परिप्रेक्ष्य : महाश्वेता देवी : गरिमा श्रीवास्तव

Posted by arun dev on मार्च 24, 2017





















ऐसा लगता है कि हम नेहरुयुगीन उदारता और आधुनिकता के ख़ात्मे की ओर अग्रसर हैं.
सच का कोई और भी पक्ष हो सकता है और उसे सुना जाना चाहिए यह गांधी की सबसे बड़ी मनुष्यता थी.
आज सबसे अधिक प्रहार इसी पर हो रहा है.
ज़ाहिर है ऐसे माहौल में अपने रचनाकारों, बुद्धिजीविओं को फिर से प्रचारित-प्रसारित करने की अनिवार्य आवश्यकता सामने आ खड़ी है.
महाश्वेता देवी ऐसी ही रचनाकार थीं. उनका जीवन  क्रांतिधर्मी था.  
गरिमा श्रीवास्तव ने खूब मन से और डूबकर इसे लिखा है.
अगर जीवन उत्सव है तो इसका सबसे बड़ा पर्व है स्वाधीनता. आइये स्वाधीन मनुष्य के पक्ष में हमसब खड़े हों.



‘जीवन एक उत्सव है’: महाश्वेता देवी                              




                                                     
क सौ बीस से अधिक किताबें और ढेरों पुरस्कार-सम्मान पाने वाली महाश्वेता देवी अब नहीं हैं. वे नहीं हैं अब जो कहा करतीं : ‘नब्बे साल की उम्र में कि लगभग बीस वर्ष और जी जाऊं तो जो -जो लिखना बाकी रह गया है सब लिख डालूं. धरित्री देवी की नौ संतानों में सबसे बड़ी ये वही महाश्वेता थीं जिन्होंने आठ वर्ष की उम्र में गुरुदेव टैगोर से पूछा था –‘तुमिएतो गुलो बोई केनोलिखे दिए छो, आमि शब् पोढ़ते पारबो न’ शान्तिनिकेतन में मौलश्री गाछ के नीचे बच्चों से घिरे गुरुदेव की मंद मुस्कान घनी दाढ़ी में छुप गयी थी और गहरी आँखें साधारण से बंगाली नैन -नक्श वाली महाश्वेता के चेहरे पर. सन अड़तीस से छत्तीस तक वे शान्तिनिकेतन के आश्रम में पढ़ीं. नन्दलाल बसु, रामकिंकर बैज को देखा और देखा अंतर्दृष्टि से उत्कृष्ट भित्ति चित्र उकेरते बिनोद्बिहारी मुखोपाध्याय को. खोवाई, पेड़ पौधे, नजदीक के गाँव, धान के खेतों में झुकी पीठ नतशिर निरंतर श्रमरत भूमिहीन, सम्मानहीन आदिवासिनियों को देखा -अन्गौछे में मूढ़ी नमक सान कर खाते भविष्यहीनों को देखा-ये सब उनके भीतर एक दूसरा संसार रचते रहे -कुछ इस तरह कि जब अपना निज का संसार रचने का समय आया तो वह संसार ज्यादा दिन तक चल ही नहीं सका. जन, आम- जन आदिवासी,पीड़ित, दुखी, अधिकारहीन- सबने उनके संसार में प्रवेश कर लिया.

साहित्यिक संस्कार विरासत में मिले थे-पिता मनीष घटक बांग्ला में लिखते थे और चाचा फ़िल्मकार ऋत्विक घटक थे, उनके मामासचिन चौधरी थे जो इकनोमिक एंड पोलिटिकल वीकली के व्यवस्थापक- संपादक बने. लेकिन महाश्वेता को क्या पसंद था - भूखे नंगे बच्चों के बीच बैठना, उनसे बातें करना, उनकी भूखी आँखों के ज़रिये दुनिया-धंधा देखना, मैक्सिम गोर्की और तोल्स्तोय को पढ़ना. सन 43 में क्या तो उम्र रही होगी, बंगाल के अकाल के बाद राहत कार्य में जुटी संस्थाओं के साथ वे गाँवों में गयीं दिखाई दिया बंगाल का असल चेहरा- तो ये है मेरा देश भूखा-नंगा, विवश, लाचार, बीमार, भात के कण-कण को तरसता, कीचड़ से भरी गढ़ही से चुल्लू भरता, दवा नहीं इलाज नहीं, क्षुद्रता की सीमा को पार करती अनैतिकता के लिए विवश और दूसरी ओर राहत कार्यों के नाम पर लूट-खसोट, सरकार चुप. पशु और मनुष्य में कोई फर्क नहीं. कड़वा यथार्थ आँखों में चुभ गया, जलने ही तो लगीं आँखें -जिन आँखों को सत्रह वर्ष की रोमानी आँखें होना था उनमें भर गयीं अनंत बिजलियाँ, जिन आँखों को भविष्य के सुनहले सपनों की जागी नींद में खो जाना था- वे आँखें बंगाल के सुदूर गावों में अकाल की महामारी के बाद फैले अभेद्य सन्नाटों के चीत्कारों से विस्फारित थीं –एई कि आमार देश ?’.

1965 में पालामऊ में आदिवासियों का जीवन देखा -जो थे मूल निवासी उन्हीं के पिछड़े अति पिछड़े रहवास! जल नहीं, जमीन नहीं, जंगलों से भी दुरदुराये जाते-जिन्हें मनुष्य समझने के लिए कोई तैयार नहीं उन्हीं के आंसुओं का खारापन महाश्वेता के कंठ को अवरुद्ध कर गया. पश्चिम बंगाल की शबर जनजाति हो, बिहार हो या छत्तीसगढ़ कहाँ नहीं गईं?, कार्यकर्ता हो उठीं, मनुष्यता के पक्ष में खड़ीं महाश्वेता, भव्य कारों में चलतीं, रेशमी साड़ियों की सरसराहट संभालती, सर्वांग आभूषणों से लदी-फंदी,नुमाईशी कार्यकर्ताओं से बिलकुल अलग थीं -नितांत स्ट्रेट फॉरवर्ड, सभाओं में गोबर पुती जमीन पर फसक्कड़ा मारयालकड़ी के स्टूल या मूढ़े पर बैठ जातीं, पैर दुखते तो ऊपर करके बैठ जातीं, होठों में फंसी गणेश छाप बीड़ी-साधारण तांत की साड़ी,पैरों में चप्पल-यही थी धज उनकी, या यों कहें धज थी ही नहीं. जो हो वही रहो, जो सोचो वही करो दिखावे और आडम्बर से दूर. देश-दुनिया में जहां कहीं भी कोई शोषित -पीड़ित हो महाश्वेता उनके साथ थीं, जिसने भी ज़रूरत के समय उन्हें पुकारा उनके लिए वे उठ खड़ी हुईं. कितनी सभाएं कितनी समितियां -चाहे वह पश्चिम बंगाल की खेड़ीया शबर कल्याण समिति हो या देश में बंधुआ मजदूरों के हक़ का पहला संगठन, सिंगूर में भूमि अधिग्रहण का मुद्दा हो या नंदीग्राम में निहत्थे लोगों की हत्या का मामला या नर्मदा बचाओ आन्दोलन में मेधा पाटेकर के साथ संघर्षरत लोगों का साथ देना हो -वे हर कहीं खड़ी थीं. ये महाश्वेता ही थीं जिन्होंने रिक्शा चलाकर जीवन यापन करने वाले मनोरंजन व्यापारी को लेखक बनने की प्रेरणा दी –‘बर्तिका’ शीर्षक पत्रिका में उसकी कहानी छापी और एक दिन ऐसा भी आया कि मनोरंजन ब्यापारी को पश्चिमबंग बांग्ला अकादमी द्वारा पुरस्कृत किया गया.

उनके व्यक्तित्व के कई आयाम थे ,उनको देखना- मिलना दो बार संभव हुआ.पहली बार तो तब जब वे शान्तिनिकेतन आश्रम की खाली पड़ी ज़मीन पर भूमाफ़िया द्वारा कंक्रीट के जंगल उगाये जाने के विरोध और वानप्रस्थी आश्रमिकों के पक्ष में अपनी आवाज़ बुलंद करने कलकत्ता से तुरंत पहुंची थीं. देवेन्द्रनाथ ठाकुर की साधना स्थली कुछ ही समय के लिए सही भू-माफ़िया के जबड़े में जाने से बच गयी, ये बात और है कि ऊंची तनख्वाह और कारों के गिरते दामों ने आश्रम की शांति और पवित्रता को ट्रेफिक के शोर से हाल के वर्षों में भर दिया.इसमें कोई संदेह नहीं कि आने वाले वर्षों में प्रत्येक धनाढ्य बंगाली का एक हॉलिडे फ़्लैट शान्तिनिकेतन में रहनेवालों की बात जोहते सूख -मुरझा रहा होगा.

महाश्वेता दी को सब लोग एक सामाजिक कार्यकर्त्ता और लेखिका के रूप में जानते रहे, लेकिन बहुत कम ने जाना कि उनके भीतर गृहस्थ जीवन जीने की लालसा थी जो हमेशा अतृप्त रही.निज और पर का कुछ गोपन रख पाना उनके स्वभाव में ही नहीं था, न एक जैसा काम हमेशा कर पाना, उन्होंने कई नौकरियां बदलीं, कभी पत्रकारिता की तो अध्यापकी, पहली किताब झांसीर रानी को मिलाकर सौ और बीस कहानी संग्रह, सामाजिक, सांस्कृतिक मुद्दों पर ढेरों लेख, अखबारी लेखन. मीडिया ने उनको बहुत ज्यादा कवरेज दी लेकिन उनका आत्म बेचैन ही रहा -किसी खोज में निरंतर! चाहे उन्हें मैग्सेसे पुरस्कार से ही क्यों न नवाजा गया हो - राजनीतिक तौर पर वे हमेशा ऐसी जन क्रान्ति की पक्षधर रहीं जो व्यवस्था को आमूल -चूल बदलने के लिए सन्नद्ध है. 

उपनिवेशवादी ताकतों का विरोध उन्हें विरासत में मिला था, नाना-नानी समाज सुधार और उत्पीड़ित, अशिक्षित का हाथ थामने में हमेशा आगे रहते. अपनी माँ की अनेक स्मृतियों में से उन्हें एक स्मृति यह भी थी  कि मृत्यु के 13 वर्ष पहले उन्हें आंख से दीखना बंद हो गया था उस दौरान भी घर में काम करने लड़की की पीठ पर अपनी उँगलियों से अक्षर उकेर कर लेटे-लेटे पढ़ाया करतीं, ऐसा था बचपन  का माहौल, जिसमें पिता की आयकर विभाग की नौकरी एक जगह स्थिर रहने नहीं देती. विजन से विवाह करना एक अस्थिर भविष्य की भूमिका ही बना. अर्थ का अभाव और अनियमित दिनचर्या  ने,दाम्पत्य की शुरुआत में ही महाश्वेता को जीवन का कटु यथार्थ दिखा दिया.दिन- दिन भर भूखी रहतीं क्योंकि पति कहलाने वाले शख्स में दायित्व निभाने का कोई हौसला नहीं था .नवारूण पैदा हुआ, जिसके लिए दूध का इंतजाम करना भी मुश्किल था, ऐसे में मायके वालों ने हमेशा मदद की. लेकिन स्वाभिमान भी कोई चीज़ होती है, जिसे भूल पाना महाश्वेता के लिए असंभव था, लेकिन इस अल्पकालीन दाम्पत्य ने भूख और दरिद्रता से निजी तौर पर परिचित तो करा ही दिया,टी.बी की बीमारी ने जकड़ा तो वो भी भूख और कुपोषण के कारण हीतो ये दिन थे जिनके बारे में महाश्वेता दी बाद में हँस कर कहा करतीं कि-‘उन दिनों ने ही मुझे बनाया’.

महाश्वेता दी को दूसरी बार देखना हैदराबाद केन्द्रीय विश्विद्यालय के दीक्षांत समारोह में संभव हुआ जब उन्हें मानद डी लिट् की उपाधि से नवाजा गया. तालियों की गडगडाहट थमने का नाम नहीं ले रही थी -व्हील चेयर पर बैठी अपने समय की बड़ी हस्ती महाश्वेता के सम्मान में ब्रह्मकुमारी आश्रम का विशाल सभागार बहुत देर तक समवेत ताल-स्वर में गूंजता ही रहा, वे संबोधित करती रहीं, धीमे -धीमे बीमार व्यक्ति बोलता है जैसे! लेकिन आवाज़ कहीं कमज़ोर नहीं पड़ी, उत्कट जिजीविषा और जीवन के प्रति अगाध विश्वास ने आवाज़ को 88 की उम्र में भी ताज़ा रखा हुआ था. उनकी कृतियों पर बनी, गोविन्द निहलानी की ‘हज़ार चौरासी की माँ’, कल्पना लाज़मी की ‘रुदाली’ गौतमघोष की ‘गुड़िया’, चित्र पालेकर की ‘माटी माय’ और तरुण मजुमदार की ‘अरण्येर अधिकार’ जैसी अनेक फिल्मों ने उन्हें युवा छात्रों के बीच सुपरिचित बनाया हुआ था. वे कमज़ोर कभी नहीं पड़ीं -घोर शारीरिक कष्ट के दिनों में भी नहीं, उन्हें नज़दीक से जानने वाले लोग बताते कि मदद के लिए रिरियाने वालों को वे कड़े स्वर में डांट भी देतीं और ऐसा करके वे उन्हें अपने अधिकारों के लिए संघर्ष और मेहनत करना सिखातीं. समाज इतिहास के विकास की प्रक्रिया में दलन और दमन के चक्र की जमीनी सच्चाई को उन्होंने अच्छी तरह समझा, गहन जंगलों, नदी के दुर्गम तटों की ओर जाते हुए इसीलिए उन्हें कभी कोई हिचक नहीं होती.

पुत्र नवारुण मेधावी कवि था पर हमेशा उनसे दूर ही रहा, और एक दिन ऐसा भी आया कि वह हमेशा के लिए सबसे दूर चला गया, जिसका अफ़सोस मां होने के नाते महाश्वेता दी को हमेशा रहा, लेकिन इसे भी उन्होंने चुनौती की तरह लिया. पी लिया अपने मन के दुःख का तप्त वाष्प.मन के अँधेरे कोनों में निज दुःख को जगह ही कहाँ देना सीखा था, इसलिए तो लिख पायीं ‘रुदाली’-स्त्री के निज और राजनीतिक सम्बन्धों पर लिखा उपन्यास अनूठा है जो भारतीय परिप्रेक्ष्य में ,राजस्थान के गाँवों में विधवा स्त्री की दशा का पता बताता है. रुदन ही जिसका रोजगार है वह है रुदाली -जो सामाजिक ,आर्थिक और धर्म के गंठजोड़ का क्रिटीक रचती है -ये स्त्री का रुदन है-जिसके पक्ष में कोई नहीं खड़ा - न समाज, न धर्म और न व्यवस्था-यह अरण्यरोदन है. एक वक्त ऐसा भी आता है जब उसके पास आंसू ही नहीं बचते, लेकिन उस से अपेक्षित है कि वह रोये, सामन्त के मरने पर, धनी और रसूख वाले व्यक्ति के मरने पर, जितना बेहतरीन रोएगी, मेहनताना उतना बेहतरीन मिलेगा. इसी तरह महाश्वेता की कहानी द्रौपदी जो सबाल्टर्न का एक नया चेहरा पाठक के सामने लाती है और पाठक पौराणिक चरित्रों को समकालीन सन्दर्भों में देखने लगता है. गायत्री चक्रवर्ती स्पिवाक से महाश्वेता देवी ने कहा था - 'जीवन गणित नहीं है न ही राजनीति. मैं वर्तमान परिस्थितियों में बदलाव चाहती हूँ और दलबंदी की राजनीति में विश्वास नहीं करती’.

महाश्वेता जी 90 से अधिक की उम्र में गयीं. वयस जनित रोगों से लड़ना उनके शरीर के लिए कठिन और कठिनतर हो रहा था. देखा जाए तो ये जाने की ही उम्र थी पर उनका जाना उपेक्षित, विवश,अधिकारों की मांग भर करने पर मार खाते हजारों लाखों, भूमिहीन, आश्रयहीन लोगों को दिशाहारा कर गया है, जीवन का यथार्थ प्रामाणिक ढंग से व्यक्त करने वाली लेखनी थम गयी है, जो कहती थी कि ‘जीवन का हर दिन एक उत्सव है -जिसे पूरी तरह जीना चाहिए’.
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गरिमा श्रीवास्तव
प्रोफ़ेसर भारतीय भाषा केंद्र
जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय
दिल्ली -११००६७
फोन -8985708041 / drsgarima@gmail.com