है. उसके अवसाद को समाप्त करने के लिए मालिक जहूर मियाँ का बेटा उसे रोज घुमाने ले जाता है, यहाँ तक कि उसे नाच कर भी दिखाता है. वह सुंदरी की जरूरत न रह जाने पर उस घर से बाहर नहीं निकाल देता बल्कि परिवार के किसी सदस्य की तरह ही उसका ख्याल रखता है.

कालिया जी की इस कहानी के जिक्र के पीछे लेखिका का एक ख़ास उद्देश्य है. वह यह कि भावनाएं तो बेज़बान में भी है जरूरत उसे समझने की है. जब तक यह सम्बन्ध लाभ तक सीमित रहेगा, जब तक इन दोनों के मध्य यह भावनात्मक लगाव नहीं पनपेगा मनुष्य अपनी प्रकृति अपने परिवेश से नहीं जुड़ पाएगा. प्रेमचंद, महादेवी या रविन्द्र कालिया की यह कहानी साहित्य का वही पक्ष है जिसपर मनुष्यता गर्व कर सकती है. यह वही साहित्य है जो जीवन को सही दिशा देता है. एक आम व्यक्ति के लिए प्रकृति हमेशा जीवन के दैनंदिन का हिस्सा रही है. वह उसकी मूलभूत जरूरत रही है. जिस देश में वर्गीय असमानता की खाई इतनी गहरी हो वहाँ यह संभव ही नही कि देश के हर नागरिक के पास आरामदेह संसाधन मौजूद हों. यहाँ हर वर्ग इतना सुविधा संपन्न नहीं जिसके पास वातानुकूलित निवास या गाड़ी की सुविधा हो ऐसे में छायादार वृक्ष ही उसका आश्रय बनते हैं. तब भी मनुष्य प्रकृति की जरूरत नहीं समझ पा रहा. 


“जिस देश में चिपको आन्दोलन हो. पेड़ काटना जुर्म बना दिया गया हो. हरियाली लाना और पेड़ रोपने का आह्वान हो. वहाँ पर यह समझ क्यों नहीं पनप पा रही है कि हमारे देश में हर चीज हमको संभाल कर रखनी है.”9

वह जनता जिसे प्रकृति के आसरे की सर्वाधिक जरूरत है प्रकृति के खिलाफ और अप्रत्यक्ष रूप से अपने ही खिलाफ हो रहे अन्याय के विरूद्ध खड़ी क्यों नहीं हो पा रही. सही अर्थों में देश का विकास तभी संभव है जब हम प्रकृति की तरफ वापस लौटें. आज तथाकथित सभ्य समाज की क्रूरता को देखते हुए रूसो के Back To Nature (प्रकृति की तरफ वापसी) का दर्शन सटीक ही लगता है. सतत विकास या Sustainable Development(टिकाऊ या सम्यक विकास) का नारा भी तभी सफल होगा जब हम प्रकृति को उसकी सम्पूर्णता में समझेंगे, अधिक से अधिक उसके करीब रहने का प्रयास करेंगे. प्रकृति की बलिवेदी पर शहरों का निर्माण किसी भी राष्ट्र को सतत विकास के लक्ष्य तक नहीं पहुंचा सकता. प्रकृति से दूर जाना, वृक्षों को भूल जाना अपने अतीत को भूल जाना है. वृक्ष हमारे इतिहास का, मानवता के विकास के साक्षी हैं. नासिरा ने ठीक ही लिखा है-


“पेड़ों की उम्र क्या होती है इसका अंदाजा आसानी से लगाया जा सकता है कि यह इंसान की पांच पुश्तों को आसानी से अपनी छाया में पाल पोस कर बड़ा कर देते हैं. यकीनन यह हमारे पूर्वज हमारे नगड़ दादा के परदादा हुए. अगर यह बोलना जानते तो यह इतिहासकार होते जिनके पास समय का लेखा जोखा होता जो घटनाओं के चश्मदीद गवाह बनकर सत्य के साक्षी के रूप में हमको प्रामाणिक ग्रन्थ देते मगर खामोशी से खड़े यह पेड़ अपने अस्तित्व की लुगदी बना हमको लिखने की प्रेरणा आज भी देते हैं.”10

पीढ़ियों से हमारे दुःख-सुख के गवाह बने यह पेड़ हमारे जीवन का अभिन्न हिस्सा बन जाते हैं. वह- “हमारी ज़िंदगी का ही नहीं हमारी सोच का भी हिस्सा हैं...पेड़ हमारे दिल व दिमाग में अंकित रहते हैं.”11 नासिरा सिर्फ हिन्दुस्तान के लिए या हिन्दुस्तान के पर्यावरण के लिए चिंतित नहीं बल्कि प्रकृति के अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर हो रहे दोहन  के प्रति चिंतित हैं. उनकी लेखनी किसी एक देश की सीमाओं में कैद नहीं बल्कि वह मानवीय हित में सीमाओं के पार भी जाती है. उनकी लेखनी वैश्विक है तभी उन्हें किसी देश-काल, वाद या सीमाओं में नहीं जकड़ा जा सकता. वैश्विक स्तर पर अपने क्षुद्र लाभ के लिए हो रहे युद्ध किस तरह पर्यावरण को क्षति पहुंचा रहे हैं इस पर भी लेखिका की बारीक नजर है. ईरान-इराक युद्ध और भोपाल गैस त्रासदी के पर्यावरण और इंसानियत पर होने वाले दुष्परिणाम हों या मध्यपूर्वी एशियाई देशों में लगातार चलने वाले युद्धों के परिणाम. नासिरा ने विश्व पर्यावरण से लेकर अंतर्राष्ट्रीय राजनीति जैसे विषयों को भी पाठकों तक पहुंचाया है. उन्हें अपने परिवेश के प्रति जागरूक किया है.सतर्क भी किया है- “बम बरसाने और राकेट फेंकने वाले अपनी जमीन को क्या जवाब देंगे जिसनें उन्हें पाल पोस कर बड़ा किया है. अब वह आग की तपिश झेलती है. अपनी उर्वरा से हाथ धो बैठती है. बंजर बन जाती है....”12

इसी तरह सीरिया की स्थिति पर वे लिखती हैं- “यह बढ़ती घृणा और शत्रुता कहाँ जाकर खत्म होगी और कुदरत का यह हुस्न जो पहाड़ों, दर्रों, नदियों, जंगलों और मैदानों के रूप में इस धरती को सजाए है, उसे बमों की बारिश से तबाह करने का गुनाह कब तक होता रहेगा?”13अपना उल्लू सीधा करने के लिए मध्य एशिया के देशों को आपस में लड़ाने, युद्ध कराने वाले अमेरिका की दादागिरी और उसकी साम्राज्यवादी नीतियों की पोल खोलती हैं. अगर युद्ध होते रहे प्रकृति के साथ खिलवाड़ होता रहा तो प्रकृति स्वयं न्याय करेगी- “दूसरों के प्राकृतिक स्त्रोतों के दोहन की यह रणनीति स्वयं मनुष्य के लिए बहुत भारी पड़ेगी. जब वह स्वयं इन स्त्रोतों से लाभ उठाने के लिए जीवित नहीं रहेगा.”14

अंतर्राष्ट्रीय मसलों खासकर मध्यपूर्व एशियाई देशों की दिन-ब-दिन बिगड़ती हालत, चरमराती आर्थिक दशा और अपनी निजी परेशानियों और राजनीति के मध्य फंसी जनता की चिंताजनक स्थिति से नासिरा बेहद दुखी और क्षुब्ध हैं. चूँकि लेखिका ने इन देशों की यात्राएं की हैं. वे इन देशों की वास्तविक परिस्थितियों को करीब से देख-समझ पाई हैं. वहाँ के अवाम की चिंता उन्हें सर्वाधिक है. उस अवाम की जिसकी फ़िक्र ना तो वहाँ के नेताओं को है, ना ही उनकी मीडिया को. जो देश अपनी समृद्ध संस्कृति के लिए जाना जाता था, अपने सौंदर्य के लिए जाना जाता था आज उसकी पहचान ही बदल दी गई है. और इसके पीछे वही विकसित देश हैं जो विश्व बाजार में अपने हथियारों की खपत बढ़ाने के लिए विकासशील या अविकसित देशों के बीच झगड़े करवाते हैं.ऐसे ही एक देश अफगानिस्तान के विषय में उन्होंने लिखा है- “अफगानिस्तान का हुस्न वहाँ के लोग हैं, जिन्होंने बेहतरीन अदब लिखकर इतिहास रचा मगर आज उनकी पहचान केवल आतंक और पोस्त की खेती रह गया है. वह पुरानी मेहमाननवाजी, वह दोस्ताना अंदाज सब कुछ बन्दूक के शोर में डूब चुका है. और वही हाल रसीले फलों का है जिनके बागान जल कर उजड़ चुके हैं.”15

कितना दुखद है किसी देश का यह चित्रण लेकिन यह वही यथार्थ है जो युद्ध के एक घातक परिणाम के रूप में आज पूरे विश्व के सामने है. आम जनता की स्थिति लगभग हर देश में यही है. उसके जीने मरने की परवाह किसे है. राजनेताओं के साथ साथ मीडिया का भी वही हाल है. जिस मीडिया को जनता के दुःख दर्द के साथ खड़ा होना चाहिए था वह मानो युद्ध का महिमामंडन करता दिखाई देता है. यह पत्रकारिता की विश्वसनीयता और उसके पूरे लोकतान्त्रिक अस्तित्व पर प्रश्न चिन्ह है. “अफगानिस्तान के अवाम की परवाह न पत्रकारों ने अपनी खबरों में की और न ही किसी और तरीके से अवाम की परेशानी हम तक पहुंची. जो ख़बरें दी गई वह सिर्फ फ़ौज और तालिबान की दी गईं. इन्ज़ीयोज द्वारा जो खबरें मिलतीं उनको पढ़कर जरूर जनता की बदहाली का पता चलता. मगर इस तरह की खबरों का दायरा हमेशा तंग रहा.”16

हिन्दुस्तानी मीडिया की स्थिति इससे कुछ ज्यादा बेहतर नहीं. यहाँ मीडिया युद्ध के बिना भी आए दिन युद्ध की स्थिति बनाती मिल जाएगी. उसे सिर्फ अपने चैनल के टीआरपी की परवाह है. भारतीय जनता की परेशानियों से उसका कोई लेना देना नहीं. व्यवस्था का हर तबका आम जनता के साथ हो रहे अत्याचार में कहीं न कहीं किसी न किसी रूप में जरूर शामिल है. आम भारतीयों की तरह ही “आम अफगान का चेहरा बरसों से गायब है. उसके सुख दुःख का हम अंदाजा भी नहीं लगा सकते हैं.”17 जबकि कम से कम किसी भी देश की मीडिया का यह दायित्व होना चाहिए कि दुनिया को अफगानी जनता के दुःख दर्द, युद्ध के साए में जीने वाले लोगों की मुसीबतों, उनकी रोजमर्रा की परेशानियों को दुनिया के सामने लाए ताकि ऐसे विनाशकारी युद्धों का विरोध हो सके. पर आज मीडिया जनता के ही खिलाफ खड़ी है. वह झूठी नकारात्मक बातों और अफवाहों से जनता के विचारों की ह्त्या कर अपनी बात जबरदस्ती थोप रही है.

इन समस्याओं से निजात पाने के लिए आम जनता को भी आगे आना होगा. सिर्फ व्यवस्था से उम्मीद लगाकर उनके भरोसे नहीं रहा जा सकता. “हमें खुद जागरूक होना पड़ेगा अपने परिवेश के प्रति, अपने देश के प्रति. हम अगर अपने ऊपर कुछ मामलों में रोक लगाना शुरू कर दें तो बहुत सी परेशानियां बिना किसी शोरशराबे के दम तोड़ देंगी.”18 जनता को भ्रष्ट व्यवस्था के खिलाफ डट कर खड़ा होना होगा. युवा किसी भी राष्ट्र का भविष्य होता है लेकिन आज वही दिग्भ्रमित है. एक सोची समझी साजिश के तहत दुनिया भर में अपना पैर पसारे कुछ अराजक तत्व इन युवाओं का इस्तेमाल अपने फायदे के लिए कर रहे हैं. युवाओं की भीड़ का हिस्सा बना उनसे सभी अमानवीय कृत्य कराए जा रहे हैं. इन स्थितियों से हर पल सावधान रहना होगा. हरिशंकर परसाई ने इसी युवा पीढ़ी के विषय में लिखा है- दिशाहीन, बेकार, हताश, नकारवादी, विध्वंसवादी बेकार युवकों की यह भीड़ खतरनाक होती है. इसका प्रयोग महत्वाकांक्षी खतरनाक विचारधारावाले व्यक्ति और समूह कर सकते हैं. इस भीड़ का उपयोग नेपोलियन, हिटलर और मुसोलिनी ने किया था. यह भीड़ धार्मिक उन्मादियों के पीछे चलने लगती है. यह भीड़ किसी भी ऐसे संगठन के साथ हो सकती है जो उनमें उन्माद और तनाव पैदा कर दे. फिर इस भीड़ से विध्वंसक काम कराए जा सकते हैं.”19

इससे डरावनी बात क्या हो सकती है कि किसी देश का भविष्य ही उसके लिए खतरा बन जाए. “अगर मैं कहूं कि हमारा समय सबसे ज्यादा नयी पीढ़ी के विरुद्ध है तो अतिशयोक्ति नहीं होगी. जन्म से लेकर अट्ठारह वर्ष तक के लड़के-लड़कियों पर जो कहर अलग अलग शक्ल में टूट रहा है उसका जवाबदेह कौन है.”20 अंतर्राष्ट्रीय मुद्दों के बीच औरत की दुनिया में नासिरा शर्मा बीच बीच में राष्ट्रीय समस्याओं अर्थात भारतीय सामाजिक-राजनीतिक व्यवस्था में व्याप्त विसंगतियों पर भी प्रहार करती हैं. वैसे भी तीसरी दुनिया के सभी देशों की कहानी लगभग एक सी ही है. कुछ कम कुछ ज्यादा लेकिन कुल मिलकर ये सभी देश समान रूप से अमेरिका की बाजारवादी नीतियों का शिकार हैं. “हिन्दुस्तान और ईरान में अमेरिका को घुसने का मौक़ा इसलिए नहीं मिल पाता क्योंकि यहाँ आपस में जितनी भी लड़ाई हो लेकिन नेशनल लेवल पर शत्रु के विरोध में सब एक हो जाते हैं. लेकिन अन्य देशों में यह बात नहीं है. इराक और अफगानिस्तान की मिसाल सामने है.”21

सोवियत संघ के विघटन के बाद एकध्रुवीय हो चुकी दुनिया के पास महाशक्ति अमेरिका की शरण में जाने के अतिरिक्त कोई रास्ता भी तो नहीं बचा था. यह और बात है कि उसने अपनी शक्तियों का दुरुपयोग कर एक नए तरह के साम्राज्यवाद का विस्तार ही किया. आज तीसरी दुनिया के देशों की आपसी एकता और सद्भाव ही उन्हें अमेरिका की खतरनाक साम्राज्यवादी नीतियों से बचा सकता है. उसके चंगुल से आज़ाद कर सकता है. यह सभी देश आज अमेरिका का बाजार बन चुके हैं. भारतीय समाज पर बाजार और पश्चिम का कब्ज़ा इस तरह और इस हद तक हो चुका है कि मानवीय सम्बन्ध भी सत्ता और पूंजी की तराजू में तौले जाने लगे हैं. सकारात्मक परम्पराओं से नई पीढ़ी धीरे धीरे बहुत दूर होती जा रही है. यह कड़वा सच है कि “हमारी नजर में इंसानी जज्बात की जगह भौतिक वस्तुओं का सम्मान ज्यादा बढ़ गया है. हम उसके गुलाम होकर रह गए हैं. उनके न रहने पर हम कुंठा के शिकार हो जाते हैं.”22 इसका परिणाम यह होता है कि हम तमाम तरह के मनोविकार व मनोरोगों की चपेट में आ जाते हैं. हमारे भीतर एक अकेलापन, व्यर्थताबोध की भावना भर जाती है जो कई बार आत्महत्या के रूप में सामने आती है. लेकिन इन सारी स्थितियों के बीच अंततः जीत शक्तिशाली की ही होती है. छला जाता है आम आदमी. भारतीय लोकतंत्र में एक आदमी अपने कीमती वोट से जिस राजनेता को विजयी बनाता है वही आगे चलकर उससे मुंह फेर लेता है. और भारतीय जनमानस भी मानो इस राजनीतिक बेरुखी का आदी सा हो गया है तभी वह सब कुछ समझकर भी चुप्पी ओढ़े रहता है.

“हम वोट डालने के अलावा अपने अन्य अधिकारों के प्रति क्यों सोए रहते हैं? अरसे से यह सिलसिला चला आ रहा है कि अत्याचार, भ्रष्टाचार को पनपने में हमारा भी योगदान रहा है. हम अपने नागरिक होने का कर्त्तव्य निभा ही नहीं पाते हैं. या तो रोटी के लिए कमाई करने भागते हैं या फिर अपनी बेबसी पर खुद को कोसते हैं और रोते रोते सो जाते हैं. हमने अपनी इस कठिनाई बाहरी जिन्दगी का अपने को आदी बना लिया है.”23 इसके पीछे एक बड़ा कारण जनता का यथास्थितिवादी होना है. यहाँ इसी सन्दर्भ में हरिशंकर परसाई की एक कहानी याद आती है- ‘दुःख का ताज’.24

यह दो ऐसे दोस्तों की कहानी है जो अपने हालात को बदलने के लिए कोई प्रयास नहीं करते बल्कि हर वक्त अपने अपने दुःख को एक दूसरे से बढ़ा चढ़ा कर बताते रहते हैं. ऐसा लगता है जैसे दुःख ही उनके जीवन की एकमात्र उपलब्धि हो. भारतीय जनता की मानसिकता पर किए गए परसाई के इस व्यंग्य का ही एक और रूप हम मुक्तिबोध की प्रसिद्ध कविता ‘अँधेरे में’ की पंक्तियों में देख सकते हैं-

“दुखों के दागों को तमगे सा पहना
अपने खयालों में दिन रात रहना/”25

वर्षों की गुलामी ने भारतीय जनमानस को अब भी ऐसे जकड़ रखा है कि वह अपनी दयनीय स्थिति से बाहर आने के लिए प्रयास करने से भी हिचकता है. लेकिन उसे अन्याय के खिलाफ बोलना होगा. “उन्हें अपने अधिकारों को लेकर सीधा संवाद करना पड़ेगा वरना वह समय भी दूर नहीं जब भारत की राजधानी में हम (जनता) एक दूसरे को शक भारी नज़रों से देख दिल ही दिल में पूछेंगे- आप अभी तक ज़िंदा हैं?”26 और यह स्थिति बहुत ही खतरनाक होगी.यह चुप्पियों का ही नतीजा है कि व्यवस्था के भीतर की खामियां दिनोंदिन बढ़ी ही हैं. संसाधनों की बेहिसाब कमी के परिणामस्वरूप आज भारत की बड़ी आबादी अपना देश छोड़ पराए देश जाने को मजबूर है. अशिक्षा, बेरोजगारी जैसी समस्याएं अपना इतना विस्तार कर चुकी हैं और धीरे धीरे बढ़ती ही जा रही हैं कि युवा अपने राज्य, अपने देश से पलायन करने पर विवश है. देश का एक बड़ा वर्ग पलायन की पीड़ा झेल रहा है.“देश में फैली बेकारी से न चाहने के बावजूद नई नस्ल विदेश की और देखती है. कुछ गाँव तो ऐसे भी हैं कि जहां बूढ़े, बच्चे और औरतें ही बच गए हैं.”27विडंबना है इस देश की जहां “पीछे पैदा हुआ बच्चा बाप को अजनबी समझता है या मेहमान.”28

यह सवाल पूरे तंत्र पर है कि आखिर क्या कारण है कि देश का बड़ा तबका ऐसा जीवन जी रहा है और जाहिर है कि वह खुश नहीं है.पलायन का एक रूप और है और वह है- ‘ब्रेन ड्रेन’. यह भी सवाल संसाधनों की कमी से ही जुड़ा है. जिससे प्रतिभाएं अपनी प्रतिभा के सही इस्तेमाल के लिए, अपनी योग्यता के सम्मान के लिए अमेरिका या अन्य यूरोपीय देशों की तरफ प्रस्थान कर रही हैं. ‘औरतनामा’ औरत की दुनिया का एक और जरूरी खंड है. जिसमें नासिरा शर्मा ने स्त्री व्यक्तित्व के लगभग हर पहलू को बड़ी सहजता से उकेरा है. यहाँ न कोई पक्षपात है न ही कोई पूर्वाग्रह बल्कि एक ऐसा नजरिया है जो स्त्री को उसके विकास के लिए तत्पर करता है. सही अर्थों में विकास के लिए. उसे सही गलत के चुनाव का बोध कराता है. उसे अपनी गलतियों के प्रति आगाह करता है. ताकि तरक्की की इस दौड़ में वह किन्ही साजिशों का शिकार ना हो जाए. स्त्री के भीतर के मनोविकारों की मुक्ति का रास्ता दिखाती हैं नासिरा. सचेत करती हैं अपने आसपास के प्रति. कहती हैं- “हम औरतों ने असुरक्षा की भावना के चलते साहित्य, कला, दफ्तर और लगभग हर कार्यक्षेत्रों में घरेलू पॉलिटिक्स को लाकर सिर्फ अपनी कब्र नहीं खोदी है बल्कि पूरी महिला इमेज को भारी क्षति पहुंचाई है.”29

स्त्री को नकारात्मक प्रतिस्पर्धा से दूर हटना होगा. ईर्ष्या के दुष्परिणाम वरना इस पूरे वर्ग को भुगतने होंगे. और स्त्री को यह समझना होगा की ईर्ष्या आदि उसके स्वाभाविक स्त्री गुण नहीं बल्कि यह सोशल कंस्ट्रक्ट   हैं. जैसा कि सिमोन द बोउआर ने लिखा है कि “स्त्री पैदा नहीं होती बनाई जाती है.”30 इस रहस्य को समझना होगा. उसे स्त्री जाति के लिए किए गए दुष्प्रचार से परे हटना होगा. उसे ‘औरत, औरत की सबसे बड़ी दुश्मन’ के मुहावरे को गलत सिद्ध करना होगा. यह सच है- “औरत ने अपने संघर्ष की लम्बी यात्रा तय की है और अपनी उपलब्धियों के चलते उसने मर्दों की दुनिया में अपना स्थान भी बनाया है. लेकिन जो आदर दिलों में होना चाहिए वह अभी उसे हासिल नहीं हो पाया जिसका उसे गहरा रंज है और यह रंज तभी दूर होगा जब औरत दूसरी औरत की इज्जत करना सीख लेगी.”31

जब तक वह एक दूसरे का सम्मान करना नहीं सीखेगी, आपसी असुरक्षा की भावना से बाहर नहीं निकलेगी वह दूसरे वर्ग का सम्मान हासिल करने में भी सक्षम नहीं होगी.सुधा सिंह ने ‘ज्ञान का स्त्रीवादी पाठ’ में लिखा है- “स्त्री दूसरी स्त्री को गंभीरता से नहीं सुनती. यह धारणा काम करती है कि स्त्री अच्छी वक्ता नहीं होती. उन्हें आधिकारिक भी नहीं माना जाता. लेकिन यह स्थिति स्त्री चेतना के साथ साथ थोड़ी बदली है. स्त्रियों ने स्त्री को अच्छी वक्ता-श्रोता मानना शुरू कर दिया है...स्त्री के बोलने से, आपस में अनुभव बांटने से यह मिथ टूटता है कि पुरुष श्रेष्ठता दैविक होती है.”32

आज सबसे जरूरी किसी भी तरह की श्रेष्ठता का टूटना है. खासकर स्त्रियों के मन के भीतर सदियों से निर्मित दैवीय पुरुष का छवि का खंडित होना सबसे जरूरी तभी वह अपनी परतंत्र छवि से भी मुक्त हो सकेगी. आज के अत्याधुनिक दौर में स्त्री के समक्ष यह चुनौती और बड़ी है. बाजार ने उसकी जो एक नई और अलग छवि बना कर पेश की है वह सबसे डरावनी है. और इस बात को आधुनिक स्त्री स्वयं नहीं समझ पा रही. एक तरफ बाजार और तकनीक उसके व्यक्तित्व के निर्माण में सहायक भी सिद्ध हुए हैं तो दूसरी तरफ उसकी स्वाभाविकता, उसके स्त्रीत्व का दमन भी किया है. आज औरत को यह समझना होगा की उसकी जरूरतें क्या हैं और बाजार से बस जरूरत भर ही मदद लेनी होगी.स्त्री को नए ज़माने की नब्ज पकड़नी होगी लेकिन उन्हें अपने स्त्रीत्व को ही अपनी ताकत बनानी होगी क्योंकि यही उसकी पहचान है, यही उसका अस्तित्व भी है. स्त्री को यह समझना होगा की उसकी लड़ाई सिर्फ पुरुष से नहीं बल्कि पूरी पितृसत्ता और इस तंत्र से है. और बाजार भी इसी तंत्र का एक हिस्सा है.

वरिष्ठ लेखिका सुधा अरोड़ा ने लिखा है- “स्त्रियाँ अपनी देह पर सिर्फ पोशाक ही नहीं, अपने स्त्रियोचित गुण त्याग कर मरदाना अंदाज में बेख़ौफ़ गाली गलौज की भाषा इस्तेमाल कर, सिगरेट के छल्ले उड़ाते हुए अपने को पुरुष के पेडस्टल पर खड़ा करने में अपने जीवन की सार्थकता समझ रही हैं. और उन्हें लगता है कि वे इसी तरह इस सामंती वर्ग को सबक सिखा सकती हैं...स्त्री प्रेम और संवेदना को दरकिनार कर अगर पुरुष जैसी बर्बर और नृशंस बनती है तो उसकी आजादी या बहादुरी पर फख्र करने का कोई कारण नहीं है.”33

उसे यह समझना होगा की इस तरह वह पितृसत्ता की जड़ों को ही मजबूत कर रही होती है. यह ठीक है कि स्त्री के सामने अब भी बहुत चुनौतियां हैं पर अब उसकी स्थिति में कुछ बदलाव भी आए हैं. अब मर्दों को भी इस बदलाव के साथ कदम से कदम मिलाकर चलना होगा वरना स्त्री के अस्तित्व के बगैर वह बिल्कुल अकेला पड़ जाएगा. “औरतों ने पिछले पचास वर्षों में खुद को बदला है. मर्दों को भी अपने को बदलना पड़ेगा.”34 और स्त्रियों को भी अपनी स्वतंत्रता के सही मायने ढूँढने होंगे. तमाम छलावों से बचते हुए अपने व्यक्तित्व के सम्पूर्ण विकास के लिए और खुद को खोए बिना स्वतंत्रता का सकारात्मक इस्तेमाल करना होगा. उत्तर आधुनिकता ने यदि औरत को उड़ान भरने के पंख दिए हैं तो साथ ही उसके सामने गंभीर चुनौतियां भी रखी है. अब उसे और मजबूत बनना होगा.क्योंकि यह वही औरत है जिसके बारे में कैफ़ी आज़मी ने कहा है-

क़द्र अब तक तेरी तारीख़ ने जानी ही नहीं
तुझ में शोले भी हैं बस अश्क-फ़िशानी ही नहीं
तू हक़ीक़त भी है दिलचस्प कहानी ही नहीं
तेरी हस्ती भी है इक चीज जवानी ही नहीं
अपनी तक़दीर का उनवान बदलना है तुझे...


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सन्दर्भ सूची
1सुधा सिंह(2008),ज्ञान का स्त्रीवादी पाठ,ग्रन्थ शिल्पी प्राइवेट लिमिटेड, दिल्ली:243
2.नासिरा शर्मा(2015), औरत की दुनिया, साहित्य भण्डार, इलाहाबाद,‘अपनी बात’ से
3.औरत की दुनिया- नासिरा शर्मा, साहित्य भण्डार, इलाहाबाद, प्रथम संस्करण 2015, पृष्ठ सं. 17
4. औरत की दुनिया- नासिरा शर्मा, साहित्य भण्डार, इलाहाबाद, प्रथम संस्करण 2015, पृष्ठ सं. 18
5. औरत की दुनिया- नासिरा शर्मा, साहित्य भण्डार, इलाहाबाद, प्रथम संस्करण 2015, पृष्ठ सं. 22
6. कस्बा- रवीश कुमार (‘एनवायर्नमेंटल इश्यू इन इण्डिया : ए रीडर’ में प्रकाशित प्रो. बीना अग्रवाल के लेख का अनुवाद)
7. औरत की दुनिया- नासिरा शर्मा, साहित्य भण्डार, इलाहाबाद, प्रथम संस्करण 2015, पृष्ठ सं. 143
8. औरत की दुनिया- नासिरा शर्मा, साहित्य भण्डार, इलाहाबाद, प्रथम संस्करण 2015, पृष्ठ सं. 26
9. औरत की दुनिया- नासिरा शर्मा, साहित्य भण्डार, इलाहाबाद, प्रथम संस्करण 2015, पृष्ठ सं. 35
10. औरत की दुनिया- नासिरा शर्मा, साहित्य भण्डार, इलाहाबाद, प्रथम संस्करण 2015, पृष्ठ सं. 54
11. औरत की दुनिया- नासिरा शर्मा, साहित्य भण्डार, इलाहाबाद, प्रथम संस्करण 2015, पृष्ठ सं. 55
12. औरत की दुनिया- नासिरा शर्मा, साहित्य भण्डार, इलाहाबाद, प्रथम संस्करण 2015, पृष्ठ सं. 62
13. औरत की दुनिया- नासिरा शर्मा, साहित्य भण्डार, इलाहाबाद, प्रथम संस्करण 2015, पृष्ठ सं. 77
14. औरत की दुनिया- नासिरा शर्मा, साहित्य भण्डार, इलाहाबाद, प्रथम संस्करण 2015, पृष्ठ सं. 62
15. औरत की दुनिया- नासिरा शर्मा, साहित्य भण्डार, इलाहाबाद, प्रथम संस्करण 2015, पृष्ठ सं. 70
16. औरत की दुनिया- नासिरा शर्मा, साहित्य भण्डार, इलाहाबाद, प्रथम संस्करण 2015, पृष्ठ सं. 71
17. औरत की दुनिया- नासिरा शर्मा, साहित्य भण्डार, इलाहाबाद, प्रथम संस्करण 2015, पृष्ठ सं. 71
18. औरत की दुनिया- नासिरा शर्मा, साहित्य भण्डार, इलाहाबाद, प्रथम संस्करण 2015, पृष्ठ सं. 80
19. आवारा भीड़ के खतरे- हरिशंकर परसाई
20. औरत की दुनिया- नासिरा शर्मा, साहित्य भण्डार, इलाहाबाद, प्रथम संस्करण 2015, पृष्ठ सं. 74
21. औरत की दुनिया- नासिरा शर्मा, साहित्य भण्डार, इलाहाबाद, प्रथम संस्करण 2015, पृष्ठ सं. 91-92
22. औरत की दुनिया- नासिरा शर्मा, साहित्य भण्डार, इलाहाबाद, प्रथम संस्करण 2015, पृष्ठ सं. 64
23. औरत की दुनिया- नासिरा शर्मा, साहित्य भण्डार, इलाहाबाद, प्रथम संस्करण 2015, पृष्ठ सं. 79
24. दुःख का ताज- हरिशंकर परसाई, (‘प्रेमचंद के फटे जूते’ में संकलित) भारतीय ज्ञानपीठ, दिल्ली, चौथा संस्करण 2009,  पृष्ठ सं. 243
25. अँधेरे में- मुक्तिबोध
26. औरत की दुनिया- नासिरा शर्मा, साहित्य भण्डार, इलाहाबाद, प्रथम संस्करण 2015, पृष्ठ सं. 79
27. औरत की दुनिया- नासिरा शर्मा, साहित्य भण्डार, इलाहाबाद, प्रथम संस्करण 2015, पृष्ठ सं. 20
28. औरत की दुनिया- नासिरा शर्मा, साहित्य भण्डार, इलाहाबाद, प्रथम संस्करण 2015, पृष्ठ सं. 20
29. औरत की दुनिया- नासिरा शर्मा, साहित्य भण्डार, इलाहाबाद, प्रथम संस्करण 2015, पृष्ठ सं. 138
30. द सेकेण्ड सेक्स : सिमोन द बोउआर (अनुवाद: स्त्री उपेक्षिता, प्रभा खेतान) हिन्द पॉकेट बुक्स, नई दिल्ली, नवीन संस्करण 2002, पहला रिप्रिंट मार्च 2004, पृष्ठ सं. फ्लैप
31. औरत की दुनिया- नासिरा शर्मा, साहित्य भण्डार, इलाहाबाद, प्रथम संस्करण 2015, पृष्ठ सं. 139
32. ज्ञान का स्त्री वादी पाठ- सुधा सिंह, ग्रन्थ शिल्पी प्राइवेट लिमिटेड, दिल्ली, प्रथम संस्करण 2008, पृष्ठ सं. 111
33. चौखट पर स्त्री- सुधा अरोड़ा का आलेख, ‘विमर्श से परे : स्त्री और पुरुष’ (सम्पादक- संजीव चन्दन) अनन्य प्रकाशन, दिल्ली, प्रथम संस्करण 2015, पृष्ठ सं. 22
34. औरत की दुनिया- नासिरा शर्मा, साहित्य भण्डार, इलाहाबाद, प्रथम संस्करण 2015, पृष्ठ सं. 146
 
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शिप्रा किरण
युवा लेखिका और अनुवादक
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मो. 8130963690