मति का धीर : प्रभाकर श्रोत्रिय : ओम निश्चल

Posted by arun dev on दिसंबर 19, 2016

















प्रभाकर श्रोत्रिय आलोचक, निबन्धकार और संपादक थे. उनके संपादकत्व की चर्चा हुई है. ज्ञानपीठ से युवा साहित्यकारों की रचनाओं के प्रकाशन की उनकी योजना में मुझे भी प्रकाशित होने का अवसर मिला था. ओम निश्‍चल से उनका लम्बा संग साथ रहा है, दिल से याद किया गया है यहाँ  उन्हें. उनकी साहित्यिक विशेषताओं पर भी गम्भीरता से बात हुई है. 


स्‍मृति शेष : प्रभाकर श्रोत्रिय
खटखटाता है कोई सुधियों की साँकल                                 
ओम निश्‍चल


प्रभाकर श्रोत्रिय के निधन से हिंदी का आंगन कुछ और सूना हो गया है. वे गत लगभग छह माह से बीमार थे तथा भोपाल में आयोजित विश्‍व हिंदी सम्‍मेलन के बाद से उनका सार्वजनिक समारोहों में आना जाना लगभग बंद-सा हो गया था. वे हिंदी के ऐसे आलोचक थे जिन्‍होंने समीक्षा की एक अलग उदात्‍त भाषा रची तथा रचना के मर्म में प्रवेश कर उसके आस्‍वादन का सलीका सिखाया. वे हिंदी के उन इने गिने आलोचकों व निबंधकारों में थे, जिसने उज्‍जैन की विद्वत्‍परंपरा के साहचर्य में रहकर आलोचना-समीक्षा की एक समावेशी शैली का अनुसंधान किया.

किन्‍तु, प्रभाकर श्रोत्रिय नहीं रहे, यह बात सहसा स्‍वीकार्य नहीं होती. वे जिस तरह से चाकचिक्‍य और नफासत के साथ रहते थे, उससे यह भान नहीं होता था कि वे सहसा बीमार पड़ेंगे और इतनी जल्दी हमें छोड़ कर चले जाएंगे. अभी पिछले ही बरस भोपाल में विश्‍व हिंदी सम्‍मेलन के मौके पर वे जब सम्‍मानित होने के लिए पहुंचे तो मुख्‍य द्वार से घुसते ही लगी कुर्सियों पर वे पत्‍नी ज्‍योति जी के साथ आराम फरमा रहे थे. किंचित शिथिलकाय तो लग रहे थे पर चेहरे पर वही सनातन तेज विद्यमान था. मैंने दोनो के कुछ चित्र खींचे. यही उनसे मेरी आखिरी मुलाकात थी. फिर कुछ दिनों बाद वे बीमार पड़े और गंगाराम हास्‍पिटल में कई बार इलाज के लिए दाखिल हुए. पर हाल ही में हुए ब्रेन हैम्‍रेज से वे सम्‍हल नहीं पाए और 15 सितंबर को रात आखिरी सांस ली.

क्‍या संयोग है कि जिस दिन में मैं अपनी बेटी के आठवें हास्‍पिटलाइजेशन का बिल भुगतान के लिए तैयार करवा रहा था, बिलिंग काउंटर पर सहसा ज्‍योति जी को खड़े पाया. वे शायद रनिंग बिल निकलवा रही थीं. संकोच हुआ कि इतने दिनों बाद कैसे उनका सामना करूँ. पर दस मिनट की कश्‍मकश के बाद बिलिंग काउंटर पर आ उनसे प्रणाम कर श्रोत्रिय जी का हाल पूछा. उन्‍होंने कहा, 'वे होश में नहीं हैं.' कोई संभावना ? 'क्षीण ही है', उन्‍होंने कहा. मैंने कहा कि हमारा आपका प्रारब्‍ध लगभग एक सा है. मैं गत डेढ़ साल से गंगाराम आईसीयू के चक्‍कर काट रहा हूं बेटी को लेकर और आप श्रोत्रिय जी के इलाज के लिए यहां गत छह माह से आ-जा रही हैं. उन्‍होंने कहा, हां निरंजन(श्रोत्रिय) ने बताया था कि आपकी बेटी क्रिटिकल हालत में है. मुझे लगा यह श्रोत्रिय जी की आखिरी वेला है. मुझे बेटी को रिलीव करा कर संसदीय राजभाषा समिति के एक निरीक्षण में समन्‍वयन के लिए निजामुद्दीन से उदयपुर-माउंटआबू के लिए ट्रेन पकड़नी थी सो जल्‍दी में था पर ज्‍योति जी को जिस रूप में बिलिंग काउंटर पर खड़े पाया, लगा एक अकेली विषण्‍ण स्‍त्री  अपने सुहाग की रक्षा के लिए अस्‍पताल में चक्‍कर काट रही है.

श्रोत्रिय जी ने कुछ ही समय अध्‍यापन किया तभी मध्‍यप्रदेश साहित्‍य परिषद से जुड़ गए. साक्षात्‍कार का संपादन किया. फिर अक्षरा से होते हुए भारतीय भाषा परिषद में आए तथा अंत में भारतीय ज्ञानपीठ. यानी नौकरियां बदलते रहे, इससे न तो उनकी ठीक से कोई पेंशन बनी होगी न कोई ढंग का पीएफ ही उनके हिस्‍से में आया होगा. वे भारतीय भाषा परिषद में भी तंगहाली में ही रहे. वसुंधरा, गाजियाबाद वाला मकान भी उन्‍होंने भोपाल की कोई संपत्‍ति बेचकर तथा कुछ धनराशि पास से जुटा कर ही खरीदा था. साहित्‍य अकादेमी से भी वे समेकित मानदेय पर ही अनुबंधित रहे . ऊपर से छह माह से पस्‍त कर देने वाली बीमारी. इलाज के लिए बेटे बेटी के होते हुए भी केवल पत्‍नी ही सक्रिय दिखतीं. कहां से खर्च आता होगा इतने मंहगे इलाज के लिए यह सोच कर एकबारगी मन कांप उठा. अगले दिन उदयपुर पहुंचते हुए फेसबुक पर अनंत विजय  का स्‍टेटस दिखा, 'श्रोत्रिय जी नहीं रहे.' सोच कर मन विचलित हो उठा. बेटी-दामाद मुंबई में है, बेटे-बहू मथुरा में. फिर भी संबंधों में इस छीजते युग में वे जैसे अकेली हो गई हैं. श्रोत्रिय जी के बिना वे कैसे रहेंगी, इस चिंता से ही मन कसैला हो गया. उनके व उनकी पत्‍नी के निकट रही राजी सेठ से बात हुई तो उनकी बीमारी व देखभाल को लेकर तमाम बातें हुईं. वे अपने आखिरी दिनों में जैसे अकेले पड़ गए थे. एक सन्‍नाटा जैसे उनके इर्द गिर्द खिंच गया था. उनके हितैषी उन्‍हें फोन मिलाते पर अक्‍सर फोन कम ही उठता. कौन उठाए, क्‍या बात करे. बीच में उन्‍हें इलाज के लिए ज्ञान चतुर्वेदी ने भोपाल भी रखा पर जैसे वह भी एक पड़ाव भर था. उनकी अनंत की यात्रा जैसे प्रतीक्षा ही कर रही थी.

आज श्रोत्रिय जी नहीं हैं तो उनकी बहुत सी स्‍मृतियां मन में गूँज रही हैं. कोलकाता प्रवास के दिनों में मैं उनके निकट आया था. तब से लगभग नियमित मुलाकातें थीं. जब उन्‍होंने 1995 में कोलकाता में आकर परिषद से वागर्थ का पहला अंक निकाला तब मैं वाराणसी में था. वागर्थ का पहला अंक जैसे कोंपल की तरह सुगंध से भरा था. याद आता है, उसके पहले अंक में ज्ञानेंद्रपति की कविताएं थीं. शायद दिनांत पर आलू और मानव बम आदि. सभी स्‍तंभ सुचिंतित आयोजना से भरे हुए दिखते थे. कोलकाता में अरसे बाद फिर एक पत्रिका ने आंखें खोली थीं. पूरे देश के लेखक उससे जुड़ने लगे थे और परिषद की ख्‍याति दूर दूर तक पहुंचने लगी थी. वहां वे लगभग सात बरस रहे.

प्रभाकर श्रोत्रिय से मिलना साहित्यिक परंपरा और आधुनिक विमर्श के लिए सतत जिज्ञासु एक ऐसे व्यक्ति से मिलना था, जिसके पास भाषा और अभिव्यक्ति की इतनी परतें थीं कि वे हर दिन नये रूप में,नये तरीके से खुलती थीं. निर्बंध हँसी उनके स्वभाव का हिस्सा थी जो अवसाद से आकुल मन को भी अपने ठहाकों की बारिश से नहला दे. एक दुर्लभ कवि मन के होते हुए भी आलोचक के भाग्य का वरण कर उन्होंने हिन्दी कविता को जिस सह्मदयता से दुलारा है और हिंदी जगत को जैसी महत्वपूर्ण कृतियाँ दी हैं, वे आलोचक की सदाशयता का प्रमाण हैं. अक्षरा और साक्षात्कार के संपादक के रूप में उन्होंने साहित्यिक पत्रकारिता के नये मानक स्थापित किये तो सारिकादिनमानधर्मयुग और साप्ताहिक हिंदुस्तान जैसी लोकप्रिय व्यावसायिक पत्रिकाओं के बंद होने के बाद व्याप्त एक लंबे साहित्यिक सन्नाटे के बीच वागर्थ एक ऐसी पत्रिका का पुनर्भव था,जिसने देश भर में फैले पाठकों की साहित्यिक और बौद्धिक भूख फिर जगा दी. श्रोत्रिय के संपादकीयों ने एक ऐसी परंपरा की लीक खींची,जिसका निर्वाह आज कुछ ही पत्रिकाएँ कर रही हैं. व्यावसायिक और अत्यंत लघु पत्रिकाओं के बीच की कड़ी के रूप में वागर्थ की यश:काया को रचने का श्रेय श्रोत्रिय को ही जाता है. इस बीच उन्होंने वागर्थ  के  अनेक  दीर्घजीवी विशेषांक निकाले जिनमें नयी शती के भविष्य पर केंद्रित अंक को देश भर में खासी सराहना मिली . इसी तरह आगे चल कर नया ज्ञानोदय का पानी पर निकला अंक बेजोड़ है.

श्रोत्रिय एक जाने-माने आलोचक, नाटककार व निबंधकार हैं. किन्तु जब कोलकाता के साहित्यिक आयोजनों में उनका परिचय वागर्थ के संपादक के रूप में दिया जाता तो उन्हें इसका मलाल अवश्य होता. पर वागर्थ के सपने के लिए उन्हें यह भी स्वीकार्य था. वागर्थ में उन्होंने अपने समय के प्रतिष्ठित लेखकों-कवियों से लेकर युवतर रचनाकारों को भी बहुमान देकर छापा. किसी विचारधारा अथवा खेमे की लीक का अनुसरण न कर वागर्थ को वे सर्वसमावेशी बनाये रखने के लिए प्रतिश्रुत रहे. अपने समय के ज्वलंत मसलों पर तीखे किन्तु संतुलित संपादकीय लिखे और साहित्यिक व कलात्मक सृजन दोनों को पड़ोस में लाने का गंभीर उपक्रम किया. वे मार्च 2002 तक वागर्थ के संपादन और भारतीय भाषा परिषद के निदेशक पद से जुड़े रहे. श्रोत्रिय जी की एक अकेली निष्ठा ने वागर्थ को जिस वैविध्य से संस्कारित किया, उससे यह हिंदी जगत की निश्चय ही एक बहुवस्तुस्पर्शी पत्रिका बन गयी थी. कभी हिंदी पत्रकारिता का गढ़ रहे कलकत्ता में वागर्थ को छोड़कर अन्य कोई ऐसी पत्रिका नहीं थी, जिसे वास्तव में पाठकों की पत्रिका का दर्जा दिया जा सके. जिस साहित्यिक लगाव और समस्त विधाओं के प्रति समादर-भाव से उन्होंने वागर्थ की प्राण प्रतिष्ठा की, वह आज भी उनकी याद दिलाती है. उनके जीवन में सर्वाधिक दुविधा के दिन कोलकाता के थे. वागर्थ छोड़ते वक्‍त वे वेदना में थे. वे कहते थे, ‘’वागर्थ का प्रकाशन शुरू से ही बड़े संघर्ष और अंतर्विरोधों से घिरा रहा है. इसके चलते मैंने अपनी बहुत तरह से बलि दी है. संस्थान में रहने में मैंने कई बार असुविधा अनुभव की लेकिन वागर्थ में ही मेरी जान अँटकी थी. कितनी वेदना से उन्‍होंने कहा था, ‘’बाजारवाद बलि देना नहीं,लेना जानता है, परन्तु कभी-कभी किसी की बलि से कोई महत्वपूर्ण चीज़ बच भी जाती है.‘’

कोलकाता में वे मेरे संरक्षक जैसे थे. कितनी बार रात में उन्‍होंने अपने संपादकीय फोन पर सुनाए हैं. एक बार उनसे जानना चाहा कि वे लेखन की ओर कैसे मुड़े तो जो बातें बताईं उनसे मन को तनिक ग्‍लानि भी हुई कि कैसा सवाल पूछ लिया. उन्‍होंने बताया,  

"गरीब होना और अनाथ होना शायद बचपन या किशोर काल की सबसे बड़ी विपदा है. पिताजी के निधन के समय 12 साल का रहा हूँगा. वे संस्कृत के अत्यंत गंभीर-प्रतिष्ठित विद्वान थे,स्वाभिमानी, असंग्रही. तो उनका जाना एक साथ अनाथ भी बना गया और गरीब भी. दो बड़े भाई थे, वे भी तब पढ़ ही रहे थे. माँ और मैं साथ थे. गरीबी की चरम सीमा क्या होती है, तभी पहचानी. परन्तु मैं आपसे यह क्यों कह रहा हूँ? कविताएँ अगर तभी से लिखता रहा तो मैं इसे इस परिवेश से, दबाव से जोड़ूँ,यह ठीक नहीं लगता. वह सहज वृत्ति के रूप में आई. बड़े-बुजुर्ग सराहते थे तो बल मिलता था. डॉ.कैलासनाथ काटजू तब भारत के गृहमंत्री थे, वे जावरा के ही थे. उन्हें कविता सुनाई, वे खुश हुए,उन्होंने अपने पास से दस रुपये महीना छात्रवृत्ति दी, यह दिल्ली से आती रही, लेकिन कैसे कहूँ कि कविता के कारण यह हुआ,एक गरीब बालक की मदद भी तो कारण हो सकता है. दसवीं क्लास में ही नौकरी कर ली प्राथमिक विद्यालय में. कई-कई काम एक साथ. नौकरी-अध्ययन प्राय: साथ चले. कविता किन अज्ञात दबावों या धक्कों से जन्मी, इसकी कोई स्मृति मुझे नहीं है, हाँ, भीतर कहीं ये रहे हों तो कह नहीं सकता. लेकिन गद्य की ओर आना तो तात्कालिक दबाव ही था. अध्ययन का क्षेत्र गद्य माँगता था, इसलिए कविता की तन्मयता और एक अलग मानसिकता में बने रहना मेरी परिस्थितियों के विपरीत था. और शायद गद्य में ही कविता को आश्रय भी मिल सकता था और एक खोई हुई मानसिकता से भी मुक्ति भी. संभवत: जीवन के वास्तविक संघर्षों के साथ खड़े रह पाने का भी यह रचनात्मक उपाय था. गद्य लिखते-लिखते पद्य छूट गया और गद्य में पूरी सजगता के साथ उपस्थित रह पाना मन को रुचिकर भी लगने लगा. रचनाकारों की सराहना या रचनाओं की सराहना से गद्य का दौर शुरू हुआ, जो बाद में आलोचनात्मक दृष्टि में विकसित हुआ. लेकिन यहाँ पहली बार लगा कि आत्माभिव्यक्ति अब किसी दूसरे के सहारे की जा रही है. तो क्या आलोचना पराश्रयी विधा है? क्या यह रचना का उपोत्पादन है? क्या यह साहित्य के क्षेत्र में दूसरे दर्ज़े की विधा है? शुरू में शायद ही ये सवाल पैदा हुए होंगे पर ये प्रश्न बाद में उभरे और लगातार ज्यादा गंभीर होते गए. मैं नहीं कहता कि मैंने इनका समाधान पा लिया है,पर अब ये गंभीर नहीं रहे. "

एक बार उनसे पूछा, पहली रचना के प्रकाशन का सुख कैसा होता है. इस निजी अनुभव को किस तरह व्‍यक्‍त करेंगे. वे बोले , बस ऐसा ही लगता है जैसे लंबी दौड़ में जीतने पर खुशी से पहले थकान और टूटन होती है. हाँ एक संतोष मिलता है . पहली से लगा कर आज तक पुस्तक लिखने में मैंने इतना परिश्रम किया कि लगभग हर किताब लिखने के तुरन्त बाद लंबी बीमारी ने मुझे आ घेरा. तो पुस्तक आ जाने पर एक राहत मिलती रही, तब से अब तक. माघ ने लिखा है---क्लेश: फले नहि पुनर्नवतां विधत्ते. क्लेश का फल मिल जाए तो ताज़गी आ जाती है---यही ताजगी आती रही-नई पुस्तक लिखने के लिए फिर से मन तैयार और उत्साहित हुआ. कभी कोई ऐसी विलक्षण खुशी हुई हो--- पहली या दूसरी या अन्य पुस्तक के प्रकाशन के बाद नहीं लगता. इतनी किताबें छपीं-कभी किसी का लोकार्पण या उत्सव मनाने का जी नहीं हुआ. लगा जैसे एक काम से मुक्त हुआ---लेकिन उसके बाद लगातार, एक नया अभाव घेरता रहा. शायद यही अगली पुस्तकें लिखवाता रहा. यह सच है कि अब तक उनकी अनेक किताबें निकलीं पर लोकार्पणके लिए उन्‍हें कोई समारोह इत्‍यादि करने की जरूरत नही महसूस हुई. हां एक बार निबंधों की एक पुस्‍तक आई तो उसका लोकार्पण विश्‍व पुस्‍तक मेले में मेरे अनुरोध पर किताबघर प्रकाशन मंडप में सुपरिचित हिंदी लेखकों केदारनाथ सिंह,कमलेश्वर,अशोक वाजपेयी,पद्मा सचदेव के सान्निध्य में जाने-माने कवि कुँवर नारायण ने किया.

पर सच्‍चा सुख किसी पुस्‍तक के प्रकाशन का तब मिला जब उनकी किताब 'प्रसाद का साहित्‍य: प्रेमतात्‍विक दृष्‍टि' रामलाल पुरी ने आत्‍माराम एंड संस से छापी. वे बताते हैं, 

"मई या जून की दिल्ली की गर्मी में पुस्तक लेकर दिल्‍ली गया. एक दो प्रतिष्ठित लेखकों के सिफारिशी पत्र भी थे. सात दिन तक प्रकाशकों के यहाँ भटकता रहा. किसी ने पूछा-कितने पैसे देंगे. किसी ने पूछा-पुस्तक कितनी बिकवा सकते हैं. किसी ने कहा-पाठ¬क्रम में लगवा सकेंगे इसे या हमारी अन्य पुस्तकों को.. आदि. निराश वापस लौटने के लिए कश्मीरी गेट बस स्टाप परखड़ा था. झोले में पुस्तक थी. सहसा सामने बहुत बड़े बोर्ड पर निगाह गई-आत्माराम एंड संस,सोचा चलो यहाँ भी किस्मत आजमा लेते हैं. पहुँचा. बहुत बड़े काँच के केबिन में वयोवृद्ध रामलाल पुरी जी बैठे थे. मैंने आने का कारण बताया. पुस्तक बताई. उन्होंने स्नेह से बिठाया. कोकाकोला पिलवाया. सारी बातें सुनीं-पुस्तक के विषय में. फिर कहा- एक फार्म देते हैं, भर दीजिए. इसमें सब कुछ लिखदीजिए. हम आपका शोध-प्रबंध दो विशेषज्ञों से पढ़वाएँगे. उन्हें हम पारिश्रमिक देते हैं. उनसे स्वीकृत होने पर हमारे विक्रय विशेषज्ञ इसकी जाँच करेंगे कि पुस्तक छापना ठीक होगा या नहीं. अगर सब सहमत होंगे तो पुस्तक अवश्य छपेगी. हम एक माह में सूचना देंगे. मुझे जीवन की सबसे ज्यादा खुशी हुई कि पुस्तक की जाँच होने पर यह अगर छपी तो अपने गुणों से छपेगी. मुझे विश्वास था कि हर परीक्षा में यह खरी उतरेगी. किताब किसी सिफारिश या प्रलोभन में न छपकरइतने बड़े (उस समय के सबसे बड़े) प्रकाशक द्वारा परीक्षण करके यदि छापी जाए तो पुस्तक का इससे बड़ा सौभाग्य नहीं हो सकता. दो माह बाद सूचना आई. पुस्तक छपेगी. अनुबंध पत्र भी. आप इससे मेरी प्रसन्नता का अनुमान लगा सकते हैं."

भोपाल में रहते हुए उन्‍हें दुष्यंत कुमार, शरद जोशी, शानी, अनिल कुमार, रमेशचंद्रशाह, अशोक वाजपेयी, ज्योत्स्ना मिलन, रमेशदवे, सोमदत्त, भगवत रावत आदि अनेक लेखकों की संगत में रहने का अवसर मिला. बीच में त्रिलोचन जी आ जाते थे. रात के दो दो बजे तक उनके साथ घूमना-बतियाना होता. विदिशा से विजय बहादुर सिंह भी आ जाते, बीच में बालकवि बैरागी भी आते रहते. राजेश जोशी तब तेजी से उभर रहे थे. सुदीप बैनर्जी,चंद्रकांत देवताले,धनंजय वर्मा भी आते रहते. लक्ष्मीकांत वैष्णव भी वहाँ आ गये थे, वेणु गोपाल भी कुछ समय के लिए आए. लेखकों ही नहींपत्रकारों में रामेश्वर संगीत,यशवंत अरगरे,कैलाशचंद्र पंत,ध्यान सिंह तोमर राजा व फजल ताबिश आदि अनेक साथी थे. बुजुर्गों में डॉ.प्रभुदयालु अग्निहोत्री,अम्बाप्रसाद श्रीवास्तव भी थे. भोपाल में उन्‍होंने एक गोष्ठी समवेत चलाई थी. कोई चंदा नहीं,कोई पदाधिकारी नहीं---एक सूचना पर सभी लोग आ जाते. गोष्ठियाँ होतीं. चाय भी खुद के खर्चे से रंगमहल टाकीज़ के कैंटीन पर पीते. बाहर से कभी डॉ.नगेन्द्र, कभी श्रीकांत वर्मा,कभी हरिशंकर परसाई,कभी अली सरदार जाफरी आदि आते तो उन्हें भी गोष्ठी में विशेष आमंत्रित किया जाता. बाद में भी कई नए और प्रखर लेखकों से भेंट हुई. कला,साहित्य परिषद के कारण वहाँ देश भर के लेखकों की आवाजाही होती. यों उनके अनेक सुपरिचित थे पर अंतरंग मित्रों में रमेश दवे, कैलाशचंद्र पंत और स्व.रामेश्वर संगीत प्रभाकर जी को बहुत महत्‍व देते थे.

प्रभाकर जी अध्‍ययनशील आलोचक थे. आलोचना के लिए उन्‍होंने कविता को केंद्र में रखा. शायद उनका अपना कवि मन काव्‍यालोचन में ही सुख पाता था लिहाजा उनसे जानना चाहा कि कवि और कविता को लेकर उनकी प्राथमिकता क्या होती है? वे बोले


"श्रेष्ठ कवि का चयन मैं वाद को सामने रख कर नहींकविता की श्रेष्ठता को सामने रख कर करता हूँ. काव्य मूल्य दरअसल अपने उच्चतर अर्थों में हमारे जीवन मूल्य की संवेदनात्मक और मार्मिक प्रतीति है. आत्म साक्षात्कार है. शब्द और अर्थ के गहरे संयोजन में कविता संवेदन अंतर्दृष्टि, सौंदर्य-बोध, रस बोध, कला समय और समाज बोध उत्पन्न करती है जो हमारे सामने हर समय नए संदर्भों में नवीनता प्राप्त करता है.यही कारण है कि कविता समय और देश की भूमि को अतिक्रांत करती है."

कविता के बारे में, उसके हर पहलू को लेकर मैंने अपनी अनेक पुस्तकों में विस्तार से चर्चा की है. बातचीत में उन्हें समेट पाना संभव नहीं है. बड़ा कवि और बड़ी कविता अपनी अन्विति में कथ्य और रूप को हमारे भीतर नवीन से नवीनतर अर्थ में उद्घाटित करती है. कविता की अंतर्क्रिया जितनी जटिल होती है, उतनी ही जटिल विवेचन प्रक्रिया भी है. इसलिए कोई एक परिभाषा या प्रतिमान अंतिम नहीं हैं. कविता हमारी शक्ति भी है और हमारा सौंदर्य भीवह हमारी चिंता भी है और अनुभूति भी.


मेघदूत के रम्य अनुशीलन (मेघदूत: एक अंतर्यात्रा) ने उनकी लेखनी को बहुत यश दिया है. एक जगह उन्‍होंने कहा भी है कि जब तक किसी रचना का अपना विराट ब्राहृांड नहीं होता,तब तक उसे बड़ी रचना होने का गौरव नहीं मिल सकता. यक्ष को सर्वहारा कहते हुए उनका आस्वादक मन तो यहाँ तक पहुँच जाता है कि मेघ ग्राम यात्रा न करता और सूखी धरती को अंकुरित न करता तो आपके सारे हँसिये बेकार हो जाते. स्पष्ट है कि मेघदूत के सर्जनात्मक अनुशीलन के समय वे व्यर्थ में एक पेड़ कटवा देने के अपराध-बोध से भर उठे थे, पर फिर भी कहते थे, मेघदूत पर लिखना सर्वथा एक नई भाव-भाषा भूमि पर पैर रखना था.

आज आए दिन कविता के प्रतिमान गढ़ने और बदलने की बातें होती हैं. मैं उनसे पूछता हूँ, क्‍या आलोचक को आलोचना को सर्जनात्मक आस्वाद में बदल देने का आकांक्षी होना चाहिए? वे बोले

तो क्या आलोचना को रूखा-सूखा, मस्तिष्क का व्यायाम होना चाहिए? आखिर आलोचना भी साहित्य की एक विधा है. कविराज विश्वनाथ ने लिखा है कि कविता के जो उद्देश्य होते हैं, वे इस साहित्य शास्त्र या आलोचना के होते हैं. सिद्धांतों के उदाहरण स्वरूप संस्कृत आचार्यों ने काव्य से प्राय: सरस पंक्तियाँ चुन कर रखीं, इसीलिए कि वे शास्त्र को सरस बनाना चाहते थे. कविता और आलोचना अपने आस्वादनीय प्रयोजन को भिन्न रीति से पूरा करती हैं. कविता के मर्म में पैठकर आलोचना उसकी आस्वादनीयता को अधिक संप्रेषणीय बनाती है, वह भाषा की परतें खोलती है, अनुभूति या कथ्य को तत्वत: स्पष्ट करती है, कविता में निहित अंत:अर्थ और आयामों को अपनी दृष्टि से जाँचती-परखती है और उन विसंगतियों पर भी उँगली रखती है जो उसकी समझ से कविता को नुकसान पहुँचाती हैं. कविता और आलोचना दोनों ही पाठक को निवेदित हैं. कवि: करोति काव्यानि रसं जानाति पंडित:. कवि रचना करता है, उसका रस या मर्म पंडित या आलोचक समझता है और अपनी समझ से पाठक की समझ का विस्तार करता है.

वे बोले,जहां तक आलोचना के प्रतिमानों का सवाल है वे कविता से ही जन्म लेते हैं. रचना को जो तत्व सौंदर्य प्रदान करते हैं और मार्मिक कौशल से अपने समय, सत्य और जीवनार्थ को व्यक्त करने में सहायक होते हैं, वे ही आलोचना के प्रतिमान बनते हैं, इसे वह(आलोचना) औचित्य और समय की कसौटी पर कसती है और तमाम ज्ञान बिन्दुओं से उसे विशद बनाती है. इसका विस्तृत विवेचन मैंने अपनी पुस्तक कविता की तीसरी आँख में किया है.

प्रभाकर श्रोत्रिय की आलोचना विचारधारा की बंदी  न थी, इसलिए जिस निष्‍ठा से उन्‍होंने प्रसाद और नरेश मेहता पर लिखा, उसी निष्‍ठा से वे मुक्‍तिबोध और त्रिलोचन के प्रशंसक थे. वे कहते थे कि ज्‍यादातर आलोचनाएँ विचारधारा का ही नहीं,संगठनों का मुँह जोहते हुए की जाती हैं. इस तरह ये विचार धारा के प्रति भी ईमानदार नहीं होतीं. वे विचारधाराओं को बंदीगृह मानते थे क्‍योंकि वे लेखक की स्वायत्तता और उसके विवेकसंगत चिंतन को, सब जगह से श्रेष्ठ के चयन के उसके अधिकार को छीनती हैं. जब कि सर्जक की दृष्टि तो उस तथ्य और यथार्थ के पार भी पहुँचती है, जहाँ विचारधाराओं की पहुँच नहीं होती. वे मानते थे कि विचारधारा  की एकांतिकता लेखक से उसका आकाश छीनती है. उनका मानना था कि मुक्तिबोध ने लेखक की जिस राजनीति की चर्चा की है, वह चालू राजनीति नहीं है, उसके गहरे मानवीय अभिप्राय हैं. इसलिए निश्चय ही आलोचना को हर वक्त आत्म-परीक्षण से गुजरना चाहिए. इसके बिना वह न सिर्फ जड़ हो जाती है, बल्कि सड़ जाती है.

वे हजारीप्रसाद द्विवेदी के इस कथन के हामी थे कि दुर्वार काल स्रोत सबको बहा देगा. वही बचेगा जिसे मनुष्य के हृदय में आश्रय प्राप्त होगा. तो ऐसी कौन सी कृतियां होंगी, मेरे पूछने पर वे बोले, सबसे पहले रामचरित मानस का नाम लूँगा. इसके बाद मुझे कालिदास का अभिज्ञान शाकुंतल और मेघदूत प्रिय है. महाभारत और वाल्मीकि रामायण विराट् और अद्भुत सर्जनाएँ हैं. संस्कृत की अनेक कृतियाँ मुझे कई कारणों से प्रिय हैं, जैसे हर्षचरितउत्तर रामचरित मृच्छकटिककादम्बरीमुद्राराक्षसकिरातार्जुनीयम्, आदि. अपभ्रंश की अनेक रचनाओं और रचनाओं के करुण पक्ष ने बहुत छुआ है.हिंदी में मुझे कामायनी और गोदान विशेष प्रिय हैंउर्दू की गालिबफिराक समेत कई शायर और शायरीभारतीय भाषाओं की और विश्व भाषाओं की अनेक कृतियाँ पढींप्रिय लगीं जैसे अन्ना केरेनिनामाँ,गणदेवता. टालस्टाय, दोस्तोव्स्की, सोल्जेनित्सीन वगैरह की कृतियाँ. आत्मकथाओं में गाँधी की आत्म कथा. यह सूची लंबी है. यदि हिंदी की कृतियों और रचनाकारों के नाम लूँ तब तो यह सूची बेहद लंबी हो जाएगी. फिर भी आचार्य शुक्ल, निराला,आचार्य द्विवेदी, अज्ञेय, मुक्तिबोध, जैनेन्द्र, महादेवी, निर्मल वर्मा, कृष्णा सोबती, नरेशमेहता, शमशेर, भारती आदि के नाम न लूँ तो गुस्ताखी हो जाएगी. आखिर अब तक किया ही क्या है---लिखने-पढ़ने के अलावा. किस वक्त कौन-सी कृति, कौन-सी उक्ति मन पर छा जाती है, क्या कहा जाए.

वे अपने अनेक समकालीनों के निकट रहे पर उनमें सुमन जी, नरेश मेहता और जैनेन्‍द्र जी के साथ उनकी अनेक यादें जुड़ी थीं. सुमन जी पर उन्‍होंने शोध किया था. उनका नाटक इला आया तो सुमन जी ने सोचा, प्रभाकर आलोचक हैं तो नाटक भला कैसा लिखा होगा पर एक बार पढा तो अनेक अवसरों पर उसकी चर्चा करते रहे. इसी तरह मेघदूत पर प्रभाकर जी की किताब मेघदूत:एक अंतर्यात्रा  पढ कर उन्‍होंने उसे ऊँचे आसन पर प्रतिष्‍ठित किया जबकि कालिदास के इस नाटक पर न जाने कितनी टीकाएं और व्‍याख्‍याएं लिखी जा चुकी हैं. नरेश जी से उनके कितने घने संबंध बने पर उनकी 65वीं वर्षगांठ पर उन्‍होंने उनकी पुस्‍तक उत्‍सवा पर कुछ तीखा आलेख पढा तो महिमा जी भले थोडा क्रुद्ध हुईं पर नरेश जी ने माहौल को थोडी ही देर में हल्‍का बना कर उसे  सहज बना दिया.

जैनेन्द्र जी के साथ तो वे एक अत्‍यंत रोचक प्रसंग सुनाते हैं. भोपाल, भारत भवन में वे जैनेन्द्र प्रसंग में आए थे. अपने अनुज लेखकों की वे हमेशा खोज-खबर रखते थे. प्रभाकर जी भारत भवन नहीं जाते थे. सो वहाँ कार्यक्रम समाप्त होने के बाद वे प्रभाकर जी और रमेश दवे जी के घर आए. दो-एक लोग साथ थे. जैनेन्द्र जी के मन में कोई बात घुट रही थी. आते ही उन्होंने उनसे पूछा बताओ, रामचंद्र शुक्ल कैसे कवि थे? प्रभाकर जी ने कहा- उनके कवि होने का क्या सवाल है? एक कविता पुस्तक यूँ ही निकली है. जैनेन्द्र जी ने कहा-हाँ मैं भी यही कहता हूँ, आलोचक सर्जक नहीं हो सकता. शुक्ल जी निराला की कविता को भले ही उनसे सौ गुना ज्यादा समझते हों, वे कवि नहीं हो सकते. उन्‍होंने कहा, बाबू जी, सर्जक होने के लिए कवि होना जरूरी नहीं है, सब की अपनी अपनी विधा होती है. आलोचक  भी सर्जक हो सकता है. जैनेन्द्र जी ने फिर जोर दिया-- तो उन्‍होंने हिम्मत करके एक तीखा सवाल दागा. अच्छा, बाबू जी बताइए, आप तो सर्जक हैं न. आप कविता लिखेंगे तो कैसी लिखेंगे. जैनेन्द्र क्षण-भर मेरी ओर देखते रहे. फिर जैसे कमान ढीली कर बोले, हाँ,सो तो है. वे बोले, "एक बड़े-बुजुर्ग लेखक की यह महत्ता है. वरना जैनेन्द्र जी तर्क के अक्षय भंडार थे. वे कोई भी तर्क देकर निरुत्तर कर सकते थे पर उन्होंने अनुज लेखक का मान रखा."

पक्षाघात के समय दिल्ली में वे उनके घर गये. पलंग पर लेटे थे. देखते ही जैसे आँखों में चमक आई और कुछ तरलता दिखी. उन्होंने प्रभाकर जी का पंजा अपने बाएँ हाथ में लिया. पकड़ गज़ब की सख्त थी---दोनों हाथों का बल जैसे एक हाथ में आ गया था. उनका हाथ बतियाता-सा लगा. हाथ भी इतना बोल सकता है यह उन्‍होंने उसी दिन जाना. गों.. गों..जैसी ध्वनि से उन्होंने अपने बेटे से कुछ कहा, उसने कहा, हाँ हाँ चाय आ रही है.... वे  बोले, ’’ऐसी हालत में भी अतिथि के स्वागत की ऐसी चिंता ! ‘’

त्रिलोचन जी के साथ प्रभाकर जी का भोपाल की सड़कों पर रात को दो-दो बजे तक घूमना होता था, जब वे हिंदी ग्रंथ अकादमी में काम करते थे. वे बताते थे


"त्रिलोचन जी मेरे लिए हर मर्ज की दवा थे. दुनिया के जिस विषय को छेड़ दो, चाहे विज्ञान हो या पर्यावरण-- वे घंटों बोलते रहते सप्रमाण. कभी तुलसी और निराला का प्रसंग निकल आए तो बात ही क्या. परन्तु जब भोपाल में घनघोर ठंड पड़ रही थी एक दम सुबह-सुबह घंटी बजी. मैं चौंका, इस ठंड में इतनी सुबह कौन. नींद से उठ कर थोड़ा अस्त-व्यस्त आया तो दरवाजे  की जाली से देखा बाबा नागार्जुन और त्रिलोचन. अरे,इतनी सुबह. मैं स्तब्ध. फिर अपने को सहेजा. भीतर बिठाया और चाय आदि के उपक्रम के बारे में पत्नी को खबर करना ही चाहता था कि बाबा बोले, चाकू लाओ. मैं फिर चौंका. सुबह-सुबह, दो बुजुर्ग कवि चल कर आए और अब ये चाकू माँग रहे हैं. मुझे  भौंचक्का देख कर बाबा ने उसी कड़कती आवाज में कहा, अमरूद काटेंगे और उन्होंने अपने जेब से अमरूद निकाले. कहने लगे- सुबह-सुबह अमरूद खाने से दमा ठीक होता है...’’

प्रभाकर जी के पास अज्ञेय,  पंत,  महादेवी,  दुष्यंत,  भारती,  चंद्रकांत बांदिबडेकर, शिवप्रसाद सिंह, श्रीराम लागू, कृष्णा सोबती, राजी सेठ, अवध नारायण मुद्गल, चित्रा मुद्गल आदि-आदि के ढेरों प्रसंग थे  जिस पर एक पुस्‍तक ही बन जाए. शायद इस बारे में उन्‍होंने कहीं कुछ लिख भी रखा हो. 

पर एक  प्रसंग तो अविस्‍मरणीय है. शरद जोशी की पत्नी इरफाना जी शायद एम.ए. कर रही थीं. उन्होंने प्रसाद विशेष कवि लिया था या प्रसाद पढ़ना चाहती थीं. शरद जी के घर आए दिन जाना होता था. एक दिन उन्होंने प्रभाकर जी से पूछा, ‘’प्रसाद पर तो तुमने पीएच.डी की है. इरफाना को प्रसाद पढ़ा दो.‘’ फिर पूछा, ‘’तुम्हारा टापिक क्या था?’’ उन्‍होंने कहा, "प्रसाद साहित्य में प्रेम तत्व." शरद जी कहने लगे, "ऐसा करो, प्रसाद तुम पढ़ा दो, प्रेम तत्व मैं पढ़ा दूँगा." और फिर प्रभाकार जी का जोर का ठहाका. 

आज सोचता हूं कि कितने मनोविनोदी थे वे. आज जरा सी बात पर लोग मुंह फुला लेते हैं, आलोचक तो अपनी ठसक में ही रहता है, पर प्रभाकर जी ने अपने पर अपने आलोचक को जरा भी हावी नही होने दिया . एक सरल तरल व्‍यक्‍तित्‍व वे हमेशा बने रहे.

'सुमनः मनुष्य और स्रष्टा', 'प्रसाद को साहित्यः प्रेमतात्विक दृष्टि', 'कविता की तीसरी आँख', 'संवाद', 'कालयात्री है कविता', 'रचना एक यातना है', 'अतीत के हंसः मैथिलीशरण गुप्त', जयशंकर प्रसाद की प्रासंगिकता'. 'मेघदूतः एक अंतयात्रा, 'शमशेर बहादूर सिंह', ‘नरेश मेहता’ 'मैं चलूँ कीर्ति-सी आगे-आगे', से लेकर कवि-परम्‍परा तक हिंदी में उन्‍होंने आलोचना की एक सुगठित शास्‍त्रीय परंपरा तैयार की. उनके लिखे नाटक इला, फिर से जहांपनाहसॉंच कहूं तो  जीवन, इतिहास और मिथक में एक नए कथ्‍य के जरिए प्रवेश करते हैं. सौंदर्य का तात्पर्य', 'समय का विवेक', 'समय समाज साहित्य', 'हिन्दी - कल आज और कल',शाश्‍वतोयं प्रजा का अमूर्तन में उनका निबंधकार एक चिंतक की भूमिका में दिखता है तो भारत में महाभारत उनके जीवन की सबसे महत्‍वपूर्ण पुस्‍तक के रूप में पहचानी गयी, जिसमें उन्‍होंने अपने वैचारिक जीवन की पूरी पूँजी लगा दी. उनके निबंधों के बारे में संत साहित्‍य विशेषज्ञ शुकदेव सिंह का कहना था कि उनके निबंध(आज व्यक्तिवादी चित्तवृत्ति को केंद्र में लेकर लिखे जा रहे संपादकीयों के सापेक्ष)निबंध के विकल्प के रूप में एक सात्विक विधा का आविष्कार हैं.

  
मध्यप्रदेश के रतलाम जिले की जावरा तहसील में 19 दिसंबर,1938 को जन्मे श्रोत्रिय जब बारह वर्ष के ही थे तभी पिताजी की मृत्यु हो गयी. वे संस्कृत के प्रतिष्ठित विद्वान और एक स्वाभिमानी व्यक्ति थे. उनके जाने से श्रोत्रिय और उनके दोनों बड़े भाइयों के सिर से एक ऐसा आश्रय उठ गया जिसकी पितृ-वत्सल छाँह में उनका व्यक्तित्व आकार पा रहा था. गरीबी की चरम सीमा क्या होती है, यह श्रोत्रिय को सदैव याद रही. तभी उनमें कविता के प्रति ललक जागी थी और ऊपर उन्‍होंने कहा ही है, जब जावरा के ही डॉ.कैलाशनाथ काटजू,जो उन दिनों भारत के गृह मंत्री थे, को उन्होंने अपनी कविता सुनाई तो वे बेहद खुश हुए और श्रोत्रिय को दस रूपये महीने की छात्रवृत्ति दी जो दिल्ली से आती रही. किन्तु अभावों के दिन केवल छात्रवृत्ति से नहीं कटते, उसके लिए अपने कंधे मजबूत करने होते हैं. लिहाजा दसवीं कक्षा में पढ़ते हुए ही उन्होंने एक प्राथमिक विद्यालय में नौकरी कर ली और फिर नौकरी व पढ़ाई साथ साथ चले. क ख ग से लेकर डिग्री कक्षाओं तक श्रोत्रिय ने अध्यापन कार्य किया तथा बाद में हमीदिया महाविद्यालयभोपाल में वे हिंदी के प्राध्यापक नियुक्त हुए. इस बीच उन्होंने पीएच.डी और डी.लिट की उपाधियाँ भी हासिल कीं. उन दिनों श्रोत्रिय गद्य लेखन और आलोचना की ओर सक्रियता से उन्मुख थे,यहाँ तक कि उस जमाने की लगभग सभी प्रतिष्ठित साहित्यिक पत्रिकाओं में उनके लेख देखे जा सकते थे, जिसकी सुगंध छिपी न रह सकी. 

मध्यप्रदेश साहित्य परिषद में खाली हुए सचिव के पद के लिए किसी ऐसे उपयुक्त व्यक्ति की तलाश मध्यप्रदेश सरकार को थी जो सचिव पद के साथ-साथ साक्षात्कार का भी संपादन संभाल सके. शासन से इसके लिए बुलावा आने पर उन्होंने संकोच के साथ प्रतिनियुक्ति पर मध्यप्रदेश साहित्य परिषद के सचिव की बागडोर सँभाली तथा पहली बार अध्यापन के अनुशीलनपूर्ण वातावरण से निकल कर साहित्य की मानक पत्रिका साक्षात्कार के संपादन जुड़े जो उसके पहले सुप्रसिद्ध कथाकार शानी के संपादन मे निकलती आ रही थी. सरल-ह्मदय और अध्यापक डॉ.श्रोत्रिय के लिए वे बेहद कठिनाई और चुनौतियों के दिन थे. 

शानी के बाद साक्षात्कार का संपादन कोई हँसी-खेल नहीं था. श्रोत्रिय पत्रकारिता की दुनिया और साहित्यक संपर्कों के मामले में निपट अज्ञातकुलशील थे. संपादकीय बस्ते रचनाओं से खाली थे. महीनो तक रचनाकारों से उन्हें कोई सहयोग भी नहीं मिला, लिहाजा साक्षात्कार का प्रकाशन लंबित रखना पड़ा. लगभग छह महीने की तपश्चर्या और विरोधों से सामंजस्य बिठाते हुए श्रोत्रिय ने साक्षात्कार का प्रकाशन पुन: शुरू किया और पहले ही अंक की आभा ने उसे लेखकों-कवियों की पलकों पर बिठा दिया. उन्होंने मध्य प्रदेश साहित्य परिषद के सचिव पद पर रहते हुए मध्यप्रदेश कला परिषद के वर्चस्व को भी खत्म किया,जिसका प्रभामंडल उन दिनों साहित्य परिषद पर काफी हावी हुआ करता था. अपने सचिव-काल में श्रोत्रिय ने साक्षात्कार को यश के शिखर पर पहुंचाया. साक्षात्कार के संपादन से विरत होने के बाद वे फिर अध्यापन से जुड़े और कुछ अंतराल पर मध्यप्रदेश राष्ट्रभाषा परिषद की पत्रिका अक्षरा निकाली. तब श्री बैजनाथ प्रसाद दुबे परिषद के सचिव हुआ करते थे. किन्तु बाद में जब लेखकों को पारिश्रमिक देने की कोई व्यवस्था न रह गई तो उन्होंने अक्षरा का संपादन छोड़ दिया. तीन वर्ष तक अक्षरा के बंद रहने के बाद फिर श्रोत्रिय ने ही अक्षरा का संपादन हाथ में लिया.

मान-सम्‍मान तो प्रभाकर जी को बहुतेरे मिले पर साहित्‍यिक पुरस्‍कार बहुत कम----न साहित्‍य अकादेमी, न व्‍यास सम्‍मान, न भारत भारती, न साहित्‍य भूषण, न मूर्ति देवी, न शलाका, न शिखर सम्‍मान, न कबीर सम्‍मान, न मोदी सम्‍मान, न गोयनका सम्‍मान, न केंद्रीय हिंदी संस्‍थान सम्‍मान ही--- पूछने का मन होता है कि क्‍या वे इन पुरस्‍कारों के योग्‍य न थे ? आखिर क्‍या दिया इस प्रखर आलोचक को इस हिंदी समाज ने. आलोचना निबंध नाटक और संस्‍कृति को लेकर इतने अकूत काम जिसमें उनकी शाश्‍वतोयं,  भारत में महाभारतकवि परंपरा जैसी तमाम कृतियां शामिल हों, उस विदग्‍ध, समावेशी आलोचक और सम्‍मोहक वक्‍ता का हिंदी समाज और संस्‍थाओं ने कैसा सम्‍मान किया है, यह हमारे सामने है. वे भारतीय ज्ञानपीठ, साहित्‍य अकादेमी, भारत भवन, मध्‍यप्रदेश संस्‍कृति विभाग तथा अनेक संस्‍थाओं के सदस्‍य रहे, जूरी में रहे, सबकी झोलियां पुरस्‍कारों सम्‍मानों से भरते रहे, पर उनकी अपनी झोली पुरस्‍कारों से खाली रही. हा धिक्.


उनके ठहाकों और मुक्त हँसी का अपना एक क्षितिज था. इससे उनके भीतर भी कहीं दुख जैसा किसी चीज का निवास है या नहीं यह पता नही चल पाता था. या फिर राजेश जोशी  के शब्दों में उन्‍हें भी बहुत सफाई से अपनी हँसी में अपने आँसू छिपा लेने की महारत हासिल थी? इस बात पर उनका कहना था, "मेरे मनहूसपने, क्रोध और दुख को भी कुछ लोगों ने देखा होगा, जिन्हें मैं इनके सिवा कुछ दे नहीं सकता था. कुछ शायद घमंडी, औपचारिक व अंग्रेजी में फार्मल भी कहते होंगे. आपको ठहाके दिखे तो शुक्रगुज़ार हूँ. और जहाँ तक दुख की बात है तो वह कहाँ नहीं है. हमसे भी कई गुना दुखी लोग संसार में हैं, उनके आगे अपना दुख बहुत छोटा लगता है और शायद हास्यास्पद भी. मुझे लगता है,दुख को अपने में नहीं,दूसरों में देखने से ही रचना का बृहत् संवेदन-संसार बनता है."

एक बार मैंने यों ही पूछ लिया था कि आपका अपना ही प्रिय स्तंभ है: यदि जीवन दुबारा जीने को मिले. इस संबंध में अपने को ही रख कर देखें तो? प्रभाकर जी कहने लगे, "जो कर रहा हूँ वही सब करना, जिसके लिए एक जीवन बहुत छोटा पड़ता है. कई भाषाएँ सीखूँ यह भी चाहता हूँ. खैर, पता नहीं, अगली जिंदगी मिले या नहीं मिले, मिले तो कौन सी. जिस तरह काम करता रहा हूँ पूरी जिंदगी, उससे गधे की ही जिंदगी मिल गई तो?’’ 

यह थे प्रभाकर जी. अपनी मुद्रा, अपनी वाचिकता, अपनी  ईमानदारी और अपनी मर्मस्‍पर्शिता व स्‍वाभिमान से उन्‍होंने अपनी शख्‍सियत में किसी को सेंध नहीं लगाने दी. वे अविजित रहे. दीनता और हीनता का रोना नहीं रोया. उन्‍हें याद करते हुए महावीरप्रसाद द्विवेदी की कही बात याद आती है. वे सरस्‍वती के संपादक थे. रेलवे की बड़ी नौकरी छोड़ कर संपादन का काम सम्‍हाला था. सरस्‍वती के आखिरी संपादकीय में उन्‍होंने लिखा कि मुझ पर दुखों के पहाड़ टूटे किन्‍तु सरस्‍वती के पन्‍नों पर  मैंने इसका रोना नहीं रोया. प्रभाकर जी ने यही लीक अपनाई. अक्षरा, साक्षात्‍कार, वागर्थ, नया ज्ञानोदयसमकालीन भारतीय साहित्‍य के माध्‍यम से उन्‍होंने खुद के साथ साथ सहयोगी लेखकों के स्‍वाभिमान और यश की रक्षा भी की. उनका माथा हीनता से झुकने नहीं दिया. जिस तरह का विवाद रवींद्र कालिया के जमाने में नया ज्ञानोदय के साथ बाद में हुआ, उसे देख कर वे सिर धुनते थे कि आखिर हिंदी के लेखकों संपादकों को क्‍या हो गया है?  
प्रभाकर श्रोत्रिय के व्‍यक्तित्‍व के अनेक आयाम हैं. सुधी आलोचक, समावेशी संपादक व प्रखर वक्‍ता तीनों रूपों में वे अद्वितीय रहे हैं. सच कहें तो सुगठित सौंदर्य के स्‍वामी प्रभाकर जी के व्यक्‍तित्‍व से स्‍वत्‍व की सुगंध आती थी. आलोचक के रूप में उन्‍होंने जयशंकर प्रसाद, शिवमंगल सिंह सुमन, मैथिलीशरण गुप्‍त, शमशेर व नरेश मेहता पर एक आधिकारिक आलोचक के रूप में लेखनी चलाई है तो संपादक के रूप में उन्‍होंने साहित्‍यिक पत्रकारिता की एक अलग ही लीक खींची. प्रभाकर जी ने नये रचनाकारों के हिमायती थे. ज्ञानपीठ से नए कवियों बोधिसत्‍व, प्रेमरंजन अनिमेष, अरुण देव, बसंत त्रिपाठी, संजय कुंदन व निर्मला पुतुल आदि की पुस्‍तकें छापीं तो उन पर बड़े लेखकों से ब्‍लर्ब लिखवाए. उन्‍हें  साहित्‍य की मुख्‍य धारा में प्रतिष्‍ठित करने का काम किया. उनकी भाषण कला बेजोड़ थी. वे पोडियम पर खड़े होते थे या मंच पर विराजमान तो लगता था, सरस्‍वती वहीं कहीं उनके आस पास ठिठक कर खड़ी हैं. 

पूरा माहौल उनके संबोधन से मुखरित हो उठता था. वे बोलते थे तो लगता था हमारी कवि-परंपरा का कोई निष्‍णात व शास्‍त्रज्ञ कवि बोल रहा है. उनकी भाषा में पांडित्‍य भी था, लालित्‍य भी. वे अपने संचालन से किसी भी समारोह को उत्‍सव बना देते थे. अपने संपादकीयों में वे एक ऐसे चिंतक के रूप में उभरे जो केवल कविता कहानी के आस्‍वादन में ही डूबा नहीं रहता बल्‍कि सामाजिक परिप्रेक्ष्‍य को एक विचारक के रूप में अवलोकित आकलित करता है. वे चले गए हैं तो लगता है मालवा के मौलश्री की सुगंध खो गयी है. एक व्‍यक्‍तित्‍व कहीं दूर क्षितिज के अंधकार में कहीं विलीन हो गया है.
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डॉ. ओम निश्‍चल
जी-1/506 ए
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