हस्तक्षेप : भारतीय अध्यात्म और बाज़ार









भारत विश्व में अपने मोक्ष, पुनर्जन्म आदि दार्शनिक मान्यताओं के कारण भी जाना जाता है. हजारो विकल प्राणी मोक्ष की तलाश में तमाम गुरुओं के पास भटकते रहते हैं. जनता को जन्म जन्मान्तर के बन्धनों से मुक्त करने के इस व्यापार में खुद गुरुओं के पास ऐश्वर्य के पहाड़ खड़े हो गए हैं. सवाल यह है कि ये दर्शनिक मान्यताएं विशेषताएं हैं कि समस्याएं ?
युवा समाज वैज्ञानिक संजय जोठे ने आचार्य रजनीश और श्री श्री रविशंकर की दार्शनिक निष्पत्तियों और सांसारिक ‘उपलब्धियों’ की अच्छी पड़ताल की है. इन गुरुओं की 'उपयोगिता' और दिख रही प्रतियोगिता के विषय में आप भी तो कुछ सोचते ही होंगे ? 


भारतीय अध्यात्म का व्यावसायिक माडल और भारत का पतन        

संजय जोठे


धुनिक समय के दो प्रसिद्ध भारतीय गुरुओं को ध्यान से देखिये, इन दोनों की शिक्षाओं और शैलियों के अध्ययन से आप समझ सकेंगे कि भारत की सनातन समस्याओं का स्त्रोत क्या है. इन गुरुओं ने जिस तरह का आभामंडल और भक्त समुदाय बनाया है उसके मनोविज्ञान को नजदीक से देखने पर और अधिक निराशा भी होती है लेकिन यह बात बहुत स्पष्ट हो जाती है कि इन गुरुओं ने जिस चीज को समाधान की तरह प्रचारित किया है वह समाधान ही सबसे बड़ी समस्या है. वैसे तो भारतीय समाज की हजारों समस्याएं हैं और हजारों प्रश्न हैं जो एक एक करके बहुत लंबी बहस की मांग करते हैं लेकिन दो ऐसे महत्वपूर्ण और प्रतिनिधि प्रश्न हैं जो सभी प्रश्नों को अपने गर्भ में समेटे हुए हैं. ये दो प्रश्न हैं – भारत इतनी सदियों तक गुलाम क्यों रहा और यह कि भारत इतने हजार सालों के ज्ञात इतिहास में विज्ञान क्यों पैदा नहीं कर सका?

ये दो प्रश्न भी असल में एक ही प्रश्न के दो पहलू भर हैं. जो समाज अवैज्ञानिक होता है वह गुलाम होता है और जो गुलाम होता है वह विज्ञान से डरने लगता है. इस तरह इन दो में से किसी एक का भी उत्तर इन गुरुओं से पूछा जाना चाहिए. ये गुरु लोग इन प्रश्नों के आसपास जन्मे उप प्रश्नों का उत्तर देते हुए एक झूठा वैचारिक आन्दोलन जरुर छेड़ते हैं लेकिन इन प्रश्नों की पीड़ा से जन्मे उत्तरों को व्यवहार में लागू करने का कोई वर्केबल रोड मेप नहीं देते हैं. यहाँ आकर इनकी समझ और नीयत पर प्रश्न खड़ा होता है. यह मानना गलत होगा कि इतने बुद्धिमान, घाघ और इतने बड़े साम्राज्यों को बनाने या चलाने वाले ये गुरु समस्या को नहीं पहचान पा रहे हैं. ये जरुर ही समस्या को समझ पा रहे हैं. लेकिन इनके काम करने की शैली इतनी गलत है कि वो समस्या को बढाती जाती है, कम तो बिलकुल ही नही करती.

हम अपने मूल प्रश्नों पर लौटते हैं. भारत की अवैज्ञानिकता और गुलामी का विमर्श ही वास्तविक भारत विमर्श है. यह रोगी को उसके रोग से समझने का प्रयास है. लेकिन ये दो आध्यात्मिक गुरु रोगी को उसके स्वस्थ होने की संभावना के आईने में झलकाकर परिभाषित करते हैं, और स्वास्थ्य भी ऐसा जो अभी तक किसी ने नही देखा या जाना. सरल शब्दों में कहें तो वे भारत और भारतीय समाज की समस्याओं को एक झूठी आशावादी दृष्टि से हल करते हैं और प्रचार करते जाते हैं कि भारत का समाज अध्यात्मिक नैतिक और उन्नत समाज है. वे अभी आंख के सामने ही पल रहे रोग की चर्चा नहीं करते बल्कि स्वस्थ हो जाने के बाद क्या संभव है उसकी चर्चा करते हैं. वे अभी की जरूरतों की बात नहीं करते बल्कि स्वर्णयुग की इबारत लिखते हैं और उसी के चारों तरफ अपनी खुद की महिमा और गुरुडम की बुनाई भी करते जाते हैं. वे स्पष्ट शब्दों में ये नहीं कहते कि इतने लंबे समय तक धर्म अध्यात्म तंत्र मन्त्र योग कुण्डलिनी इत्यादि करने के बावजूद या इसी के कारण ये देश सड़ रहा है, बल्कि वे अभी भी यही कहते हैं कि भारत के लोगों को और अध्यात्मिक और धार्मिक बनने की जरूरत है ताकि सारी समस्याएं मिटाई जा सकें. ये दोनों गुरु यह नहीं कहते कि भारतीय आध्यात्मिकता का माडल ही असली जहर है, बल्कि इसके विपरीत वे इसी माडल की कास्मेटिक सर्जरी करके इसी को सुन्दर और जहरीला बनाते जाते हैं.

भगवान रजनीश ने हालांकि अपने करियर की शुरुआत में गौतम बुद्ध और मार्क्स से प्रभावित होकर बहुत ही सही दिशा में प्रश्न उठाये थे. वे एक खालिस नास्तिक या अज्ञेयवादी की मुद्रा में बात करते थे और एकदम चुभते हुए सवाल उठाते थे. वे पूछते थे कि इतना धर्म कर्म सत्संग और संन्यास होने के बावजूद इस देश में सामान्य सी प्राकृतिक नैतिकता क्यों नहीं है. लोग यहाँ एकदूसरे के साथ मिलकर समाज बदलने का प्रयास क्यों नहीं करते. महिलाओं की हालत इतनी खराब क्यों है और भारतीय शिक्षा संस्थान और वैज्ञानिक दुनिया में सबसे पिछड़े क्यों हैं इत्यादि. उनकी पुरानी हिंदी की किताबों में बहुत स्पष्टता से ये देखा जा सकता है. उनकी दो महत्वपूर्ण किताबे हैं - भारत के जलते प्रश्न और गांधी पर पुनर्विचार. इन दोनों किताबों में वे बहुत वैज्ञानिक ढंग से प्रश्न उठाते हैं और उत्तर भी देते हैं. लेकिन जब वे खुद जब इन प्रश्नों के उत्तरों को अमल में लाने की दृष्टि से समर्थ हो जाते हैं तब आश्चर्यजनक ढंग से स्वयम ही भगवान् बनकर लोगों को तन्त्र मन्त्र कुण्डलिनी और रहस्यवाद इत्यादि सिखाने लगते हैं. साठ के दशक में वामपंथी और मार्क्सवादी शैली में बात करने वाले आचार्य रजनीश जब समाज में पैठ बना लेते हैं तो सत्तर के दशक की शुरुआत में ही संन्यास देने की घोषणा करते हैं और समाज क्रान्ति की सारी बातें भूलकर आध्यात्मिक क्रान्ति की बात करने लगते हैं. आध्यात्मिक क्रान्ति का सीधा सीधा अर्थ है कि मनुष्य साधना करके मोक्ष को कैसे हासिल करे इस जमीन पर गरीबी मिटाने की बजाय स्वर्ग का ऐश्वर्य कैसे हासिल करे.

यह नितांत वेदान्तिक ढंग का एकांगिक और आत्मकेंद्रित माडल है जिसमे सामूहिक शुभ और समाज के लाभ की कोई प्रेरणा नहीं होती है. आप अपना तन्त्र मन्त्र लेकर चुपचाप अपने कमरे में बैठे रहें और आपके पडौस में ही अन्याय होता है तो उसके बारे में आपको सोचना तक नहीं है. यह भारत का सनातन वेद सम्मत आध्यात्मिक अनुशासन है. इसी का प्रचार रजनीश खुद को भगवान् घोषित करके करते हैं. अब चूँकि उन्होंने शुरुआत में बुद्ध की नास्तिकता और मार्क्स की सामाजिक क्रान्ति दृष्टि का उपयोग करके लोगों को प्रभावित कर लिया है इसलिए लोग उनसे पूछते हैं कि महाराज वो पुरानी क्रांतिकारी बातों का क्या हुआ? तो भगवान रजनीश उत्तर देते हैं कि जीवन विरोधाभास है एक सांस अंदर आती है तो दूसरी बाहर जाती है, दिन के साथ रात है, पक्षी दो पंखों पर उड़ता है इत्यादि इत्यादि. 

इस पूरे खेल में वे लाखों लाख लोगों को उलझा लेते हैं और वे सभी लोग जो उन्हें सामाजिक  बदलाव का पक्षधर मानते आए थे वे उनसे दूर चले जाते हैं. बचे रह जाते हैं खालिस भक्त और मोक्ष का संधान करने वाले भाग्यवादी, अन्धविश्वासी और स्वार्थी लोग जिन्हें समाज और दुनिया की कोई समझ नहीं है और चिंता भी नहीं है. बस ले देकर चक्र कुण्डलिनी समाधि इत्यादि की बात करते हैं और भद्दे और स्त्री विरोधी जोक्स सुनाते रहते हैं. आज भी उसी दौर के स्वार्थी अन्धविश्वासी और व्यक्तिपूजक शिष्य उनकी विरासत संभाले हुए हैं.

अभी अभी ओशो के नाम पर एक नया आश्रम शुरू हुआ है जो चौरासी दिनों में चौरासी लाख योनियों से मुक्ति दिलाने का दावा करता है और तीन दिनों में पूर्वजन्म की यात्रा करवा देता है, ज्योतिष और देवी देवताओं का आह्वान करना सिखाता है. ये रजनीश की कन्फ्यूज्ड और मूर्खतापूर्ण शिक्षाओं का स्वाभाविक परिणाम है. फलों से पता चलता है कि पेड़ कैसा था. उनके अन्य आश्रम और ध्यान केंद्र भी जो समाज में बड़े बोल्ड होकर खुद को पेश करते हैं वे भी समाज को बदलने की बिलकुल चिंता नहीं करते बल्कि अत्यंत स्वार्थी ढंग के ध्यान समाधि में ही अपनी ऊर्जा लगाए रखते हैं. उनके शिष्यों में अधिकाँश लोगों से बात करने पर साफ़ दिखाई देता है कि आत्मा, परमात्मा और पुनर्जन्म सहित मोक्ष इत्यादि के अंधविश्वास कितनी गहराई से उनके मन में जमे हुए हैं. यहाँ तक कि आनंद उत्सव के नाम पर जिस तरह का हास्यबोध रजनीश उन्हें देकर गये हैं उसमे भी स्त्रीविरोधी और नस्लीय चुटकुलों की भरमार है. खासकर सरदारों, स्त्रियों, सिंधियों और मारवाड़ियों को उन्होंने चुटकुलों में खूब इस्तेमाल किया है. उनके शिष्यों मे भी इसी तरह का भयानक जातिवाद, स्त्री विरोधी मानसिकता और पलायनवाद सहित ज्योतिष इत्यादि का सम्मोहन बना हुआ है. 

इस उदाहरण से समझ में आता है कि भगवान रजनीश किस तरह से भारत के लिए समाधान नहीं बल्कि समस्या देकर गये हैं.

इसी तरह श्री श्री रविशंकर जो कि महर्षि महेश योगी के शिष्य हैं उन्होंने भी अपनी शुरुआत से ही अध्यात्मिक उपलब्धियों और मानसिक शान्ति के लिए उपायों को अपनी चर्चा के केंद्र में रखा. प्राणायाम और आसनों की व्यवस्था सहित मन्त्रों इत्यादि के अनुशासन से लोगों को मानसिक शान्ति और स्वास्थ्य का आश्वासन दिया गया. एक शहरी और उपभोक्तावादी जीवनशैली में व्यक्तिगत जीवन की समस्याओं का समाधान करने के उद्देश्य से उनकी प्रस्तावनाएँ रची गईं हैं. कामकाजी युवा मध्यम वर्ग की तनाव और प्रतियोगिता से जन्मी समस्याओं का उन्होंने हल पेश किया. उनकी अध्यात्मिक पहल में हालाँकि मोक्ष, समाधि और चक्र, कुण्डलिनी इत्यादि का वैसा ज्वार नहीं है जितना भगवान रजनीश की प्रस्तावनाओं में है लेकिन फिर भी उनका पूरा अनुशासन मोक्ष और समाधि की धारणा का ही विस्तार है. व्यक्तिगत शुभ और व्यक्तिगत मोक्ष की आत्मघाती धारणा से जन्मा एकान्तिक और स्वार्थी ढंग का आध्यात्म उनके अनुशासन का मुख्य स्वर है. सुदर्शन क्रिया या अन्य प्राणायाम और कीर्तन इत्यादि असल में तनाव दूर करने के और शारीरिक मानसिक स्वास्थ्य को बढाने के उपाय हैं. इन सबको एक सामूहिक ढंग से करने का तरीका भी बतलाया गया है जो एक नये ढंग की सामूहिकता और टीम का आभास देता है. उपर-उपर से लगता है कि रजनीश के सन्यासियों की तरह ही रविशंकर के शिष्य भी ध्यान कीर्तन इत्यादि के माध्यम से एकदूसरे के निकट आ रहे हैं और समाज में एक तरह का संश्लेषण और एकीकरण हो रहा है. लेकिन ज़रा कुरेदकर देखिये ये संश्लेषण और एकीकरण झूठा और बनावटी है. न केवल यह बनावटी है बल्कि असली एकीकरण और सामूहिकता बोध की संभावना का सबसे बड़ा दुश्मन भी है.

आइये इसकी गहराई में प्रवेश करते हैं. रजनीश और रविशंकर दोनों ही जिन मौलिक मान्यताओं पर खड़े हैं वे हैं आत्मा, परमात्मा, पुनर्जन्म और मोक्ष या बुद्धत्व. ये मान्यताएं दुनिया की सबसे घातक अन्धविश्वासी अवैज्ञानिक और क्रान्ति विरोधी मान्यताएं हैं. इनमे उलझने वाले किसी भी समाज ने आज तक न तो विज्ञान दिया है न तकनीक, न ही समतामूलक और लोकतांत्रिक समाज दिया है. लिंग, वर्ण, भाषा और जाति के भेद इन्ही मान्यताओं के गर्भ से आते हैं. अब ऐसे गुरु जब पश्चिमी क्रांतिदृष्टि को भारतीय पुराण दृष्टि से मिलाकर खिचड़ी बनाते हैं तो वो ऐसी जहरीली रचना होती है जो न पश्चिम के काम आती है न पूर्व के. अब इन गुरुओं की प्रस्तावनाओं को दुबारा देखिये, ये दैनिक जीवन का जो अनुशासन देते हैं और जिस तरह के प्रवचन पिलाते हैं वह एक पक्ष है, फिर जिस तरह से मनुष्य और दुनिया के भविष्य को चित्रित करते हैं वो दुसरा पक्ष है. और मजा ये कि ये दोनों पक्ष एकदूसरे के विरोध में हैं. यही इनकी मूर्खता का स्त्रोत है. दोनों ही एक भयानक पाखंडी विरोधाभास पर खड़े होकर दुनिया को मूर्ख बनाते हैं.

एक तरफ आत्मा का सिद्धांत सिखाते हैं और दूसरी तरफ कहते हैं कि आत्मभाव – मैं मेरा से मुक्ति ही मोक्ष है. अब ये गजब की पाखंड लीला है. अगर आत्म भाव से मुक्ति ही लक्ष्य है तो आत्मा और पुनर्जन्म का सिद्धांत क्यों सिखाते हो? तब क्यों नहीं बुद्ध की अनत्ता सिखाते हो? या तो आत्मा सिखाओ या फिर निर्वाण सिखाओ दोनों एकसाथ क्यों सिखाते हैं? एक तरफ समझाते हैं कि आत्मा अजर अमर अविनाशी और एक से दूसरे गर्भ में जाने वाली चीज है उसे नष्ट नहीं किया जा सकता. फिर ये भी सिखायेंगे कि अपने होने का बोध यानी आत्मभाव या अहम् को त्यागना ही मोक्ष है. अरे भाई जब त्यागना ही है तो आत्मा की बकवास सिखाते ही क्यों हैं आप? यही इनके धंधे का असली राज है. जब आप पुनर्जन्म मानकर चलेंगे तो आप स्वार्थी होने लगेंगे, जब स्वार्थ की बातें करेंगे तो ये परमार्थ की सितार छेड़ देंगे. बस जलेबी पर जलेबी बनाते जायेंगे. ये गुरु लोग एक हाथ में जहर की पुडिया और दूसरे हाथ में दवाई लेकर चलते हैं बिमारी और इलाज दोनों से कमाई होती रहे. रात में दीवार पर कीचड़ डालते हैं और सुबह गली-गली में चिल्लाते हैं दीवार साफ़ करवा लो. ये धर्म और आध्यात्म का विशुद्ध बाजारीकरण हैं और रजनीश सहित रविशंकर इसमें बहुत ही कुशल हैं. 

ये दोनों गुरु सिखाते हैं कि व्यक्तिगत जीवन में आनंदित कैसे हों, दैनिक जीवन के तनाव और प्रतियोगिता सहित यौन कुंठाओं और शारीरिक व्याधियों से भी कैसे मुक्त हों. यह बात बहुत सुन्दर है. एक शुरुआत के रूप में बहुत अच्छी बात है. लोग संन्यास लेकर या दीक्षा लेकर या बेसिक कोर्स या एडवांस कोर्स करके आगे बढ़ते जाते हैं. प्राणायाम, मंत्रजाप, आसन त्राटक या कीर्तन आदि से कुछ तनाव कम करते हैं और अपने जीवन में सुख और शिथिलता का अनुभव करते हैं.  इस बात की प्रशंसा होनी चाहिए. लेकिन समस्या तब खड़ी होती है जब ये व्यक्तिगत समाधान सामूहिक समाधान बन पाने की यात्रा में एकदम से असफल हो जाते हैं. उदाहरण के लिए व्यक्तिगत जीवन में तनाव कम करके हजारों लोग जब आपस में मिलकर सामूहिक जीवन और समाज का नक्शा बनाने बैठते हैं तब वे समाज निर्माण की चिंता की बजाय अपने मोक्ष की चिंता में घुस जाते हैं. आत्मा और पुनर्जन्म की धारणा उन्हें अपने ही भावी जन्म सहित मोक्ष की चिंता में इतना उलझा लेती है कि इन गुरुओं के शिष्य समाज के लिए रत्ती भर भी योगदान नहीं करते.

इसका ये अर्थ हुआ कि एक उपभोक्तावादी और तनावपूर्ण जीवनशैली में जीते हुए जब मन और शरीर थकने लगता है तब इन गुरुओं की शरण में आकर इनसे मदद ली जाती है. जब तनाव व रोग कम होते हैं तो दुगुनी ताकत से उसी जीवन व्यवस्था और स्वार्थी मोक्ष की धारणा की सेवा करने लग जाते हैं. इसी बिंदु पर जिद्दु कृष्णमूर्ति इन गुरुओं की खूब खबर लेते हैं और इनके पाखण्ड को नंगा करते हैं. यह बहुत बारीक बात है लेकिन रजनीश और रविशंकर दोनों के शिष्य इसे समझने में असफल रहे हैं. यह आज ही की बात नहीं है. इनके गुरु और उनकी पुरानी परम्पराओं ने भी यही सब किया है. इसीलिये इतने लंबे इतिहास में इस देश में राजतन्त्र, सामंतवाद, तानाशाही, गुलामी और धर्मसत्तावाद इत्यादि सब मिलेगा लेकिन लोकतंत्र का नामो निशान तक नहीं मिलेगा. लोकतंत्र कभी इस जमीन पर ही जन्मा था लेकिन वह आजीवकों और बौद्धों का काल था. अशोक बौद्ध होने के पहले आजीवक थे, चन्द्रगुप्त भी आजीवक थे. उस समय भौतिकवाद का दर्शन था जो आत्मा परमात्मा को नहीं बल्कि शरीर और मनुष्य सहित प्रकृति के सम्मान पर खडा था. इसीलिये उन्होंने उस समय में चिकित्सा, भेषज, मूर्तिकला, कृषि सहित अन्य सभी कलाओं को विक्सित किया. लेकिन जैसे ही आत्मा परमात्मा स्टाइल धर्म हावी हुआ ये मुल्क अंधविश्वास और कर्मकांड में डूब गया.

हालाँकि भगवान रजनीश को अमेरिका से सबक मिलने के बाद बहुत बड़ी शिक्षा मिली थी. अपनी विश्वासपात्र शिष्या शीला से और अन्य शिष्यों से धोखा खाने के बाद उन्हें समझ में आया कि आत्मा परमात्मा और गुरुभक्ति किसी भी तरह से किसी की चेतना में कोई बदलाव नहीं लाती बल्कि ऐसे सभी लोग मौके के इन्तेजार में बैठे रहते हैं और गुरु के बीमार या कमजोर होते ही खुद सत्ता चलाने लगते हैं. इस बोध से रजनीश को असली बुद्धत्व मिला. इसीलिये अमेरिका से लौटकर उन्होंने जिस अंदाज में अपनी बातें रखीं हैं वो एकदम अलग ही बात है. वही ओशो का असली सौंदर्य है उतना भर हिस्सा बचाने योग्य है और उसी से भारतीय अध्यात्म की मूर्खता के इलाज की कोई उम्मीद है. लेकिन उनके अपने शिष्य उनकी अनत्ता और शून्य पर आधारित बातों को छुपा रहे हैं. जब वे स्वयं को गौतम बुद्ध में समर्पित करते हैं उसके बाद की उनकी किताबें गायब की जा रही हैं. कापीराईट के झगड़ों में उन्हें अदृश्य बनाया जा रहा है. भगवान रजनीश तो अपने विरोधाभासों में खुद ही कमजोर होकर ब्राह्मणवाद का चारा बन चुके हैं अब उनका अंतिम और सबसे महत्वपूर्ण अवतार ओशो उनके लालची और पाखंडी शिष्यों के हाथों नष्ट हो रहा है.

श्री रविशंकर अभी मौजूद हैं, लेकिन उनकी शिक्षाओं के अनुशीलन से ऐसा बिलकुल नहीं लगता कि वे कभी भी स्व, आत्मा और पुनर्जन्म आधारित अध्यात्मिक माडल का विरोध करेंगे. वे और उनके गुरु महेश योगी विशुद्ध वेदांती हैं. वे पुनर्जन्म के बिना चल ही नहीं सकते. और जब तक पुनर्जन्म की या स्व के या आत्म की निरंतरता का सिद्धांत इस देश में चलता रहेगा ये देश स्वार्थी और अवसरवादी बना रहेगा. इसमें सामूहिक शुभ और लोकमंगल की धारणा नहीं आ सकेगी. उपर उपर सर्वे भवन्ति सुखिनः कहते रहेंगे लेकिन अपने ही घर में स्त्री को शास्त्र पढने या मंदिर जाने की अनुमति नहीं देंगे. अपनी बेटियों को आजादी से और मनमर्जी से विवाह करने की इजाजत नहीं देंगे. कण-कण में ब्रह्म का दर्शन करेंगे लेकिन एक शूद्र को तीन फूट ऊपर से धार गिराकर पानी पिलायेंगे वह छू न जाए इस बात का पूरा ध्यान रखेंगे. वसुधैव कुटुंबकम की ढपली भी  बजायेंगे और शादी ब्याह के इश्तिहारों में धर्म, जाति और उपजाति का बखान भी करते रहेंगे.

भगवान रजनीश और रविशंकर की शिक्षाओं और उनके शिष्यों के मनोविज्ञान को ध्यान से पढ़िए आपको आश्चर्य होगा कि ये लोग इस शताब्दी में विज्ञान और तकनीक के साथ जी रहे हैं. वे एक पाषाण युग के चलते फिरते जीवाश्म नजर आते हैं. उनकी स्वार्थ दृष्टि अंधविश्वास और पलायनवाद देखकर समझ में आता है कि इस देश पर इतनी छोटी छोटी कौमों ने कैसे इतनी आसानी से कब्जा किया होगा. ऐसे गुरुओं और इनके आध्यात्म से इस देश को बचाने की सख्त जरूरत है. भारत के समाज में जो थोड़ी सी प्रगतिशीलता, वैज्ञानिकता और नैतिकता बची हुई है तो वो इन गुरुओं की वजह से नहीं बल्कि इनके बावजूद बची हुई है. 
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संजय जोठे  university of sussex से अंतराष्ट्रीय विकास में स्नातक हैं. संप्रति टाटा इंस्टिट्यूट ऑफ़ सोशल साइंस से पीएचडी कर रहे हैं.
sanjayjothe@gmail.com

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  1. अच्छा विश्लेषण .. जैसा कि आपने भी कहा ओशो और रविशंकर की शुरुवाती सोच सही दिशा की और उन्मुख थी लेकिन बाद में वे दौनों ही अपनी ही मान्यताओं /शिक्षाओं की काट करने लगे |दरअसल जब आध्यात्म और दर्शन समाजोन्मुख व् लोकप्रिय होने लगते हैं तो इस अन्तर्रष्ट्रीय लोकप्रियता को भुनाने के लोभ में इस तरह के योगी (संत) मार्ग से भटक जाते हैं |

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  2. गुरूघंटालों का सम्यक विबेचन किया है संजय गोठे ने । इन कथाबाचको ने लोगो की मूर्खता के बल पर अपना बिपुल साम्राज्य खड़ा किया है बर्नाड शा ने कहा है unless fools are on the earth wise men will not suffer.

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  3. Sarang Upadhyay12/3/16, 9:52 am

    भारतीय समाज, धर्म और दर्शन के विरोधाभासों का बेहतरीन विश्लेषण।

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  4. Pandit Ramanji12/3/16, 9:52 am


    असल में तो "मृत्युभय "के कारण ही ये सब चल रहा है,
    इसी डर ने और पाप - पुण्य के दोराहे में उलझें लोगों को इनकी चमक दमक खींचती है ।
    ये धनपति होते जाते हैं और संशयशील लोग शिकार होकर कंगाल हो जाते हैं ।

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  5. संजय जी!
    'आत्मा, परमात्मा, पुनर्जन्म और मोक्ष या बुद्धत्व - ये मान्यताएं दुनिया की सबसे "घातक अन्धविश्वासी, अवैज्ञानिक और क्रान्ति विरोधी मान्यताएं" हैं.'

    'वही ओशो का असली सौंदर्य है उतना भर हिस्सा बचाने योग्य है और उसी से "भारतीय अध्यात्म की मूर्खता के इलाज की कोई उम्मीद है".'

    तीखी आलोचना। बधाई। दो वाक्यों पर आपका तर्क जानना है। "अवैज्ञानिक और क्रान्ति विरोधी मान्यताएं" के विपरीत आप किन बातों को जरूरी पाते हैं और 'विकास' को किस दृष्टि से देखा जाए? क्या विज्ञान के अलावा दुनिया में कोई आधार नहीं हो सकता? और "भारतीय अध्यात्म की मूर्खता" को आपने कैसे महसूस किया है? लोगों के नहीं, आपके व्यक्तिगत अनुभव के विचार की बात है।

    PS - I'm not a follower or supporter of either of these gurus. It's a question of personal understanding :)

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  6. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल रविवार (13-03-2016) को "लोग मासूम कलियाँ मसलने लगे" (चर्चा अंक-2280) पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  7. saloni sharma12/3/16, 6:06 pm

    बढ़िया विश्लेषण। विशाखा जी का प्रश्न उत्तम है।
    आत्मज्ञान के लिए जवाब जानना चाहेगें

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  8. खुली और सजक सोच का बेहतरीन नमूना।

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  9. umda avlokan .. it would be nice if you kindly give some hint or reference of discussed thoughts of j.krishnamurti.

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  10. समस्या भारतीय सनातन दर्शन में नहीं ,समस्या पाश्चात्य भोगवादी जीवन शैली में है। उसे शैली ने स्वार्थ भोग और अकेलेपन में लिप्त ऐसी मानवता पैदा की है जो अपने दैहिक भोगवादी संस्कृति की पूर्ति के लिए ऐसी रोगी मानसिकता पैदा किया है जो विग्यान दर्शन साहित्य धर्म और अध्यात्म सबको इस्तेमाल किया है।ईसाई के अनुयायियों ने पहले इसीलिए दुनियाभरमे लूटमार किया। अपनी औद्योगिक क्रांति की।आजकल पूरी दुनिया उसकी मेफंसी है।औररजनीश तथा रविशंकर जैसे भोगी बाबाओ ने इस भोगवादी संस्कृति से ग्रस्त बीमार मानवता के लिए अपने भोगवादी का बेहतरीन जुगाड किया और भारतीय वैराग्य त्याग को बदनामभी किया तथा कमजोर भी। जैसा कि बुद्ध मध्यममार्गदिखाते है।वही भोगवादी कोकम करने का मार्ग था।जबकि आज बाबा लोग भोगवाद को धार्मिक मान्यता दिलाने का काम करते रहे हैं ।जो मूलतः कारपोरेट वाद है। इसका भारतीय सनातन चिंतन परंपरा से कोई संबंध नही है।विशुद्ध पाश्चात्य ईसाइयों का चिंतन और धर्म है।जिसमेभारतीय अध्यात्म के सोने का पानी चढाए दिया गया है। फिर भी आपने रजनीश और रविशंकर की बेहतर आलोचना की है।साधुवाद।बधाई !

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  11. इनके ढोंग-पाखंड-आडंबर को फैलाने हेतु एथीस्ट पूरे-पूरे जिम्मेदार हैं जो 'धर्म' का 'मर्म' जनता को समझाने को तैयार नहीं हैं। उस वैकूम को भरने हेतु ये व्यापारी जनता को उल्टे उस्तरे से मूढ़ने को आगे आ जाते हैं। प्रगतिशील का कर्तव्य है कि, वह जनता को समझाये - अध्यात्म = अध्यन + आत्मा अर्थात अपनी 'आत्मा' का अध्यन 'आध्यात्म' है न कि बाजारू ढोंग। धर्म=सत्य,अहिंसा (मनसा-वाचा-कर्मणा ),अस्तेय,अपरिग्रह व ब्रह्मचर्य न कि जड़-पूजा। देवता=जो देता है और बदले में कुछ लेता नहीं है जैसे- वृक्ष,जल,नदी,तालाब,समुद्र,वायु,भूमि आदि। भगवान=भ (भूमि-पृथ्वी )+ग (गगन-आकाश )+व (वायु-हवा )+I(अनल-अग्नि )+न (नीर-जल) न कि कोई कल्पित मूर्ती। चूंकि ये तत्व खुद ही बने हैं इनको किसी ने बनाया नहीं है अतः ये ही 'खुदा' हैं। इनका कार्य G(जेनरेट )+O (आपरेट )+D(डेसट्राय) है अतः ये ही GOD हैं। क्या कोई भी प्रगतिशील जनता व समाज को सही मार्ग दिखा रहा है ? केवल भटका कर जनता को ढोंगियों के खेमे में बांधे रखने का कार्य भर तथाकथित प्रगतिशील कर रहे हैं , फिर भला लुटेरों की क्यों न बन आए?

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  12. पठनीय आलेख है लेकिन रजनीश को सिर्फ कुछ कोणों से देखने की कोशिश की है, हाँ उनके कुछ समर्थक गलत दिशा में जा रहे हैं लेकिन यही तो बुद्ध के साथ भी हुआ था।

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  13. लोगो को अच्छी-अच्छी बाते करके फुसलाना फिर अपना उल्लू सीधा करना, इन गुरूओ का यही काम है

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  14. pankaj janwar13/3/16, 10:30 am

    In jaise guruon ne AADHYATMA ko SAMUHA se joda kyonki yeh vyapar karna chahte hai....SAMUHA se unmaad aata hai shanti nahi
    Kyonki sacchai toh yeh hai ki AADYATMA ya jise hum DHARM kehte hai yeh bahut hi niji ( personal) hai..Shanti akele mein hi paayi ja sakti hai... bheed ya samuha mein nahi...kyonki yeh bahot hi vyaktigat vishay hai Samuhik nahi....

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  15. नितांत बौद्धिक विश्लेषण जिसका अनुभूति से दूर-दूर तक कोई सरोकार नहीं हो सकता। तर्क चाहे जितने शशक्त हों किन्तु वे अनुभूति का पर्याय नहीं बन सकते..यदि आपने कभी बुद्ध की विपश्यना..ओशो के सक्रिय ध्यान..महर्षि के भावातीत ध्यान..श्री श्री की सुदर्शन क्रिया को अनुभूति के स्तर पर जाना होता तो इस वाणी विलास की व्यर्थता का बोध कभी हो चुका होता..हाँ लेकिन यह इतना आसान अगर होता तो धरती बुद्धजीविओं और बुद्धुओं से नहीं अपितु बुद्ध(Enlighted) पुरुषों से भरी होती। फिर भी इस बौद्धिक व्यायाम का भी अपना एक महत्व है...विचार से कभी तो अनुभूति की यात्रा सुरु होगी ही..

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  16. अनाम13/3/16, 11:16 am

    मुझे लगता है आप पूर्वाग्रह से ग्रसित है । आप न तो वेद जानते है न धर्म । धर्म ग्रन्थ में ही कृष्ण ने मुक्ति की बात की है ।मुक्ति क्या है , पहले यह जाने । आप कम्युनिस्ट सोच से पहले बाहर निकले, फिर धर्म और साधू की बात करे । रजनीश और श्री श्री ने तो एक पहल तो की समाज में लोगो को तनाव मुक्त करने की पर आप और हम क्या करते है । लोगो को तनाव देते है या उनसे तनाव उधर लेते है ।

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  17. Very accurate analysis. Near to truth. Ye guru middle class ke family tention n business me disurbane se upje hai.

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  18. I do not say that the "escapist" attitude which commentators of our Indian system have presented are free from error but after reading the essay one thing is absolutely clear that the writer himself is less equipped with the facts and has failed to remove his presuppositions...

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  19. जहाँ जहाँ विज्ञान है वहीँ इनके अनुयायी ज्यादा क्यों हैं ? हो सकता है इनका आन्दोलन गलत लोगों और गलत रास्ते पे चला गया हो..लेकिन मूलभूत सवाल ये है कि योग और दर्शन को गलत साबित करना और मार्क्स को सही ठहराना ...तथाकथित स्वतंत्र चिन्तक का ये पूर्वाग्रह कब छूटेगा?...और हाँ इनके और इनके शिष्यों ने समाज सुधार नहीं किया ?ये कहते हुए ठेका लेने का असफल और कुत्सित प्रयास करना ये कब जायेगा?...इनकी पीड़ा समझ में आती है मुझे ....समालोचना के नाम पर सिर्फ आलोचना हास्यास्पद है ...ये गडऊँ ग़दर करने वाले तथाकथित विचारकों की चीत्कार सुन के करुणा तो फूटती ही है...ॐ शांतिः शांतिः शांतिः ...

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  20. अनाम14/3/16, 8:04 am

    Ye sach hai or me shemat hoon.aaj kal ye bhi ek industry hai.or khoob chal rahi hai.agar inki pol kholo ya unke me bare me janta ko jagrook karo.to Pansare or kalburgi jesha hal ho jata hai.ye desh ka durbhagya hai ki hamare desh ke sidhe sadhe pareshan log inki chakachond me aa jate hai.kitne udharan hai.or in sab babao ko rajnetik sanarakchan bhi milta hai.

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  21. dear sir, i read ur article with utmost sincerity and in course of ur argumentation i found it to be methodologically incoherent. while analyzing osho, it seems to me that u r generalizing the criticism of indian philosophy to a particular man who is distinct in his body of thought. it is evident from ur argument why aatma is central to osho in both pre and post moksha period, why he talks of it when he has to abandon it? u were unable to comprehend that centrality and as a result u choose to problematize it. i would rather call it as a selective criticism. however, the logic behind use of aatma to osho is central inorder to understand "self" in totality. the logic of totality for osho is similar to benzaminian approach to history. without understanding the aatma in totality one can't even understand exploitation and humiliation that one feels and incurs on others and it is through that understanding of "total self" one can transcend it or one can integrate oneself with society and fellow being as there would be no other in his self. u talked about the problems of society but they can only be solved when distinction between self and other is removed. osho tries to do that. no revolution can serve the problems and misery that human faces, not even marx, until self is not united. u talked of revolution, count any one of them beginning from American to French all of them has failed and belied humanity. have u ever reflected on them why it happened so? what kind of revolution do u imagine to solve the problem of society? if it is not about acceptance of ours without any form. osho leads that movement. so please my friend be more serious while reflecting on osho's philosophy. i am not supporter of him neither a follower but i found a man with some sort of integrity in ideas. his methodology is fascinating and if u have to draw criticism draw on his methodology. it will bring more result, even if u have to engage u cant do so without taking him on his root.

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  22. बेहद घटिया प्रस्तुतिकरण।अधकचरे अध्ययन के आधार पर लिखा गया है।

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  23. आत्मज्ञान के संबन्ध में एक प्रश्न आया है। उस सन्दर्भ में निवेदन करना चाहूँगा कि बुद्ध की दृष्टि में आत्मज्ञान शब्द ही उचित नहीं है। बल्कि आत्म नहीं है ऐसी प्रतीति ही निर्वाण है। बुद्ध की दृष्टि में शरीर सहित मन और व्यक्तित्व को शून्य की तरह जान लेना निर्वाण है। जिस अर्थ में अनत्ता की व्याख्या की गई है उसे एक बार देख लीजिये, यहीं समालोचन पर मेरा अगला लेख अनत्ता की व्याख्या पर आने वाला है।

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  24. संजय जोठे के stupid आलेख को मैंने ध्यान से पढ़ा । कहीं का तुक्का कहीं जोड़ दिया है हमारे महान शोधकर्ता ने । ये कबीर मीरा सबको अपनी कलम से कटघरे में खड़े करेंगे । यह अनुभवहीन लेखक का का नितांत ही घटिया आलेख है हालांकि मैं ने न तो दोनों गुरुओं में से किसी की दीक्षा ली है न उसका प्रसंशक ही हूँ। पर लेखक की सोच -समझ को देखकर यही लगता है कि इसने किसी इन्द्रियातीत चीज का जीवन में अनुभव ही नहीं किया और उसकी यहाँ व्याख्या करने पर तुले हैं। पढ़ने से लगा कि बेकार इन लोगो को पढ़कर अपना बेशकीमती समय बर्बाद करता हूँ ।

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  25. लेख को पढ़ कर ऐसा लगा किसी बच्चे ने लिख दिया हो। पुरे सिद्धांत को बिना पढ़े एवं समझे व्यर्थ ही समय और शक्ति बर्बाद की है लेखक ने। मैं कोई रविशंकरजी एवं आचार्य रजनीश के बचाव मैं नहीं बोल रहा हूँ। लेकिन भारतीय वेदांत के अपेल सिद्धांत की बिना समझे रविशंकर और रजनीश की आड़ मैं जो धज्जियां उड़ाने का बचकाना प्रयास किया है उसे सफल नहीं होने दूंगा।

    1. विदांत ही एकता और समता को स्थापित कर सकता है कैसे? पहली बार समत्व मैं गड़बड़ तब हुई जब शुद्ध चैतन्य आत्मा मैं भ्रान्ति हुई कि मैं कुछ हूँ। यानि मैं कुछ अलग हूँ। जब "मैं" बना तो "यह(मुझसे प्रथक)" भी बनालिया। आत्मा को जैसे ही भुलाया फिर तो मैं, मेरा और यह तीन चीज़े खड़ी हो गयी। फिर प्रारम्भ हुआ असमानता का खेल। फिर से आत्मा को जान लेने से यह तीनो ही एक साथ धरासाही हो जायेगा।

    2. लेखक ने कहा " एक तरफ आत्मा का सिद्धांत सिखाते हैं और दुसरी तरफ कहते हैं की मैं मेरा से मुक्ति ही मोक्ष है।" जी हां मैं मेरा से मुक्ति ही मोक्ष है। मैं और मेरा का भाव अनात्मा का है, आत्मा का नहीं। इसीलिए आत्मा का सिद्धांत सिखाना और मैं मेरा से मुक्ति एक ही बात है जबकि लेखक को लग रहा है की ये विरोधाभासी हैं।

    3. शब्दों मैं ना उलझे उपनिषदों मैं आता है कि " मैं को जानना है और मैं को ही मिटाना है।" जब मैं को मिटाने की बात कही जाती है तो मतलब उस सीमित मैं को मिटाना है जो शरीर को निरपेक्ष सत्य मान कर है, जिसे अहंकार भी कहा जाता है उसे मिटाना है। और जब मैं को जानने की बात कही जाती है तो उस असीमित मैं को जानना है जो आत्मा से होकर है। हम सब शरीरों की एक ही आत्मा है ऐसा जानने पर जो सीमित मैं है या जो अहंकार है वह गिर जाता है।

    4. आगे लेखक ने कहा है की "या तो आत्मा सिखाओ या निर्वाण (मोक्ष)।" आत्मा को भूले हो इसलिए आत्मा सिखाते हैं। आत्मा को जानते ही मोक्ष की प्राप्ति हो जायेगी इसलिए निर्वाण की बात करते है। आत्मा और निर्वाण एक ही हैं अलग नहीं। जैसे की मुझे किसी चीज की विस्मर्ति हो गयी हो तो जिसकी विस्मर्ति हुई है उसकी भी बात करनी पड़ती है और स्मृति कैसे होगी उसकी भी।

    5. लेखक को भ्रम है की अहम् को त्यागने पर तो आत्मा का त्याग हो जायेगा। आत्मा को त्यागना नहीं है आत्मा को जानना है और अहम् को यानि मैं मात्र शरीर हूँ इसको त्यागना।

    गीता मैं कृष्णा कहते हैं की है अर्जुन तू आत्मावान हो जा। आत्मावान होने पर तू समत्व बुद्धि मैं स्तापित हो जायेगा।

    6. लेखक कहता है की पुनर्जन्म की बात करने पर स्वार्थी हो जाएंगे। मुझे लगता है की आत्मा और पुनर्जन्म की बात करने पर निश्वार्थी और आशावादी हो जायेंगे????

    7. लेखक को थोड़े सही जे कृष्णमूर्ती लगे क्योंकि वे थोड़ा उलझा कर बोलते हैं। कुछ भी पल्ले नहीं पड़ने देते हैं। जब उन्हें समझोगे तो पाओगे की कृष्णामूर्ति भी आत्मा को मानते हैं हालांकि सीधे आत्मा शब्द का प्रयोग नहीं करते है।

    एक बार स्वामी शर्णानदजी और कृष्णामूर्ति जी की चर्चा के कुछ अंश यहाँ पर रखता हूँ। कृष्णमूतिजी नकारत्मक्ता मैं ही बोलते हैं - यह भी नहीं, यह भी नहीं है, इस तरीके से वह बताते हैं की क्या है। यह उपनिषद् की भी शैली है। खैर इसपर शरणानन्दजी ने कहा तो क्या आप अभाव को मानते हैं। इसपर कृष्णमूर्ति बोले नहीं नहीं लाइफ है लाइफ। तो शरनान्दजी ने कहा जिसको आप लाइफ कहते हैं, मैं आस्तिक उसे ईश्वर कह दूँ तो आपको कोई समस्या है क्या? और कोई अध्यात्मवादी उसे आत्मा या ब्रह्म कहदे तो कोई समस्या है क्या? कृष्णमूर्ति के पास इसका कोई जबाब नहीं था।

    8. लिंग, जाति भेद ये मानव के स्वभाव ही हैं। किस देश के मानवों मैं भेद नहीं है कहीं जाति का कहीं अमीर गरीब और कहीं काला गोरा। जाति रंग भेद और अमीर गरीब ये सब भेद अपने आप को शरीर मानने से होते है। शरीर से ऊपर हम सब आत्मा ही हैं अतः आत्मा को जानने से ये भेद मिट जाते हैं। आत्मावान होना ही समत्व की प्राप्ति का एक मात्र उपाए है।

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  26. 9. वेदांत का ब्रह्म, कृष्णामूर्ति की life, बुद्ध का निर्वाण ( दुखों का नितांत अभाव), आस्तिक का ईश्वर, अध्यात्मवादी की आत्मा और भौतिकवादी का संसार - ये सब एक ही चीज हैं।

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  27. आश्चर्य है की जो नहीं जानते हैं वे लेख लिख रहे हैं और यहाँ ताली बजने वाले भी हैं। ना तो लेखक को और नहीं ताली बजने वालों को वेदांत या भारतीय दर्शन समझ मैं आया है। सच बताऊँ तो कौन किसलिए ताली बजा रहा है ताली बजाने वाले को या लिखने वाले को यह पता भी नहीं होता है। कोई इसीलिये ताली बजा रहा है की वह रविशंकर या ओशो के खिलाफ है। कोई इसलिए की भारतीय संस्कृति के खिलाफ है। कोई इसलिए लिख रहा है की बस लिखना है। सत्य से इनका कोई लेना देना नहीं। कोई कम्युनिस्ट है तो उसे तो बस संस्कृति का विरोध ही करना है, यही उसका जीवन हो गया है। लेखक जो कम्युनिस्ट लगता है सच मानियों तो सही मायने मैं कम्युनिज्म को भी नहीं समझ पाया है। आईये सच्चे कम्युनिज्म को समझते हैं।

    मैं एक सच्चा कम्युनिस्ट विचार धारा वाला था। ध्यान रहे कट्टर नहीं सच्चा कम्युनिस्ट। समाजवाद समता समानता और समत्व बहुत सही लगता था। लेकिन प्रश्न था की यह प्राप्त कैसे होगा। क्या कानून से? क़ानून से तो बस किये हुए कर्मों को ही रोका जा सकता। जो मन मैं विचारों मैं जो विषमता है वह कैसे मिटेगी? विचारों तक की समानता आवश्यक थी क्योंकि विचार ही तो आखिर कर्म बनते हैं। फिर मैं भगवद्गीता के परिचय मैं आया। मैंने देखा जो हम कम्युनिस्ट चाहते हैं समता समत्व इसमें इसी सब की बात है। कृष्णा चिल्ला चिल्ला कर पूरी गीता मैं बार कहते हैं कि है अर्जुन तू सम बुद्धि का हो जा, जो समत्व मैं स्तापित हो। जो यह भेद करने वाली बुद्धि को छोड़ और सब को एक कर के देख। अर्जुन कहते हैं कैसे भगवान् कहते हैं तू आत्मावान हो जा। हम सब मैं एक ही आत्मा वास करती है इसे जानकार तेरी बुद्धि समत्व मैं स्तापित हो जायेगी। समत्व को यहां तक ले गए की तू मैं और मेरा को छोड़ कर बस और केवल सत्य को ही देख उसीका अन्वेषण कर।

    अतः मित्रों अगर आप सच्चे कम्युनिस्ट हैं तो समानता की स्थापना के लिए क्रांति से कानून बदलिये और भगवद् गीत को अपना ग्रथ बनाइये। लेकिन आश्चर्य है की सभी कम्युनिस्ट भगवद्गीता जैसे ग्रन्थ के घोर विरोधी हैं। भगवद् गीत तो कम्युनिस्टों का सबसे बड़ा ग्रथ है ऐसा कमनिस्ट ग्रन्थ आज तक धरती पर नहीं लिखा गया। यह न व्यक्ति को मानता है और न ही राष्ट्र नहीं मैं मेरा को। यह तो मात्र और मात्र सत्य का पुजारी होने की बात करता। और कौन नहीं जानता है की सत्य समता मैं स्तापित करता है। जय लाल सलाम।

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