परख : रचना समय का कविता विशेषांक : अशोक कुमार पाण्डेय

Posted by arun dev on जनवरी 21, 2012







रचना समय के कविता विशेषांक की समीक्षा के बहाने युवा कवि, समीक्षक अशोक कुमार पाण्डेय ने जहां समकालीन हिंदी कविता से जुड़े कुछ जरूरी सवाल सामने रखे हैं,वहीं इस धारा की पहचना को लेकर हिंदी आलोचना के संभ्रम की भी खबर ली है. एक जरूरी हस्तक्षेप.





   समकालीन कविता का दस्तावेज   

कविता की प्रासंगिकता और उपयोगिता पर लगातार उठते सवालों, इसके पाठक विहीन होते जाने के दावों और पत्र-पत्रिकाओं में इसके लगातार घटते स्पेस के दौर में पूरी तरह से कविता पर केंद्रित विशेषांक निकालना एक जोखिम भरा काम ही हो सकता है. लेकिन यह एक विस्मयकारी स्थिति है कि ठीक इसी दौर में न केवल अनेक पत्र-पत्रिकाओं ने यह जोखिम उठाया है बल्कि देश भर में कविता-केंद्रित कार्यक्रमों की नई-नई श्रृंखलाएँ भी शुरू हुई हैं. सुदूर दक्षिण में रति सक्सेना कई वर्षों से लगातार कविता केंद्रित अंतर्राष्ट्रीय आयोजन “कृत्या” कर रही हैं, दिल्ली में “कवि ने कहा” सीरीज में हर माह तीन कवियों का काव्यपाठ हो रहा है, दिल्ली में ही भारतीय भाषाओं की कविता पर केंद्रित एक बड़ा आयोजन “समन्वय” हुआ जिसके अब प्रतिवर्ष आयोजन की योजना है, देवास जैसी छोटी जगह पर बहादुर पटेल “ओटला” नाम से लगातार कविता केंद्रित आयोजन कर रहे हैं, बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग के छात्रों ने सहभागिता आधारित एक बड़ा आयोजन गत वर्ष किया और ग्वालियर से शुरू हुआ “कविता समय” जयपुर के बाद अब अपने तीसरे आयोजन की तैयारी में है. इसी बीच कृति ओर, परिकथा, परस्पर सहित अनेक पत्रिकाओं ने अपने कविता-केंद्रित अंक निकाले हैं, प्रियंकर पालीवाल कोलकाता से पूरी तरह कविता-केंद्रित पत्रिका “अक्षर” निकाल रहे हैं, पब्लिक एजेंडा ने अपना विशेषांक मूलतः कविता पर ही केंद्रित किया और परस्पर, लमही सहित कई अन्य पत्रिकाओं के कविता-विशेषांक शीघ्र ही आने वाले हैं. भोपाल से निकलने वाली पत्रिका “रचना समय” का वरिष्ठ कवि नरेश सक्सेना के संपादन में निकला कविता-विशेषांक इसी शृंखला की एक मज़बूत और महत्वपूर्ण कड़ी है.

रचना-समय के इस विशेषांक की एक बड़ी खूबी तो यह है कि यह समकालीन कविता में सक्रिय वरिष्ठतम पीढ़ी के कवियों जैसे कुंअर नारायण, चन्द्रकांत देवताले और केदार नाथ सिंह से लेकर बिल्कुल युवतर पीढ़ी के कवियों जैसे कुमार सुरेश, वंदना मिश्र, सुशीला पुरी, नीरज खरे, कुमार अनुपम और कुमार राजेश आदि को शामिल कर पाठक के समक्ष पूरे रचनात्मक परिदृश्य का एक प्रतिदर्श उपस्थित करता है. दूसरी ज़रूरी बात यह कि नरेश सक्सेना ने इस विशेषांक में समकालीन कविता के इर्द-गिर्द उठने वाले तमाम सवालों से जूझने का जेनुइन प्रयास किया है. उन्होंने कवियों और आलोचकों से लेकर कुछ प्रमुख कहानीकारों के समक्ष जो सवाल रखे हैं, वे कविता के वर्तमान और भविष्य को लेकर चिंतित किसी भी कविता-प्रेमी के समक्ष उपस्थित जेनुइन सवाल हैं. यह अलग बात है कि ज्यादातर उत्तरदाता इन सवालों से सीधी मुठभेड की जगह इनसे दायें-बाएं बचकर निकलने की कोशिश करते लगे हैं. लेकिन इस बचने और उलझने के बीच से बहुत कुछ ऐसा निकल कर आता है जिसमें समकालीन कविता के संकटों के बीज छिपे हैं.

इस विशेषांक में विश्वनाथ त्रिपाठी, मैनेजर पाण्डेय, सुधीर रंजन सिंह, ए अरविंदाक्षन जैसे आलोचकों के लेख/साक्षात्कार हैं. सभी ने समकालीन कविता के संकटों पर अपने-अपने तरीके से बात की है. लेकिन एक और बात सभी के साथ एक चीज़ समान है – इनमें से किसी ने भी उस “समकालीन” कविता के एक कवि का नाम लेना या कविता को उद्धरित करना भी गवारा नहीं किया है जिसके संकटों पर बात हो रही है. कुछ अस्सी के दशक से आगे नहीं बढ़ते, कुछ नब्बे के दशक के कुछ कवियों (कविताओं नहीं) के नाम लेते हैं और उसके बाद के कवियों पर एक शब्द भी नहीं. बस सुधीर रंजन सिंह अपने शहर के एक कवि रविन्द्र स्वप्निल प्रजापति की एक काव्य पंक्ति का उपयोग सारी पीढ़ी को निपटाने और फिर कुछ नसीहतें देकर निकल जाने के लिए करते हैं. मैं यह नहीं कह रहा कि हमारी आलोचना समकालीन कविता की युवा पीढ़ी को पढ नहीं रही है. लेकिन यह ज़रूर कहूँगा कि पूरी पीढ़ी को खारिज करने की और ‘लांग नाइंटीज’ के एक ऐसे सिद्धांत के सहारे समझने की कोशिश कर रहे हैं, जिसके सामाजिक-राजनैतिक अभिधार्थ समकालीन कविता के किसी भी सावधान पाठक को साफ तौर पर असंगत लगेंगे. यह यूं ही नहीं कि वरिष्ठ कवि केदार नाथ सिंह ने पिछले दिनों कविता-समय में यह कहा कि आज की कविता नब्बे के दशक का विस्तार नहीं है अपितु उससे आगे गयी है. आज हिन्दी की आलोचना यह देख ही नहीं पा रही कि इस सदी के पहले दशक में न सिर्फ कविता के लोकतंत्र का विस्तार हुआ है और इस पर से हिन्दी हृदयस्थल के सवर्ण पुरुषों का वर्चस्व टूटा है बल्कि इंटरनेट और नए सूचना माध्यमों के विकास के साथ-साथ उसकी भाषा और शिल्प में भी जबरदस्त परिवर्तन आया है. असल में संकट कविता से अधिक आलोचना का है. इसीलिए जब विभूति नारायण राय कहते हैं – मैं समकालीन कविताएँ तलाश कर पढता हूँ, लेकिन आज के कवियों का चेहरा एक जैसा है, कवि का नाम और शीर्षक हटा दें तों पता ही नहीं चलेगा कि यह किसकी रचना है’ तों मैं उन्हें एक साथ कुमार अनुपम, अनुज लुगुन, गिरिराज किराडू, शिरीष कुमार मौर्य और अजेय की कविताएँ भेजना चाहता हूँ...’ यह अकारण तो नहीं कि ‘इधर के कवियों’ में उन्हें बस एक नाम याद आटा है – विनोद कुमार शुक्ल!

लेकिन इसी अंक में एक कम चर्चित हिन्दी आलोचक शालिनी माथुर का एक महत्वपूर्ण आलेख है जिसमें उन्होंने स्त्री-विमर्श के चर्चित कवि पवन करण, नरेश सक्सेना, विष्णु खरे और कात्यायनी की कविताओं की गंभीर विवेचना की है. पवन करण की कविताओं के सन्दर्भ में उन्होंने जिस तरह परत दर परत अर्थ खोलें हैं, उनसे आप सहमत या असहमत हो सकते हैं लेकिन उनकी गंभीरता असंदिग्ध है. उनका यह आकलन गंभीर बहस की मांग करता है कि वन करण के प्रेम के पद्य में व्याभिचार के गद्य की गंध इसलिए आती है कि उनके पात्रों को अपनी हेयता का ज्ञान है....ये कविताएँ जुगुप्सा जगाती हैं और उनका यह निष्कर्ष भी कि ‘यहाँ स्त्री कवि के बाहर खडी है अपनी शारीरिकता लिए. इसी तरह विष्णु खरे की कविता ‘लड़की’ और ‘लडकियों के बाप’ पर उनकी टिप्पणी – इन मार्मिक कविताओं में वर्तमान यथार्थ का निरूपण है और असीम करुणा, पर जिन विचारों के आधार पर करुणा उपजाई गयी है वे विचार क्या सही हैं? श्रेयस्कर हैं? प्रशंसनीय हैं? इन आर्थिक और सामाजिक रूप से गरीब लड़कियों के बाप के भीतर स्थितियों से विद्रोह की एक हलकी सी चिंगारी भी नहीं’ 
और इसके बरक्स कात्यायनी की चर्चित कविता ‘हाकी खेलती लड़कियाँ’ और ‘हिरना समझबूझ वन चरना’ के भीतर इस तथ्य की उनकी सटीक पहचान कि ‘कात्यायनी और उनकी लड़कियों के लिए पाबंदियों में जकड़े रहना एक करुणाजनक दृश्य नहीं है, वह वास्तविकता है जिसे वे रोज जीती हैं’ और फिर यह प्रश्न कि ‘क्या स्त्री लेखन और पुरुष लेखन अलग-अलग होता होगा?...पर ऐतिहासिक, आर्थिक और सामाजिक कारणों की वज़ह से स्त्री दृष्टि और पुरुष दृष्टि साफ़-साफ़ अलग-अलग पहचानी जा सकती है. ऐसा तब तक चलता रहेगा जब तक कि लिंगाधारित भूमिकाएं इसी प्रकार जड़वत बनी रहेंगी.’ हिन्दी के आलोचकों के सामने एक बड़ी चुनौती उपस्थित करता है. अगर वे इसी तरह वर्ग की व्यापक संरचना के भीतर स्थित सामाजिक-राजनैतिक समूहों जैसे दलित, आदिवासी, उत्पीड़ित राष्ट्रीयताओं के सदस्यों आदि के कविता के परिक्षेत्र में प्रवेश और तथाकथित मुख्यधारा की कविता के साथ उनके अंतर्संबंधो को समझने की कोशी करते तो नब्बे के दशक के बाद की कविता की विभिन्न लाक्षनिकताओं को बेहतर समझ पाते. वैसे पत्रिका में कवियों की लंबी सूची से दलितों-आदिवासियों के साथ पहाड़ के बेहद महत्वपूर्ण कवियों जैसे अजेय, सुरेश सेन निशांत, अनूप सेठी, महेश पुनेठा की अनुपस्थिति भी खलती है.

सम्पादकीय में नरेश सक्सेना ने हिन्दी कविता संबंधी एक सर्वेक्षण और इसके भयावह नतीजों की जो चर्चा की है, वह निश्चित रूप से चिंताजनक है. हालाँकि पेशे से सर्वेकर्मी होने के कारण इसकी प्रविधि को जाने बिना मेरे लिए इसे पूरी तरह स्वीकार कर पाना आसान तों नहीं लेकिन कविता के घटते स्पेस को लेकर जो स्थितियाँ सामने हैं उनसे मुँह चुराना कविता के किसी प्रेमी के लिए उचित नहीं होगा. लेकिन इसकी वजूहात केवल कविताओं के भीतर ही नहीं. हालाँकि विश्वनाथ प्रसाद तिवारी का यह कहना कि ‘जिस समाज में नेता नोटों की माला पहनकर अपराधियों की पीठ ठोकेंगे, वहाँ कविता कौन पढ़ेगा?’ उस और एक इशारा करता तों है लेकिन नवसाम्राज्यवादी परिवेश में मानवीय कल्पना तथा संवेदना के सतत निषेध के बरक्स इस तथ्य की जिस गंभीर विवेचना की आवश्यकता है, हिन्दी आलोचना अभी उससे दूर ही दिखाई देती है.

तकरीबन चार पीढ़ियों के सौ के करीब कवियों की दो सौ से अधिक कविताओं के बीच अच्छी-बुरी कविताओं पर बात करना तो इस समीक्षा के कलेवर में संभव नहीं, लेकिन इतना ज़रूर कहा जा सकता है कि यह अंक केदार नाथ सिंह, मंगलेश डबराल, इब्बार रब्बी, लीलाधर मंडलोई, मदन कश्यप, नरेश चंद्रकर, सविता सिंह, संजय कुंदन, विमल कुमार, श्री प्रकाश शुक्ल, शिरीष कुमार मौर्य और मनोज कुमार झा की बेहद अच्छी कविताओं के लिए याद किया जाएगा.  

समीक्षित पुस्तक – रचना समय का कविता विशेषांक, मई-२०११
संपादक – नरेश सक्सेना
मूल्य – १०० रुपये