निज घर : मुकुल शिवपुत्र पर सीरज सक्सेना : पीयूष दईया

Posted by arun dev on अक्तूबर 19, 2016























(मुकुल शिवपुत्र का गायन)


मशहूर हिन्दुस्तानी शास्त्रीय गायक और कुमार गन्धर्व के पुत्र मुकुल शिवपुत्र किंवदन्ती में बदल गए हैं. उनकी मयनोशी और अपारम्परिक जीवन शैली के तमाम किस्से हवाओं में बिखरे हैं. 
पहली टकराहट तो उनकी अपने पिता से ही हुई, बाद में पत्नी के असमय निधन ने उन्हें दरवेश बना दिया.

प्रसिद्ध चित्रकार और सिरेमिक आर्टिस्ट सीरज सक्सेना का लम्बा संग साथ मुकुल शिवपुत्र के साथ रहा है.  यह संस्मरण उसी का सुफल है.

कवि-रंगकर्मी पीयूष दईया से सीरज सक्सेना की बातचीत में यह संस्मरण बुना गया है. 
संगीत में रूचि रखने वालों के लिए यह रुचिकर है, कलाओं के साझा घर की भी यह एक आत्मीय बैठकी है जिसमें कलाकारों के अंतर्मन आलोकित हैं. 


मुकुल शिवपुत्र                                                         
सीरज सक्सेना के साथ पीयूष दईया की बातचीत





(एक)
सीरज सक्सेना
रामचरितमानस में मेरी रूचि बचपन से रही है. मुकुल शिवपुत्र जी से मिलने के बाद मानस के रहस्य मुझ में खुलने-फैलने लगे. उनसे मिलना इस तरह से अविस्मरणीय है कि उसे अब तक मैं संस्मरण का दर्जा नहीं दे सका हूं.

भारत भवन में आयोजित होने वाली संगीत-सभाओं में मैं बराबर जाता था और वहां यदा-कदा पं. मुकुल शिवपुत्र का ज़िक्र होता रहता था. कभी उदयन (वाजपेयी) बोलते-बताते थे, कभी अखिलेश. इन बातचीतों से मेरा उनसे परोक्ष परिचय बनने लगा. इन चर्चाओं से मेरे मन में उनकी छवि एक गूढ़ संगीतकार/गायक की बनी. वे ऐसे शख़्स लगे जो स्वयं अपने महत्व से उदासीन हो. निर्लिप्त. कभी उनके औघड़ व्यक्तित्व के बारे में सुनने को मिलता. एक दिन शाम में अखिलेश के यहां उदयन आए हुए थे. मैं वहां अक्सर रहता ही था. अखिलेश बड़े उदारमना हैं. मैं कभी भी समय-असमय उनके यहां चला जाता था लेकिन मेरी उपस्थिति से कभी भी उनके चेहरे पर कोई शिकन नहीं आई. मैं भी अपनी मर्यादा का उल्लंघन नहीं करता था. मैं उन दोनों की बातचीत सुन रहा था. उन दिनों सुनने में ही भलाई लगती थी, अपनी सीमाओं व अज्ञान का मुझे पता था. रात में लगभग दस बजे जब उदयन जाने लगे तो मुझे भी साथ लेते चले अपने गेस्ट हाउस छोड़ने के लिए. मेरा गेस्ट हाउस उनके घर के रास्ते में ही था. रास्ते में उन्होंने मुझसे कहा कि अगर मुझे जल्दी नहीं है तो हम मुकुल से मिलने चलते हैं. मैं सहर्ष तैयार था. मुकुल पोलीटेक्नीक कॉलेज के पीछे किसी शिक्षकों के अतिथि-गृह में रह रहे थे. हम उनके कमरे पर पहुंचे. दस्तक दी. अन्दर से आवाज़ आयी--’’कौन है?’’ उदयन ने कहा--’’मैं उदयन.’’ भीतर से स्वर बाहर आया--’’आ जाइए, खुला है.’’ हम अन्दर दाखि़ल हुए. कमरे में प्रकाश मद्धिम था. हल्की दाढ़ी और धोती-कुर्ता पहने एक देसी आदमी वहां बैठे थे. कमरा छोटा था, जिस लैम्प से प्रकाश फैला था वह भी. एक गिलास रम से भरा था और साथ में एक और गिलास था जिसमें दूध था. मुकुल और उदयन के बीच कुछ देर औपचारिक बातचीत चलती रही. मैं सब कुछ सुनने के बजाय देख रहा था. रोमांचित. साक्षात्. फिर हम वहां से लौट आए. उदयन जी ने मुझे मेरे गेस्ट हाउस छोड़ा. रात-भर मैं मुकुल जी के बारे में सोचता रहा. नींद मुझे अपने घेरे में नहीं ले सकी.





(दो)
सुबह आठ बजे मैं अपनी साइकिल से मुकुल जी के कमरे पर पहुंच गया. पहले मैंने उन्हें अपना परिचय दिया कि मैं कल उदयन जी के साथ आया था. और आप के बारे में सभी से सुनता रहा हूं. मिलने की जिज्ञासा थी इसलिए आया हूं. उन्होंने कहा--’’अच्छा, ठीक है.’’ उन्होंने मुझे दूध पिलाया. पूछा--’’कहां रहते हो?’’ मैंने बताया-- "भारत भवन के अतिथि-गृह में. वहां एक बड़ा फ्लैट है जिसके एक कमरे में मैं रहता हूं.’’ उन्होंने कहा--’’अच्छा, चलो चाय पीने चलते हैं.’’ हम नीचे आए. उन्होंने एक झोले में अपना सामान रख रखा था. मैंने अपनी सायकिल ले ली. वहीं पोलिटेक्नीक के आसपास चाय की कई छोटी-छोटी गुमटियां है. हमने चाय पी. तब उन्होंने मुझसे कहा कि मैं तुम्हारे साथ चलता हूं. तुम्हारे कमरे पर. मैंने कहा--’’हां, ज़रूर.’’ मैंने उन्हें सायकिल पर बिठाया और हम चल पड़े. हमीदिया कॉलेज के सामने आए और उन्होंने कहा, अब रूको. रुक गये. बोले--"यहां से पैदल चलते हैं.’’ वहां से मेरा गेस्ट हाउस नज़दीक ही था. प्रोफेसर्स कालोनी में. हम कमरे तक पैदल गये. उन्हें वहां अच्छा लगा. उन्होंने खाना बनाया. हम दोनों ने खाया. मेरा भारत भवन जाने का समय हो चुका था. मैंने उनसे कहा कि मुझे स्टूडियो जाना होगा पर वे वहीं रहे, कोई दिक़्क़त नहीं है. बोले--"हां, ठीक है. मैं यहीं हूं. तुम कब आओगे?’’ मैंने कहा--दोपहर में खाना खाने. फिर वापस चला जाऊंगा और शाम में छह-सात बजे तक फ़ारिग हो जाऊंगा.’’ बोले--अच्छा.’’ दोपहर में जब कमरे पर पहुंचा तो उन्होंने बढ़िया खाना बना कर तैयार रखा हुआ था. मैंने खाना खाया, चला गया. शाम में लौटा. बातचीत करते रहे. रात में मैं रामचरित मानस पढ़ रहा था. वे बोले--’’क्या पढ़ रहे हो?’’ मैंने कहा--रामचरित मानस.वे बोले--’’अच्छा, जोर से पढ़ो.’’ मैं बाल काण्ड पढ़ रहा था सो उसी में आगे उन्हें सुनाने लगा. थोड़ी देर में तो वे रोने लगे. मुझे समझ नहीं आया कि एकदम क्या हो गया कि वे रोने लगे हैं. बोले--ऐसे पढ़ते है? क्या तुम्हें पढ़ना नहीं आता है?’’ मैंने कहा--’’पढ़ तो रहा हूं. चौपाई.’’ बोले--ऐसे नहीं पढ़ते हैं. मैं पढ़ कर सुनाता हूं.’’ वे पढ़ते और एक चौपाई की व्याख्या आधा घण्टे तक करते. मानस-शब्दावली उनके जरिये मुझे कण्ठस्थ हो गयी है. आज जब मैं एक चौपाई पढ़ता हूं तो उसका अर्थ पढ़ते-पढ़ते ही समझ में आने लगता है. फिर ऐसा होने लगा कि कभी मैं पढ़ता था, वे व्याख्या करते थे. कभी अचानक भावुक हो जाते, कभी ख़ामोश. यह हमारी दिनचर्या का हिस्सा बनने लगा. हम शाम में पाठ करते. पहले बाक़ायदा अगरबत्ती जलाते. फिर पाठ चलता. पाठ के बाद परांठे वग़ैरह बनते. वे बड़े धार्मिक शख़्स हैं. खास कर बाल-काण्ड उन्होंने बहुत अच्छे से सिखाया.

उस दिन आने के बाद वे मेरे साथ लगभग सात-आठ महीने लगातार रहे.

(मुकुल शिवपुत्र के हस्ताक्षर)



(तीन)
रामचरित मानस पढ़ते पढ़ते उनको कुछ कम्पोजिशन याद आ जाती थी. वे अचानक गाने लगते थे. पूछते--’’कुछ समझ में आया?’’ मैं कहता--’’नहीं, लेकिन गाना अच्छा लगा.’’ कभी कोई पुराना फ़िल्मी गाना भी सुना देते थे. कभी भजन सुनाने लगते थे. उन्हीं दिनों में उन्होंने भारत भवन में रामचरित मानस पर एकाग्र एक परर्फोरमेंस दिया. एक दिन मैं और पण्डित जी (हम मुकुल शिवपुत्र को पण्डित जी कह कर बुलाते थे) हम दोनों ध्रुव शुक्ल से मिलने गये. उन्होंने ध्रुव जी से कहा मैं रामचरित मानस पर गाना चाहता हूं.उन्होंने कहा--’’हां, आप तय कीजिए कहां गाना है, कब गाना है. मैं आयोजन का बन्दोबस्त कर देता हूं.’’ कुछ दिनों बाद भारत भवन में उन्होंने रामचरित मानस से कुछ चौपाइयां गाईं. पूरी जगह श्रोताओं से भरी थी. कह सकते हैं कि भीड़ उमड़ पड़ी थी. शाम में छह बजे उन्हें गाना था. वह संस्कृति विभाग का आयोजन था. सरकार की ओर से. तय हुआ कि दिग्विजय सिंह, मुकुल जी को गुलदस्ता देकर, उनका स्वागत करेंगे और फिर वे गाएंगे. चार बजे सफ़ेद रंग की लाल बत्ती वाली गाड़ी गेस्ट हाउस आ गयी. मुकुल जी मेरे साथ ही रह रहे थे. सो उन्हें लिवाने के लिए.



(चार)
अच्छा, पण्डित जी अभिनय भी ज़बरदस्त करते थे. अपने होने की महत्ता भी दिखाते थे. जब कभी ज़रूरत होती. अपनी तरह से. कभी बिलकुल सहज रहते, कभी ऐसे हो जाते कि कोई उन्हें हाथ तक नहीं लगा सकता. कि वे महान संगीतकार है. बहुत दफ़ा उनसे तूतू-मैंमैं भी हो जाती थी. वे बिलकुल हमउम्र दोस्त की तरह लड़ने लगते थे और मैं उन्हें पूरी इज़्ज़त देते हुए लड़ता था. बहरहाल, वे सज्जन जो उन्हें लेने आए थे, उन्होंने दरवाज़ा खटखटाया. मुकुल जी ने मुझसे कहा कि जाओ, दरवाज़ा खोलो. मैंने खोला. सज्जन ने पूछा--’’मुकुल जी हैं?’’ मेरा जवाब था--’’हां, हैं.’’ उन्होंने कहा--’’आप उन्हें बता दीजिए कि गाड़ी लेने आयी है.’’ मैंने कहा--जी.’’ मुकुल जी से कहा कि गाड़ी आ गयी है सो चलते हैं. उन्होंने कहा--नहीं. अभी नहीं. उनसे कह दो कि वे आ रहे हैं.’’ एक घण्टा वह सज्जन इन्तज़ार करते रहे. फिर आए और बोले कि चलना चाहिए, विलम्ब हो रहा है. मुकुल जी बाहर आए और उनसे बोले--’’तुम जाओ. मैं ख़ुद आ जाऊंगा.’’ थोड़ी देर बाद मैंने कहा कि पण्डित जी पांच बजने को आए हैं. यहां से पैदल चलेंगे तो आधा घण्टा पहुंचने में लग जाएगा और छह बजे कार्यक्रम है. मुख्यमन्त्री आपका स्वागत करेंगे. मुझे बोले--’’तुम्हें जल्दी है. तुम जाओ.’’ मुझे लगा कि उन्हें सही वक़्त पर कार्यक्रम-स्थल तक पहुंचाना मेरी ज़िम्मेवारी है. मैंने फिर आग्रह किया. बोले--’’अच्छा, चलते हैं.’’ बगल में झोला. पांव में मोजे व चप्पल. कुरता पहने, कंधे पर गमछा और हाथ में अपना काला छाता लिये..उस दिन वे ऐसे चल रहे थे जैसे कोई राजा जाता हो. छाते की उस समय कोई ज़रूरत नहीं थी. लेकिन उनके हाथ में छाता ऐसे था जैसे प्रतिष्ठा का प्रतीक. हम पैदल चलते चलते ..पार्क तक पहुंचे. वहां एक पान की दुकान है. पण्डित जी ने कहा कि चलो पान खाते हैं. मैंने कहा--’’पण्डित जी विलम्ब हो रहा है.’’ मैं चलने का आग्रह कर रहा था और वे पानवाले को यह समझा रहे थे कि उन्हें कैसा पान चाहिए. चूना इतना, इस तरह कि कत्था ऐसे लगाये कि..पन्द्रह-बीस मिनट तक तो वे पानवाले को यह समझाते रहे कि उन्हें किस तरह का पान खाना है. फिर उसने पान बनाया. पण्डित जी ने मुंह में रखा और हम वहां से आगे चले. जब भारत भवन पहुंचे तब तक छः बज कर पन्द्रह मिनिट हो चुके थे.



(पांच)
अब उन्हें तो पता था कि क्योंकि मन्त्री का मामला है, सो वह देर से ही आएगा, लेकिन मुझे तब यह बात पता नहीं थी. वे अपने समय पर ठीक ही पहुंच गये थे. दिग्विजय सिंह आए साढे छः बजे जबकि छः बजे का समय तय था. यह शायद मुकुल जी को ठीक नहीं लगा. वे अपने ग्रीन रूम में थे. भारत भवन में कलाकार का सम्मान बहुत गहरा था. जैसे स्टूडियो बन्द होने का समय पांच बजे का है लेकिन अगर कोई कलाकार रात में दस बजे तक काम कर रहा है तो चौकीदार वहीं रहता था. यह नहीं कह सकता था कि पांच बज गये हैं और आप जाइए. बाहर गुन्देचा बन्धु उनका तानपूरा ट्यून कर रहे थे. सारंगीनवाज़ थे, सारंगी वादक सरवर खान के दादाजी. सभी मुकुल जी को बहुत गम्भीरता से ले रहे थे. पूरी दर्शक-दीर्घा खचाखच भरी हुई थी. मुकुल जी के कार्यक्रम का सभी को बेसब्री से इन्तज़ार बना रहता था. सभी समय से पहले ही आ गये थे. मुकुल जी को अपने होने, गाने व आवाज़ की गम्भीरता का पता था. ख़ैर! औपचारिक उद्घोषणा शुरू हो चुकी थी कि अब हम श्री मुकुल शिवपुत्र को आमन्त्रित करते हैं और मुख्यमन्त्री को कि वे उन्हें गुलदस्ता भेंट करें. उद्घोषणा हो गयी और पांच मिनिट बीत गये पर पण्डित जी नहीं आए. वे परदे के पीछे ही खड़े हुए थे कहीं. दिग्विजय सिंह स्टेज पर गुलदस्ता ले कर खड़े रहे. थोड़ी देर बाद वे आए और औपचारिक रस्में पूरी होने के बाद उन्होंने गाया. तीन घण्टे तक. अद्भुत गायन था. अमर.



(छह)
कई बार वे शराब पी कर इतने धुत्त हो जाते थे कि उन्हें ऑटो से लाना पड़ता था. बहुत बार जेबें रूपयों से भरी होती थी. कई दफ़ा किसी कार्यक्रम के बाद वे सीधे बार में जा कर बैठ जाते थे. फिर किसी तरह लड़खड़ाते कमरे तक पहुंचते. ऑटोवाले उन्हें जानने लगे थे. कई दफ़ा सीढ़ियां चढ़ते हुए जेबों से नोट गिर जाते. फिर सुबह उठने पर हमसे कहते--तुमने मेरे पैसे ले लिये.’’ हम उन्हें बताते, पण्डित जी रूपये ऑटो में गिरे थे और ऑटोवाले ने ऑटो से रूपये निकाल कर दिये हैं. सीढ़ियों से कितने ही पांच पांच सौ के नोट उठा कर ख़ुद मैंने रखे हैं. हम आपके पैसे क्यों लेंगे. बहुत लड़ाई-झगड़े चलते रहते थे.





(सात)
वे चिलम भी ख़ूब पीते थे. उनका पूरा एक पर्व चलता था. अगर शराब पी रहे हैं तो सात-आठ दिन लगातार पीते रहते थे. सुबह से शाम तक. ज़्यादातर वक़्त कमरे में रहते थे और कम बोलते थे. बीच बीच में गाते भी रहते थे. खाना ख़ुद ही बनाते थे. उनका खाना अक्सर गरिष्ठ होता था. खाना बनाने के लिए जो सामग्री होती थी उसमें बढ़िया आटा और रसोईघर में दूध का होना बहुत ज़रूरी है और एक लीटर देसी घी. पनीर होना ज़रूरी है और मक्खन. जब नहीं होता था तब वे ले कर आते थे. बड़ा अलग ढंग का खाना बनाते थे. उनके हाथ में मानो स्वाद बसता है. इतना स्वादिष्ठ भोजन. दाल बना रहे हैं तो उसमें दूध भी डाल देते थे तब भी ग़ज़ब का स्वाद आता था. हम बड़े लालच के साथ खाते थे. कई बार तो उन्होंने हमें आलू और भांग की सब्जी खिला दी, मेथी की बोल कर. सोयाबीन की बड़ी, आठ रूपये क़िलो वाला चावल और सोयाबीन का सस्ता वाला तेल. जीरा, राई, हरीमिर्च वगै़रह : यह हमारा मीनू होता था पर पण्डित जी के आने के बाद हमारा मीनू बदल गया. वे अपना ले कर आते थे. कई बार सेण्डविच बनाते थे.





(आठ)
वे यह कोशिश करते थे कि मैं कहीं जाऊं नहीं. न भारत भवन न कहीं और. इतना खिला देते थे कि कहीं जा ही न सकूं, नींद आती रहे. यहीं बना रहे. कई बार लेने आ जाते थे, भारत भवन. बीच के दिनों में मुझे रोकने का वे बहुत आग्रह करते. कहते कि इस पेंटिग में कुछ नहीं रखा. मैं तुम्हें तानपूरा सिखा देता हूं. ऐसे उल्टे दौरे उनको पड़ते रहते थे. एक बार तो काफ़ी लड़ाई-झगड़ा कर के मैं सुबह दस बजे कमरे से निकल गया. उनके आने के बाद से मेरा भारत भवन के सिरेमिक्स के स्टूडियो में जाना कम होने लगा था. पहले मैं नियमित व अनुशासित था. इतवार हो या सोमवार, रोज़ जाता था. स्टूडियो मैं ही खोलता था और आख़ीर में मैं ही आता था. अब नागे होने लगे थे. मैंने पहचाना कि इस का असर मेरे काम पर पड़ रहा है. मैं जाने लगा, तो उन्होंने रोक लिया कि आज तुम नहीं जाओगे. मैंने कहा--’’मैं भोपाल आया ही सीखने हूं और वह मेरा कर्म है, मुझे करना ही है. आप जाने दें.’’ वे कहने लगे--’’इससे कोई रास्ता नहीं निकलेगा. पैसे-वैसे कुछ मिलते नहीं है.’’ वे मुझे जानबूझ कर, भीतरी स्नेह के चलते, हतोत्साहित कर रहे थे. तरह तरह से. कहने लगे--’’शाम को तानपूरा मंगवा लेता हूं. दो मिनिट में सिखा दूंगा. देशाटन करेंगे. मुम्बई में शो करेंगे. तुम्हें नहीं मालूम, बहुत अच्छी पहचान है मेरी.’’ मैंने कहा--’’जी, पण्डित जी. मुझे मालूम है, बहुत अच्छी पहचान है आपकी. दूर दूर तक आपके डंके बजते हैं.’’ बोले--’’फिर भी तुम्हें भरोसा नहीं है.’’ ऐसे ही बोलते थे वे, ’’ज़्यादा समझदार है तू! नहीं मानेगा मेरी बात.’’ मैं अनुनय करता--’’नहीं, पण्डित जी ऐसी बात नहीं है. मुझे जाना ही होगा. वह मेरा कर्म है, काम है.’’ बोले--’’छोड़ दे वो. मैं तुझे सिखाऊंगा संगीत. तानपूरा बजाओ. कुछ नहीं है उसमें. चार दिन में सिखा दूंगा.’’ मैंने फिर विनयतापूर्वक कहा कि नहीं, पण्डित जी मुझे यह सब समझ में नहीं आएगा. यह गुरू-शिष्य परम्परा का मसला है. और हमारे लिए तो गुरू दोस्त है. बोले--’’मैं ऐसा थोड़े बोल रहा हूं कि मेरे पैर दबा. हम तो वैसे ही दोस्त हैं. दोस्त की तरह बजाना, सीखना.’’ और कमाल देखिए कि वो तानपूरा आया, फिर शाम में और मैं वहां से भाग गया.

पण्डितजी चाहते थे कि वे मुझे तानपूरा सिखाएं और जहां जहां उनके कार्यक्रम हों वहां मैं उनके साथ जाऊं. पर वह समय मेरे लिए बनने का था सो दिन भर मैं स्टूडियो में रहता था. शाम और सुबह में ही उनका साथ सम्भव हो पाता था. इस से वे नाराज़ होते और चिढ़ जाते थे. यही बात उन्होंने बाद में मुझे अपने एक पत्र में भी लिखी : ’’तुम मुझ से मिले ही कब?’’ उन का यह मित्र-भाव मेरी निधि है.


(सीरज सक्सेना और मुकुल शिवपुत्र)

(नौ)
दोपहर में एक ऑटो आकर भारत भवन के गेट पर रुकता है. वे नशे में धुत्त अजीब-सा व्यवहार करते हैं. सब उनको जानते थे. उन्होंने कहा कि जाओ सीरज को बुला कर लाओ. भारत भवन का एक कर्मचारी भागते भागते आया और बोला कि आपसे मिलने कोई आया है. ऑटो से कोई एक बाबा आए हैं. मैंने कहा, ठीक है, मैं आ रहा हूं. मैं फिर अपने काम में लग गया. पता चला थोड़ी देर बाद वे ख़ुद आ रहे हैं, झूमते-झामते. अच्छा, वहां सब महिलाएं वग़ैरह भी काम कर रहीं थी. सबको मालूम था कि मुकुल जी इन दिनों मेरे साथ रह रहे हैं. सब को लगता था कि मेरी संगत बड़ी अच्छी है और मैं उनकी तारीफ़ भी करता था. अचानक वे वहां नशे में धुत्त खड़े थे. सब देख रहे थे. मेरी हालत ख़राब हो गयी. मैं मिट्टी में काम कर रहा था. बोले--तू इन लोगों के साथ क्या कर रहा है ? क्या कर रहा है इन लोगों के साथ?’’ मैंने तुरन्त कहा, ’बस, मैं चल रहा हूं आपके साथ.’’ उन्होंने कहा--’’हां, यह सब बन्द कर और चल. ऑटो बाहर ही खड़ा हुआ है.’’ हम कमरे पर पहुंचे. उन्होंने चीलम लगाई और पीने लगे. 

उन्हें मेरी संगत इसलिए भी पसन्द थी कि मुझे किसी चीज़ की लत नहीं थी और किसी चीज़ को लेकर नकार भी नहीं था. जब वे पेश करते थे तो अपनी मात्रा के हिसाब से भांग ले लेता था, मदिरा भी. उनको जिस साथी की तलाश थी, उसे शायद उन्होंने मुझ में देखा हो. और मैं उनके साथ रहना इसलिए पसन्द करता था कि उनका व्यक्तित्व मुझे बहुत प्रभावित करता था. इस तरह से उनका अराजक व औघड़ तरह से रहना पर फिर भी उनकी कला का सामाजिक स्वीकार व महत्व. उनकी कला की एक अलग जगह है. अपनी. उनकी जीवन-शैली अलग है. यह मुझे प्रभावित करता था. उनसे बहुत सीखा है मैंने.




(दस)
मुकुल जी को लिखने का भी शौक़ रहा. वे अपनी कॉपी में कविताएं या किसी बंदिश के बोल मात्राओं में या राग में लिखित रूप से रखा करते थे. पर कोई भी डायरी उनके साथ अधिक देर तक टिक नहीं पाती थीं. कुछ कविताएं भी वे हिन्दी और संस्कृत में लिखते और सुनाते थे.

बीच बीच में पण्डित जी को कुछ चीज़ें आकर्शित भी करती थीं जैसे रिकॉर्डर, कैमरा, रनिंग शूज़ इत्यादि पर ये सब चीजें उनका साथ अधिक देर तक नहीं दे पातीं. उने झोले में यह सब, कुछ ही समय बाद, ग़ायब हो जाता है.

हम यह जानते थे कि वे कुमार गन्धर्व के बेटे हैं. एक दो बार हमने कुमार जी की बात की. उन्होंने पूछा--’’तुम्हें क्या अच्छा लगता है संगीत में.’’ उस दौर में हम नुसरत फतह अली खां को भी काफ़ी सुनते थे. वह भी सुनते थे. बोले कि ’’यह क्या बकवास लगा रखी है. किस किस को सुनते हो!’’ एक दिन हमने कुमार जी की कैसेट लगा दी. वे आए कहीं से और आ कर बैठ गए. बिलकुल गम्भीर मुद्रा में बैठे रहे. अचानक उठे और हमारा दिल्ली-मेड टेपरिकार्डर उठा कर फेंक दिया. जोर से. मैं रसोईघर में था. जोर का स्वर हुआ तो मैं आया. मैंने देखा, पूरा टेपरिकार्डर वहां पुर्जा-पुर्जा बिखरा पड़ा था. मैंने उनसे कहा--’’इतना अच्छा चल रहा था. अब क्या सुनेंगे?’’ उन्होंने कहा--’’मैं बैठा हूं पर मुझे तो कभी तू सुनता ही नहीं है. इन लोगों को सुन रहा है. मेरे को सुनने का टाइम नहीं है तेरे पास? बैठ, मैं सुनाऊंगा तुझ को.’’



कुमार जी को सुन कर वे अजीब से हो जाते थे. बड़े असहज. उनकी उपस्थिति को वे शायद बरदाश्त नहीं कर पाते थे. उन पिता-पुत्र का कुछ अजीब ही सम्बन्ध था. उन्होंने बहुत सालों से घर छोड़ दिया था. कुमार जी जब जीवित थे तभी वे घर से चले गये थे. ऐसा अभागा-सा ख़याल आता है मानो उनके जीवन में कोई बुरी घटना हुई है. इसके बारे में हमने कभी चर्चा नहीं की. हालांकि उनकी पत्नी, हमारे इन्दौर के कला-महाविद्यालय से पढ़ी थी. सन् 80 के दशक में जब वे इन्दौर में रहते थे तब बहुत ही आधुनिक ढंग से रहते-जीते थे. यह बताया था उन्होंने. वे बताते थे--’’इन्दौर में जो सब से पहला स्कूटर आता था वह मैं ही ख़रीदता था. बाबा दिलाते थे. वे एक बार मुझे साउथ अफ्रीका भी ले कर गये थे. विदेश भी जा चुका हूं.’’ मानो कह रहे हो कि देखो कितना बड़ा हूं मैं. उनका बड़ा अच्छा अंदाज़ था बताने का. उसमें अहं नहीं होता था पर कुछ ऐसा लगता था जैसे शेर घुर्रा रहा हो प्यार से. जबकि यह मालूम हो कि यह मुझसे स्नेह करने वाले मित्र हैं. जिनसे दुश्मनी का कोई अर्थ नहीं है. कुछ इस ढंग से घुर्राते हुए कि उसमें विनोद-भाव और अभिनय का पुट हो. मासूम. बड़े अंदाज़ से कहते थे कि उस वक़्त मैं रेबेन का चश्मा पहनता था. और जब इन्दौर में निकलता था तो सब देखते थे मुझे. जींस पहनता था. स्कूटर पर निकलता था. यह था, वह था. सिगरेट पीता था. हमारे कला-महाविद्यालय के सीनियर मित्र बताते थे कि उनकी पत्नी बहुत सुन्दर थी. उनका शायद प्रेम-विवाह हुआ था. उनके ससुर स्वयं एक प्रतिष्ठित व्यक्ति थे. हमें यह पता चला था कि अपनी पत्नी की मृत्यु के लगभग तुरन्त बाद उन्होंने घर छोड़ दिया था. वे ऐसे ही भटकते थे, बस. आज उन्हें घर छोड़े भी शायद चालीस साल हो गये होंगे. पैसे की कमी उन्हें बहुत कम होती थी. कोई न कोई आयोजन हो ही जाता था. सब को पता था कि उनके पास कोई घर नहीं है. कभी रेलवे स्टेशन पर सो जाते हैंं, कभी कहीं चले जाते हैं. कभी किसी के साथ रह लेते हैं. तो उनके लिए घर की एक व्यवस्था करनी चाहिए. वहां पर उनके सभी मित्र लोग यह कोशिश कर रहे थे कि सरकार की ओर से उन्हें एक बंगला मिल जाय. जब तक यह जीवित रहेंगे तब तक उनका बना रहेगा. लेकिन वे अराजक ढंग से जीने वाले व्यक्ति हैं. अगर आप उन्हें व्यवस्थित करने की कोशिश करेंगे तो वे तुरन्त वहां से चले जाएंगे. उनका बहुत लम्बा समय साधुओं के साथ भी बीता है.

जब मैं भोपाल छोड़ कर दिल्ली आ रहा था तब पण्डित जी किसी दूसरे शहर में कार्यक्रम के लिए गये हुए थे. जाते समय मेरी उनसे भेंट नहीं हो सकी थी. दिल्ली अचानक आना पड़ा हम को. बल्कि एक तरह से भोपाल से भगाया गया हम को. पण्डित जी दक्षिण भारत की ओर कहीं गये हुए थे. जब वे भोपाल आए तो गेस्ट हाउस पर ताला लगा था. वे वहां से चले गये और फिर भोपाल नहीं आए. वे नेमावर चले गये. नेमावर का पता मेरे पास था. यह जगह हरदा के पास है. वे वहां एक आश्रम में रहते थे. भोपाल भी वे वहां से ही आए थे और उन्होंने ही मुझे वहां का पता दे रखा था. दिल्ली आने के बाद मैंने उन्हें चिठ्ठी लिखी. नेमावर से उनका जवाब आया. कई बार फ़ोन पर भी बात होती थी.
आगे जाकर एक लम्बा अन्तराल बीत गया.

(मुकुल शिवपुत्र)


(ग्यारह)
उनकी याद मुझे उनकी ओर ले जा रही थी. मैं इन्दौर आया. इन्दौर से उनके यहां उनसे मिलने गया. नेमावर. वहां उनका रूप एक साधु का था. वे छोटी कुटिया में रहते थे. वहां भगवान की कुछ मूर्तियां रखी थी. उनकी डायरी थी. झोला था. कमण्डल था. तानपूरा रखा था. चीलम थी. गांजा था. आश्रम की एक कुटिया उन्हें दी हुई थी. वे रोज़ सुबह आश्रम की सफ़ाई करते थे. झाडू लगाते थे. उस आश्रम के महन्त विद्वान व प्रभावशाली थे. उनसे मुकुल जी की दोस्ती थी और उन्हीं के चलते वे वहां रहते थे. जो भी महन्त से मिलने आता वह पूरा आश्रम घूमता ही था. उनकी कुटिया में भी लोग आते थे. कुछ लोग वहां पैसे रख कर चले जाते थे. गांव वासी आते थे. कोई एक बोरी चावल रख कर चला जाता था, कोई कुछ. ऐसे उनका जीवन-निर्वाह हो रहा था. आसपास के लोग उनसे गहरा आदर-सिक्त प्रेम करते थे. कभी कभी वे आसपास गांव के लोगों को बुलाते और कुछ कुछ सिखाते थे. जब मैं गया तब वे एक लड़के को तबला बजाना सिखा रहे थे. यूं वहां किसी को यह पता नहीं था कि वे एक बहुत बड़े गायक हैं. वहां उनकी पहचान एक सन्त की तरह थी. जब मैं उनके दिये पते पर उन्हें ढूंढ़ते ढूंढ़ते पहुंचा तब मैं लोगों से यही पूछ रहा था कि पण्ड़ित मुकुल शिवपुत्र जी कहां रहते हैं. वे बड़े संगीतकार है. पर लोगों ने कहा कि नहीं, ऐसा तो यहां कोई नहीं है. लेकिन हां, एक मुकुल सन्त ज़रूर है जो वहां कुटिया में रहते हैं. मैं कुटिया पर पहुंचा. वहां ताला लगा था. आसपास पूछा. सब ने कहा, यहीं कहीं होंगे या नदी पर होंगे. मैं नदी पर गया लेकिन वे वहां भी नहीं थे. मई-जून का समय था. तेज धूप. मैं दो घण्टे तक इन्तज़ार करता रहा. मुझे लगा कि कहीं वे चले तो नहीं गये, लेकिन वे जब बाहर जाते थे तो बता कर जाते थे कि मैं पूना जा रहा हूं या किसी और शहर. सो यह तय था कि वे हैं यहीं पर. मैं बैठा रहा. नर्मदा के किनारे इतनी गर्मी थी कि देह का सारा पानी सूखा जा रहा था. नर्मदा का अपना एक रहस्यात्मक सौन्दर्य है, गर्मी की दोपहर इस रहस्य को और गहरा रही थी. वे क़रीब दो घण्टे बाद आए. जैसे ही आए, मैंने उनके चरण छुए. आदरवश. वे कुटिया में ले गये और हाल-समाचार जाना. फिर पूरा नेमावर घुमाया और स्थान का महत्व समझाया. यह बताया कि नेमावर नर्मदा का मध्य-बिन्दु है. नर्मदा की नाभि है यहां पर. वहां कुछ पुराने मन्दिर भी हैं. मैं उनके साथ दो दिन ठहरा फिर वापस आ गया. इस यात्रा का असर मुझ पर इतना गहरा रहा कि मैंने कुछ कविताएं भी लिखीं. मैं वहां उनसे मिलने दो बार गया. एक दफ़ा जब दिल्ली से आश्रम फ़ोन किया तो पता चला कि वे अब वहां नहीं रह रहे थे. रमता जोगी जो ठहरे! फिर उनसे तब मुलाक़ात हुई जब वे रजा फाउण्डेशन के अवार्ड के लिए आए थे. हमारे कमरे पर भी आए. रात में रस-रंजन किया. अगले दिन कमानी सभागार में उनका गायन था. सुनने में आया है कि वे अब पूना या नासिक की तरफ़ कहीं हैं.






(बारह)
पण्डित जी हिन्दी, अंग्रेजी और मराठी बोलते हैं. मुझे टूटी फूटी मराठी आती हैं. इसलिए मराइी में उन से बहुत ही कम बातचीत हुई. ज़्यादातर हिन्दी और अंग्रेज़ी में ही बातें होती थीं. बीच बीच में जब पण्डितजी मूड में होते तो भोजपुरी में भी बोलते. जैसे वे प्रेम से सिरजा कह कर बुलाते.

जब मैं दूसरी बार नेमावर गया तो मेर साथ मेरे एक कलाकार मित्र मार्क --जो नीदरलैण्ड से आये थे--भी मेरे साथ चले. वहां पण्डितजी और हम सब दो दिन अंग्रेजी में ही बात करते रहे. उन्होंने मार्क के लिए गाया-बजाया भी. मार्क उनकी इस फक्कड़ जीवन-शैली से प्रभावित हुए. उनके लिए पण्डित जी ने (जो स्वयं शाकाहार हैं) नर्मदा नदी से मछली भी बनवाई.



(तेरह)
पण्डितजी और मैं दोनों ही कला की अलग अलग विधाओं में रमे थे. एक ही शहर के होने के नाते हमारे बीच निकटता शीघ्र हुई. विधा का यह अलगाव मुझे उनके साथ सहज मित्रता बनाने में मददगार साबित हुआ. मसलन, अगर मैं संगीत क्षेत्र का होता तो उनके पैर छूता और उनका नाम लेने से पहले कान छूता. अर्थात् हमारे बीच कोई औपचारिकता या अपनी अपनी विधा का बड़प्पन नहीं था. मैं उनसे एक मित्र की तरह ही खेलता बात करता, लेकिन मुझे उनके कद का हमेशा खयाल रहता और अपनी मर्यादा में रह कर ही हंसी ठिठोली करता. उन्होंने मुझे जो हक़ या अधिकार दिया है वह मुझे अच्छे से पता है और शायद उन्हें भी.



(चौदह)
इन्दौर के कला गुरू दिवंगत विश्णु चिंचालकर (जिन्हें हम सब गुरू जी कहते हैं) मुकुल जी के पिता कुमार जी के बड़े क़रीबी मित्र थे. चित्रकला को उन्होंने बचपन से देखा है. गुरूजी के काम की वे अकसर तारीफ़ किया करते थे. मुझे भी सलाह देते थे कि तुम्हें भी उनकी तरह कुछ करना चाहिए. पर मेरा कहना रहता था कि पण्डित जी मेरा मन अमूर्तन में लगता है--जो दिख रहा है उसे बनाने में मेरी रुचि नहीं है. वे नाराज़ भी होते थे. जब मैं उन से मिलने नेमावर पहुंचा था तो उन्होंने मिट्टी में बनाई एक छोटी मूर्ति दिखाई, जिस में शिव खड़े हैं और नृत्य कर रहे हैं. इस मूर्ति को ले कर उन्होंने यह कथा सुनाई कि शिव को देख पार्वती भी उनके साथ नृत्य कर रही है. जैसा जैसा शिव करते हैं वैसा वैसा पार्वती भी करतीं हैं. वे भी पारंगत और प्रवीण हैं. यह जुगलबंदी चलती रही. कुछ देर बाद शिव ने एक विचित्र भंगिमा रची. अपने नृत्य का एक विशेश करतब दिखाया --खड़े हो कर अपने दाहिने पांव की छोटी उंगली से बायीं आंख में अंजन लगाया. यह भंगिमा देख पार्वती स्तब्ध रह गयीं. आंख में अंजन लगाते हुए यह प्रतिमा जब मैंने मुकुल जी के पास देखी तो मेरे पूछने पर उन्होंने यह बताया कि यह प्रतिमा उन्होंने ही सिरजी है. प्रतिमा छोटी थी पर इसे बनाने में मुकुल जी का हुनर देखा जा सकता था--शिव की वह भंगिमा जिसमें शिव एक पांव पर खड़े हैं और दूसरा पांव उनके मुख पर है. अनुपात के हिसाब से वह एक सुन्दर और पूर्ण प्रतिमा थी. मुकुल जी का देखना सूक्ष्म और परिपक्व है.
(मुकुल शिवपुत्र द्वारा लिखा पत्र)



मुकुल जी को सुनते हुए पूरा वजूद झंकृत हो जाता था. जब वे हमारे साथ थे तब भी रियाज़ बराबर करते थे. सुबह उठ कर. वह सोते कब थे, यह पता नहीं लगता था. वे जगे, बैठे रहते थे. गाते यूं थे कि आवाज़ सुनायी नहीं देती थी. अन्दर ही अन्दर रियाज़ करते, गाते थे. कभी ऊंचे स्वर में भी गाते थे. उनका स्वर आध्यात्मिक रहस्य में लीन जान पड़ता था. उनका गाना कभी मनोरंजन नहीं लगा. कभी नहीं. उनके गाने में शृंगार नहीं, वियोग का स्वर प्रमुख रहता था. एक तरह का अवसाद भी. वे भजन भी गाते थे. हम हमेशा यह ख़याल रखते थे कि उनके भीतरी जगत में हमारे कारण ख़लल न पड़े. कभी वे लिखते और हमें सुनाते कि देखो, मैंने कविता लिखी है. अगर उन दिनों का रोज़नामचा लिख पाता तो अच्छा रहता. जिन काग़ज़ों पर लिखते थे वे उनके झोले से न जाने कहां गिर जाते थे. कभी वे बाज़ार चले जाते खरीदारी करने, कभी किसी मित्र से मिलने.




(पन्द्रह)
दिल्ली में शकरपुर इलाके़ में मैंने और मेरी पत्नी अगेश ने रहना शुरू किया था. कमरा बहुत छोटा था, पर वे उसमें भी हमारे साथ रहे थे. अगेश जानती हैं कि मेरा उनके साथ गहरा सम्बन्ध है और वे भी उनकी बहुत इज़्ज़त करती है. उनकी भौतिक उपस्थिति से कभी हमें या हमारी उपस्थिति से उन्हें विघ्न पड़ा हो याद नहीं. एक बार आए तो कई दिन हमारे साथ रहे. कभी भांग की सब्जी बनाते कभी मदिरा पीते रहते. कभी चीलम पीते. जब वे रहे तब खाना वे ही बनाते थे. अगेश को खाना बनाने नहीं देते थे. ख़ुद बनाते थे.



एक दिन कहा--’’ऑटो करो, अशोक जी (वाजपेयी) से मिलने जाना है.’’ मैंने कहा-- पहले फ़ोन कर के पूछ लेते हैं कि वे है भी या नहीं. "बोले--’’हां, फ़ोन करो.’’ फ़ोन भी बड़े अंदाज़ से करते हैं. जब अगली ओर से फ़ोन उठा लिया जाता तो कहते, मैं मुकुल शिवपुत्र बोल रहा हूं. अगला कहता हां, कहिए. पर वे तीन-पांच बार ज़रूर यह कहते कि अरे मैं मुकुल शिवपुत्र बोल रहा हूं. अगला धैर्यपूर्वक उनके अगले वाक्य का इन्तज़ार करता. फिर कहते--’’मिलने आ सकता हूं. अभी आप घर पर ही है?’’ जवाब आया--’’हां, ठीक है आप आ जाइए.’’ अशोक जी के यहां गये तो वहां भी कुछ बात नहीं करते थे. नमस्ते कह कर बैठे रहते थे. अशोक जी उनके पिता के मित्र रहे हैं सो एक अलग तरह का सम्मान भी उनके प्रति उनके मन में है. काफ़ी देर बैठे रहने के बाद कहा--मैं एक म्यूज़िक स्कूल खोलना चाहता हूं. जिसमें नये लोगों को मैं कुछ गाना सिखाऊं.’’ अशोक जी ने कहा--’’हां, ठीक है. आप प्लान करिए. कहां करना है, यह बताइए. करेंगे कुछ.’’ इन वाक्यों बाद आधे घण्टे का वक़्फ़ा. अशोक जी बैठे हुए है, मैं बैठा हुआ हूं. बीच बीच में अशोक जी अपना कुछ करते पर उनका पूरा ध्यान सारे समय मुकुल जी की ओर ही बना रहा. अशोक जी ने पूछा--’’मुकुल, आना कब हुआ तुम्हारा? बोले--’’अभी आया हूं.’’ अशोक जी ने पूछा--’’कुछ गाना वग़ैरह है?’’ बोले--’’नहीं, गाना हो जाएगा, हो जाएगा गाना.’’
फिर चुप हो गए.

देर बाद बोले--’’अच्छा, अब हम चलते हैं.’’ अशोक जी ने कहा--’’नहीं, रुको. आज यही रुक जाओ. दो-तीन दिन रुक जाओ.’’ बोले--’’नहीं, इसके यहां रुका हूं.’’ मैंने कहा--’’नहीं, आप रुक जाइए.’’ बोले--’’क्यों, क्या तुम्हें तकलीफ़ हो रही है मुझसे?’’ मैंने कहा--’’नहीं, ऐसी बात नहीं. घर चलना है. घर चलते हैं.’’ बोले--’’अच्छा, चलो. अशोक जी, इज़ाज़त दीजिए.’’ अशोक जी ने कहा--’’ठीक है. मुकुल आना फिर.’’ बोले--’’हां. हां. फ़ोन करूंगा मैं, आपको.’’
इस तरह हम दो तीन बार अशोक जी के यहां गये.



वे एक ऐसे व्यक्ति है जिनकी कोई इच्छा नहीं है. He don't want to become anything. हर व्यक्ति में चाहना रहती है पर उनके मन में यह तक नहीं है कि वे अपने गाने में ही सही, संसार के सम्मुख महान बनें. वे बस जब तक होगा गाते रहेंगे, जीते रहेंगे. किसी एक जगह से उनको मोह नहीं है. एक जगह वे ज़्यादा लम्बे समय तक रहते भी नहीं हैं. वे सिर्फ़ अपने संगीत में रहते हैं. 



(सोलह)
मुकुल जी जैसा यायावर मैंने अपने आस-पास, अपनी कला बिरादरी में नहीं देखा. वे यायावरी के उस्ताद हैं. यायावरी में उनकी बराबरी करना असम्भव है. एक तो वे बहुत ही कम सामान के साथ अपनी यात्राएं करते हैं और दूसरा उनके पड़ाव भी अनिश्चित ही होते हैं. जब तक उन का मन रमता है तब तक वे एक जगह टिके रहते हैं, लेकिन फिर अचानक कहीं और निकल जाते हैं. वे छोटी से छोटी जगह पर भी बहुत कम सुविधाओं के साथ सहज ही रह लेते हैं. जहां जाते हैं उसे अपना घर बना लेते हैं. उन्हें जगह और भौतिक सुख-सुविधाओं के बारे में शिकायत नहीं रहती. बल्कि किसी अनगढ़ जगह पर ही उनका चित्त रमता है. साधु-महात्माओं के साथ रहते हुए ही उन्हें इस जीवन-शैली का अभ्यास हुआ है. उन के पास हमेशा एक झोला रहता है, जिस में गीता, पेन, काग़ज़, गमछा आदि रहते हैं. चीज़ों के संग्रह के लिए उनकी स्पेस में कोई जगह नहीं है. कम से कम सामान के साथ जीवन अच्छे से जीया जा सकता है, यह उन्हीं से सीखा है.

अगर वे अपने गायन के लिए कहीं जाते हैं तो कभी कभी कई दिन वहीं रुक जाते हैं. पैसे या किसी और वस्तु का संग्रह उनके जीवन में नहीं है. यह उनका अपना जीवन जीने का बिरला तरीका है. उनके भीतर जीजिविशा का अद्भुत आत्मविश्वास है. 



(सत्रह)
दूसरी बार जब मैं उनसे नेमावर मिलने गया था तब वे आते वक़्त मेरे साथ आ गये. वे मुझे वहां रोकने के लिए बराबर आग्रह कर रहे थे. बोले--’’कि रुक. कल कलाव बनेगा. दो पीपे घी आने वाला है. दो बोरी आटा आ रहा है. तू रुक जा.’’ कलाव मतलब भगवान का प्रसाद. बड़ी कढ़ाई में बनता है. मैंने कहा--’’नहीं, मुझे जाना होगा. तीन दिन के लिए इन्दौर आया हूं. दो दिन आपके साथ यहां रहा, एक दिन घर पर रहना होगा. माता-पिता भी हैं.’’ बोले--’’तेने वापसी का रिजर्वेशन तो नहीं करा रखा? कल कलाव है. मैं परसों आऊंगा तेरे यहां, इन्दौर.’’ मैंने कहा--’’हां, ठीक है. आप ज़रूर आइए.’’ फिर एक दिन बाद वे मेरे घर आ गये. इन्दौर बस-स्टैण्ड पर पहुंच कर उन्होंने मुझे फ़ोन किया. मैं उन्हें अपने स्कूटर पर लेने गया और घर ले आया. हमारे घर पर नीचे एक अलग कमरा है. अतिथि कक्ष. उन्हें वहीं ठहराया ताकि वे अपने ढंग से रह सके. दुर्गासप्तशती, भागवत और तुलसीदास की विनय पत्रिका जैसी किताबें उनके झोले में हमेशा रहती थीं. उनके साथ जो समय बीता, उससे मैं आज भी सीखता हूं. इन्दौर में वे मेरे घर दो-तीन दिन रहे. घर पर मैंने यह कह रखा था कि वे एक महान गायक व सन्त हैं. मेरी मां ने पूछा--’’तब तो हाथ भी देखते होंगे?’’ मैंने कहा--’’हां, हाथ भी देखते हैं. और पहुंचे हुए सन्त हैं.’’ मेरी मां में स्वतः ही उनके प्रति श्रद्धा-भाव जग गया. पण्ड़ित जी ने मेरी मां को गाना भी सुनाया. एक लोक-भजन है--जमना किनारे मोरा गांव, सांवरे आ जाइयो.....यह भजन मैं अपने बचपन में गांव में भी सुनती थी : मां ने उनसे कहा. उन्होंने कहा कि हां, यह गांव से ही आया है. मेरी मां से रहा नहीं गया सो उन्होंने उनसे पूछ ही लिया कि क्या आप हाथ भी देखते हैं? पण्ड़ित जी ने कहा कि हां, देखता हूं और उन्होंने मेरी मां का हाथ भी देखा. उन्हें ज्योतिष-विद्या आती है. 

मुकुल जी अपने पहनने-ओढ़ने को लेकर बिलकुल उदासीन थे. वे इन सब से ऊपर उठ गए हैं. उनकी दाढ़ी अक्सर बढ़ी रहती थी. कभी मौज में आते तो पूरी दाढ़ी साफ़ करवा लेते. कभी वे स्पोटर्स शूज पहन लेते, कभी हंटरर्स हेट. आम तौर पर वे जिस पोशाक में होते थे वह थी धोती और कुरता. एक गमछा. झोला हमेशा साथ रखते. उसमें कुछ पुस्तकें भी रहतीं. जैसे दुर्गासप्तशती. रूद्राक्ष की माला और अगरबत्ती का पैकेट हमेशा ही रहता. माचिस, चिलम. एक या दो पुडिया गांजे की. कभी मदिरा. उनसे जो भी मिलता, प्रभावित हुए बग़ैर नहीं रहता.

उनका एक नया रूप मैंने तब देखा था जब मैं उनसे हरदा के पास नेमाबर मिलने गया था. उनका साधु-रूप भी उनके लिए एक तरह का आवरण ही था. वे शायद इसमें स्वयं को सुरक्षित महसूस करते थे. या उनका गायक उस खोल में सुरक्षित रहता था. उनका स्वभाव अप्रत्याशित था. बालक-मन तो था ही. मासूम. ज़िद्दी. मैंने जो रूद्राक्ष पहन रखा है वह उन्होंने ही मुझे दिया था. यह उनका आशीर्वाद है जिसने संघर्ष के दिनों में मुझे गहरा सम्बल दिया.

उनका पूजा-पाठ करने का तरीक़ा अलग था. इसमें उनके समय-तारीख़ इत्यादि का महत्व नहीं था. पूजा के लिए नहाना ज़रूरी नहीं था. वे बिना नहाये भी पूजा करते थे. यद्यपि पूजा-संस्कारों व कर्मकाण्ड, विधियां उन्हें बहुत अच्छे से आती थीं. दुर्गासप्तशती का पाठ वे इतने ज़बरदस्त ढंग से करते थे कि आप मन्त्रमुग्ध सुनते रह जाते थे. मुझे सुनते सुनते ही कण्ठस्थ हो गया. पहले तो दुर्गा के 108 नाम सुनाए. फिर उसकी चित्रमयी व्याख्या की. कहते, कि सुन, अच्छी चीज़ सुनाता हूं. मेरे पास बैठा कर तुझे बहुत अच्छी चीजें सुनाऊंगा, सिखाऊंगा. दुर्गा कवच सुनाते. गीता के श्लोक वे प्रायः बोलते रहते थे. कर्म-दर्शन के माहात्मय पर विस्तार से बताते.


(अठारह)
भोपाल में बीते मेरे लगभग चार वर्षों में मुकुल जी के साथ लगभग आठ महीने बीते थे. लगातार. यह समय मेरे लिए महत्वपूर्ण सीख है. यह देखा कि उनके भीतर का कलाकार एक मनुष्य की तरह किस तरह से बर्ताव करता है. किस तरह से जीता है. उसके सरोकार किस ढंग के हैं. वे बाक़ी इन्सानों व कलाकारों से भिन्न हैं. उनका उठना-बैठना, पूरा व्यक्तित्व, कहना चाहिए वजूद, बहुत ही प्रभावशील है. उनमें गहरा आकर्षण है. वे एक प्रेरक व्यक्तित्व हैं. उनकी जीवन-शैली निहायत ही सरल-सहज है. उनको तथाकथित समाज या जीवन या आसपास से कोई अपेक्षा ही नहीं है. उनकी कोई वांछा नहीं रहती. गाना उनके लिए वैसा ही था जैसे किसी दूसरे सामान्य इनसान के लिए अपना कर्म. उन दिनों जब मैं भोपाल में था तब मेरी काफ़ी अपेक्षाएं थी, न जाने किस किस से, शायद अपने आप से ही होगी. कि मैं एक युवा कलाकार हूं, बहुत गम्भीरता से अपना घर-बार छोड़ कर आया हूं सो मुझे कहीं छप्पर मिलना चाहिए, कि मान्यता मिलनी चाहिए वग़ैरह. यह मेरी अनुभवहीनता थी. बाद में ज्ञान हुआ कि असली चीज़ें ये सब नहीं हैं. बर्हिमुखी से अन्तर्मुखी होने का यह रूपान्तरण पण्ड़ित जी की ही देन है. उन्हें भौतिक सुविधाओं की ज़रा भी चिन्ता नहीं थी. कि ज़मीन पर सोएंगे तो गद्दा होना चाहिए या तकिए की ज़रूरत होती है. उन्हें बाल्टी तक की अपेक्षा नहीं रहती थी. मेरे लिए यह कल्पना करना तक कठिन है कि अगर बाल्टी न हो तो मैं पांच दिन कैसे बिता सकूंगा. अब मैं किसी भी तरह से जीवनयापन कर सकता हूं. यह पण्ड़ित जी से ही सीखा है. बिना किसी को हानि पहुंचाए हुए, बिना किसी मान्यता को गिराए हुए. सभी कुछ की गरिमा को अक्षुण्ण रखते हुए.

उन दिनों मैं उस उम्र में था जब अपने देखने-ओढ़ने पर भी काफ़ी समय ज़ाया करता था. मुझे किस तरह से व क्या पहनना चाहिए, कि किस तरह से बाल कटवाने चाहिए. कलाकार हूं तो तमाम लोगों से अलग हूं, कि मेरे दो सींग निकले हुए हैं! उस उम्र का एक अलग उत्साह था. टीशर्ट पर कविता लिख कर और जींस पर रंग लगा कर घूमते थे. उस उत्साह को रूपान्तरित करने में मुकुल जी का बड़ा हाथ है. उनके साथ बिताए समय से मैंने इतने पाठ सीखे हैं कि वे ताउम्र मेरे लिए काफ़ी हैं. रह रह कर वे पाठ जीवन में सामने आते हैं. कई बार मैं उनके सामने हताश हो जाता था कि जेबें ख़ाली हैं और मिट्टी/भट्टी तक के पैसे नहीं है. चावल लाने के पैसे नहीं है. ये करे-वो करे-क्या करे! उन मौक़ों पर उन्होंने मानसिक बल दिया. कई बार क्या होता था कि अहम् की वजह से या किन्हीं और कारणों से मैं अपनी गहरी पीड़ा या आर्थिक तंगी की शिकायत वग़ैरह पर बात नहीं कर पाता था. यह सब मैं मुकुल जी से बांटता था. 
(पीयूष दईया  और सीरज सक्सेना)

वे मेरे मित्र-सखा-गुरू सबकुछ थे. मैं उनके साथ बिलकुल खुला था और वैसा ही वे भी मेरे साथ महसूस करते थे. हमारा सम्बन्ध स्वच्छन्द सम्बन्ध था. उम्र को उन्होंने कभी प्रत्यारोपित नहीं किया. उम्र, गुण, विद्या सभी लिहाज़ से मैं उनका अनुज ही था.
(‘बातचीत का यह अंश 2009 की सर्दियों में बुना गया था, पर रह गया और अब फिर से पुनर्जीवित हुआ है’ : पीयूष दईया ) 
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(वाग्देवी प्रकाशन से शीघ्र प्रकाश्य पुस्तक -सीरज सक्सेना के साथ पीयूश दईया की बातचीत “सिमिट-सिमिट जल’’ से एक अंश)
पीयूष दईया : todaiya@gmail.com