ख़ राब कविता का अंत:करण : देवी प्रसाद मिश्र

(कृति - Saks Afridi)


समकालीन महत्वपूर्ण हिंदी कवि देवी प्रसाद मिश्र की कविता ‘सेवादार’ की सदाशिव श्रोत्रिय द्वारा की गयी व्याख्या पिछले दिनों से बहस मे है. विष्णु खरे का मानना था 
“जब आप एक उम्दा कवि के रूप में स्वीकृत-प्रतिष्ठित हो चुके होते हैं तो अचानक आपकी ज़िम्मेदारियाँ कठिन,जटिल और जानलेवा होती जाती हैं. यह आप ही करते हैं. आपके पाठक आपसे एक न्यूनतम उत्कृष्टता की माँग और उम्मीद करने लगते हैं. हर कला, हुनर और स्पोर्ट आदि में यह विचित्र 'demand and supply' का दुर्निवार नियम अपने-आप आयद हो जाता है. आपके चाहने-न चाहने से फिर कुछ नहीं होगा.” 
देवी प्रसाद मिश्र का मानना है – “कई बार काव्य मूल्य को आयत्त करने के लिए काव्य गुण का परित्याग करना पड़ता है."  कविता, भाष्य, टिप्पणियाँ और देवीप्रसाद मिश्र का यह सुचिंतित प्रतिपक्ष यहाँ आप पढ़ें.






‘गर नहीं हैं मिरे अशआ'र में मा'नी न सही’
ख़ राब कविता का अंत:करण                                       

देवी प्रसाद मिश्र







मेरी कविता सेवादार का भाष्य हो, ऐसा मैंने नहीं चाहा था. बिल्कुल नहीं चाहा था, मेरे भाई. इसे एक बुरी कविता के तौर पर छोड़े रखना चाहिए था. सदाशिव जी को और उसके बाद बहसकर्ताओं को भी. जब अच्छे को अच्छा कहने की परंपरा इतना क्षीण है तो बुरे को बुरा कहने के लिये काहे इतनी मशक्कत. लेकिन दिक्कत यह है कि उसकी निहंग निंदा ही नहीं हुई, हिंदी के इस समय के बेहद समर्थ कथाकार योगेंद्र आहूजा ने इसे पसंद भी किया.

निरंतर ब़ड़े हस्तक्षेप को तैयार कवयित्री निर्मला गर्ग और अवांगार्दी तबीयत के कवि अजेय को इसकी प्रासंगिकता से इंकार नहीं था. लेकिन यह बात एकाधिकारवादी और लानतवादी कोहराम के जटिल तंत्र और आधिपत्यमूलक दबंग वकीली जिरह के संजाल में खो गई.  समालोचन के समर्थ एडिटर ने किसी समझदारी के तहत ही कहा होगा कि एनजीओ के धंधों  को लेकर सेवादार एक अकेली सी ही कविता है.  जब यह कविता जलसा में अन्य कविताओं के साथ आई ही थी तो ज्ञान जी ने इस कविता का नोटिस लिया था. असद जैदी जैसे समर्थ कवि और संपादक ने इसे छापा. तो यह कविता उतनी छतहीन, बेसहारा, बिराऊ सी नहीं थी जितना दिखाने या बताने की कोशिशें की गई है.

लेकिन फैसलाकुन होना एक तबीयत है, विमर्श हीन होना एक विकल्प और मंतव्य को छिपाने के लिये छद्म भाषिक तंत्र का कांस्ट्रक्ट एक चातुर्य. कविता की अंतर्वस्तु पर विचार किये बिना जिन्होंने इसे ख़राब कविता कहा है वह रचना से कवि व्यक्तित्व के निरसन और संरचना पर ज़ोर देने का काफी मार्मिक उदाहरण है जो रचनात्मक मीमांसा में मंतव्यवाद के संदेह को हरा भरा रखता है और नव संरचनावाद की वापसी की भूमि तैयार करता है.  और मैं कब कह रहा कि यह महान कविता है या कि अच्छी ही कविता. यह एक बेहद साधारण कविता है जो हमारे समय की असाधारण लूट, असमान वितरण तंत्र,  बिचौलिया संस्कृति, देह को माल में बदलने की होशियारी, सेवा सेक्टर में अंग्रेज़ी तंत्र के वर्चस्व और पौरुषेय आधिपत्य  का वृत्तांत बनने की कोशिश करती है. वैसे यह भी कह दूँ कि महान और अच्छी कविताओं ने महान और अच्छे लोगों की तरह समाज और साहित्य का आत्यंतिक नुकसान किया है. मुझे सबवर्सिव पोएट्री ही ठीक लगती है- साधारण सी दिखने वाली, पलीता लगाने वाली, टेढ़ी मेढ़ी, नीली पीली, बाज़ दफा यह कहने के लिये मजबूर करने वाली कि इसमें कविता कहाँ है. 



मेरा कहना है कि काफी दिनों से काम करते कवियों की रचनाओं को उनकी एकांतिकता में नहीं किसी अवधारणात्मक विस्तार में भी देखना चाहिए. लेकिन जनाब, मैं किसी रियायत की माँग नहीं कर रहा. कुछ सूत्र दे रहा हूँ और ले भी रहा हूँ जो यहाँ नहीं भी तो कहीं और काम  आ सकते हैं. यह तो तय है कि यह प्योर पोएट्री नहीं है. शुद्ध कविता का परमौदात्य यहाँ नहीं है. आह्वान में काँपती इबारत नहीं है तो नहीं है. यह हमारे समाज के निरंतर गैरजिम्मेदार होते जाने का लगभग एंटी पोएट्री आख्यान है जिसे जानबूझकर शैली के चलताऊ  ऊबड़खाबड़पन के सहारे बयां करने की कोशिश की गई.

एक खड़खड़ करती भाषा में हमारे समय की अकथ क्रूरता के गहरे इशारे यहाँ ज़रूर हैं. एक ओर खरिआर की 13 नये पैसे रोज़ कमाती औरतें हैं  तो  दूसरी ओर संजीवनी सूरी है जिसे लगभग रोज़ 2200 रु मिलते हैं. यह खरिआर और जीकेटू के बीच का सामाजिक, सांस्कृतिक और संसाधनीय तनाव ह. संजीवनी का मायने होता है जीवनदायिनी लेकिन सोचकर रखा गया संजीवनी नाम महानगराधृत खाऊ तंत्र का अनिवार्य हिस्सा है. तो यहाँ पंडित राम चंद्र शुक्ल के विरुद्धों का सामंजस्य नहीं है-होना भी नहीं चाहिए. जो विरुद्ध है वह एकमेक  नहीं हो सकता. लेकिन विकट वैपरीत्य संजीवनी और खरिआरकी औरतों के बीच का ही नहीं है. संजीवनी अपने बॉस की सेक्सिस्ट घेरेबंदी (और प्राउलिंग) से बच नहीं सकती. 


संजीवनी की देह उसकी शक्ति संरचना और विपत्ति और उसके निरंतर आहतव्य होने का स्त्रोत है. पुरुष की दमक और धमक वाले बाज़ार में यह स्त्री की आस्तित्विक दुविधा है. तो यह रिश्तों का ऐंद्रजालीय पावर स्ट्रक्चर है जिसको समझने के लिये जिसकी दरकार हुआ करती है उसे ऐतिहासिक अवस्थिति की समझ के नाम से भी जाना जाता है. understanding of historical situation.एक बात और: कविता में आसपास एक जर्मन ब्रीड का जानवर भी घूम रहा है जो भारतीय मानस में घूमते अनिर्वचनीय नस्लवाद की, आदिवासी और नागर जीवन की, काले और गोरे की, मैं और वह की, आर्य और अनार्य के विभाजन की  न मिटती ऐतिहासिक वैश्वीयस्मृति है. चाहिएवाद का लंबा पहाड़ा पढानेवालों को पुनर्स्मरण कराना चाहता हूं कि कविता को जांचने का बुनियादी प्रतिमान यह भी होता है कि उसमें हमारे समय की केंद्रीय अंतर्वस्तु का कोई सिरा है या नहीं.

हो सकता है कि यह विषमतावर्णन किसी निबंध का विषय हो लेकिन इस तरह के निबंध हिंदी में बहुत होते तो भरोसा कीजिए मैं यह कविता न लिखता. मेरे यार, मुझे एक विकट नैतिक चुगली कर लेने दो फिर कविता बने या न बने.

यह कविता अमरता विमर्श से हलकान कवि की कविता नहीं है. काव्य गुण खोकर भी कुछ कहने की ज़रूरत से न तो मायकव्स्की का इंकार था और न नज़ीर अकबराबादी  और न मुक्तिबोध का और न कबीर का. यह मत सोचिएगा कि इन महान कवियों के समकक्ष मैं खुद को रखने की कोशिश कर रहा हूँ. मैं न हुआ इतना गुस्ताख़. लेकिन काव्य गुण को बीच बीच में खोना रचना धर्म के लिए काफी ज़रूरी प्रक्रिया है. कई बार काव्य मूल्य को आयत्त करने के लिए काव्य गुण का परित्याग करना पड़ता है. कविता को जांचने के लिए इस प्रतिमान बिराऊ प्रतिमान की भी उपेक्षा नहीं की जा सकती .


और अंत में.....जो लोग इस कविता में प्रयुक्त अंग्रेज़ी को लेकर विपत्तिग्रस्त हैं वे पहचान के संकट से आलोड़ित हैं और निरर्थ मिली ताकत से भ्रमित.
_________ 

d.pm@hotmail.com



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  1. Bilkul sach hai..sir..aapki kavitaye naitik pratirodh ke roop mein darz hoti hain..yah kavitaa maine bhi jalsaa patrika mei aur kavitaon ke saath padhi thi..ek aur kavitaa bhaasha ki panktiyan hai..ek bhaasha mei kyon nahin bol paata puraa sach...kyon nahi ho paata main asahamat..kavitaa mei kyon hai satta sukh..

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  2. मंगलेश डबराल5 मई 2018, 6:49:00 pm

    मेरे ख़याल से समस्या यह है कि कोई भी कविता जब किसी एकल या विशिष्ट सत्य-तथ्य की पड़ताल करती है तो वह विशिष्ट नहीं रहता बल्कि सामान्यीकृत हो जाता.है. लगभग सारी सत्यों-तथ्यों का प्रातिन्धिक रूप. यह सिनेमा में भी होता है,जहां एक पेड़ सारे पेड़ों का बिंब बन जाता है. एक आत्यंतिक स्थिति. तो क्या तमाम एनजीओ ऐसे ही होते हैं जैसे इस कविता में हैं. ज़्यादातर एनजीओ पतित और खाऊ हैं बेशक, लेकिन सभी नहीं.

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  3. बेनामी5 मई 2018, 8:17:00 pm

    कविता के अंतःकरण में जो लड़की है वह भी किसी सामान्यीकरण का नतीजा है। कास्टिंग काउच सिंड्रोम से कविता निकल रही है। कविता क्या इवॉल्व कर रही है? हालातों की बखिया उधेड़ने से हालात बदल नहीं जाते।

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  4. देवी प्रसाद मिश्र एक 'उम्दा' कवि हैं अौर उन्हें हमेशा 'उम्दा' कविता ही लिखना चाहिए अौर 'मांग अौर अापूर्ति' के 'दुर्निवार' नियम को अपने ऊपर 'अायद' कर लेना चाहिए, एक उपभोक्तावादी मांग है। यह कहा जा रहा है -- अौर कहने वाले अकेले विष्णु खरे ही नहीं हैं-- कि कवि की अपनी नागरिकता अौर वैचारिक अस्मिता पाठक/उपभोक्ता की संप्रभुता के दायरे में ही परिभाषित हो, उसके बाहर नहीं। यह भी अपेक्षा रखी जा रही है कि कविता में जो विषय उठाया जाए उस के साथ न्याय ज़रूर हो। ज़ाहिर है कविता जैसी भी है, उसमें जो कहा गया है, बहुतों को पसंद नहीं अाया है।

    मुझे ख़ुशी है कि देवी की इस कविता में न उम्दगी पैदा करने की कोशिश है, न रसिकजन की गुणवत्ता की प्यासी अात्मा को तृप्त करने पर ध्यान दिया गया है, अौर न ही यह तराज़ू हाथ में लेकर विषय के साथ न्याय करने के फेर में पड़ी है। अच्छा है, क्योंकि जैसी भी इसकी हस्ती है अौर जो थोड़ी बहुत जान इसमें है, इसी वजह से है। इस तरह के उल्लंघन अौर काव्योचित अन्याय ने ही इस कविता को बचाया है।

    कवि का काम 'न्याय' करना नहीं है। है तो यह अालोचक का भी नही, पर अालोचकगण इस ख़ुशफ़हमी में रहते हैं कि वह न्याय करते हैं अौर उन्हें न्याय करना चाहिए। तो वे करे। वैसे अक्सर अपने समय के निकृष्टतम दुराग्रहों अौर जकड़बंदियों को ढोने वाले लोग अालोचना ही के इलाक़े में पाये जाते हैं।

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  5. रोना तो यही है कि जान ज्यादा नहीं है. इसकी वजह यह है कि यह कुछ स्टीरियोटाइप्स को अपनी नींव में रखे हुए है.

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    1. पता नहीं मुझे क्यों जान दिखती है इस में . ? देवी प्रसाद मिश्र को मै परसनली नहीं जानता . उन की शैली मुझे अपील करती है . गज़ब की पठनीयता होती है इस में . और ठोस यथार्थ के बिंब होते हैं .


      " स्टीरियोटाइप को नींव मे रखे हुए "

      इस का अर्थ नहीं समझ सका सर .

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  6. यह कविता देखने में मामूली लगती है। इसका यह मामूलीपन ही इसकी खासियत है। मुझे तो पढ़ने के बाद लगा कि इस विषय को इसी तरह लिखा जा सकता था। हमें आस्वाद को बदलना भी चाहिए।

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  7. अपने प्रिय कवियों से और मित्रों से इस मसले पर मतभेद रखते हुए मेरा यह दृढ़ता से मानना है कि 'सेवादार' देवी प्रसाद की एक महत्वपूर्ण कविता है I मैं इसे 'महत्वपूर्ण' ही कहूंगी, क्योकि समकालीन कविता पर जब 'महान' और 'कालजयी' का लेबल चस्पां किया जाता है तो अक्सर समय इस उपक्रम को हास्यास्पद ही सिद्ध करता आया है I पहली बात तो यह कि यह कविता भारत और तीसरी दुनिया के सभी देशों में सक्रिय साम्राज्यवादी और देशी पूंजीपतियों और सरकारों द्वारा वित्तपोषित एन.जी.ओ. की संस्कृति को देवी की अपनी विशिष्ट शैली में अनावृत्त करती है और सिर्फ इतना ही नहीं करती, बल्कि कविता के सहज प्रवाह और मिजाज़ को बरक़रार रखते हुए उनकी राजनीति ( गरीबों के कथित कल्याण की कुलीन चिंताएं, एन.जी.ओ. फंडिंग के स्रोत आदि...) को भी पाठक की निगाहों के सामने उघाड़ती चलती है I यहाँ देवी जिसतरह कविता की सहज अंतर्लय और प्रवाह को कायम रखते हुए अपनी अचूक राजनीतिक लक्ष्यभेदी दृष्टि का परिचय देते हैं, वह हिन्दी कवियों में विरल ही दीखता है I मुझे बेहद आश्चर्य होता है कि इस कविता की नीव में मंगलेश को कहाँ से कुछ स्टीरियोटाइप्स दीख जाते हैं I यह कविता हिन्दी के उन मार्क्सवादी कवियों के रूढ़िबद्ध, अश्मीभूत खांचो-सांचों को तोड़ने का भी काम करती है जिन्होंने "मानव-कल्याणवाद",करुणावाद और "दया-धर्मवाद" को या तो मार्क्सवाद का समानार्थी बना दिया है, या फिर इन चीज़ों से मार्क्सवाद को विस्थापित कर दिया है I हिन्दी कविता में करुणा और भावाकुलता भरे आख्यानों, शिल्पगत चौंक-चमत्कारों, नौस्टेल्जिया और लोकरागात्मकता पर आह-वाह करने की जो आदत विकसित की गयी है, उस माहौल में देवीप्रसाद की इस कविता की सहजता, मामूलीपन और मजाकिया अंदाज़ के पीछे छिपी विचार-संपन्न आलोचनात्मक दृष्टि को पकड़ पाने में लोगों को यदि दिक्क़त हो रही है तो इसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं है I मंगलेश का मानना है कि यह कविता एन.जी.ओ. के बारे में प्रतिनिधिक यथार्थ का बयान नहीं करती, क्योंकि कुछ एन.जी.ओ. ऐसे भी हैं जो ईमानदारी से काम करते हैं I पहली बात तो यह कि प्रातिनिधिक यथार्थ सार्विक यथार्थ नहीं होता, वह आम परिदृश्य को प्रस्तुत करता है I दूसरी बात, अपवादस्वरूप यदि कुछ एन.जी.ओ. ईमानदारी से भी काम करते हैं तो इससे उनकी राजनीति सही नहीं हो जाती I एन.जी.ओ. चाहे ईमानदार हों या भ्रष्ट,खाऊ-कमाऊ, सभी सुधारवाद की पैबंदसाज़ी के द्वारा जनता की वर्ग-चेतना को कुंद करते हैं, इस व्यवस्था के दामन पर लगे खून और गन्दगी के दागों को तरह-तरह के डिटर्जेन्ट्स से धोने का काम करते हैं I वैसे आज ज्यादातर एन.जी.ओ. भ्रष्टाचार-व्यभिचार के अड्डे ही बन चुके हैं, जिनमें रिटायरड इक़लाबी लोग अपनी सेवाएँ दे रहे हैं I एन.जी.ओ. के राजनीतिक कुचक्र पर जेम्स पेत्रास, हेनरी वेल्तमेयर, जोन रोयलोव्स आदि दर्ज़नों अध्येताओं ने काफी कुछ लिखा है I मंगलेश ने अगर अबतक न पढ़ा हो तो ज़रूर पढ़ लेना चाहिए I बहरहाल, गुज़रे दस वर्षों की महत्वपूर्ण पचास कविताएँ अगर मुझसे कोई चुनने को कहे तो मैं उनमें अकेले देवी प्रसाद की ही कम से कम पन्द्रह कविताओं को शामिल करूंगी और उनमें 'सेवादार' कविता भी निश्चित शामिल होगी

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    1. इस से मुझे खुशी होगी. माने , मेरी पसंद की कविता एकनॉलिज हो ने से .

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  8. मैं एक हद तक आपसे सहमत हूँ. मैं आपके सुझाए आलेखों को भी पढूंगा. लेकिन आप मुझे आप मुझे तीस्ता सेतलवाड के संगठन, और ग्रीनपीस आदि के बारे में अपना रुख बताएं. ये दोनों एनजीओ हैं. और इस देश की फासिस्ट सरकार दोनों को नष्ट करने पर आमादा है..और हमारे उत्तराखंड का बीज बचाओ आंदोलन को भी, जो एमएनसी बीजों के खिलाफ लंबे समय से संघर्ष कर रहा है और कुछ कामयाब भी रहा है. एक मार्क्सवादी होने के नाते मैं यह मानता हूँ कि सभी व्यक्तिपरक सत्यों का एक वस्तुपरक सत्य होता है और एकल घटना दरअसल

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  9. to Mangalesh Dabral इस व्यवस्था के तमाम अंदरूनी अंतरविरोध हैं I बीज और पर्यावरण बचाने के तमाम आन्दोलन पूँजीवाद के अंतर्गत बीज और पर्यावरण तो नहीं बचा सकते, हाँ, पूंजीवादी व्यवस्था के प्रति भ्रम ज़रूर पैदा करते हैं I दूसरे, ये इस व्यवस्था को अन्दर से प्रतिसंतुलित करते रहने वाले अंदरूनी मेकेनिज्म का और सेफ्टीवोल्व का काम करते हैं I बुर्जुआ सिस्टम के भीतर बुर्जुआ जनवाद को बचाने के लिए कुछ एन.जी.ओ. एक प्रति-संतुलनकारी शक्ति के रूप में अवश्य काम करते हैं I एक ओर फासिज्म के खिलाफ वे टैक्टिकल मित्र होते हैं, दूसरी तरफ वे बुर्जुआ सिस्टम के प्रति विभ्रम पैदा करते हैं और उसकी तीसरी सुरक्षा-पंक्ति का काम करते हैं I एक बात और स्पष्ट कर दूं, मैं जब एन.जी.ओ. की बात कर रही हूँ तो मेरा मतलब केवल उन गैर-सरकारी संस्थाओं से है जो देशी-विदेशी पूँजी या सरकारों द्वारा वित्तपोषित हैं I जो गैर-सरकारी संस्थाएं जनता से अपने संसाधन जुटाती हैं, उनकी राजनीति ग़लत हो सकती है पर हम उन्हें साम्राज्यवाद या सिस्टम के एजेंट की संज्ञा नहीं दे सकते I

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  10. to Katyayani - please be specific and not theoritical as there are a number of theories in marxism including those of roza lauxemberg and georgy dimitrov and leibknekht, and so many. i asked you about teesta ngo and greenpeace.

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  11. मंगलेशजी, मैं अमूर्त थियरी की बात न करके पैमाने की बात कर रही हूँ, यह ठोस बात है जिसे आप ग्रीन पीस और तीस्ता के संगठन पर भी लागू कर सकते थे I पर आप मुझसे ही सुनना चाहते हैं तो सुन लीजिये I फासिज्म के ख़िलाफ़, बुर्जुआ जनवाद की पक्षधर होने के नाते तीस्ता आवाज़ उठाती हैं और उस हद तक हम उनके साथ हैं, पर उनकी संस्था यदि विदेशी या सरकारी या किसी देशी पूंजीपति से फंडिंग लेती है तो वह बुर्जुआ जनवाद की चौहद्दियों की हिफाजत करने के लिए प्रतिबद्ध है, इस सिस्टम की चौकीदार है और हम इस रूप में उसके विरोधी हैं I ग्रीनपीस को फासिस्ट ख़तम करना चाहते हैं, यह एक दीगर बात है, पर उसकी बीज और पर्यावरण बचने की राजनीति भी विदेशी वित्त-पोषित सुधारवादी राजनीति है जो पूँजी-कृत असंतुलनों को इसी व्यवस्था के भीतर दूर करने वाली प्रति-संतुलनकारी शक्ति के रूप में काम करती है, अतः हम उसके विरोधी हैं I बहुत सारे ऐसे संगठन हो सकते हैं, जिनका हम बुर्जुआ जनवाद की हिफाजत के सीमित उद्देश्य तक तो साथ दें, पर सामान्य और व्यापक स्तर पर उनकी राजनीति का विरोध करें I

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  12. एक बात और I इस प्रश्न पर अड़कर मेरे मूल तर्क को दृष्टि-ओझल न किया जाये I मेरा कहना है कि प्रतिनिधिक यथार्थ सार्विक यथार्थ नहीं होता, वह आम परिदृश्य को प्रस्तुत करता है और देवी की कविता ने अत्यंत कुशल और मारक ढंग से एन.जी.ओ. की संस्कृति और राजनीति के मर्म को उद्घाटित किया है I

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    1. यही शायद अपेक्षित भी रहता है गद्य कविताओं से

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  13. यह सही है कि मार्क्सवाद में कई सिद्धांत हैं, पर मूल प्रश्नों पर कोई व्यक्ति अपने अध्ययन-मनन और अपनी समझ से किसी एक ही सिद्धांत को सही मानता है और उसे अपने विश्लेषण की दृष्टि और उपकरण के रूप में इस्तेमाल करता है Iअलग-अलग नतीजे कई बार अलग-अलग सिद्धांतों के टकराव की अभिव्यक्ति होते हैं और कई बार वे एक ही सिद्धांत को सही और ग़लत ढंग से अमल में लाने से पैदा होते हैं I सिद्धांतों की बहुलता हो सकती है, पर सिद्धांत में हम बहुलतावादी नहीं हो सकते I और हाँ, रोज़ा, लीब्कनेख्त और दिमित्रोफ़ के मूल सिद्धांतों में कोई अंतर नहीं था, उनके कुछ उपप्रमेयों और निष्पत्तियों में ज़रूर था I

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  14. फासिस्ट अगर ग्रीनपीस और तीस्ता के एन.जी.ओ. के पीछे पड़े हैं तो इसलिए कि वे बुर्जुआ जनवाद को नष्ट करने के लिए उसके भीतर की सभी प्रति-संतुलनकारी शक्तियों को, उनके पूरे मेकेनिज्म को ध्वस्त कर देना चाहते हैं I इस सीमा तक तीस्ता या ग्रीनपीस के साथ खड़े होने का मतलब यह कत्तई नहीं हो सकता कि हम उनकी पूरी राजनीति के साथ हैं I

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  15. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल सोमवार (07-05-2017) को "मिला नहीं है ठौर ठिकाना" (चर्चा अंक-2963) पर भी होगी।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    राधा तिवारी

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  16. मैंने इस कविता का लम्बा-सा मूल-पाठ विश्लेषण शुरू कर दिया था लेकिन कात्यायनी के लगातार बॉम्बिंग रेड्स के बाद मामला 'scorched earth' में तब्दील हो गया.
    लेकिन यह ज़रूर कहना होगा कि यह कविता इसलिए भी संदिग्ध और आपत्तिजनक है कि मूलतः वह pathalogically स्त्री-विरोधी है और संजीवनी को एक भावी महँगी,बड़े पैकेज वाले casting couch पर स्वेच्छा से बिछ-बिछ जाने वाली slut दिखाने पर आमादा है.इस लिहाज़ से यह पोर्नोग्राफी-उन्मुख है.
    समझना कठिन है कि किन कारणों से हमारी अन्यथा कुशाग्र और vigilant कवयित्रियों ने कविता के इस केन्द्रीय पहलू को देखने में कोताही बरती है.

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    1. स्त्री विरोध नहीं है , क्योंकि यहाँ 13 पैसे प्रतिदिन कमाती आदिवासी स्त्रियां भी हैं . इसे पोर्न से जोड़ना तो बनता ही नहीं है . यह जो संजीवनी सूरी है , उच्च मध्यवर्गीय दोगली नैतिकता और आभिजात्य धन लोलुपता का वर्ग प्रतीक है . न कि सम्पूर्ण स्त्रीत्व का 😡

      खरे सर,यह फेयर नहीं है । आप एक जिम्मेदार आलोचक हो. 🙏🏽

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  17. मेरी जानकारी के अनुसार बीज बचाओ कोइ एन जी ओ नहीं है।ये एक अभियान था जिसको चलने वाले लोगों के हालात से शायद बहुत कम लोग परिचित होंगे।ये सब सर्वोदय से जुड़े लोग हैं।जिनमे से विजय जड़धारी और धूम सिंह नेगी से कोइ कभी भी जा कर मिल सकते हैं।कुंवर प्रसून बहुत बीमारी के बाद अनजाने से चल दिए। मुझे हमेशा लगता है की हमारे समाज और उसके केंद्र में रहने वाले लोगों को कभी इतना सलीका आया ही नहीं की वे उन लोगों के अंत को थोडा सिखड़ बना सकर जिन्होंने अपने आस पास की बेहतरी के लिए पूरी जिंदगी गुज़री होती है।मेरी बात को सुधारवादी और बेसमझी बेअक्ली माना जायेगा।फिर भी कहने का मन हुआ।

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  18. जब आप किसी कविता को ख़ारिज करने पर तूल जाते हैं या कि उसे महत्वपूर्ण साबित करने का नज़रिया अपनाते है, तो यह कवि से कहीं अधिक कविता की ताकत का रण-क्षेत्र होता हैं कवि तो महज़ निमित्त बना रहता है। अच्छा कहो या बुरा उसे कोई फ़र्क नहीं पड़ता। देवी प्रसाद मिश्र पाठकों के लिए कविता लिख चुके हैं अब लेखक-मित्र टिप्पणियाँ टीप रहे हैं। उनका हक़ है और आपके प्रति प्यार भी। मेरी मानें तो इसमें खुद कवि को बीच-बचाव की आवश्यकता नहीं है।

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  19. राजेश सिंह8 मई 2018, 4:56:00 pm

    इस अंक में शामिल पेंटिग बहुत कुछ कहती है।

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  20. रवींद्र त्रिपाठी10 मई 2018, 1:02:00 pm

    मित्र Arun Dev के संपादन में निकलनेवाली वेब पत्रिका `समालोचन' में इन दिनों कवि देवीप्रसाद मिश्र की कविता `सेवादार' पर एक बहस चल रही है। देवी प्रसाद मिश्र हिंदी के एक बेहतरीन कवि और कथाकार हैं। लेकिन जो बात मैं लिखने जा रहा हूं वह उनकी कविता पर नहीं बल्कि उनकी कविता पर हो रही बहस के बारे में है।कई बार व्याख्या या व्याखाएं मूल रचना से ज्यादा समस्यामूलक हो जाती है। मेरे खयाल से यहां ऐसा ही हो रहा है।
    इन व्याख्याओं में मूल बात एनजीओ सेक्टर पर सिमट कर रह गई है। एक कवि ने एनजीओ सेक्टर को लेकर कविता लिख दी। उसे ये रचनात्मक आजादी है कि क्या लिखे और किस विषय पर लिखे। पर जब उस कविता पर सारी बहस इस बात पर सिमट जाए कि एनजीओ सेक्टर कितनी समाजविरोधी (बेशक यहां सरलीकरण किया जा रहा है) है तो ये उस व्यापक बहस से जुड़ जाती है जो राजनीतिक विमर्श की तरफ जाती है।
    एक बड़ा बौद्धिक वर्ग है जो ये मानता है कि एनजीओ सेक्टर पूंजीवाद का समर्थक है। इस मान्यता के कई संस्करण है। इस धारणा वाले लोग ईमानदार भी होते हैं। लेकिन बात ईमानदारी की नहीं समझदारी की है। यानी राजनैतिक समझदारी की।
    चीजों को कई बार तुलनात्मक ढंग से समझना पड़ता है। ये सही है कि एनजीओ सेक्टर में बहुत भ्रष्टाचार भी है। कई व्यावसायिक हितों वाली कंपनियां भी अपने हितों के लिए एनजीओ चलाती है और उनके उद्देश्य जनकल्याण नहीं बल्कि कंपनियों के हितों का संरक्षण होता है। पर सााथ ही ये भी सही है कि राजसत्ता या स्टेट जितना अमानवीय हो जाती है उतना कोई एनजीओ नहीं होता है। दुनिया का इतिहास, और मुख्यरूप से हालिया राष्ट्रराज्य का इतिहास यही बताता है कि राज्यसत्ताएं बेहद क्रूर और अमानवीय होती रही है और आज भी इसकी मिसालें दुनिया भर में है। ऐसी राज्यसत्ताओं के खिलाफ आवाज उठानेवाले एनजीओ भी हैं।
    कई बार मार्क्सवादी कहे जानेवाले लोग या एक्टिविस्ट भी एनजीओ सेक्टर के खिलाफ बोलते रहे हैं। ऐसा करना कुछ गलत भी नहीं है। लेकिन तस्वीर का दूसरा पहलू ये भी है इनमें से कुछ ऐसे भी होते हैं किसी आततायी राज्यसत्ता के खिलाफ अपनी राज्यसत्ता की स्थापना ही समस्याओं का निराकरण मानते हैं। ऐसे में ये बात भी भुला दी जाती है कि `अपनी' कही जानेवाली राज्यसत्ताएं भी क्रूर हो जाती है। उतनी कि किसी एनजीओ के उस तरह क्रूर होने के उदाहरण नहीं मिलते।
    फिर से कह दूं कि देवी प्रसाद मिश्र की कविता से मुझे कोई एतराज नहीं है। एक कवि अपनी भावनाएं और विचार किसी बड़े राजनैतिक विमर्श के संदर्भ में ही रखे ये जरूरी। वह किसी लघु विमर्श पर भी कविता लिख सकता है। आखिर दुनिया को हर अंदाज में देखा जाना चाहिए।
    मेरी आपत्ति इस बात पर है एनजीओ संबंधित विमर्श में राज्य और राजनैतिक दलों की क्रूरता के इतिहास को भूला जा रहा है।

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  21. मिथिलेश श्रीवास्तव11 मई 2018, 1:23:00 pm

    कविता की दो ही श्रेणियां हो सकती हैं -अच्छी कविता या ख़राब कविता | हम अपने समय की अच्छी कविताओं से अपना सरोकार रखते हैं | अच्छी कविताओं के बारे में यह कहना कि उन्हें प्रकाशित होने से रोकना चाहिए सरासर बेमानी है | देवी एक अच्छे कवि हैं और उनकी कविताएं जिनका ज़िक्र इस लेख के संदर्भ में हुआ है, अच्छी कविताएं हैं | सेवादार कविता में देवी ने हमारे समय के एक जटिल विषय को उठाया है और उस जटिलता को अपनी कविता में वहां ले गए हैं जहां हम इस व्यवस्था को हम कोसते हैं और बेबस हो जाते हैं | कविता और क्या करती है? हमारी कुंद चेतना को क्रियाशील करती है | मुझे यह कविता अच्छी लगी | श्रोत्रिय जी को भी धन्यवाद |

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  22. हिंदी में (ज)हालत यह हो चुकी है कि आप कितना भी साफ़ लिख दें - मतिमंद या कुटिल दिमाग़ वही पढ़ेगा जो वह पढ़ना और विकृत करना चाहता है.मैं स्पष्ट कह रहा हूँ ''उन कविताओं को हर स्तर पर रोका जाना चाहिए जो देवीप्रसाद जैसे बड़े रचनाकार के मर्तबे से कमतर हो सकती है.''
    मैं देवीप्रसाद का तब से प्रशंसक हूँ जब वह और भी ज़्यादा युवा थे .उनकी और उस स्तर के कई रचनाकारों की कविताओं में स्वयं को एक stakeholder समझता हूँ.लेकिन मैं उनकी ''सेवादार'' से बहुत निराश हूँ कि उसमें एक अभागी युवती को लेकर सिर्फ़ घृणा और तिरस्कार है,उसकी वैसी ज़िन्दगी को समझने की कोई कोशिश नहीं है.मैं अभी-अभी समझ नहीं पा रहा हूँ कि देवीप्रसाद से ऐसी reactionary और cliche कविता संभव कैसे हुई.

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  23. देवी प्रसाद मिश्र की कविता पर विवाद का दायरा बढ़ रहा है. अब यह हिंदी से निकलकर मराठी तक पहुँच गया है. कविता का मराठी अनुवाद - कविता महाजन ने किया है.
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    देवीप्रसाद मिश्र यांच्या एका कवितेवर हिंदीत चांगली 'घमासान' चर्चा सुरू आहे. काल मी लिहिलेली पोस्ट ती चर्चा वाचून मनात आलेला विचार मांडणारी होती. हिंदीतल्या चर्चेचे मुद्दे दोन आहेत : १. स्वयंसेवी संस्थांचं अर्थकारण आणि २. स्त्रियांनी आर्थिक फायदे वा पदोन्नतीसाठी स्वत:च्या शरीराचा 'वापर' करणे.
    कालच्या पोस्टमध्ये अनेकांना संदर्भच माहीत नसल्याने अपेक्षित असलेली चर्चा झाली नाही, हे जाणवलं. थोडक्यात, आपल्या आसपासच्या भाषांमध्ये काय चाललं आहे, याचा आपल्याला अनेकदा पत्ताच नसतो, हेही जाणवलं. असो. तर त्या कवितेचा अनुवाद देते आहे; आता 'नेमकी' चर्चा होऊ शकेल. व्हावी ही अपेक्षा. :-)
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    या मुलीनं जी बसलीये कारमध्ये
    सेवेचं व्रत अवलंबलंय सुरवातीपास्नच तिच्यात सेवेचा
    भाव होता जो पाहून आईवडलांनी तिला
    दिल्ली विद्यापीठातून सोशल वर्कमध्ये एमए करवलं
    खेरीज तिनं एमफिल केलं या विषयात की हरियाणात
    मुलींची संख्या कमी का होतेय

    संजीवनी सुरी कारमध्ये बसली होती
    आणि तिचे सर तिला सोडायला आले होते
    मीटिंग खूप लांबली होती उशिरापर्यंत म्हणून

    जीके टू मध्ये एका घरासमोर कार थांबली तेव्हा
    सर म्हणाले की आता १० लाखांच्या पॅकेजवर
    काम सुरू कर नंतरचं नंतर पाहू तेव्हा संजीवनी म्हणाली
    सर तसं तर ठीक आहे पण थोडं कमी आहे तेव्हा सर हसत
    म्हणाले की थोडं कमी तर नेहमीच असलं पाहिजे

    संजीवनी म्हणाली, सर घरात आत या ना
    आईला भेटा. बाबा गेल्यापासून
    शी इज डेड अलोन. सर म्हणाले ओह.
    बट कीप इट द नेक्स्ट टाईम. संजीवनी म्हणाली की
    सर तुम्ही आत तर येत नाहीयेत पण माझ्या कुत्र्याला
    तरी अवश्य भेटाच. शी इज जर्मन शेफर्ड. प्लीज सर.
    सर म्हणाले की ते अवश्य येतील एखाद्या दिवशी. मग त्यांनी संजीवनीला
    आठवण करून दिली की तिनं खरिआर – हाऊ टेरिबल द प्रोननसिएशन इज –
    खरिआर जिल्ह्यातल्या दहा गावांमधल्या बायकांच्या सरासरी
    मजुरीवर रिपोर्ट तयार करावा तेव्हा संजीवनीनं सुस्कारा सोडत म्हटलं की
    सर एका बाईला सर्वसाधारणत: महिन्याचे तेरा रुपये मिळतात -
    एका दिवसाचे चाळीस पैसे
    सर म्हणाले की आपण काय करू शकतो केवळ अहवालच
    लिहून पाठवू शकतो आणि जोवर तो पाठवला जात नाही
    वर्ल्ड बँकेकडून पुढचे सहासष्ट लाख रिलीज नाहीत होणार


    करेन, सर, करेन म्हणत संजीवनीनं कुत्र्याला जवळ घेतलं
    आणि सर निघून गेले. सिली गर्ल, यू आर सच अ रॅविशिंग स्टफ असं काहीसं
    म्हणत, जे कदाचित ऐकू गेलं असतं
    तर संजीवनी सूरी, का आहे इतका फरक अशी भयंकर स्त्री विरोधी गोष्ट सांगण्यात
    की स्त्रियांसाठी काम करणाऱ्या त्या संस्थेला मिळणारी वार्षिक तीन
    कोटींची युरोपीय ग्रँट बंद होऊन जाईल.
    ०००

    ( मूळ कविता : देवीप्रसाद मिश्र, अनुवाद : कविता महाजन )
    या कवितेच्या संदर्भात कवी देवीप्रसाद मिश्र यांचं भाष्य आणि त्यावर सुरू असलेली उत्तम चर्चा वाचण्यासाठी 'समालोचन'ची लिंक पहिल्या कॉमेंटमध्ये आहे.

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  24. बड़ी सार्थक बहस है। बहुत धुंधले चित्र साफ हो रहे हैं, साथ ही समसामयिक विषयों पर हमारे समय के साहित्यकारों की राय जानकर उनके एजेंडे भो दिखाई पड़ रहे हैं। बड़ी बात ये कि अब ये बहस हिंदी के गलियारे से निकल कर मराठी भाषा मे भी पहुंच रही हैं।

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