सहजि सहजि गुन रमैं : पुरुषोत्तम अग्रवाल

Posted by arun dev on अगस्त 25, 2011



















डॉ. पुरुषोत्तम अग्रवाल ::

जन्म : २५ अगस्त, १९५५, ग्वालियर
उच्च शिक्षा जे.एन.यू से
महत्वपूर्ण आलोचक – विचारक
कुछ कविताएँ भी
नाटक, वृत्तचित्र और फिल्मों में दिलचस्पी

संस्कृति : वर्चस्व और प्रतिरोध, तीसरा रुख, विचार का अनंत, कबीर:साखी और सबद तथा अकथ कहानी प्रेम की : कबीर की कविता और उनका समय आदि प्रकाशित

मुकुटधर पाण्डेय सम्मान, देवीशंकर अवस्थी आलोचना सम्मान , राजकमल हजारीप्रसाद द्विवेदी कबीर सम्मान .
 
कॉलेजियो द मेक्सिको तथा कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी में विजिटिंग प्रोफेसर, अमेरिका, इंग्लैण्ड, जर्मनी, फ्रांस, आयरलैंड, आस्ट्रेलिया, नेपाल, श्रीलंका, थाईलैंड आदि देशों में व्याख्यान यात्राएं 

भारतीय भाषा केन्द्र (जेएनयू ) के अध्यक्ष, एनसीआरटी की हिंदी पाठ्य–पुस्तक समिति के मुख्य सलाहाकार रहे

सम्प्रति संघ लोक सेवा आयोग के सदस्य
ई पता :  purushottam53@gmail.com

  
पुरुषोतम अग्रवाल के लिए कवि-कर्म सैद्धांतिक मीमांसा से परे कोई सुविधाजनक अरण्य नहीं है. प्रेम, आसक्ति और राग का भाषिक सृजनात्मक सौंदर्य, विवेक और विवेचना का ही विस्तार है, यह कई बार उसका उद्गम बनता है और अनेको बार रूढ़ विवेक और विवेचना की आम परिपाटी पर संशय का साहस भी देता है.
पुरुषोत्तम का कवि, विचारक पुरुषोत्तम में कोमल, संवेदनशील और मानवीय पक्ष की तसदीक करता है, ज़िरह करता है और अंतत: उसकी रक्षा भी.  यही वह पता है जहां खो जाने पर कवि पूछते पूछते पहुँचता है.


 रज़ा
गुमशुदा


यह औरत कुछ दिन से लापता है
दूर नहीं, पड़ोस में ही
जमना के कश्तीपुल के आस-पास कहीं रहती थी
यह औरत
किसी घर में

दीवारों का कच्चापन झाँकता है
नीली-हरी पन्नियों के चमक के पीछे
दिखता है गन्ने को लुगदी में बदलता कोल्हू
दिखता है कश्तियों का पुल
घर का नहीं, घर के जरा पास का पुल.

घर का बीमार, बोशीदा दरवाजा
खुलते बंद होते वक्त
कुछ कहता है
चरमराती, काँपती आवाज में
सुन कर कोई, कोई भी बेकाबू नहीं होता
क्यों हो? दरवाजा फकत कहानी ही तो कहता है.

खैर, आप तो वो सामने इश्तेहार देखिए
बीच में तस्वीर लापता औरत की
कोई फोन नंबर,
कहीं नहीं बीमार बोशीदा दरवाजा
कहीं नहीं गन्नों को लुगदियों में बदलता कोल्हू
कहीं नहीं कश्तियों का पुल
फकत एक चेहरा है
गौर से इसे बाँचें
किसका है यह चेहरा
शायद आप पहचानें.

इतनी सिलवटें और झुर्रियां कितनी सारी
एक दूसरे से बतियाते, एक दूसरे से लड़ते
इतने सारे निशान, एक इबारत बनाते
इस छोटे से चेहरे पर
इतनी उलझनें इत्ते से बालों में
जरा गौर से देखें
शायद आप पहचान लें इस चेहरे को.

पुल, कोल्हू, दीवार और दरवाजे का तिलिस्म भेद
यह औरत तो चली आई गुमशुदगी तक
घर छूट गया पीछे ही
बच गया
लापता होने से.


समुद्र किनारे मीरा

तुम्हारी बाट देखते देखते
मैं स्वयं आ पहुँची तुम तक
मेरे समुद्र श्याम
अब तो अपनी बनाओ मुझे – निठुर
मत भरमाओ मुझे
मत छलो स्वयं को अब और


ये जो उठती लहरें
जिनकी बेचैनी बढ़ती पल प्रतिपल
ये लहरें नहीं तुम्हारे गहन अंतस में
छुपी उत्कंठाएँ हैं – लालसाएँ हैं ये – प्रिय मेरे




यह जो विस्तार फैला वहाँ तक दूर तलक
यह विस्तार तुम्हारे पुष्टसांवरे वक्षस्थल का है
समुद्रश्याम
अँकवार लो मुझे


यह जिसे सब अस्ताचलगामी सूर्य सा देख रहे हैं
यह तो है स्यांतक मणि
द्विगुणित कर रही अपनी शोभा
तुम्हारे वक्षस्थल के मादक वर्ण से
तुम्हारा वक्षस्थल जिसके वर्ण में
घुल मिल गया है मेरी पुतलियों की
आतुरता का वर्ण
जिसमें समा गयी है मेरी आंखों की प्रतीक्षा


इतने लोभी हो तुम सांवरे,तुमने मन ही नहींवर्ण भी हर लिया है
समर्पिता का
खड़ी हूँ तुम्हारे किनारे
यहाँ आ पहुँचने के बाद
उत्कंठा से – लज्जा से आरक्त
वैदूर्यमण्डितस्यांतकसज्जित
तुम्हारे वक्ष के वाष्प से पूरित
आपादमस्तक प्रेमालोकस्नाता स्त्री मैं
खड़ी हूँ तुम्हारी पुकार की प्रतीक्षा में
तुम्हारे स्पर्श की बाट जोहती – साँवलिया !


पग-तलों में अपनी लालसा लहरों से गुदगुदी करके
सताओ मत निर्दयी
पल पल खिसकती है पाँव तले से धरती
डर लगता है ना………नाथ जी!
पग-तल को गुदगुदा कर लौटती हर लहर
रेत को ही नहीं थोड़ी थोड़ी कर मुझे भी ले जाती है
अपने साथ….कितना मीठा है डर ...
कितना मादक धीरे धीरे रीतना...


अब न लौटूँगी कान्हा...
पूरी की पूरी रीते बिना


लौटने में चमकता अँधेरा है...स्वर्ग का...धर्म का...
डरती हूँ घिर ना जाऊँ सदा के लिए चमकीले अंधेरे में
छोड़ आई सब कुछ पीछे
मेड़तामेवाड़वृन्दावनसारे रण
पीछे छूट गए हैं तुम्हारी सखी सेरणछोड
सम्मुख है केवल नील ज्योति प्रसार
शुद्ध श्यामल पारावार
तुम्हारा अनंत प्यार
विराट वक्ष – मेरे एक आधार


अब ना लौटाओ मुझे
बढ़ाओ बाँहें समा लो मुझे …..छुपा लो
छुपा छुपी में अब तो खिला लो मीता
अपनी मीरा को
लो मुझे……..मैं आई……..समुद्रश्याम.

(कुछ वर्ष पूर्व लिखी गई..)



मेवाड़ में कृष्ण
(उदयपुर के जगदीश मंदिर के द्वार पर किंवदंती लिखी है कि भगवान जगन्नाथ ने राणा से कहा " मेरा मंदिर बनवाओ, मीरा को दिया वचन निभाने मुझे पुरी से मेवाड़ आना है ")

तुम आईं थी सखी
सांवरे समुद्र में समाने, मेरी द्वारिका तक
मैं तो स्वयं वहाँ नहीं था,
उदय की खोज में
चला गया था,
अस्ताचल के पश्चिम से पूरब की ओर
लौटना चाहता हूं
अपनी तड़प तक अपने सत्व तक
मैंआऊंगा अब अनछुए छूट गये पलों को पाने
मैं आऊंगा मेवाड़ तुम्हें दिया वचन निभाने

आ सकूं इसी पल या प्रतीक्षा के बाद, 
प्रलय-पल
आना है मुझे मेरी प्रिया तेरे नगर, तेरे प्रांतर, तेरे आंचल
आना है तेरे गीतों का छंद छू पाने
ये अक्षौहिणियां, यह द्वारिका भुलाने
तुझे दिया वचन निभाने

तेरी कविता में महकती ब्रज-रज में बस जाने
तेरे गीतों के वृंदावन में मुरली बजाने
उस कोलाहल, उस महारास में
नाचने और नचवाने
अक्रूर रथ में चढ़ते पल दिया था
जो स्वयं को
वह वचन निभाने

मैं ही हूं कालपुरुष, सखि
ब्रह्माण्डों का संहारकर्ता
मैं ही हूं कालपुरुष, मीरा
कालप्रवाह का नियंता
मुझी से होकर गुजरता है
सारा जीवन-अजीवन, समय-असमय
प्रत्येक प्रवाह
मैं ही हूं अनंत, अनारंभ, अद्वितीय...

सबसे ज्यादा एकाकी, निपट अकेला

इस अकेले को आना है सखि
मेड़ता की गलियों में
खिलखिलाने
आऊंगा गुइयां,
मीरा
परात्पर, परंतप, पुरुषोत्तम को पीछे छो़ड़
पुन: अबोध बालक बन जाने
लुका-छिपी में इस अंतिम बार तुझ से हार जाने..
स्वयं को दिया, गुइयां को दिया
वचन निभाने...
(यह कविता पिछले वर्ष उदयपुर में जगदीश मंदिर की यात्रा के बाद..).

















रज़ा


::
सागर की साँवरी देह पर चाँदनी
जैसे तुम्हारे साँवरे गात पर आभा
करुणा की, प्रेम की, अपनी सारी बेचैनी को स्थिर करती साधना की
कितना अलग दिखता है समुद्र तुम्हें याद करते हुए
कैसी समझ आती हो तुम
समुद्र को याद करते हुए

::
वह पता है मेरा
खो जाता हूँ जब कभी
पूछते-पूछते वापस आ जाता हूँ.

::
शब्दों को नाकाफी देख
मैं तुम तक पहुंचाना चाहता हूं
कुछ स्पर्श
लेकिन केवल शब्द ही हैं
जो इन दूरियों को पार कर
परिन्दों से उड़ते पहुंच सकते हैं तुम तक
दूरियां वक्त की, फासले की
तय करते शब्द-पक्षियों के पर मटमैले हो जाते हैं
और वे पहुंच कर जादुई झील के पास
धोते हैं उन्हें तुम्हारी निगाहों के सुगंधित जल में.

::
पहले ही आए होते.

मेरी हथेली गर्म, खुरदुरे स्पर्श से भर गयी थी
विशेषणों से अलग कर किसी संज्ञा के जरिए पहचान सकूं
इसके पहले ही फिसल गया वह स्पर्श हथेली से
बेचैन, हतप्रभ छोड़ मुझे...
काश जान पाता किसी तरह
क्या था वह
जो एकाएक भर मेरी हथेली,
एकाएक ही फिसल भी गया.

कौन सी जगह थी वो जिसने भरी थी मेरी हथेली उस स्पर्श से
खोजता रहा सोचता रहा, सोचता रहा खोजता रहा,
कौन सी थी वह जगह
पुरी का सागर तट
अलकनंदा का अनवरत प्रवाह
सरयू की ठहरी सी धार...
जे.एन.यू. की रात के अंतिम पहर का सन्नाटा
कालीघाट, दश्वाश्वमेध,
हाइगेट का कब्रिस्तान,
आज़्तेकों का तेउतियाखान
जिन्नात का बनाया किला ग्वालियर का
या मोहल्ले का बुजुर्ग वह पेड़ पीपल का....

हर जगह दोबारा लौटा
खड़ा हुआ, गहरी साँस ली, टटोला, टोया
हँसा, गाया और...रोया...
सब व्यर्थ
क्या सच, सब व्यर्थ?

कहीं दोबारा नहीं गया था मैं
हर जगह पहुँचा पहली ही बार
इस वहम के साथ कि पहले भी आए थे
इस कसक के साथ कि पहले ही आए होते.

::
कवि के सपने में एक शहर आबाद था
शहर का नाम ग्वालियर या शायद इलाहाबाद था
सपने से निकला कवि
आ गया इस महानगर में
कितने मकान बदले
रह न पाया कभी घर में.




विख्यात चित्रकार रज़ा के साथ पुरुषोत्तम अग्रवाल