सहजि सहजि गुन रमैं : मनोज छाबड़ा

Posted by arun dev on फ़रवरी 19, 2013













मनोज छाबड़ा कलाओं के साझे घर के नागरिक हैं. कविताएँ लिखते हैं. पेंटिग बनाते हैं. हजारों की संख्या में उनके बनाए कार्टून पत्र- पत्रिकाओं में बिखरे पड़े हैं. हिसार,हरियाणा से सांध्य दैनिक 'नभछोर' के साहित्यिक पृष्ठ 'क्षितिज' का संपादन करते रहे हैं. एक काव्य-संग्रह 'अभी शेष हैं इन्द्रधनुष' वाणी प्रकाशन से (२००८ में) प्रकाशित है.
मनोज की इन कविताओं में उनका विकास और विश्वास साफ देखा जा सकता है. कविताओं के साथ रेखांकन भी आपके लिए..

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संजौली

१.

सस्ते दामों और
महंगाई के तीखे आरोपों के बीच
संजौली में
ये चुनाव के दिन हैं
इन दिनों
बहुत फुसफुसाते हैं यहाँ के लोग
पार्टी छोड़ चुके नेताओं की
ताक़त तौलते हैं
अपनी निराशाओं की वज़ह ढूंढते
बहस करते
आखिरकार
सरकार को जिम्मेवार  ठहराते  हैं
और तसल्ली देते हैं खुदको
कि हम तो जी ही लेंगे उसी तरह
जीते आ रहे हैं जैसे बरसों से
इन मुश्किल पहाड़ों में

अक्टूबर के अंत की ठंडी रातों में
सब कुछ वैसा ही है  संजौली में
जैसा बरसों से था
एकाएक बन गए हज़ारों फ्लैटों से
चिंतित जरूर हैं यहाँ के लोग
पर सांत्वना देते हैं खुद को
कि चलो!
बच्चों के रोज़गार के अवसर तो बढ़े



२.

अब शिमला में नहीं बची जगह  कहीं
तो  संजौली ही सही
सर्पीली सड़कें
करवट लिए औंधी पडी हैं
और पर्यटकों की गाड़ियां
संजौली के कमर रौंद रही हैं

सिसकती संजौली का सारा जल
पर्यटकों के हिस्से आ जाता है
और
ठिठुराती सर्दी में
संजौली के बच्चे
अपने सूखे गलों को सहलाते रहते हैं

दो-चार रोज़ के मेहमान
अपनी जेबों में सिक्के खनखनाते रहते हैं
और
किसी अनुभवी-पुराने आदमी को तलाशकर
फ्लैट्स के दाम पूछते हैं
वे ये भी जानना चाहते हैं
कि कैसे
सेब के बागों में हिस्सेदारी मिल सकती है

पहाड़ का अनुभवी बूढ़ा
खूब हँसता है भीतर
और
उन पहाड़ों की ओर इशारा करता है
जिसे खनकते सिक्के वाली आखें
नहीं देख पाती
अचानक
खनकते सिक्के सूखे चमड़े में बदल जाते हैं

उधर संजौली
आने वाले नए पर्यटकों के लिए कमर कसती है


३.

संजौली से लौट रहा हूँ
पहाड़ को अपने भीतर लिए
तमाम लोगों के साथ
मैं भी उसी संघर्ष से गुज़र रहा हूँ
जहां दो बोरियां लादे
पहाड़ पर चढ़ रहा था कोई
चेहरे की झुर्रियों के खिलाफ लड़ते हुए
समय से पहले पहुँचने की कोशिश में

हालांकि
समय से पहले पहुँचने पर भी
गालियाँ सुननी होंगी
डेरी से पहुँचने और
ग्राहकों के खाली लौटने के नाम की
इसके एवज़ में
मज़दूरी में कटौती आसान होती है

मज़दूरी देने वाले  हाथ
पूरी  दुनिया में एक समान हिंसक होते हैं
मैं जानता  हूँ

मज़दूरी मांगने वाले हाथ
जानते हैं पहले से ही
कि
मज़दूरी का कटान
मालिक के बच्चे का झुनझुना बन कर खनकेगा

अक्सर अमीर बच्चों के खिलौने
मज़दूर-बच्चों के रोटी से निकलते हैं
और भूख से बिलखते बच्चे की
बेबस मां की आँखों में जाकर चुभ जाते हैं

इसे दुःख में
पहाड़ स्खलित हो जाते हैं कई बार
और बड़ी-बड़ी इमारतें
गिर जाती हैं पत्थरों की मार से

इन्हीं पत्थरों को उठाते
सड़क को फिर से संवारते
पहाड़ के लोगों की 
एक और पीढ़ी पल जाती है
लेकिन पहाड़ कुछ और नंगे हो जाते हैं

दरख़्त कटते हैं
और मैदान के अमीरों का सपना
पहाड़ के वक्ष पर
बहुमंजिली इमारत की शक्ल में
सांस लेने लगता है

मैं संजौली से लौट रहा हूँ
मेरे भीतर उगे पहाड़ पीछे छूटने लगे हैं
मैदान पर लौट तो आया हूँ
कुछ  अनगढ़ पत्थर
अब भी चिपके हैं मेरे अंतस में



हस्ताक्षर

अभी भी मेरे पास है
वढेरा आर्ट गैलरी की किताब वह
जो खरीदी थी
दरियागंज के फुटपाथ से
इस बात से अनजान
कि
हुसैन के दस्तखत छिपे हैं उसमे
वहाँ घोड़े नहीं हैं
नहीं है मदर टेरेसा
हुसैन के घुमावदार हस्ताक्षरों को समझा जब मैं
मेरे भीतर एक घोडा टप-टप करता हुआ
दौड़ गया
बड़ी कूची से रंग गया एक कैनवास
भीतर के काले बच्चे के बालों को
मदर टेरेसा के झुर्रीदार हाथ सहला गए

बाद में सोचा कई बार
एक रोज़
बेच डालूँगा
इस  पुस्तक को किसी शौक़ीन अमीर के हाथ
मोटी रकम ऐंठ कर
अपनी ज़रूरतों पर हुसैन की चादर तानूंगा
रोज़ ढूंढता अखबार में
हुसैन की तस्वीरों की कीमत
और
करोड़ के शून्य गिनते-गिनते
दरियागंज से बहुत सस्ती खरीदी गई
उस किताब को उठाता
हस्ताक्षरों को सहलाता
और
रख लेता
भविष्य के तंग दिनों की खातिर...





आकाश के विश्वास में

आकाश के विश्वास में
करोड़ों स्त्रियाँ बदलती हैं अपने वस्त्र -
खुले में
और
ढेरों इंद्र झांकते हैं
अपनी-अपने खिड़की खोलकर
आकाश से

ओ देवताओ !
जनता छली जाती है हमेशा
तुम पर ढेरों विश्वास करके
देखो !
कितनी भारी भीड़ जुटी है
तुम्हारे दरवाजों पर
इन पीड़ितों के पास
कुछ नहीं है तुम्हारी आशा के सिवाय

तुम्हारे छहों-आठों हाथ
तलवार-हथियार से होते हैं लैस
और
भूमि-दलालों के हाथ बिके ये हथियार
ग़रीब जनता के पीठ पर पड़ते हैं

मैंने
अपने मंदिर से
तुम्हें
निष्कासन की दे दी है सजा




ईश्वर की गोद में


ईश्वर की गोद में बैठी
अबोध बच्चियां
पूछती हैं ईश्वर  से
कहाँ गए वे सारे लड़के
जिनके हाथ में थे
हमारे गुड्डियों को ब्याहने वाले गुड्डे
छुपन-छिपाई का यह कैसा खेल है ईश्वर !
कि
छिपे हैं वे ऐसे
कि निकले ही नहीं


चुप है ईश्वर
कैसे कहे
कि सभी लड़के
पृथ्वी पर औरतों के पेट में जा छिपे हैं
बहुत मांग है उनकी वहाँ
ईश्वर कहता है-
अभी कई माह छिपे रहेंगे लड़के
और
थाली बजने की आवाज़ के साथ प्रकट होंगे

ईश्वर
बच्चियों के सर सहलाता है -
कहता है -
इन लड़कों की कलाइयां
ढूंढेंगी तुम्हारे हाथ
और
निराश होकर लटक जायेंगी

अचानक
इनके सपनों से
सभी स्त्रियाँ गुम हो जायेंगी
मेरी बच्चियो !

तब तक
तुम रहोगी
यहीं स्वर्गलोक में 

उस समय तक
पुरुष बन चुके बालक
अपने गुड्डे लिए
भटकते रहेंगे गुड्डियों की तलाश में

एक रोज़
जब पृथ्वी घोर संकट में होगी
तुम जाओगी
और
उदास आँगन लीप दोगी पृथ्वी का
और सारा संकट हर लोगी

तुम्हारे  दिन लौटेंगे
ज़रूर लौटेंगे एक दिन
दिन तुम्हारे.