सबद भेद : छायावादी विषाद-तत्त्व : मिथक और यथार्थ : रवि रंजन

Posted by arun dev on अक्तूबर 10, 2018










यह छायावाद का शताब्दी वर्ष है. १९१८ से २०१८ के इन सौ वर्षों में छायावाद की कविताओं को लेकर शताधिक अकादमिक कार्य हुए हैं पर अभी भी बहुत कुछ ख़ास नहीं हुआ है.  

छायावाद मूलत: मुक्ति और आशा का काव्य है. मुक्ति उपनिवेश से लेकर तमाम सामाजिक पारम्परिक रुढियों से और उम्मीद निर्मित हो रहे राष्ट्र से. छायावाद का बीज शब्द अरुण है. और यही नव जागरण है.

जिस तरह से भक्ति काल की कविता बिना ईश्वर के पूरी नहीं होती उसी तरह छायावाद प्रेम और विषाद के बिना. यह कविता का उस समय का मुहावरा है. जैसे भक्त कवि ईश्वरीय आडम्बर के बीच अंतत: मानवतावाद लिखते हैं उसी तरह छायावाद निर्मित हो रहे राष्ट्र का जागरण लिखता है.

छायावाद के केंद्र में जयशंकर प्रसाद हैं. वह कविता, नाटक, कहानी, उपन्यास तक में विस्तृत हैं. वह बींसवी शताब्दी के एकमात्र मुकम्मल साहित्यकार हैं.

आलोचक रवि  रंजन जी ने छायावाद में विषाद की खोज़ खबर ली है अपने इस आलेख में.

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छायावादी विषाद-तत्त्व : मिथक और यथार्थ                      
रवि रंजन 



चार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी ने लिखा है कि छायावाद हजारों साल की भारतीय रचनाओं की प्रकृति व ‘टाइप’ को अस्वीकार करता है और इस प्रकार हमारा साहित्य एक नवीन क्षेत्र में पदार्पण करता है. स्पष्ट ही इस परिवर्तन के अपने सामाजिक कारण थे. कहना न होगा कि अपवादस्वरूप घनानद सरीखे कुछ गिनेचुने रचनाकारों को छोड़कर पहले के अधिकांश कवि किसी मिथकीय या ऐतिहासिक घटना, कहानी आदि में आए चरित्रों के बहाने प्रेम की कविता लिखते थे.  पर छायावादी कवि पहली बार हमारे साहित्य में अपने प्रेम की कविता लिखने के लिए अग्रसर होते हैं. सुमित्रानंदन पन्त ने ‘ग्रंथि’ में, सूर्यकांत त्रिपाठी निराला ने ‘जुही की कली’ में तथा जयशंकर प्रसाद ने ‘आँसू’ में निजी प्रेम की कविता लिखी है.

बीसवीं सदी के आरम्भिक चरण में सामंती सामूहिकता के विरुद्ध व्यक्ति स्वातंत्र्य का आत्यंतिक आग्रह जब हिंदी कविता में रचनात्मक स्तर पर प्रकट होने लगा तो उसके बारे में  तद्युगीन प्रवाह-पतित पंडितों की प्रतिक्रिया क्या थी, यह जगजाहिर है. जहाँ तक इस संदर्भ में आचार्य शुक्ल के मंतव्य का प्रश्न है, यह ध्यान रखना जरुरी है कि वे उस युग के एकमात्र ऐसे आलोचक हैं, जिनका रिश्ता अपने समकालीन छायावादी आन्दोलन के साथ द्वंद्वमूलक था. पर जैसा कि किसी आलोचक ने लिखा है कि इस द्वंद्व को झगड़े के रूप में अधिक और द्वंद्वात्मक (परस्परतापरक) रूप में कम देखा गया है. सही बात तो यह है कि समीक्षा का लक्ष्य समकालीन सर्जना के जिस द्वंद्व को पकड़ना होता है, छायावाद के सन्दर्भ में अधिकांश शुक्लोत्तर समीक्षक उसे पकड़ने में प्राय: असमर्थ सिद्ध हुए. परम्परा से आचरित सामाजिक बंधनों को नकारनेवाली नवीन रचनाशीलता को लेकर आचार्य नंददुलारे वाजपेयी या डॉ. नगेन्द्र की प्रतिक्रियाओं को उसे शास्त्रीय अनुशासन में बाँधने की एक पुरजोर कोशिश के रूप में देखा जाना चाहिए, जिसे सामाजिक स्वाधीनता के आकांक्षी नवीन चेतनासंपन्न कवियों ने अपनी रचनात्मक ऊर्जा से विफल कर दिया.

छायावादी रचनाभियान के मूल्यांकन को लेकर जहाँ तक प्रगतिशील समीक्षकों के रुख का प्रश्न है, हम पाते हैं कि आरम्भ में उनकी दृष्टि घोर प्रतिक्रियावादी थी. एक ज़माने से प्रगतिशीलता का दमामा पीटते-पीटते कालान्तर में अप्रासंगिकता की स्थिति में पहुँच जाने वाले प्रगतिशील आलोचक शिवदान सिंह चौहान ने तो कभी यहाँ तक लिखा था कि ‘इस छायावाद की धारा ने हिंदी साहित्य को जितना धक्का पहुँचाया है उतना शायद ही भारत को हिन्दू महासभा या मुस्लिम लीग ने पहुँचाया हो.’ (1937, विशाल भारत)

बहरहाल, इस संदर्भ में सुखद बात यह है कि आगे चलकर प्रगतिशील समीक्षकों द्वारा ही छायावादी काव्यान्दोलन का ठीक-ठाक मूल्यांकन संभव हो सका. उस युग के साथ-साथ छायावादोत्तर काल के अनेकानेक आलोचकों को यदि छोड़ भी दें तो डॉ. रामविलास शर्मा या डॉ. नामवर सिंह के छायावाद विषयक आलोचनात्मक चिन्तन में जो सूक्ष्म दृष्टि है, उसके बरअक्स शांतिप्रिय द्विवेदी एवं जानकीवल्लभ शास्त्री जैसे सहृदय प्रभाववादी समीक्षकों के आलोचकीय विवेक में कितनी गंभीरता है, यह अलग से बताने की ज़रूरत नहीं है.
(महादेवी वर्मा)

रचना के स्तर पर अभिव्यक्ति के लिए आकुल-आतुर जनता की मुक्ति की आकांक्षा को शास्त्रीय अनुशासन में बांधने की एक खतरनाक प्रवृत्ति हमें वहाँ भी दिखाई देती है, जब ‘छायावाद’ को अंग्रेजी की ‘रोमांटिक पोएट्री’ का पर्याय तथा इसी तर्ज पर छायावादी विषाद-तत्व को ‘रोमांटिक एगोनी’ की प्रतिलिपि बताने का उपक्रम किया जाता है. आज हम इक्कीसवीं  शताब्दी के आरंभिक चरण में है, जिसकी सबसे बड़ी उपलब्धि है – उपनिवेशवाद की समाप्ति. छायावादी कविता की ‘रोमांटिक पोएट्री’ का पर्याय बताना तथा ‘रोमांटिक एगोनी’ की अवधारणा की पृष्टभूमि में रखकर ‘छायावादी विषाद-तत्व’ पर बातें करने से हिंदी कविता के मूल्यांकन के क्षेत्र में उसी औपनिवेशिक ज़ेहनियत का ख़तरा नज़र आता है, जिसकी समाप्ति पिछली  शताब्दी की सबसे बड़ी उपलब्धि मानी जा रही है.

प्रसंगवश आचार्य शुक्ल की ‘बीज भाव’ वाली बात मानीखेज़ प्रतीत होती है. ‘काव्य में लोकमंगल की साधनावस्था’ निबंध में शुक्ल जी ने ‘करुणा’ और ‘प्रेम’ को विश्व की तमाम उल्लेखनीय साहित्यिक कृतियों के ‘बीज भाव’ के रूप में मान्यता दी है. यह बात अलग है कि उन्होंने जिन कृतियों में ‘प्रेम’ को ‘बीजभाव’ बताते हुए उन्हें सिद्धावस्था का काव्य घोषित किया है, उनमें से भी अनेक में अंत:सलिला की तरह ‘करुणा’ प्रवहमान दिखाई देती है. भले ही वहाँ उतनी व्यापकता न हो, जितनी कि साधनावस्था वाले काव्य में होती है. जाहिर है कि इस तरह के विभाजन के अपने खतरे हैं और हमें नहीं भूलना चाहिए कि ‘छायावाद का ताजमहल’ कही जाने वाली कृति ‘कामायनी’ भले ही शुक्ल जी के विभाजन के अनुसार ‘साधनावस्था का काव्य’ मानी जाए पर वहां भी अंतिम सर्ग ‘आनंद’ है, जिसके उपभोग के लिए ही श्रध्दा और मनु कैलास की यात्रा करते हैं.

डॉ. परमानंद श्रीवास्तव ने लिखा है कि ‘महान कविता अकेले क्रोध से पैदा नहीं होती वह पैदा होती है क्रोध और करुणा के तनाव में.’ (शब्द और मनुष्य, पृ. 198) आनंद्वर्द्धन ने वाल्मीकि रामायण पर टिप्पणी करते हुए कवि हृदय में उत्पन्न जिस विक्षोभ या शोक को ही श्लोक के रूप में अभिव्यक्त हुआ देख कर उसमें करुण रस की बात की है, वहाँ भी अन्यायी (व्याध) के प्रति क्रोध या आक्रोश की कमी नहीं है. सच तो यह है कि जब युगीन परिस्थितियों के दबाव या कई बार रचनाकार की निजी मनोवैज्ञानिक बुनावट के कारण इस ‘करुणा’ में से ‘आक्रोश’ गायब हो जाता है या कम हो जाता है तो ‘करुणा’ वहाँ अपनी रक्षणमूलक व्यापकता खोकर ‘विषाद’ के रूप में तत्वान्तरित हो जाती है. वाल्मीकि के राम जब कहते हैं कि –
‘राज्यं भ्रष्टं वने वास: सीता नष्टा मृतो द्विज:
ईदृशीयं ममा लक्ष्मीर्दहेदपि हि पावकम्.’

(राज्य गया, वनवास मिला, सीता नष्ट हुई, पिता का मित्र जटायु मारा गया. मेरा दुर्भाग्य ऐसा है कि वह अग्नि को भी जला दे.)

निश्चय ही यह विषादग्रस्त मनोदशा की अभिव्यक्ति है, जिसमें वह करुणाजन्य गत्वरता नहीं है, जिसकी प्रतिमूर्ति राम माने जाते हैं. संभवत: इसी परिप्रेक्ष्य में छायावाद के अग्रणी पुरोधाओं में एक जयशंकर प्रसाद ने एक स्थान पर ‘विषाद’ को ‘करुणा का विश्रांत चरण’ कहा है-

‘किसी ह्रदय का यह विषाद है
छेड़ो मत यह सुख का क्षण है
उत्तेजित कर मत दौड़ाओ
करुणा का विश्रांत चरण है.’


(निराला)
प्रसाद ने यहाँ ‘विषाद’ को ‘सुख का क्षण’ कह कर उसे जिस अतिरिक्त महिमा से मंडित किया है, वह न केवल प्रसाद की, बल्कि छायावाद की एक प्रमुख प्रवृत्ति रही है और शायद इसी कारण निराला को छोड़कर प्राय: सभी छायावादी कवि यथार्थ की भूमि पर इस अति वैयक्तिक ‘विषाद-तत्त्व’ के मूलभूत कारणों से जूझते नज़र नहीं आते. लेकिन इसका यह मतलब कतई नहीं है कि छायावाद मनुष्य की आत्यंतिक वैयक्तिकता से निष्पन्न विषाद-भाव के नकारात्मक पक्ष से अपरिचित था:

ओ जीवन की मरू मरीचिका,
कायरता के अलस  विषाद !
अरे ! पुरातन अमृत अगतिमय
मोहमुग्ध जर्जर अवसाद.   (कामायनी)

  
जयशंकर प्रसाद जब अपने एक प्रसिद्ध गीत में ‘विषाद-विष’ पद का प्रयोग करते हैं तो प्रकारातंर से वे इसी ओर संकेत करते हैं –

अपने विषाद-विष से मूर्च्छित
काँटों से बिंधकर बार-बार
धीरे से वह उठता पुकार
मुझको न मिला रे कभी प्यार !

  
महान कविता का समाजशास्त्रीय परिप्रेक्ष्य प्राय: अत्यंत प्रच्छन्न होता है. इसलिए अच्छे पाठक का दायित्व है कि उसमें जहाँ कहीं भी आधारभूत वैचारिक पृष्ठभूमि अंतर्निहित हो, उसे वह खोज निकाले. छायावाद के संदर्भ में ऐसा ही महत्वपूर्ण कार्य गजानन माधव मुक्तिबोध ने किया है. ‘कामायनी’ पर अपनी विलक्षण सूझ के साथ पुनर्विचार करते हुए मुक्तिबोध ने वहाँ विस्तार के साथ वर्णित जल-प्रलय के जातीय मिथक को सामन्ती सभ्यता के ध्वंस से जोड़ कर देखा है, जो ब्रिटिश साम्राज्यवाद के एक धक्के से छिन्न-भिन्न हो गयी थी. एलियट की शब्दावली में यदि कहें तो ‘कामायनी’ में वर्णित जल-प्रलय का मिथक बीसवीं सदी में सामन्ती सभ्यता के विघटन का ‘मूर्त विधान’ (ऑब्जेक्टिव कोरिलेटिव) है. प्रसाद जब कामायनी के ‘चिंता’ संर्ग में लिखते हैं –

‘भरी वासना सरिता का वह
कैसा था मदमत्त प्रवाह’

या

कंकण क्वणित रणित नूपुर थे,
हिलते थे छाती पर हार;
मुखरित था कलरव, गीतों में
स्वर लय का होता अभिसार.’

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तो वे देव जाति की विलासिता के वर्णन के बहाने प्रकारांतर से सामन्ती समाज की ही विलासिता को चित्रित करते हैं जिसके अनेक उदाहरण रीतिकाव्य में मिलते हैं:

(i) गुलगुली गिल में गलीचा है, गुणीजन हैं,
चाँदनी है, चिक है, चिरागन की माला है.  – पद्माकर

(ii) सटपटाति सी ससिमुखी, मुख घूंघट पट ढांकि,
पावक झर सी झमकि झरी, गयी झरोखा झाँकि. - बिहारी


रीतिकालीन कवियों द्वारा वर्णित सामन्ती विलासिता के चित्रों से मेल खाती अनेकानेक पंक्तियाँ जयशंकर प्रसाद के काव्य में विद्यमान हैं. ‘कामायनी’ के मनु का सारा विषाद इसी सभ्यता के ध्वंस को लेकर हैं जिसका वह भी एक सदस्य था –

‘गया सभी कुछ गया, मधुरतम
सुरवालाओं का श्रृंगार ’


‘कामायनी’ के रचयिता ने मनु को देव-सभ्यता के विध्वंस के बाद जिस मानव सभ्यता के विकास के नेता के रूप में प्रस्तुत किया है वह वस्तुत: मध्यवर्गीय सभ्यता है, जिसे मार्क्सिस्ट जार्गन में ‘बुर्जुआ सभ्यता’ कहा जाता है. स्वार्थ, स्पर्धा और अहं की आधारभूमि पर खड़ी इस नयी सभ्यता में मनुष्य की चेतना का विघटन स्वाभाविक है. ‘कामायनी’ में मनु का व्यक्तित्व किसी व्यक्ति या नायक का व्यक्तित्व-मात्र नहीं है. सच तो यह है कि कवि ने उसे व्यापक संदर्भ में सम्पूर्ण मध्यवर्ग के प्रतिनिधि पात्र के रूप में रखा है तथा उसके द्वारा पौराणिक आख्यान की जमीन पर आधुनिक मध्यवर्गीय मनुष्य के शील एवं उसकी विषादग्रस्त विघटित चेतना का निरूपण किया है जो हमारे युग की एक महत्वपूर्ण समस्या है. आधुनिक मनुष्य के भीतर विषाद भरा हुआ है और इससे उसकी चेतना का कौशल खंडित हो गया है –

‘स्खलन चेतना के कौशल का
भूल जिसे कहते हैं
एक बिंदु जिसमें विषाद के
नर तिरते रहते हैं.’

‘चेतना का इतिहास’ लिखते हुए प्रसाद मनु के बहाने आधुनिक मनुष्य की चेतना में पैदा हो गई दरार को अभिव्यंजित करते हैं और स्पष्ट ही ऐसी विघटित चेतना वाला व्यक्ति कदापि सच्चे-प्रेम का वाहक नहीं हो सकता. ‘कामायनी’ के इड़ा सर्ग में मनु से काम कहता है –
                                          
‘तुमने  तो  पायी  सदैव    उसकी  सुन्दर  जड़  देह मात्र
सौन्दर्य जलधि से भर लाये केवल तुम अपना गरल पात्र.’

वस्तुत: गाँधी-युग में भारतीय सामाजिक जीवन में जो एक नैतिक वातावरण निर्मित हो रहा था, छायावाद भी कहीं-न-कहीं उससे अवश्य प्रभावित हो रहा था. निराला की ‘राम की शक्तिपूजा’ में भी यह प्रभाव छिटपुट रूप में देखा जा सकता है –

‘आराधन का दृढ़ आराधन से दो उत्तर.’

प्रसाद के अनुसार आधुनिक मध्यवर्गीय मनुष्य की चेतना में उत्पन्न इस दरार का मूल कारण इच्छा, क्रिया व् ज्ञान के क्षेत्रों में समन्वय का अभाव है. ‘कामायनी’ में आया ‘व्यस्त’ शब्द इसी बिखराव (डिसइंटीग्रेशन) की ओर इंगित करता है और इसे ‘समस्त’ या ‘इंटीग्रेटेड’ बनाये बिना मनुष्य पूर्णता को प्राप्त नहीं कर सकता:

शक्ति के विद्युत्कण जो व्यस्त
विकल बिखरे हों जो निरुपाय
समन्वय उसका करे समस्त
विजयिनी मानवता हो जाय.

 
‘कामायनी’ में श्रद्धा द्वारा गाए जाने वाले गीत के एक अंतरे में चेतना की जिस थकान की चर्चा है वह भी प्रकारांतर से आधुनिक मनुष्य की विघटित चेतना का ही संकेत है, जिसे दूर करने के लिए प्रसाद की श्रद्धा वहाँ मलय-पवन की तरह आती है –

‘विकल होकर नित्य चंचल
खोजती जब नींद के पल
चेतना थक-सी रही तब
मैं मलय की वात रे मन.’


यहाँ चेनता का ‘थकना’, प्रसव-पीड़ा से उस माता का ‘थकना’ है, जो कालिदास की कल्पना में जब इंदुमती के रूप में आती हैं तव ‘रघुवंश’ में वे लिखते हैं – ‘पाश्चिमात यामिनी यामात प्रसादमिव चेतना.’ रात्रि के अंतिम प्रहर में जैसे चेतना प्रसार पाती है, वैसे ही प्रौढ़ावस्था में पुत्र को जन्म देकर इंदुमती ने अपनी चेतना का प्रसार पाया. यदि कोई चाहे तो ‘कामायनी’ के इस गीत में आई ‘मलय की बात’ की रचनात्मक प्रतिध्वनि रघुवंश में वर्णित शैशव की पुलक में सुन सकता है.

‘कामायनी’ की रचना से बहुत पहले जयशंकर प्रसाद ने लिखा था –

ओ री मानस की गहराई !
तेरा विषाद-द्रव तरल-तरल
मूर्च्छित न रहे ज्यों पिए गरल
* * * * *
तू हँस जीवन की सुघराई.

 
(पंत)
प्रसाद की रचनाशीलता के आरम्भिक चरण में आया ‘विषाद-द्रव’ ठोस कारण के साथ ‘कामायनी’ में अभिव्यंजित हुआ है. पर सवाल यह उठता है कि कवि ने जिस तरह मनु के मन में ‘नटराज का नर्तन’ कराकर उसके तमाम व्यभिचरण को कृति के अंतिम सर्ग में नष्ट होता हुआ दिखाया है, वह कहाँ तक स्वाभाविक लगता है. कहना होगा कि प्रसाद ने मनु को जिस मानव सभ्यता के विकास के नेता के रूप में प्रस्तुत करना चाहा है, उसके नवनिर्माण की प्रक्रिया में सबसे बड़ा बाधक तत्व उसका सामन्ती संस्कार है. वह किसी भी तरह से उदात्त नायक सिद्ध नहीं होता, जैसा कि डॉ. नगेन्द्र सिद्ध करते रहे हैं. कारण यह कि उसमें इंद्रियलिप्सा के साथ-साथ घोर अहंकार है. उसका अपना का वक्तव्य है –

(i)     
इन्द्रिय की अभिलाषा जितनी,
सतत  सफलता पावे
जहाँ हृदय की तृप्ति विलासी
मधुर मदिर कुछ गावे.


(ii)     
दौड़ कर मिला न जलनिधि अंक,                         
आह ! वैसा ही मैं पाखंड.

(iii)   
मेरा सब कुछ क्रोध-मोह के,                           
मृषा दान से गठित हुआ.
 
    
कोई कह सकता है कि व्यक्तिवाद का तिरोहण ‘कामायनी’ के नायक की उपलब्धि है. पर गंभीरतापूर्वक विचारने से कृति के अंतिम सर्ग में उसका हृदय जिस प्रकार परिवर्तित-सा होता दिखाया गया है, वह कतई स्वाभाविक नहीं लगता. कारण यह कि व्यक्तिवाद, छायावाद के साथ समाप्त नहीं हो जाता है, बल्कि उसके बाद उसका अत्यंत भयानक तथा ज्यादा घिनौना रूप समाज के सामने आया है. प्रसाद जिसे दर्शन की भाषा में इच्छा, क्रिया व् ज्ञान में बिखराव कहते हैं वह और वीभत्स रूप में आज के विषादाकुल पाखंडी बुद्धिजीवी की ‘ट्रैजेडी’ है, जो मुक्तिबोध की ‘ब्रह्मराक्षस’ कविता में व्यक्त हुई है –

आत्मचेतस किन्तु इस
व्यक्तित्व में थी प्राणमय अनबन...
विश्वचेतस-बे-बनाव !!
महत्ता के चरण में था
विषादाकुल मन !
…………………………………
पिस गया वह भीतरी
औ बाहरी दो कठिन पाटों बीच,
ऐसी ट्रैजेडी है नीच !!





फ़र्क यह है कि जहाँ एक हद तक निराला को छोड़कर अन्य छायावादी कवियों ने आधुनिक मनुष्य की इस विषादग्रस्त रुग्ण मनोदशा का भाववादी ढंग से वर्णन-चित्रण तथा समाधान प्रस्तुत किया है, वहीँ निराला एवं उनकी परम्परा से जुड़े परवर्ती यथार्थवादी रचनाकारों में वास्तविकता की जमीन पर इस समस्या से जूझने की प्रवृत्ति दिखाई पड़ती है.
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रवि रंजन

प्रोफ़ेसर एवं पूर्व अध्यक्ष, हिन्दी विभाग, हैदराबाद केन्द्रीय विश्वविद्यालय,  हैदराबाद-500046. विजिटिंग प्रोफ़ेसर, वारसा विश्वविद्यालय,पोलैंड.  इ.मेल: raviranjan@uohyd.ac.in