सहजि सहजि गुन रमै : अनिरुद्ध उमट

Posted by arun dev on अगस्त 04, 2012



















अनिरुद्ध उमट

28 अगस्त 1964, बीकानेर, राजस्थान

प्रकाशन
उपन्यास - अंधेरी खिड़कियां, पीठ पीछे का आंगन
कविता संग्रह - कह गया जो आता हूं अभी
कहानी संग्रह - आहटों के सपने
निबन्ध संग्रह - अन्य का अभिज्ञान

सम्मान-
राजस्थान साहित्य अकादमी द्वारा उपन्यास- अंधेरी खिड़कियां- को रांगेय राघव सम्मा
कृशनबलदेव वैद फेलोशिप
संस्कृति विभाग, भारत सरकार की जूनियर फेलोशिप


रघु राय
अनिरुद्ध उमट मितकथन के कवि हैं. सीधी पंक्तिओं में गहरी बात का असर देखना हो तो ये कविताएँ देखनी चाहिए. जीवन जगत के कई ऐसे प्रसंग हैं जो नजरो के सामने रहते हुए भी ओझल दिखते हैं, कवि अदृश्य को दृश्य करता है अपने को ओट में रखते हुए. कुछ कविताओं में मृत्यु की गिरती हुई राख है जो अंतिम सचकी तरह  है . ये कविताएँ मृत्यु को भी देखती हैं .
  


परेशान मरने तक              

छत पर गिरते तारों की राख से
रहा परेशान
मरने तक

नहीं चाहता था
कहीं बचे रह पाएं
नींद की प्रतीक्षा में भटकते
पैरों के निशान

क्या तारे चमक-चमक राख होते
प्रत्येक मृत्यु की प्रतीक्षा में

क्या निशानी रह जानी
सुराग बचा रह जाना
जरूरी है

यह सुन तारों ने
कुछ ताजा राख
और गिरा दी



उसी रात


बरसों तक न सींचा
कीड़ी नगरा

इतना कि कभी-कभी
खुद को
सींचता-सा लगता

मैं नींद की मौत
नहीं मरना चाहता
किया था आर्तनाद
स्वप्न में खुद को
मरते देख

बिला नागा धर्म यह
घर कर गया
मुझमें

एक ही दिन सींच न पाया

उसी रात स्वप्न में
मुझे सींचने आ गयी
सारी चींटियां
(कीड़ी नगरा- चींटियों की बांबियां)                            



मौत की घड़ी



पिता और पुत्र के मध्य से
वह किसी सांप सी
गुजर जाएगी


दोनों उस गुजर जाने की
लकीर को
सिहरते देखेंगे
एक दूसरे की आंखों में

फिर एक-दूसरे के कंधे पर
सिर रख सो जाएंगे



लगाव


एक कुम्हारिन से
माँ
लगाव हुआ

बनाती नहीं
मिट्टी से बरतन
लेपती रहती मुझ पर

घुमाती रहती
चाक पर

मैं कैसा बना
तू बता

किसी काम का भी रहा

आज तो उसने
खुद को चाक पर चढा लिया
लेप लिया मुझे



अन्त में



होने से
होगी
जिसके भी
कविता

होगा नहीं
वह

कहीं



कभी तुम इतने जीवित


दिन बीते मजाक भूले

बहलाने को लिखी
कविता
गाई लोरी
किया शवासन

स्त्री यूं सोया
कि न सोया
शमसान में यूं रोया
कि न रोया

अभी-अभी तुम्हारे साथ
अभी-अभी मैं नहीं रहा

कभी तुम इतने जीवित
कि तुम ही तुम नहीं

बहुत हुआ मजाक अब
भूले जिसे दिन बीते

लौटना चाहा तो देखा
अपनी राख
हो चुकी
ठंडी बहुत

जिसमें एक दांत
धुंआ रहा.




अपने अंधेरों से हम




घर के हिस्से करते पिता
कागज पर
अपने हिस्से करते

सब को
समान रूप से
वितरण पश्चात
लौटते जब

सरक जाता
किसी ओर
जनम के हिस्से में
तब तक उनके हिस्से का
अंधेरा

बुला भी नहीं पाते
अपने अंधेरों से हम
उन्हें




तुम जाओ



तुम जाओ
करनी है ठंडी
राख
मुझे

रखनी है
पलकों पर

तुम जाओगे नही तो
लौटोगे कैसे

तुम्हें लिखी जाती इबारत
पढोगे कैसे

जरा दूर
जाओ

बाकी है
आंच
अभी
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