परख : स्त्री शतक (पवन करण: साधना अग्रवाल

स्त्री शतक
पवन करण
भारतीय ज्ञानपीठ
18, इन्स्टीट्यूशनल एरिया, लोदी रोड
नयी दिल्ली—110003
मूल्य—370
संस्करण— 2018











स्त्रियों की महागाथा                     
साधना अग्रवाल








नारी पर अधिकार स्थापित करना ही पुरुष के पौरुष की कसौटी रहा  है. वह उसके रूपसौंदर्य की प्रशंसा ही नहीं करता बल्कि उसे पाने के लिए किसी भी हद तक जाने की कोशिश करता है. दरअसल स्त्री उसके लिए सिर्फ भोग्या है. वह उसके एक-एक अंग को भोगना चाहता है. मर्यादा और नैतिकता की तमाम सीमाओं को लांघते अपनी मर्दानगी को दिखाने की जिद में वह स्त्री को केवल अपनी सम्पत्ति समझता है. स्त्री उसके लिए बस एक साधन है और कुछ नहीं. सैद्धान्तिक रूप से उसे देवी का दर्जा जरुर दिया गया है लेकिन व्यवहार में ऐसा है नहीं. जबकि स्त्री खुद को केवल मनुष्य समझने के लिए एक लंबी लड़ाई लड़ती रही है. स्त्री का शोषण आज से नहीं अपितु सृष्टि के आरंभ से होता रहा है, युग कोई भी रहा हो. युगों के हिसाब से केवल स्त्री पात्र बदल गए लेकिन उनकी नियति नहीं. उस पर तो धर्म, संस्कृति, संस्कार, नैतिकता के नाम पर अनेक नियम और बंधन लाद दिये गए हैं. पुरुष सत्ता की थोथी मर्यादा के बीच स्त्री असंख्य अदृश्य बेड़ियों और जंजीरों में जकड़ी हुई है. स्त्री का जीवन हमेशा से ही संघर्षों की गाथा रहा है. उसका न तो अपनी देह पर कोई अधिकार है और न मन पर. इसीलिए तो आज की स्त्री अपनी अस्मिता की पहचान के लिए पितृसत्ता के विरोध उठ खड़ी हुई है.
  
(पवन करण)
               
हिंदी के प्रतिष्ठित कवि पवन करण का नया काव्य संग्रह 'स्त्रीशतक' अभी आया है जिसमें उन्होंने बहुत मेहनत और शोध करके हमारे धर्मग्रंथों, पुराणों और इतिहास से शोषित, पीड़ित, दुखी, अपमानित 100 विभिन्न स्त्री पात्रों के जरिए उनकी दारुण कथा को कविता के माध्यम से प्रस्तुत किया है. जिसे सुनकर आप न केवल शर्मसार होते हैं बल्कि ग्लानि भी अनुभव करने लगते हैं. पवन करण पुरुषों के झूठे अहम् और दंभ को चकनाचूर कर उनकी असलियत को भी सामने रखते हैं. इसकी एक बड़ी विशेषता यह है कि वह ऐसे अनचीन्हें स्त्री पात्रों से हमारा परिचय कराते हैं जिनसे हम अनभिज्ञ हैं.
                     
यद्यपि भारतीय संस्कृति, पुराणों और मिथकों को आधार बनाकर संस्कृत साहित्य में विशाल मात्रा में साहित्य रचा गया है लेकिन वह एकांगी इस अर्थ में दिखाई देता है क्योंकि वह पुरुष समाज के वर्चस्व और उसकी ताकत का परिचय ही देता है. यद्यपि आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी ने कवियों की उर्मिला विषयक उदासीनता लेख लिखकर इस ओर कवियों का ध्यान आकृष्ट किया था जिसका परिणाम था मैथिलीशरण गुप्त का साकेत. उसके बाद रामधारी सिंह दिनकर ने भी इस ओर कदम बढ़ाया था. लेकिन इस संग्रह में हमारी पूर्वज स्त्रियों की व्यथा-कथा ही नहीं है बल्कि मुक्ति की आकांक्षा भी है. उनके प्रश्न हमें विचलित ही नहीं करते बल्कि बेचैन भी करते हैं. लगता है पवन करण ने सैंकड़ों पन्ने पलटकर इतिहास की भीतरी तह तक जाकर एक से बढ़कर एक स्त्री पात्रों की वेदना को स्वर दिया है. हो सकता है भविष्य में जिसकी भरपाई कवि को करनी पड़े, जिसके लिए उसको अपनी कमर कसनी होगी लेकिन इतना तो मानना पड़ेगा कि जो सवाल उनके भीतर नासूर की तरह दुख रहे थे मानो उस पर संवेदना का मरहम लगा दिया हो.
            
पवन करण ने तमाम देवताओं, ऋषियों, मुनियों, राजाओं, साधु-संतों, को अपराधी बनाकर जनता के समक्ष खड़ा कर दिया है. इसका एक धवल पक्ष यह भी है कि इसमें साधारण से साधारण स्त्री भी अपनी बात कहने में कोई संकोच करती नहीं दिखती और देवताओं तक को कठघरे में खड़ा करने से नहीं घबराती. ये कविताएं हमें निरुत्तर कर देती हैं. हमारे सामने सती, सावित्री, सीता आदि के उदाहरण तो दिए जाते हैं लेकिन उनकी वेदनाओं को कभी सामने नहीं लाया जाता. 
          
पवन करण ने इस संग्रह की प्रत्येक कविता के फुटनोट में संबंधित स्त्री पात्र का संक्षिप्त परिचय भी दिया है जिससे उसे जानने-समझने में पाठक को आसानी होती है. इस संग्रह की पहली ही कविता है 'तारा'. तारा यूं तो बृहस्पति की पत्नी थी लेकिन चंद्र उसे अपने साथ भगा ले गया था जिसके परिणामस्वरूप बुध का जन्म हुआ. इस कविता में कवि ने तारा की व्यथा को आज के पुरुष की ग्लानि से जोड़कर प्रस्तुत किया है. दूसरी कविता है—'सवर्णा' जो सूर्य विवस्वान की पत्नी रेणु की दासी थी. सवर्णा रेणु के रुठ कर चले जाने पर वह विवस्वान के साथ पत्नी की तरह रहने लगी थी. लेकिन रेणु उसे उलाहना देती हुई कहती है-
तुम्हें क्या लगता था सवर्णा
कि तुम सूरज का मुंह मोड़ दोगी
रानी और दासी के बीच का अंतर भेद दोगी ?
     
जयन्ति कविता में कवि देवताओं की असलियत बताने में कोताही नहीं बरतता और कहता है-देवताओं को स्त्रियां तब तक ही प्रिय हैं
जब तक वे उनकी अनुगता हैं, कामिनी हैं
पैर दबातीं लक्ष्मी सी आज्ञाकारिणी
और ऋषितपस्या भंग करती मेनकाएं हैं.

दरअसल जयन्ति इन्द्र की पुत्री थी जिसे उसने बलि से धरती हथियाने के लिए शुक्र को सौंप दिया था.
           
कीर्तिमालिनी कविता में व्याकुल करने वाला प्रश्न है जिसका जबाव शायद ही किसी के पास हो
माया रचता कोई देव ही क्यों न हो
कामभोग के लिए किसी की
भार्या मांगने का
अधिकार नहीं किसी को.

इसी कविता में कीर्तिमालिनी देवी उमा से सवाल करती हैं कि
उमा अब आप ही मुझे बतायें
परीक्षा लेने के लिये देव
स्त्रीदेह ही क्यों चुनते हैं
यह तो सरासर देहलोलुपता है
जिसमें उनका साथ देने
आप भी चली आती हैं

कवि उमा पर दोषारोपण करता यही नहीं रुकता बल्कि एक औरत होने के नाते उन पर गंभीर आरोप भी लगाता है

ये आपने क्या किया गौरी
आपने तो करोड़ों स्त्रियों के मन में
कुंठा घोलकर रख दी
आश्चर्य कि शंभु के सामने शक्तिहीना होकर रह गई शक्ति
गौरवर्ण प्राप्त करने को उद्यत
आपने एक बार भी
उन स्त्रियों के बारे में नहीं सोचा
जिनकी त्वचा का रंग
काले सर्प सा डसता रहा है उन्हें.

इस कविता में स्त्री की वेदना, दुख, पीड़ा, संत्रास,अपमान,उपेक्षा,ग्लानि, हताशा ही सामने नहीं आती बल्कि उसका मन चीत्कार कर उठता है जब उसे अहसास होता है कि इसके लिए पुरुष ही नहीं स्त्री भी किसी हद तक उतनी ही दोषी है.
            
वैसे तो संदेह या शक करना किसी के लिए भी सही नहीं है क्योंकि यह माना जाता है कि शक का कोई इलाज नहीं लेकिन एक स्त्री के लिए शक करना वर्जित है

स्त्री के लिए संदेह वर्जित है
फिर चाहे वह जगदंबा ही क्यों न हो
मन ही मन विजया बुदबुदाती
पुरुष चाहे देव हो या गण  
स्त्री को अपना सिर झुकाकर
मान लेना चाहिए उसका कहा.
         
साधारण पाठक कृष्ण की एक पत्नी रुकमणि के बारे में जानता है और राधा को उनकी प्रेमिका के रूप में लेकिन पवन करण ने कृष्ण की आठ पत्नियों से हमारा परिचय कराया है- जाम्बवती,सत्यभामा, मित्रवृंदा, सत्या,लक्ष्मणा, भद्रा और कालिंदी.
          
इस संग्रह में अर्जुन की बालविधवा पत्नी उलूपी का दुख-दर्द है तो सवाल करती घटोत्कच की पत्नी मोर्वी है. विदुर की मां इन्दु की पीड़ा है, पृथ्वी का दोहन करने वाले राजा पृथु की पत्नी अर्ची है जो दबे स्वर से सती होने से मना करना चाहती है लेकिन साहस नहीं जुटा पाती. पिप्पलादी की मां तथा दधीचि की पत्नी सुवर्चा को दिक्कत इस बात से है कि उसके पति ने बिना उससे पूछे अपनी हड्डियां दान में क्यों दी ? क्या केवल पति का ही अपनी पत्नी पर अधिकार होता है पत्नी का पति पर कोई अधिकार नहीं. वह कहती है-

फिर तुमने मेरी सहमति लिए बिना
अपना देह-आधार
कैसे दे दिया किसी को
तुम्हारी आज्ञा के बिना क्या मैं
कभी किसी को स्वयं का
कुछ सौंप सकती थी.

पुरुरवा की प्रेमिका उर्वशी है जो पुरुष मानसिकता को सामने रखती है

ज्ञानी और गुणीजन हमसे
प्रेम नहीं हमारा भोग करते हैं
वे हमारी सहवास क्रियता को
नहीं समझते आपकी तरह प्रेम.

हिरण्यकश्यप की पत्नी क्याधू एक स्त्री की नियति को उजागर करती कहती है-

एक स्त्री के लिए स्त्री होना
हर काल में होता है कठिन
उसके लेखे में तो हमेशा कुर्री पक्षी की भांति
रुदन करना ही होता है बदा.
                           
कल्पाषपाद की भार्या मदयन्ती ऋषि-मुनियों से सवाल करती है कि क्या वे स्त्रियों को भोगने के लिए ही तो राजाओं को शाप नहीं दिया करते थे या फिर पुत्र की चाहत में राजा अपनी पत्नी को गर्भवती होने के लिए ऋषियों के पास भेजा करते थे. मदयन्ती पूछती है-

मुझे छूने से पहले मेरी बात का
जवाब दो मुनि प्रवर
क्या आप हमारे पतियों को
उनके और उनके राज्य पर
अपना ज्ञान और श्रेष्ठता
कायम करने के लिए शाप देते हो
राजपाट के साथसाथ
भोगने के लिए हमें भी
अपने कमंडल में भरे घूमते हो
तरहतरह के शाप
वन में मेरे पति को रतिदोष का
शाप देने को तत्पर
कामक्रीड़ारत मुनि ही था एक
ये कैसी साधना है तुम्हारी
इन्द्रियां ही नहीं सधती.  
                           
शर्याति की पुत्री सुकन्या भी ऋषि-मुनियों के शाप देने पर ही सवाल खड़ा नही करती बल्कि उनकी काम-लोलुपता पर उंगलि उठाती है. वह एक पिता की बेबसी का वर्णन करती कहती है-

पिता को जो सूझा वो किया उन्होंने
मगर मुझे पाकर च्यवन ने
छोड़कर अपनी तपस्या
मेरे लिए खुद को किया युवा.

वहीं पवन करण राजा दशरथ की आंख में उंगुलि डालकर दिखाना चाहते हैं कि उन्होंने बेटे और बेटी में भेदभाव ही नहीं किया बल्कि अपनी बेटी को एक ऋषि को सौंप दिया बिना उसकी इच्छा जाने कि वह क्या चाहती है-

जब दशरथ उसे ऋष्यश्रृंग को
सौंप रहे थे तब क्या उसने
तुमसे कहा कि मैं किसी ऋषि से नहीं राम भैया जैसे किसी
राजकुमार से ब्याह करना चाहती हूं.  
                 
पवन करण की ये कविताएं निश्चित ही आधुनिक हिंदी कविता के इतिहास में एक मील का पत्थर साबित होंगी क्योंकि इसका फलक इतना व्यापक है कि हम सोच भी नहीं पाते, याद करने की कोशिश भी करते हैं तो बामुश्किल हमें 10-12 चरित्र ही याद आते हैं. यही कारण है कि ये कविताएं कोई मामूली कविताएं न होकर स्त्रियों की महागाथा के रूप में हमारे सामने आती हैं. हालांकि भारतीय समाज जैसा आज है, वैसा सदियों से रहा था, यह कहने में अब कोई संकोच नहीं. मेरा मानना है कि ये कविताएं पढ़कर हम अपने भीतर उस विद्रोह की आंच को महसूस कर सकते हैं, यही इसकी ताकत है और सफलता भी.
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संपर्क
साधना अग्रवाल
B- 2 / T
दिल्ली पुलिस अपार्टमेंट्स
मयूर विहार फेज—1
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मो0 9891349058
Email- agrawalsadhna2000@gmail.com  

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आप अपनी प्रतिक्रिया devarun72@gmail.com पर सीधे भी भेज सकते हैं.

  1. आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल सोमवार (11-03-2019) को "लोकसभा के चुनाव घोषि‍त हो गए " (चर्चा अंक-3270) (चर्चा अंक-3264) पर भी होगी।
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    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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