सहजि सहजि गुन रमैं : अविनाश मिश्र


पेंटिंग : Tyeb Mehta
AND BEHIND ME DESOLATION


अविनाश मिश्र अपने पद्य और गद्य दोनों से लगातार ध्यान खींच रहे हैं. उनके लिखे की प्रतीक्षा रहती है. उनकी भाषा में बिलकुल समकालीन ताजगी है. भारतीय काव्य-परम्परा में नायक – नायिकाओं के अनेक भेद निर्धारित हैं. नायिकाओं के वर्गीकरण में वय और रूप पर अधिक बल है. हिंदी का यह युवा कवि अपनी परम्परा में समावेश करता हुआ एक ऐसे वर्गीकरण पर पहुंचता है जो सोच और बर्ताव पर आधारित है. जहाँ ‘देह पर नाखूनों और दांतों के दाग’ के अनेक निशान हैं. पर ये कवितायेँ एकतरफा बचाव नहीं करतीं. इनमें हमारे जीवन की ही तरह तमाम विवादी स्वर हैं. अगर ये कविताएँ राजनीतिक रूप से सही नहीं लगीं तो यह सहज संभाव्य है.   



कवितायेँ  
दस उच्छ् वास                       
अविनाश मिश्र




।। असूर्यम्पश्या ।।
जन्म : 1960

प्रतिस्पर्द्धा को तुमने पराजित किया
लेकिन प्रतिभा से नहीं
तुम्हारी कविता से ज्यादा प्रासंगिक था स्वर तुम्हारा
तुम्हारी देह में पौरुष था और तुम्हारे विचारों में भी
तुम स्त्री नहीं लगती थीं
तुम कवयित्री नहीं लगती थीं 
***




।। प्रगल्भा ।।
जन्म : 1970

तुममें बसना प्रचलित में बसना था
प्रचलित था पाखंड  
प्रचलित था अहंकार
प्रचलित था द्वेष
प्रचलित था छल
तुमसे बचना प्रचलित से बचना था
***





।। क्षमाशीला ।।
जन्म : 1980

तुम्हारे व्यक्तित्व के आगे निष्प्रभ थी तुम्हारी कविता
तुम कवयित्री नहीं देवी थीं
प्रेम को नहीं पूजन  को उत्तेजित करती हुईं 
जिन्होंने तुम्हें मैला किया
डाल दिया अपना सारा कलुष तुम पर
अपनी कल्पनाओं में नाखूनों और दांतों के दाग छोड़े तुम्हारी देह पर
तुमने उन्हें क्षमा किया यथार्थ में 
तुम पृथ्वी थीं
***





।। लज्जाप्रिया ।।
जन्म : 1985

जब-जब तुमसे मांगी गई कविता
तुम्हें लाज आई
जैसे तुम्हारी देह तुमसे मांगी जा रही हो
तुम्हारा मानना था एक स्त्री के लिए उसकी कविता
उसकी देह जैसी होती है
एक बार अगर दे दी तो अपनी नहीं रहती
***






।। आक्रामिका ।।
जन्म : 1990

तुम्हारी कविता पढ़कर लगता था
तुम चाहती हो काटना किसी पुरुष के होंठ
और प्रतिकार में चाहती हो अपने स्तनों पर दंतक्षत
***





।। रूपगर्विता ।।
जन्म : 1992

सब तुम्हारी कविता से प्रेम करते थे
एक भी आस्वादक था यूं 
जिसने तुम्हें महान माना हो
एक भाषा की समग्र समालोचना नतमस्तक थी
तुम्हारी कविताओं के आगे 
लेकिन तुम्हें आलोचक नहीं आईने पसंद थे
***





।। अभिसारिका ।।
जन्म : 1994

तुम्हारी कविता पढ़कर तुम्हारी कामना उठती थी
हृदय स्पर्श को व्याकुल होता था
लेकिन तुम्हारा संसार इन कामनाओं के बाहर था
उतना ही अंतर्मुख जितना सम्मुख 
तुम जिससे वादा करती थीं
उससे नहीं मिलती थीं
***





।। मानवती ।।
जन्म : 1996

तुम्हारी कविता को मनाना पड़ता था
तब वह सुंदर लगती थी
वह शिल्प नहीं था उसका
कि रूठती तो सुंदर लगती
***





।। समर्पिता ।।
जन्म : 1998

अनुभव की असमृद्धता ने तुम्हें समर्पण में दक्ष किया 
रुक जातीं कुछ वर्ष और तो कविता में दक्ष होतीं
*** 
फोटो : Sushil Krishnet
   




।। निर्लज्जप्रिया ।।
जन्म : 2000

तुमसे मिलकर भीतर कुछ खिलता था
बाहर फैलता था अपवाद...
***


___________________
परिचय :
युवा कवि-आलोचक. प्रतिष्ठित प्रकाशन माध्यमों पर रचनाएं प्रकाशित और चर्चित.
न कोई किताब, न कोई पुरस्कार. 'पाखी' में कार्यरत.
darasaldelhi@gmail.com
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कुछ कविताएँ यहाँ  पढ़ें और  आलेख भी.

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  1. स्तियों के मनोजगत का क्रूर विश्लेषण और विभाजन पुरुष की अपनी चिंता और राजनीति रही. स्त्री मनुष्य इकाई है. शिल्प और रूप में कविताएं पुरुष क्षेत्र की परिव्याप्ति हैं. परम्परा को पकड़ने की नवीनता और उत्साह है पर स्त्री का मनोजगत तयशुदा खांचे में जैसे एक रूढ़ी हो. रूप खींचता है पर कथ्य रूप से अलहदा हो गया है. समालोचन शुक्रिया. अविनाश को बधाई.

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  2. Aparajita Sharma28/3/15, 9:01 am

    अरुण जी आपने मेरे लिए फेसबुक को बुक में तब्दील कर दिया और इसके लिए आपका बहुत शुक्रिया।आप जिन कविताओं का चयन करते हैं उनको पाने की तलब होती है।समालोचन पर कविता मतलब कविता है।
    अविनाश जी बधाई। उनके शब्द और लय में गजब की कसावट है। नए अर्थों को इसी तरह गढ़ते गढ़ते उन्होंने भाषा को थोड़ी और धार दी है।

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  3. बहुत ठहर का पढ़ रहा हूं। जन्मवर्ष के उल्लेख वहीं जकड़ लेते हैं। वे उल्लेख कविता में शामिल हैं। इस मुहावरे को पढ़ना हमें सीखना होगा, कुछ कुछ वैसे ही, जैसे देवीप्रसाद मिश्र की कविता के लिए सीखना पड़ा था।

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  4. अच्छी कवितायें और स्वीकारोक्ति, अब नए स्वरुप में नया रचो और फिर से अपना नया जीवन शुरू करो........प्रेम में पगा आदमी सच में रचनात्मक हो जाता है, निंदा पुराण छोड़कर सृजनरत रहो भाई हिन्दी में अच्छे लोगों की जरुरत है और अपना परिचय लिखने का स्टाईल भे बदलो, तुम्हे पुरूस्कार से क्या? सब माया है और क्या इस पुरुस्कार की राजनीती से हम सब वाकिफ नहीं है.......

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  5. Ekdm moulik aur prabhavi... Tumhe aalochak nhi aayine pasnd the...yahi to ho raha hai aaj... Avinaash Mishra jee aapko haardik badhai! Samalochan ko aapka aur hme Samalochan ka dhanyavaadi hona chahiye. Aabhaar!

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  6. Ashutosh Dubey28/3/15, 5:29 pm

    आइने पसन्द करने वाले दरअसल आईने नहीं, अपना प्रतिबिम्ब देखना पसन्द करते हैं, जैसा वह उन्हें दिखाई देता है.'रुपगर्विता' भी इसी अर्थ में आईनों को आलोचकों पर तरजीह देगी शायद.

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  7. बिलकुल अलग तेवर की कविताएँ

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  8. अविनाश को मैंने अक्सर मज़ाक में कई बार 'सेक्सिस्ट' कहा है. इस मज़ाक का मज़ा यह होता है कि मज़ा वहीं मर जाता है. आपसी आत्मीय याराना बातचीत का कोई प्रमाण न दिया जा सकता है, न मैं दूंगा. लेकिन ये कविताएं बहुत कुछ प्रमाण की तरह सामने आती हैं. प्रमाण कि अविनाश कवि है और प्रमाण कि उसका वैयक्तिक वजूद भी कवि का ही है. उसमें से मनुष्य बहुत बाद में कहीं अकेले में रोते हुए भरा हुआ निकलता मिलता है.

    एक दोस्त से कुछेक रोज़ पहले मैंने कहा था, 'कविताएं अच्छी नहीं, सच्ची होनी चाहिए...अच्छी हो ही जाएगी.' इतने सपाट कथन की वक़ालत नहीं करूंगा, लेकिन अविनाश की ये (और बहुत सारी) कविताएं सचाई के बीच से हथौड़ी चलाते निकल रही हैं. आत्मकथ्य हैं ये. कहां है आप कि आपका प्रेम बस व्याकरण के गिजगिजाहट में बसा है, वह आत्मस्वीकारोक्ति कहां है, कहां है खांटी वनसाइडेड 'फेमिनिज़्म'....ढूंढना ज़रूरी है. आत्मा बहुत काली है, यदि आप अभी तक अपने प्रेम के ख़राब पहलुओं को नकारते आ रहे हैं.

    ये कविताएं प्रेम और अफेक्शन की वैकल्पिक लेकिन ज़्यादा मौजूं सचाईयां हैं.

    सब लिखे का हिसाब इन कविताओं में, अविनाश...मेरा शुक्रिया क़ुबूल करना.

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  9. बहुत अच्छी कविताऎ। अविनाश ने बांदा में जो कविताऎ पढी थी उससे यह स्वर बहुत अलग है मगर बहुत सुखद । लग रहा है जैसे आत्म चिंतन के दौर से गुजर रहा हो। कवि को इस तरह के संघर्ष मे शरीक होना चाहिए। जो कविता में नए प्रयोग करते है ,अच्छे लगते है। ये कविताऎ परिणाम नहीं ,बदलाव के सुखद संकेत है।

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  10. समालोचन को धन्यवाद।

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  11. नूतन डिमरी गैरोला29/3/15, 8:08 am

    कवि स्त्री और उसके लेखन को नजदीकी से पढता समझता हुआ खुद को दूर रखते हुए विश्लेष्ण करता है स्त्री का और कविता का ... हालाँकि यह एकतरफा संवाद है स्त्री मन की थाह नहीं पर ये पुरुष का नजरिया है जो अपने में बहुत जुदा है यहाँ जन्मवर्ष के साथ और शीर्षक भी कविता में एक दम नयापन भर रहा है ... बेहतरीन कवितायें और बहुत खूब सुन्दर प्रयोग ... इस नयेपन से भरी कविताओं के लिए शुक्रिया समालोचन अविनाश जी की इन कविताओं तक पहुंचाया

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  12. Arun Sheetansh29/3/15, 8:09 am

    अपनी पीढ़ी में श्रेष्ठ कवि अविनाश बने हुए हैं .ग़ज़ब की ताजगी भरी कविताएँ हैं .कोई भी नया कवि आता है तो नया लेकर १९८० में जन्मे जितने भी कवि हैं .दावे के साथ कह सकता हूँ कि आनेवाली जनता के धरोहर होगे.
    अपनी कल्पनाओं में नाखूनों और दांतों के दाग छोड़े
    तुम्हारी देह पर...
    बधाई

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  13. अविनाश की कविताएं आकर्षित करती हैं. उन्हें बधाई.

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  14. भाई अविनाश तुम्हारी कविताएं हमेशा ही आकर्षित करतीं हैं। न केवल पाठ में बल्कि फार्म में भी। इसबार वर्ष का उल्लेख काविताओं को खिला आकाश दे रहा है, और पाठकों को भी। अब आप में जितनी समझ और जानकारी है। उसके अनुसार इन कविताओं से ऊर्जा लीजिए और उड़ान भरिए। बहुत बधाई। अरूण भाई आपने इस बाजारू तंत्र को सचमुच संग्रहणीय बना दिया है।

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