परख : कैनवास पर प्रेम (उपन्यास) : विमलेश त्रिपाठी

Posted by arun dev on अगस्त 26, 2015


















पुस्तक समीक्षा
मद्धिम पीड़ा की आंच पर पके प्रेम का रोचक आख्यान                           
डॉ. राकेश कुमार सिंह


पीड़ा जैसा भाव चाहे जिस स्रोत से अपना आकार ग्रहण करे उससे पड़ने वाला प्रभाव उससे जुड़े स्रोतगत संदर्भों में संलिप्त रहने वाले व्यक्ति की अनुभव क्षमता के अनुरूप पड़ता है. कुछ ऐसा ही विमलेश त्रिपाठी के उपन्यास कैनवास पर प्रेम को पढ़ने के दौरान महसूस होता है. यह उपन्यास अपने अंदर एक चिर-परिचित विषय लिये हुए हैं; जिसे हम प्रेम के नाम से जानते हैं. प्रेम की पीड़ा में डूबते-उतराते कथा चरित्रों और खुद कथाकार का जीवन जिन जीवनगत सदर्भों से जुड़ा हुआ है; वो भी काफी हद तक जाने-पहचाने से हैं. चूंकि इनके जीवनगत संदर्भ अलग-अलग हैं; (कुछ एक मामलों में समान होते हुए भी) इस वजह से इनकी प्रेमगत पीड़ा का स्वरूप भी अलग-अलग होगा; चाहे वो कथानायक सत्यदेव शर्मा के प्रेम की पीड़ा हो या उसके दोस्त सैफू की पीड़ा, उनकी प्रेमिकाएं मयना, रिंकी सेन की पीड़ा हो या खुद कथाकार की.

इस प्रकार के खाए, पिए और पचाए विषय के वावजूद भी, ध्यान देने वाली बात यह है कि यह उपन्यास पाठक को रीडिंग सीट को बिना एक बार में पढ़े छोड़ने की इजाजत नहीं देगा. इस अध्ययनगत अनुभव को मैंने काफी सजींदगी के साथ महसूस किया है और इसकी वजह भी जो मेरे मस्तिष्क में स्पष्ट आकार ग्रहण करती है; वह है- विषय का रोचक प्रस्तुतीकरण. विषय का प्रस्तुतीकरण तभी रोचक और सशक्त होगा जब रचनाकार के पास अनूठा शिल्प रचने की क्षमता हो.

उपन्यास को टुकड़े-टुकड़े में मुख्य रूप से सत्यदेव शर्मा और कथाकार के निजी जीवन की सर्जनात्मक दास्तान के रूप में देखा जा सकता है. कथाकार द्वारा इस उपन्यास में कथागत चरित्रों के समानान्तर अपनी निजी दास्ता को रोचक तरीके से बयान करना ही उपन्यास के विशिष्ट और अनूठे शिल्प के एक महत्वपूर्ण आयाम के तौर पर देखा जा सकता है.

उपन्यासकार जब भी अपनी मुख्य कथा की तरफ मुड़ता है या उससे निकलकर अपने निजी जीवन कथा की तरफ मुड़ता है उस कथागत मोड पर एक जिंदगी से दूसरी जिंदगी में प्रवेश की प्रक्रिया पूर्व दीप्ति (फ्लैश बैक) प्रक्रिया के तहत निर्मित होती है. इस शिल्पगत प्रक्रिया को कथाकार ने काफी रोचक और अनूठे ढंग से अंजाम दिया है. मेरी दृष्टि में यह शिल्पगत प्रक्रिया पाठक के अंदर मार्मिक तनाव में तब्दील होने की पर्याप्त क्षमता रखती है; और यह मार्मिक तनाव पाठक को कथा में इनवाल्व करने की दृष्टि से काफी नजर आता है.

अगर ध्यान से देखा जाए तो उपन्यासकार अपने निजी वृत्तांत में भी उपन्यास की मूल कथा की संवेदना को समाहित किए हुए हैं. उपन्यास के अंदर ही कथाकार एक सहयोगी के रूप में इस बात का स्पष्ट संकेत  करता दिखाई देता है – मैं डर के बारे में सोचना बंद कर देता हूं. जब डर लगे तो डर के बारे में सोचना बंद कर दो. किसी कविता के बारे में सोचो या किसी कहानी के पात्र के बारे में, बहुत समय पहले की कहीं पढ़ी हुई यह बात याद आ जाती है. मुझे लगता है कि कोई है जो मेरे साथ चल रहा है मेरी हर गतिविधि को ध्यान से देखता हुआ.(पृ.24)
उपन्यासकार उपरोक्त तरह के बहुत सारे स्पष्ट संकेत निर्मित करता चलता है, जिनसे उपन्यास की रचनात्मकता को समझा जा सकता है. ये रचनात्मक संकेत कथा की रोचकता बढ़ाने के साथ-साथ इसके प्रवाह को संतुलित गति देते हैं. इन्हें रचनात्मकता के अनूठे प्रयोग के तौर पर देखा जा सकता है. इन अनूठे रचनात्मक शिल्पगता प्रयोगों में से एक है – महत्वपूर्ण गजलों गीतों और कविताओं का उपन्यास में मौलिक प्रयोग. उपन्यास में जगह-जगह हुए इस तरह के मौलिक प्रयोग उसे रोचक बनाने के साथ-साथ कथा की मूल प्रवृत्ति को सुरक्षित रखते हुए उसे विस्तार देते हैं. उदाहरण के तौर पर एक महत्वपूर्ण गजल की पंक्तियों के मौलिक प्रयोग को कथा के ढांचे को विस्तार देने के क्रम में देखा जा सकता है – तुम्हें याद हो कि न याद हो –/गा रही है आबिदा परवीन/ इतिहास से आती हुई उसकी आवाज/ वर्तमान को छेदती लगातार गूंज रही है/ मरे हुए समय में/ सिरफ गीत ही जिन्दा लगते हैं/ मुझे क्यों बार-बार सुनाई पड़ता है वह रुदन/ जो मेरे दोस्त की आखिरी चिट्ठी में दर्ज थे/ क्यों याद आता है/ उस रात के बाद का मौन/ जब उसके शब्द चुक गये थे/ खड़े थे पराजित मेरे सामने शर्मसार/ ओ जो हममें-तुममें करार था-/ गा रही है आबिदा परवीना....2 (पृ.14) जानी मानी गजल की इन पंक्तियों को कथा के मूल सदंर्भ से जोड़ते हुए इस तरह से मौलिक काव्यात्मक विस्तार देना कथाकार की रचनात्मक क्षमता को उजागर करता है. यह काव्यात्मक विस्तार कथा के अंदर के महत्वपूर्ण तथ्यों और उनसे जुड़े मार्मिक तनावों की तरफ संकेत करता है. इस प्रकार का शिल्पगत प्रयोग उपन्यास की कथा में कई महत्वपूर्ण मोड़ों पर किया गया है. 

इस उपन्यास में काव्यात्मकता यहीं तक सीमित नहीं बल्कि यह समग्र उपन्यास की काव्य भाषा के स्वभाव और स्वरूप में संलिप्त नजर आती है. एक प्रकार से यह पूरे उपन्यास की अहम विशिष्टता है. इससे उपन्यास इस तर्क पर भी खरा उतरता है कि कविता गद्य की कसौटी होती है. एक प्रकार से उपन्यासकार ने अपने समग्र औपन्यासिक गद्य में काव्य की रंगत मिलाकर अपनी कथा संरचना को सार्थकता प्रदान की है. चूंकि इस उपन्यास के केंद्र में एक चित्रकार के प्रेम को विषय बनाया गया है; जिसके जीवन के विविध रंगों को कथा के कैनवास पर उतारना बिना इस किस्म की भाषा के संभव नहीं है. भाषा को उपन्यासकार ने सिर्फ कोरे माध्यम के रूप में नहीं बल्कि विषय में निहित उद्देश्य की पूर्ति के रूप में इस्तेमाल किया है. उदाहरण के तौर पर इस पूरे उपन्यास को देखा जा सकता है; जिसकी कथा-भाषा प्रेम की मद्धिम पीड़ा को अपने अंदर काव्यात्मकता के साथ समाहित किये हुए हैं. फिर भी अपने तर्क की पुष्टि के लिए एक उदाहरण देना जरूरी समझता हूं. कथा के इस अंश  को देखिए-एक तितली अकेली उड़ती थक गयी है. एक हाथ अकेले हिलते-हिलते थक गये हैं. एक सांस रुक-रुक कर चलना शुरू करती है. खेत में सरसों के सारे फूल गुम हो गये हैं. चांपा नल में पानी नहीं आता. झोले से लेमनचूस गायब हो जाते हैं. पहाड़े की जगह कानों में एक धुन बजती है,जिसका अर्थ समझ में नहीं आता. एक चिड़िया आकर पेड़ पर बैठती है और एक हूक जैसी अवाज निकालती फूर्र हो जाती है. काजल के रंग काले नहीं, पता नहीं उनका रंग कैसा हो गया है. सपने में घोड़े पर सवार एक राजकुमार आता है, जिसके पीछे बहुत सारे मुखालिफ हैं. मैं उसे बचाने दौड़ती हूं कि सब अचानक गायब हो जाते हैं. मुझे लगता है कि मुझे एक पिंजरे में कैद कर दिया गया है. वह पिंजरा एक अंधेरे कुंए के भीतर पाताल में है, जहां से मेरी आवाजें बाहर की दुनिया को सुनाई नहीं पड़ती. मैं मौन हूं. मेरे शब्द गुम गए हैं. क्या तुम मुझे मेरे शब्द वापस करने आओगे ?. (पृ.42) मयना के खत में प्रेम की पीड़ा को बयान करती इन पंक्तियों में काव्यात्मकता का रंग गाढ़े रूप से उभरा है. इसमें उसकी बिखरी उम्मीदों को कथाकार ने गहन काव्य संवेदना युक्त है. कथा भाषा में तराश कर कथा के कैनवास पर चित्रित किया है.

इस उपन्यास की संरचना बहुत कुछ मुक्तिबोध के एक साहित्यिक की डायरी की याद दिलाती है. हालांकि विधा और विचार के स्तर पर इन दोनों में पर्याप्त अंतर है. लेकिन शिल्प के स्तर पर काफी कुछ मिलता जुलता है. वहां मुक्तिबोध अपने मैं को अपने दोस्त का सहयात्री बनाकर संवाद करते हैं; यहां उपन्यासकार अपने अंदर के लेखक को कथानायक का सहयात्री बनाकर संवाद करता है. इस उपन्यास की समग्र संरचना मेरी दृष्टि में इन संदर्भों के आधार पर काफी सशक्त बन पड़ी है; जिसमें सत्यदेव शर्मा का प्रेम मद्धिम पीड़ा की धीमी आंच पर पकता दिखाई देता है. जिसका आस्वाद इस उपन्यास का अध्ययन करके ही लिया जा सकता है.  
__________________________________________________________________
 डॉ. राकेश कुमार सिंह
हिंदी विभाग, केरल केंद्रीय विश्वविद्यालय/कासरगोड, केरल
singhhcu@gmail.com