सहजि सहजि गुन रमैं : वाज़दा ख़ान















क्यूं लिखना कविता का    
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लिखने का आलम क्यूं
आधी दुनिया या पूरी दुनिया के
दु:ख के समन्दर में डूबने की प्रवृत्ति
अन्दर निराशा भर लेने की प्रवृत्ति
घुटने की प्रवृत्ति
संवेदनाओं में त्राहिमाम-त्राहिमाम
होगा, कितनी तबाहियां
फिर अभिव्यक्ति का कोई सोपान, कोई ज़रिया
चाहत ही नहीं, जीवन ही बन जाता है शायद.

कहा-अनकहा, सुना-अनसुना, कब समाया मुझमें. कब शब्दों, रंगों में रवां होने लगा. युवा होती लड़की की तरह मुझको भी ख़बर न हुयी. दरअसल खुदा जब इन्सानी बुत बना रहा था, तमाम बुत बनाने के बाद जब मेरा बुत बनाने की बात आयी तो उसने मेरे बुत में मुट्ठियां भर-भर ढेरों संवेदनायें डालीं. उस वक़्त वह न जाने किन हवाओं से बात करने में मशगूल था कि बेध्यानी में अनुपात से अधिक बेचैनी की न जाने कितनी मुट्ठियां भर डालीं और जब सब्रोसुकून के एहसास बुत में भरने की बारी आयी तो ऐन वक़्त पर उसे प्यास लगी. अपनी हथेलियों को ओक बनाकर पानी पीने लगा. ओक बनाने में मुट्ठी खुल गयी. इस तरह सब्रोसुकून की जगह न जाने कितने (तृष्णा) जन्मों की प्यास भर गयी, गर्म पानी सी उबलती प्यास, अनन्त विस्तार जानने की प्यास, पता नहीं क्या पाने की प्यास, खुद को पा लेने की प्यास, न जाने कितनी रेतीली प्यास.

हमेशा से स्त्रियों को खुद में घुटते-पिसते देखा, उनका घोंटा जाना देखा प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष. उन्हें दोयम दर्जे़ की सलाहियतें मिली, चाहे पास-पड़ोस हो, चाहे अपना घर हो, चाहे दूर देश में, चाहे खुद में. और फिर खुदा ने गले तक संवेदनायें/ बेचैनियां भर दीं हो तो क्या पगडण्डी बनती. छटपटाहट, वेदना की टेर रह-रहकर मुझे पुकारती तो उन्हें लफ़्जों में ढलना ही था, मुसव्विरी होनी थी. भीतर ही भीतर दूसरे छोर पर बसी मौन क्रन्दन करती हुयी दुनिया में तबाहियों के दरम्यान अपने होने के एहसास के साथ सब्र का एहसास भी तो रखना था. लिहाजा हर्फ़ों की, तस्वीरों की अनुभूतियों के साथ उनकी मासूम रुमानियत, उनके तसल्ली भरे लम्स में खोना ही था.

कई बार ये महसूस होता है कि ग़र शब्दों के रूप रंग की कायनात न होती तो हम अपनी बेचैन रूह को लेकर कहां जाते, क्या करते, कहां पनाह पाते? तमाम दुनियावी/रूहानी सरगोशियां, तकलीफें हमें तबाह नहीं कर देतीं? तबाह तो हम अब भी हैं. पर ये तबाह होना कुछ अंशों में मायने रखता है (केवल कागज़ी नहीं). अन्तश्चेतना में कहीं बहुत गहरे जड़ जमाये कायनात के तमाम गर्दोगुबार, उदासी, खुशी, कथा-व्यथा, कुछ तो जाहिरा तौर पर सामने रख पाये या रख पाते हैं. शायद बहुतों को कुछ अपना सा लगे, आखिर हमने भी तो इन्हें अपने होने के एहसास के साथ पूरे माहौल/परिवेश से ग्रहण किया है. सांसों के साथ न जाने कितने आंधी-तूफान, क्षोभ-विक्षोभ, निराशा, अकुलाहट, सुख-दु:ख की विरासत भीतर समाहित हुयी है. नज़रें उठाओ तो अक्सर आसमान में भी उड़ते दिखायी देते हैं और ज़मीन पर तो हमेशा से आभासित हैं. पर ये केवल आभासी दुनिया नहीं है. वास्तविकता के बहुत करीब बिल्कुल घुली मिली न जाने कितने फलसफ़े, भीतर की दुनिया में गढ़ते हुये-उन्हें बयां तो होना था किसी न किसी रूप में, किसी न किसी माध्यम में- आखिर दु:ख में इतनी सम्भावनायें हैं.” संवेदनाओं का सबसे अहम हिस्सा. कैसे दूर रहें हम इससे, हम तो इसे ओढ़ती-बिछाती हैं, साथ लेकर चलती हैं. सदियों से हमारी धरोहर जो है. आगे भी विरासत सम्भाली जाती रहेगी. ग़र दुनिया में कुछ आसान नहीं है तो बहुत मुश्किल भी नहीं है, ज़िन्दगी है तो मन को भी ज़िन्दा रखना है. आती-जाती सांसों की तरह तस्वीरेंकशी (चित्रकर्म) और नज़्मों को भी रवां रखना है.

कितनी चुनौतियां, कितनी अन्तर्कथायें, कितने सरोकार, कितने अनचीन्हे, अदृश्य जीवित किस्से-कहानियां, शिकायतें, कितने घाव, कितनी काग़ज़ी आवाज़ें धड़कनों के साथ कैसे-कैसे जज़्ब होती रहती है. कभी आंखों की राह, कभी कानों की राह तो कभी हृदय की राह. आखिर अनुभूतियां क्या हैं? संवेदनायें क्या हैं? ज़िन्दगी क्या है? आज तक कोई शत-प्रतिशत समझ पाया हो तो पता नहीं? हर किसी में कहीं न कहीं अधूरेपन का एहसास, कोई खालीपन.


कभी सोचूं जाओ नहीं लिखती मैं, नहीं लगाती खूबसूरत रंगों को अपने गले, नहीं गुनना कुछ मुझे आती-जाती हवा की तरह, नहीं पालना किसी भी तरह का एहसास, पर क्या ये सम्भव है? ये और लगने लगता है कि मैं अपने आप से बदला ले रही हूं. जब ये सम्वेदनायें इतनी नाज़ुक हैं शीशे से भी ज़्यादा तो कई बार क्रूर रूपों में क्यूं नज़र आती हैं कि हम बेबस हैं उनके सामने. यही बेबसी लेखन को विवश करती है, जीवन बनती है, भीतर की दुनिया की लौ जलाये जो रखनी है.
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वाज़दा ख़ान की कविताएँ

(एक)

कितनी अन्तर्कथाएं मन में चलती हैं
बहती हैं नदियों में सदियों में
सदियों तक यहां वहां जाने कहां कहां
कभी कभी तुम्हारे मन तक
एक बार अपनी सम्पूर्ण जिजीविषा के साथ
तुमसे प्रेन करना चाहती हूं
तुम्हारे बनाये पेड़ पौधे आसमान बादल
चिड़ियों से प्रेम किया
तुम्हारे बनाये गये मनुष्यों से प्रेम किया
यहां तक कि अपने अनन्त अधूरेपन से भी
अब तुमसे प्रेम करना चाहती हूं
सम्पूर्ण दीवानगी के साथ
मिली है मुझे विरासत में
माथे पर मेरे हौले से रखना तुम अपना हाथ
तुम्हारे नर्म सुकून स्पर्श से मुंद जाएं आंखें
कि आसुओं की नमी में रौशनी आ जाये
अन्धेरों की जगह
हौले से थपकना मेरा जिस्म मां की तरह
जैसे थपकन मेरे रूह में समा जाये
सदियों से भटकती छटपटाती रूह
एक लम्बी शान्त पुरसकून की नींद सो जाये
तुम उठाना बांहों में मुझे
जैसे लोग च़ढ़ाते हैं फूल
दफ़्न कर देना आराम कब्र में
मिल जाऊंगी तुममें हमेशा के लिये.




(दो)
तुम्हारी उपस्थिति शून्यवत कर देती है
दिन रात को लड़खड़ा जाती हैं बेचैनिया
ओठों पर उभर आती है तुम्हारी ख़ामोशी
रख नहीं पाती खुद को तुम्हारे समक्ष
या तुम देखना नहीं चाहते
महसूस भी नहीं करना चाहते
गुलमोहर के फूलों की थरथराहट
दरअसल कुछ गणनायें
अनन्त काल से ही ग़लत सही होती आ रही हैं
मनुष्य को कोई वश नहीं उस पर
हां ये ज़रूर है हम चाहें तो
सितारे नक्षत्रों को पढ़ते हुये
गणनाओं को अपेक्षित आकाशगंगाओं में
ढाल सकते हैं तसल्ली के लिये
बांट सकते हैं सहजता
क्षितिज पर रख सकते हैं अपनी गम्भीरता
रेतीली सूखी सतह पर
सूरज की उगती हुयी किरणों को लेकर
कोई कालजयी कृति बनायी जा सकती है
असम्भव शब्दों से लिखी जा सकती है दोबारा
आत्मकथा.





(तीन)

कहीं गीली ज़मीन नहीं कि रोप दूं
कोमलता के पौधे
कि जड़ पकड़ रही मिट्टी
गिर जायेगा मन पेड़ से गिरी
नादान पत्तियों की तरह
भर जायेगा धुंआ पहाड़ों से बहता
नील नदी की उन्नत घाटियों में
हो जायेंगे सुडौल
तितली के पंख वर्जनाओं की एक लम्बी तान
नैतिकता के दौर में अखण्ड कथा की तरह
बांची जाती है
बचा लेगी कुछ ज़मीन
कुछ वर्जनायें आसमान में घूमती हैं
ज़रूर तुम्हें भिगोती होगी
अपवाद नहीं हो कुछ शताब्दियों में
अपवाद नहीं होते
इसी तरह असभ्यतायें भी सभ्य होने
की परम्परा में नैतिकता का पद
ग्रहण करती हैं गढ़ती हैं तमाम सच
जो ग्रह उपग्रह तक में घुले हैं
पक्का कुछ झूठ भी तिरते होंगे
वर्जनाओं के अन्तरिक्ष में
इन्हीं घूमती ब्रह्माण्डीय वर्जनाओं और
असभ्यताओं को एहसास करने के
किसी चौकस क्रम में
नहीं बनती कोई तथाकथित नैतिकता
न रचती है़ कोई उपदेशात्मक आचरण
सदियों से ढंकी मुंदी लगातार चल रही हैं
वर्जनायें सच के समानान्तर.





(चार)


गहरी अन्धेरी खाइयों से निकलकर
बहती गूंजती आवाज़ों
और खिलखिलाहट के संग
खुद को रखती हूं तुम्हारे भीतर
तुम्हारा भरापन खोल देता है
गाढ़े समय का कोई किस्सा
फिर मिलेंगे का कोई विधान
रचा था या रचने को थे
घुल जाती है तुममें
हवाओं के संग यहां वहां डोलती
कोई सर्जनात्मक सोच
लिखती जाती हूं फिर
ज़िन्दगी की कोई तहरीर
तुम्हें एहसास तक नहीं होता
कितना उद्वेग कितनी हलचल
कितनी बेचैनियां झऱ रही हैं
गुलमोहर के फूलों के साथ
खिले हैं जीवन की सीधी तीखी पड़ती धूप में
अपनी लालिमा के साथ तुम अपनी परछाईं
तक हटा लेते हो वहां से
एहतियातन कोई फतवा जारी न हो जाय़े
क्या इतनी गहनता से आवेशित
होती है कविता
क्या उतरती है शाम पर ऐसी कोई रात
क्या गुज़रती है कोई रूह
अनजाने शून्य में ऐसे चुपचाप
क्या पनपती है कोई इन्द्रधनुष
आकाश में कोई परीकथा
ऐसे ही कभी सोचकर देखना एक बार
परतों में दबी रेखायें
अब कितनी अमूर्त हो चली हैं.





(पांच)

मेरे भीतर उगी सच्चाइयों की कुछ गहरी
रंगतों को तुम चुरा लो और
मैं तुम्हारा वक़्त
मैरी नज़्मों को तुम चांद के भीतर रख दो
तुम ही ऐसा कर सकते हो
तुम्हारी उंगलियों में भी न जाने कितनी
नज़्में क़ैद हैं रिहा होने की छटपटाती
तुम ही ऐसा कर सकते हो
अपने अहम के साथ रहते हुये भी
मेरे अनजाने अजन्में कितने रुपाकारों को
अपने भीतर संजोये तुम
अनियन्त्रित कठिन होते दिन रात में
अन्तर्विरोध से तपते दहलते घबराते
कीच मिट्टी सर्द में घुलते सपने
कई बार याद दिलाते हैं मुझे
आधे अधूरे वज़ूद आकारों के कि
अमूर्तन भी एक हिस्सा है
बातों का वादों का.




(छै)
सौन्दर्य का सबसे प्रिय गीत
नीले हरे रंग से गुंथे देह वृक्षों में
लहरा रहा है
ख़ामोश उदासी के साथ
अंगड़ाइयां रूप लेना चाहती हैं कि
आसमान की सादगी नदी के वक्राकार मोड़
घाटियों का अन्धेरा
अनहद नाद की धुन कोई अजपा जाप
उसकी रूह में पैबस्त है
आओ अपने मन की तूलिका का
एक स्ट्रोक (स्पर्श) लगाना
चिड़िया की आंखों पर
चहचहाहट के कितने पल बीते समय में
और आने वाले समय में गुन्जार होंगे
थोड़े डर के साथ थोड़ा फासले पर
थोड़ी सी बची जगह में मन कैनवस पर
साथ ही अपनी पहली ग़लती को बचाकर
रखना भविष्य के लिये
अभी कितने रंगों से बावस्ता
होना बाकी है.

(पेंन्टिंग को देखकर लिखी गयी कविता)
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(सभी पेंटिग वाजदा के ही हैं)
वाजदा खान की कुछ कविताएँ यहाँ भी देखें.

8/Post a Comment/Comments

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  1. वाज़दा खान से एक-दो बार मिली हूँ. कलाकृतियों की तरह कोमल रंगों और रूपाकृतियों वाली कवितायेँ. यहाँ मन की उथल पुथल और नारी की स्थिति मुखर है. बचैनी, छपटाहट और वर्जनाओं को तोड़ने के बावजूद उनके अस्तित्व की झलक मिलती है.

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  2. परमेश्वर फुंकवाल26/11/13, 7:16 pm

    अरुण जी, वाजदा जी की पेंटिंग्स अद्भुत हैं...उतने ही अद्भुत हैं उनके विचार और उनकी कविताएँ...ये कोमलता के पौधे, ये फूल..ये शब्द लगता है अभी बहुत रंगों से वाबस्ता होना शेष है. समालोचन की मिट्टी में इन रंगों को खिले हुए देख अच्छा लगा...

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  3. वाज़दा दुनिया के आदिम रंगों से लेकर एक्रेलिक के सफ़र में औरतों का आकाश ,ज़मीन कितनी बदली ...वही पीड़ा,वही उसकी गढ़न ..रचाई जा रही हैं स्त्रियां ..कूची किसी सत्ता की ,रंग किसी सत्ता के ,कैनवास किसी और के और आत्मा -देह औरत की .
    सुंदर पेंटिंग्स के साथ सुंदर कविताएं .

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  4. सुमन केशरी26/11/13, 8:03 pm

    "मोनालिसा की आँखें" का कवर वाज़दा की कृति है...अब उनकी कविताएं पढ़वाने के लिए शुक्रिया अरुण...

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  5. Brijrani Verma ·27/11/13, 2:48 pm

    Enjoying Vazda Khan's Kavitayen through your Samalochan. Thank you for providing this platform. I am very proud of you Vazda . bahut hi badhiya likhati ho.

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  6. बहुत सुन्दर कविताएँ...अद्भुत पेंटिंग्स.....
    आभार अरुण जी.

    अनु

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  7. दो महीने पहले, हिसार में होने वाले 'खुले में रचना' कार्यक्रम के बाद कार से प्रख्यात कवयित्री Savita Singh ji और Suman Keshari ji के साथ दिल्ली वापस लौट रहा था. रास्ते में बात-चीत पेंटिंग पर होने लगी. बातों-बातों में मैंने कहा कि मुझे पेंटिंग की बहुत समझ नहीं है, ख़ासतौर पर रंगों की, हाँ यह ज़रूर है कि पेंटिंग्स को लेकर मेरी अपनी पसंद-नापसंद है. मेरे लिए एक पेंटिंग बहुत अच्छी हो सकती है और दूसरी बहुत खराब. पर मैं यह नहीं बता सकता कि अमुक पेंटिंग मुझे क्यों अच्छी लग रही है और अमुक क्यों खराब. मेरी इस बात पर सविता जी बहुत हैरान हो गयीं. उन्होंने मुझसे कहा कि अच्छी कविता को लिखने और उसकी समझ के लिए पेंटिंग को समझना और रंगों को जानना बहुत अहमियत रखता है. मुझे नहीं पता कि यह बात कितनी सही है पर वाजदा खान की कविताओं से गुज़रते हुए मुझे बार-बार पेंटिंग्स की अपनी नासमझी पर गुस्सा आता रहा है. गो कि वाजदा खान की कवितायेँ उनकी पेंटिंग्स से ज्यादा आसान है पर एक नया रंग बनाने के लिए मिलाए गए रंगों की तरह उनकी कविता की पंक्तियों के बीच-बीच में कुछ छुपे हुए संकेत हैं...कुछ रंग जिन्हें पकड़ना आसान नहीं है. उनकी पेंटिंग्स के बर-अक्स उनकी कविता का रंग उतना चटख नहीं है बल्कि सादगी लिए हुए एक सूफियाना सा रंग है वहाँ. वही रंग उनके आत्म-कथ्य में भी झलकता है. उनके संग्रह के माध्यम से भी उनकी कविताओं का रसा-स्वादन करने का सुख मिला है मुझे. उनसे मिलने का सौभाग्य भी मिला है. एक बहुत ही विनम्र, संकोची और भली महिला, बिलकुल अपनी कविताओं की तरह. शुक्रिया समालोचन का और बधाई वाजदा खान को.

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  8. वाजदा अद्भुत हैं , पेंटिंग में, कविता में और जीवन में भी ....लगातार पढ रहीं हूँ उन्हें पर ये कविताएँ जो यहाँ समालोचन पर रखी गयी हैं उसमें डूबने और शिद्दत से जीने को जी चाहता है | अरुण जी आपको बहुत-बहुत आभार|

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