परख : हिंदू परम्पराओं का राष्ट्रीयकरण : वसुधा डालमिया

Posted by arun dev on अगस्त 13, 2016

वसुधा डालमिया








अंग्रेजी में 1997 में प्रकशित वसुधा डालमिया की पुस्तक – ‘The Nationalisation of Hindu Tradition का हिंदी अनुवाद ‘हिंदू परम्पराओं का राष्ट्रीयकरण’ राजकमल प्रकाशन से इस वर्ष छप कर आया है. अनुवाद संजीव कुमार और योगेन्द्र दत्त ने किया है.
राष्ट्रवाद, उदयीमान मध्यवर्ग, अस्मिता (ओं) की निर्मिति, धार्मिक सुधार और साम्प्रदायिकता आदि के बीच अन्त: क्रियाओं की जटिलता के आकलन का यह बौद्धिक आकलन अकादमिक क्षेत्रों में बहुत समादृत है.
इस शोध पुस्तक का महत्व कई कारणों से है. हिंदी नवजागरण के पुरोधा भारतेंदु हरिश्चंद्र की भूमिका  और उनके शहर बनारस और उस समय की सामाजिक, धार्मिक, साहित्यिक सक्रियताओं को जानने समझने के लिए यह प्रमाणिक और विश्वसनीय सामग्रीं प्रदान करता है.
दूसरा यह कि हिंदी नवजागरण को लेकर अतिउत्साह और अतिव्याख्या का जो ‘हिंदी स्कूल’ है उसे समुचित और संतुलित करने के लिए भी इसे पढ़ा जाना चाहिए.
और यह भी कि भारत में जिस तरह से मानविकी में शोध होते हैं वे कितने अक्षम, अपर्याप्त और अनुचित हैं, इस शोध को पढ़ते हुए खास तौर से महसूस होता है. 
अनुवाद बेहतर है.

लेखक अरुण माहेश्वरी ने इस किताब की कुछ अवधारणाओं पर जरूरी सवाल उठाये हैं.



भारतेंदु हरिश्चंद्र : सबाल्टर्नवाद और सांस्कृतिक मार्क्सवाद    

अरुण माहेश्वरी


संजीव कुमार ने भारतेन्दु हरिश्चन्द्र पर केंद्रित वसुधा डालमिया की किताब जो मूलत: अंग्रेजी में लिखी गई है - The Nationalisation of Hindu Tradition का हिंदी में अनुवाद किया हैं - ‘हिन्दू परंपराओं का राष्ट्रीयकरण, जिसे राजकमल प्रकाशन ने छापा है.   

इतिहास की सबाल्टर्नवादी दृष्टि को मूलत: इतिहास सृजन की एक अति-यथार्थवादी (surrealist) धारा कहा जा सकता है. यह वस्तु मात्र केंद्रित एक ऐसा नजरिया है जो चीज को किसी सक्रिय प्रक्रिया में, परिघटना के तौर पर देखने के बजाय, कुछ स्वयंसिद्ध सिद्धांतों के चौखटे में उसके पूरे विस्तार के साथ जड़ने की कोशिश होती है. अर्थात इसमें वर्णित चीज में कभी कोई बदलाव नजर नहीं आता है, क्योंकि उसके इर्द-गिर्द भी कहीं किसी प्रकार का कोई बदलाव नहीं दिखाई देता है. मान कर चला जाता है कि कुछ चीजें हैं जो सनातन काल से चली आ रही हैं, आज भी चल रही है और शायद आगे भी इसी प्रकार चलती रहेगी. उसी सनातनता के परिप्रेक्ष्य के चौखटे में यह इतिहास दृष्टि अपने विषय को भी उसके अधिकतम, और सूक्ष्मतम ब्यौरों के साथ जड़ने का काम करती है. और जब आप इतिहास को किसी भौतिक परिघटना के तौर पर देखने के बजाय उसे किसी सनातन सत्य की अभिव्यक्ति के रूप में देखने लगेंगे, तो हमेशा विषय की द्वंद्वात्मकता के व्याहत होने और एक प्रकट चित्र के कल्पित विस्तार के भूल-भुलैय्या में ही खो जाने का खतरा बना रहता है. और, इससे कुल मिला कर जो कृति सामने आती है, उसमें अन्तत: अति-विस्तार की ऊब की अंधेरी खाई के सिवाय और कुछ नहीं बचा रहता है.

विषय को और भी खोलने के लिये, मैं यहां ओवेन चैडविक की प्रसिद्ध किताब The Secularisation of the European Mind in the 19th Century (1975) का उल्लेख करना चाहूंगा, क्योंकि इसका एक गहरा संबंध वसुधा डालमिया की किताब के विषय से भी है. चैडविक की इस किताब की सबसे बड़ी शक्ति इसी बात में है कि उन्होंने तमाम वैज्ञानिक चिंतकों की तरह स्वयं धर्म को एक सामाजिक परिघटना के रूप में देखा था. अपनी किताब में चैडविक ने सामाजिक चिंतन में रैनेसांस के उदारतावाद से लेकर कार्ल माक्‍​र्स के विचारों के साथ ही मजदूरों के व्यवहार में होने वाले बदलावों, चर्च के प्रति बदलते हुए समाज के रवैये का एक विवरण दिया था और साथ ही 19वीं सदी में वाल्तेयर की भूमिका, विज्ञान और धर्म, इतिहास और सेकुलर, मनुष्य की नैतिक प्रकृति की तरह के बौद्धिक विषयों को भी अपने विचार का विषय बनाया था. इस पूरे उपक्रम में चैडविक ने डरखाईम (Durkheim) की तरह के लोगों की सोच की उस पूरी प्रणाली का प्रत्युत्तर दिया था जोधर्म को एक सामाजिक परिघटना मानने के बजाय, ‘समाज को एक धार्मिक परिघटनाके रूप में देखते हैं. जो लोग भी सामाजिक प्रक्रिया के अध्ययन के विषय के तौर पर समाज में धर्म के स्थान को अपनाते हैं, उनके विपरीत चैडविक धर्म-निरपेक्षीकरण (Secularisation)  की प्रक्रिया से आधुनिक समाज के अध्ययन की बात पर बल दिया था. यह कहना कि धार्मिक आस्था पहले भी थी, और आज भी है समाज को स्थिर रूप में देखने का दृष्टिकोण है.

चैडविक ने उदाहरण दे कर कहा था कि एक जमाने में लोग भूत-प्रेत, डायन-डाइनी पर जितने व्यापक पैमाने पर विश्वास करते थे, आज वे सारे भूत-प्रेत निशक्त हो गए हैं. आदमी नैसर्गिक तौर पर आस्थावादी है की तरह की बातों का ऐतिहासिक अध्ययन में कोई मायने नहीं होता. चैडविक के शब्दों में, ‘इतिहास ईश्वर का ज्ञान नहीं होता, आंशिक तौर पर यह ईश्वर के ज्ञान का ज्ञान होता है.जो लोग मनुष्य के धार्मिक अनुभवों की प्रकृति के अध्ययन में लगे होते हैं, उनके लिये इस सच को मानना कठिन होता है कि लोगों की ईश्वर पर आस्था डोल रही है. उल्टा ऐसा करने वालों को वे कहते हैं कि आप जिस धर्मनिरपेक्षीकरण की बात कर रहे हैं, वह आपके दिमाग का फितूर है, क्योंकि आप ऐसा चाहते हैं. लेकिन यह सच नहीं है ; अर्थात धर्मनिरपेक्षीकरण एक कोरा प्रचार है. इसकी बात न करना ही बेहतर है.

चैडविक के शब्दों में, ‘They say that secularisation only exists in the minds of those who wish it to occur ; in short that it is merely a word of propaganda ; and that we shall therefore do better not to use it. Their excuse lies in the perception that a goodly number of those who write about secularisation write out of dogma and not out of open minded enquiry.” 

ऐसे लोग धर्मनिरपेक्षीकरण की तरह के शब्द को शब्दकोश से ही निकाल बाहर करने की बात करते हैं. वे अंतत: धर्मनिरपेक्षता की बात को ही एक भूल साबित करना चाहते हैं. चैडविक ने ऐसी दृष्टि की तुलना उस मूलभूत धार्मिक दृष्टि से की है, जो आदमी के स्वर्ग से गिरने के बाद उसके पतन और पतन के सिवाय और कुछ नहीं देखती है.

लेकिन इतिहास के बारे में इस नजरिये का मूल दोष यही है, जैसा कि हमने शुरू में ही कहा है कि यह कुछ स्वयंसिद्ध बातों के चौखटे में ऐतिहासिक प्रक्रिया को जड़ने की कोशिश होती है. मसलन्, धर्म था, धर्म है और धर्म रहेगा. इसके अलावा बाकी सारी बाते फिजूल हैं. ऐसे लोगों के लिये धार्मिक विश्वासों के रूप में आने वाले परिवर्तनों का कोई मायने नहीं होता. उनके लिये इस सवाल का भी कोई अर्थ नहीं होता कि आज कितने लोग है जो भूत-प्रेत या पुराणों में वर्णित नरक के खौलते तेल में तल देने या परियों जैसी सुंदरियों, देवी-देवताओं से भरे स्वर्ग जैसी बातों पर पूरा यकीन करते हैं ?

वसुधा डालमिया की किताब की चर्चा करते हुए चैडविक की बातों का जिक्र सिर्फ इसीलिये किया गया है कि डालमिया ने जिस प्रकार हिंदू धर्म के एक स्वयंसिद्ध ढांचे में बनारस, भारतेंदु और हिंदी भाषा को रखने की कोशिश की है, उससे इसके सिवाय दूसरे किसी नतीजे पर नहीं पहुंचा जा सकता है कि आज के भारत और 19वीं सदी के भारत में, यहां के लोगों के सामाजिक व्यवहार में कोई फर्क ही नहीं आया है. वाराणसी की तरह के हिंदुओं के एक धार्मिक शहर में हरिश्चंद्र की तरह के एक धर्म-भीरू साहित्यकार का जन्म होता है और उसके जरिये धर्म का ही राष्ट्रीयकरण हो जाता है. मसलन्, धर्म-विश्वासी राममोहन राय के जरिये धर्म का राष्ट्रीयकरण भर हुआ क्योंकि बांग्ला नवजागरण ने बंगाल से धर्म का नाश तो नहीं किया. वह इसके पहले भी था, नवजागरण में भी था और आज तक है और शायद हमेशा रहेगा ! आधुनिकता के प्रकल्प की सारी विफलताओं के बावजूद ऐसीथा, है, रहेगाकी तरह की बातें न सिर्फ इतिहास-विरोधी है, बल्कि इतिहास को एक सामाजिक-आर्थिक परिघटना के रूप में अध्ययन का विषय बनाने के मूलभूत वैज्ञानिक दृष्टिकोण के विरुद्ध है. वसुधा डालमिया की किताब इससे पूरी तरह से ग्रसित है और इस प्रकार के स्वयंसिद्ध आधारों पर इतिहास के अध्ययन के जो भी दुष्परिणाम हो सकते हैं, उन सबको इस ऊबाऊ किताब में अच्छी तरह से देखा जा सकता है.

दरअसल, इतिहास को एक सामाजिक-आर्थिक परिघटना के रूप में न देखने का यह यह दोष सिर्फ सबाल्टर्नवादियों का नहीं, सांस्कृतिक मार्क्सवाद के तमाम रूपों का है. वे हर सामाजिक व्यवहार को संस्कृति संबंधी कुछ स्वयंसिद्ध बातों के आधार पर देखने की कोशिश करते हैं. जबकि मार्क्सवाद इतिहास के अध्ययन के केंद्र में मनुष्यों के बदलते हुए सामाजिक-आर्थिक संबंधों को रखता है. इसका एक बड़ा उदाहरण हम आज आम तौर वैश्वीकरण और सांप्रदायिकता संबंधों पर की जाने वाली चर्चा में देख सकते हैं.

जब कोई वैश्वीकरण और सांप्रदायिकता को अनिवार्य तौर पर परस्पराश्रित मानता है, तब वह वैश्वीकरण को एक आर्थिक-सामाजिक परिघटना के तौर पर देखने के बजाय उसे महज एक सांस्कृतिक परिघटना या सांस्कृतिक समस्या के रूप में देखने का दोषी होता है. वैश्वीकरण के नाना सांस्कृतिक परिणामों को भी वह एक ही निश्चित आत्मगत चौखटे में जड़ कर पेश करता है. वैश्वीकरण की तरह की एक ऐतिहासिक पूंजीवादी सामाजिक-आर्थिक परिघटना को नितांत संकीर्ण दृष्टि से साम्प्रदायिकता की तरह की एक समस्या में सीमित करके देखना या इस प्रकार का कोई भी निष्कर्ष निकालना कि भारत में सांप्रदायिकता हमेशा से थी, आज भी है और आगे भी रहेगी, एक पूरी तरह से इतिहास-विरोधी नजरिया है. इतिहास संबंधी सोच के इस दोष को यदि आपको सबसे प्रकट रूप में देखना-समझना हो तो आप उसे एजाज अहमद की किताबOn communalism and Globalisation’ से देख सकते हैं. वह वसुधा डालमिया की तरह ही एक ऐसा आख्यान रचते हैं जिसमें भारत में नाना रूपों में हिंदू सांप्रदायिकता का बोलबाला रहा है, वही आज भी जारी है और वे कहते हैं कि वैश्वीकरण की इस दौर में आगे भी इसी प्रकार जारी रहेगा.  

गहराई से देखने पर यह समझने में शायद ही किसी से चूक होगी कि ऐसा सांस्कृतिक मार्क्सवाद सैमुअल हंटिंगटन के सभ्यताओं के बीच संघर्ष के सिद्धांत का ही एकमाक्‍​र्सवादी प्रतिरूप है. मजे की बात यह है कि इसका इतिहास की सबाल्टर्न दृष्टि के साथ स्पष्ट मेल दिखाई देता है. 

हेगेल ने दुनिया के इतिहास को स्वतंत्रता के विचार का विकास कहा और मार्क्स ने उसे वर्ग संघर्ष का विकास बताया. हेगेल के विचार को, जो सर के बल खड़ा था, मार्क्स ने उलट कर पैरों के बल खड़ा किया.

यथार्थ और विचारों की द्वन्द्वात्मकता की सच्चाई में अक्सर 'पहले कौन' का सवाल असमाधेय सा लगने लगता है. इसीलिये विचारों की शक्ति से कभी कोई इंकार नहीं कर सकता. फिर भी, इतिहास में यह सचाई बार-बार ज़ाहिर होती रही है कि विचार जीवन के व्यक्त हो चुके यथार्थ के पीछे-पीछे घिसटते हैं और कल्पना के पर लगा कर उसी के गगन में ऊँची उड़ाने भरते हैं. मगर भ्रम ऐसा पैदा होता है मानो वे अपने किसी पूर्ण रूप से स्वाधीन और संप्रभु संसार में विचर रहे हैं. इसीलिये, 'सांस्कृतिक मार्क्सवाद' मार्क्सवाद को हेगेलवाद में रूपांतरित करने का उपक्रम है. यह भाववाद है. मार्क्सवाद का विलोम है.
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अरुण माहेश्वरी (जून 1951)
मार्क्सवादी आलोचकसामाजिक-आर्थिक विषयों पर टिप्पणीकार एवं पत्रकार  

प्रकाशित पुस्तकें (१)साहित्य में यथार्थ : सिद्धांत और व्यवहार (2) आरएसएस और उसकी विचारधारा (3)नई आर्थिक नीति : कितनी नई (4) कला और साहित्य के सौंदर्यशास्त्रीय मानदंड (5) जगन्नाथ (अनुदित नाटक) (6) पश्चिम बंगाल में मौन क्रांति (7) पाब्लो नेरुदा : एक कैदी की खुली दुनिया (8) एक और ब्रह्मांड, (9) सिरहाने ग्राम्शी, (10) हरीश भादानी, (11) धर्मसंस्कृति और राजनीति, (12) समाजवाद की समस्याएं, (13) तूफानी वर्ष 2014 और फेसबुक की इबारतें, (14) प्रतिद्वंद्विता से इजारेदारी तक, (15) आलोचना के कब्रिस्तान से, (16) Another Universe .

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