सहजि-सहजि गुन रमैं : अमित उपमन्यु



अमित की कविताएँ हिंदी कविता की बनावट और बयान में नया कुछ जोड़ती हैं. यह नया समकालीन है. मध्यवर्गीय नागरिक मन उत्तर औपनिवेशिक और बेलगाम पूंजीवादी  समय में जिसे तरह के संकटों और संत्रास से गुज़र रहा है उसकी अनुगूँज इन कविताओं में है.
एक अच्छी बात यह है कि ये कविताएँ सरलीकरण की  सपाटबयानी से बची हुई हैं. मित और मुहावरे ताज़े हैं. अमित से उम्मीद  है. 



मेरे अपने

कह दूँगा
, लिख दूँगा, गा दूँगा
जो भी मैं कहना चाहूँगा सबसे.
कहना तो बहुत कुछ है,
पर सब कुछ नहीं.
सब कुछ नहीं जो मेरे अंदर है
कल्पित, निर्मित या अवतरित
जैसा भी
पर सिर्फ मेरा.

सब कुछ नहीं है सब के लिए
न कला न सब साहित्य के लिए
कुछ आत्मोद्बोधन है, कुछ आत्मावलोकन
और कुछ मुक्ति
बेड़ीयों से...

कलम अनाथ शब्दों की जननी होती है
जन्म लेते ही कवितायेँ कर लेती हैं जननी से सम्बन्ध विच्छेद
और हो जातीं हैं वैश्विक संपत्ति!
उस अर्थ से मुक्त जिसके सम्प्रेषण के लिये उन्हें जन्म दिया गया था
बल्कि नगरवधू सी.
पर मेरा सब कुछ अनाथ नहीं है
नगरवधू सा भी नहीं
कुछ ऐसा है जो सिर्फ मेरे लिए है
और उसका केवल एक ही अर्थ है जो उसे मैंने दिया
वो अर्थ हमेशा अमलिन रहेगा
नित श्वेतवस्त्रधारी,
मैली ज़बानों से अनछुआ,
उथली आलोचनाओं से अपरिचित,
और अर्थहीन अर्थों से अविचलित.

मेरे शब्द मुझमें!
सदा विस्तृत
और सीमित.
विस्तृत मन में /सीमित तन के / सूक्ष्मोष्ण ह्रदय में.



भाषा

मेरे पास है एक अच्छे वक़्त की भाषा
एक बुरे वक़्त की.
तेज़ हवामें सड़क से भरभराकर उड़ती है भाषा
और देह के अश्लील छेदों से होकर 
सारे मकानों में भर जाती है.

जब मैं रोना चाहता हूँ
तो बच्चों की हंसी पर भी रो देता हूँ.
कोयल का गीत भी एक दुःख बन जाता है मोर के नाच की ही तरह.
मैं ख़ुशी के हर घृणित पल से घृणा करता हुआ
हर एक बात पर रोता हूँ सिवाय उस चिट्ठी के
जो मुझे मिलती है आंसुओं से भीगी हुई.
अपनी गर्म साँसों से उस चिट्ठी को सुखाकर
पीपल के नीचे दफ़न कर देता हूँ

भाषा घुसती है मकानों में
और सोती आँखों को चुभती है;
उनके सपने धुंधला देती है.
मैं सड़क पर निश्चिंत सो रहे लिपिहीन कुत्ते को ज़ोरदार लात जमाता हूँ
वह भड़भड़ाते हुए अपने कुसंस्कृत दांत गड़ाता है मेरी लिपि में 
और भाषा बह निकलती है सारे बाँध तोड़ कर

मेरे पास है दुःख की एक भाषा,
एक सुख की.
मैनें छुपा रखी हैं बरगद नीचे भाषाएँ सच और झूठ की.
मैं एक अनजान धातु का बर्तन हूँ
जिसे खोजा जाएगा चाँद पर किसी अमावस के दिन
फिर मैं विषाक्त कर दूंगा अपनी खोज में आने वाली सारी भाषाओं को खुद में उबालकर.

विसूवियस जब भी बोलेगा बदल देगा इटली के मानचित्र को
पाताली प्लेटें जब भी बतियाएंगीं आपस में
खिचड़ी बन जाएंगीं भाषाएँ.

मैं एक लिपि हूँ जिसकी खुद की कोई भाषा नहीं.
दुनिया की है बस एक भाषा
जो तैर रही है ईथर में
बिना लिपि...

·         विसूवियस-  इटली में स्थित अति-प्राचीन ज्वालामुखी जो कई वर्षों से निष्क्रिय है
·         ईथर-  माना जाता है की यह (काल्पनिक) पदार्थ ही सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में फैला है जैसे पृथ्वी पर वायु.





संधि

हमारे निर्णयों से स्वाधीन
और मताधिकार से महरूम प्रक्रियाओं के उत्पाद हम
घोर ऋणी हैं उन महान अव्यवस्थाओं के
जिन्होंने हमें लोकतंत्र लिखना सिखाया

भय मनुष्य की पलकें और देवताओं का वीर्य है
मद दैत्य की नाभि,
ज्ञान मनुष्य का तीर.

हर फूल अपनी धरती और मौसम खुद चुनता है
जानवर मौसम के पीछे चलते हैं
पक्षी मौसम के भी आगे उड़ जाते हैं
इंसान अभागा
मुट्ठी में बंद रखना चाहता है
सारी मुस्कुराहटें

जिन-जिन चट्टानों पर सर्वशक्तिमान लिखा गया
वे आपस में टकरा कर चकनाचूर हो गईं.
देवताओं ने स्वर्ग और दैत्यों ने नर्क के दरवाज़े पर अंदर से मोटे लकड़े अड़ा रखे हैं
इंसान लिखी चट्टानें उनसे लगातार टकरा रही हैं
धूसर बादल स्वर्ग और नर्क पर बरस रहे हैं
इंसान खून की नदियों पर पल रहा है
अनगिनत सरस्वतियाँ हो चुकी हैं पाताल में ओझल

एक धनुर्धर चिड़िया की दोनों आँखें तीरों से बेध रहा है
उसकी एक आँख में है स्वर्ग का और दूसरी में नर्क का नक्शा.

सर्द हवाएं गर्म हवाओं की ओर बहती हैं
धाराएँ ऊंचे जलाशयों से निचलों की ओर
वे एक-दूसरे को नष्ट नहीं केवल पदच्युत करती हैं
पर चंगेज़ कमज़ोरों की पहचान का बलात्कार करते हैं
और हिटलर उनकी हत्या

मध्यस्थों ने अपना काम कर दिया
इंसान की दैत्यों और देवताओं से संधि हो चुकी है
उसके हिस्से स्वर्ग से मदिरा, अप्सराएं और दंभ आया
और नर्क से मिला आधा राज्य और मूर्खता!



हत्यारे

तू अकेला ही हत्यारा नहीं है मेरे दोस्त
ये आसमानी उड़ाके भी तो कूद पड़ते है एक दूसरे पर बैलों की तरह
रेलें भर पेट आदमी खाकर एक ही रास्ते पर आमने-सामने आ जाती हैं -
शिकारी कुत्तों की तरह अपने कैनाइन चमकाते हुए
ग्लेशियर अपने मोहल्ले में आने वाले टाइटेनिकों के पुट्ठे से नोंच लेते हैं
गोश का एक मोटा टुकड़ा,
स्टेल्थ विमान छुप कर आग बरसाते हैं बस्तियों पे जैसे बाघ घात लगाता है-
पीली घास में छुप कर,
पुच्छल तारों के झुण्ड घूम रहे हैं घर-घर उजाड़ते हुए जैसे कोई दंगा छिड़ा हो शहर में
मेरा मोबाइल फोन कतरा-कतरा अपना रेडिएशन घोल रहा है मेरी रगों में  -
जैसेकोई मंत्री अपने राजा को ज़हर दे रहा हो धीरे-धीरे
और वो तिकोना बरमूडा ब्लैक-होल की लोकल फ्रेंचाइज़ी ले आया है यहाँ.

यहाँ तो हर तरफ मौत के मेले खेले जा रहे हैं प्यारे
तू तो बस मामूली कतरा है इस सृष्टि का जो युद्धरत है खुद से ही
और प्रसवक्रीड़ा की पीड़ा के बाद ललचाई नज़रों से देख रही है
अपने ही बिलौटों को
होठों पर जीभ फेरते हुए .....



अंतिम इच्छाएँ

वर्तमान एक दोमुंहा सांप है
जिसका एक मुंह अतीत की ओर है
दूसरा भविष्य की.
हमारा अस्तित्व लगातार व्यस्त है
गुज़रते पल की तड़फड़ाती पूंछ की परछाईं को मुट्ठी में जकड़ने में

हाथ से छूटी आत्मकथाओं के पन्ने
तूफानी भंवर में समा सारी दिशाओं में फ़ैल जाते हैं,
मैं निहारता रहता हूँ अपनी परछाईं को वर्तमान में खड़ा
अतीत में उदित, भविष्य में अस्त होते हुए

बचपन के अध्याय
जवान खेतों की पीठ पर लदे
मौसमी गीत गुनगुना रहे हैं.
कागज़ की नावों और हवाई जहाज़ों पर वसीयत लिख
उन्हें भेज दिया जाता है खज़ाने और प्रतिक्रियाएं कमाने के लिए.

जवानी के मोटे-मोटे अध्याय बिखरे पड़े हैं
सूनसान सड़कों, अँधेरी गलियों, बंज़र खेतों और उजाड़ बगीचों में.
दिन के उजालों के आरामतलब कुत्ते
सूनसान रातों में राजप्रहरी नियुक्त कर दिए जाते हैं.
हर रात ठीक दो बजे मेरी परछाइयाँ
नंगे शहर की पीठ पर गुमसुम टहलती हैं
तभी सारे कुत्ते कंधे की सबसे ऊंची हड्डियों पर चढ़
आश्वासन भरे अशुभ गीत गाने लगते हैं

बुढ़ापे के कोरे अध्याय के
आखिरी पन्ने के आखिर में
लिखा है धिक्कार!
ये आत्मा का ख़ालीपन है
जो हमेशा प्रस्तावना में अटकी रही.
ज़िन्दगी में उपसंहार नहीं होता
उसके हर एक शब्द का न्यायसंगत बंटवारा
सारे पन्नों के बीच कर दिया जाता है
ऐतिहासिक परम्पराओं द्वारा.

जीवन भर दमित अरमानों से
फांसी के तख़्त पर
पूछी जाती है अंतिम इच्छा
और दिए जाते हैं चार विकल्प चुनाव के लिए
स्वीकृत बजट के अनुसार

अंतिम इच्छा पूछने के उपक्रम में
जल्लादों की सद्भावना की मवाद
अरमानों के फेंफड़ों में ठसाठस भर दी जाती है
मोटी सुई वाले इंजेक्शन से,
और एक नए सहृदय विचार के काले लिफाफे से मुंह ढांप
उनका गला घोंट दिया जाता है:
दुनिया कितनी ख़ूबसूरत है!

दुःख महकते हैं रातों में रातरानी की तरह
भूखी आत्मा के बुखार से तपते बदन की आंच में,
अलाव की तरह दमकते हैं सर्दियों की कुहरे भरी शामों में
और खांसते जाते हैं खों-खों, जलती लकडियों से उड़ती कालिख पर.
उनके फेंफडों से सेब का रस और महंगी शराबें रिसने लगती हैं बरसातों में
पहले उनके जेनेटिकली मोडिफाइडबीज फेंक दिए जाते हैं उर्वर ज़मीन पर सैलाब उगाने के लिए
और फिर ज़मीनों को बंजर किया जाता है उनकी लहलहाती फसल के लिए;
अंत में छिड़क दिए जाते हैं महंगे आयातित कीटनाशक
दुःख के चेहरे पर मुस्कराहट लाने के लिए

सूरज उगता है और डूब जाता है रोज़
भोर और रात का चल रहा है अब भी चिरकालीन युद्ध
कैसे लिख दूँ मैं अब अंत में दो उम्मीदज़दां क्रांतिकारी शब्द
एक वैश्विक कागज़ी तसल्ली से लिथड़े हुए?
जीवन से बड़ा आसान है छलछंदों में योद्धा बनना.
ऐसे वक्तों की फसलें उगनी होती हैं
हर छाती में अलग-अलग

अपने-अपने शब्द
अपना-अपना वक्त
अपनी-अपनी अंतिम इच्छाएं




सत्य के दांत नहीं होते

सत्य कभी मरता नहीं
विलंबित हो जाता है भीष्म की कालचयनित मृत्यु की तरह
अबूझ हो जाता है मकड़ी के जाले की तरह
धुंधला जाता है किसी मोतियाबिंदी आँख की तरह
पर मरता नहीं
बस एक अधमरे सांप की तरह रेंग कर
किसी ओट में छुप जाता है फिर से बाहर आने को
एक भौंडे वक्त पर
अनचाही आँखों के सामने
किसी पुराने प्रेमपत्र की तरह !

सत्य कभी मरता नहीं
सरकारें उसे दौड़ा सकती हैं थका नहीं
पुलिस उसे कोड़े दे सकती है ज़ख्म नहीं
अदालतें उसे रुसवाई दे सकती हैं फांसी नहीं
क्यूंकि सत्य के पैर नहीं होते
पीठ नहीं होती
गला भी नहीं!

सत्य की ओट में
स्वर्ण-मृग के छलावे
“ अश्वत्थामा हतः ” की अति मंद ध्वनियाँ
और विकास के मानचित्रों की अट्टालिकाएं छुपी हो सकती हैं.
कभी इसे सुन के भी अनसुना कर दिया जाता है
उस अभागन स्त्री सा
जिसे भोगते सब हैं स्वीकार कोई नहीं करता !
जब इसका गर्वोन्मत्त गरलवमन किया जाता है
और नहीं होता कोई महावीर नीलकंठइसे स्वीकार करने
तो वो भटकता है कुछ क्षण के लिए धरा पर
और फिर ऊपर उठने लगता है
(सत्य बहुत हल्का होता है
उसके ह्रदय में पाप नहीं होता)
वो उठते-उठते पृथ्वी की सीमा से बाहर जा
ब्रह्मांड में विलीन हो जाता है;
विश्वात्मा!

जब अंतरिक्ष यात्री जायेंगे ब्रह्मांड में
तो वह उन्हें गूंजता सुनाई देगा वहाँ
शब्दशः वैसा ही
जैसा ठुकराया गया था
बिना वायु भी
क्यूँकी सत्य के फेंफड़े नहीं होते.

आश्चर्य है!
सत्य क्यों काटने दौड़ता है सबको
बावजूद इसके की
सत्य के दांत नहीं होते.

(सभी चित्र :mary-ellen-mark)
__________


अमित उपमन्यु

दिनांक १७ सितम्बर १९८६ग्वालियर (म.प्र.)

बी.ई. (मैकेनिकल इंजी.)एम.ए. (अंग्रेज़ी साहित्य)सर्टिफिकेट इन फ्रेंचभारतीय शास्त्रीय संगीत की शिक्षा.
थियेटर (अभिनय) से सम्बद्धफिल्म एंड टेलीविज़न इन्स्टीट्युट ऑफ़ इण्डिया (पुणे) से डायरेक्शन शोर्ट कोर्स.
कविता/कहानियाँ/आलेख एवं कुछ लघु फिल्मों के लिए पटकथा/गीत लेखन और म्युज़िक कम्पोजिशन. राष्ट्रीय स्तर पर सॉफ्टबॉल खेल में लगभग १२ वर्षों तक म.प्र. का प्रतिनिधित्व किया और कई   प्रतियोगिताएं जीतीं.
असुविधाअनुनादसिताब दियारा और परिकथा में कवितायें प्रकाशित. कुछ अन्य पत्रिकाओं में शीघ्र प्रकाश्य.
 ई पता : amit.reign.of.music@gmail.com


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  1. कविताओं के साथ श्वेत श्याम चित्रों का संयोजन कमाल का है.

    मारक कविताएँ हैं. कवि को बधाई. संधि कविता विशेष पसंद आई.

    सत्य के दांत नहीं होते ...अलग तेवर की कविता है.
    आश्चर्य है !
    सत्य क्यों काटने दौड़ता है सबको
    बावजूद इसके कि
    सत्य के दांत नहीं होते..

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  2. अमित के पास कविता की नयी भाषा है.. प्रयोग का साहस है. प्रस्तुत कविताओं में कविता की गहनता सब्जेक्ट , एक्स्प्रेसन और शब्दावली तीनों स्तरों पर प्रकट हुई है जो अमित को नए युवा कवियों की अलग कतार में खड़ा करता है.. इस कवि के पास जबर्दस्त रेंज है जो इनदिनों अलग अलग ब्लॉग पर आई उनकी कविताओं को एक साथ देखने पर तुरंत दीखता है.. स्वागत अमित ..शुक्रिया समालोचन ..

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  3. Deepali Sangwan1/11/12, 10:34 am

    amit ka shabdon se ek aisa rishta hai jise shabdon mein hi bayan nahi kia ja sakta.. Amit ko padha ek doosri duniya mein safar krne jaisa hai..sabki kavitayein lajawab kr dene wali hai, badhai

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  4. Ashok Kumar Pandey1/11/12, 2:33 pm

    पिछले दिनों अमित से मुलाकात और इस वक्फे में कवि के रूप विकसित होते हुए देखना, मेरे लिए व्यक्तिगत रूप से बेहद संतोषजनक है.

    असुविधा पर पहली बार कवि रूप में उसे प्रस्तुत करते हुए लिखा था -- "उनकी कविताओं से परिचय होना मेरे लिए उनके एक नए पहलू से रु ब रू होना था. समकालीन मुहाविरे में लिखी ये कवितायें अपनी अंतर्वस्तु में प्रगतिशील-यथार्थवादी धारा के व्यापक परिदृश्य का एक ज़रूरी हिस्सा लगती हैं. इनमें सबसे अलग लगने वाली बात की जगह सबके साथ लगने की बात ज़्यादा नज़र आती है. किसी विशिष्टता की जगह ये कवितायें एक आधुनिक युवा की आँखों से दुनिया को देखते हुए अपने समय, समाज से जद्दोजेहद की कवितायें हैं. असुविधा पर अमित का स्वागत".

    संतोष यह कि लगातार वह इन संभावनाओं, इन उम्मीदों पर खरा उतर रहा है...

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  5. Hrishikesh Sulabh1/11/12, 2:35 pm

    अमि‍त को पढ़ना आश्‍वस्‍तकारी है कि‍ वे आने वाले समय की ओर अपनी कवि‍ताओं से सूक्ष्‍म और कलात्‍मक संकेत दे रहे हैं। नई
    काव्‍यभाषा और कहन के नए अंदाज़ के साथ इस नये कवि‍ का स्‍वागत। बधाई समालोचन और अरूण देव के लि‍ए.....

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  6. Nand Bhardwaj1/11/12, 2:40 pm

    अमित की कविताएं अपने वृहत्‍तर सरोकारों, विस्‍तृत फलक, सजग दृष्टि और अछूती भाषिक अभिव्‍यक्ति के चलते विस्मित करती हैं। अपने समय के निर्मम यथार्थ और विडम्‍बनाओं के प्रति कवि का सात्विक प्रतिरोध और मानवीय संघर्ष के प्रति गहरी आश्‍वस्ति इन कविताओं के असर को और गहरा बना देती है। भाषा और काव्‍य-संवेदन का यह नया तेवर अपने पहले ही पाठ में न केवल आकर्षित करता है, बल्कि एक दूरगामी प्रभाव छोड जाता है। अमित को हार्दिक बधाई।

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  7. Ernest Albert1/11/12, 3:02 pm

    सच में अच्छी कवितायें
    इस बहुय्यामी इंसान से मिलवाया आपने , शुक्रिया शायक बाबू
    अपर्णा ने ध्यानाकर्षित किया यहाँ ब्लैक/ वाईट चित्रों पर तो
    मार्लन ब्रांडो विख्यात किरदार कर्नल क्रूट्ज़ में नमूदार हुए
    और वो नीचे का चित्र शायद 'स्ट्रीट कार नेम्ड डिज़ायेर' नाटक से जिसमे मार्लन ब्रांडो (ही) थे !
    अमित से सीखा जा सकता है की उल जलूल कोम्प्यूटर जेनेरेटिड चित्र कविताओं को कितना गिराते हैं
    या ऐसे चित्र कितना उठा भी देते हैं !
    पर ये भी हो सकता है की अमित को अपनी रचनाओं पे विशवास हो !
    शुक्रिया जी !

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  8. Singh Kshama1/11/12, 3:03 pm

    दुःख महकते हैं रातों में रातरानी की तरह ...'अंतिम इच्छाएं और सत्य के दांत नहीं होते' बहुत अच्छी कवितायें हैं ..भाषा की गंभीरता और विविधता अमित की ख़ासियत है ..

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  9. 'सत्य के पाँव नहीं होते' और 'अंतिम इच्छायेँ' कविता बेहद सुंदर है । अंतिम इच्छाएं में हमारे द्वंद्वों को खूबसूरती से बयान किया है अमित जी ने ! अमित जी की कविताओं से परिचय के लिए धन्यवाद !

    अनुपमा तिवाड़ी

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  10. अच्‍छी कविताएं हैं... सच में अमित एक बेहतरीन संभावनाशील कवि के रूप में सामने आ रहे हैं... बधाई। ...मर्लिन ब्रांडो को कविताओं के साथ देखना एक और सुखद अनुभव रहा... आभार समालोचन...

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  11. यह ख़ुशी की बात है , कि आज ब्लॉगों ने अमित जैसे नवांकुरों को सामने लाने का इतना सार्थक प्रयास किया है...बहुत अच्छी कवितायें हैं ..बधाई ...

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  12. बहुत बढ़िया कविताये अमित जी ! बस, लिखते रहिये ..लेकिन इसी ताजगी और मासूमियत के साथ ! समालोचन का आभार !

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  13. बहुत अच्छी कवितायेँ ! कविताओं की भाषा और कहन अलग-सा असर छोड़ती है !निश्चित ही अमित में एक सजग कवि सभी लक्षण मौजूद है ! उनके लिए शुभकामनाएं और बधाई !

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  14. सभी कविताएँ अति-शानदार हैं. और यह शानदार होना समकालीन भी है. बहुत बहुत बधाई!

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  15. अमित के पास जो'कल्पित,निर्मित या अव‍तरित' है वह अथाह है। ऐसा प्रतीत होता है कि एक मनुष्‍य जिसकी चिंता तो बस अपने लिए प्रामाणिकता की तलाश है वह बस इतने से उपक्रम में भी सृष्टि से लेकर धरती और उसपर इंसान के बनने से लेकर सभ्‍यता तक के बनने के अंतर्विरोधों के घन को अपने भीतर पहचान लेता है। उसे ऐसा इंसान बनना है जिसे 'इंसान की दैत्‍यों और देवताओं से हो चुकी संधि' के झूठ से कोई लाभ नहीं उठाना, उसे 'खुशी के हर घृणित पल' को फेंक डालना है। वह जैसे-जैसे अं‍तर्विरोधों के घन से मुक्‍त होता है,जिस क्रम में वह दौड़ाया और घसीटा भी जाता है, जिसे अपनी प्रामाणिकता की खातिर वह स्‍वीकार करता है, वैसे-वैसे वह मुक्‍त हो ऊपर उठता है। विश्‍वात्‍मा के पास भी वह वैसा सुनाई देगा जैसा वह ठुकराया गया था। एक द्वैताद्वैत सा महसूस हुआ। ऐसा महसूस हुआ कि सत्‍य अपने होने के लिए जिस प्रक्रम से गुजरा उसके अनुगूंजों उसके विशेषार्थों को धारण कर ही वह सत्‍य है।....अमित जी क्षमा करेंगे अर्थ महसूस करने में गलतियां मैंने निश्चित की होगी...पर अमित नाम के 'असाध्‍य वीणा' को साधने की साधना में लगा रहूंगा...

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  16. अच्छी कवितायेँ.......एक अलग पहचान बनती हुयी.

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  17. Rajdeep Kanwaria6/11/12, 7:34 am

    मुझे इन कविताओ को पढ़ने मे ही एक घँटे से अधिक का समय लग गया !इन्हे समझने के लिए मुझे बहूत दिमाग दौड़ाना पड़ा!! सत्य की तरह रेगँता हुए अर्थो की तह तक पहुचना एक "सत्यमेव जयते" जैसी अनुभूति होने जैसा लगा!!
    मेरे लिए इनमे बहुत कुछ था भले ही इनमे सबके लिए कुछ न हो!! पर शायद कलम अनाथ नही जमाने को नया रुख देने वाले कवि-लेखक इसके अभिभावक है!! आप सुख दुख की अलग अलग भाषा का हुनर रखते है पर मेरे पास भाषा एक लहजे अलग अलग!! बाकि अपने अपने शब्द अपने अपने प्रयोग अपनी अपनी अर्थ निकालने की इच्छाए! आपकी शब्दो के साथ तो यारी पुरानी लगती है और उम्मीद है यह सूरज डूबने से पहले अपना काम पूरा कर चुका होगा !! बाकि कहना तो बहुत कुछ है पर सब कुछ नही!

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