हिदी दिवस (5) : हिन्दी : अस्मिता की पहचान : मोहसिन खान

















हिंदी की राष्ट्रीय स्वीकृति और वैश्विक पहुँच की चर्चा कर रहे हैं मोहसिन खान. 

अब यह उपभोक्ता तकनीक की सबसे तेज़ी से बढती भाषा है. 

फेसबुक, ट्वीटर, व्हाट्सऐप, वाइबर, वीचैट, टेलीग्राम, इंस्टाग्राम, लिंक्डइन, हो या ब्लागिंग सब हिंदी में फल-फूल रहे हैं.





हिन्दी :  अस्मिता की पहचान                          

मोहसिन खान  



मालोचनपर राहुल राजेश और संजय जोठे के लेख हिन्दी भाषा और नागरी लिपि के समर्थन-असमर्थन में पढ़े, राहुल राजेश जी से पहले कभी लेखों के माध्यम से परिचय न हुआ और संजय जोठे मेरे घनिष्ठ मित्र प्रकाश जोठे (देवास म.प्र.निवासी) के सबसे छोटे और प्रतिभाशाली भाई हैं. संजय मेरे सामने बहुत छोटे थे, तब जब उनके घर पर मैं आया-जाया करता था, आज जब बड़े हो चुके हैं तो संजय मेरे यहाँ आते हैं और हमारी कई विषयों पर चर्चा, बहस होती रहती है, अब वे भी मित्र हो चुके हैं. समालोचनपर हिन्दी भाषा और नागरी लिपि के संदर्भ में संजय जोठे के लेख "हिन्दी की दुर्दशा का सनातन प्रश्न" पढ़कर वास्तव में कुछ बातें स्पष्ट करना अनिवार्य हो जाती हैं, क्योंकि संजय का लेख भाषा के प्रश्न को लेकर जातीय आसमिता, भाषाई अस्पृश्यता एवं भेदभाव, दलित आंदोलन की सीमाओं के तहत रचा गया आभासित होता है, जिसमें एक बहुत बड़ी कमी वर्तमान अवस्था में हिन्दी भाषा और नागरी के विकास, प्रसार, प्रयोग, विस्तार, व्यापकता की बात दरकिनार रह जाती है और दूसरा यह कि लेख राजभाषा की अस्मिता के प्रश्न को भी धक्का पहुंचता हुआ राष्ट्रीय भावना से निरपेक्ष सिद्ध होता हुआ दिखाई देता है. राहुल राजेश जी ने अपने लेख "रोमन लिपि में हिन्दी का कुतर्क", "हिन्दी का विरोध अंतत: अंग्रेज़ी का समर्थन है" कई मुद्दे, तर्क, प्रश्न, समाधान हिन्दी और नागरी के संदर्भ में सार्थक रूप में उठाए हैं, लेकिन वे भाषाई राजनीति को समझ नहीं पा रहे हैं और वर्तमान में भगवाकरण की स्थिति से परहेज करते नज़र आ रहे हैं.

संजय जोठे और राहुल राजेश के प्रश्नों, संवादों का क्रमश: उत्तर देते हुए पश्चात में अपना मत हिन्दी और नागरी के वर्तमान परिप्रेक्ष्य में रखूँगा. संजय के लेख का स्वर हिन्दी भाषा के संदर्भ में विपरीत ठहरता है, क्योंकि हिन्दी, नागरी का वर्तमान स्वरूप व्यापक होते हुए इतना विकास कर गया है कि आज हिन्दी भाषा, नागरी लिपि पुस्तकों की भाषा न रहकर अपनी सीमाओं का विस्तार करते हुए अधुनातन तकनीक का हिस्सा बनते हुए अंतरराष्ट्रीय सीमाओं, पूरी दुनिया मे फैल चुकी है. हिन्दी के जिस रोनेवाली स्थिति को संजय उजागर कर रहे हैं, वह न तो उपयुक्त है और न ही  वर्तमान में कोई ऐसी चिंताजंक स्थिति हिन्दी और नागरी के विषय में दिखाई देती है. संजय ने भाषा के प्रश्न को सनातन स्थिति से जोड़कर अतीत और इतिहास के प्रश्नों को उठाकर भटक जाते हैं और उनके लेख के भीतर से जातीय अस्मिता, भाषाई अस्पृश्यता एवं भेदभाव, दलित आंदोलन की बू आ रही है. वे इस लेख में विद्रोही कम और बदला लेने वाली भावना से अधिक ग्रसित हैं, इसका कारण साफ है कि वे हिन्दी, नागरी के वर्तमान परिदृश्य, प्रसार, व्यापकता से कट जाते हैं और केवल भाषाई भेदभाव को केंद्र में रखते हुए सामयिक अवस्था में हिन्दी के विरोध में उतर जाते हैं. वे ये भूल जाते हैं कि हिन्दी और नागरी ने अपने को हर क्षेत्र के लिए चुस्त और दुरुस्त बना रखा है, वे विरोध पर बल देते हुए हिन्दी और नागरी के वैश्विक फलक पर विस्तार को नज़रअंदाज़ कर जाते हैं और हिन्दी की स्थिति को आत्मघाती और कोढ़ में खाज की तरह दर्शाते हैं. उनके इस कथन का उत्तर मेरे आगे के लेख में स्पष्ट हो जाएगा कि आज हिन्दी, नागरी किस स्थिति में है और उसका प्रसार कहाँ तक हो पाया है. 

इन्होंने एक प्रश्न और भी उठाया है कि हिन्दी में ज्ञान-विज्ञान या आधुनिक शिक्षा प्रणाली कि पुस्तकें अथवा शिक्षा उपलब्ध नहीं तो इस बात का उत्तर साफ दिया जा सकता है कि आज की स्थिति में हिन्दी विश्वविद्यालय की स्थापना के साथ समस्त विषयों का माध्यम हिन्दी है और कई विज्ञान के लेखक अपनी पुस्तके हिन्दी में लिख रहे हैं. हिन्दी के पास व्यापार-वाणिज्य से लेकर विज्ञान, तकनीक की भाषा की शब्दावली मौजूद है जिसका प्रयोग लगातार किया जा रहा है.

राहुल राजेश जी ने हिन्दी, नागरी के समर्थन में बात उठाई है और पक्षधरता को लेकर चल रहे हैं यह बात सुखद तो है, लेकिन वे इस बात को भूल जाते हैं कि वर्तमान में भाषाई राजनीति का खेल भी खेला जा रहा है, क्योंकि यहाँ पर भी बदला लेने की भावना केंद्र में मौजूद है. मुगल काल में फारसी को राजकीय भाषा घोषित किया था उसी के चलते अब हिन्दी भाषा को वैसी ही प्रतिस्थापना के लिए शक्ति-प्रदर्शन के तहत कार्यवाही की जा रही है और यह बात सत्य है कि हिन्दी के भगवाकरण करने पर कुछ लोग आमादा हैं. यह ठीक वैसी ही स्थिति है जब राष्ट्रीय आंदोलन भारत में चल रहे थे तब भाषा का विभाजन साहित्य में देखने को मिलता है. अचानक छायावादियों के लिए भाषा संस्कृतनिष्ठ हो जाता है क्योंकि उनके साथ भी यही समस्या जुड़ी हुई थी कि वह सांस्कृतिक उद्धार की दिशा में आगे बढ़ते हुए जातीय अस्मिता की बात करते हैं और अचानक काशी में संस्कृतनिष्ठ हिन्दी का प्रचलन एक भीतरी आंदोलन के तहत हो जाता है.

छायावाद के सारे रचनाकर कविता, कहानी, नाटक, उपन्यास तथा अन्य विधाओं में संस्कृतनिष्ठ हिन्दी का आंचल पकड़ लेते हैं. यहाँ उनकी जातीय अस्मिता, प्राचीन गौरव-गुणगान, विश्व में स्वयं को सर्वोपरि बताने का दंभ विद्यमान होकर केंद्र में आजाता है. जबकि इस समय में अधिक लोकप्रियता बच्चन, भगवती चरण वर्मा, अंचल आदि को उनके भाषाई समन्वय पर अधिक प्राप्त होती है. वर्तमान स्थिति भी इससे परे नहीं, आज भारत की अस्मिता की बात उठाते हुए कई जतियों, धर्मों, संप्रदाय के प्रति उपेक्षा की दृष्टि से देखा जा रहा है और भाषा के मामले में भी इसी प्रकार का रवैया बन रहा है. आज भी प्राचीन गौरव का गुणगान करते हुए संस्कृति-रक्षण, भाषा-रक्षण और अन्य रक्षण की बात  मुद्दे के रूप में उजागर होते हुए समक्ष आ रही है, इस बात को किसी भी दशा में इनकार करते हुए नकारा नहीं जा सकता है. 

अब अपने मताभिव्यक्ति में बात रखता हूँ, जो हिन्दी भाषा और नागरी (देवनागरी नहीं, मेरी दृष्टि में मैं नागरी को देव से जोड़कर नहीं देख रहा हूँ) यह सत्य है कि भाषा केवल विचारों और भावों की अभिव्यक्ति का माध्यम है, परंतु आज देश के साथ वैश्विक स्तर पर हिन्दी भाषा और नागरी लिपि राष्ट्रीय अस्मिता और पहचान का भी प्रश्न बन गयी है. हम वर्तमान में हिंदी और नागरी लिपि को संयुक्त राष्ट्र संघ की आधिकारिक भाषा बनाने का बहुत प्रयास कर रहे हैं, लेकिन ऐसा प्रयास केवल राष्ट्रीय अस्मिता और प्रभाव को दर्शाने का कृत्रिम प्रयास और विचार सिद्ध होगा, इसका स्पष्ट कारण यह है कि अभी हिंदी भारत में राजभाषा के रूप में स्थापित है, राष्ट्रभाषा के रूप में उसे आधिकारिक मान्यता प्राप्त नहीं हुई है.

जब हमारे ही राष्ट्र में हिंदी के साथ भेदभाव, प्रतिबद्धता का अभाव और विरोधों की स्थितियों का सामना हो, तो वैश्विक स्तर पर हिंदी की स्थापना महज़ एक दिखावा ही नज़र आता है. भारत भाषा-वैविध्य राष्ट्र है, यहाँ संवैधानिक रूप में मान्य 22 भाषाओं को संवैधानिक दर्जा प्राप्त है और यहाँ कई सौ बोलियाँ विद्यमान हैं. ऐसी दशा में हिंदी को राष्ट्रभाषा घोषित करना किसी भी सरकार के लिए एक बहुत बड़ा ख़तरा नज़र आता है, क्योंकि जैसे ही एक भाषा हिंदी को राष्ट्रभाषा के रूप में मान्यता मिली तो हिंदी की अनिवार्यता लागू होगी और ऐसी अवस्था में प्रांतीय/क्षेत्रीय भाषा के समर्थक अपने विरोध का स्वर ऊँचा करते हुए हिंदी के विरोध में सड़कों पर उतर आएँगे और एक अराजकता/आंदोलन का वातावरण भारत में निर्मित होगा. ऐसी हालत में कोई भी वर्तमान सरकार किसी भी तरह का भाषा के विवाद और स्थापना का ख़तरा उठाने से पीछे ही हटेगी, इस मुद्दे को टालती ही रहेगी.

सरकारें प्रजा बनाती हैं और प्रजा जब एकजुट हो तथा वैचारिक समन्वय के माध्यम से भावुकता को परे रखते हुए हिंदी के मान, अस्मिता और अधिकार के लिए एक साथ आगे आए और प्रत्येक प्रान्त अपना समर्थन हिंदी के लिए दे, तो किसी भी तरह से फिर हिंदी को राष्ट्रभाषा बनने से कोई भी नहीं रोक सकता है. अतः ये बहुत आवश्यक हो जाता है कि भारत में एकजुट होकर एकमत से वास्तविक समर्थन हिंदी भाषा के रूप में प्राप्त हो ताकि हिंदी की वर्तमान संघर्षात्मक अवस्था से मुक्ति मिल सके, वरना भारत सहित विश्व में प्रत्येक वर्ष ढोंग, आडम्बर और झूठी संकल्पना के दोहराव के साथ दिवस 'हिंदी दिवस' यूँ ही मानते रहेंगे, शपथ समारोह, कार्यक्रम होते रहेंगे, अतिथियों के व्याख्यान आयोजित होते रहेंगे और एक दिन हिंदी भाषा संस्कृत भाषा के समान सिमटकर रह जाएगी और इसके प्रचलन पर प्रश्न लग जाएगा, क्योंकि खतरा अभी भी बरकरार है. इसलिए बहुत आवश्यक हो जाता है कि हिन्दी भाषा और नागरी लिपि को लेकर ईमानदार प्रयास करते हुए प्रतिबद्धता के साथ इसे अपनाते हुए दैनिक जीवन की भाषा और लिपि बनाएँ तथा अपने समस्त कार्य हिन्दी और नागरी में करें. 

वर्तमान में प्रचलित हिंदी भाषा और नागरी लिपि को स्थिति पर विचार कर लिया जाए कि हिंदी भाषा और नागरी लिपि किस दिशा-दशा में, किस स्तर पर, किस क्षेत्र में, कहाँ तक प्रसारित और विद्यमान है, इसकी व्यापकता कहाँ तक है, किस माध्यम का चयन करते हुए उपयोगकर्ता इसका इस्तेमाल कर रहा है? सूचना प्रौद्योगिकी के युग में हिंदी भाषा और नागरी लिपि ने अपना मार्ग तय कर लिया है और आज कंप्यूटर, इंटरनेट, सोशल मीडिया, मोबाईल, फ़िल्म, टेलीविज़न इत्यादि में निरंतर अपने माध्यम की भाषा और लिपि बनी हुई है. कंप्यूटर में हिंदी भाषा और नागरी के प्रयोग और उपयोगकर्ता/उपभोक्ता की दृष्टि को केंद्र में रखकर सन 2000 से हिंदी भाषा और नागरी को स्थान मिला है अब कम्प्यूटर इंस्टालेशन के समय आप अपनी उपयोगी भाषा और लिपि का चयन करते हुए पूरा कंप्यूटर हिंदी और नागरी में स्थापित कर सकते हैं. अधकितर भाषा प्रेमियों को इस बात का ज्ञान नहीं है और वह अपने कंप्यूटर को अब भी अंग्रेज़ी तथा रोमन में इस्तेमाल कर रहे हैं.

मोबाइल की स्थिति भी ऐसी ही है आपका सम्पूर्ण मोबाईल भाषा चयन के विकल्प के माध्यम से हिंदी और नागरी में परिवर्तित हो सकता है, लेकिन अब भी उपयोगकर्ता अपने भाषाई स्टेटस में अंग्रेज़ी और रोमन को अपनाए हुए  हैं कारण इसका भी स्पष्ट है कि अब भी उनके भीतर से ग़ुलामी के अंश नहीं निकल पाए हैं, अब भी भाषा की ग़ुलामी को अपनाकर अभिमानी हो रहे हैं. उन्हें हिंदी और नागरी के चयन और उपयोग में शर्म और झिझक आती है साथ ही स्वयं की इज़्ज़त-आबरू का दंभी प्रश्न भी उन्हें आ घेरता है. मोबाइल पर ही सेकड़ों हिन्दी के एप्स मौजूद हैं जिसमें  शब्दकोश से लेकर अनुवाद टूल तथा गेम्स से लेकर समाचार चैनल तक हिन्दी भाषा और नागरी लिपि में प्राप्त किए जा सकते हैं.

आज की वास्तविकता यह है कि मोबाइल कंपनियों ने  अपने उत्पाद को खपाने के लिए राष्ट्रों की प्रमुख भाषाओं को ही ग्रहण नहीं किया, बल्कि प्रांतीय और क्षेत्रीय बोलियों को भी ग्रहण किया तथा भाषा को केंद्र में रखकर अपने उत्पाद सेवाओं को भारतीय बाज़ारों में खपाने का भरसक प्रयत्न किया है. भाषा बाज़ार की मांग का एक महत्वपूर्ण हिस्सा और नीति समझी जा रही है और कम्पनियाँ इसके लिए गंभीर होकर प्रयासरत हैं.

अब भारत में तकनीक का उपयोगकर्ता बेड़े समूह में बड़ी आसानी से कम्प्यूटर, इंटरनेट, मोबाईल में हिंदी और नागरी का उपयोग कर रहा है. इंटरनेट पर हिंदी भाषा और नागरी के पृष्ठों की संख्या पहले पहल बहुत कम रही हो, लेकिन वर्तमान में हिंदी और नागरी के पृष्ठों की बाढ़ आ गई है. 

इन्टरनेट पर हिन्दी भाषा और देवनागरी लिपि में अकल्पनीय, अथाह सामग्री उपलब्ध है और देवनागरी लिपि में कार्य, प्रयोग, उपयोग किया जाना संभव है. आज ज़माना ब्लोगिंग, माइक्रो ब्लोगिंग का है और ब्लॉगिंग में भाषा का माध्यम हिंदी मौजूद होने के कारण बड़ी अधिक संख्या में हिंदी और नागरी में ब्लॉगों की रचना हो रही है और सभी भारतीय भाषाओँ के साथ हिंदी वर्चस्व पाकर प्रथम स्थान पर है. यहाँ तक कि अब डोमिन भी नेट पर हिंदी और नागरी में बनाए जा सकते हैं, बस अब ईमेल के पते (उदाहरण स्वरूप- राजीवसिंह८६@जीमेल.कॉम) के लिए हिंदी और नागरी में स्थापना की आशा है लगभग वह भी शीघ्र ही पूरी हो जाएगी.गूगल ने इंटरनेट पर हिंदी भाषा और नागरी के विकल्प के साथ खोज इंजनों की सुविधा उपलब्ध कर रखी है, अधिक उपयोगकर्ता अभी भी अंग्रेज़ी/रोमन का प्रयोग कर रहे हैं जो कि दुःखद अवस्था है. स्टार्टअप इंडिया और डिजिटलाइज़ेशन जैसे महत्वपूर्ण प्रयासों से भी हिन्दी भाषा और नागरी लिपि के प्रचलन में ख़ासी वृद्धि होने के साथ उपयोगकर्ताओं का ध्यान आकर्षित हुआ है.

आज सोशल मीडिया- फेसबुक, ट्वीटर, व्हाट्सऐप, वाइबर, वीचैट, टेलीग्राम, इंस्टाग्राम, लिंक्डइन के नव्य, तीव्रगामी, अधिक कारगर एप्स के माध्यम में हिंदी/नागरी की स्थिति काफ़ी मज़बूत हुई है, इन माध्यमों के उपयोगकर्ता आज अंग्रेजी/रोमन को पछाड़ रहे हैं. बहुत से एप्स समूह फेसबुक, ट्वीटर, व्हाट्सएप्प पर मौजूद हैं जिसमें निरंतर हिंदी/नागरी का इस्तेमाल हो रहा है और विकास की गति को तीव्र कर रहे हैं.हिंदी भाषा और नागरी ने सूचना प्रौद्योगिकी के इस युग में तकनीक के साथ अपना क़दम से क़दम मिलाकर आगे बढ़ने का हौसला दिखाया है, जो कि स्वागत योग्य होने के साथ प्रशंसनीय एवं संतोषप्रद नज़र आता है. आज सोशल मीडिया के कारण हिंदी और नागरी में भारत ही नहीं बल्कि विश्व-स्तर पर व्यक्तियों के मध्य संवाद बढ़ा है और निरंतर वृद्धि हो रही है. मुंबई विश्वविद्यालय के पूर्व हिन्दी विभागाध्यक्ष प्रो.करुणाशंकर उपाध्याय की पुस्तक हिन्दी का वैश्विक संदर्भमें दर्शाते हैं कि 8 वर्षों के भीतर दुनियाभर में हिन्दी बोलने वालों की संख्या में 9 करोड़ और हिन्दी भाषियों की संख्या में 10 करोड़ हिन्दी बोलनेने वालों की बढ़ोतरी हुई है. भारत के अतिरिक्त विश्व में ऐसे कई देश हैं जहां हिन्दी जानने वालों की संख्या 50 प्रतिशत तक है. 

आज विश्वभर में हिन्दी जननेवालों की संख्या १,१०,२९,९६,४४७+ है, हिन्दी अब १६० देशों से बढ़कर २०६ देशों तक पहुँच गई है. भाषा के उपयोगकर्ताओं की दृष्टि से हिन्दी भाषा वैश्विक स्तर पर द्वितीय स्थान पर बनी हुई है, इस स्थिति से अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि वर्तमान में हिन्दी भाषा किस स्तर पर कहाँ तक प्रसारित हुई है. डिज़िटलाइज़ेशन के इस युग में वास्तव में हिंदी भाषा और नागरी को महत्त्व सुनिश्चितता के साथ अपना मार्ग व स्थान भी मिल है और आज अधिक से अधिक उपयोगकर्ता इसका उपयोग निःसंकोच कर रहे हैं, बच्चों, गृहणियों से लेकर वृद्ध भी हिंदी भाषा और नागरी के प्रयोग को तकनीक के माध्यम से अपनाए हुए हैं. 

बैंकिंग क्षेत्र में भी वर्त्तमान में हिंदी/नागरी का बढ़ावा मिलने के साथ स्थिति मज़बूत दिखाई दे रही है. हिंदी-अहिन्दी प्रदेशों में बैंकिंग क्षेत्रों में त्रिभाषा सूत्र का प्रयोग किया जा रहा है, बैंक के नाम के साथ समस्त प्रकार के दस्तावेज़ ग्राहक/उपभोक्ता की सुविधा के लिए तीन भाषाओं और लिपियों में पर्चियाँ तथा अन्य दस्तावेज़ों का प्रयोग किया जा सकता है, जिसमें हिंदी और नागरी अनिवार्य रूप से मौजूद है. डिज़िटलाइज़ेशन के साथ हिंदी नागरी और बैंकिंग प्रणाली का प्रायोगिक दौर शुरू हो चुका है. बैंकों की सम्पूर्ण वेबसाइट हिंदी में उपलब्ध होने के साथ एटीएम के भाषा विकल्पों में हिंदी और नागरी का धड़ल्ले से प्रयोग हो रहा है. ए.टी.एम. त्रिभाषा सूत्र पर आधरित मशीन है जिसमें ध्वन्यात्मक सुविधा के साथ लिखित नागरी लिपि की पर्ची प्राप्त होती है. जमा पर्ची, शेष जानकारी पर नागरी लिपि हिंदी भाषा के साथ मौजूद है. विश्व के कई देशों से हिन्दी की पत्रिकाएँ नागरी में प्रकाशित हो रही हैं. 

इसके साथ भारत के अतिरिक्त दुनियाभर के 100 से अधिक विश्वविद्यालयों में हिन्दी का पठन-पाठन हो रहा है. कई भारतीय मूल के रचनाकर विदेशों में बसे हुए हैं जो कि हिन्दी की सेवा करते हुए लगातार हिन्दी का श्रेष्ठ साहित्य हिन्दी को देते हुए हिन्दी और नागरी को अपना योगदान दे रहे हैं. उक्त स्थिति के अतिरिक्त सूचना प्रौद्योगिकी के दैनिक व्यवहार, उपयोग और प्रयोग में हम देवनागरी का सहज ही उपयोग करते हुए जीवन व्यतीत कर रहें हैं. रेलवे प्लेटफ़ार्म, बस स्टैण्ड आदि स्थानों पर इलेक्ट्रोनिक बोर्डों द्वारा  सूचना हमें देवनागरी में प्राप्त हो रही है, साथ ही रेलगाड़ी, बस के भीतर और बाहर तत्संबंधी सूचना भी हमें देवनागरी में इलेक्ट्रोनिक बोर्डों द्वारा प्राप्त हो रही है. 

वर्तमान में हिन्दी और नागरी की इतनी अधिक व्यापकता और प्रसार है कि रोमन अब स्वत: पिछड़ने की स्थिति में आचुकी है, हिन्दी और नागरी के वर्तमान और भविष्य पर चिंताजनक कोई खतरा मुझे तो दिखाई नहीं देता, बस विरोधों के संवादों के बजाए हम समर्थन, समन्वय के भाव को ग्रहण कर लें और दुराग्रह से मुक्त हो जाएँ तो हिन्दी भाषा और नागरी लिपि के विवादों से मुक्त हो जाएंगे. हमें हिन्दी और नागरी की देश-विदेश में स्थापना के साथ सुलभ भाषा और लिपि बनाने के लिए अपने प्रयासों में और अधिक सजगता, सक्रियता और संकल्पना लानी होगी ताकि इसके परिवर्धन और विकास की नई दिशाएँ वैश्विक स्तर पर निर्धारित हो सकें. हिन्दी ने वैश्विक प्रसार और परिदृश्य में अपनी अनूठी पहचान बनाते हुए अपनी शक्तिमत्ता के साथ अपने अस्तित्व को दीर्घ फ़लक पर स्थापना दी है, आज उदारवाद, भूमंडलीकरण, प्रौद्योगिकी के इस युग में हिन्दी और नागरी पिछड़ी नहीं बल्कि उसने अन्यान्य संसाधनों के अनुरूप स्वयं को ढालकर, नव्य मधायमों में संचारित होकर विविध स्तरों पर आरूढ़ होकर यह दर्शा दिया है कि हिन्दी और नागरी जनमानस से लेकर तकनीकी धरातल पर भारत से लेकर वैश्विक स्तर पर बहुत कारगर एवं उपयोगी है. हिन्दी और नागरी में खुलापन और विस्तार है इसी के कारण आज वह सबकी संवाहिका बनी हुई है, अपने को संकीर्णता से बचाते हुए विस्तार के साथ विश्व के कोने कोने में फैल रही है.    
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डॉ. मोहसिन ख़ान
                        स्नातकोत्तर हिन्दी विभागाध्यक्ष
जे. एस. एम. महाविद्यालय,
अलिबाग़-जिला-रायगढ़/ (महाराष्ट्र) ४०२  २०१
 मोबाइल-०९८६०६५७९७० / ०९४०५२९३७८३/मेल : Khanhind01@gmail.com

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  1. हिन्दी पर बहस को सार्थक दिशा में आगे बढ़ाता बहुत संतुलित आलेख। मोहसिन खान जी को बधाई और समालोचन का आभार। मैं बस इसमें यह जोड़ना चाहता हूँ कि हिन्दी को संस्कृतनिष्ठ बनाने का आग्रह बहुत पहले ही तिरोहित हो चुका है। जैसे हिन्दी साहित्य और कविता छायावाद और संस्कृतोन्मुखी होने के मोह और आग्रह से बहुत पहले ही मुक्त हो चुकी है, ठीक वैसे ही हिन्दी भी संस्कृतनिष्ठ होने/बने रहने के आग्रह या दबाव से बहुत पहले ही मुक्त हो चुकी है। हिन्दी का मौजूदा स्वरूप बहुत सरल-सहज और जनोन्मुखी ही है। हाँ, संस्कृत से आए अनेक शब्द जो बहुत पहले से स्वीकृत, प्रचलित और जुबान पर चढ़े हुए हैं, वे तो बने ही रहेंगे। जहां तक राजभाषा के मौजूदा स्वरूप का सवाल है तो यह भी बहुत सरल-सहज और मानक ही है। बस इसे निष्पक्ष होकर देखने की जरूरत है। भारत के संविधान में और राजभाषा अधिनियम, नियम और नीति में यह कहीं भी नहीं लिखा है कि हिन्दी में सिर्फ और सिर्फ संस्कृत से ही शब्द-ग्रहण किए जाएँ। मुझे यह भी कहना है कि चूंकि भारत के संविधान में हिन्दी लिपि 'देवनागरी' दर्ज है, तो इसलिए इसे 'देवनागरी' कहने में कोई परहेज करने की जरूरत नहीं है। हाँ, बहस-चर्चा में अपने मन्तव्य के साथ कोई इसे सिर्फ 'नागरी' कहना चाहें तो कहें, पर यह सांविधिक रूप में/से 'देवनागरी' ही रहेगा। भारत के संविधान ने हिन्दी को संघ की राजभाषा बहुत पहले ही ससम्मान घोषित किया है, जिसके पीछे हिन्दी की राष्ट्रीय आंदोलनों में महत्वपूर्ण भूमिका, हिन्दी की विशाल भाषायी आबादी, हिन्दी और हिन्दी व्याकरण की सहजता-सरलता, देवनागरी लिपि की सहजता-सरलता और तत्कालीन अनेक अहिंदी भाषा-भाषी राजनेताओं तक का हिन्दी को प्रबल समर्थन प्रमुख तार्किक और तथ्यपरक आधार रहे हैं। इसलिए मैं हिन्दी को राजभाषा के साथ-साथ संवैधानिक रूप से संघ की 'राष्ट्रभाषा' घोषित करने-कराने का समर्थक कतई नहीं हूँ। इससे दूसरी भाषाओं का अहित ही होगा और हिन्दी के खिलाफ वैमनस्य और विरोध और अधिक आक्रामक होगा। हिन्दी राजभाषा या राष्ट्रभाषा के संवैधानिक दर्जों के बिना भी सर्वाधिक लोकप्रिय और समर्थ भाषा है, यही हिन्दी का बल और सौन्दर्य है। जहां तक हिन्दी के भगवाकरण की बात है तो मैं अब भी नहीं मानता कि कोई भी सरकार या मौजूदा बीजेपी सरकार हिन्दी का भगवाकरण करने का प्रयास कर रही है। इसका कोई भी प्रत्यक्ष या परोक्ष संकेत मुझे अबतक नहीं दिख रहा! हाँ, मैं फिर दुहराता हूँ कि संस्कृत भाषा के संरक्षण-संवर्धन को हिन्दी के भगवाकरण या फिर संस्कृत के ही भगवाकरण के रूप में देखने की भूल हरगिज नहीं करें। जहां तक भाषा की राजनिति का प्रश्न है तो अब राजनीति 'हिन्दी' में होती है! चिदम्बरम की बात याद करें!(काश! मुझे भी हिन्दी आती तो मैं भी बनारस में मोदी को टक्कर देता!) हिन्दी या किसी भी भाषा के नाम पर राजनीति करने का कोई कारण अब नहीं बचा रह गया है!

    - राहुल राजेश, कोलकाता।

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  2. उम्मीद करें कि भारतीय भाषाओँ में विश्वस्तरीय शोध भी हों... सृजन और शोध जो कि भाषा से व्यक्त होते हैं - वे भाषा की सीमाओं से सीमित न हों। हम यह मानकर खुश होते हैं कि हिंदी फ़ैल रही है या अमुक देश में अमुक विश्वविद्यालय में या इतने या उतने लोग हिंदी सीख रहे हैं, ये सफलता हिंदी या हिंदी में हुए सृजन की नहीं है। यह उस बाजार की सफलता है जिसमे भारतीय भीड़ बात करती है।

    भाषा पर गर्व करना ठीक है। उसकी तरक्की के आकड़ें भी अपनी जगह ठीक हैं लेकिन उस सृजनात्मक रुझान को कैसे लाएंगे जो किसी भी भाषा में कुछ नहीं कर पा रहा है? ये बड़ी समस्या है। शायद ये भाषा का प्रश्न नहीं है लेकिन भाषा को अनिवार्य रूप से प्रभावित करता है।

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  3. मैं इस क्षेत्र से सीधा जुड़ा हूँ और मैं बहुत आश्वस्त हूँ कि हिंदी और नागरी में कई प्रकार के शोध होने के साथ तकनीकी विषयों पर भी पुस्तकें इसी क्रम में लिखी जा रही हैं, बालेन्दु शर्मा दाधीच जी की पुस्तक का उदाहरण लें तो स्पष्ट हो जाएगा, भाभा ऑटोमिक के एक वैज्ञानिक अपनी पुस्तक हिंदी में लिखते हैं जो कि क्ष-किरण के नाम से है। ऐसे कई उदाहरण हैं।
    कंप्यूटर तकनीक पर हिंदी और नागरी में किताबें उपलब्ध हैं साथ ही हिंदी और नागरी में मासिक पत्रिकाएँ कंप्यूटर, नेट इत्यादि विषयों पर निरंतर प्रकाशित हो रही हैं। अनुवाद का एक बहुत बड़ा क्षेत्र इस दिशा में खुला हुआ है और निरंतर कार्य कर रहा है। चाहे मानव द्वारा अनुवाद हो या मशीन द्वारा बहुत काम हो रहा है। कोशों पर इतना काम हुआ है कि सिर चकरा जाए, अभी थिसारस भी नागरी में आया है यह काम भी महत्त्व का है। अभी iit की परीक्षा भी हिंदी में आयोजित की जाने वाली है। म. प्र. के राजीव गांधी प्रौद्योगिकी संस्थान ने हिंदी में परीक्षा देने पर मोहर लगादी है, यह कम महत्त्व की बात नहीं।

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  4. आपकी इस प्रस्तुति का लिंक 22-09-2016 को चर्चा मंच पर चर्चा - 2473 में दी जाएगी
    धन्यवाद

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  5. http://arvindlexicon.com/4242/lekhak-manch-article/
    इस लिंक पर शब्दकोश के थिसारस हिंदी और अन्य भाषाओँ के कोश पर पढ़ा जा सकता है।

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  6. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शुक्रवार (23-09-2016) को "नेता श्रद्धांजलि तो ट्विटर पर ही दे जाते हैं" (चर्चा अंक-2474) पर भी होगी।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट अक्सर नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  7. धीरे-धीरे ही सही लेकिन एक दिन इन्टरनेट पर सबसे आगे होगी हमारी हिंदी ..
    बहुत अच्छी प्रस्तुति

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