गुरदयाल
सिंह राही (10 January 1933 – 16
August 2016) अमृता
प्रीतम के बाद पंजाबी भाषा के ऐसे दूसरे रचनाकार हैं जिन्हें भारतीय ज्ञानपीठ
सम्मान प्राप्त हुआ था. उनके उपन्यासों के देश– विदेश में अनुवाद हुए और उनपर
फिल्में बनीं. उन्हें रूस से सोवियत लैंड नेहरू पुरस्कार भी मिला. इनकी तुलना
रूस के महान उपन्यासकार मक्सिम गोर्की से
की जाती है. गुरदयाल सिंह हाशिये पर गुजर-बसर करने वालों
की जिंदगी के सुख –दुःख के रचनाकार थे. वे खुद हाशिये से थे.
किसी भी
रचनाकार का एक जरूरी रिश्ता उसके प्रकाशकों से होता है. देश निर्मोही ‘आधार
प्रकाशन’ के प्रकाशक ही नहीं लेखक और संपादक भी हैं. उम्मीद है कि वह गुरदयाल
सिंह रचनावली का कार्य समय से सम्पन्न कर लेंगे. यही सच्ची श्रदांजलि होगी.
समालोचन
की तरफ से गुरदयाल सिंह की स्मृति को नमन.
गुरदयाल
सिंह : आम आदमी का लेखक
देश निर्मोही
गुरदयाल सिंह के उपन्यास भारतीय
जन-जीवन की एक सच्ची तस्वीर हैं. उनके उपन्यासों में
हरे भरे खेत खलियानों, कुओं , तलाबों, ऊबड़ खाबड़ गलियों, कच्चे मकानों, पक्के चौबारों और जीते जागते घर आँगनों का यथार्थपरक
ढंग से चित्रण हुआ है. गुरदयाल सिंह के लेखन की ताकत इस बात में थी कि उन्होने उन आम
लोगों का पक्ष लिया है जिन्हें सदियों से ‘नीच’ कह कर तिरस्कृत किया जाता
रहा है वह जगसीर, बिशना, रौनकी, साधू , मुंदर ,भानी, नंदी और सती जैसे पात्रों के संगी साथी हैं. यही
किसी साहित्यकार कि मानवता कि कसौटी है. गुरदयाल सिंह मलवे के ग्रामीण परिवेश के सांस्कृतिक
विवेक से जुड़े उपन्यासकार थे. उनके सभी उपन्यासों में सामाजिक, आर्थिक और राजनैतिक प्रभावों को प्रमुख रूप से देखा जा सकता
है. दलित जातियों पर हो रहे अत्याचारों के खिलाफ, पाखंड, झूठ और परम्पराओं के नकार में उनकी लेखनी की आवाज़ मुखर थी.
पंजाबी उपन्यास को यथार्थवाद की जमीन पर पुख्ता तरीके से ला खड़े करने वाले ज्ञानपीठ पुरस्कार विजेता उपन्यासकार गुरदयाल सिंह, जो अपने आप में एक जीता-जागता इतिहास थे आज हमारे बीच नहीं हैं. जिस तरह हम रूस के जनजीवन और उसके इतिहास को जानने के लिए तोल्स्तोय के पास जाते हैं और चीन तथा भारत के संदर्भ में लू शुन एवं प्रेमचंद के पास जाते हैं, उसी तरह पंजाब को जानने-समझने के लिए हमारे पास गुरदयाल सिंह का नाम आता है. उनकी कालजयी कृति 'मढ़ी का दीवा' के बाद उनके लगातार ऐसे उपन्यास प्रकाश में आते रहे जो अगला मील पत्थर प्रस्तुत करने का प्रयास करते रहे हैं जैसे 'अध चांदनी रात',
'परसा', ' घर और रास्ता',
‘सांझ सवेर’, ‘पाँचवाँ पहर‘, ' अंधे धोड़े का दान', और ' भर सरवर जब उच्छलै'. इसके अतिरिक्त भी उनका रचनात्मक अवदान गहन व्यापक है जिसमें उनके उपन्यास 'साँझ-सवेर', 'रेत की एक मुट्ठी' और 'पौ फटने से पहले',
चार सौ से अधिक कहानियां, निबन्ध, बाल-साहित्य और आत्मकथा 'क्या जानू मैं कौन' जो अपने आप में आत्मकथा की एक नई परिभाषा घडती है.
प्रख्यात आलोचक नामवर सिंह ने
'मढ़ी का दीवा' उपन्यास की तुलना तोल्स्तोय के उपन्यास ‘युद्ध और शांति’ से करते हुये अपने एक लेख में लिखा कि उन्नीसवीं शताब्दी में
जब यूरोप में उपन्यास पतन की ओर जाने लगा तभी एक पिछड़े देश तथा पिछड़ी कही जाती भाषा के एक उपन्यास ने इसे
चढ़त की ओर मोड दिया. यह उपन्यास था तोल्स्तोय की रचना ‘युद्ध और शांति‘ और भाषा थी रूसी. ऐसा ही कुछ भारतीय साहित्य के गद्य क्षेत्र
में घटा जब भारतीय उपन्यास अपने शिखर से पतन की ओर जाने लगा तो बीसवीं सदी के छटे दशक
में एक पिछड़ी कही जाने वाली भाषा ने इसे चढ़त की ओर मोड दिया. वह उपन्यास था ‘मढ़ी का दीवा’ और उसकी भाषा थी पंजाबी. रूसी भाषा में भी इस उपन्यास
का अनुवाद हुआ और लगभग 10 लाख प्रतियाँ प्रकाशित हुई. राष्ट्रीय फिल्म विकास
निगम द्वारा निर्मित इसी उपन्यास पर आधारित फिल्म को राष्ट्रीय अवार्ड मिला. 2012 में उनके एक और उपन्यास ‘अंधे घोड़े का दान‘ पर बनी फिल्म पर भी सर्वोतम पंजाबी फिल्म नेशनल अवार्ड मिल चुका
है.
प्रो. चमन लाल के साथ गुरदयाल सिंह |
गुरदयाल सिंह स्वतंत्र भारत
के एक प्रतिनिधि उपन्यासकार थे. उनसे मिलना और उनके रचना संसार से होकर गुजरना दोनों
ही अपने आप में अनूठे अनुभव थे. गुरदयाल सिंह के रचना संसार में विचारने का मौका उनके
पहले उपन्यास ‘मढ़ी का दीवा’ से मिला. बाद में ‘अध चाँदनी रात’ पढ़ने को मिला और कुछ कहानियाँ. ‘परसा’ पंजाबी में प्रकाशित होते ही खूब चर्चित हुआ और उसे
पहले पंजाबी में ही पढ़ा.
यह संयोग विरले ही देखने को
मिलता है कि एक ही व्यक्ति में एक अच्छा इंसान और अच्छा लेखक एकसाथ हों. पंजाबी साहित्य
में यह संयोग गुरदयाल सिंह के रूप में देखने को मिला. ‘परसा’ का हिन्दी अनुवाद आधार से प्रकाशित हो इस आशय का एक पत्र मैंने
उन्हें लिखा तो उन्होने बिना किसी पूर्व शर्त के अपनी सहमति दे दी. उनका लिखना था कि
तुम बड़ा काम कर रहे हो, तुम्हारी मदद करके मुझे खुशी होगी . हालांकि उनके
हिन्दी में चार उपन्यास नामी गिरामी प्रकाशकों ने प्रकाशित किए थे.
1994 में पहली बार गुरदयाल सिंह से मिलना हुआ और उन्होने अपना सर्वश्रेष्ठ
आधार जैसे एक नए प्रकाशन के खाते में डाल दिया. यह आधार के लिए एक बड़ी उपलब्धि थी.
जिससे हमारा उत्साह चरम पर था. उनसे एक रिश्ता बना जो दिनों दिन प्रगाढ़ होता गया. बाद
में गुरदयाल सिंह ने अपने सभी उपन्यासों व अन्य रचनाओं के हिन्दी अनुवादों के अधिकार
आधार को दे दिये.
अब जब हम उनके समग्र साहित्य
को हिन्दी में उपलब्ध करवाने के मकसद से उनकी रचनावली पर काम कर रहे थे जिसका सम्पादन
हमारे समय के प्रतिभाशाली आलोचक व साहित्यकार विनोद शाही ने पूरा किया है तो गुरदयाल सिंह से फोन पर अक्सर लंबी -लंबी बाते होती रहती थी. वे पिछले लगभग एक साल से अस्वस्थ चल रहे थे. उनकी इच्छा थी कि यह काम जल्द पूरा हो. हमारी तरफ
से हो रही देरी पर उन्हें खीज भी होती.
वे नाराज़ भी होते. कोई एक सप्ताह पहले ही उनका फोन आया तो उन्होने पूछा कि अभी कितना काम बचा है. जल्दी करो अब मेरे पास समय नहीं है. लेकिन अपनी सीमाओं को तो हम ही जानते थे जिनके रहते यह काम उनके जीते जी संभव नहीं हो पाया. सच में मेरे अंदर यह अपराध बोध हमेशा रहेगा कि मैं उनकी यह अंतिम इच्छा उनके रहते पूरी नहीं कर पाया.
वे नाराज़ भी होते. कोई एक सप्ताह पहले ही उनका फोन आया तो उन्होने पूछा कि अभी कितना काम बचा है. जल्दी करो अब मेरे पास समय नहीं है. लेकिन अपनी सीमाओं को तो हम ही जानते थे जिनके रहते यह काम उनके जीते जी संभव नहीं हो पाया. सच में मेरे अंदर यह अपराध बोध हमेशा रहेगा कि मैं उनकी यह अंतिम इच्छा उनके रहते पूरी नहीं कर पाया.
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देश निर्मोही
आधार प्रकाशन, पंचकूला, हरियाणा
aadhar_prakashan @yahoo.com
aadhar_prakashan
आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शनिवार (20-08-2016) को "आदत में अब चाय समायी" (चर्चा अंक-2440) पर भी होगी।
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भावभीनी श्रद्धांजलि के साथ
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'
प्रकाशको और लेखकों के सम्बन्धों पर बहुत कम लिखा गया है. देश निर्मोही ने अच्छा लिखा है. उन्हें कभी इस पर विस्तार से लिखना चाहिए. समालोचन को क्या कहा जाए, हिंदी में कम से कम ऐसी एक पत्रिका है . यह क्या कम है ? दोनों को बधाई.
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