भाष्य : मुक्तिबोध : अन्तः करण का आयतन : शिव किशोर तिवारी

Posted by arun dev on अप्रैल 16, 2018




शिव किशोर तिवारी (१६ अप्रैल १९४७) का कविता की दुनिया में आगमन किसी घटना की तरह अचानक से हुआ है. इलाहाबाद विश्वविद्यालय से हिंदी में एम. ए. करने के बाद साहित्य से उनका लगाव  सामने नहीं आया था.  अब जब वह सामने है तो लगता है कि इन बीच के वर्षों में वह हिंदी, असमिया, बंगला, संस्कृत, अंग्रेजी, सिलहटी और भोजपुरी की कविताओं की दुनिया में भूमिगत होकर रमें हुए थे.
  
कविताओं के अनुवाद, उनकी व्याख्याएं और आलोचना  के उनके उद्यम ने उन्हें आज आवश्यक बना दिया है. समालोचन पर ही आपने बंगला, असमिया आदि भाषाओं से हिन्दी में  उनके महत्वपूर्ण अनुवाद पढ़े हैं. निराला की कविता पर उनकी व्याख्या पढ़ी है. आज मुक्तिबोध की कविता अन्तः करण का आयतनपर उनका  यह आलेख आपके लिए प्रस्तुत है.

आज शिव किशोर तिवारी का  जन्म दिन है. अब वह ७१ साल के हो गए हैं.
समालोचन के पाठकों की तरफ से जन्म दिन की बहुत- बहुत बधाई.
लेख पर आपकी प्रतिक्रियाओं की प्रतीक्षा है. 






कविता से होकर : अन्तः करण का आयतन
शिव किशोर तिवारी







मुक्तिबोध की कविता ‘अंत:करण का आयतन’ मार्च 1960 में प्रकाशित हुई. तब तक मुक्तिबोध राजनाद गाँव आ चुके थे जहाँ उन्हें अध्यापक की नौकरी मिल गई थी. जीवन में आपेक्षिक स्थिरता आ गई थी. उसी वर्ष फरवरी में उनका लेख ‘नई कविता का आत्मसंघर्ष’ छपा. कविता और लेख दोनों में एक आश्वस्ति झलकती है. कवि अपने क्राफ्ट, अपने मिशन के बारे में आराम से सोच रहा है. पिछले दिनों का अनिश्चय, “अनवस्था” समाप्त न भी हों तो बहुत कम हो गए हैं.

1955 में अज्ञेय ने एक कविता लिखी, ‘जितना तुम्हारा सच है’. अपने लेख में इसकी एक पंक्ति को मुक्तिबोध बिना  कवि का नाम लिए कोष्ठकों में उद्धृत करते हैं –
तुम नहीं व्याप सकते, तुममें जो व्यापा है उसी को निबाहो. स्वभावगत तटस्थ बेबाकी से वे इस पंक्ति के स्रोत को जड़ीभूत सौंदर्याभिरुचि का नाम देते हैं और एक वैकल्पिक सौंदर्यशास्त्र का प्रस्ताव करते हैं.  ‘अंत:करण का आयतन’ इस विकल्प को तलाशती कविता है. मानो अज्ञेय की पंक्ति के जवाब में वह शुरू में ही कहती है - “यह छाँह मेरी सर्वगामी है”.

कविता को समझने के लिए बार-बार लेख की ओर लौटना पड़ेगा. (आगे शीर्षक न देकर ‘कविता’ और ‘लेख’ शब्द इस्तेमाल हुए हैं.)





सार-संक्षेप


मुक्तिबोध की बहुत सी कविताओं की तरह यह कविता भी दृश्यों में बँटी है. सुविधा के लिए हम इन दृश्यों को अंकों से निर्दिष्ट कर रहे हैं. कुछ पंक्तियों की भूमिका के बाद किसी फिल्म की तरह दृश्य बदलते जाते हैं. तीन सौ से अधिक पंक्तियों की कविता की भूमिका महज 11 पंक्तियों की है. आरंभ इस बोध के साथ होता है कि कवि की भौतिक-मानसिक सीमाएँ हैं. अपने परिवेश में कैद वह मानव मात्र से, विशेषत: सामान्य जन से, जुड़ने में अपने को असमर्थ पाता है. और स्पष्ट करके कहें तो उसकी विद्या-बुद्धि, संस्कार, मध्यवर्गीय जीवन-शैली आदि साधारण जन से एकात्म होने में बाधक हैं. पर वह कवि है, जिसकी एक “छाँह” है – उसकी सृजनात्मकता, उसकी भावप्रवणता और कल्पनाशीलता, एक शब्द में उसकी कविता. यह छाँह कवि-व्यक्ति की सीमाओं को लाँघ कहीं भी जाने में समर्थ है. वह हवाओं में अपने अकेलेपन से बेचैन घूमती है.  वह श्यामल-अंचला है.

मुक्तिबोध का प्रिय शब्द है श्यामल, साँवला. संदर्भ के अनुसार उसका सुंदर, प्रिय, काम्य, कल्याणकारी आदि कोई भी अर्थ हो सकता है. यहां शायद हरी-भरी धरती का रूपक है. सृजनगर्भा काव्यानुभूति द्वंद्व की चेतना से संपन्न है. यहाँ द्वंद्व की चेतना का अर्थ आभ्यंतर भावनाओं और बाह्यजगत् की मार्मिक चेतना का द्वैत है. यह ठीक मार्क्सवादी द्वंद्व नहीं है यह अगली पंक्ति में ही साफ हो जाता है- “सत्-चित्, वेदना का फूल”. सत् याने बाह्य जगत् का अस्तित्व-बोध और चित् अर्थात् अंतश्चेतना. लेख की ये पंक्तियाँ देखें – 

अतएव आज की कविता किसी न किसी प्रकार से अपने परिवेश के साथ द्वंद्व-स्थिति में उपस्थित होती है, जिसके फलस्वरूप यह आग्रह दुर्निवार हो उठता है कि कवि-हृदय द्वंद्वों का भी अध्ययन करे, अर्थात् वास्तविकता में बौद्धिक दृष्टि द्वारा भी अंत:प्रवेश करे और ऐसी विश्व-दृष्टि का विकास करे जिससे व्यापक जीवन-जगत् की व्याख्या हो सके तथा अंतर्जीवन के भीतर के आंदोलन आर पार फैली हुई वास्तविकता के संदर्भ से व्याख्यात, विश्लेषित और मूल्यांकित हों.






दृश्य 1

छाँह सभी दरवाजों की सांकलें बजाती है पर कोई-कोई दरवाजे नहीं खुलते.
ये स्वार्थ, लोभ, अहम्मन्यता, ठस संस्कृति और आत्मसंतुष्ट विद्वत्ता के दरवाजे हैं. इन घरों के निवासी इस प्रकार की कविता के प्रति अवज्ञा का भाव रखते हैं. पर बचत उनकी भी नहीं है. उनके अवचेतन में कविता अपनी उपस्थिति दर्ज करेगी. उनके सपनों में उनके अनिवार्य भवितव्य की सूचना देगी – स्वप्न के प्रतीकों से- जैसे, आसमान उतर आया नीचे और उन्हें घायल कर गया. नीलाकाश का नीचे उतरना ‘आसमान टूट पड़ना’ मुहावरे का बिंबात्मक रूप हो सकता है. 

“उजाड़ प्रकाश” सपने के भीतर सपने वाली नींद से वे उठ बैठेंगे . उजाड़ प्रकाश का अर्थ यह प्रतीत होता है कि सपने में जहाँ उनकी दुनिया थी वहाँ एक सूना प्रकाश भर दिख रहा है जैसे किसी घर को समूल हटा देने के बाद का चमकीला खालीपन. और तब वे सशंकित सोचते हैं, “ये सत्ता, शक्ति, सभ्यता, संस्कृति, संचित ज्ञान, नियम, आदर्श आदि सभी क्या नवानुभूति की आँधी में उड़ जायेंगे?”

सभ्यता के प्रतापी सूर्य – भूतकाल के ज्ञानी,  विचारक, साहित्यिक- जिनके प्रकाश से परंपरा की दीप्ति है, अब क्षीण हो रहे हैं. जैसे हमारे सूर्य में धब्बे पैदा हो जाते हैं – कमतर ऊर्जा के क्षेत्र- वैसे इनमें भी पैदा हो गये हैं, पर ये धब्बे स्थायी, वर्धमान और विध्वंसक हैं. गिद्धों की तरह वे हमारी मूल्य-दृष्टि पर हमला कर रहे हैं. विखंडनशील सूर्यों से पीली धूल के बगूले उठते हैं. “पीली धूल” शायद तारों की आँधियाँ (स्टेलर विंड्स) है जो बड़े तारों के विनाश की सूचना देती हैं. फिर कविता में “गंदे कागजों का म्यूनिसिपल कचरा” आता है जो संभवतः अप्रासंगिक वाङ्मय का प्रतीक है.

यहाँ से छाँह पहाडों की ऊँचाई पर पहुंचकर वहाँ से नीचे के प्रसारों में चल रहे जीवन-नाट्य का जायजा लेती है.
एक ओर आवश्यक और अवश्यम्भावी विनाश, दूसरी ओर प्रासंगिक और सच्ची संवेदना के रुधिर से रँगा नवविहान. विनष्ट होते “प्रतिबिंबों” और नये बिंबों का गुम्फन और उलझाव बदलते जगत् का चेहरा दिखाते हैं. इसका एक अर्थ यह हो सकता है कि परंपरा से संपूर्ण विच्छेद नहीं है. नया पुराने से संश्लिष्ट हो जाता है. दूसरा अर्थ यह हो सकता है कि परिवर्तन मरणशील परंपरा और जयंती नवीन भावानुभूति के द्वंद्व में दृश्यमान है.बाद में कविता में जो घटित होता है उससे लगता है दूसरा अर्थ ही ठीक है.

यहाँ पहले दृश्य का अंत होता है. मुख्यतः यह अंश कविता की नई भाषा और प्रतिमान के विषय में है पर जीवन के सभी व्यापार इससे जुड़े हुए हैं. कविता के माध्यम से जीवन-दृष्टियों का संघर्ष दिखाया है. नई काव्य-दृष्टि और जीवन-दृष्टि की देह-रचना अगले अंश में.





दृश्य 2


भूमिका में छाँह हवाओं में उड़ती है. इस भाग में वह सागर तरंगों पर चलती है,
“दिशाओं पार” और हलके पाँव. दिशाओं पार तो बोलचाल की जबान हो गई- माने बहुत दूर, हलके पाँव की व्यंजना है कि कविता अपनी उपस्थिति को विज्ञापित नहीं करती क्येंकि वह अधूरी है. उसे अपने प्रियजनों से सीखना है. अंतःप्रेरणा को जन संवेदन से एकात्म करके नई अभिव्यक्ति पानी है. ये प्रियजन कौन हैं? शोषित, वंचित, हाशिए पर पड़े लोग ? यह सोचने का आकर्षण प्रबल है पर कविता के अंतस्साक्ष्यों से प्रमाणित नहीं होता. 

केवल साधारणजनों का उल्लेख हैं (जिनके द्वार खुले हैं). उनको “अजाने प्रियतर” कहा है. इस परिभाषा में वे सभी लोग शामिल हैं जो उच्चभ्रू, वर्गीय संस्कृति से निष्कासित हैं.उनकी एक भाषा है, संस्कृति है, जीवन-बोध है जिसे कवि को ग्रहण करना है ताकि उसकी अभिव्यक्ति पूर्ण हो सके. अभी वह अपनी अंतश्चेतना की पूंजी लेकर निकला है जिसे जनजीवन की चेतना से संश्लिष्ट करके पूर्णता पाने का आग्रह है. सामान्य जन को काव्यानुभूति कई स्तरों पर भेंटती है. सबसे सुंदर और व्यंजनापूर्ण बिम्ब है –

घर में घूमती उनके
लगाती लैंप, उनकी लौ बड़ी करती”.

इसके बाद बिंब थोडे जटिल हो जाते हैं. पहला बिंब प्रियजनों से मुखातिब होने का है. मुखातिब होना एक रहस्यमय प्रक्रिया है. स्पष्ट नहीं है कि छाँह और प्रियजनों का संलाप, चर्चा, वाद-विवाद वास्तविक हैं या किसी रहस्यमय मनोलोक में घटते हैं. पर यह स्पष्ट है कि इस पक्रिया में कवि केवल सीखता नहीं है, अपने “पारिजात भी प्रदान करता है. पारिजात पूजा का फूल है. अपने अनुभवात्मक ज्ञान-संवेदन के रूप में ये फूल कवि लाया है. अपने प्रियतरों के साथ एक विनिमय होता है. यह भी अर्थ हो सकता है कि अपने अनुभव को कवि सामान्य जन के समक्ष नम्रतापूर्वक प्रस्तुत करता है और उनके अनुभव के साथ उसे जोड़कर नए जीवनानुभव और उसकी उपयुक्त अभिव्यक्ति का आविष्कार करता है. दूसरा बिंब एक वृक्ष का है जो सघन छायादार और भव्याशय है. 

भव्याशय माने जिसके नीचे शरण लेने का बहुत स्थान हो. वृक्ष का प्रतीक इतना स्पष्ट नहीं है. कवि की आत्मचेतना और प्रियतरों की जनचेतना के लिए दो चंद्र-रेखाओं का प्रतीक बाद में आता है. ये चंद्ररेखाएँ वृक्ष के नीचे मिलती हैं. वृक्ष कोई ‘कॉमन ग्राउंड’ है – शायद आदर्श या पूर्णता का प्रतीक जिसकी भूमि पर कवि की आत्मचेतना और बाह्य चेतना का संयोग होता है. या एक रहस्यमय भावलोक का प्रतीक जहाँ सर्जनात्मक प्रक्रिया घटित होती है. इस वृक्ष के नीचे हैं दो “नीलतन चंद्ररेखाएँ” – पेड़ के पत्तों से छनकर आती चाँदनी की दो धारियाँ जो एक ही स्रोत से उपजकर अलग हो गईं और फिर मिल रही हैं?

मुझे यह व्याख्या अनावश्यक जटिल लग रही है. मैं समझता हूँ चंद्ररेखायें रहस्यमयी सत्ताओं के बिंब हैं जिनमें एक आत्मचेतना और दूसरी लोकचेतना है जिनका वास्तविक चंद्रकिरणों से मात्र लाक्षणिक संबंध है. ये रेखाएं मिलती हैं; फिर सहसा उनसे भभककर आग निकलती है. आग का प्रतीक अगली पंक्ति में ही स्पष्ट कर दिया है- एक द्वंद्व का निष्कर्ष. यह निष्कर्ष किसी भयंकर बात की तरह पैदा हुआ है. भयंकर बात का अर्थ है आंदोलित करने वाला निष्कर्ष. इसके प्रभाव से रहस्यमय वृक्ष के नीचे तिमिर में समय झरता है -- भूत और वर्तमान के संघर्षण की चिनगारियाँ ? या भविष्य के स्फुलिंग ? अंतश्चेतना और लोकचेतना के द्वंद्व से उपजे निष्कर्ष की ऊष्मा फैल जाती है जिससे ‘छाँह’ मुग्ध और उत्साही हो जाती है. 

वह एक विशिष्ट प्रतिबद्धता का अनुभव करती है, भविष्य की परिकल्पना प्रस्तुत करती है और मुक्तिकामी जनता के साथ चलती है. सामान्य जन के दुख-सुख की सहभागिनी बनती है. छाँह की यात्रा जारी रहती है, विश्वचेतना की अग्नि बाँटती, जिससे अन्य जनों की आत्मचेतना गंभीर, अर्थवान और सक्रिय होती है.

इस दृश्य में सर्जनात्मक प्रक्रिया की यात्रा दिखाई है. पर अंत तक आते-आते जनता के मुक्तिकामी संघर्ष का सामाजिक पक्ष उभर आता है – अन्याय और शोषण से मुक्ति की विश्वचेतना. आत्मचेतना और लोकचेतना के द्वंद्व से कविता उपजती है, यह एक कथ्य है. पर बृहत्तर संदर्भ नवीन विश्वचेतना है जिसमें सामाजिक-आर्थिक समता का संघर्ष शामिल है –

“हृदय में वह किसी के सुलगती रहती
उलझकर, मुक्तिकामी श्याम गहरी भीड में चलती”.

यहाँ कवि की साम्यवादी प्रतिबद्धता की छाया है.





दृश्य 3


दृश्य बदलता है.
अपनी छाँह से हटकर कवि सीधे अपनी बात करता है. इस अंश का आरंभ एक ‘इपिफ़नी’ (आकस्मिक अनुभूति) से होता है - “मैं देखता क्या हूँ...” और तेरह पंक्तियों में कवि अपनी प्रतिबद्धता का निर्भ्रान्त उद्घोष करता है. धरती पर जहाँ भी प्रेम या समर है, आलिंगन है या विवाद, सभी जगह कवि की उपस्थिति है. उपस्थिति ही नहीं, एक अपना पक्ष है. 

धरती के विकासी द्वंद्व-क्रम में कवि एक पक्षधर है. यहाँ द्वंद्व के अर्थ के बार में कोई संशय नहीं है – द्वंद्वात्मक भौतिकवाद का द्वंद्व जो वर्ग-संघर्ष की धुरी पर इतिहास के घूमने का पर्याय है.





दृश्य 4


यह दृश्य और इसके बाद का दृश्य सर्वाधिक नाटकीय हैं. कथ्य से शिल्प को जितना अलग करना संभव है वहाँ तक कह सकते हैं कि कविता के ये दो अंश शिल्प के बारे में हैं. मैं इनको अलग-अलग विश्लेषित कर रहा हूँ क्योंकि यह दृश्य अभिव्यक्ति के संकट के बारे में है और अगला उसके समाधान के बारे में.

दृश्य जनपथ पर चलते लोगों के चित्र से आरंभ होता है.जनपथ सामान्य जनजीवन का प्रतीक है. लोग आ जा रहे हैं, आसमान साफ है, रातों को टिमटिमाती ढिबरियाँ, दिन में चमकीली धूप, चटक रंगों के कपड़ों में स्त्रियाँ, कहीं प्रेम, कहीं वैर – सारे दैनिक व्यापार ग्रामीण परिवेश की याद दिलाते हैं.
 कवि कल्पना करता है कि यह समस्त व्यापार धरती के बजाय किसी नये आकाश के मार्गों पर घट रहा है और उस आकाश से एक रंगधारा बरसकर कवि की छाती भिगो जाती है. 

वर्णित परिदृश्य यथार्थ के बजाय कवि की मनोदशा दर्शाता है. कवि सामान्य जन से एक तादात्म्य अनुभव कर रहा है. ग्राम जीवन का मोहक चित्र इस मन:स्थिति का प्रतिबिंब है. तभी कवि के हृदय में धक्का लगता है, जब उसे भान होता है कि इस नये भावजगत् को अभिव्यक्ति देने में समर्थ शिल्प उसके पास नहीं है. उसके भाषिक संस्कार और जड़ अभिव्यक्ति उसे  “अजंता की गुफाओं में कैद” रखे हुए हैं.

अजंता की गुफाएँ जड़ सौंदर्य-बोध की प्रतीक हैं. अब कवि अपने रचनाशील व्यक्तित्व के भीतर जा उसका एक एक कोना जाँचता है और हैरान होता है कि वहाँ सब कुछ अनुपयोगी, जंग खाया है जो नये काव्यानुभव को प्रतिबिंबित करने में असमर्थ है. चौथे दृश्य के अंत में एक आईने का प्रतीक आता है जो इतना मलिन हो गया है कि कोई तस्वीर उसमें नहीं दिखती .




दृश्य 5


पाँचवें दृश्य का प्रारंभ उन्हीं बंद कमरों और उसी अंधे आईने से होता है. जब कवि परंपरागत शिल्प के मकड़जाल से मुक्त होने के लिए बेचैन है तभी अभिव्यक्ति के बंद कमरों से मधुर संगीत की ध्वनि आती है.
उसी अंधे दर्पण में एक प्रतिभामयी अभिव्यक्ति की लावण्य-मूर्ति प्रकट होती है. भूतकाल में हजारों पीढियों ने बेहतर दुनिया के जो सपने देखे थे उन सपनों की एक परिपाटी इस कबाड़ में छिपी जीवित है. इस बिंब का यह अर्थ ग्रहण नहीं कर सकते कि परंपरा की धूल झाड़कर उसे ग्रहण करना होता है. इसकी चर्चा थोड़ी देर बाद. जब यह मनोरम दृश्य चल रहा है तभी लबादा ओढ़े, मुख ढके एक रहस्यमय आकृति प्रकट होती है. यह आकृति डाँटकर पूछती है, “मुझसे भागते क्यों हो?वह स्पष्ट घोषणा करती है – 

“द्वंद्व का कोई समाधान समन्वयकारी कल्पना में नहीं मिलने वाला. संहार के बिना सर्जन असंभव है. समन्वय झूठ है. स्थापित प्रकाश के स्रोत भंग होंगे और कवि को उन्हें भंग करने में योग देना होगा.

इस तरह परंपरा और नवीनता के समन्वय का कोई संकेत कविता में ढूंढना व्यर्थ है. कवि पूर्ण क्रांति की बात कर रहा है. यहाँ कविता में बडा नाटकीय क्षण उपस्थित होता है. कवि पोशीदा आकृति का आवरण हटा देता है. वह देखकर चकित रह जाता है कि वह वही लावण्यमयी मूर्ति है जो आईने में दिखी थी और जिसका स्वरूप सहस्रों पीढ़ियों के स्वप्नों से निर्मित था. पर यह मूर्ति परंपरा का प्रतीक नहीं है, जो आलिम-फाजिल लोगों द्वारा निर्मित होती है. 


यह सामान्य जन के बेहतर दुनिया के सपनों से निर्मित लोक-परंपरा का संगीत है जो अभिजात परंपरा के रव में दब गया और अब नये कवि के तत्पर कानों को सुनाई दे रहा है.  नये शिल्प का रास्ता अभिजात वर्ग के जड़ सौंदर्य-बोध को नष्ट करके और बहुसंख्य वंचितों के सौंदर्य-बोध को आधुनिक संदर्भ देकर निकलेगा. चूँकि यह सारी उथल पुथल कवि के मन में चल रही है, इसलिए मान लेना पड़ेगा कि सदियों से उपेक्षित जनकेंद्रित सौंदर्य-बोध कवि के अवचेतन में विद्यमान है. (परंतु “हजारों पीढियों ने विश्व का रमणीयतम जो स्वप्न देखा था” यह एक विश्वास या, उससे भी कम, कल्पना की चीज है यह एहसास पाठक को कुछ असहज कर सकता है.)


इस दृश्य का अंत एक विलक्षण और उद्वेगपूर्ण चित्र के साथ होता है. अभिव्यक्ति के आविष्कार के बाद अनेक मनोरम बिंब आते हैं जो इस आविष्कार के उत्सव की तरह हैं. उन्हीं में एक बिंब है –आम्रमंजरी.  स्वप्न जैसा माहौल है जिसमें कवि एक गुच्छा बौर तोड़ लेता है – उल्लास के अतिरेक में नहीं, बल्कि अपना खुद का एक वैशिष्ट्य हासिल करने के लिए. पर उसे बौर में “प्रियजनों” के मुख दिखाई देते है. अपने कृत्य से लज्जित-कुंठित कवि बौर को वापस डाल पर लगा देता है, फिर भी उसके मन में विचार आता है, “उत्पीड़कों के वर्ग से मुझे कभी मुक्ति नहीं मिलेगी क्या ?” कवि उत्पीड़क वर्ग में शामिल नहीं है, पर उनके मूल्यों, संस्कृति, प्रतीकों आदि को इतना आत्मसात कर चुका है कि उनसे मुक्ति असंभव-सी लग रही है. इसीलिए विशिष्टता का लोभ है.

कोई 275 पंक्तियों के बाद कविता वहीं पहुँच जाती है जहाँ से शुरू हुई थी – 

आत्मीयता के योग्य मैं सचमुच नहीं” से शुरू होकर  

“मुझको तोडने की बुरी आदत है
कि क्या उत्पीड़कों के वर्ग से होगी न मेरी मुक्ति”
तक.

इसी विदग्ध, निर्मम, मर्मभेदी आत्मचेतना के कारण कविता मूल्यवान है.





दृश्य 6

यह आशावादी दृश्य है. विशिष्टता के प्रति कवि का आकर्षण देखकर सामान्य अभिव्यक्ति की लावण्य-मूर्ति मुसकराती है. इस स्खलन के कारण वह कवि को और गहरे जान लेती है. अपनी भूल का सुधार कर कवि अपनी पात्रता सिद्ध करता है. उसे धरती से आकाश तक एक संगीत सुनाई देने लगता है. उसकी चेतना द्वंद्व का सहज वहन कर सकती है. शिप्रा नदी के तट पर मंदिर की आरती और उच्चस्वर श्वान-रोदन की परस्पर विरोधी ध्वनियाँ कवि एक साथ ग्रहण कर पाता है. उसकी अंतश्चेतना इस विरोध को समाहित कर पूर्ण अभिव्यक्ति का निर्माण करती है.




दृश्य 7


आशावादी स्वर कायम रहता है. कवि चमत्कृत है कि नये भावबोध और सौंदर्य-बोध की यात्रा तय करने के बाद कविकर्म कितना आसान हो गया है. जीवन के (और अनिवार्यत: काव्य के) प्रश्न अब उद्विग्न नहीं करते. उत्तरों का संधान अब एक ‘एडवेंचर’ है, मंगल ग्रह की यात्रा-सा. कवि अपने को विश्वचेतना के वाहक के रूप में प्रस्तुत करता है और पाठक का आवाहन करता है कि वह नये प्रश्नों के नये उत्तर खोजने के ‘एडवेंचर’ में उसके साथ चले.वह अपने को रथवान सारथी की भूमिका में प्रस्तुत करता है, पाठक जिसका यात्री है.







 कथ्य और संरचना

इतना स्पष्ट कि कविता में एक केंद्रीय विचार है जिसके इर्दगिर्द उसकी संरचना हुई है. लंबी कविता में जो एक ‘नैरेटिव’ तत्त्व होता है वह तो है ही, उसे जोड़ने वाली एक कड़ी भी है. दो शब्दों में यह कड़ी है –‘नया सौंदर्य-बोध’. यह सौंदर्य-बोध कवि की अंतश्चेतना और लोक-चेतना या ‘सामान्य’ के द्वंद्व से पैदा होता है.लेख में मुक्तिबोध इस प्रक्रिया को कविता के औचित्य से जोड़कर देखते हैं – 

“सच तो यह है कि मनुष्य जब काव्य में अपने आप को प्रकट करता है, तब वह केवल आत्म-प्रस्थापना ही नहीं करता, वरन् वह आत्म-औचित्य की स्थापना करता है...इस आत्म-औचित्य की भावना से प्रेरित होकर वह अपने भीतर जो कुछ उसका अपना विशिष्ट है, उसे सामान्य में – उस सामान्य में जिसे वह सामान्य समझता है – इतना अधिक मिला देता है कि उस सामान्य के प्रवाह में बहकर उसका विशिष्ट आमूलाग्र बदल जाता है. और जब वह विशिष्ट सामान्य से घुल-मिलकर रूपांतरित हो जाता है, तब कवि आह्लाद और प्रकाश का अनुभव करता है. 

यह उद्धरण कविता के केंद्रीय विचार को सफाई से प्रस्तुत कर देता है. यहाँ “उस सामान्य से जिसे वह सामान्य समझता है महत्त्वपूर्ण है.




दृश्य 5 की ओर लौटें :

सहस्रों पीढियों ने विश्व का

रमणीयतम जो स्वप्न देखा था
वही,
हाँ, वही
बिलकुल सामने प्रत्यक्ष है !!
मैं देखता क्या हूँ,
अँधेरे आईने ने में सिर उठाती है
प्रतेजस-आनना
प्रतिभामयी मुख-लालिमा
तेजस्विनी लावण्य-श्री
प्रत्यक्ष,
बिलकुल सामने !!

यह नाटक कवि के मन में घटित होता है. सामान्य के इस सौंदर्य-बोध की वस्तु-सत्ता भी हो सकती है,
पर कविता में वह प्रकट होता है कवि की अपनी बुद्धि, भावना और कल्पना के हवाले से.

इस कथ्य को केन्द्र में रखकर कविता का तानाबाना बुना गया है जिसके तीन सूत्र हैं. कविता में ये सूत्र नाटकीय संघर्ष के रूप में आते हैं. पहला सूत्र वह है जिसे लेख में "
तत्त्व के लिए संघर्ष"  कहा गया है. यह कविता का भावपक्ष है. इसका प्रतिफलन कवि की अंतश्चेतना और बाह्य जगत की वास्तविकता के द्वंद्व से होता है. कविता में इस तत्त्व का परिपाक दूसरे दृश्य में होता है—


मेरी छाँह ...
व अपने प्रियतरों के उजलते मुख को
मधुर एकांत में पाकर
किन्हीं संवेदनात्मक ज्ञान-अनुभव के
स्वयं के फूल- ताजे पारिजात- प्रदान करती है;
अचानक मुग्ध आलिंगन,
मनोहर बात, चर्चा, वाद और विवाद
उनका अनुभवात्मक ज्ञान-संवेदन
समूची चेतना की आग
पीती है.
गहन आत्मीय सघनच्छाय
भव्याशय अँधेरे वृक्ष के नीचे
सुगंधित अकेलेपन में,
खड़ी हैं नीलतन दो चंद्र-रेखाएं
स्वयं की चेतनाओं को मिलाती हैं
उनसे भभककर सहसा निकलती आग,
या निष्कर्ष
जिनको देखकर,अनुभूत कर, दोनों चमत्कृत हैं...


दूसरे सूत्र को लेख में  “अभिव्यक्ति को सक्षम बनाने के लिए संघर्ष” का नाम दिया है. कविता में यह दृश्य 4 और 5 में प्रकट होता है. इस बार संघर्ष (वर्गीय अभिजात सौंदर्य-बोध के प्रभाव से) जड़ हो चुकी अभिव्यक्ति और जन-परंपरा से संपृक्त नवीन अभिव्यक्ति के बीच है. यहाँ कवि की दृष्टि स्पष्ट है—




सुकोमल काल्पनिक तल पर
नहीं है द्वंद्व का उत्तर
तुम्हारी स्वप्न-वीथी कर सकेगी क्या.
विना संहार के सर्जन असंभव है;
समन्वय झूठ है...



ऊपर सौंदर्य-बोध से संबंधित जो उद्धरण दृश्य 5 से दिया गया है उससे स्पष्ट है कि कवि एक नये सौंदर्य-बोध से अनुप्राणित प्रक्रिया का प्रस्ताव करता है जिसमें कवि की सृजनशीलता लोक से प्रेरणा ग्रहण कर पूर्ण अभिव्यक्ति का निर्माण करती है.

तीसरा सूत्र कविता में एक “अंडरलायिंग नैरेटिव” की तरह व्याप्त है. इसे लेख में विश्व-दृष्टि-विकास का संघर्ष कहा है. कविता का आरंभ आत्म-संदेह से होता है – 


“अंत:करण का आयतन संक्षिप्त है
आत्मीयता के योग्य मैं सचमुच नहीं”. 



कवि के व्यक्तित्व और उसकी ‘छाँह’ की सर्वगामी होने की प्रवृत्ति के बीच द्वंद्व है.इस विषय में लेख का यह अंश द्रष्टव्य है- 

“किंतु कवि-हृदय फैलना चाहता है, आत्मविस्तार करना चाहता है. फैलने की इस मनोवृत्ति के सक्रिय होते ही उसे मानव-वास्तविकता के मूल मार्मिक पक्ष दिखाई देने लगते हैं. 

यह फैलने की मनोवृत्ति कविता में इस तरह व्यक्त हुई है “यह छाँह मेरी सर्वगामी है”

जैसे-जैसे वर्णन आगे बढ़ता है कवि का आत्मविश्वास बढ़ता है. एक बिंदु पर आकर वह दृप्त घोषणा करता है –

स्नेहाश्लेष या संगर कहीं भी हो
कि धरती के विकासी द्वंद्व-क्रम में एक मेरा पक्ष
मेरा पक्ष नि:संदेह !!



पर आत्म-संदेह प्रबल है. वह फिर लौटता है –

“मुझको तोड़ने की बुरी आदत है
कि क्या उत्पीड़कों के वर्ग से होगी न मेरी मुक्ति”.

तोड़ने की आदत का मतलब है व्यष्टि को समष्टि से अलग करना. कवि व्यक्ति और कवि-हृदय का यह द्वंद्व तीन चौथाई कविता में फैला है. लेख की सरल सैद्धांतिकी कविता के सीधे आत्मावलोकन के सामने नहीं ठहरती. इसी आत्मावलोकन से आगे का रास्ता निकलता है शायद . इस बिंदु पर कविता अस्पष्ट है. आखिरी पंक्तियों में कवि संशय-रहित प्रकट होता है. वह यह भी कहता है कि कविकर्म उसके लिए सहज हो गया है. पर आत्म-संदेह के नष्ट होने का स्पष्ट चित्र नहीं आता. मुझे लगता कि बौद्धिक विश्व-दृष्टि के प्रश्न पर कवि को आत्मविश्वास चाहे हो, उसे आत्मसात् कर पाने की मनोवैज्ञानिक तैयारी पर संदेह रह जाता है जो अन्य कविताओं में भी प्रकट होता है –

उसे देख प्यार उमड़ता है अनायास
लगता है - दरवाजा खोलकर
बाँहों में कस लूँ
घुल जाऊँ मिल जाऊँ लिपटकर उससे.
परंतु, भयानक खड्डे के अँधेरे में आहत
और क्षत-विक्षत मैं पड़ा हुआ हूँ,
शक्ति ही नहीं है कि उठ सकूँ जरा भी
(यह भी तो सही है कि
कमजोरियों से ही मोह है मुझको)
इसीलिए टालता हूँ उस मेरे प्रिय को
कतराता रहता
डरता हूँ उससे.

(अँधेरे में)



विसंवादी स्वर


एक विसंवादी स्वर पहले ही चिह्नित किया गया है – एक संपूर्ण काव्यशास्त्र को असहज करता आत्म-संदेह जो दो स्थलों पर स्पष्ट व्यक्त हुआ है. और जगहों पर यह स्वर इतना स्पष्ट नहीं है पर थोड़ा ध्यान देने से पकड़ में आता है. उदाहरण के लिए ये पंक्तियाँ लेते हैं

“अचानक एक काला स्याह चेहरा प्रकट होता है
विकट हँसता हुआ
अध्यक्ष वह मेरी अँधेरी खाइयों में
कार्यरत कमजोरियों के कार्यरत षड्यंत्र का”.

यहाँ नवीन चेतना को अभिव्यक्ति देने की असमर्थता की चर्चा हो रही है. कवि के अब तक आयत्त भाषिक संस्कार अपर्याप्त हैं. पर साथ-साथ एक संदेह भी है – अपने अंदर पैठी कमजोरियों से मुक्ति कहाँ तक संभव होगी? आगे चलकर जब कवि का सामना लोकोन्मुख सौंदर्य बोध से होता है तो उसकी “रमणीयतम मृदु मूर्ति”


धीमे मुसकराती है
व मुझको, और गहरे और गहरे,
जान जाती है
व किरनें सब जगह यों फैल जाती हैं
कि मैं लज्जित
भयानक रूप से
विद्रूप मैं सचमुच !!


इसी तरह लोक-चेतना के आग्रह के बीच व्यक्ति- चेतना जबरन घुस आती है –

“यह छाँह मेरी सर्वगामी है
हवाओं में अकेली साँवली बेचैन उड़ती है”.

‘अकेली... बेचैन’ का अर्थ शायद यह है कि छाँह अकेलेपन से व्यग्र होकर लोक- संसर्ग खोज रही है. पर ‘अकेली’ का अर्थ यह भी है कि छाँह प्रकृत्या अकेली है, इसलिए बेचैन है. लोक- संसर्ग की कामना प्रबल है,पर अकेलापन एक स्थायी स्थिति है. 
“अपने प्रियतरों के स्वप्न, उनके विचारों की वेदना जीकर” भी छाँव “ भटकती रहती व ज्यादा स्याह होती है”. अभिव्यक्ति के संकट से भी कवि इस तरह सम्मुखीन होता है- 

“सामना करने निपीड़क आत्मचिंता से
अकेले में गया मन”. 

समष्टि कविता का स्थायी भाव है परंतु व्यष्टि संचारी भाव की तरह आती रहती है. तीन और उदाहरण:



1.

कि मेरी छाँह उनको पार कर, भूरे पहाड़ों पर
अचानक खड़ी स्तब्ध
उसके गहन, चिंतनशील नेत्रों में
विदारक क्षोभमय संतप्त जीवन-दृश्य
मैदानी प्रसारों पर क्रमागत तिर रहे से हैं.
(यहाँ छाँह द्रष्टा की भूमिका में है, भागीदार नहीं है.)



2.
मेरी छाँह ...
व अपने प्रियतरों के उजलते मुख को
मधुर एकांत में पाकर
किन्हीं संवेदनात्मक ज्ञान-अनुभव के
स्वयं के फूल- ताजे पारिजात- प्रदान करती है;
अचानक मुग्ध आलिंगन,
मनोहर बात, चर्चा,वाद और विवाद
उनका अनुभवात्मक ज्ञान-संवेदन
समूची चेतना की आग
पीती है.

(यहाँ दो चित्र संवाद की संभावना दिखाते हैं – एक छाँह द्वारा अपना ज्ञान-अनुभव प्रदान करना और दूसरा वाद, विवाद,चर्चा. संदर्भ से प्रतीत होता है कि “प्रियतर” जन छाँह की उपस्थिति से अनभिज्ञ हैं, शायद सो रहे हैं. यह समस्त व्यापार एक अमूर्त स्तर पर कवि की कल्पना में घटित हो रहा है.)




3.
तुम्हारे द्वार पर आया हुआ मैं अस्त्र-सज्जित रथ
मेरे चक्र दोनों अग्रगति के लिए व्याकुल हैं
व मेरी प्राण-आसंदी तुम्हारी प्रतीक्षा में है
यहाँ बैठो, विराजो,
आत्मा के मृदुल आसन पर
हृदय के, बुद्धि के ये अश्व तुमको ले उड़ेंगे और
शैल-शिखरों की चढ़ानों पर बसी ठंडी हवाओं में
व उसके पार ...
तुम्हें ले जायेगा.


(ये पंक्तियाँ कविता के प्राय: अंत में आती हैं.यहाँ तक आकर भी समष्टि केवल सवारी है. रथ का स्वामी और नियंत्रक कवि स्वयं है.)

परंतु ये संचारी भाव स्थायी भाव के संवादी नहीं, विसंवादी हैं. अंतिम उद्धरण से एक और बात निकलती है. पूरी कविता सामान्यीकरण के बारे में है. पर यह स्पष्ट नहीं है कि कविता को सर्वजनगम्य बनाना भी इस सामान्यीकरण का अंग है या नहीं. ऊपर उद्धृत पंक्तियों से तो लगता है कि कविता का रथ हर कोई नहीं हाँक पायेगा.

यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि इन विसंगतियों का कविता पर क्या प्रभाव पड़ता है. मेरे विचार से ये विसंगतियाँ कविता को नये आयाम देती हैं और उसमें एक चित्ताकर्षक अस्पष्टता तथा श्लिष्टता उत्पन्न करते हैं. पाठक की कल्पनाशीलता को अर्थों की परतें खोलने का पूर्ण अवकाश प्राप्त होता है.


शिल्प


कविता के कथ्य के बारे में सोचें तो लगता है कि ‘अभिव्यक्ति का साम्यवाद या ‘श्वान- रुदन का सौंदर्यशास्त्र’ जैसे व्यंग्यात्मक जुमले इस पर सहज ही चस्पाँ किये जा सकते हैं. पर किसी का साहस नहीं होगा. यह मुक्तिबोध के शिल्प की ताकत है. उनकी अभिव्यक्ति इतनी प्रखर और उदात्त है कि पाठक कथ्य तक पहुँचने के पहले ही अभिभूत हो जाता है. बिंब और प्रतीक अपनी जगह, केवल शब्दों को और उनकी ध्वनियों को साधकर जो चमत्कार मुक्तिबोध कर सकते हैं उसका सानी नहीं है – 


सहस्रों पीढ़ियों ने विश्व का
रमणीयतम
जो स्वप्न देखा था
वही, बिलकुल वही.
स्वप्न के आवेश में यह जो
सुकोमल चांदनी की मंद नीली श्री
क्षितिज पर देख
फसलों के महकते सुनहले फैलाव
में ही चला जाता है
व आँखों में चमकती चाँद की लपटें
हृदय में से
निकलती आम्र-तरु-मधु-मंजरी की गंध


इन पंक्तियों में “चाँदनी की लपटें” को छोड़कर कोई रूपक या बिंब नया या असाधारण नहीं है. चाँदनी की लपटों का बिंब भी मूलत: शाब्दिक है. पर शब्दों की योजना और ध्वनि के संयोजन से ऐसा प्रभाव उत्पन्न किया गया है कि सामान्य जन की सारी आशा- आकांक्षाओं का इतिहास जीवंत हो उठता है. मुक्तिबोध की इस कला का उपयुक्त विश्लेषण करने के लिए भाषाशास्त्र, ध्वनि-विज्ञान और संगीत का सहारा लेना चाहिए. दुर्भाग्य से मैं यह सुझाव प्रस्तुत करने के अतिरिक्त इस दिशा में और कुछ करने में असमर्थ हूँ.

पूरी कविता बिंबों से अटी पड़ी है. सबसे आकर्षक संभवतः यह छोटा-सा बिंब है – 


“घरों में घूमती उनके
लगाती लैम्प, उनकी लौ बड़ी करती”.

रहस्यात्मक और स्वप्नभित्तिक बिंब मुक्तिबोध की कविता की पहचान हैं, जो इस कविता में भी काफी हैं.

रूपक और प्रतीक लंबी कविताओं में विशेष महत्त्वपूर्ण होते हैं.इस कविता में छाँह सबसे महत्वपूर्ण रूपक है. यह स्पष्टत: कवि की सृजनात्मक प्रतिभा का रूपक है. अधिकांशत: इसका मानवीकरण किया गया है. इसके अतिरिक्त इनकार वाले द्वार,सभ्यता के स्वर्ण कलश, पारिजात, रंगीन मस्त किनारियाँ, झाँइयाँ, परछाइयाँ, उत्पीड़कों का वर्ग,प्रेम का वाहन, प्राण- आसंदी, अश्व आदि कुछ अन्य रूपक हैं. प्रतीकों का प्रयोग अपेक्षाकृत अधिक हुआ है. इनकी व्याख्या सार-संक्षेप में हो चुकी है. 


यहाँ महत्त्वपूर्ण प्रतीकों को गिना देना काफी होगा – नीलाकाश, बेबीलोन, सूर्य, सूर्यों के धब्बे, गिद्ध, पीली धूल के बगूले,अँधेरा वृक्ष, चंद्र-रेखाएं, आग, काला स्याह चेहरा, अजंता की गुफाएँ, भीतर के कमरे, आईना, मूर्ति, तोड़ी हुई आम्र-मंजरी, संगीत, आरती, श्वान-रोदन, रथ आदि.





अंतत:

इस विवेचन में किसी विशेष पद्धति का उपयोग नहीं किया गया है. मुख्य बल खुद कविता और उसके शब्दों पर है. मुक्तिबोध के एक लेख से कविता की समांतरता पर चर्चा की गई है पर जहाँ कविता का अंत:साक्ष्य लेख से अलग निष्कर्ष की ओर ले जाता है वहाँ उसी का भरोसा किया  है. मुक्तिबोध से कविता के कवि (poetic persona) की अभिन्नता अभिप्रेत नहीं है.


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शिव किशोर तिवारी
२००७ में भारतीय प्रशासनिक सेवा से निवृत्त.
tewarisk@yahoocom