सहजि सहजि गुन रमैं : महेश वर्मा

Posted by arun dev on मार्च 08, 2016

कला कृति : Rana Begum


महेश वर्मा  की कविताएँ                          
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याद दिलाना            


मुझे कब बोलना है
मुझसे अधिक तुम याद रखना

अंतरालों को याद रखना
कहाँ मेरी चुप है
कहाँ धीमी पड़ जायेगी आवाज़

कहाँ रुदन के लिए जगह छोड़नी है,
कहाँ हंसी के लिए, साज़ के लिए

कब आवाज़ साथ छोड़ देगी
कब रूह, कब साथ छोड़ देगा सहगान
कब विफल ही जायेगा रंगमंच
कब आकाश के उस ओर चली जायेगी तान

कभी भूल जाऊँ बीच में

तो मुझे याद दिलाना.



25 दिसंबर              

बच्चियों के गले से निकली भाप
और प्रार्थनाओं से गर्म
चर्च के ह्रदय में गूंजती है
पल्लीपुरोहित की अटपटी भाषा

फिर प्रार्थनाओं में टुकड़ा-टुकड़ा ऊपर उठता है आकाश
ढेर सारे पखेरू उड़ते हैं सहगान में
वाद्यवृन्द बजाता है साल भर के शोक

गुलाबी रिबन, गुलाबी लिपस्टिक, गुलाबी स्कार्फ 
गुलाबी मुस्कान,
गुलाबी फ्रॉक में चक्करदार घूमती है रात

गुलाबी इस रात का रंग है इस साल
पिछले साल गुलाबी इस रात का रंग था
उसके पिछले साल इस रात का रंग था गुलाबी

अब चारों ओर दौड़ रही हैं बच्चियां
आस्था की तितलियाँ उड़ती हैं
पन्नियों से सजे
छोटे से आकाश में

पियक्कड़ों का देवता
अपने दांत चमकाता घूमता है
स्वर्ग में.



31 दिसंबर             

अंतिम दिन मृतकों के नाम होना चाहिये
पूरे बरस के लिये एक लम्बी श्रद्धांजलि


उनकी आत्माओं को शांती मिले : आमीन
शांती मिले उनकी आत्माओं को : आमीन
आत्माओं को शांती मिले उनकी : आमीन

एक साँप केंचुल छोड़ रहा है
ठंडी झाड़ियों में, एक साल केंचुल छोड़ रहा है,
बारहसिंगा रोता है ठंडी झाड़ियों में

हाथी कभी रास्ता नहीं भूलते : ठंडी रात में

उसी आदिकालीन रास्ते पर
वे लुढ़काते चले जायेंगे हमारी धरती


पृथ्वी के पैरों में सांकल डालकर
उसे अपने अक्ष पर घुमाते नए देवता
अपने जाम उठाते हैं शांती और समृद्धि के नाम.

चुपचाप सिसकते हैं वृक्ष
ओस में अपने आंसू मिला देती है हरियाली

सीटी की तेज़ आवाज़ से पहले
बुझ चुका है उत्सव का संगीत

वमन,
नींद
और जले हुये
बारूद की गंध में
बावड़ी की सीढियाँ उतरते

अँधेरे जल में उतर जायेगा साल.






शाम            
शाम ही से शुरू होती हैं चीज़ें
कुछ रंग शाम ही के पास हैं  

पक्षी स्वर चक्करदार घूमते हैं-
आकाश में, कुछ सितारे आते हैं

घूमते वृक्ष निर्लिप्त खड़े हो जाते हैं
और चुप्पी अपनी लकीरें खींचती है
झींगुरों के सहगान पर

बूढा डॉक्टर पीता है अपने संदेह
और बीवी की ख़ूबसूरती का जाम
अपनी बन्दूक पर उसका अब भी वही विश्वास है

प्रार्थना घर की घंटियाँ सुनकर
विश्वास की दिशा में सर झुकाने वाली
अंतिम बुढ़िया
मोतियाबिन्द की हरी आँखटोपी
लगने के बाद से
भूलने लगी है देवताओं के नाम  


बादल उठते हैं शाम के भीतर से 


कुछ टूटने की आवाज़ आती है.





गया साल                 
पहले पूर्वजों का लोप हुआ
फिर पीठ फेरते ही कथाओं में बदलने लगे लोग

इस बीच इतनी मौतें हो चुकीं
इतने बुरे दिन
इतनी उदास रातें
कि बहुत धीमे गुजरा साल

एक जख्म सूखने का महीना
तीन महीने आंसू सूखने के
दो आत्महत्याओं के महीने
डेढ़ महीना गुमशुदा का पोस्टर चिपकाते
चिपक गया स्टेशन की दीवार पर

क्या कहा जाए बाकी बचे दिनों के बारे में

कोई मिलता तो उसका एक अफ़साना ज़रूर होता
फिर उसके जाने में
उसकी पीठ पर पढ़ लेते इतिहास.



गल्प में झरने के वापस लौटने का दृश्य           

मैंने लौटते देखा झरने को
उसके उद्गम रंध्रों में,
कल्पना को वापस
पत्थर में लौटते देखा,
विस्मय को पथरीले यथार्थ में.

संशय को और गहरे संशय में
देखा डूबते

इसी तरह एक-साथ अचानक
बारिश की तरह झरते देखा नक्षत्रों को,
उनका लौटना देखा
धूल में
जल में और
पुरातन अन्धकार में.

पीछे अगर सचमुच को पीछे
पीछे की ओर घूम पड़े पृथिवी,
धुरी पर या सूर्य के विस्मय के अक्ष पर-तो पीछे,
किस पीछे की जगह पर
थोड़ी और देर तक रुकना चाहेंगे आप?
और किस पीछे के समय को पोंछकर मिटा देना?
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महेश वर्मा :  maheshverma1@gmail.com