मैं कहता आँखिन देखी : रंजना अरगड़े

Posted by arun dev on दिसंबर 05, 2010


शमशेर बहादुर सिंह (१९११-१९९३) की जन्म शताब्दी वर्ष पर समालोचन की विशेष प्रस्तुति

"एक कवच मैं और ओढ़ना चाहता हूँ
एक अदृश्य कवच - निरहंकार,तटस्थतम
निर्मलता का".                                                       
डायरी-६/मार्च/१९६३


कई बार ऐसा लगता है कि शमशेर की कविताएँ आरोप हैं जिनकी सफाई हर आलोचक देता है. शमशेर अपने शिल्प के कारण आलोचना की दुविधा हैं. जब कहा जाता है कि –‘कवियों के कवि शमशेर’ तब इसका आशय यह है कि शमशेर की कविताएँ इतनी बहुस्तरीय और जटिल है कि इसे कोई कवि ही समझ सकता है. एक कवि के लिए और वह भी जिसे प्रगतिशील कहा जाता हो इससे बड़ा लांछन क्या हो सकता है? पाठकों के बिना न तो कविता की मुक्ति है न कवि की.

कम समझे गए,गलत समझे गए और अब भी समझने की चुनौती पेश करते हिंदी के इस सीधे – सादे कवि पर रंजना अरगंडे और अपर्णा की आत्मीय बातचीत.  
संपादक


पारदर्शी धूप के पर्दे :

आज से करीब एक सप्ताह पूर्व अरुण जी ने डॉ. रंजना अरगड़े से शमशेर पर बातचीत के लिए कहा. जैसे स्कूल खुलने पर विद्यार्थी तमाम तैयारी करता है, वैसे ही मैं भी तैयारी में जुट गई. घर में एक लायक कलम न थी.  झट एक महँगी कलम लायी गयी, नोट पैड और फोल्डर मंगाए गए. पुस्तकों की भीड़ में तलाश हुई शमशेर के कविता संग्रहों की. कुछ सामग्री उपयोगी थी  पर कुछ न मिल पाने के कारण खीज हुई जिसका शिकार घर-भर गाहे बगाहे होता रहा. नोट्स बनाये गए ... प्रश्न हाशिये से निकलकर बाहर आये, हालांकि अन्त तक उन पर संशय ही रहा.
चश्में से झांकता सौम्य चेहरा, सामान्य भारतीय कद, रंग साफ़, नीम्बू के बौर रंग की तांत की साड़ी- रंजना जी थी.
बड़े स्नेह से अभिवादन का उत्तर देते हुए एक अन्य कक्ष में चलने का आग्रह किया. यह हिंदी विभाग की कोई क्लास थी. पहले कुछ सामान्य बातें हुईं .. नयी शिक्षा प्रणाली, शिक्षण में होने वाली क्रान्ति, अंतरजाल का शिक्षा में प्रयोग ..आदि  

बातचीत को आगे बढाते हुए मैंने पूछ ही लिया-
रंजना जी आपने शोध कार्य शमशेर जी पर ही क्यों किया ?



बिना झिझक के उत्तर आया-
पहली बात तो यह थी कि मेरे मन में यह तय था कि कविता पर काम करना है। मैंने नरेश मेहता के आठ काव्य संग्रहों पर एम.ए में काम किया था। अज्ञेय पर मेरे निर्देशक डॉ.भोलाभाई पटेल ने काम किया था। उन्हीं दिनों शमशेरजी की कविताएँ पढ़ी थी। शोधार्थी पुराने विषयों पर टिके थे. शमशेर जी के तीन संग्रह आ चुके थे– ‘कुछ कविताएँ’, कुछ और कविताएँ’ तथा ‘चुका भी हूँ मैं नहीं’ अपनी तरह की अलग कविताएँ .. उर्दू आकर्षित कर रही थी ... नए बिम्ब थे, दुरूह होता भाव पक्ष - बस चुनौती लगा उन पर काम करना.

रंजना जी की आवाज़ में खनक आ गयी और ये खनक हमारी रगों में भी दौड़ पड़ी .. एक झुरझुरी सी महसूस हुई .. आत्मविश्वास का पेड़ चारों ओर अपना हरापन बिखेर रहा था. वातवरण में शमशेर जी का प्रेम व्याप रहा था- 

द्रव्य नहीं कुछ मेरे पास
फिर भी मैं करता हूं प्यार
रूप नहीं कुछ मेरे पास
फिर भी मैं करता हूं प्यार
सांसारिक व्यवहार न ज्ञान
फिर भी मैं करता हूं प्यार
शक्ति न यौवन पर अभिमान
फिर भी मैं करता हूं प्यार
कुशल कलाविद् हूं न प्रवीण
फिर भी मैं करता हूं प्यार
केवल भावुक दीन मली
फिर भी मैं करता हूं प्यार.

प्रेम से संचालित उनकी जीवन दृष्टि से एक प्रश्न अनायास ही निकल आया ..
कैसा प्रेम था ? कैसा सौन्दर्य.. जो शिथिल ही नहीं हुआ !


रंजना जी सहज थी- 
सौन्दर्य उनके जीवन के केंद्र में था और संतुलन को वह सौन्दर्य मानते थे ... प्रेम उनके लिए अपने-अपने कर्तव्यों को देखना और बूझना था. वही उन्होंने किया . एक वृत्तांत सुनाते-सुनाते वह विह्वल हो उठीं - एक भरवाड दूधवाली घर आया करती थी . गुजराती बोला करती थी; वह भी ठेठ कच्छ की. शमशेर जी हिंदी में बात किया करते. दोनों के बीच संवाद का सूत्र क्या था ? कितना समझ पाते थे दोनों एक -दूसरे की बातलेकिन बातचीत का ये सिलसिला सालों चलता रहा. बाद को जब शमशेर जी को कबीर सम्मान मिला तब उन्होंने खुश होकर कुछ धन राशि इस भरवाड दूधवाली को दिलवा दी.  

अब प्रेम और सौन्दर्य की बात करते-करते हम संगीत को पकड़ बैठे .
क्या शमशेर जी की कविताओं में कोई संगीत है या फिर वे मात्र फ्री वर्स हैं ? फ्री वर्स का भी अपना संगीत होता है .

रंजना जी -
इस संदर्भ में आप फ्रांस के प्रतीकवादी आंदोलन को ध्यान में रख सकते हैं, जहाँ कविता के एक भीतरी संगीत की बात है। ये संगीत होता है अनुभूति का. फिर शमशेर जी तो चित्रकार थे .. तो ये संगीत तो होना ही था उनके काव्य में .अनुभूतियाँ बिम्ब बनाती हैं; बिम्ब चित्र सजाते हैं और ये चित्र भीतर की लय पर गाते हैं ..
 
धूप कोठरी के आईने में खड़ी
हँस रही है
पारदर्शी धूप के पर्दे
मुस्कराते
मौन आँगन में
मोम सा पीला
बहुत कोमल नभ
एक मधुमक्खी हिलाकर फूल को
बहुत नन्हा फूल
उड़ गई
आज बचपन का
उदास माँ का मुख
याद आता है....
बाहर से आने वाली पारदर्शी धूप खिड़की से छन-छन कर आ रही थी .. कमरे में मोम -सा पीताभ बिखरने लगा
क्या कवि का अंतर्मुखी मन बाहर की दुनिया  देख पाया ..  .


तब व्यग्र होकर रंजना जी कह उठीं
टूटी हुई, बिखरी हुई, चाय की दली हुई पाँव के नीचे कविता. मैं कौतुक से उन्हें सुन रही थी .. वह पूछ बैठीं –
चाय की दली हुई से क्या समझीं आप ?
अप्रत्याशित प्रश्न था .. उत्तर सूझा नहीं . तब उन्होंने ही क्रम संभाला
बार-बार चाय को उबालते रहो .. अंत में क्या बचता है ? बस यही दलना है . जिंदगी का दलना. यही यथार्थ है और उसका मनोभाव.
मैं हतप्रभ ! किस सहजता से रंजना जी ने हमारी बात का उत्तर दिया था !  
 
वह दुरूह कवि थे ? क्या कोई विदेशी प्रभाव ? अंतिम दिनों में उनकी एकान्तता ?

हाँ, थे .. दुरूह कवि थे वह . कलाकार की निपुणता और दक्षता थी उनमें वही उन्हें दुरूह बना रही थी. पर उनकी गज़लें इससे मुक्त रहीं .. ग़ज़लों की परम्परा को यथावत अपनाया .. लेकिन हिंदी कविता की बात कुछ और थी . हिंदी एक प्रयोगशाला बनी हुई थी . विदेशी प्रभाव भी था. सुरयलिज्म .. फ़्रांस का प्रतीकवाद .. नए सिम्बल्स ... बदलाव तो हो रहा था. अज्ञेय , मुक्तिबोध का व्यक्ति स्वातंत्र्य .. फिर शमशेर जी कैसे अछूते रहते. हिंदी उनका औपचारिक अध्ययन का विषय कभी रहा ही नहीं . भूगोल, दर्शन , अंग्रेजी और उर्दू विषय थे; इसलिए वैविध्य दीखना स्वाभाविक है.  एजरा पाउंड से ज्यादा असर क्यूमिन का था उन पर. ये सब मिल कर उनको दुरूह बना रहे थे. रंजना जी एक प्रवाह में बताती गयीं कि कवि को समझने के लिए कैसे उन्होंने उनकी कविताएँ टेप कर ली थीं, जिन्हें सौ से दो सौ बार तक सुनना होता .. तब जाकर मर्म समझ आता.

पार्किन्सन हो गया था . शरीर साथ नहीं दे रहा था. इधर उन्होंने लिखना भी छोड़ दिया था . कहते - नए लोग (मंगलेश डबराल आदि ) नया और अच्छा लिख रहे हैं ... अब उन्हें लिखने दो . कहाँ ज़रुरत है, लिखने की. पर ज़िन्दगी से जुड़े रहे . हमेशा सच पर अडिग .. खरापन था उनमें . आँखें बुढ़ापे में भी बच्चे सी चमकीली निर्मल, निर्दोष.. जैसे एक बच्चा पेड़ को देखता है .. आसमान को देखता है ... नदी को देखता है .. चिड़िया और सुबह को देखता है; उसी शुभ्रता, निर्मलता से वे भी दुनिया को देखते ...

एक बार की बात है-

वह एक चरवाहा था . अक्सर चुपके से पेड़ काट कर ले जाता.
उस दिन जब मैं घर लौटी तो देखा - वह लगभग पूरा पेड़ काट चुका था. मैं बरस पड़ी.
किससे पूछकर पेड़ काटा ?जी, दादा जी से.
अब मेरे चौंकने की बारी थी. भीतर आकर शमशेर जी से पूछा कि- चरवाहे को पेड़ काटने की इज़ाज़त क्या उन्होंने दी ?वे सरल भाव से बोले – हाँ, बेचारे की बकरियां .. चारा कहाँ से लाये ?

फिर थोड़ी देर के लिए रंजना जी चुप हो गयीं. कमरे में मौन पसरा था.   
फिर वह बोलीं- एक ख़त उनकी मृत्यु के बाद आया. यह पोस्टमैन का ख़त था, जो रोज़मर्रा में चिट्ठी डालने आता था. शमशेर जी की मृत्यु का समाचार सुन कर उसने चार पेज का ख़त लिखा !  
 

दो घंटे से ऊपर हो गया था . वहाँ से लौटने का मन न था ...

थरथराता रहा जैसे बेंत
मेरा काय...कितनी देर तक
आपादमस्तक
एक पीपल-पात मैं थरथर
कांपती काया शिराओं-भरी
झन-झन
देर तक बजती रही
और समस्त वातावरण
मानो झंझावात
ऎसा क्षण वह आपात
स्थिति का ...


रंजना भालचंद्र अरगंडे - (१९५७ दाहोद,गुजरात), समीक्षक आलोचक
शोध कार्य के दौरान अस्वस्थ शमशेर बहादुर सिंह की वर्षों तक देख भाल.
आलोचना,निबन्ध और अनुवाद की पुस्तकें. 
वाणी तथा माता कुसुम कुमारी पुरस्कार से सम्मानित.
आचार्य एवं अध्यक्ष ,हिन्दी विभाग, भाषा साहित्य भवन, गुजरात युनिवर्सिटी, अमदावाद
ई-पता :  argade_51@yahoo.co.in
अपर्णा मनोज भटनागर- (१९६४, जयपुर),कवयित्री.
टेबल टेनिस का शौक.कत्थक सीखा.लोक नृत्य में विशेष योग्यता. इधर ब्लागिंग में सक्रिय     
ई-पता:  
bhatnagar.manuparna.manuparna@gmail.com