कथा - गाथा : बिकनी में बॉबी : संजीव चंदन

Posted by arun dev on मार्च 11, 2017
















संजीव चंदन जाति और जेंडर के मुद्दे पर लिखते हैं, ‘स्त्रीकाल’ पत्रिका का संपादन करते हैं, कथाकार हैं. यह उनकी नई कहानी है.



आधुनिकता के मायने भी पीढ़ियों में बदल जाते हैं. कभी ब्रेक-अप दारुण हुआ करता है पर आज तो ‘सैयां जी से आज मैंने ब्रेकअप कर लिया’ के बाद लगता है कि यह कोई अच्छी चीज़ है. इत्यादि



कहानी
बिकनी में बॉबी                                      
संजीव चंदन


रवाज़ा वापस बंद कर अनु सीधे अपने बेडरूम में घुसी और अपने बेड पर निढाल बिछ गई,  उसके चेहरे पर हताशा और उदासी साफ़ दिख रही थी. पेट के बल औंधे गिर कर वह सुबकने लगी. उसे लग रहा था कि वह आज निधि की नहीं अपनी जिन्दगी का एक अहम मसला सुलझाने में असफल रही, उसे लग रहा था कि आज दो-दो अनु एक साथ सुबक रही हैं, यहाँ उसके बेडरूम में और वहाँ 25-26 साल पहले मगध के उस गाँव के कोहबर वाले घर में फ्रेम हुई अनु. कोहबर वाले घर की दहलीज से बाहर निकली अनु ने उसके बेडरूम में निढाल पडी अनु तक 25-26 साल का फासला तय किया है, लेकिन ऐसा क्या है, क्यों है कि अनु के भीतर से आज भी कोहबर में कैद एक लडकी खीचती है, उसके व्यक्तित्व को वापस वहीं ले जाना चाहती है, जहां से बड़ी सजगता से उसे मुक्त किया था उसने, एक ऐसे व्यक्तित्व के रूप में ढाला था, जो बिंदास है, मुक्त है, बोल्ड है!


बोल्ड ! क्या था उसके जमाने में बोल्डनेस का मतलब! तब सेना में कांस्टेबल उसके बड़े भाई के पास जमा फ़िल्मी पत्रिकाओं में जीनत अमान, परवीन बॉबी से लेकर ममता कुलकर्णी तक की तस्वीरें होतीं- और वे ही उसके कल्पना लोक में मायानगरी की नारी की तस्वीर रचतीं- मुक्त, उन्मुक्त और बोल्ड. स्कूल की ऊंची कक्षाओं से लेकर कॉलेज तक आते-आते, यानी 10वीं से 11वीं तक उसकी कोमल भावनायें तुकबंदी के तौर पर कागज़ पर उतरने लगी थीं, लेकिन अपने भीतर आकार लेते बोल्डनेस का पहला अहसास तब हुआ था, जब ‘कवि’ के साथ पहली बार हाथों में हाथ डालकर वह फिल्म देखने गई थी- ‘साजन’. जब छोटे शहर के बड़े सिनेमा घर में पंखे के नीचे सुकून से हवा खाते हुए उसने परदे पर माधुरी दीक्षित को ‘बहुत प्यार करते हैं तुमको सनम’ गाते हुए देखा-सुना, तो उसे लगा कि खुल्लम-खुल्ला प्यार की घोषणा करने वाली माधुरी ही सबसे बोल्ड है, सबसे मुक्त- वरना उसके शहर में कौन लडकी सरेआम ऐसे प्यार का इजहार कर सकती है. ऐसा सोचते हुए उसने गौर किया कि उसके शहर में तो कोई लडकी किसी लड़के के हाथ में हाथ डाले दिन –दहाड़े सिनेमा भी देखने तो नहीं आ सकती थी. यह गौर करते हुए उसने महसूस किया कि मुक्ति का राग तो उसके भीतर भी है-एक उड़ान तो उसके भीतर भी सुप्त पडा है.

उसके बाद.... उसके बाद शहर के साहित्यिक मंचों पर कवि और उसकी जोड़ी हिट हो गयी- उन दिनों कवि और अनु ने खूब कवितायें लिखीं- प्रेम की, प्रेम में त्याग और समर्पण की. वे कवितायें लिखते और मंचों से एक दूसरे को संबोधित करते. शहर के साहित्यकारों में पुरुष ही पुरुष होते, इक्के-दुक्के बुजुर्ग होती महिलाओं के अलावा, उन बुजुर्ग होती महिलाओं के सामने वह बोल्ड और बिंदास थी. वैसे वे महिलायें सुरैया के जमाने की नहीं थीं, लेकिन जीनत अमान और परवीन बॉबी के शुरुआती दिनों में ही ‘हा..य..!’ कहते हुए फ्रीज हो गई थीं, क्योंकि वे राखी और रेखा से ज्यादा आगे सोच ही नहीं पाती थीं, मुक्ति और बोल्डनेस के नाम पर बहुत हुआ तो पति के सामने ‘रंग बरसे’ गाते किसी पराये को हसरत से देख लेना भर ही, वह भी निगाहें बचा कर.

यह प्यार अंतर्जात का था, इसलिए स्वाभाविक ही था कि ग्रैजुएशन तक आते–आते पिता और घर वालों का दवाब स्वजातीय योग्य वर से विवाह कर लेने का बना. दवाब के आगे उसकी एक न चली और वह कोहबर वाले उस घर में कुछ दिनों तक अपने नवेले पति के साथ बिताने के बाद, जब पिता के घर आई तब फिर वापस नहीं गई- मुक्त लड़की ने उसे वापस जाने नहीं दिया.

विवाह के बंधन को वहीं छोड़, बिना किसी तलाक की औपचारिकता के वह अपने कवि संग जिन दिनों साहित्यिक राजधानी की ओर रुखसत कर हुई, उन दिनों उसकी भाषा की लेखिकायें परिवार बचाओ और परिवार तोड़ो के द्वंद्व से लगभग बाहर आने की सीमा तक पहुँच गई थीं- लेखन का बोल्डनेस बिस्तर के विस्तृत वर्णन तक पहुँच चुका था-स्त्री की मुक्ति का इतना विस्तार जरूर हो गया था. साहित्यिक राजधानी में उसे उड़ने का क्षितिज दिखा, फैलने का विस्तार. यहाँ आकर कवि की कवितायें उसे रूमानियत से भरी बोरिंग प्रतीत होने लगीं और अपनी कवितायें कोरी भावुकता और बचपना. एक बार फिर वह दहलीज लांघ कर निकली, कवि को उसकी बिस्तर पर चाय, सिगरेट और उसकी कविताओं के साथ छोड़कर- एक-दो अपनी कवितायें भी उसने वहीं छोड़ दी, जिसकी वर्तनी देखने के लिए कवि ने अपने पास रखी थी-छोड़कर गई तो फिर मुड़कर नहीं देखा.

उसकी भाषा में अभी बहुत कुछ शेष था, मुक्ति के नये प्रसंग लिखे जाने बाकी थे. साहित्यिक राजधानी के उसके गलियारे में मुक्ति के नये प्रसंगों के वे अर्थ नहीं थे, जो देश के राजनीतिक-अराजनीतिक स्त्रीवादी आंदोलनों के घोषणापत्र में शामिल थे. या वह भी नहीं, जो साहित्य के दूसरे गलियारों में लिखे जा रहे थे. उसने साहित्य के अपने गलियारे की रिक्ति भरी और निजी जिन्दगी में अपनी शर्तों पर ‘सह्जवीन’ के चुनाव किये-जिसमें सुरक्षा, संबल और आजादी हो. यह सब करते हुए समय बीतता गया, उसने ध्यान ही नहीं दिया कि उसके समय की ममता कुलकर्णी का ज़माना नहीं रहा, अब तो बिपासा, विद्या और करीना का समय भी लगभग बीत चुका था- ‘बहुत प्यार करते हैं तुमको सनम’ अब शहर के चौराहों पर नहीं बजते अब तो हेडफोन लगाये लडकियां, ‘मैंने सैंया जी के साथ अब तो ब्रेक अप कर लिया’ सुनती हैं और उसपर झूमती हैं.

सच में समय बहुत तेजी से आगे निकल गया था, उसकी भाषा में भी अब संभोग विवरण का विस्तार देने वाली पीढ़ी आ गई थी. पता नहीं क्यों वह यह नहीं समझ पाई कि जब आप ‘पहले प्यार की पहली चिट्ठी तक’ या सचिन तेंदुलकर की सेंचुरियों तक या हद से हद ‘उल्ला-ला और विद्यावालन’ तक फ्रीज हो गये हों और एक पीढी दिल्ली के कडक लौंडे से ‘मैं तो तंदूरी मुर्गी हूँ यार..’  सुनने-सुनाने का आग्रह कर रही है, महेंद्र सिंह धोनी की कप्तानी भी इतिहास की बात हो गई है और अनुष्का शर्मा, आलिया भट्ट, जैसी नई लड़कियों ने ने करीना, कैटरीना की छुट्टी कर दी है, तब आप अपनी पिछली भूमिकाओं में कैद हैं, अपने तमाम साहसों, प्रयोगों और बोल्डनेस के बावजूद चलन से बाहर हो गये हैं-आउट ऑफ़ फैशन. चूकी वह यह नहीं समझ पायी तो यह भी नहीं समझ पाई कि जिस अंतिम समय में वह स्टील हो गई थी, वहाँ से ही उसने कुछ ऐसी चिंताओं और सोच को अपने भीतर पनपने का अवसर दे दिया था, जिनका वह पिछले दिनों मजाक उड़ाया करती थी, या जिन्हें मगध के गाँव में ही छोड़कर वह आगे बढ़ती गई थी. हालांकि साहित्यिक राजधानी में तब भी वैसी सोच, वैसी चिंतायें वैसी प्रवृत्ति उसके गलियारे के इर्द-गिर्द मिल ही गई थीं- जिनके वजूद पर वह ठहाके लगाती थी, या जिन्हें अपनी सिगरेट के धुओं से वह उड़ा दिया करती थी.

वह अनजाने ही समय को अपनी मुट्ठी में कैद कर लेना चाहती थी, सबकुछ समेट कर अपने आँचल से बांधे रखना चाहती थी. जिस समय में वह स्टील हो गई थी, वहाँ से ही निरंतर बिंदास और बोल्ड होती लड़कियों को चिपकाये रखना चाहती थी. वह फतवे तो नहीं देती थी, लेकिन उसे लगने लगा था कि मुक्ति की एक सीमा होनी चाहिए, ऐसा लगना ठीक वैसा ही था, जैसा उसके मुक्त होने के क्षणों में राखी और रेखा तक फ्रीज हो गई महिलओं को लगता था. उसके भीतर बीमारी की हद तक एक बेचैनी ने सिर उठाना शुरू किया था- वह सारे संबंधों को जोड़ कर रखना चाहती थी. वह नहीं चाहती थी कि कोई विवाह टूटे या किसी का सहजीवन. अपने घर का म्यूजिक सिस्टम वह खीझ कर बंद कर देती, जब कोई अनुष्का शर्मा सरीखी लड़की, उसकी बेटी या कोई और ‘मैंने सैंया जी से आज ब्रेक अप कर लिया’ सुनती और उसपर थिरकती दिखती- उसके मुंह से निकलता आजकल के बच्चे भी न- यह आवाज उसे इको की तरह गूंजती सुनाई पड़ती, कहीं पीछे से गूंजती हुई.

उसकी बेचैनी बढ़ती ही जा रही थी, उसके आस-पास घटित घटनायें उसे बेध रही थीं. वह इस या उस सहेली से अपनी चिंता व्यक्त करती कि उस या इस सहेली के जीवन में सबकुछ ठीक नहीं है, कि कोई तीसरा उसके जीवन में है या कोई तीसरा उसके जीवन में दस्तक दे रहा है. ऐसा भी नहीं था कि वह इस बेचैनी पर काबू नहीं पाना चाहती थी, या खुद से निकलकर वह अपनी इस बेचैन प्रवृत्ति को देखती तो सबकुछ अटपटा और दकियानूस सा लगता, जिसे वह मगध के कोहबर वाले गाँव में छोड़ आई थी. लेकिन खुद से निकलकर बहुत देर रहा भी तो नहीं जा सकता था. उसे कोफ़्त होता अपने गलियारे के साहित्य में आई नई पीढी के प्रयोगों पर कि क्या अनाप-शनाप, संभोग चित्रण और कोक शास्त्र लेखन तक आ गई है यह पीढी- अपनी बात को पुख्ता करने के लिए वह कहती सेक्स का विवरण ही करना है तो विदेशी भाषाओं के बड़े लेखकों से सीखो- कोई अश्लीलता नहीं. ऐसा सोचते और कहते हुए वह खुद भी नहीं समझ पाती कि अश्लीलता होती क्या है, और कब, किस सीमा से शुरू हो जाती है.

अनु सुबकते –सुबकते अपने बेडरूम में काफी देर तक निढाल यूं ही पडी रही. उसे अफ़सोस था कि वह निधि का विवाह बचा नहीं पाई- उसने निधि और उसके पति के बीच तीसरी उपस्थिति को बहुत पहले देख-समझ लिया था. उसने निधि को आगाह भी किया, लेकिन अफ़सोस उसकी अपनी सहेली भी तब उसका मजाक उड़ाती और कहती कि वह ख़ामख्वाह अपने मन से ऐसे भ्रम निकाले. निधि अनु को सचेत भी कर देती कि उसका यह आचरण, उसकी यह सोच उसके अपने जीये जीवन से काफी अलग और दकियानूस है. यह सुन कर उसकी बेचैनी और भी बढ़ जाती. निधि का विवाह बचाने के लिए उसने अपने साथ और भी सहेलियों को शामिल करने की कोशिश की, लेकिन सहेलियां इसे या तो उसका अतिरिक्त आग्रह या उसके भीतर किसी के निजी में तांक-झाँक की पनपती प्रवृत्ति के तौर पर देखतीं. वह अपने साहित्यिक गलियारे को भी दुरुस्त रखना चाहती थी, लेकिन उसकी सहेलियां इसे अपना सिक्का चलाने की उसकी कवायद से ज्यादा नहीं मान पा रही थीं.

काफी देर तक सुबक लेने या फिर जी खोलकर रो लेने के बाद उसका मन थोड़ा हल्का हुआ. उसने सायास निधि के मसले से अपना ध्यान हटाना चाहा. उठी, अपने लिये ब्रेड ऑमलेट बनाया और कॉफ़ी बनाई. नवीन को आने में देर थी-अभी दो घंटे और. अपनी स्टडी में जाकर कुछ पढने का मन बनाया कि स्टडी की ओर जाते हुए बेटी के गुड़ियों वाले कबर्ड के पास रुक गई. रुना को ‘डॉल्स’ का बहुत शौक था. कई तरह के गुडिया वहाँ कबर्ड में बैठी थीं. रूना के सबसे प्रिय बार्बी डॉल्स के कितने रंग-रूप! ये कंपनी वाले भी न क्या-क्या प्रयोग करते हैं, बच्चियों की रूचियां तय करते हैं. उसे सबसे ज्यादा कोफ़्त जीरो साइज की बार्बी से होती- सूख कर कांटा! कोई फैशन के लिए अपने को इतना कष्ट देता है भला- उसकी सोच का सिलसिला शुरू होने ही वाला था कि उसने वहीं विराम दे दिया. कबर्ड बंद कर आगे बढना चाह रही थी कि बार्बियों के बीच कपड़ों से बनी गुडिया पर उसकी नजर गई- वह ठिठक गई. यह उसकी अपनी गुडिया थी- हाफ पैंट और शर्ट पहने, यह तो उसकी अपनी गुड़िया थी.

उसने उसे बड़े प्यार से उठाया- बॉबी-यही तो यही नाम था उसका. कितने प्यार और मेहनत से बनाया था उसने उसे. गाँव में उसकी सहेलियों के बीच गुडिया बनाने की होड़ होती, जो वे अपनी माओं के साथ मिलकर बनाती थीं. इसे भी उसने अपनी मां के साथ मिलकर बनाया था. माँ चाहती थी कि गुडिया को सुंदर सी साड़ी और ब्लाउज पहनाई जाये-ब्लाउज की बांह कटी हो. पास बैठी दादी ने कटी बांह पर ऐतराज जताया था- वे बांहों वाले ब्लाउज में गुडिया को देखना चाहती थी. अनु एक सिरे से बिदक गई. उसने जिद्द की कि न बांह वाली, न कटी बांह वाली ब्लाउज, और न साड़ी. उसकी गुडिया हाफ पैंट और शर्ट पहनेगी. दादी और माँ दोनो को इस पर ऐतराज था, वे मानती थीं कि खुली टांग वाली गुडिया बड़ी बेहया लगेगी. लेकिन अनु की जिद्द के आगे उन्हें झुकना पडा. समझौता इस बात पर हुआ कि शर्ट-पैंट वाली गुडिया को गुड्डे की तरह बनाया जायेगा और उसकी किसी गुड़िया से शादी रचाई जायेगी. गुड़िया के बनते ही अनु ने पैतरा बदला और उसे गुड्डा मानने से इनकार कर दिया. वह चिल्लाने लगी, ‘नहीं यह मेरी गुडिया है, गुड्डा नहीं, इसका ब्याह नहीं रचाउंगी मैं.’ दादी ने चिढ़ाया, ‘ऐसी भी गुडिया होती है क्या, बिना छातियों वाली गुडिया.’ इसके बाद भी अनु कहाँ सुनने वाली थी, उसने उसे गुड़िया ही माना और नाम दिया-बॉबी.

बॉबी को अपने साथ लेकर वह स्टडी की और न जाकर बेडरूम की ओर बढ़ी. तभी मोबाइल बजा-रुना थी. रुना बोर्डिंग स्कूल में पढ़ रही थी, आठवीं में. हमेशा की तरह उसने अपनी ओर से धाड़-धाड़ बोलना शुरू किया. यह ज़ाने बिना भी कि माँ सुन भी रही है कि नहीं. उसने हफ्ते भर में बोर्डिंग स्कूल के बताने लायक सारी घटनाओं का ब्योरा दिया और अंत में उसने कहा, ‘ममा शिबू से मेरा ब्रेक अप हो गया.’ रुना दोस्ती टूटने को ब्रेक अप बता रही थी. उसी लय और उत्साह से उसने ‘लव यू ममा’ कहा और फोन रखते-रखते अनु ने सुना कि वह गा रही है, ‘सैंया जी से आज मैंने ब्रेक अप कर लिया.’

अनु निरुद्वेग बेड पर बैठ गई और बॉबी को देखना शुरू किया. उसके कपड़े पुराने और जीर्ण हो गये थे. उसने सोचा कि इसके लिए नये कपड़े बना दूं. बॉबी के लिए कपडे वह खुद बनाना चाह रही थी. अपने नये स्टाल को उसने कैंची से काट दिया. कपड़ों के कई आकार सोचे उसने- अंततः बॉबी के लिए उसने बिकनी बनाई. उसके सारे कपड़े उतार कर वह उसे बिकनी पहना रही थी और गा रही थी, ‘सैंया जी से आज मैंने ब्रेक अप पर लिया.’
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संजीव चन्दन 
१९७७,  बिहार के जहानाबाद जिले में.

कहानी संग्रह ‘546 सीट की स्त्रीऔर आलोचनात्मक लेखों का संग्रह स्त्री दृष्टिशीघ्र प्रकाश्य.
स्त्रीवादी पत्रिका स्त्रीकालके संपादक
संपर्क : themarginalised@gmail