सैराट – संवाद (९) : सिनेमा, सामाजिक चिंताएं और बुद्धिजीवी : संदीप सिंह

Posted by arun dev on जून 22, 2016









समालोचन में मराठी फ़िल्म सैराट पर ज़ारी बहस और धारदार होती जा रही है. संदीप सिंह ने फ़िल्म, उसके प्रभाव और उसकी सामाजिक सार्थकता पर बात की है, पूर्व के प्रकाशित आलेखों पर भी उनकी तीक्ष्ण दृष्टि है. किसी फ़िल्म को देखने के अलग-अलग नजरिये हो सकते हैं. यह बहुलता अपने आप में स्वागतयोग्य है. 

                                                                


सैराट : सिनेमा, सामाजिक चिंताएं और बुद्धिजीवी                          
संदीप सिंह  



सैराट और समाज
नागराज पोपटराव मंजुले की फिल्म सैराट ने मराठी आमजन में हलचल मचा दी है. महाराष्ट्र में खासतौर से, काफी जन-समूह और परिवार सामने आयें हैं जिन्होंने सैराट से प्रेरणा लेकर विजातीय-विवाह के लिए मंच बनाये हैं या ‘घर-निकाला’ दिए हुए अपने बच्चों और उनके प्रेम को अपनाया है. जाहिर है ऐसा कर भर लेने से तमाम अंतर्विरोध समाप्त नहीं हो जाते, पर यह बड़ी बात है कि एक फिल्म ने इस हद तक लोगों को प्रेरित किया है. नागराज मंजुले की पहली फिल्म फंड्री ने भी छोटे स्तर पर ऐसा किया था. उसके रिलीज होने के बाद खासकर दक्षिण महाराष्ट्र में निचली दलित जातियों (वडार, कैकडी इत्यादि) में लोगों ने अपने घरों और मोटरसाइकिलों के ऊपर ‘फंड्री’ (सुअर) लिखवाना शुरू कर दिया था.


सैराट और बुद्धिजीवी
बुद्धिजीवियों/समीक्षकों को सैराट की अचूक पटकथा, फिल्मांकन और व्यावसायिक सफलता के सूत्रों को समझने में काफी दिक्कतें आ रही हैं. वे इसे एक शुद्ध व्यवसायिक मसाला फिल्म मान रहे हैं जिसमें निर्देशक ने चालाकी से यथार्थवाद की छौंक लगा दी है. कोई समीक्षक इसलिए नाराज हैं कि फंड्री जैसी यथार्थवादी कृति के फिल्मकार मंजुले ने ऐसी फिल्म क्यों बनायी? कुछ सोचते हैं कि फिल्म में आयी चीजों को बढ़ा-चढ़ाकर दिखाया गया है. फिल्म का लम्बा होना और उसकी ‘डिटेलिंग’ किसी के लिए कलात्मकता की दुश्मन है तो किसी के लिए इसका संगीत फिल्म की थीम के लिए अप्रासंगिक है. किसी का मानना है कि फिल्म में जो गाँव व उसके चरित्र वगैरह दिखाए गए हैं उस पर पूरी गंभीरता से काम नहीं हुआ है और मुख्य कथा-चरित्रों के अतिरिक्त बाकी चरित्रों (मुखिया, लड़की का भाई, लड़के के मित्र इत्यादि) का मोहरों की तरह इस्तेमाल किया गया है. कोई तो सिर्फ इसलिए घबराया हुआ है कि फिल्म की समाप्ति के बाद एकाध जगहों पर कुछ दर्शकों ने स्टेज पर चढ़कर शायद झिंगात गाने पर ‘तथाकथित’ रूप से नृत्य किया. उन्हें यह ‘त्रासदी का उत्सव’ लगता है. इसके इतर किसी समीक्षक को यह भी लगता है कि सैराट जैसी फिल्में आन्दोलन और सामाजिक चिंताओं को व्यावसायिक तरीके से बेचने की एक सफल कवायद है.  

वरिष्ठ कवि और आलोचक विष्णु खरे ने दार्शनिक प्रश्न उठाकर सैराट जैसी कृतियों की ‘त्रासद नियति’ की चर्चा की है. वे ‘त्रासदी को हल बनाकर पेश करती’ इस फिल्म के दर्शकों (उन्होंने ने ही इसे सफल बनाया) और फिल्म से होने वाले ‘मनोरंजन’ को केंद्र में रखते हुए ‘सवर्णवाद से आजीवन शत्रुता’, ‘टपोरीपन’ में self-indulgent होने व दर्शनरति और कामुकता में इसका सूत्र ढूँढने की कोशिश करते हैं. अपनी फांस को व्यक्त करते हुए लिखते हैं कि सैराट की ‘सफलता गले से उतरती है, दिमाग में अटककर रह जाती है’. आगे एक टिप्पणी में यह भी कहते हैं ‘जिस तरह एक लुम्पेन दर्शक-वर्ग सल्मानादिक की फिल्में हिट कर डालता है, क्या उसका विडंबनात्मक उभार हम मराठी में भी देख रहे हैं?’.  

ये प्रश्न गंभीरतापूर्वक विचार करने की मांग करते हैं. मसलन, कला के एक रूप में सिनेमा से आप क्या समझते हैं? कृति की कलात्मकता, यथार्थपरकता और व्यावसायिकता से आपका क्या तात्पर्य है? दर्शक-समूह या कलाकृति के उपभोक्ताओं को आप कैसे देखते हैं? उनसे आपकी क्या अपेक्षाएं हैं?

मेरी कोशिश होगी कि जटिल बातों को भी संभवतम सरल तरीके से रखा जाय और व्याख्या में यदि कोई कमजोरी है तो भी उसे भारी-भरकम दार्शनिक पदों या अर्नाल्ड हाउजर, अडोर्नों, अल्थूसर या ऋत्विक घटक के नाम से न ढंका जाय. पर इन प्रश्नों पर आने से पहले आइये कुछ छिटपुट बातें कर ली जाएँ.


सैराट का अर्थ क्या है?  
विष्णु खरे के लेख से हिन्दी में सैराट को लेकर एक बहस पैदा हुई है. पहली बहस तो इसके हिन्दी अर्थ को लेकर ही है. पलायन, उन्मुक्त, बेभान इत्यादि अर्थ निकाले जा रहे हैं. रुचिकर बात यह है कि कोई यह नहीं देखना चाह रहा कि खुद मंजुले सैराट से क्या अर्थ लगाते हैं! दर्जनों सात्क्षाकारों में वे इसका अर्थ totally wild या unstopable, uncontrolable या mad and unstopable बता रहे हैं. हिन्दी में संभवतः ‘बेकाबू’ या ‘उन्मत्त’ इसके आस-पास का शब्द होगा. वैसे सैराट 16वीं में इस्तेमाल होने वाला मराठी शब्द है. संत तुकाराम ने अपने अभंगों में कृष्ण और गोपिकाओं की कथा में इसका इस्तेमाल किया.

‘पडिली भुली धांवतें सैराट. छंद गोविंदाचा चोजवितें वाट.’

कथा ये थी कि एक गोपिका को लगने लगा कृष्ण सबसे ज्यादा उसके करीब हैं. वह बड़ी घमंडी हो गयी. कृष्ण को उसका घमंड तोडना जरूरी लगा. उन्होंने उस गोपिका को अपने कंधे पर बैठाने का वादा किया और अंतर्ध्यान हो गए. अब वह उनकी खोज में सैराट (बेकाबू, उन्मत्त) हो गयी. मराठी साहित्य के छात्र मंजुले को इतना तो जरूर पता रहा होगा!

इस हिन्दी-अर्थाकरण में सबसे ख़राब अर्थ ‘पलायन’ विष्णु खरे ने ही किया है. यह हो सकता है कि उन्होंने काफी शब्दकोशों इत्यादि को भी देखा हो. प्रश्न उठता है वे ऐसा अर्थ क्यों पेश कर रहे हैं? इसका उत्तर उनके लेख के अंत में व उनकी टिप्पणियों में मिलता है. साफ़ प्रतीत होता है कि सैराट की पूरी परिघटना के प्रति अपनी मान्यताओं, अभिजनवादी असहजता और दार्शनिक प्रपत्तियों को ध्यान में रखकर ही वे ऐसा कर रहे हैं. लेख में आगे इस पर विचार किया जायेगा. आइये पहले नागराज मंजुले और सैराट पर बात करते हैं.



नागराज मंजुले कौन हैं?
यह बता देना काफी नहीं है कि मंजुले महाराष्ट्र की वडार (सुअरपालक) दलित जाति से आते हैं. 12वीं कक्षा में पहली बार अम्बेडकर को पढ़ने पर जब वे अम्बेडकर का फोटो घर ले आये तो पिता ने नाराज होते हुए कहा ‘तू महार का फोटो क्यों ले आया? ये तो महारों का नेता है, इसका फोटो मेरे घर में नहीं लगेगा.’ इस पर मंजुले ने जवाब दिया कि ‘अगर अम्बेडकर का फोटो नहीं लगेगा तो तेरे एक भी भगवान का फोटो नहीं रहने दूंगा’.

16 मार्च 2016 को (सैराट रिलीज होने से पहले) टीवी चैनल ‘महाराष्ट्र वन’ पर मशहूर मराठी पत्रकार निखिल वाघले को दो किश्तों में दिए इंटरव्यू में नागराज अपने जीवन की कई परतें खोलते हैं. इससे हमें भी उनकी जमीन, संवेदना, क्राफ्ट और रचनाशीलता को समझने के संकेत मिलते हैं. नागराज जब छोटे ही थे एक रिवाज के अनुसार तुलजा भवानी के मंदिर में माता-पिता ने उन्हें अपने निःसंतान रिश्तेदार को गोद दे दिया. नए घर में नागराज की कभी बनी नहीं और पुराने घर वे कभी लौट नहीं सके. किशोर हो रहे इस बच्चे ने ‘अपने परिवेश के ही अनुसार’ इस गम को अठन्नियां सिनेमाघरों की हिन्दी, मराठी व ब्लू फिल्मों, बीड़ी, गुटखे, शराब और गांजे के जरिये मिटने की कोशिश की. 

सातवीं कक्षा तक आते-आते वह वह पूरा शराबी था. यहीं 6ठी में पढने वाली एक लडकी को वह चाहने लगा जिसकी झलक फंड्री में दिखती है. थोडा आगे चलकर यह लड़का शिवसेना का कार्यकर्ता बना, दंगों में हिस्सा लिया. आर.एस.एस. की शाखा में उछला-कूदा और जब यहाँ उसे बाताया गया कि उसके कस्बे के पुराने किले में जो मस्जिद है वह दरअसल एक मंदिर था जिसे कब्ज़ा कर मुसलमानों ने मस्जिद बना दी. तो एक दिन उत्तेजित और उत्साही लड़के ने शायद नशे की पिनक में इस अपमान का बदला लिया और मस्जिद पर भगवा झंडा टांग आया! यहाँ तक कि शोलापुर में दलित पैंथर के कार्यकर्ताओं के ऊपर हुए हमलों में भी युवा मंजुले सहभागी रहा. रामायण सीरियल का भक्त मंजुले अपने को श्रीकृष्ण समझता था.

इसी समय उसने महाभारत के कर्ण के नायकत्व को उभारने वाला शिवाजी सावंत का उपन्यास ‘मृत्युंजय’ पढ़ा. बकौल मंजुले यह उनका ‘टर्निंग प्वाइंट’ था. यहाँ से जीवन में अम्बेडकर और अन्यों का आना शुरू होता है. अब तक गिरते-पड़ते पास होने वाला लड़का मराठी साहित्य में एडमिशन लेता है फिर अहमदनगर से जन-संचार में पढाई करता है. यहीं उसके जीवन में ‘पिसतुलिया’ आती है. जिन्दगी के बाकी जटिल प्रसंगों को आप समझ ही सकते हैं. गौर करियेगा मैंने दलित जाति का होने के नाते युवा मंजुले को हुए अनुभवों पर बहुत चर्चा नहीं की है.

(शादी कम उम्र में हो गयी थी. पत्नी से बनी नहीं. 2013 में उनका अदालत से तलाक हुआ. यहाँ उनकी पत्नी की कथा बहुत महत्वपूर्ण हो जाती है. उन्होंने नागराज पर उत्पीड़न के आरोप लगाये हैं. सामान्य भारतीय महिला पर ‘घर और रिश्ते’ की चारदीवारी में होने वाले खुले/छुपे शोषण को देखते हुए स्वभावतः मंजुले की पूर्वपत्नी से हमारी एकजुटता बनती है. व्यक्तिगत स्तर पर इस तरह के अनुभव के जिम्मेदार मंजुले इस फांक को अपनी कला में कैसे साधते हैं - यह प्रश्न हमेशा बना रहेगा और बनी रहेगी इस प्रश्न पर उनकी सार्वजनिक जवाबदेही!)



जिन्दगी के गद्य और पद्य को दर्ज करती फिल्म
सिनेमा बनाने वालों के संसार से बाहर की एकदम जुदा दुनिया से आये मंजुले के पास अपनी दृष्टि है. वे सिनेमा की भाषा समझते हैं और साथ ही समझते हैं अपने दर्शकों को और उनके जटिल जीवन को – जो ‘दुःख ही जीवन की कथा रही’ से बाहर भी जाना चाहता है. याद कीजिये फंड्री के जब्या को रंगीन जींस, चमकदार शर्ट और फैशनेबल चश्मे के सपने देखते हुए. कई बार यह सपना भी अपराध ठहरा दिया है. बरबस मुझे याद आ जाती हैं वो घटनाएं जहाँ लुधियाना, जालंधर या भिमंडी से जांगरतोड़ नौकरी से कमाकर गाँव को लौटे दलित नौजवानों के फ़िल्मी बाल रखने या चाइनीज मोबाइल पर तेज गाना सुनने या नयी साइकिल खरीदने पर ही सर्वणों द्वारा मार पिटाई की गयी है. मंजुले वहीं से आते हैं. झिंगात के जोशीले और ‘उपद्रवी’ संगीत से परेशान महानुभावों को उसी वक़्त घर के पिछवाड़े में केले के खेतों में फ़ैल रहा सन्नाटा और चीखें क्यों नहीं सुनाई देती हैं?  

मंजुले की पिछली फिल्म फंड्री में एक अत्यंत गरीब, दलित परिवार का दुबला-पतला गहरे रंग का किशोर जब्या अपनी एक सहपाठी को बहुत पसंद करता है. वह उसे अपनी ओर आकर्षित करने की तरकीबें सोचता/करता रहता है. उसके सामने अच्छे कपड़ों में आना चाहता है और अपनी पारिवारिक पृष्ठभूमि उससे छुपाता रहता है. फिल्म कभी नहीं बताती कि जब्या की चाहत का क्या हुआ. क्या होता अगर वह लडकी भी जब्या को पसंद करती? क्या होता अगर जब्या गोरा होता और लडकी थोडा दबे रंग की होती? क्या होता अगर जब्या के सपनों की जादुई चिड़िया सचमुच उसकी चाहत को उसके करीब ला देती? इन प्रश्नों के जवाब के लिए आप सैराट देख सकते हैं. कुछ लोग सैराट को उनकी पिछली फिल्म फंड्री (सुअर) का सिक्वेल कह रहे हैं जिसका काला-कलूटा दलित किशोर जब्या/जामवंत सैराट में आकर प्रशांत/पर्श्या हो जाता है.


सैराट : एक विलक्षण सिनेमैटिक सबवर्जन
सैराट मुख्यधारा के सिनेमा के रास्तों और तिकड़मों का इस्तेमाल करती हुई इस समाज का एक और सच हमारे सामने रखती है. मंजुले की ताकत यह है कि वे सिनेमा के ‘इडियम’ और ‘लोकप्रिय’ होने की अहमियत जानते हैं. उनकी विलक्षणता इस बात में है कि वे मुख्यधारा के सिनेमा के तरीकों/छवियों का इस्तेमाल करते तो हैं पर कहानी अपनी कहते हैं. एक ऐसे वक़्त में जब सामाजिक अस्मिताएं ज्यादा से ज्यादा संकीर्ण और कठोर हो रही हैं, सैराट का सफलतम मराठी फिल्म हो जाना आशा की किरण जैसा है. दूसरी तरह से कहा जाय तो सैराट ‘सिनेमैटिक सबवर्जन’ का एक मॉडल है. दिलचस्प है कि फिल्म जितनी रोचक है उतनी ही हमारे समाज की सच्चाईयों को उजागर करने में सक्षम. ‘बम्बईया सिनेमा’ अगर हमारे आस-पास बिखरे सच को नष्ट या ओझल करता है तो मंजुले की सैराट ‘बम्बईया सिनेमा’ के सच को नष्ट कर एक नए सिनेमा की रचना करती है- सफल बने रहने की जिद पर कायम रहते हुए.

सैराट उन चुनिन्दा फिल्मों में से है जब हम कमोबेश खुद को ही सिनेमा में देख लेते हैं. हाँ, इस फिल्म के कर्णप्रिय, मादक और उत्सवी संगीत की कल्पना करने के लिए अजय-अतुल और मंजुले बधाई के पात्र हैं. इस पर अलग से लिखे जाने की जरूरत है कि कैसे देशज धुनों, पदों, और रूपकों के प्रयोग और संगीत के आधुनिकतम यंत्रों व तकनीकों की इस सिम्फनी ने फिलहाल पूरे महाराष्ट्र को झुमाकर रख दिया है.


मंजुले ने साबित कर दिया कि जाति, लिंग, विकलांगता और उत्पीड़न के विषय सिर्फ डॉकूमेंट्रीज के लिए ही नहीं हैं. कल्पना कीजिये कि आप एक ऐसी फिल्म देख रहे हैं जहाँ आप मनमोहन देसाई, माजिद मजीदी, आदित्य चोपड़ा, करन जौहर, अडूर गोपालकृष्णन और आनंद पटवर्धन को एक साथ देख लेते हैं. सैराट आपको गुदगुदाती, हंसाती और रुलाती है और कभी तो आपका दिल सीट से उछल जाने को करता है. रेडिफडॉटकॉम पर ज्योति पुनवानी अपने लेख में तीन मराठी परिवारों का जिक्र करती हैं जिन्होंने सैराट देखने के बाद विजातीय-विवाह के चलते घर से बहिस्कृत अपने बच्चों को वापस अपनाया.   


स्कूल, कविता, प्यार और दोस्ती – सिनेमा की नई दुनिया
मंजुले की विशेषता यह भी है वे सिनेमा की दुनिया से बाहर निकाल दिए गए दृश्यों और रूपकों को पुनर्स्थापित करते हैं. कमोबेश उनकी हर फिल्म में स्कूल का केन्द्रीय महत्व है. यही वह जगह है जहाँ दोस्तियाँ परवान चढ़ती हैं, चाहत नए नए रंगों में सामने आती है, जीवन में पहली बार कविता आती है और दुनिया अपने रहस्य खोलती है. मंजुले की फिल्मों के स्कूल में मध्यकालीन निर्गुण कवि चोखामेला (फंड्री) या दलित कविता के हस्ताक्षर नामदेव ढासाल की कविताएँ (सैराट) सहज रूप से चली आती हैं. वे बताते हैं कि कितना भी जटिल हो जीवन कविता साथ देती है. उनकी दोनों फिल्मों के युवा नायक कविता लिखते हैं. 

आजकल का ‘बम्बईया सिनेमा’ दोस्ती के नाम पर दो प्रतिस्पर्धी चरिर्त्रों का निर्माण करता है जो औरत या ताकत के लिए एक दूसरे से जोर आजमाइश करते रहते हैं, पर हम जानते हैं कि जीवन दोस्तियों का ही दूसरा नाम है. खासकर किशोरावस्था की दोस्तियाँ बगैर छल-कपट के सच्चे मानवीय और सरल मूल्यों का निर्माण करती हैं. सैराट को उसके मामूली लोगों की बेपनाह दोस्तियों के लिए भी याद किया जाएगा. सैराट आपको अपने बचपन और किशोरावस्था में लेकर जाती हैं, यह आपके मन की सबसे नरम जगह छू लेती है और आप छपाक से प्यार की बावड़ी में बावले से कूद जाते हैं.


टकसाली छवियों को तोडता सिनेमा  
सैराट भारत के ग्रामीण परिवेश में कई धरातलों पर हो रहे बदलावों को पकड़ती है. मंजुले यह दिखाने से नहीं चूकते कि जमाना कुछ न कुछ बदला है और उनकी फिल्मों के दलित चरित्र पाटिल (ऊँची जाति) की बावड़ी में जमकर नहाते हैं. ‘पर्श्या’ किसी से दबता नहीं है, उसकी कविताएँ कॉलेज के नोटिसबोर्ड पर लगती हैं और वह क्लास में सबसे ज्यादा नंबर लाने वालों छात्रों में गिना जाता है. जब पूरी तरह से सजा-धजा पर्श्या अपने दोस्त को घड़ी और पर्स थमा बावड़ी में कूदने के बाद आर्ची की फटकार पर निकल रहा होता है तब आप कैमरे के मूवमेंट पर गौर कीजिये. कैसे पर्श्या निचली सीढ़ी से ऊपर आता है. एक क्षण के लिए वह टशन में खड़ी आर्ची पर भारी पड़ जाता है.

चाहे क्रिकेट की कमेंट्री हो या पुरस्कार वितरण में मुख्य अथिति के रूप में विराजमान एक भगवा साधु हो, स्कूटी चलाती आर्ची के पीछे बच्चे को लेकर बैठा पर्श्या हो या सड़क किनारे भगवा झंडा लिए कार्यकर्ता युवा ‘प्रेमियों/जिहादियों’ की पिटाई कर रहे हों- मंजुले की नजर से कुछ छूटता नहीं है. कुछेक मौकों पर लगता है कि फिल्म खिंच रही है पर तुरंत समझ में आ जाता है कि ऐसा संपादन की समस्या के चलते नहीं हो रहा है. जीवन की सांसारिकता का आख्यान रचने के लिए ‘डिटेलिंग’ में जाना ही पड़ता है.  


सैराट की कहानी         
सैराट निचली जाति के पर्श्या और एक सवर्ण जमींदार की बेटी आर्ची के प्यार की कहानी है. जाहिर है यह प्यार किसी को बर्दाश्त नहीं. इस जोड़े को जमींदार परिवार की हिंसा का सामना करना पड़ता है. जान बचाने के लिए वे दूसरे शहर भागते हैं. जहाँ उन्हें एक अप्रत्याशित और नेक मदद मिलती है. शक-शुबहे के भीतर तक चीर देने वाले एक दौर के बाद अपने प्रेम की पुनर्खोज कर वे शादी कर लेते हैं और अब उन्हें एक बच्चा भी है. लगता है कि ‘हैप्पी इंडिंग’ होने वाली है कि अचानक सालों बाद आर्ची का परिवार उन्हें खोजकर ख़त्म कर देता है. पर उनका बच्चा बच जाता है क्योंकि नरसंहार के समय एक पड़ोसी महिला उसे घुमाने ले गयी होती है. फिल्म के अंत में लहू में डूबे अपने मां-बाप के मृत शरीरों के आतंक में वह बच्चा रोते हुए बाहर की तरफ भागता है. सीमेंट की फर्श पर बच्चे के खून सने पैरों के निशान छूटते जाते हैं. एक लहूलुहान भविष्य की ओर इशारा करते हुए.


सिनेमा का क्राफ्ट
सैराट के माध्यम से मंजुले ने यह साबित कर दिया है कि वे ‘सिनेमा के क्राफ्ट’ के अनोखे कीमियागर हैं. ख़ास बात यह है कि विराट बिम्बों की रचना करते वक़्त बारीक और उपेक्षित सच्चाइयाँ उनकी नजर से फिसल नहीं जातीं. फिल्म का पहला हिस्सा संगीत और रंगों से भरा हुआ है और दूसरे हिस्से में यह कम होने लगता है. फिल्म के अंतिम भाग में सारे कृत्रिम उपादान धुंधले और हलके होते जाते हैं. कोई संगीत नहीं, कोई बड़ा दृश्य नहीं. अंत में सब कुछ हट जाता है, बचता है सिर्फ सन्नाटा, बच्चे का दारुण रूदन और हमारे इर्द-गिर्द का कोरस. गहरी संवेदनशीलता, ‘पोएटिक इनसाइट’ और असाधारण ‘डिटेलिंग’ से बुनी मंजुले की शैली विराट से सूक्ष्म की तरफ जाने की है. दर्शक को थोडा-थोडा अंदाजा रहता है कि फिल्म कहाँ ख़त्म होगी, पर फिल्म का अंत उसके लिए एक ‘शॉक’ की तरह आता है. एक मंटोई पटाक्षेप! जहाँ आपके अंतर्मन में कांच की कोई चादर टूट जाती है...

सैराट में (फंड्री की तरह) पेशेवर कलाकार न के बराबर हैं. इन सबमें 15 साल की रिंकू राजगुरु द्वारा अभिनीत आर्ची का किरदार सबसे अहम है. सैराट की आर्ची एक दबंग जमींदार और राजनेता की बेटी और उभरते हुए दभंग भाई की बहन है. मुखर और हर मौके पर हावी रहने वाली आर्ची प्यार में पड़ने के बाद सामन्ती ठसक त्याग देती है. वह अपने प्यार की रक्षा में गोली चलाती है, थानेदार से भिड़ जाती है और ट्रैक्टर चलाकर भरी दोपहर में परश्या के घर पहुँच जाती है. साफ़तौर से असहज दिख रही पर्श्या की मां से वह पीने के लिए पानी (!) मांगती है और बाजार में सबके सामने उसका पैर छूती है. ऐश्वर्य और सामन्ती माहौल में पली-बढ़ी आर्ची, निचली जाति के गरीब लड़के के प्यार में पड़ी आर्ची, एक अजनबी शहर की झुग्गी-झोपड़ी में गटर के ऊपर बने अपने टीन के कमरे और बिना दरवाजे वाले बाथरूम से गुजरते हुए बॉटलिंग प्लांट में मजदूर की नौकरी तक कैसे बदलती है, सीखती है, मंजुले ने इसे रिंकू राजगुरु के कलाकार से निकलवाने में सफलता पायी है.             
जाहिर है सिनेमा की राजनीति होती है पर सिनेमा का काम राजनीति करना भर नहीं है. सारी कलाओं में क्रांतिकारियों के लिए सिनेमा को सबसे महत्वपूर्ण विधा, लेनिन यूँ ही नहीं मानते थे. जो हो, सिनेमा के रंगमंच पर जीवन के नायक आ पहुंचे हैं.


सैराट के सन्दर्भ में उठी चिंताएं
यह विडम्बना ही कही जायेगी कि हमारे देश में सबसे ज्यादा ‘मॉस’ की चिंता करने वाले लोग सिनेमा ‘क्लास’ का चाहते हैं. सबसे पहले शीर्षक का ही मसला लें. अर्थ का अनर्थ करने के साथ-साथ विष्णु खरे जी उसमें एक और प्रश्न चेंप देते हैं कि सफल फिल्मों के शीर्षक अन्य भाषाओँ में कैसे जज्ब हो जाते हैं. बड़े उदाहरणों में न जाते हुए, रोजा, बॉम्बे, रावण, किक, गजनी, दृश्यम जैसे शीर्षकों को हिन्दी में किस नाम से अनुवादित किया जाता? बाकी थुप्पाकी (तमिल) हिन्दी में ‘हॉलिडे’, पोक्करी (तमिल) हिन्दी में ‘वांटेड’, विक्रमारकुडू (तेलगू) हिन्दी में ‘राऊडी राठोड़’, और कावलन (तमिल) हिन्दी में बॉडीगार्ड कैसे हो जाती है? 
जयंत पवार साहब एक तरफ कहते हैं फिल्म का ‘बेहद अस्त-व्यस्त अरेंजमेंट और सटीकता का अभाव’ इसकी कलात्मकता के आड़े आता है तो दूसरी तरफ इसके सहज संवाद और बहुजनी अंदाज की प्रशंसा करते हुए फिल्म की ‘चिंतित’ कर देने वाली लम्बाई पर दर्शकों द्वारा ‘विजय’ प्राप्त कर फिल्म देखने को उपलब्धि मानते हैं. मैं असमंजस में पड़ जाता हूँ कि ऐसा कर दर्शक अहसान कर रहे थे या किसी फरमान का पालन कर रहे थे? कहीं ऐसा तो नहीं कि फिल्म उनका मनोरंजन कर रही थी साथ ही बहुविध स्तरों पर उनका उन्हीं से सात्क्षातकार भी करा रही थी?


यथार्थवाद और सैराट
दरअसल यहीं से फिल्म की यथार्थपरकता और कलात्मकता के सूत्र मिलते हैं. आरबी तायडे जिन्हें सैराट जैसी ‘व्यवसायिक’ और गैर-यथार्थवादी फिल्म बहुत ‘निराश’ करती है, का कहना है कि सैराट की कहानी में कुछ नया नहीं है. न ही ऑनर किल्लिंग रोज की सच्चाई है न गाँव वैसे बचे हैं जैसा दिखाया गया है! साथ ही वे फिल्म में आये चिड़ियों के समूह के फिल्मांकन की ‘वैधता’ पर भी सवाल उठाते हैं! देशी आलोचक को शक होता है कि भला ऐसा विस्मयकारी दृश्य देशी फिल्मकार फिल्मा कैसे सकते हैं? अंत में अपनी निर्देशकीय प्रतिभा का प्रदर्शन करते हुए सुझाव देते हैं कि सैराट की शुरुआत उसके ‘अंतिम दृश्य’ से होनी चाहिए थी!

उनसे पूछा जाना चाहिए कि यथार्थवादी फिल्म से वह क्या समझते हैं? किस फिल्म को वे यह दर्जा देंगे? ‘अंकुर, अजांत्रिक, सतह से उठता आदमी’ को या किसे? 9 जून 2016 के लेख में महाराष्ट्र की मशहूर वकील फ्लेविया एग्नेस सिलसिलेवार ढंग से आंकड़ों के साथ महाराष्ट्र में अंतर्जातीय विवाह के खिलाफ हुई हिंसाओं का ब्यौरा देती हैं. कहीं तायडे साहब यह तो नहीं सोचते हैं कि फिल्म उसी विषय पर बननी चाहिए जो लगभग महामारी बन चुका हो!

असल में सैराट एक नए तरह का सिनेमा है जो जीवन की क्रूर, निर्मल और गझिन सच्चाइयों से बना है. साथ ही इसे बनाने वाले को भारतीय सिनेमा के बीते सौ सालों में बोये गए बीजों की भी पहचान है. वह उनकी तिकड़में, ताकत और कमजोरियां जानता है. वह यह भी मानता है कि उसे इनके बीच से भी गुजरकर जाना है. यह आने वाला भविष्य बताएगा कि उसकी यह यात्रा कहाँ पहुँचती है. जैसा कि जयंत पवार लिखते भी हैं ‘अब यहाँ से आगे बहुजन संवेदना वाली कृतियों के समक्ष ज़िम्मेदारी बढ़ गई है’. जाति के नीचे जाति और पितृसत्ता हर जगह है. संवेदनशील और सजग रचनाकार को इससे टकराना होगा. यहाँ मंजुले को सारे अंतर्विरोधों से ऊपर रखने की न कोई चाह है न मूर्ति गढ़ने का प्रयास. अंतर्विरोधों से अछूती न उनकी कला हो सकती, न राजनीति या जीवन. पर यकीन मानिए प्रेम-कहानियों का अनोखा दास्तानगो मंच पर आ चुका है.   



सैराट की त्रासद नियति
विष्णु खरे मानते हैं कि फिल्म में आयी ‘घटनाएं मनमानी उबाऊ नियमितता से लौटती आती हैं’ और ‘विडम्बनावश, एक कलाकृति के रूप में ‘सैराट’ अब खुद उनमें शामिल हो गयी है’. यानि सैराट का आना ‘कस्बाई दैनिको’ में छपने वाली ‘हत्यारी मानसिकताओं’ की ख़बरों के आने जैसा ही है! इसे वह कृति की ‘त्रासद नियति’ मानकर छोड़ देते हैं. अगर सैराट इस ‘त्रासद नियति’ को अभिशप्त है तो ‘ज्ञानी’ कवियों की कविताओं की क्या नियति है? मैं समझना चाहता हूँ कि ‘सैराट को क्या होना चाहिए था जिससे वह ‘उबाऊ नियमितता’ न बन जाती. साथ ही यह उलझन भी है कि यह कैसी ‘उबाऊ नियमितता’ है जिसने कमोबेश एक बहस को ही जन्म दे दिया है! सिर्फ समालोचन में नहीं बल्कि महाराष्ट्र के जीवन में भी. वो कौन लोग हैं जो ‘सैराट मैरिज ग्रुप’ बनाकर घर से भागे/निकाले प्रेमी जोड़ों की मदद कर रहे हैं. या बॉम्बे के वे सब्जी वाले (जैसा कि मयंक सक्सेना कहते हैं) या ऑटो और बूट पॉलिश वाले (जैसा बॉम्बे में रिजर्व बैंक के अफसर हमारे मित्र आदित्य त्रिपाठी कहते हैं) कौन हैं जो लोगों को सैराट देखने के लिए कह रहे हैं!

माफ़ कीजियेगा यह वही ‘लुम्पेन दर्शक-वर्ग’ है जो ‘सल्मानादिक की फिल्में हिट कर डालता है’. यह वर्ग ‘आपकी’ फिल्में देखने नहीं आता. भले ‘आपकी फिल्में’ उसके नाम पर बनी हों, उसे समझ में नहीं आतीं. हिंदुस्तान के ‘प्रगतिशीलों’ को सैराट और मंजुले का इस बात के लिए भी शुक्रिया अदा करना चाहिए कि उसने इस ‘लुम्पेन दर्शक-वर्ग’ को ‘सल्मानादिक’ की दुनिया के बाहर खींचा. अब फिल्म से यह मांग मत कीजिये कि वह जीवन भर के लिए उनकी सोच बदल दे. इन सुधी समीक्षक को पढ़कर मुझे ब्रेख्त की ‘अपने लिए नयी जनता चुन लो’ वाली कविता याद आ जाती है.

विष्णु खरे जाने किस आधार (?) पर यह भी कह डालते हैं कि ‘विजातीय-विवाह’ के मामलों में मराठी संस्कृति ‘अन्यों की तुलना में’ कम असहिष्णु है. होने को तो महाराष्ट्र में अम्बेडकर का भी एक ब्राह्मणी से निरापद ब्याह हुआ था पर National Crime Record Bureau के आकंडे तो कुछ और कहते हैं. यद्यपि NCRB विजातीय-विवाह के पदबंध से कोई अलग आंकड़ा तो नहीं रखता पर उसकी 2014 और 2015 की रिपोर्ट साफ़ कहती है कि जातीय हिंसा/उत्पीड़न के मामलों में तमिलनाडु और उत्तर प्रदेश के बाद महाराष्ट्र अव्वल है. बात यहाँ इस या उस राज्य को अच्छा-बुरा दिखाने की नहीं है पर स्पष्ट है कि जिस समाज में जातीय उत्पीड़न/हिंसा की सच्चाई कुछ और हो वह विजातीय विवाह को लेकर भी बहुत नरम नहीं होगा. दरअसल दिक्कत तब आती है जब आलोचक लोग समाजशास्त्रीय अवधारणाओं और तथ्यों को दरकिनार कर सबकुछ कविता की शैली में लिखने लगते हैं.

फिल्म की बाजार में सफलता से चिंतित कमोबेश यही बात फिल्मकार रामनी आरवी कहते हैं कि सैराट आन्दोलन की चिंताओं को व्यवसायिक तरीके से बेचती है. देश-विदेश की विभिन्न संस्थाओं से ग्रांट लेते, फेस्टिवलों में अपनी फिल्मों को भेजने का भरदम जुगाड़ करते और एक अंगरेजीदा छोटे से समूह के लिए फिल्में बनाते इन ‘डिफरेंट’ या क्रांतिकारी फिल्मकारों के बारे में क्या कुछ कहने की जरूरत है? बात यहाँ किसी को ऊँचा या नीचा दिखाने की नहीं है पर आन्दोलन के मुद्दे सैराट या फंड्री की तरह क्यों नहीं दिखाए जा सकते? सब आपकी तरह, आपके प्रतिमानों पर फिल्म क्यों बनाएं?

  

सिनेमा की सतही विवेचना
हैरानी इस बात पर भी होती है कि विष्णु खरे को पहला एक घंटा ‘टपोरी’ और self-indulgent क्यों लगता है? क्यों उनके नजरिये में वह कुछ भी स्थापित नहीं करता? मैं कल्पना कर रहा हूँ कि कैसे बनती फिल्म अगर पहले एक घंटे से बना ‘स्पेस’ निर्मित नहीं होता? क्या होता अगर पर्श्या का छुप-छुप कर आर्ची को देखना नहीं होता, कुएं में कूदना नहीं होता, सलीम का मोबाईल और प्रदीप (लंगड़ा) की तरफ फेंके गए ‘कटे नाखून’ नहीं होते, विकलांग अधेड़ की अनसुनी नमस्कार नहीं होती, चिट्ठीयों का लौटना नहीं होता, आर्ची की बुलेट, ट्रैक्टर और पर्श्या के घर पानी पीना नहीं होता, ढ़ासाल नहीं होते, प्रिंस की थप्पड़ नहीं होती!?

यह कौन सी विवेचना है जो फिल्म की सफलता से आतंकित होकर दर्शक की ‘सवर्णवाद से आजीवन शत्रुता’ का शर्तनुमा प्रतिमान खड़ा करती है? आलोचक को यह पूछने के लिए मजबूर क्यों होना पड़ता है कि ‘क्या वाकई ‘सैराट’ कोई जातीय, सामाजिक या राजनीतिक प्रश्न उठाती है? ऐसा क्या अपने आपको पाठकों के समक्ष ज्यादा ‘क्रिटिकल’ दिखाने के लिए किया जा रहा है या इसमें आलोचक का भ्रम भी शामिल है?

इसी बिंदु पर विष्णु खरे द्वारा सैराट के हिन्दी अर्थ का अनर्थ करने के भी सूत्र मिलते हैं. क्या यह फिल्म एक ‘सफल’ खूनी पलायन है? विष्णु खरे के लेख की हेडिंग में फिल्म की सफलता पर लगाये गए प्रश्नचिन्ह देखिये! इतनी शिद्दत और बारीकी से बनाई गयी इस फिल्म को देखने के बाद आप क्या ‘पलायन’ की मानसिकता से ग्रस्त हो जाते हैं या गुस्से की भावना से? या कसमसाते अवसाद सा कुछ आपको घेर लेता है? क्या उसमें दर्शक की मुक्ति नहीं होती? हैदराबाद की उस मजदूर बस्ती में देश के अलग-अलग हिस्सों से आये हिन्दी बोलते इन युवा महिला मजदूरों में आपको सिर्फ पलायन दीखता है, जीवन और जिजीविषा नहीं!    



दर्शन-रति, कामुकता और त्रासदी
अगर दो किशोरों के प्रेम, देखा-देखी और संकोची छुअन से आप सरस हो जाते हैं, आपको अपना कुछ याद आ जाता है या वैसे सिर्फ दृश्य की कल्पना करके आप रोमांचित हो जाते हैं तो क्या आप ‘दर्शन-रति’ और ‘कामुकता’ का मजा ले रहे हैं? यदि ऐसा है तो उसमें बुरा क्या है? और फिर बर्तोलुची, अंतोनियोनी या आर्थर रिम्बा की फिल्मों में क्या आप भाई-बहन का रक्षा-बंधन टाइप प्यार देखने जाते हैं? ‘सरोज.स्मृति’ में अपनी बेटी सरोज की शारीरिक सुन्दरता का वर्णन करने वाले निराला क्या कामुकता के शिकार हैं? और शमशेर? और नेरुदा? ऐसे हजारों उदहारण! क्या मादक ऐंद्रिकता और गझिन कामुकता चुने हुए ‘कल्चर्ड’ और साहित्यिक लोगों को ही समझ आयेगी, ‘लुम्पेन दर्शक-वर्ग’ को नहीं? और अगर नहीं आती तो उसका जिम्मेदार कौन?    

जहाँ तक ‘त्रासदी को हल’ बनाकर पेश किये जाने की बात है क्या सचमुच फिल्म ऐसा करती है? मुझे नहीं लगता. मित्रों और बहुतेरे अनजान लोगों की जो प्रतिक्रियाएं आयी हैं उनसे तो यही पता चल रहा है कि लोग किसी जोड़े का ऐसा अंत नहीं चाहते और कहीं-कहीं तो ऐसा न होने देने के लिए वे ठोस प्रयास भी शुरू कर चुके हैं. दूसरी बात, क्या त्रासदियों में मनोरंजन के तत्व नहीं होंगे? हम गोदान जैसा त्रासद उपन्यास बार-बार क्यों पढ़ना चाहते हैं? उत्तर भारत में कोई दुखद घटना होने पर ग्रामीण महिलाएं अक्सर गा-गाकर क्यों रोती हैं? क्या उन पर ‘लिरिकल’ होने का आरोप लगाया जाय?

त्रासदियाँ सिर्फ वे नहीं होती जिन्हें हम आप जानते हैं, न ही त्रासदियों को लेकर लोगों का रिस्पांस वही होता है जो हम आप चाहते हैं. जाहिर है दूर बैठकर सांस्कृतिक-समीक्षा करने वाले विपदा के मारों का करीब से किया गया अनुभव समझ नहीं पाते.

मराठी मानुष में फुले-अम्बेडकर की रवायत ज्यादा गहरी है, भले ही उसका मौजूदा राजनीतिक अवसरवाद उसे मिटाने में लगा हो. सैराट की सफलता कोई ‘विडंबनात्मक उभार’ नहीं वरन फुले-अम्बेडकर की रवायत का एक गजब रचनात्मक, सहज और मार्मिक प्रयोग है. समझने में दिक्कत होती है कि वह कौन सी शारीरिक या सांस्कृतिक बनावट है जहाँ कोई चीज गले से उतरने के बाद, (उल्टा) दिमाग की ओर चली जाती है? यही कहा जा सकता है कि जनाब गले से उतरकर उसे दिल में जाने दीजिये.

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पुनश्च : मेरे मित्र सत्य शिवरामन बैंगलोर की तमिल दलितों की बस्ती में मृत्यु होने पर गाने वाले ‘मर्डर आर्केष्ट्रा’ का जिक्र करते हैं और मुझे याद आ जाती है ‘गैंग्स ऑफ़ वासेपुर’ जहाँ सरदार खान के जनाजे पर गायक (यशपाल) पूरे ताम-झाम के साथ ‘तेरी मेहरबानियाँ’ गा रहे हैं. कर्णाटक की कुछेक दलित जातियों में मृत्यु का जुलूस गाजे-बाजे और नृत्य के साथ निकालता है और ‘थलईकुट्टू’ तमिल गरीबों में प्रचलित एक परंपरा है जहाँ मजबूर गरीब परिवार अपने अति-वृद्ध सदस्य को गाँव की सीमा पर किसी पेड़ के नीचे तेल से नहलाकर समाधि (मृत्यु) के लिए छोड़ देता है! भारतीय जीवन परत दर परत बहुत उलझा हुआ है. यह गहरे, अनासक्त और निष्पक्ष निरीक्षण की मांग करता है. कला-साहित्य हो या राजनीति, ‘आत्मरति के किलों’ में बैठे हमारे ‘डॉन क्विकजोटों’ को उतरकर नीचे आना ही होगा.   
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संदीप सिंह
लेखक और सामाजिक कार्यकर्ता हैं
एम. ए. (हिंदी), एम. फिल./ पीएच. डी. (दर्शन शास्त्र).
जेएनयू  छात्रसंघ के अध्यक्ष  और छात्र संगठन आइसा के राष्ट्रीय अध्यक्ष रह चुके हैं.
sandeep.gullak@gmail.com
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मराठी फ़िल्म सैराट की विष्णु खरे की विवेचना से आरम्भ इस वाद-विवाद- संवाद में अब तक आपने आर. बी. तायडे(इंग्लिश), कैलाश वानखेड़े,जयंत पवार (मराठी), भारत भूषणतिवारी (अनुवाद), मयंक सक्सेनाटीकम शेखावत,सारंग उपाध्याय और संदीप सिंह के आलेख पढ़े. अब रंग आलोचक सत्यदेव त्रिपाठी का यह आलेख खास आपके लिए.