रंग-राग : नवें जागरण फिल्मोत्सव से एक दर्शक : सत्यदेव त्रिपाठी

Posted by arun dev on अक्तूबर 12, 2018










जागरण फिल्मोत्सव-2018 (मुम्बई) में सत्यदेव त्रिपाठी ने तीन दिनों में अठारह फिल्में देख डालीं. जिनमें से डेविल’, साधो’, ‘करीम मोहम्मद’,‘अश्वथामा’, ‘तर्पण, ‘पंचलाइट, माई डीयर वाइफ कुछ देर और’ ‘नाच भिखारी नाच’ और  ‘आमो आखा एक से’  (अंतिम दोनों वृत्त चित्र) पर उन्होंने विस्तार से लिखा है.
इनमें से तर्पण शिवमूर्ति की कहानी, पंचलाइट रेणु की कहानी तथा ‘नाच भिखारी नाच’ भिखारी ठाकुर के जीवन पर आधारित हैं.  
सत्यदेव त्रिपाठी रंगमंच और फिल्मों के गहरे जानकार और अनुभवी लेखक हैं. पढ़ते हुए उनकी पकड़ का अंदाज़ा होता है. साहित्यिक कृतियों पर बनी फिल्में अक्सर उम्मीद से कम साबित होती हैं. सत्यदेव त्रिपाठी का यह विश्लेषण सहेजने योग्य है, यह इनमें से कुछ फिल्मों को तलाश कर देखने की तलब पैदा करता है.





नवें जागरण फिल्मोत्सव से एक दर्शक                        
सत्यदेव त्रिपाठी



तने दिनों से भिन्न-भिन्न शहरों में भ्रमण कर रहे जागरण फिल्मोत्सव-2018’ से मेरी आँखमिचौली चल रही थी. जब मेरे गृहनगर बनारस में हो रहा था, तो मैं मुम्बई वाले घर था. इलाहाबाद भी जा सकता था, पर तब मैं भोपाल था. और जब जागरण उत्सव भोपाल गया, तो मैं बनारस था..... लेकिन आख़िर समापन के वक़्त मुम्बई में आँख मिल ही गयी...और अपनी सेवामुक्ति का फायदा और घर से नज़दीक ही फन रिपब्लिककी सुविधा के चलते 27 से 30 सितम्बर के चारो दिनों का मन बनाया....

सुबह 10 से रात के 11 बजे के दौरान चारो पर्दों पर दिखायी जा रही कुल सौ फिल्मे देखकर मन गदगदामान हो गया...लेकिन रोज़ के 12 घण्टे में हर दिन की 3 से 4 फिल्म ही देखी जा सकती थी याने छोटी-बडी मिलाके अधिकतम 16-18 फिल्में...पर अपनी आँखों की औक़ात व हिदायत के चलते हर दिन तीन के हिसाब से अपनी पसन्द की 12 फिल्में देखने का हौसला बाँधा....

कुछ चयनित फिल्मों में गुजराती-मराठी-ब्रज-भोजपुरी की एक-एक फिल्म थी, पर पहले दिन ही उत्सव की (शायद) एकमात्र गुजराती फिल्म रतनबाग़ निरस्त (कैंसिल) हो गयी. फिर सबसे अधिक निशाने पर रही वोदका डायरीज़ (कुशल श्रीवास्तव), जो तकनीकी खराबी की बलि चढ गयी.... लेकिन दस-दस-बीस-बीस मिनट के अश्वासन पर दो घण्टे के इंतज़ार ने ऐसी ऊब पैदा की कि अगली फिल्म में बैठने की ताव न रही.... इन अनुभवों के चलते आदित्य की फिल्म मास्साहब के एक घण्टे देरी से शुरू होने की सूचना मिली, तो कहीं ऐसा न हो, यां भी वही क़ाफिर सनम निकले के डर से तुरत भाग खडे हुए. कभी लाइन में पीछे होने के चलते हाउस फुल हो गयी दिनेश यादव की फिल्म टर्टिल में प्रवेश ही नहीं पा सके. इसी तरह अधिकांश फिल्में लेट-लतीफ ही होती रहीं....



संक्षेप में व्यवस्था के इन हालात के ऊपर महाबप्पा यह भी कि क्षितिज शर्मा की डेविलमें राक्षसत्त्व का रूप देखने की आस लिये बैठे, तो बिस्तर पर मरणासन्न पडी अपनी विधवा माँ का इलाज़ नहीं करा पा रहा ऐसा बेरोज़गार बेटा मिला कि घर में खाने का ठिकाना तक नहीं. लेकिन इस बातन कही को बंगला व लॉन के रूप में उसकी करोडों की सम्पत्ति की आँखन देखी के पाखण्ड के बाद आगे क्या देखते...!!

एनएसडी मास्टर क्लास का ऐक्टिंग मास्टर जब 15 मिनट तक सब कुछ बोलता रहा, सिर्फ ऐक्टिंग को छोडकर, तो ज्यादा स्वास्थ्यकर जान पडी कैफ़े की चाय.... एनएसडी मास्टर ने दो-चार वाक्य अंग्रेजी में शुरू किये, फिर हिन्दी पर आ गया. और यही हाल अपनी फिल्म को प्रस्तुत करते हुए एवं बाद में उस पर चर्चा शुरू करते हुए सभी हिन्दी वालों का रहा. अपने पानी पर तो अंग्रेजी वाले ही रहते हैं. उन्हें हिन्दी का कोई लालच नहीं. किंतु हिन्दी में पूरी फिल्म बनाने वाले किसी निर्देशक का अंग्रेजी-मोह वस्तुत: उसके दिमाँगी दिवालियेपन का प्रमाण है. क्योंकि ख़ुद भी अंग्रेजी में पूरा न बोल सकने का पता होने और सामने बैठे हिन्दी दर्शकों के बावजूद इतना भी होश नहीं रह जाता कि फिर क्यों व किसके लिए अधकचरी अंग्रेजी बूकने से शुरुआत करते हैं...!!

इतने-इतने चक्रव्यूहों के बीच जो कुछ फिल्में देख सका, उनका सबसे बडा हासिल यह कि ख़ास अंचलों की समस्याओं पर बनने वाली समानांतर फिल्मों की शुरुआती प्रकृति आज खूब फूली-फली है- और-और गहन व गहरी होती जा रही है. पहले तो गुजरात के परिवेश, वहाँ की भाषा व समस्या से अनजान कोई बेनेगल भी फिल्म (मंथन) बना देता था, लेकिन अब समय व कला-विस्तार के साथ हर अंचल के लोग उभर कर आये हैं, जो यह काम अधिक शिद्दत व प्रामाणिकता से कर रहे हैं. अंचलों का नेतृत्त्व भी हो रहा है और अपनेपन का एक भीना संस्पर्श या उसी अपनत्त्व के चलते आक्रोश का जज़्बा भी समाहित हो जाता है, जिससे पूरी फिल्म संवेदनसिक्त हो उठती है.

फिल्मोत्सव में देखी साधो’, ‘करीम मोहम्मदअश्वथामा...आदि फिल्में इसकी साखी हैं. सब अपने-अपने परिवेश की उपज हैं. सबके लहज़े व शैली अपने अंचल से लबरेज़ हैं, पर अश्वथामाको तो भाव के साथ भाषा की एकता स्थापित करने की रौ में ब्रज में ही हो जाना पडा. और कई अंचलों की सामान्य समस्या पर अधारित होने के बावजूद तर्पणके पुरज़ोर असर में लेखक शिवमूर्त्ति व उनकी कथा एवं निर्देशक नीलम सिंह का समान अंचल से होना भी बेहद कारग़र भूमिका निभाता है. साहित्य-समीक्षा की शब्दावली में इसे संवेदनात्मक कलाकहा जाता है, जबकि मंथनको कलात्मक संवेदन’. लेकिन इसके बाद फिल्मकार की अपनी हथौटी फिल्म को विविधता व निजता अता करती है, जिसमें इन फिल्मों के साक्ष्य पर अपनेपन की संसक्ति ही धीरे-धीरे या झटके से कभी आसक्ति में भी बदल जाती है.



निर्देशक पुष्पेन्द्र सिंह की फिल्म अश्वत्थामाडाकुओं के साये में जीते चम्बल के बीहड इलाके पर है. उन्होंने बताया कि ज्यादातर कलाकार उस अंचल के वास्तविक लोग हैं. इक्ष्वाकु बने नौ साल के आर्यन सिंह को देखकर विश्वास नहीं होता, पर करना पडता है. होश सँभालते से ही महाभारत के शापग्रस्त अश्वथामा के जंगलों में फिरने की कथा सुनते हुए यह बच्चा डाकुओं की नृशंसताओं से अनाथ हो जाता है. फिर पूरी फिल्म ननिहाल में जंगलों-पहाडियों में घूमते हुए बिताता है. अंत में घर वापस लौटते हुए पिता की बाइक से उसी में इरादतन खो जाना अश्वथामा हो जाने का प्रतीक पूर्ण हो जाता है. लेकिन वीहड की जिन्दगी व परिवेश को अति जीवंतता प्रदान करने की तकनीकी व कलात्मक कोशिश में फिल्म अमूर्त्त (ऐम्बिगुअस) व जटिल हो जाती है. किंतु पुष्पेन्द्र सिंह फिल्म पर होती बातचीत में अपने तकनीकी और कलात्मक कौशल को लेकर अति विश्वस्तता (ओवर कॉन्फीडेंस) के इतने शिकार लगे कि कुछ कहने का कोई मतलब न था.... शायद वे अपनी फिल्म कला को लेकर भवभूति की भूमिका में चले गये हैं कि समय अनंत है, पृथ्वी बहुत बडी है...कभी पैदा होगा कोई, जो इसे समझेगा – ‘उत्पस्यसे हि मम कोपि समानधर्मा कालो हि निरवधि विपुला च पृथ्वी’.

ऐसा न होता, तो श्वेत-श्याम (ब्लैक व्हाइट) में फिल्माते हुए, किसी पृष्ठ्भूमि व करीने के बिना चरित्रांकन करते हुए, बिखरी घटनाओं को व्यतिक्रम में पेश करते हुए, कहीं का कहीं दृश्यों को लाते हुए और उसे असीमित लम्बाई या झटकेदार कट देते हुए...आदि-आदि सब के दौरान कुछ तो सोचते कि दर्शक कोई अगम जानीतो है नहीं कि आपके मन-मष्तिष्क में क्या चल रहा है, जान ले और सबकुछ आपोआप जोड ले...

कुमार शाहनीमणि कौल भी अमूर्त्त थे, पर उनमें क्रम व सिलसिला तो था. खैर, ब्रज भाषा की फिल्म घोषित हुई, पर उसके साथ भी न्याय न कर पाने का कोई न कोई ढाँसू तर्क या कलात्मकता के अनोखे आयाम भी होंगे उनके पास....   



बच्चे चुराने के सुनियोजित कारबार पर आधारित साधो में तर्क व सम्भाव्यता की जगह आकस्मिकता और इत्तफाक़ की बहुतायत ने ऊलजलूलपन भर दिया है. कला जगत में बुलन्द इक़बाल दानिश से दस्तबस्ता कहना चाहेंगे कि श्मशान में शवों को दफनाने वाले साधो का मृत बच्चे को जिन्दा पाकर उसके माँ-बाप के पास पहुँचाने का जज़्बा तो जीवन से खोते जाते इस भाव को पाने की बात है, पर इस प्रयत्न में जितने लोग अचानक मिलते हैं, सब बच्चे-बेचक गैंग के हैं, को कैसे मान लें. चलिए, उनका जाल इतना फैला है, भी मान लें, पर उस बच्चे के माँ-बाप दिल्ली जाते हुए कहाँ हादसे का शिकार होते हैं, कहाँ इलाज़ कराते हैं, कहाँ के हैं और कहाँ आते-जाते हैं कि ठीक अंत तक साधो से अचानक मिल जाते हैं - बिना किसी सूत्र के...! सबको जोड देना भानुमती का कुनबा ही है. 


बार-बार चोर-गिरोह से मिलना और बच-बचा कर निकल जाने में कुछ रोचकता अवश्य है, पर जब बच्चा हाथ में नहीं है, तो वह रफ-टफ साधो उस अकेले आदमी का मुकाबला क्यों नहीं करता? फिर किसी पुलिस या अस्पताल...आदि में क्यों नहीं जाता? उसकी कोई पृष्ठ्भूमि नहीं बतायी जाती कि पता लगे कि साधो नहीं करता जो कुछ या करता है, जो कुछ, वो क्यों और क्यों नहीं? फिर साधो को इतना घायल करने वाला बच्चे के बाप के सामने से भाग जाता है और बाप खडे ताकता रह जाता है...क्यों? कुछ करता क्यों नहीं? क्या एक बच्चे का बिकने से बचा पाना ही फिल्म की नेमत हो...!! जिस लापरवाही व बेवक़ूफी से कार-दुर्घटना होती है, उसे देखकर एक बार लगता है कि ऐसी आदतों को लताडना ही तो फिल्म का मक़सद नहीं, पर जब पूरी फिल्म उसे पागलों की याद की तरह भुला देती है, तो इतने सोचविहीन कारण पर दानिश का इक़बाल बुलन्द होता क़तई नहीं लगता.... आदिवासी इलाकों के परिवेश की अगूढता, विरलता अलग तरह की सुन्दरता दे रही थी...इसके साथ रानावि के सुकुमार टुडू ने मज़बूर व मूक साधो को जिस ख़ूबी से उतारा व जिया है, के अलावा फिल्म में कुछ भी पचता नहीं.



पवन कुमार शर्मा निर्देशित और बहु प्रशंसित फिल्म करीम मोहम्मद प्रकृति के रू-ब-रू और आतंक के साये में यायावरी जीवन जीते बकरवाल (गडेरिये) क़ौम की जातीय कथा है. पत्नी व सैकडों भेडों के परिवार के साथ हामिद की यह यात्रा ही बेटे करीम की निरक्षर पाठशाला है, जिसमें बातचीत के रूप में सिद्धांत व शास्त्र नहीं, राष्ट्रीयता, वफादारी तथा इनके लिए उत्सर्ग तक की निडरता व हिम्मत से भरी मुक़म्मल इंसानियत के आदर्श पाठ पढाये ही नहीं, जीवन में उतारे जाते हैं, जिसे करीम अपनी नवजात बहन को सिखाने का मंसूबा रखता है याने पीढी-दर-पीढी की पाठशाला-परम्परा...,जो फिल्म में आकर सबके लिए अनुकरणीय बन गयी है.

फिल्म में हामिद की बहन का गाँव सीमा पर बसा है. उसके जीजाभाई और गाँव के सभी लोग जिन्दगी के डर से आतंकियों को शरण देकर अपने को सुरक्षित रखने के भ्रमजन्य विश्वास में जीते हैं. इसके खिलाफ पूरे गाँव के सोये हुए ज़मीर को जगाने और आतंकवादियों को गिरफ़्तार कराने के प्रयत्न में पिता हामिद के क़ुर्बान हो जाने पर करीम इस प्रयत्न को आगे बढाता है... जिन्दगी बनाम ज़मीरकी वही चेतना गाँव वालों को आतंकियों के डर से मुक्त कराती है.

हिमांचल की वादियां खूबसूरत भी हैं और फिल्म-कला के लिए उपयोगी भी. हामिद-परिवार का मानुषिकता से बेहद प्लावित जीवन भी श्लाघ्य है...किंतु उन्हें उकेरने के आवेग में कथा और कथ्य का अनुपात थोडा गडबडाता-सा है. फिल्म की ही भाषा में कहूँ, तो फिल्म का 80 प्रतिशत भाग जीवनमें सरफा हो जाता है और 20 प्रतिशत में ही ज़मीरआ पाता है. यह अलग बात है कि 20% वाला ज़मीर पूरी फिल्म पर शासन करता है, जो वांच्छित भी है और सफलता का मानक भी, पर चौकन्ने दर्शक को 80% के दौरान कुछ ऊब होनी स्वाभाविक है. करीम बने हर्षित राजावत की उत्फुल्लता और संतुष्टि बेजोड है. पिता हामिद बने यशपाल शर्मा हमेशा की तरह सुयोग्य हैं और माँ बनी जूही सटीक सहयोगिनी.... 

उक्त फिल्मों की अपने परिवेश व जीवन में बसी आसक्ति से मुक्त है नीलम सिंह की फिल्म तर्पण - आँचलिक तत्त्वों से भरी-पूरी होने के बावजूद. कारण है शायद पहले के स्वतंत्र रूप से लिखे उपन्यास पर आधारित होना और उसे वैसे का वैसा फिल्म में उतार दिये जाना. लेकिन शायद इससे बडा कारण है उपन्यास में निहित दलित बनाम सवर्ण की संवेदना, जो पहले जैसी (शैवाल कृत व प्रकाश झा निर्मित दामुल..आदि) अंचल विशेष की न रहकर अब सामान्यीकृत (जनरलाइज़) हो गयी है. राष्ट्रीय स्तर पर आन्दोलित-उद्वेलित होते-होते अब यह मुद्दा न सवर्णों द्वारा पहले जैसा दलित-दमन रह गया है, न वर्ग-विभेद की हेय स्थिति. बल्कि यह वर्ग-संघर्ष में तब्दील हो गया है, जो ऐतिहासिक विकास का अपेक्षित सोपान था. तभी तो इसमें पहली बार चमटोल का प्यारे अपनी बेटी रजपतिया के साथ हुए बदफेली के मामले को पुलिस तक ले जाता है और साहित्य तथा सिनेमा नव-नवा हो जाता है. वाहक बनता है दलित नेता भाईजी, जिसकी पहुँच विधायक तक है. इस समीकरण के चलते कोई ब्राह्मण बच्चा चन्दर (फिल्म में गुण्डा जैसा हैकड) पहली बार जेल जाता है. अच्छा है कि दलित नेता भाईजी अपनी जमात के साथ ईमानदारी से प्रतिबद्ध है, वरना 1967 में छपे उपन्यास अलग अलग वैतरणीका हरिजन नेता तो ठाकुरों को फ़रार पाकर मारे-सताये गये हरिजनों से ही पैसे ऐंठकर ख़ुद भी लेता है और औलिस को ब ही खिलाता है.... ऐसे में यह विकास भी क़ाबिलेगौर है.

लेकिन इस मुक़ाम पर अब प्रगति के नाम पर हुए आज के दाँव-पेंच हैं, जैसे को तैसा के वजन पर दोनो तरफ से अनेति और फ़रेब के हथियारों से मुक़ाबले की तैयारी है. ब्राह्मण-बच्चे को बडी सज़ा दिलाने के लिए बलात्कार की कोशिश को बलात्कार हुआलिख देने से दलित नेता को न गुरेज़ है, न इज्जत-बेइज्जती की परवाह. बेटी और उसकी माँ को परवाह है वे असली शिकार (विक्टिम) जो हैं. यहाँ स्त्री की पारपरिक संवेदना ही है या लिंग-भेद का संकेत भी? पिता प्यारे की सहमति उपन्यास में कम, फिल्म में कुछ अधिक है. फिल्म विधा देखने से बावस्ता है और दिखना यह है कि अब मामला सच का नहीं, सच के आग्रह का भी नहीं, हार और जीत का है. ताक़त की आज़माइश का है. फलत: कई तारीख़ों तक चन्दर को ज़मानत न मिलने का जश्न मनाया जाता है दलित बस्ती में. दोनो तरफ से जातीय और रसूख़ के रिश्तों के समीकरण बिठाये जाते हैं. कानूनी नुस्ख़ों की चालें चली जाती हैं. पैसे प्यारे के भी कम खर्च नहीं होते लुधियाने में कमाता बेटा भी आता है, लेकिन पण्डितजी तो पानी की तरह पैसे बहाते हैं.

ये सारी स्थितियां और सरंजाम आधुनिक हैं, लेकिन जेल से छूटकर आने पर चन्दर अकेले बन्दूक लेकर पूरी बस्ती में डाँफता है. प्यारे-परिवार घर में छुप जाता है. बेहद डर जाता है. ये सूरते हाल पुराने हैं. क्या लखनऊ-वासी होने के बाद लेखक को मालूम नहीं कि आज किसी की हिम्मत नहीं कि अकेले ऐसा कर पाये. इसी तरह गाँव से क़रीबी वास्ता होता, तो शिवमूर्त्ति बलात्कार की कोशिश मटर के खेत में न कराते. अरहर व गन्ने के खेत ही त्रिकाल में सरनाम व मुफीद रहे हैं इसके लिए. निर्देशक गन्ने का खेत लायीं, पर घटना बाहर करा दीं!! उनका चन्दर इतना भोहर है या कैमरा गन्ने के खेत में नहीं पहुँचता? ऐसी कुछ और वारदातों के अलावा नीलमजी ने उत्तर भारत के गाँव को जस का तस उतार दिया है. उपाध्याय घर-परिवार की ब्राह्मणी व अमीरी ठसक में सरहंग पण्डिताइन बनी वन्दना अस्थाना की ही तरह दुख व बेबसी में रजपतिया की माँ बनी पूनम खण्डारे ने ध्यान खींचा. 


सारी हीरोगीरी के बावजूद चन्दर बने अभिषेक मदरेचा सामान्य ही रहे, तो रजपतिया बनी नीलम कुमारी भी सामान्य से कुछ ही आगे चल पायीं. हाँ, भांजे व दीदी को सँभालने के लिए सारी उठापटक व जोड-तोड करने वाली अमिट छाप छोड्ते हैं अमरकांत के रूप में अरुणशेखर. नेता को सही साकार किया है संजय सोनू ने, पर इन सबसे ऊपर लवंगिया को क्लिक करती हैं पद्मजा रॉय.    
  
(शिवमूर्ति)

शिवमूर्त्ति ने गाँव का इस्तेमाल किया है, लोक का नहीं. और नीलम सिंह ने बारहा इसी का अनुसरण किया है बजुज एक गीत के, जिसमें लोक जीवंत हो उठा है काहे चस्का चिल्होर चोंच मारे.... चील्ह के घोसले में माँस!!के रूप में चिल्होर सरनाम है, जो चोंच मारनेसे जुडकर चन्दर की माँस-खोरी का सटीक व शातिर प्रतीक बन जाता है. सही-सही मौकों पर इसकी टेर ऐसा छौंक बन जाती है कि पूरी फिल्म का स्वाद बदल जाता है. लेकिन भोजपुरी-भाषी होने के बावजूद राकेश निराला ने तरपन को पुरखों का तर्पण काहे ना उतारेकरके मज़ा किरकिरा कर दिया है. और कवने चस्काको काहे चस्काकरके अशुद्ध व असड्ढल भी कर दिया है!! लेकिन आज की पीढी को इतनी बारीक फिट से वास्ता नहीं. वह हिट चाहती है, जो हो जाये, तो बस...और इंशा अल्लाह यह हो ही जायेगा.... गायक की कोशिश में करुणा की सिहरन आती है, पर करुण-सर में भींगना नहीं हो पाता - सराबोर होना तो दूर की बात.... फिर दूसरे-तीसरे बन्धों में सुधार की कामना और इसके लिए शब्दों के कटबैठी जोड तो करुणा को यूँ ही सोख लेते हैं, तो गायन भी रेत में नाव चलाना होगा ही...!!

यहाँ तक तो फिल्म में भरा है जीवन. उसमें कमाल की कला तब आती है, जब चन्दर की नाक काटता है बेटा मुन्ना और इल्ज़ाम सर ले लेता है बाप प्यारे. उत्तराखण्डी नन्द्किशोर पंत ने उत्तरप्रदेशी प्यारे के भाव-अदा-रंगत तथा सर्वाधिक भाषा को जिस संयम व सोच से साधा है, वह क़ाबिले तारीफ़ तो ख़ूब है, पर ज़हिराये बिना रहता नहीं. सवर्ण की नाक कटती है और कला की इज्जत आसमान छूने लगती है. प्यारे का वह जुनून और उसमें कला का सरोकार देखने लायक है. शम्बूक से आज तक की दलित-त्रासदी साकार हो उठी है. बस, निराकार रह जाता है अकेले दलित नेता के पास बन्दूक लेकर चन्दर का पहुँचना. काश उपन्यास में लवंगी से मिली सूचना पर चन्दर का वहाँ आना नीलमजी दिखा देतीं...!! इसी तरह रजपतिया की तय हो गयी शादी, उपाध्याय के नाते अच्छे कुल में चन्दर की शादी में रुकावट और अपनी जाति के खिलाफ खडी लवंगिया की वेदना...आदि-आदि के जिक्र भी आते, तो फिल्म का संतुलन ही नहीं बनता, अंचल की ख़ासियतों से फिल्म अधिक प्रामाणिक व समृद्ध होती. इन सबके बिना भी नीलम का तर्पण अच्छा है क़ाबिल कथा-चयन की बदौलत है, पर बेहतर करने एवं ऐसी कला को कालबद्ध से कालजयी बनाने के लिए और सोच व कौशल दरकार है....   
    
हम सबकी अजीज़ कहानी पंचलाइट थी साहित्यिक कृति पर जागरणमें पेश दूसरी हिन्दी फिल्म. लेखक राकेश कुमार और निर्देशक प्रेमप्रकाश मोदी की भयानक इल्मी युति ने रेणु की मासूम-सी पंचलाइटको इतना फिल्मी बना दिया कि रेणुजी भी देखें, तो गश खाके गिर पडें.... उस गाँव में कोई गोधन कहीं आडे-वल्ते किसी मुनरी को देख कर एकाध टुकडा फिल्मी गीत गा दे, तो वही बहुत होता है - प्यार कर लेने के लिए और पंचों द्वारा इसी का बहाना बनाकर उसके स्वाभिमान को तोडने के लिए तथा न टूटे, तो बिरादरी बाहर की सज़ा देने के लिए. भिन्न-भिन्न टोलों (मुहलों) की पंचायतों को आज की पार्टियों का रूपक दिया जा सकता था, जो वस्तुत: रेणुजी का इष्ट और तंज था. लेकिन ऐसी ज़हीन सोच क्यों और कैसे आये आज. यहाँ तो गोधन के चरित्र के उसी गाने का सिरा पकडकर पूरा कृष्णोत्सव मनवा दिया और गोधन को कृष्ण बनाकर गवा दिया...याने सारी सांकेतिकता को रंगीन-फ़हीम जलसे में डुबो दिया, तब जाके उनके लिए गोधन स्थापित हुआ.... फिर छडीदार को लम्पट व राधा का रूप देकर ब्रजेन्द्र काला की अदाकारी के उपयोग और सुन्दर पत्नी पर नज़र गडातों को डपटते पंच नगीना में यशपाल शर्मा को ज्यादा मौका (स्पैस) देने...आदि की कीमियागीरी भी हुईं.

मगर असली बात यह कि पूरे समय की (फुल लेंग्थ) फिल्म बन गयी. ग़नीमत हुई कि सिर्फ़ फ़ालतू का सब जोडा, रेणुजी में से कुछ काम का काटा नहीं. पर यह सब करना हो, तो दूसरी कहानी बना लो. रेणु को क्यों खींच-तान रहे...? लेकिन वैसी औक़ात नहीं और पंचलाइटकी लोकप्रियता को भुनाना है. ऐसा सभी कर रहे हैं आज सबसे बडे पैमाने पर भंसाली कर रहे हैं, पर हम तो कहेंगे – ‘सर जाये या रहे, न रहे हम कहे बगैर...’. और यह सब कतरब्योंत न होती, तो उक्त कलाकरों के साथ मस्त-ज़हीन आशुतोष नागपाल (गोधन) और ठीकठाक अनुराधा मुखर्जी (मुनरी)...जैसे अन्य कलाकारों से सजी फिल्म में अपने मुहल्ले की पंचायत की छबि के नाम पर ही सही, योग्यता की क़दर हुई तो सही... इन बुतों में वफ़ा है तो सही’....




चन्दन कुमार निर्देशित माई डीयर वाइफ के पति साजन व पत्नी इला के जीवन में ऐसी कडवाहट आ गयी है कि हरदम लडते रहते हैं, पर कोई निर्णय नहीं ले पाते और साथ रहे बिना रह भी नहीं पाते. शराब और सिगरेट के साथ झगडे चरम पर भी पहुँचते रहते हैं. एक रात आमंत्रित युवा दम्पति ऐमी व विनीत आते हैं और देर रात तक पीने के दौरान वे भी साजन-इला जैसे ही झगडने लगते हैं.... दूसरा युग्म पहले के रू-ब-रू उसका आईना बन जाता है. बहुत करुण बनकर उभरता है माँ न बन पाने के कारण इला का मनोवैज्ञानिक केस बन जाना. दोनो युग्मों की कथा में प्रखर होकर सामने आते हैं मानव-जीवन के 
तीखे सच.....   


दो वृत्तचित्र इरादतन देखने थे. पहला, भिखारी ठाकुर पर शिल्पी गुलाटी व जैनेन्द्र का तैयार किया नाच भिखारी नाचदेखा. भिखारी जैसे जन्मजात कलाकार पर कुछ भी बने, श्रद्धा व प्यार उपजाता है, पर उसमें कुछ भी नियोजित व सुविचारित नहीं था. 

सवाल इतने रुटीन व कच्चे हैं सबसे वही के वही, तो जवाब भी वैसे ही होंगे. फिर भी उनके साथ काम किये लोगों से जो भी निकला है, भिखारीमय है. कलाकार व मनुष्य का सुमेल. खाँटीपने में अनगढ और अमूल्य. 

इसके ठीक विपरीत रहा आमो आखा एक से. प्रतिभा शर्मा निर्देशित ज़िला (या झिला) बाई पर बना महत्त्वाकांक्षी वृत्तचित्र. उस वीहड जीवट व अफाट इरादों वाली महिला को दृश्य-दर दृश्य हर ढाँचे में सक्रिय, ज़हीन, बेखटक व जुनूनी देखना लोमहर्षक रहा. सब कुछ सुनियोजित, सुचिंतित और सप्रयोजन.... तेजी-तुर्शी-तेवर के साथ गति-कैमरे-ऐक्शन के अद्भुत संयोजन में ज़िलाबाई के जीवन-कार्य का मक़सद बनते जाते कलाकर्म का नमूना. अपने प्रदेय तथा असर का समुचित आकलन-ग्रहण-सम्प्रेषण करता प्रस्तुति-विधान.... उनके चरित्र की ख़ासियतों का यथातथ्य निरूपण-प्रसारण.... सर्वांग सुन्दर आकुलित-उद्वेलित करता सधा-सुनिर्मित.



और अंतिम दिन के अंतिम शो में देखी कुछ देर और - सिर्फ 21 साला युवक अनुराग क्वात्रा निर्देशित. शहर दिल्ली के इलाका चाँदनी चौक में बनती-चलती एक अल्हड विदेशी किशोरी कैरा व एक सीधे-सादे स्थानीय किशोर बिट्टू की कहानी, जिसमें चाँदनी चौक भी एक किरदार बन जाता है और वहीं विचरता शेरू कुत्ता भी. इसे खींच-तान के कैरा-बिट्टू के आत्मान्वेषण की कहानी भी कह लिया जा सकता है. लडकी अपने शोध के सिलसिले में चाँदनी चौक को छानना-जानना चाहती है और वहीं बिट्टू के स्वर्गीय पिता की दुकान है जलेबी की, जिसे पडोसी चाचा (राजेश नवमेन) चलाते हैं और बिट्टू भी वहाँ हाथ बँटाता है. सो, चाचा से पूछ-पूछ कर दो-तीन दिनों ले जाने के बाद फिर खुद जाने लगते हैं दोनो...भटकते हैं, बतियाते हैं.... फिल्म के बिना बताये आप को समझना पडता है कि दोनो रोज़ कुछ देर और...घूमना व साथ रहना चाहते हैं. बिट्टू का रोज़ कुछ देर और’... इंतज़ार सभी करते हैं - अजलस्त बीमार माँ (मीनू क्वात्रा) बिट्टू के आने (या अपने जीने?) का कुछ देर औरइंतज़ार करती है... चाची को माँ बनना है, नहीं बन पाती, पर कुछ देर औरकी आस उसे भी है, जिसमें बिट्टू का खाने के लिए आना भी है... दुकान को और बढाने तथा उसके लिए बिट्टू के कारगर सहयोग का रोज़ कुछ देर और...का लम्बा इंतज़ार चाचा को भी है...तथा शेरू को भी है खेलने-खाने के लिए...!!



लेकिन 56 मिनट की फिल्म कब और कहाँ खत्म हो, का कुछ देर और..कुछ देर और’... इंतज़ार दर्शक को निरंतर और शायद सर्वाधिक.... फिर इंतज़ार खत्म होने पर ज़रा भी देर नहीं लगती समझने में कि कुछ देर औरचलती तो भी वही होता, जो शुरू हुई, तब हुआ...!! बिना कुछ बने जैसी बन गयी है फिल्म और बिना कुछ किये जैसे कर गये हैं सब कुछ सभी किरदार और कलाकार सर्वाधिक सजन कुमार (बिट्टू) और नीहारिका (कैरा)...कुछ कहे बिना क्या सब कुछ नहीं कह दिया गया...!!  


इस समूची कागद लेखीका आँखन देखीवाला पहलू नाम बडे और दर्शक थोडेके रूप में भी फलित हुआ. कल्कि कोच्चिन, केके मेनन, पंकल कपूर, यशपाल शर्मा...जैसे  कुछ और नाम नींमनाम वालों के प्रचार व मौजूदगी के बावजूद दो-चार गिनी-चुनी फिल्मों को छोडकर सभी में चौथाई भी नहीं भरे सभागार...बाज-बाज में तो दस-पाँच सर ही दिखते रहे लगातार.... और जो लोग आये, उनमें अधिकांश तो फिल्म से जुडे लोग थे तथा कुछ जुडे लोगों से जुडे लोग थे. थोडे-बहुत फिल्म में काम पाने के संघर्षी (स्ट्रगलर्स) नौनिहाल भी थे, जो मौका-मुहाल निकाल-पाके अपने रोज़गार की गुज़ारिश करने की लालसा लिये फिल्म देखने से अधिक वहाँ आने वाले कुछ सेमी स्टारों पर नज़र गडाये रहते.... वे फिल्म के बाद की बात-चीत में मौजूद निर्देशकों-अभिनेताओं की तारीफ़ों के पुल बाँधते और शहर की जमा (पूँजी) पूछनेकी तरह फिल्म का बजट पूछते पाये जाते.... 

ढाई-ढाई सौ के खर्च में 12 घण्टे एसी में साथ बैठे इक्के-दुक्के प्रेमी युगल भी कभी दिखे, लेकिन सिर्फ़ फिल्में देखने के मक़सद के साथ समूचे सरंजाम पर काकदृष्टि गडाने वाले हम जैसे खलिहर तो दूसरा नहीं लखाया...!!
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