विष्णु खरे : भारतीय मानव-मूल्यों के आभूषण

Posted by arun dev on अप्रैल 10, 2016










हिंदी सिनेमा में अभिनेता भारत भूषण की अदाकारी की बारीकियों पर यह आलेख सहेज लेने लायक है खासकर ऐसे में जब हम गुजरे जमाने में दिलीप कुमार तक ठिठक कर रुक गए हैं. भारत भूषण के जीवन संघर्ष और उनके रचनात्मक अवदान को  पारखी दृष्टि से देखते हुए विष्णु खरे ने अपने ख़ास अंदाज़ में इसे यहाँ उद्घाटित  किया  है.



भारतीय मानव-मूल्यों के आभूषण                             
विष्णु खरे 


ह ठीक है कि शुरूआत में आख़िरकार एक अभिनेता अपने किरदारों को लिखनेवाले और उसे निदेशित करनेवाले की निर्मिति ही होता है लेकिन यकबारगी जब उसकी काबिलियतें पहचान ली जाती हैं तो वह अदाकार भी बिना कहे लेखकों से अपने लिए खुद को  लिखवाने और अपने डायरेक्टरों के ज़रिये ख़ुद को डायरेक्ट करने लगता है. तब हम कह सकते हैं वह  एक स्वायत्त व्यक्तित्व बन जाता है और उसे फिल्म के कई तत्वों का सीधा श्रेय दिया जा सकता है – यहाँ तक कि गीत-संगीत सहित उसे लगभग पूर्णतः नियंत्रित करने का भी –लेकिन हम यहाँ इस बहस में न पड़ें कि यह सिनेमा की सेहत के लिए मुफ़ीद होता है या नहीं.  हम यही कहेंगे कि फिर एक अभिनेता का फ़र्ज़ हो जाता है कि वह अपने लाखों दर्शकों को सिनेमा-हॉल से उठने के बाद बेहतर और अधिक सुसंस्कृत इंसान छोड़े. और यह एक स्वाभाविक, मानवीय अभिनय-कला  और फिल्म के माध्यम से हो जिनमें जबरन और नक़ली-सतही सबक़ और उपदेश न दिए गए हों.

दिलीप कुमार, अशोक कुमार, मोतीलाल, बलराज साहनी, संजीव कुमार, अमिताभ बच्चन, नज़ीर हुसैन, गुरुदत्त, रहमान– शायद राज कपूर - उन मुट्ठी-भर अदाकारों में हैं जिन्हें ऐसा दैवीय वरदान मिला. इन सब ने स्थायी-अस्थायी तौर पर करोड़ों दक्षिण-एशियाई दर्शकों को ‘’मनुष्यतर’’ बनाया. फ़िल्में इन्हीं को ज़ेहन में रख कर बनाई गईं. इनका किसी फिल्म में होना किन्हीं इंसानी क़दरों की गारंटी होता था. (बदक़िस्मती से यहाँ इतनी ही महान अभिनेत्रियों की ऐसी ही उपलब्धियों की बात करने का मौक़ा नहीं है. उन्होंने कितनी करोड़ किन महिला दर्शकों को क्या-क्या सहारे दिए हैं इसके आकलन की तो अभी शुरूआत ही नहीं हुई है. और अब तो 1920-30 के बीच की वह हमारे घरों की मेरी उम्र के हिसाब से माँ-चाचियाँ-बुआएँ भी कम बची हैं जो हमें अपनी-अपनी पहली कहानियाँ बयान कर सकतीं.)

भारत भूषण (14 जुलाई 1920– 27 जनवरी 1992) मेरठ के एक संभ्रांत और सुसंस्कृत परिवार से थे, घर में कलाओं और साहित्य को लेकर वातावरण था और सिनेमा में उनकी रुचि उन्हें शायद अपने बड़े भाई साहब से मिली जिनका स्टूडियो लखनऊ में था. भारत भूषण तालीम के लिए अलीगढ़ भी गए यानी वह शुरूआत से ही यू.पी.की हिंदी-उर्दू,हिन्दू-मुस्लिम गंगा-जमनी तहज़ीब में भीगे हुए थे. दो साल छोटे दिलीपकुमार की पहली फिल्म ‘ज्वार भाटा’ 1944 में आती है जबकि भारत भूषण की पहली फ़िल्म 1941 की भगवतीचरण वर्मा – केदार शर्मा की ‘चित्रलेखा’ थी जो अपने-आप में उस युग का एक विवादास्पद सांस्कृतिक-कलात्मक वक्तव्य थी, भले ही उसमें भारत भूषण की कोई प्रमुख भूमिका न थी. उसके बाद उनकी दो फ़िल्में थीं ‘भक्त कबीर’ (जिसे मैंने बहुत बचपन में देखा है) और ‘भाईचारा’ और यह कहने का मन होता है कि इन तीनों ने भारत भूषण का प्रमुख अभिनय-मार्ग– दार्शनिक-‘प्राचीन’ युग, मध्यकालीन संत-सेकुलर संस्कृति, आधुनिक संयुक्त परिवार काल - निश्चित कर दिया. लेकिन उन्हें बतौर नायक पहली अखिल-भारतीय सफलता मिली अपने गुरु केदार शर्मा की ही सुपर-हिट ‘सुहाग रात(1948) से, जब दिलीप कुमार की ‘शहीद’, ’अंदाज़’ और ‘शबनम’ भी आसपास थीं.
यदि भारत भूषण की अभिनय-शैली का मुझे कोई नाम देना पड़े तो मैं उसे ‘’सौम्य’’, ’’हलीम’’ या ‘’सलीम’’ कहना चाहूँगा. हिंदी और उर्दू ज़ुबानों और उच्चारणों पर उनका स्वाभाविक लेकिन असाधारण स्पष्ट अधिकार था. उनसे अपनी किसी फिल्म में दोनों भाषाओँ की कोई ग़लती नहीं हुई. उनकी शक्ल-ओ-सूरत ‘’मैचो’’ नहीं थी लेकिन वह एक नैतिक ‘टफ़नेस’ भी निभा सकते थे. उनकी आवाज़ में अद्वितीय कोमलता, तहज़ीब, करुणा, सांगीतिकता और मानवीयता थीं. वह खलनायक-नुमा कोई लम्बा रोल कर नहीं सकते थे. इसके बावजूद उनके किरदारों का वैविध्य देखकर आश्चर्य होता है.

(ग़ालिब की भूमिका में)
‘राम दर्शन’, ’किसी की याद’, ’जन्माष्टमी’,’भाई बहन’,’माँ’ (बिमल राय की एक बेहतरीन मार्मिक पारिवारिक किन्तु विस्मृत फ़िल्म), ’आनंदमठ’ (‘वन्देमातरम’, ’जय जगदीश हरे’),’शुक रम्भा’,’दाना पानी’, श्री चैतन्य महाप्रभु’ आदि शीर्षकों से ही भारत भूषण के अभिनय का कुछ वैविध्य समझा जा सकेगा. लेकिन जिन फिल्मों को उनके कारण भुलाया न जा सकेगा वह हैं ‘’बैजू बावरा’’,’’शबाब’’,’’मिर्ज़ा ग़ालिब’’, ’’बसंत बहार’’, ’’रानी रूपमती’’, ’’सोहनी महिवाल’’, ’’सम्राट चन्द्रगुप्त’’, ’’फागुन’’, ’’महाकवि कालिदास’’, ’’बरसात की रात’’, ’’संगीत सम्राट तानसेन’’, ’’विद्यापति’’ और ‘’जहाँआरा’’. इनमें ‘’कवि’’ ,गेटवे ऑफ़ इंडिया’’, ’’लड़की’’ और ‘’घूँघट’’ भी जोड़ी जा सकती हैं.

देखा जा सकता है कि भारत भूषण को कवियों, शायरों, गायकों, सम्राटों, सुल्तानों, संतों, भक्तों, पौराणिक व्यक्तित्वों, आदर्श बेटों और बड़े भाइयों की भूमिकाएँ बहुत मिलीं. इनमें सुखांतिकाएँ-दुखान्तिकाएँ दोनों थीं. ’’बैजूबावरा’’ को अमर बनाने में जितना योगदान नौशाद के संगीत का है, रफ़ी की हैरतअंगेज़ गुलूकारी का,  उतना ही ‘’ओ दुनिया के रखवाले’’ को पुकारते हुए भारत भूषण का भी है.  मेरे लिए यह कल्पना कर पाना कठिन है कि ‘’शबाब’’ जैसी महान संगीत-फिल्म में उन दिनों भारत भूषण के अलावा सामंत युगीन गायक-प्रेमी की भूमिका कौन निभा सकता था – दिलीप कुमार उसके लिए बहुत ‘’सॉफिस्टिकेटेड’’ हो चुके थे. वही माजरा ‘’बसंत बहार’’ के साथ है. हैरत इस बात की है कि सोहराब मोदी ने ‘’मिर्ज़ा ग़ालिब’’ के लिए किसी मुस्लिम एक्टर को न चुन कर भारत भूषण को लिया जिन्होंने गुलाम मोहम्मद के संगीत के साथ ग़ालिब को ऐसा अमर कर डाला कि उनका नाम लेते ही सबसे पहले भारत भूषण की उर्दू-ए-मुअल्ला शायराना शक्ल ही नज़र आती है. यही हाल ‘’बरसात की रात’’ का है – ‘’ज़िन्दगी भर नहीं भूलेगी’’ – क्या ? साहिर की शायरी, रोशन की मूसीकी, रफ़ी की आवाज़ या भारत भूषण की अदाकारी ?

यह सारी फ़िल्में इसीलिए बन पाईं कि हमारे पास भारत भूषण जैसा अदाकार था. उनमें कहानी, संगीत और अदाकारी अंतर्गुम्फित होते थे. सबके संतुलन का ध्यान रखा जाता था.  संवाद, गीत और संगीत उनकी जान होते थे. यह नहीं कि भारत भूषण की सभी फ़िल्में हिट हुईं लेकिन यदि आप दिलीप-राज-देव को तत्कालीन सुपर-स्टार मानें तो भारत भूषण उनसे कुछ ही दूर थे, बल्कि सच तो यह है कि दिलीप कुमार के अलावा उन जैसे किरदार कोई और निभा ही नहीं सकता था. 1941 की ‘’चित्रलेखा’’ से लेकर 1968 की ‘’कृष्ण भक्त सुदामा’’ तक भारत भूषण ने नायक या सहनायक के रूप में करीब 50 फिल्मों में काम किया और यश तथा धन दोनों पर्याप्त अर्जित किए. लेकिन उन्होंने फ़िल्में बनाने का घातक निर्णय लिया और अपनी पूँजी और ज़मीन-जायदाद खो बैठे. पारिवारिक मोर्चे पर भी उन्हें बहुत सदमे लगे और पचास की उम्र तक पहुँचते-पहुँचते उन्हें दोयम-तीयम दर्ज़े के किरदार मिलने लगे जो जीवन-यापन के लिए लाज़िमी हो गए.

भारत भूषण ने अपनी मुफ़लिसी, नाकामयाबी और गुमनामी के दिनों का मुक़ाबिला बहुत हिम्मत से किया. उन्हें अपने काम पर ही जिंदा रहना था और वह उन्होंने कर दिखाया. विडंबना यह है कि 1968 के बाद उन्होंने क़रीब 150 फिल्मों में एक्स्ट्रा की भूमिकाएँ कीं जिनमें संभ्रांत-से-संभ्रांत और हक़ीर-से-हक़ीर किरदार थे.  

इतनी वेराइटी वाला इतना बड़ा पूर्व-नायक एक्स्ट्राहिंदी फिल्मों में कोई दूसरा न हुआ. शायद वह मुम्बइया फ़िल्मों और नियति को इस तरह शर्मिंदा कर रहे थे. उन पर किताब आनी चाहिए. मुझे याद नहीं आता कि गुलज़ार की ‘’माचिसमें वह क्या बने थे, जो  उनकी आख़िरी फिल्म कही जाती है. लेकिन वह अपनी बड़ी फिल्मों में अमर हैं.  आज भी इन्टरनैट के ज़रिये लाखों दर्शक उन्हें देखते-सराहते  हैं. उन जैसे अंत-तक निस्संकोच संघर्षशील बड़े कलाकार को विस्मृत, असफल और दयनीय कैसे कहा जा सकता है.
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(विष्णु खरे का कॉलम. नवभारत टाइम्स मुंबई में आज प्रकाशित, संपादक और लेखक के प्रति आभार के साथ.अविकल )

विष्णु खरे 
(9 फरवरी, 1940.छिंदवाड़ा, मध्य प्रदेश)
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