परख : भूभल (मीनाक्षी स्वामी ) : ज्योतिष जोशी

Posted by arun dev on सितंबर 04, 2016










भूभल (उपन्यास)- मीनाक्षी स्वामी
सामयिक प्रकाशन, 3320-21, जटवाड़ा
नेताजी सुभाष मार्ग, नई दिल्ली-110002
मूल्य-360 रुपये
डी-4/37, सेक्टर-15
रोहिणी, दिल्ली-110089






स्त्रियों के प्रति न्याय के लिए पेश हुआ मुकदमा                         

ज्योतिष जोशी

ज्योतिष जोशी


मीनाक्षी स्वामी हाल के वर्षों में उभरीं हिन्दी की महत्वपूर्ण कथाकार हैं. अपनी कहानियों और उपन्यासों में समाज-शास्त्रीय प्रविधि का प्रयोग कर विवेच्य विषय की बारीकी में उतरना उनकी रचनात्मकता का वैशिष्ट्य है. समाजशास्त्र की प्राध्यापक मीनाक्षी स्वामी की प्रकाशित कृतियों में अच्छा हुआ शकील से प्यार नहीं हुआ (कहानी संग्रह), ‘लाला जी ने पकड़े कान (किशोर उपन्यास), ‘पुलिस और समाज’, ‘भारत में संवैधानिक समन्वय और व्यावहारिक विघटन’, ‘कटघरे में पीड़ित’, तथा अस्मिता की अग्नि परीक्षाजैसी विभिन्न सामाजिक और सामयिक विषयों पर लिखित तथा चर्चित कृतियों के अतिरिक्त मीनाक्षी स्वामी ने नतोहं तथा भूभलनामक उपन्यास भी लिखा है. यहाँ हम  उनके साहित्य अकादमी म.प्र. के बालकृष्ण शर्मा नवीन पुरस्कार से सम्मानित चर्चित भूभलउपन्यास पर विचार करेंगे. यह उपन्यास इसलिये विशिष्ट माना जाना चाहिये कि स्त्रियों की स्थिति के कानूनी पहलू की भूमिका को लेकर लिखा गया हिंदी का यह संभवतः पहला उपन्यास है.

भूभल स्त्री-उत्पीड़न और उसके साथ पुरुषों की ज्यादतियों के बरक्स समाज तथा कानून की भूमिका का प्रभावी आकलन करता है. हिन्दी में स्त्री-विमर्श में तेजी आई है और अनेक स्तरों पर स्त्री-अधिकार का संघर्ष चल रहा है पर स्त्री को इस रूप में अंकित करने की कोशिश प्रायः कम ही दिखती है जिसमें कानूनी सीमाओं का संज्ञान लेते हुए वह समाज में अपने संघर्ष के बल पर वांछित हक और सम्मान पा सके. हिन्दी में स्त्री-विमर्श की शुरूआत, कम से कम कथा साहित्य के स्तर पर जैनेन्द्र कुमार ने की. जिनकी रचनाओं में स्त्री को उसके संघर्षों के साथ-साथ उसकी वांछित आकांक्षाओं में देखने की सफल कोशिश हुई. पर बाद के दौर में स्त्री के दूसरे रूप अधिक प्रभावी होते गए और उसके स्वत्व का संघर्ष पीछे छूट गया. मीनाक्षी स्वामी स्त्री को एक बड़े फलक में आँकती हैं जिसमें हर तरह की विपरीत स्थितियाँ होती हैं और उनमें से वह अपनी पहचान पाती है तथा अपने को एक समग्र स्त्री बनाकर कृतकार्य होती है.
   
भूभलमें लम्बी कथा है जिसमें अनेक उतार-चढ़ाव हैं. मुख्यतः कंचू यानी कंचन उपाध्याय की यह कहानी एक ऐसे संघर्षशील स्त्री की कहानी है जो बचपन से ही अपने अधिकारों के प्रति सजग रहती है. अपने भाई राज यानी राजशेखर के विद्यालय में ही पढ़ने की ज़िद हो या अपनी उपेक्षा के प्रति संजीदगी हो. कंचन में बचपन से ही प्रतिरोध की प्रवृत्ति बलवती है और वह लगातार अपने विकास के प्रति सचेष्ट रहती है. उपन्यास में स्त्री-सशक्तिकरण के साथ-साथ स्त्रियों के प्रति यौन हिंसा का पक्ष प्रबल है. आरंभ में ही हम देखते हैं कि काका यानी नारायण प्रसाद मिश्र की नर्सरी में कंचू, राज, इन्दु, सरला, दिनेश सभी खेलते हैं और कंचू के जन्मदिन पर काका उसे गुलमोहर का पौधा उपहार में देते हैं. कंचन अपनी माँ के कहने पर टाट-पट्टी वाले स्कूल में जाने के बजाय राज के अच्छे स्कूल में प्रवेश की ज़िद करती है और फिर वहीं प्रवेश कर लेती है. अपनी इंदौर वाली गीता बुआ की दी हुई फ्राक के बेल्ट तोड़ने पर वह संजू से लड़ती है जो उसे रक्षाबंधन पर भेंट में मिला है.

स्कूल में नल पर पानी पीने को लेकर झगडे़ में वह राज का बचाव करती है तथा प्रिन्सिपल से नितिन की शिकायत कर उसे सलीके से रहने की सीख देती है. इसी बीच काका की नर्सरी में दोस्तों के साथ छुपम-छुपाई के खेल में झाड़ियों में छुपी ग्यारह वर्षीय सरला को कुछ बदमाश उठाकर ले जाते हैं और उसका बलात्कार करते हैं. काका के प्रतिरोध करने पर उनके सर पर चोट लगती है जो अस्पताल में भर्ती होते हैं, पर उनकी जान नहीं बच पाती. इसका गहरा असर कंचन पर भी पड़ता है. आगे उसका रुझान भाषण प्रतियोगिताओं में भागीदारी के प्रति होता है और वह इंटर स्कूल प्रतियोगिता में मिस चतुर्वेदी के लिखित पर्चे को पढ़े बगैर खुद के प्रदर्शन से प्रथम आती है. प्रतियोगिता में द्वितीय रहनेवाले दीपक तिवारी की चालबाजियों का भी वह जवाब देती हैं. इस दौरान नितिन कंचन को बदनाम करने की साजिश करता है जिसका वह करारा जवाब देती है. आगे के वर्षों में बी.ए. के अंतिम वर्ष में मणिकांत चौधरी का प्रवेश होता है जो अपर कलेक्टर का पुत्र है. वह बैडमिंटन भी खेलता है. उससे कंचन की नजदीकी बढ़ती है. उसके बाद एल.एल.बी. में कंचन और मणि का नामांकन होता है.

इस बीच राज बी.काम करता है जिसके बाद उसकी शोभा के साथ सगाई होती है और फिर शादी भी. इधर एल.एल.बी. के अंतिम वर्ष में अध्यापिका मिस जोशी के साथ उमेश यादव नामक बदमाश छात्र बदसलूकी करता है. मणि के प्रतिरोध करने पर उमेश को निष्कासित किया जाता है. लेकिन उसकी कारस्तानियों से आजिज आकर मिस जोशी नौकरी छोड़कर वापस अपने शहर चली जाती हैं. पुनः प्रवेश लेकर लौटे उमेश यादव ने मणि और कंचन को एक कमरे में बंदकर बदनाम करने की साजिश करता है. उमेश मणि और कंचन के आपसी संबंध को घृणित बताकर कंचन के घर चिट्ठी भेजता है जिस पर कंचन का भाई राज कंचन के प्रति अभद्र होता है. इस पूरे प्रकरण में कंचन को पिता का साथ मिलता है. कंचन के द्वारा उमेश की हरकतों के बारे में बताने पर पिता पक्ष लेते हैं और अन्तर्जातीय होने के बावजूद मणि से उसकी शादी को राजी भी होते हैं. कंचन का मणि के प्रति अपनी पसंदगी जाहिर करने पर पिता के अलावा घर में किसी और का साथ नहीं मिलता.

उपन्यास का सबसे अहम पक्ष कंचन का सिविल जज बनने की तैयारी कर सफल होना है जिसके बाद उसे इंदौर में सिविल जज की नौकरी मिलती है. पहले तो वह अपने बुआ के घर रहती  है पर शीघ्र ही उसे शासकीय बंगला आवंटित हो जाता है. वहाँ वह न्यायाधीश शोभना केलकर के निर्देशन में प्रशिक्षण लेती है. कंचन के माता-पिता गुलमोहर के पेड़ों की छाया में बने बंगले को देखकर खुश होते हैं. कंचन अदालत के चपरासी अशोक के आग्रह पर सर्वेन्ट क्वार्टर में रहने की जगह देती है जहाँ वह सपरिवार रहने लगता है. इस बीच मणि एल.एल.एम. करके विधि का प्राध्यापक हो जाता है और फिर शोध के सिलसिले में न्यूयार्क जाता है. मणि और कंचन की तय सगाई कंचन के पिता के आकस्मिक देहांत के कारण टल जाती है. पर दोनों का परस्पर संवाद बना रहता है.

 इधर अदालत में कंचन को स्त्री-मामलों की सुनवाई  दी जाती है. पहला मामला घर में काम करनेवाली ममता का आता है जो मालिक के ड्राइवर से प्रेम करती है पर शादी नहीं हो पाती. घरवालों के विरोध करने पर वे भाग जाते हैं. पुलिस में रिपोर्ट होती है तो पकड़े जाते हैं जहाँ पूछताछ करने के बहाने कांस्टेबल राधेश्याम और गणेश उसका बलात्कार करते हैं. मामला अदालत में जाता है और कंचन के प्रयास से दो साल की सजा पाये दोनों सिपाही उच्च न्यायालय से बरी हो जाते हैं और ममता चरित्रहीन करार दी जाती है. तर्क है-कौमार्य भंग का, पर यह देखने की जरूरत नहीं समझी जाती कि उसके कौमार्य भंग का कारण उसका प्रेम है न कि चरित्रहीनता. उसके बाद ज़रीना का मामला आता है जिनके साथ असलम ने बलात्कार किया है. गवाह मोटी रकम खाकर अदालत में पलट जाते हैं जिसके चलते पीडित जरीना को न्याय नहीं मिल पाता है. उसके बाद इमरती बाई का मामला आता है जो आँगनबाड़ी सेविका होने के नाते समाज में जागरूकता फैलाने का काम कर यश पाने लगती है जिससे कुपित होकर ठाकुर कर्णदेव सिंह अपने आदमियों के साथ उसका बलात्कार करता है.

यह मामला भी दब जाता है. वोट की राजनीति यहाँ काम करती है. ठाकुरों की अधिक आबादी मामले को झूठे आरोप में बदल देती है. इसके बाद रूपा का मामला सामने आता है. बकरी चरानेवाली रूपा के साथ छीतर और हरिया बलात्कार करते हैं. उसके पिता नारायण ने बहुत मिन्नत की, पर डाक्टर ने पैसे लेकर बलात्कार की पुष्टि के बावजूद इसे सहमति का मामला सिद्ध कर दिया. आपराधिक मामलों के शातिर वकील रामकिशोर ने बलात्कार के बाद रह गये गर्भ को पहले का सि़द्ध किया और गर्भपात को हथियार बना लिया. इस तरह दोनों अभियुक्त निर्दोष मान लिये गये और पीडीत रूपा चरित्रहीन. इसी कड़ी में एक दस वर्षीय बालिका के साथ साधु नीलभद्र द्वारा किये बलात्कार का मामला चला, पर कुछ न हुआ. साधु नीलभद्र अपने रसूख के बल पर बरी हो गया.

उपन्यास में इन सभी वारदातों की सिलसिलेवार तफ़सील तो है ही, इन पर पर्याप्त बहस भी है जो हमारी व्यवस्था को तार-तार करती है. स्त्रियों को हवस का शिकार बनाकर उनके सम्मान को नष्ट करना और उन्हें मृत्यु के मुँह में जाने को विवश करना-समाज और अदालत दोनों की ओर से होता है. रामकिशोर जैसे पतित और लालची वकील अपनी बेशर्मी का प्रदर्शन कर कुतर्कों के जरिये इंसाफ नहीं होने देते और हमारी कानून-व्यवस्था चंद सिक्कों में तुलकर असंख्य ज़िन्दगियाँ तबाह करती जाती है. इस बीच कुछ अन्य मामले भी प्रकाश में आते हैं जिनमें एक है चौपन साल की कांता के साथ चौबीस वर्षीय राकेश द्वारा बलात्कार. राकेश कहता है कि कांता के पति ने उसकी माँ के साथ बलात्कार किया था जिसका बदला उसने लिया है. इसी तरह रिया का दोस्ती से इन्कार करने पर उससे अरूप, अनल और कुंतल बलात्कार करते हैं. तीन साल की पायल भी चाचा प्रकाश द्वारा हवस का शिकार होती है.

इधर एक और मामला उर्मिला का आता है जिसके बलात्कारी कंचन के सख्त रवैये और सूझ-बूझ भरे फैसले के कारण रामकिशोर की बेशर्म जिरह के बावजूद दस-दस वर्ष की कठोर सज़ा पाते हैं. बलात्कार की पुष्टि हुई पर उर्मिला द्वारा प्रतिरोध के चिह्न न होने को रामकिशोर ने उसे सहमति का मामला बताकर जिरह किया था. उर्मिला ने अपने निर्णय में लिखा-‘‘उर्मिला के साथ बलात्कार हुआ है. यदि मेडिकल जाँच में जोर-जबरदस्ती के चिह्न नहीं पाये गये तो कारण स्पष्ट है. उर्मिला जैसी दुबली-पतली और नाजुक स्त्री तीन बलिष्ठ युवकों का प्रतिरोध करने में अक्षम है. यदि उसकी सहमति होती तो वह मामले की रिपोर्ट दर्ज़ ही नहीं कराती, बल्कि चुपचाप घर आ जाती.’’ (पृष्ठ-176)

कंचन के इस निर्णय को ऐतिहासिक माना गया और उसकी सर्वत्र प्रशंसा हुई. उर्मिला के मामले में शिकस्त खाने के बाद वकील रामकिशोर ने वकीलों का आंदोलन करवा देता है और कंचन के विरुद्ध अतिरिक्त स्त्री-प्रेम और पुरुष-विरोध का आरोप लगाया, पर वह अपनी योजना में कामयाब न हो सका. इस पर उसने मणि के साथ कंचन के संबंध को लांछित करने की घृणित साजिश भी की. अखबारों तक में इस संबंध को बदनाम करने की कोशिश हुई लेकिन कंचन अविचल रही और अपने ध्येय के प्रति प्रतिबद्ध भी.

लेकिन परिस्थितियों ने उसे स्वयं शिकार हो जाने को विवश किया जिसकी भारी कीमत उसे चुकानी पड़ती है. एक दिन देर रात को नशे में धुत् दोस्तों के उकसाने पर उसी के बंगले के सर्वेन्ट क्वार्टर में रहनेवाला चपरासी अशोक कंचन के घर में घुस जाता है और उसके कपडे़ फाड़ डालता है. पर कंचन के साहस के साथ धक्का देने पर वह भाग खड़ा होता है. यह घटना आग की तरह फैल जाती है. उमेश यादव अब चूँकि स्थानीय पुलिस में है इसलिए मणि और कंचन से पुराना हिसाब का मौका देखकर हवालात में अशोक को डरा-धमका कर बलात्कार को कबूल करने का बयान ले लेता है. अब टी.वी. में इस पर बहस होने लगती है, अखबारों में उल्टी-सीधी रिपोर्ट छपने लगती हैं. पूरे प्रकरण में पाक-साफ होने के बावजूद कंचन अकेली पड़ जाती है. न्यूयार्क से लौटकर विधि का प्राध्यापक बना मणि भी कंचन को संदिग्ध मानकर अकेला छोड़ देता है. इसी बीच जब मणि अशोक से मिलता है और सच्चाई जान लेता है तो उसे भरोसा होता है और इसको उमेश यादव की कारस्तानी मानने में कोई भ्रम नहीं होता.
मेडिकल रिपोर्ट से भी यह सिद्ध होता है कि कंचन का शील अक्षत् है. इसके बाद मणि ने कंचन से माफी माँगी. कंचन ने उसकी गलती स्वीकार की और दोनों ने मिलकर राष्ट्रीय महिला आयोग की ओर से मसविदा तैयार किया. बाद में बलात्कार की पीड़िता के पूर्व चरित्र पर ध्यान देने संबंधी धारा को हटा दिया गया. इस धारा को हटाने के लिए कंचन और मणि ने राष्ट्रव्यापी आंदोलन किया-गाँव-कस्बा, नगर के लोगों को जोड़कर उन दोनों ने इस समस्या की गंभीरता को बताया और राष्ट्रीय महिला आयोग को ज्ञापन दिया जिसके बाद उक्त धारा को हटाया गया जो बहुत संगत था. ज्ञापन में कंचन ने लिखा था-

   
‘‘यह अपील हर नागरिक के लिए है. बलात्कार संबंधी कानूनों में सुधार के लिए हम एक जन आंदोलन की आवश्यकता महसूस करते हैं ताकि सब को न्याय मिल सके. इन संशोधनों में पीड़ित स्त्री के पूर्व चरित्र पर ध्यान न देना, उसका बयान उसके घर पर रिकार्ड करने की सुविधा, बलात्कार के मामले में आरोपी को सुनवाई पूरी होने तक जमानत न मिलना, अदालत के निर्णय से पहले ऐसे संवेदनशील मामलों में मीडिया को दूर रखना, खासकर मीडिया ट्रायल पर प्रतिबंध, बलात्कार की परिभाषा का दायरा व्यापक करना, समानांतर जाँच एजेन्सी को मान्यता देना, मामले का प्रतिदिन सुनवाई होना, मुख्य हैं.’’ (पृष्ठ-255)

 इस तरह एक बड़े लक्ष्य में बदलकर उपन्यास समाप्त होता है जिसमें कंचन उपाध्याय की संघर्षशीलता और अदम्यता बहुत गहरे स्तर तक हमारे मन पर उतर जाती है. स्त्रियों के प्रति बलात्कार की घृणित घटनाएँ हमारे समाज को शर्मसार करती रही हैं और समाज की संवेदनहीनता को भी सूचित करती हैं. जन्म से लेकर मृत्यु-पर्यन्त स्त्री दोयम दर्जे की ही बनी रहती हैउपन्यास में कंचन की आरंभिक शिक्षा को लेकर भेदभाव को ही देखें तो स्पष्ट हो जाता है कि लड़कों के मुकाबले लड़कियों की कितनी उपेक्षा होती है. विचित्र यह है कि यह उपेक्षा माताओं के द्वारा अधिक होती है. कंचन की माँ का व्यवहार इसको पुष्ट करता है. उपन्यास का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष यही है कि इसमें समस्या की निरंतरता बनी रहती है और कंचन के सिविल जज बनने के बाद उपन्यास का वास्तविक रूप सामने आता है. उपन्यास का प्रतिपाद्य है-स्त्री उपेक्षा, उसके प्रति सामाजिक के साथ न्याय व्यवस्था की भी संवेदनहीनता तथा उसके साथ जबर्दस्ती यौनाचार. जाहिर है, उपन्यास का स्वर इसके प्रति प्रतिरोध का है जो कानूनी प्रक्रियाओं के साथ स्त्री-स्वर को सशक्त बनाने में दिखता है. अनेक चरित्रों और कथा-स्तरों के इस उपन्यास में कंचन उपाध्याय केन्द्रीय चरित्र है और वह अपनी केन्द्रीयता में बेहद प्रभावित करती है. शेष सभी पात्र पूरक हैं. यहाँ तक कि मणिकांत चैधरी भी नितांत दब्बू और वहमी  ही बनकर आता है. कंचन बचपन से लेकर नाना स्तरों पर पढ़ाई के दौरान कंचन अपने को लगातार माँजती है, परिश्रम करती है, स्वयं को सशक्त करती है तथा अपने व्यक्तित्व में समग्र बनती है. मीनाक्षी स्वामी चूँकि समाजशास्त्री भी हैं, इसलिए उन्होंने उपन्यास में कथा को सामाजिक ताने-बाने में बुनकर कंचन के क्रमिक विकास को दिखाया है, जिससे समस्या की बुनियाद को समझना सहज हो सके.
मीनाक्षी स्वामी

उपन्यास में कथा की निरंतरता है, प्रवाह है और कथ्य में सादगी के साथ विषय को आकार देने की क्षमता है. उपन्यास की भाषा में गति है, सीधे-सीधे कथा में उतारते हुए समस्या की ज़द में ले जाने के कौशल के साथ. उपन्यास बेहद पठनीय और सरस है जिसमें समस्या की निरंतरता में विन्यस्त तनाव हमें स्थिर नहीं रहने देता. हम सोचते हैं, खीझते हैं, झुंझलाते हैं और अपने समाज के साथ अपनी व्यवस्था पर भी लज्जित होते हैं. यह इस उपन्यास की सबसे बड़ी उपलब्धि है. उपन्यास अपने प्रतिपाद्य में सफल हो और वह पाठक को अपने मंतव्य से विचलित कर दे, यह उस उपन्यास का वैशिष्ट्य होता है. मीनाक्षी स्वामी का उपन्यास भूभलइस स्तर पर सफल है और अपने नाम के अनुरूप चिन्गारियों से युक्त गर्म राख को प्रज्ज्वलित करता है. यह वह चिन्गारी है जो आग की शक्ल लेती हुई विकराल हो जाती है-डराती है और स्त्री के प्रति किसी भी तरह की हिंसा से ख़बरदार करती है. इस तरह यह उपन्यास स्त्रियों के प्रति न्याय के लिए पेश हुए एक ऐसे मुकदमे के रूप में सामने आता है जिस पर जिरह हो रही है, वादी-प्रतिवादी उलझ रहे हैं, तारीखें बढ़ रही है, सबकी साँसे टँगी हैं कि न जाने क्या हो पर समस्या बदस्तूर बनी हुई है जो हमें शर्मशार कर रही है. यह उपन्यास की सबसे बड़ी उपलब्धि है.
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ज्योतिष  जोशी 
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