निज घर : गीत चतुर्वेदी

Posted by arun dev on जुलाई 02, 2014





























कलाएं सहोदर हैं, कविता की बातें संगीत और चित्रकला तक जाती हैं. नृत्य और नाट्य ललित कलाओं को साथ लेकर चलते है. गीत चतुर्वेदी का गद्य उनकी कविताओं की तरह मोहक होता है. इस आलेख में गीत ने अपनी कविताओं की सर्जना पर लिखा है.
प्रवाह   का   माहात्म्य   बाधाओं   से   है
(चित्रकला का मेरे लेखन पर प्रभाव : कुछ चिल्लर बातें)


गीत चतुर्वेदी

यह अभी तक रहस्य है कि सृष्टि की शुरुआत कहां से हुई. सबसे पहले कोई तारा टूटा था या कुछ बड़े ग्रह आपस में टकरा गए थे. यह पूरी दुनिया ईश्वर की सांस है या यह ब्रह्मांड दरअसल ईश्वर का खुला हुआ मुंह है? संभव है कि यह पूरा संसार किसी प्राचीन नास्तिक की शरारत हो और जल्दबाज़ी में वह यह बताना भूल गया हो कि उसने दरअसल यह सबकुछ शरारत में कर दिया था और इसीलिए कृपया उसकी शरारत यानी इस संसार को गंभीरता से न लिया जाए. सही-सही तो वही बता सकता है, जिसने इस सृष्टि को बनते हुए देखा हो.
मद्रिद के राष्ट्रीय संग्रहालय में गेर्निका के सामने खड़े होकर ठीक यही सवाल किया जा सकता है - पिकासो ने इस पेंटिंग को बनाने की शुरुआत किस बिंदु से की थी? उन्होंने पहली रेखा कौन-सी खींची थी और पहला रंग कौन-सा चलाया था?
पिकासो को छोड़ देते हैं. एक साधारण दर्शक की तरह ख़ुद से ही यह सवाल करते हैं - मैं आखि़र इस पेंटिंग को किस बिंदु से देखना शुरू करूं? अगर इस पेंटिंग की चौड़ाई मेरी दृष्टि की यात्रा है, तो मैं इस यात्रा का प्रस्थान-बिंदु कहां से मानूं?
यह सवाल हम किसी भी पेंटिंग, किसी भी चित्र के सामने खड़े होकर कर सकते हैं. वॉन गॉग का पीला कमरा कहां से शुरू होता है? रेम्ब्रां की शीबा अगर नहाने बैठी है, तो उसकी अनावृत्त देह का कौन-सा अंग इस शिलापट पर सबसे पहले बैठा था? और नीचे बैठा यह जो पुरुष उसके दाहिने पैर का नाख़ून पोंछ रहा है, क्या उसने उसके बाएं पैर का नाख़ून पहले ही पोंछ दिया है या थोड़ी देर बाद पोंछेगा? वर्मीर की नन्ही लड़की ने पहले कान की बालियां पहनी थीं या पहले माथे पर साफा बांधा था? दाली की घडिय़ां पहले पिघलती हैं कि पहले सूखती हैं?
यक़ीनन, इनमें से किसी भी सवाल का जवाब नहीं है.
इसी सवाल को मैं अब दूसरी विधाओं की तरफ़ ले जाता हूं.
रस्कोलनिकोव पहले हत्या करता है, या पहले प्रायश्चित करता है? मुझे पता है, वह पहले हत्या करता है. प्रायश्चित तो पुस्तक के अंत की ओर बढ़ते हुए मिलता है. दोस्तोएवस्की ने उससे पहले क्या करवाया था? पहले वह बूढ़ी स्त्री के प्रति नफ़रत से भरता है या सोनिया को अपनी प्रतीक्षा करता हुआ पाता है? यक़ीनन, सोनिया उसकी प्रतीक्षा तो जेल से छूटने के बाद करती है. पर दोस्तोएवस्की ने पहले किस दृश्य की रचना की थी?
इससे कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता कि दोस्तोएवस्की ने पहले किस दृश्य की रचना की थी. उन्होंने अपनी कृति में पहले किस दृश्य को जगह दी, यह महत्वपूर्ण है.
मोत्सार्ट ने अपनी कुछ सिंफनी के प्रील्यूड भले बाद में लिखे थे, लेकिन शुरुआत में उन्होंने प्रील्यूड ही रखा. इस तरह मुझे पता है कि सिंफनी की शुरुआत प्रील्यूड से ही होगी.
जब मैं पाठक या श्रोता की तरह साहित्य या संगीत की रचनाओं को पढ़ता-सुनता हूं, तो मुझे पता होता है कि उनकी शुरुआत एक निश्चित बिंदु से होती है और वे एक निश्चित बिंदु पर जाकर समाप्त हो जाती हैं. यह कला की एक एकरैखीय यात्रा है, जिसके निरूपण में उसके भौतिक प्रारूप का अहम योगदान होता है. यह भौतिक एकरैखीयता आपको अवश्य मिलेगी, भले रचनाकार ने अपनी शैलीगत बहुरैखीयता से अपनी कृति को बाक़ी अन्य कृतियों से विलगा दिया हो.
लेकिन चित्रों में हमें भौतिक एकरैखीयता के दर्शन कभी नहीं होते. वे कहां से शुरू होते हैं, कहां ख़त्म होते हैं, उन्हें किस बिंदु से देखना शुरू करना चाहिए, और किस बिंदु पर देखना ख़त्म हो जाना चाहिए, यह चारों चीज़ें हम कभी तय नहीं कर सकते. यह हर रचनाकार के हिसाब से अलग होंगी और हर दर्शक के हिसाब से भी अलग. गेर्निका को आप बाएं से देखना भी शुरू कर सकते हैं और दाएं से भी. हो सकता है कि पिकासो ने सबसे पहले आंख बनाई हो, उसके बाद बैल बनाया हो या जो भी सबसे पहले बनाया हो, उसे काला रंग फैलाकर छुपा दिया हो? वह हम सबको दिखता ही नहीं.
ठीक यही स्थिति जीवन और सृष्टि के साथ है.
कहां से शुरू हुई? नहीं पता.
कहां जाकर ख़त्म होगी? नहीं पता.
कभी शुरू भी हुई थी? नहीं पता.
कभी ख़त्म भी होगी? नहीं पता.
मैं कहां से जीना शुरू करूं? जिस समय मैं पैदा हुआ, वहां से जीना शुरू करूं? या महाभारत के रूप में मैंने एक बेहद पुरानी किताब पढ़ रखी है और वह किताब भी अब मेरे जीवनानुभव का हिस्‍सा बन चुकी है, तो उस किताब के लिखे जाने के समय से जीना शुरू करूं? जिस तरह चित्र का कोई आदि नहीं, अंत नहीं, उसी तरह इस जीवन का भी. उसी तरह सृष्टि का भी.
तमाम रहस्यों से भरी हुई इस सृष्टि और तमाम रहस्यों की ओर इशारा करने वाली चित्रकला को जोडऩे वाले दो सवाल और पूछे जा सकते हैं -
मैं इसे कहां से देखना शुरू करूं? जहां से आपकी मर्ज़ी हो.
मैं इसका क्या अर्थ निकालूं? जो आपकी समझ में आ जाए.
यही कारण है कि मोनालिसा की मुस्कान आज तक अपरिभाषेय है. यही कारण है कि गेर्निका की व्याख्याएं आज तक होती हैं, और किसी को भी अंतिम नहीं माना जा सकता. 'रिज़रेक्शन ऑफ लैज़ारस' में वॉन गॉग क्यों आखि़र अपना ही चेहरा बना देता है, इसके दस से ज़्यादा कारण कलाविद् गिना चुके हैं.
यही कारण है कि शंकर के लिए यह जगत एक मिथ्या है, जबकि बुद्ध के लिए इस संसार से बाहर कुछ भी नहीं है. नीत्शे चीख़-चीख़कर कहता है कि ईश्वर मर चुका है, जबकि ईश्वर के नाम पर आए रोज़ दंगे होते हैं.
जैसे हर कलाविद् चित्रों का अपना पाठ करता है, वैसे ही हर चिंतक सृष्टि का अपना पाठ करता है. उसके बाद भी चित्र इतने रहस्यमयी होते हैं कि किसी एक पाठ में समा जाने से बरज़ोरी बच निकलते हैं. इसके बाद भी सृष्टि इतनी रहस्यमयी है कि हर चिंतक का पाठ अपूर्ण जान पड़ता है.
सृष्टि किसी भी कलाकार के समक्ष उपलब्ध सबसे बड़ी रचनात्मक चुनौती है. अपनी-अपनी विधाओं के उपकरणों से सुसज्जित महत्वाकांक्षी कलाकार उसे पार कर जाने के महाकाव्यात्मक स्वप्न से भरे होते हैं, फिर भी सृष्टि या जीवन का रहस्य अलंघ्य सुमेरु की तरह है.
इसके बाद भी, कला की तमाम विधाओं में से अगर कोई विधा सृष्टि या जीवन के इस रहस्य को सबसे क़ुरबत से छू पाने में सफल होती है, तो वह है चित्रकला. एक महान चित्र अपने एक ही फ्रेम के भीतर जीवन के समस्त रहस्यों और समस्त भावनाओं को एक साथ समाहित कर लेता है.


किसी भी कलाकार की तरह मेरा स्वप्न भी यही है कि मैं अपने लेखन में जीवन के उन तमाम रहस्यों को पकड़ सकूं, उनकी ओर इशारा कर सकूं, जिन रहस्यों को हम कभी समझ नहीं पाते.
बहुत पहले से यह कहा जाता रहा है कि सारी कलाएं अंतत: संगीत बन जाना चाहती हैं. अपनी तमाम रागात्मक जटिलताओं के बाद भी संगीत में एक सु-प्रवाहता होती है. एक श्रोता के रूप में जहां आपको दचके लगने शुरू हुए, आप संगीत की लय को भंग पाते हैं. तैरना श्रमसाध्य है. बहने में कोई श्रम नहीं लगता. कला-रसिक अल्पश्रम-जीवी होते हैं. इसीलिए वे बह जाना चाहते हैं. ऐसे कि सब कुछ भूल जाएं. ऐसे कि वे ख़ुद को भूल जाएं. ख़ुद को भूल जाने के लिए बहना ज़रूरी नहीं. अच्छे तैराक, तैरते हुए भी ख़ुद को भूल जाते हैं. बहकर आप वहां पहुंचेंगे, जहां धारा आपको ले जाना चाहती है. तैरकर आप वहां पहुंचेंगे, जहां आप ख़ुद जाना चाहते हैं.
अच्छे कलाकार, अच्छे चिंतक, अच्छे कला-रसिक हमेशा तैराक होते हैं. वे रचनाओं में डूबकर वहां पहुंचते हैं, जहां वे ख़ुद पहुंचना चाहते हैं, लेकिन अनुभव बहने का करा देते हैं. संगीत बह जाने की इसी प्रवृत्ति का प्रवर्तक है, तो चित्रकला इसी बह जाने का प्रतिरोध है. चित्र हमेशा आपको रोक लेंगे. आप किसी एक बिंदु पर ठिठक जाएंगे और उसे बहुत देर तक देखते रहेंगे.
दोनों विधाओं की आपस में तुलना करके, किसी एक को नीचा और दूसरे को ऊंचा दिखाना मेरा अभीष्ट नहीं है. जबकि मैं उस प्रचलित मान्यता को संदेह से देखना चाहता हूं कि जिसके हिसाब से सारी कलाओं को अंतत: संगीत हो जाना चाहिए. मैं उस सुप्रवाह को संदेह से देखना चाहता हूं.
सुप्रवाह एक बहुत बड़ा मिथ है. जीवन और कला दोनों के ही संदर्भ में.
गंगा का प्रवाह मिथकीय है. कालिदास से लेकर श्रीहर्ष तक ने अपने महाकाव्यों में उसे सुप्रवाहिनी बताया है. यह एक सौंदर्यजनक उपमा है, किंतु यह उपमा ही है.  यदि गंगा सुप्रवाही होती, तो कहीं तेज़, कहीं धीमी न होती. पानी का तापमान हर जगह एक-सा होता. एक साधारण-सा पौधा, जो बीचधार उगा खड़ा है, उसके प्रवाह को बाधित कर देता है. पानी भले न अटकता हो, लेकिन पानी के साथ आ रहे तिनके ज़रूर वहां अटक जाते हैं.
यह जो बाधा है, यही गंगा के प्रवाह को आकार देती है. जहां वह पौधा उगा है, उसके एक तरफ़ पानी की देह पर वलय पड़ते हैं.
यह नदी की विशाल छाती पर सुंदर रेखाचित्र है.
और यही उसके सुप्रवाहिनी होने को खंडित कर देता है.
श्रेष्ठताएं विशिष्ट खंडनों से बनती हैं.
और कला एक अवश्यंभावी खंडित सौंदर्य है.
जीवन खंडनखंडखाद्य है.
तभी मोत्सार्ट के शांत प्रील्यूड में अचानक वायलिन का एक समूह सबकुछ को तोड़ता हुआ प्रविष्ट होता है और अपने तोडऩे से जोडऩे की क्रिया को संभव बना जाता है. यहीं पिकासो याद आते हैं, जो कहते हैं, 'हर रचना अपने प्राथमिक रूप में विध्वंस होती है.'
यदि खंडन न हो, तो रचना में सौंदर्य नहीं आ सकता. और खंडन सुप्रवाह का निषेध है. वह दरअसल तभी उपस्थित होता है, जब सुप्रवाह के मिथ का बोलबाला होता है.
जीवन से बड़ा रहस्य मृत्यु है. मृत्यु भी एक खंडन है. हम सब मृत्‍यु की खंडित संतान हैं.


मैंने अब तक सौ से कुछ ही ज़्यादा कविताएं लिखी हैं और मात्र छह कहानियां. मैंने उनमें इसी खंडन को पाना चाहा है. जहां तक कहानियों का संबंध है, अपनी इस चाह को मैंने 'फ्रैक्चर्ड फ्लुएंसी' का नाम दिया है. और कविताओं में इसी कोशिश को 'असंबद्ध काव्य-संरचना' कहा है.
और यह कहने में मुझे कोई गुरेज़ नहीं है कि ये दोनों ही चीज़ें मुझे पेंटिंग्स से प्राप्त हुई हैं.
1920 के दशक के मध्य में जब आंद्रे ब्रेतां 'नादिया' लिख रहे थे, उसी समय पेरिस में कलाकारों का एक समूह अतियथार्थवादी चित्रों के साथ प्रयोग व अभ्यास कर रहा था. अलग-अलग स्तरों पर अतियथार्थ के बहुत सारे मतलब निकलते हैं, लेकिन उन चित्रों में मुझे जिस बात ने सबसे ज़्यादा आकर्षित किया, वह थी उनकी असंबद्ध संरचना व उनका अनादि-अनंत स्वरूप.
दुनिया अगड़म-बगड़म चीज़ों का भंडार बहुत पहले से रही है, लेकिन यही वह समय था, जब कलाकारों ने सौंदर्य की प्रचलित मान्यताओं से बाहर निकलकर इस अगड़म-बगड़म को लक्ष्य किया. प्रथम विश्वयुद्ध की विभीषिका झेल रहे ये मुट्ठी-भर लोग अपने आसपास से बेतहाशा कुढ़े हुए थे. ये दो परस्पर विरोधी दिखने वाली चीज़ों को एक साथ लेकर आ गए.
यह मीठे के साथ खट्टा रख देने, आम के साथ इमली रख देने जितना आसान काम नहीं था. खट्टे और मीठे, आम और इमली में तो प्रचलित संबंध है. भले गुण में दोनों में विलोम हो, लेकिन विलोम भी तो एक संबंध है. ठंडे और गरम में संबंध का युग्म है. इन्होंने ऐसी चीज़ों के बारे में सोचा, जिनके बीच पहले से कोई संबंध प्रचलित ही न हो. भले दो चीजें अपने स्वभाव से विरोधी हों, लेकिन यदि उनमें विरोध का भी संबंध है, तो वे असंबद्ध नहीं रह जातीं. जैसे आग और पानी. दोनों का स्वभाव अलग है, लेकिन विरोधी स्वभाव के ही कारण दोनों के बीच विरोध का संबंध है, इसलिए अगर आप अपनी कृति में आग और पानी को एक साथ रख रहे हैं, तो यह असंबद्ध संरचना का प्रयोग नहीं है, बल्कि यह तो एक प्रचलित विरोधी संबंध का ही पुनर्चित्रण है.
मेरे कहने का आशय यह है कि दो ऐसी चीज़ें, जिनमें से पहले से कोई संबंध न जान पड़ता हो, को एक साथ रखना. या अगर उनमें पहले से कोई संबंध हो, तो आपने उसे इस तरह एक साथ रखा है, उनके बीच मान्य वह पुराना संबंध, बदल जाए, नया अर्थ पा ले.
उस समय चित्रकार इसी प्रविधि की ओर बढ़ रहे थे. 90 साल बाद बहुत दूर बैठकर मैं उनके चित्रों को देखता हूं, तो मुझे यह ख़्याल आता है कि दरअसल पूरी दुनिया एक असंबद्ध संगति है. अलग-अलग स्वभाव वाली चीज़ें एक साथ आती हैं, हम पहली बार उसे चौंककर देखते हैं, फिर अपनी रसिकता में हम उनकी एक संगति बिठाते हैं और एक नया अर्थ पाते हैं.
मुझे कई पाठकों के ईमेल आते हैं, जो अक्सर मुझसे इस काव्य-संरचना के बारे में पूछते हैं. जब वे मेरी कविताएं पढ़ते हैं, तो वे उसके समग्र प्रभाव से आह्लादित होते हैं, लेकिन जब भी वे पंक्ति-दर-पंक्ति उस कविता की व्याख्या करने की कोशिश करते हैं, तो पाते हैं कि इसकी पंक्तियों का आपस में कोई सुपरिचित तालमेल नहीं है. यही चीज़ उन्हें प्रश्नाकुल करती है, और इसी से वे आकर्षित भी होते हैं. मैं इस काव्य-संरचना का प्राचीन चित्रकला के साथ संबंध बताता हूं और कविता में एक नये प्रयोग की तरह परिचित कराता हूं.
सल्वादोर दाली की एक बहुचर्चित पेंटिंग है, जो लगभग उसी समय की है. 'द पर्सिस्टेंस ऑफ मेमरी'. उसमें ठूंठ पर एक घड़ी कपड़ों की तरह सूख रही है. दूसरी घड़ी ज़मीन पर गिरे किसी दैत्य की पीठ पर सूख रही है. ठूंठ शायद किसी चबूतरे पर उगा था. तो उस चबूतरे की दीवार पर एक घड़ी और सूख रही है. उसकी बग़ल में रखी एक घड़ी को चींटियों ने छांप रखा है. जितनी भी घडिय़ां सूख रही हैं, वे कपड़ों की तरह मुड़ी-तुड़ी हैं. आप कभी नहीं सोच सकते कि घड़ी को मोड़ा भी जा सकता है, पछीटे हुए कपड़े की तरह पानी चुआती एक घड़ी डोर पर सूखते हुए समय भी दिखा सकती है. इस पेंटिंग की पृष्ठभूमि में एक निर्जन अनंत है. दूर तक सिर्फ़ दूरी है.
यह दाली की एक निर्णायक पेंटिंग है, जिसने पूरी दुनिया के कलाजगत पर गहरा असर डाला. लोगों का मानना है कि यह ऐसी पेंटिंग है, जो ब्रह्मांड की संरचना के हमारे बने-बनाए आग्रहों को ध्वस्त कर देती है. यह आइंस्टीन के सापेक्षता के सिद्धांत से प्रभावित है. यह समय और दूरियों के बीच रिश्ते को दिखाती है.
दाली ने अपने स्वभाव के अनुसार सापेक्षता के साथ इसके रिश्ते को नकार दिया और कहा, 'दरअसल मैं चीज़ के कुछ टुकड़ों को सूरज की रोशनी में पिघलता हुआ दिखाना चाहता था. अंत में मैंने चीज़ के टुकड़ों की जगह घड़ी का प्रयोग किया, क्योंकि घडिय़ां पिघलती नहीं हैं.'
दाली ने अपने कामों में चीज़ के घनाकार टुकड़ों का बहुत प्रयोग किया है. उनका स्पष्टीकरण वाजिब भी लगता है, लेकिन मैं इस चित्र को जिन कई स्तरों पर देखता हूं, उनमें से एक यह है कि यह चित्र समय और दूरी के सिद्धांत से ज़्यादा स्मृति की जि़द को दिखाता है. ठीक अपने शीर्षक की ही तरह.
एक जि़द्दी स्मृति, जो अपनी अड़ में इतनी बीहड़ है कि आपके पूरे यथार्थवादी बिंब संसार को ध्वस्त कर देती है. यह हमारी करवटों से बना हुआ एक स्वप्न है. यह हमारी नींद की सिलवटों का रेखांकन है. एक ऐसे स्वप्न की जि़द्दी स्मृति, जो हमारी पीठ से चिपक गई है. जब भी हम बिस्तर पर अपनी पीठ टिकाते हैं, स्वप्न की यह स्मृति फिर से जाग जाती है. हम अपने पूरे समय को पिघलता हुआ महसूस करते हैं. यह घड़ी आधुनिक मनुष्य का एक बिंब है.
इस चित्र की तमाम ख़ासियत में से एक यह भी है कि यहां एक भी रेखा अमूर्तन की तरफ़ नहीं जाती. अपनी बुनावट में यह चित्र ठोस यथार्थवादी है. ठूंठ, बिल्कुल ठूंठ की तरह है. घड़ी अपना आकार खो देती है, लेकिन है वह घड़ी ही. यह पुरातन फिगरेटिव आर्ट है, जिसमें हर फिगर, अपने फिगर के साथ उपस्थित है. उसके बाद भी यह यथार्थवादी पेंटिंग नहीं है, क्योंकि इसमें ऑब्जेक्ट्स का प्रबंधन इस तरह किया गया है कि वे सबसे पहले यथार्थ की आपकी वर्तमान अवधारणा को ही घायल कर देते हैं. खांटी यथार्थवादी औज़ारों का उपयोग करते हुए भी एक कलाकार यथार्थ के परे चला जाता है, अतियथार्थ की रचना करते हुए वह अपने समय के यथार्थ को ही पुनर्परिभाषित कर देता है. ठोस रेखाएं एक स्वप्न-संसार की रचना कर देती हैं.
स्वप्न क्या होते हैं? हमारे उर्वर मन की सबसे बीहड़, सबसे सुंदर कल्पनाएं होते हैं. और कल्पनाएं कभी हमारे यथार्थ से विशाल नहीं होतीं. उसके बाद भी एक सुंदर कल्पना, हमारे यथार्थ के आकार को बड़ा कर देने का महती काम करती है.
यही असंबद्धता की शक्ति है. चित्रों में प्रयुक्त उपेक्ष्य असंबद्धताओं का सीधा संबंध हमारे स्वप्न-जगत से है. उसी तरह मेरी रचनाओं में आने वाली असंबद्ध संरचनाओं का संबंध स्वप्न-जगत से है.
मेरा मानना है कि लेखक इस पूरी दुनिया की नींद है. मैं उन लोगों को अक्सर संदेह की नज़र से देखता हूं, जो यह कहते हैं कि लेखक जागृति की संज्ञा है. जागृत लेखक कभी रचना नहीं करता. वह बस चीज़ों को देखता है. लेखक का देखना, लेखक का ग्रहण करना नहीं है.
लेखक इस पूरे संसार की योगनिद्रा है. स्वप्न बुनने का काम नींद करती है. लेखक इस पूरे संसार के लिए स्वप्न बुनता है. इसीलिए उसकी भूमिका नींद की तरह है. अच्छा, बुरा, कैसा भी स्वप्न.
जाग की अवस्था में वह जिन चीज़ों को देखता है, वह उन्हें ठीक उसी तरह ग्रहण नहीं करता. उसका उर्वर मन उस चीज़ का रूप और आकार बदल देता है. जैसे दाली उस चित्र की शुरुआत में चीज़ के टुकड़े देखते हैं, लेकिन रचते समय चीज़ की जगह घड़ी रख देते हैं.
लेखक द्वारा ग्रहण करने की यह क्रिया किसी तार्किक आधार पर नहीं होती, न ही होनी चाहिए. तर्क किसी भी रचना का शत्रु है. मैं तर्कों की जगह हमेशा काल्पनिकताओं को प्राथमिकता देता है. तर्क संहार कर देते हैं. काल्पनिकताएं रच देती हैं.
यहां मुझे फिर पिकासो याद आते हैं, कला के संबंध में जिनकी बातें मेरे लिए मंत्रों की तरह हैं. अपने इंटरव्यूज़ में वह बार-बार कहते हैं, 'मैं चीज़ों को उस तरह नहीं बनाता, जैसा मैं उन्हें देखता हूं. मैं चीज़ों को उस तरह बनाता हूं, जैसा मैं उन्हें सोचता हूं.'
यह जो 'सोचना' शब्द है, इसे कुछ लोग विचार मान लेते हैं, लेकिन है यह कल्पना. कल्पनाओं के साथ सबसे बड़ा घात तब होता है, जब वे विचार बन जाती हैं.
इसीलिए पिकासो का घोड़ा, ठीक घोड़े जैसा नहीं दिखता, लेकिन असर वह घोड़े जैसा करता है.
कला में घोड़ा, घोड़े जैसा न हो.
मुर्ग़ा, मुर्ग़े जैसा न हो.
इंसान भी, इंसान जैसा न हो.
घोड़े में थोड़ा-सा इंसान हो.
मुर्ग़े में थोड़ा-सा घोड़ा भी हो.
इंसान में थोड़ा घोड़ा भी हो, थोड़ा मुर्ग़ा भी हो, थोड़ा-सा गुलाब भी हो, और उसका कंधा लिखने की मेज़ जैसा हो और उसकी हथेली एक तरफ़ से डबलरोटी जैसी गाढ़ी कत्‍थई हो. इन सबके बाद भी वह कहीं थोड़ा छोटा इंसान हो, कहीं थोड़ा बड़ा इंसान हो.
हो सकता है, उसकी देह में चेहरा ही न हो. उसकी जगह एक फूल खिला हुआ हो.
लेकिन वह अवश्य ही उन मान्यताओं पर चोट करे, जिनके हम आदी हो चुके हैं. वह हमारे अभ्यस्त हो जाने का निषेध प्रस्तुत करे. वह आदत का स्‍पीड ब्रेकर हो.
क्योंकि कला में 'खोजा' नहीं जाता, बल्कि कला में 'पाया' जाता है.


गर आपने आंद्रे ब्रेतां की 'नादिया' पढ़ी हो, तो आपका ध्यान दो चीज़ों पर अवश्य जाएगा. उस नॉवेला की पहली पंक्ति और उसकी आखि़री पंक्ति.
पहली पंक्ति है - मैं कौन हूं?
यह त्रेतायुगीन प्रश्न है, जिसका उत्तर हर रोज़ खोजा जाता है. जब ब्रह्मा ने अपना पहला मानसपुत्र पैदा किया था, तो उसने भी प्रगट होते ही पहला सवाल यही किया - मैं कौन हूं? इसके बहुत सारे उत्तर हैं, और हर उत्तर अधूरा है. इस प्रश्न में उतना ही रहस्य व्यापा है, जितना कि पूरी सृष्टि में. और यही सवाल दुनिया की सबसे बड़ी पॉलिटिक्‍स है: पॉलिटिक्‍स ऑफ़ आइडेंटिटी.
चित्रकला एक लेखक से यही सवाल करती है कि तुम कौन हो? तुम इस चित्र के भीतर भी बैठे हो और बाहर खड़े होकर इस चित्र को देख भी रहे हो? तुम इस सृष्टि का हिस्सा भी हो या बाहर खड़े होकर तीसरे पक्ष की तरह इस सृष्टि को देख भी रहे हो?
यह सवाल सिर्फ़ लेखक ही नहीं, बल्कि समस्त कलाकारों के सामने होता है.
और समस्त कलाकारों से ही नहीं, पूरी मानवजाति के सामने होता है.


और 'नादिया’ की आखि़री पंक्ति है - ब्यूटी विल बी कन्वल्सिव ऑर विल नॉट बी एट ऑल.
सौंदर्य तुम्हें झटके देगा या नहीं भी देगा.
रेम्ब्रां की 'बाथशीबा' का सौंदर्य मुझे बिल्कुल झटका नहीं देता, लेकिन फिर भी एक झटका दे देता है, जैसे ही उसके चेहरे पर नज़र जाती है.
'पर्सिस्टेंस ऑफ़ मेमरी' में यथार्थवादी उपकरण जो फ्लुएंसी पैदा करते हैं, वे उतनी ही उपेक्षणीय है, जितना कि अभी-अभी आपकी आंखों के सामने से गुज़रा दृश्य. दिन-भर आप जितने दृश्य देखते हैं, वे सब इतने नैसर्गिक तरह से फ्लुएंट होते हैं, सुप्रवाही होते हैं, कि आप उनकी ओर कभी ध्यान ही नहीं देते. जो ऑबवियस है, वही मोस्ट फ्लुएंट है.
महान चित्र आपकी फ्लुएंसी को तोड़ देते हैं. एक अटपटी रेखा अपने छिपे होने पर कुपित रहती है. महान रचनाएं भी यही तोडऩे का काम करती हैं.
'फ्रैक्चर्ड फ्लुएंसी' के अपने औज़ार मैंने ऐसे ही चित्रों के ज़रिए पाए हैं. सौंदर्य बाज़ दफ़ा इतना फ्लुएंट होगा कि आप उसे एक प्रवाह मान लेंगे और वह आपको कोई झटका नहीं देगा. लेकिन उसके बीच एक या एकाधिक फ्रैक्चर ऐसे होंगे, जो आपके प्रवाह को खंडित करेंगे और आपको झटका देंगे.
आखि़र इस सृष्टि की फ्लुएंसी भी तो फ्रैक्चर्ड ही है. यह सृष्टि भी असंबद्ध संगतियों से ही निर्मित हुई है. सितारे और गुलाब में कोई रिश्‍ता नहीं था. दोनों के बीच रिश्‍ता एक कवि ने ही बनाया.
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