सबद भेद : अज्ञेय : परम्परा,प्रयोग और आधुनिकता : परितोष कुमार मणि


रघुवीर सहाय ने अज्ञेय के लिए एक सुंदर वाक्य लिखा है कि मानव मन को खंडित करने वाली पराधीनता के प्रतिकूल अज्ञेय की मानव – अस्मिता और गरिमा की प्रतीतियाँ आधुनिक भारतीय की स्वंत्रता के ही मूल्य हैं. कहना न होगा कि अज्ञेय का लेखन परम्परा से ज़िरह करता हुआ समकाल से पार जाता है, और स्वतंत्रा के ये मूल्य आधुनिकता के आज भी सबसे पवित्र अवदान हैं. 

जन्म शताब्दी वर्ष में परितोष कुमार मणि का अज्ञेय के संदर्भ में परम्परा, प्रयोग और आधुनिकता को टटोलता हुआ यह आलेख.  

हिंदी साहित्य में सच्चिदानन्द हीरानंद वात्स्यायन अज्ञेय अपने सजग, अन्वेषी सृजनधर्मिता के कारण आधुनिक भावबोध के अग्रदूत के रूप में स्थापित हैं. अज्ञेय ने अपनी तात्विक दृष्टि से विभिन्न साहित्यिक विधाओं के सृजन और अन्वेषण को नए आयाम दिया. वास्तव में अज्ञेय को समझे बिना बीसवीं शताब्दी के हिंदी साहित्य के बुनियादी मर्म,उसके आत्मसंघर्ष, उसकी जातीय जीवनदृष्टि और उसके आधुनिक पुनराविष्कार को समझ पाना कठिन है. हिंदी के वैचारिक,सृजनात्मक आधुनिक साहित्य पर अज्ञेय की गहरी और अमिट छाप है.             

परम्परा,प्रयोग और आधुनिकता ऐसे विषय हैं, जिन्होंने हिंदी जगत में कुछ बुनियादी परिवर्तन किये, अज्ञेय ने इन विषयों पर हिंदी में जितना सार्थक, सजग और रचनात्मक लेखन और चिंतन किया, उतना किसी अन्य ने नहीं. वस्तुतः हिंदी में परम्परा और आधुनिकता को सदैव अलग-अलग वैचारिक आयामों से मापा जाता रहा, लेकिन अज्ञेय ने इस धारणा को स्पष्ट रूप से खंडित किया, उनका मानना है परम्परा बदलती हुई परिस्थितियों के अनुरूप परिवर्तित होकर निरंतर जब नवीन होती जायेगी ,तभी उसकी प्रासंगिकता है. परम्परा और प्रयोग दोनों एक दूसरे से संपृक्त हैं. इन दोनों का संबंध ही जहा परम्परा को उसकी रुढिवादिता से आगे ले जाकर उसका पुनर्संस्कार करता है, वहीँ प्रयोगों की अनिवार्यता भी सिद्ध करता है.इस तरह कवि के लिए सिर्फ परम्परा नहीं, उसका अपने युग के अनुरूप परिष्कार भी जरुरी है. परम्परा एक व्यापक अनुभव के रूप में समकालीन लेखक और साहित्य के लिए सार्थक महत्व रखती है, इसीलिए साहित्य में नए आयामों का प्रस्तुतीकरण और निर्वैक्तिकता बिना परम्परा के  विशद ज्ञान के प्राप्त नहीं हो सकता और इस परम्परा का आगे के सार्थक उपयोग के लिए नए प्रयोगों की आवश्यकता होती है.                                                                                                                                                      

वास्तव में नई अनुभूतियों का स्वीकार और पुराने भाव – संयोजनो की रुढिवादिता  का त्याग अथवा उनके प्रति विद्रोह का भाव ही प्रयोग की आवश्यकता  को जन्म देता है. इसे ऐसे भी कहा जा सकता है कि जब रागबोध का स्वरुप जटिल हो जाता है तो उसके सहज सम्प्रेषण के लिए नए प्रयोगों की जरुरत होती है, यदि अज्ञेय की इस बात पर ध्यान दिया जाये ‘हमारे मूल राग-विराग नहीं बदले,उनको व्यक्त करने की प्रणाली बदल गयी है’ तो यह स्पष्ट होगा कि कलाकार की संवेदनाएं तभी जटिल रूप धारण करती हैं जब परवर्ती युगीन वास्तविकताओं से हमारे  मूल राग-विराग टकराते हैं. जैसे-जैसे ये वास्तविकताएं परिवर्तित होती जाती हैं, वैसे-वैसे रागात्मक संबंधो के व्यक्त करने की प्रणालियाँ भी बदलती जाती हैं,न बदले तो वास्तविकता से उनका संबंध टूट जाता है. प्रयोग एक सामाजिक आवश्यकता है और विकास का रास्ता भी वहीँ से गुजरता है. साहित्य की सार्थकता के लिए भी ऐसे परिवर्तनों की जरुरत होती है, लेकिन बदलाव का अर्थ पूर्ववर्ती साहित्य की उपेक्षा नहीं है. उसे नई रचना के साथ-साथ अतीत की परम्परा  के अध्ययन  के लिए प्रयुक्त करना पड़ेगा, उससे पूर्ववर्ती  काव्य-परम्परा और आज के संदर्भ में उसकी प्रासंगिकता पर विचार करने में सहायता मिलती है. अज्ञेय का कहना है- हमारी पीढ़ी के कवि ऐसे स्थल पर पहुँच गए थे जहाँ उन्हें अपनी पिछली समूची परम्परा का अवलोकन करके आत्माभिव्यक्ति के नए मार्ग खोजने की आवश्यकता प्रतीत हो रही थी.प्रत्येक भाषा का शब्दकोश मरे हुए रूपकों का भंडार है किन्तु हमारे युग में रूपको के जीर्ण होने की यह क्रिया विशेष तेजी से हुई और साथ ही सामाजिक परिवर्तनों के साथ काव्य की वस्तु में असाधारण विस्तार आया .कवि ने सत्य देखे,नए व्यक्ति- सत्य और सामाजिक- सत्य और उनको व्यक्त करने के लिए भाषा को नए अर्थ देने की आवश्यकता हुई. इस तरह हम देख सकते हैं नए सत्यों की सहज अभिव्यक्ति की बुनियाद प्रयोग ही है.                                                                           

जिसे तथाकथित प्रयोगवाद कहा जाता हैऔर अज्ञेय दूसरा  सप्तक की भूमिका में जिसका जोरदार रूप  से खंडन कर चुके थे उसमे आरम्भ से ही परम्परा के प्रति विद्रोह और प्रयोग पर बल देने का भाव देखा जा सकता है, अज्ञेय स्वंय लेखकों को परम्परा से हट कर सृजन के लिए एक नया मार्ग तलाशने पर जोर देते. अपने लिए भी वो यही कहते हैं -

मेरा आग्रह भी नहीं रहा
कि मैं चलूँ उसी पर
सदा पथ कहा गया, जो
इतने पैरों द्वारा रौंदा जाता रहा कि उस पर
कोई छाप नहीं पहचानी जा सकती थी
                                            (अरी ओ करुणा प्रभामय) 

अज्ञेय परम्परा को उसके समूचे रूप में ग्रहण करने के विरोधी हैं, क्योंकि परम्परा में न तो सब मूल्यवान है और न ही सारा कुछ व्यर्थ. यह रचनाकार के उपर निर्भर करता है कि वह उसमे से अपनी रचना के लिए क्या लेता है, क्या आत्मसात करता है. आत्मनेपद में वह कहते हैं – ऐतिहासिक परम्परा कोई पोटली बाँध कर रखा हुआ पाथेय नहीं है जिसे उठा कर हम चल निकले.वह रस है, जिसे बूँद-बूँद अपने में हम संचय करते हैं – या नहीं करते, कोरे रह जाते हैं.  इस टिप्पणी से स्पष्ट है कि अज्ञेय जहाँ एक तरफ परिस्थिति निरपेक्ष परम्परा  को स्वीकार नहीं करते, वहीँ दूसरी तरफ परिस्थिति के सम्मुख समर्पण कर देने के बजाय  परम्परा का सामर्थ्य इसमें मानते हैं कि वह नई परिस्थितयों का किस हद तक सामना कर सकती है, सामना करने और टकराने की यह स्थिति ही परम्परा का विकास या उसका नवीकरण है. अज्ञेय इन्ही अर्थो में आधुनिक लेखक हैं.उनके लिए परम्परा ज्ञान की विकासशील प्रक्रिया है, जिसे रचनाकार को अपने अनुभव से चुनना होगा,तभी उसके लेखन कि सार्थकता है, इसीलिए वे लेखन के लिए शाश्वत मूल्यों को नहीं अनुभव के विकास को जरुरी मानते हैं- अनुभव कोई स्थिर या जड़पिंड नहीं,वह निरंतर विकसनशील है.बुद्धि का नए अनुभवों के आधार क्रमशः नया स्फुरण और प्रस्फुटन होता है और नया अनुभव पुराने अनुभव को मिटा नहीं देता ,उसमे जुडकर उसे नई परिपक्वता देता है. साहित्य में हम परम्परा की चर्चा इसी अर्थ में करते हैं ,तारतम्यता उसमे अनिवार्य है.
                                          (आधुनिक हिंदी साहित्य)

परम्परा को आत्मसात करना, उसको समय सापेक्ष बनाने के लिए प्रयोग की आवश्यकता और इन दोनों के समायोजन से आधुनिक रचना-दृष्टि की उत्पति; अज्ञेय के समूचे साहित्य की बुनियाद और प्रस्थान-बिंदु है..उनके लिए आधुनिकता का अर्थ परिस्थितियों के परिवर्तन के साथ नई प्रक्रियाओं का हिस्सा बन जाना है.वास्तव में किसी परम्परा द्वारा इतिहास के आगे प्रस्तुत की गयी चुनौतिओं  की पहचान ही आधुनिकता को जन्म देती है.परम्परा अतीत की गहराइयों से निकलकर वर्तमान को मापते हुए भविष्य की ओर उन्मुख होती है. इस प्रकार एक संवाद जो निरंतर परम्परा और वर्तमान के बीच चलता रहता है, वहीँ आधुनिकता को जन्म देता है. 

पंद्रहवीं शताब्दी के आस –पास आधुनिकता का अर्थ कलाजगत में मानवीय संदर्भों के आधार पर लगाया गया और लगभग इसी समय आधुनिक विज्ञान ने नवीन अविष्कारो के द्वारा जन-जीवन को प्रभावित करना शुरू किया.तर्क और विश्लेषणमूलक चिंतन की आधार वाली स्थितियां सत्रहवीं शताब्दी तक यूरोपीय साहित्य में प्रतिफलित होने लगी थी और ये स्पष्ट रूप से भावात्मक और धारणामूलक चिंतन के प्रति विद्रोह की  सूचक थी. विज्ञान के नए आविष्कारों से उस चिंतन में तर्क,विवेचन,अन्वेषण तथा प्रयोग जैसी स्थितियां उत्पन्न हुईं और इनसे प्रभाव से कलाजगत विशिष्ट हुआ. इस प्रकार प्राचीन व्यवस्था की सोच तथा चिंतन-पद्धति को माँजकर, उसे नया संस्कार देकर तार्किक, अन्वेषणात्मक और प्रयोगशील बनाकर—नई परिस्थितियों के सामना करने के लिए तैयार किया गया. संस्कार देने की इस स्थिति को ही अज्ञेय आधुनिकता के रूप में देखते हैं, यही संस्कार लेखक की संवेदना से जुड़ता है.संवेदना और संस्कार का सम्बन्ध और उस संबंध का लचीलापन ही किसी प्रकार के कला की सर्जनात्मकता संभव करता है.

आधुनिकता का अर्थ अज्ञेय के लिए सिर्फ सामाजिक रूप से मूल्यनिरपेक्ष  हो जाना नहीं है, बल्कि उनका मानना है कि उन मूल्यों के प्रति सजग होने की हमारी ज़िम्मेदारी बढ़ जाती है, लगातार उनका परीक्षण करते रहना हमारा कर्तव्य हो जाता है,उनका आशय मूल्यों के प्रति नैरंतर प्रवाह को ही आधुनिकता मानने से है. यही वजह है कि अज्ञेय आधुनिकता को एक नए ढंग का कालबोध मानते हैं.  वस्तुतः जैसे-जैसे कालबोध परिवर्तित होता है, वैसे ही बहुत सी चीजों के साथ हमारे संबंध भी अनिवार्य रूप से बदल जाते हैं जैसे इतिहास के साथ, सामाजिक परिवेश के साथ, तंत्र-श्रम और पूँजी के साथ, शासन-सत्ता एवं कला-साहित्य के साथ,इसीलिए अज्ञेय आधुनिकता में कालबोध और संवेदन का प्राथमिक महत्व मानते हुए उस पर आग्रह करते हैं.साहित्य सबसे पहले एक सार्थक रचनात्मक चेष्ठा है, जिसमे सौंदर्य - दृष्टि और मानवीय मूल्यों की प्रधानता होती है. कवि कुंवरनारायण का कहना है- कलाओं में आधुनिकता का प्रमुख अर्थ यह होगा कि मनुष्य अपनी बनाई चीजों और अपने बारे में उपलब्ध नई-पुरानी जानकारियों को कैसे मानवीय और सुन्दर बनाता है.
 (आज और आज से पहले).
चूँकि मानवीयता का यह स्वरुप रचनाकार की अपनी संवेदना से जुड़ा होता है अतः साहित्य की आधुनिकता के लिए वह तो आवश्यक है ही, साथ ही उन संवेदनो की सहज-सार्थक प्रस्तुति और उसका सम्प्रेषण भी वांछित है,इस तरह अज्ञेय आधुनिकता को सीधे सम्प्रेषण और साधारणीकरण के मूल प्रश्न से जोड़ देते हैं- यदि  हम आधुनिकता की चर्चा साहित्य और कलाओं के सन्दर्भ में करते हैं तो इन दोनों को जोड़कर रखना अनिवार्य हो जाता है.साहित्य और कला मूलतः एक सम्प्रेषण है.
                                                           (केंद्र और परिधि)
सहित्य मूलतः अभिव्यक्ति और सम्प्रेषण का ही क्षेत्र है, इसलिए साहित्यकार को अपनी रचना-दृष्टि के विकास के लिए अपनी संवेदन को बदलना अपरिहार्य है, नहीं तो साहित्य एक ही स्थान पर ठहर कर जड़ हो जायेगा. अज्ञेय कहते हैं— अगर हम नयी परिस्थिति को और उससे उत्पन्न होने वाली चुनौतियों को नहीं पहचानते तो हम विभिन्न कलाओं में आने वाले परिवर्तनों को ठीक-ठीक नहीं समझ सकते हैं, उनके मूल कारणों के साथ जोड़ नहीं सकते.
(केंद्र और परिधि)
इस तरह से देखा जा सकता है अज्ञेय के लिए परम्परा, प्रयोग और आधुनिकता तीनों एक दूसरे से संपृक्त होकर ही अपनी सार्थकता सिद्ध करते हैं,जो परिवर्तन  और नयेपन के लिए अनिवार्य है. नए संवेदना बोध के साथ सम्प्रेषण की पद्धतिया भी बदले, साहित्य और रचनाकार की प्रासंगिकता इसी से बची रह सकती है. आधुनिकता सम्बन्धी चिंतन अज्ञेय के लिए महज पश्चिमी नक़ल नहीं है, बल्कि वह स्वस्थ परिवर्तनों के अनुकूल रह कर उसे आत्मसात करने की प्रक्रिया है.वह आधुनिकता के संस्कार के लिए परम्परा की जड़ो तक लौट कर जाते हैं .अज्ञेय अपनी रचनाधर्मिता, अपने चिंतन से साहित्य को नई दिशा और दशा देते हैं और इस तरह से अपनी प्रासिंगकता को सिद्ध करते हैं.वास्तव में इस शती में जिन लोगो ने हिंदी साहित्य की स्थिति और नियति का निर्धारण किया है, उसमे अज्ञेय सर्वोपरि हैं.          













परितोष मणि 
उच्च शिक्षा  जे.एन.यू से. 
अज्ञेय की काव्य- दृष्टि प्रकाशित.
ई-पता : dr.paritoshmani@gmail.com                                    

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  1. " अज्ञेय " पर बेहद सार्थक आलेख
    परितोष मणि का ....

    आभार अरुण जी...

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  2. Nirmal Paneri5/6/11, 7:01 pm

    हमारे मूल राग-विराग नहीं बदले,उनको व्यक्त करने की प्रणाली बदल गयी है’ तो यह स्पष्ट होगा कि कलाकार की संवेदनाएं तभी जटिल रूप धारण करती हैं जब परवर्ती युगीन वास्तविकताओं से हमारे मूल राग-विराग टकराते हैं. जैसे-जैसे ये वास्तविकताएं परिवर्तित... होती जाती हैं, वैसे-वैसे रागात्मक संबंधो के व्यक्त करने की प्रणालियाँ भी बदलती जाती हैं,न बदले तो वास्तविकता से उनका संबंध टूट जाता है. प्रयोग एक सामाजिक आवश्यकता है और विकास का रास्ता भी वहीँ से गुजरता है. साहित्य के सार्थकता के लिए भी ऐसे परिवर्तनों की जरुरत होती है, लेकिन बदलाव का अर्थ पूर्ववर्ती साहित्य की उपेक्षा नहीं है. उसे नई रचना के साथ-साथ अतीत की परम्परा के अध्ययन के लिए प्रयुक्त करना पड़ेगा, उससे पूर्ववर्ती काव्य-परम्परा और आज के संदर्भ में उसकी प्रासंगिकता पर विचार करने में सहायता मिलती है... वाह बहुत शुक्रिया अरुण जी कही न कही दिमागी त्रंत्र की सर्विस करता ये आप का नोट बहुत सटीक शिख देता हुआ आज के परिपेक्ष्य की !!!!!!!!!!!!!

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  3. Gaurav Muktaabh5/6/11, 8:55 pm

    मानव मन को खंडित करने वाली पराधीनता के प्रतिकूल अज्ञेय की मानव – अस्मिता और गरिमा की प्रतीतियाँ आधुनिक भारतीय की स्वंत्रता के ही मूल्य हैं. vah sir kya vaky uthaayaa hai.............

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  4. Nautan Gairola5/6/11, 8:56 pm

    मानव मन को खंडित करने वाली पराधीनता के प्रतिकूल अज्ञेय की मानव – अस्मिता और गरिमा की प्रतीतियाँ आधुनिक भारतीय की स्वंत्रता के ही मूल्य हैं.... main aisee mulyon ko dharan karne valeY Agyey ji kp sat sat naman karti hun... Raghuveer ji ke in sundar vaakyon ko share kiya aapne .. aapka shukriya

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  5. Sainny Ashesh5/6/11, 8:57 pm

    सुंदर और सार-गर्भित टिप्पणियाँ। अरुण, निर्मल, गौरव और नूतन ने 'अज्ञेय' को समझने की अच्छी कोशिश की है...हालांकि हिन्दी के ठेकेदारों के लिए 'अज्ञेय' सदा 'अज्ञेय' ही रहेंगे। स्वाभाविक लक्षण हैं।

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  6. परितोष का आलेख पढ़कर फिर एक बार मेरे अंदर अज्ञेय को समझने का उत्साह पैदा हो गया है। बहुत अच्छा लगा। लेखक की दिलचस्पी किशोरावस्था से ही अज्ञेयपरक हो गयी थी। वे अज्ञेय और मोहन राकेश के प्रति गहराई... से अनुरक्त थे। प्रस्तुत लेख में जिस सहजता से अज्ञेय के परंपरा, प्रयोग और आधुनिकता संबंधी विचारों को स्पष्ट किया गया है उससे भी सिद्ध होता है कि परितोष अज्ञेय के गहरे पाठक और व्याख्याता हैं। मुझे लगता है कि अज्ञेय को पूरी तरह समझने के लिये इन तीन सूत्रों को उनकी सर्जना से जोड़कर समझना बहुत जरूरी है। यही एक सीधा रास्ता है जो हमें अज्ञेय के चिंतन और सृजन के साथ जोड़ता है। वे सिर्फ नाम से ही अज्ञेय हैं;वरना उनकी कविताएँ,कहानियाँ और उपन्यास ज़िंदग़ी को हमारे लिये पहले से ज्यादा ज्ञेय और गम्य बनाते हैं।

    [आत्मनेपद में वह कहते हैं – ऐतिहासिक परम्परा कोई पोटली बाँध कर रखा हुआ पाथेय नहीं है जिसे उठा कर हम चल निकले.वह रस है, जिसे बूँद-बूँद अपने में हम संचय करते हैं – या नहीं करते, कोरे रह जाते हैं]

    [परम्परा को आत्मसात करना, उसको समय सापेक्ष बनाने के लिए प्रयोग की आवश्यकता और इन दोनों के समायोजन से आधुनिक रचना-दृष्टि की उत्पति; अज्ञेय के समूचे साहित्य की बुनियाद और प्रस्थान-बिंदु है..]

    बहुत सुंदर काम भाई परितोष!!! बधाई। बस दो-चार जगह वर्तनियों का दोष मुझे खटक रहा था; भले ही वे आप या अरुण से जल्दबाज़ी में चली गयी हों। बानगी देखिए - ये नमूने इसी आलेख से चयनित हैं (नैरेन्तैर्यता/छेत्र/रचना-दृष्टी/रूढ़ीवादिता/मूल्यनिर्पेक्ष)। मैं फिर भी तहे-दिल से मानता हूँ कि कितना भी जुगत भिड़ाइये वर्तनी की कुछ गलतियाँ तो खुद वर्तनी की एकरूपता के अभाव में होनी ही हैं।

    बाकी सब बहुत सुंदर...बहुत श्लाघ्य...। परितोष और अरुण को पुन: बधाई।See More

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  7. अनाम7/6/11, 11:49 am

    परम्परा को आत्मसात करना, उसको समय सापेक्ष बनाने के लिए प्रयोग की आवश्यकता और इन दोनों के समायोजन से आधुनिक रचना-दृष्टि की उत्पति; अज्ञेय के समूचे साहित्य की बुनियाद और प्रस्थान-बिंदु है..accha aalekh hai.arun aur paritosh aadono ka shukriya

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  8. आपने मेरे बच्चों के साथ अज्ञेय का फोटो चुना, इसके लिए धन्यवाद.
    आपकी पुस्तक 'अज्ञेय की काव्य दृष्टि' कहाँ से छपी है?
    -ओम थानवी

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  9. ओम थानवी जी..
    यह सूचना तो और भी प्रीतिकर है ..वास्तव में यह अज्ञेय का दुर्लभ फोटो है. आभार.
    परितोष मणि की किताब अनामिका प्रकाशन इलाहाबद से मुद्रित है.

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