शशि कपूर, लता मंगेशकर और कपिल शर्मा: हरि मृदुल


  

हरि मृदुल ने ‘अमर उजाला’ के मुंबई ब्यूरो में विशेष संवाददाता रहते हुए चमकती फिल्मी दुनिया के अँधेरे और टूटन को भी करीब से देखा है, उनकी ये तीनों कहानियाँ यहीं से पैदा हुईं हैं.    


तीन कहानियाँ                                                                                            
हरि मृदुल 




१.

पृथ्वी में शशि 

इंटरवल हुआ, तो हॉल में रोशनी हुई. मद्धिम रोशनी. उसी रोशनी में किसी ने शशि कपूर को देख लिया. अरे देखो- शशि कपूऽऽऽर.... इसके बाद तो उनसे मिलनेवालों का तांता लग गया. लोग आते, उन्हें नमस्कार करते. घेर कर खड़े हो जाते. उनमें से कई लोगों ने उनसे उन फिल्मों के बारे में बातें करनी शुरू कर दीं, जो उन्होंने पता नहीं किस-किस उम्र में, किन-किन शहरों के किन-किन सिनेमाघरों में देखी थीं. वह सबकी बातें चुपचाप सुन रहे थे. उनकी कोई प्रतिक्रिया नहीं थी. हालांकि इस बीच कुछ लोगों ने मोबाइल से उनकी ह्वील चेयर के बाजू में खड़े होकर फोटो भी खिंचवानी शुरू कर दी थीं....

जी हां, शशि कपूर ह्वील चेयर में थे. काफी अस्वस्थ चल रहे थे वह. लेकिन उनका पृथ्वी थिएटर आना थमा नहीं था. जब भी मन करता, अपने नौकर से ह्वील चेयर मंगवा लेते और आ जाते. थिएटर में प्रवेश करते ही उनकी आंखों में चमक आ जाती. उनके चेहरे की भंगिमा बदल जाती. वह खुद भी थिएटर के प्रांगण में मौजूद तमाम चेहरों को बड़े गौर से देखने लगते. मानो वह इन चेहरों में कुछ खोज रहे हों.  उनकी यह खोज पूरी होती भी हो कि नहीं, कह नहीं सकते. लेकिन पृथ्वी थिएटर आकर उन्हें थोड़ी राहत तो अवश्य ही महसूस होती. ‘यहां आकर मुझे ऐसा लगता है कि जैसे मैं अपने पिता पृथ्वीराज कपूर की गोद में बैठा हुआ हूं’, एक बार एक इंटरव्यू में उन्होंने कहा भी था.  

पता नहीं क्यों, बाद के दिनों में उन्होंने पृथ्वी थिएटर आने का अपना वक्त बदल दिया था. वह ज्यादातर तभी आते, जब कोई नाटक बस शुरू ही हुआ हो. हॉल में अंधेरा हो जाता, तब उनका नौकर ह्वील चेयर से उन्हें ले आता और वह चुपचाप नाटक देखने लगते. कई बार उन्हें कोई नाटक नहीं रुचता, तो वह इंटरवल में ही खामोशी से निकल जाते. लेकिन वह न किसी को अपने आने का पता चलने देते और न ही जाने का. हालांकि ऐसा शायद ही कभी हुआ हो कि उनके आने और जाने का पता किसी को न चला हो. 

तो उस दिन भी जैसे ही नाटक शुरू हुआ और हॉल में अंधेरा हुआ, उनका नौकर ह्वील चेयर में उन्हें ले आया था. वह हमारे साथ नाटक देख रहे हैं, जिसका पता हमें इंटरवल में ही चलना था. हॉल में मद्धिम रोशनी हुई कि लोगों की नजर शशि कपूर पर पड़ गई....

उस दिन शशि बहुत असहज हो गए थे. हुआ यह कि जैसे ही पता चला कि वह दर्शकों के बीच बैठे हुए हैं, तो एक अधेड़ महिला उनसे मिलने के लिए बेहद उतावली हो गई. वह अपने बूढ़े हो रहे पति के साथ नाटक देखने आई थी, परंतु वह शशि को देखते ही मानो सुध-बुध ही खो बैठी. वह अपनी सीट से इतनी तेजी से उठी कि पति भौंचक देखता रह गया. हमेशा घुटनों में दर्द की शिकायत करनेवाली और पति का हाथ पकड़ चलनेवाली उस महिला में पता नहीं कहां से इतनी स्फूर्ति आ गई थी.

दरअसल वह अपने युवावस्था के सपनों के राजकुमार से हर हालत में मिलना चाहती थी. वह शशि कपूर की जबर्दस्त फैन थी. उसने एक-एक फिल्म देखी थी उनकी. हमेशा ही ख्वाबों में देखा था उन्हें. खयालों में सोचा था. परदे पर उन्हें देखकर कितनी तो आहें भरी थीं. उनके कितने ही पोस्टर अपने कमरे में चिपकाए थे. यहां तक कि अब भी जब कभी दोपहर के समय टीवी पर किसी ओल्ड इज गोल्ड टाइप चैनल पर उनकी कोई फिल्म दिख जाती, तो सास-बहू वाले सीरियल छोड़कर उसे ही एकटक देखने लगती....  

अधेड़ महिला जब लोगों को धकियाते हुए आगे पहुंची और उसने ह्वील चेयर पर बैठे शशि कपूर को देखा, तो उसे यकीन ही नहीं हुआ कि वह सचमुच शशि कपूर हैं. वह अवाक् थी. वह जीवन में पहली बार शशि कपूर से मिल रही थी, लेकिन उसने कभी कल्पना भी नहीं की थी कि अब तक उसका हीरो इस हालत तक पहुंच चुका होगा. उसके मन में जो छबि थी, वह गोरे-छरहरे शशि की थी. उस शशि की थी, जो हंसता था तो डिंपल पड़ते थे गालों में. उनके दांत पर चढ़े दांत में भी वह अनुपम सौंदर्य खोज लेती थी. लेकिन यहां तो वह शशि नदारद था. उस शशि की जगह एक असहाय, बूढ़ा और बेबस शख्स बैठा हुआ था!!

अब तक उस महिला का पति भी पीछे से आ चुका था. उसे बीवी की इस तरह की हरकत पर कोई हैरत नहीं हुई. उसे अच्छी तरह पता था कि वह शशि कपूर को कितना ज्यादा चाहती है. इस अधेड़ अवस्था तक पहुंचते-पहुंचते हजारों बार अपने पति को बता चुकी थी कि वह शशि कपूर की बहुत बड़ी दीवानी है और हमेशा दीवानी रहेगी.... यह भी महज इत्तफाक ही था कि खुद उसका पति भी शशि कपूर का बहुत बड़ा फैन था. बीवी को जब पति ने बुत सा खड़ा देखा, तो उसे लगा कि अपने प्रिय हीरो से मिलने में वह संकोच कर रही है. उसने फौरन अपनी बीवी का हाथ पकड़ा और शशि कपूर से मिलवाने के लिए उनके ठीक सामने पहुंच गया. लेकिन बीवी के पांव आगे नहीं बढ़ रहे थे. उसकी मुखमुद्रा एकदम अलग थी. ठिठकी खड़ी उस अधेड़ महिला पर तब तक शशि की नजर पड़ चुकी थी और वह उस महिला के मन की थाह ले चुके थे. शशि ने यकायक अपनी आंखें बंद कर ली थीं....

शशि की आंखें बंद ही थीं कि उनके कानों में महिला का अधेड़ स्वर सुनाई दिया, जिसमें वह अपने पति से कह रही थी, ‘शशि कपूर नहीं है यह. शशि कपूर ऐसा हो ही नहीं सकता....’

तब तक इंटरवल खत्म हो चुका था. वह अधेड़ महिला नाटक अधूरा छोड़ अपने पति का हाथ पकड़ कर बाहर निकल चुकी थी. इधर शशि कपूर ने जब आंखें खोलीं, तो इंटरवल के बाद का नाटक शुरू हो चुका था. थिएटर में अंधेरा होते ही शशि कपूर की ह्वील चेयर भी बाहर निकलती देखी गई.

अब तो शशि कपूर नहीं रहे. उन्हें गुजरे हुए कई वर्ष बीत चुके हैं. लेकिन मालूम पड़ा है कि पृथ्वी थिएटर में घटी इस घटना के बाद शशि फिर दोबारा कोई नाटक देखने नहीं आए. ह्वील चेयर में ही एकाध बार आए भी, तो थिएटर के भीतर नहीं गए. लोगों से बचते रहे. लोग उनके इस बदले व्यवहार पर कयास लगाते रहे. हालांकि यह छोटी सी घटना पांच ही लोगों को पता थी पूरी तरह- एक तो उस अधेड़ महिला को, जो शशि कपूर की सबसे बड़ी फैन थी और उनसे जीवन में पहली बार मिली थी, फिर भी बिना उनसे कोई बात किए चली गई थी. दूसरे उस महिला के पति को, जो अपनी पत्नी के चक्कर में खुद भी शशि कपूर से अपनी भावनाएं व्यक्त नहीं कर पाया था. तीसरे शख्स स्वयं शशि थे, जो उस अधेड़ महिला का मन तत्काल पढ़ गए थे और जिन्होंने नाटकीय अंदाज में हुए एक सत्य के साक्षात्कार को बहुत गंभीरता से ले लिया था. चौथा व्यक्ति था ह्वील चेयर चलाकर शशि कपूर को नाटक दिखाने लाने वाला विनम्र नौकर और पांचवां मैं, जो कि इस दौरान खुद पृथ्वी थिएटर में मौजूद था और जिसने उसी क्षण अपने आपसे वादा किया था कि कभी न कभी तो वह इस घटना को जस का तस अवश्य ही दर्ज करेगा.  

  

(पृथ्वी थिएटर – मुंबई के जुहू स्थित इस थिएटर की स्थापना अपने रंगकर्मी पिता पृथ्वीराज कपूर की स्मृति में खुद शशि कपूर ने की थी. इस थिएटर में आज भी नियमित रूप से नाटक होते हैं. इसका संचालन अब शशि कपूर की बेटी संजना कपूर करती हैं.)  

 

  

२.

लता मंगेशकर की चोटी 

लता मंगेशकर गा रही थीं और क्या खूब गा रही थीं....

मेरा उनके गाने पर कोई ध्यान नहीं था, उनकी चोटी पर था. चोटी लंबी थी. बड़े जतन से गुंथी हुई. लेकिन यह किसी हीरोइन की लाल परांदेवाली चोटी नहीं थी. परंपरा का अनुसरण करती कैसी तो शालीन छबि सामने रख रही थी यह चोटी. लता मंगेशकर जब कभी गाते-गाते अचानक मुड़कर संगीतकारों की तरफ देखने लगतीं, तो उनकी यह चोटी भी उनका अनुसरण करती.

लता मंगेशकर अपने पुराने गाने गा रही थीं और पुरानी यादों में खो जा रही थीं. उन्हें अपने गीतों के मुखड़े और अंतरे के बीच के अवकाश में पता नहीं क्या-क्या याद आ रहा था. कई बार लगता था कि वह गाते हुए अभिनय भी कर रही हैं. जिस हीरोइन पर उस गाने को फिल्माया गया था, वह बारंबार सामने आ जा रही थी. वह दृश्य सामने आ रहा था, जिस पर हीरोइन को लता जी की आवाज उधार लेने की जरूरत पड़ी थी. कई बार अंतरा गाने से पहले वह युवा साजिंदों को देखने लगतीं और याद करतीं उन साजिंदों को, जिन्होंने आधी शताब्दी पहले इन गानों की रिकॉर्डिंग के समय अपनी जान लगा दी थी और अनोखा परिणाम दिया था. कई बार ऐसा भी महसूस होता कि वह उन गीतकारों को याद कर रही हैं, जिन्होंने इन्हें लिखा. जिनके बोल अपनी धुन खुद-ब-खुद बनाते चले गए और संगीत का साथ मिलते ही मानो मूर्तिमान ही हो गए. वे बहुत विनम्र गीतकार थे और तुलनात्मक रूप से गरीब भी थे. गाते समय लता जी की मुखाकृति देखकर लगता कि संभवत: वह उन गीतकारों के प्रति कृतज्ञता ज्ञापित कर रही हैं.  

वह एक बड़ा चैरिटी कार्यक्रम था, जिसमें फिल्म इंडस्ट्री के तमाम बड़े गायकों और गायिकाओं के साथ विशेष रूप से लता मंगेशकर को भी आमंत्रित किया गया था. मुझे लगता है कि मीडिया का इतना बड़ा जमावड़ा इसलिए लगा हुआ था कि लता जी भी इस कार्यक्रम में गानेवाली थीं. मीडिया ही क्या, आम संगीतप्रेमियों की भी बड़ी उत्साहजनक उपस्थिति थी. भारी भीड़ थी. जहां हम पत्रकारों को बैठाया गया था, वहां से स्टेज ज्यादा दूर नहीं था. लेकिन गायक या गायिका एक अलग ही कोण से दिखाई दे रहे थे वहां से. मीडियाकर्मियों को थोड़ी दिक्कत महसूस हो रहा थी, लेकिन मुझे तो अपनी यह सीट अपूर्व आनंद दे रही थी.

शुरुआत में बॉलिवुड के नए गायक आए और फिर कई सुपरिचित गायक. सभी ने समां बांधा. लेकिन जब लता मंगेशकर आईं, तो लोग अपनी जगह खड़े हो गए. तालियों की गड़गड़ाहट थी कि थमने का नाम नहीं ले रही थी. इसके बाद शुरू हुआ लता जी का गायन. सब बड़ी तन्मयता से सुन रहे थे, लेकिन मैं कहीं और ही था. अचानक मुझे महसूस हुआ कि मैं तो उनके गाने सुन ही नहीं रहा हूं. पता नहीं क्यों, मेरा ध्यान तो लता जी की चोटी पर है....

लता जी गा रही थीं. बीच-बीच में वह बड़े कृतज्ञता भाव से साजिंदों की ओर देखती थीं. साजिंदे उन्हें खुद को देखते देख अतिरिक्त उत्साह में आ जाते. वे धन्य महसूस करते कि उन्हें बजाते हुए लता मंगेशकर देख रही हैं- महानतम गायिका लता मंगेशकर. वाकई यह दिन उन साजिंदों के लिए ऐतिहासिक था और मरते दम तक उन्हें याद रहनेवाला था. लता जी को गाते देख नहीं लगता था कि वह पिचहत्तर पार हो चुकी हैं. उनकी आवाज में वही लोच थी और वही खनक महसूस हो रही थी, जो पैंतीस की उम्र में थी. लेकिन मेरा ध्यान तो उनकी चोटी पर था....

मुझे बार-बार लग रहा था कि वह पिचहत्तर पार की उम्रदराज महिला नहीं हैं, बल्कि पंद्रह साल की किशोरी हैं. वह किशोरी, जिसकी मां ने अभी कुछ देर पहले ही उसकी चोटी बनाई है और फिर स्टेज पर भेज दिया है. स्टेज पर वह पूरे आत्मविश्वास से खड़ी है और अपनी लहराती चोटी को महसूस कर रही है. उसे लग रहा है कि लोग गायकी के साथ-साथ उसकी चोटी को भी देख रहे हैं. चोटी खूबसूरत है, इसलिए गायकी भी खूबसूरत है. यही वजह है कि वह गायकी से ज्यादा अपनी चोटी को देखकर मुदित है. वह गजब की प्रस्तुति दे रही है. हौसला बढ़ाती मां भी सामने ही बैठी है....

तभी मुझे लगा कि अब लता जी मां पर अपना कोई प्रसिद्ध गाना सुनाएंगी, लेकिन ऐसा नहीं हुआ. दरअसल उन्हें गिने-चुने गाने ही सुनाने थे और वह अपनी प्रस्तुति दे चुकी थीं. जब फिर से तालियों की गड़गड़ाहट सुनी, तो मानो मेरी तंद्रा टूटी. मुझे याद आया कि मैं इस आयोजन के लिए खास तौर पर कैमरा लेकर आया था, जो मैंने अभी बैग से निकाला ही नहीं. जब मैंने बैग में कैमरा रखा था, तभी सोचा था कि मैं लता जी की गाते हुए दसियों फोटो निकालूंगा. यह मेरे लिए एक ऐतिहासिक धरोहर होगी. लेकिन मैं भूल गया. मैंने देखा कि स्टेज पर अब भी लता जी मौजूद थीं, लेकिन वह माइक के सामने से हट चुकी थीं. वह विदा लेते हुए बस मुड़ने ही जा रही थीं कि मैंने फौरन अपने बैग से कैमरा निकाला और तेजी से चलाना शुरू कर दिया. क्लिक... क्लिक... क्लिक....

मेरी पहली क्लिक के समय तक लता जी पूरी तरह मुड़ चुकी थीं, यही वजह है कि जो स्नैप मुझे मिला, उसमें लौटती हुई लता जी थीं. उनका चेहरा आंशिक ही दिख रहा था, लेकिन बड़े जतन से गुंथी हुई चोटी अवश्य दिखाई दे रही थी. उस कैमरे से खींचे हुए लता जी के कितने ही फोटो मेरे पास हैं, हर फोटो में उनकी चोटी ही प्रमुखता से दिख रही है. हालांकि यह मेरा नसीब था कि कुल पल बाद ही उनका चेहरा मेरे कैमरे के सामने था. बस थोड़ी देर के लिए. दरअसल वह पोडियम में गीतों की अपनी डायरी भूल गई थीं, उसे लेने ही पलटी थीं. इसी का फायदा उठाते हुए मैंने कुछ और स्नैप ले लिए थे. तो उस दिन के दसियों फोटो मेरे पास हैं, जिन्हें मैं फुर्सत मिलने पर जब-तब देखता रहता हूं. लेकिन आप आश्चर्य करेंगे कि इन तस्वीरों को बारंबार देखने के बावजूद अब मुझे कुछ और याद नहीं आता. सिर्फ लता जी के गाने ही याद आते हैं. एक से एक नायाब गाने. वे गाने, जो लता जी ने उस ढलती शाम उस चैरिटी शो के लिए गाए थे.

 

३.

कपिल शर्मा की हंसी 

कपिल शर्मा के बारे में आपको बताने की जरूरत नहीं. जी हां, वही कपिल शर्मा जिन्होंने कभी स्टैंडअप कॉमेडी करते हुए लोगों का दिल जीता. एक से बढ़कर एक शोज में अपना टेलेंट दिखाया. काफी नाम-दाम कमाया और फिर जल्द ही अपना शो शुरू कर दिया – ‘द कपिल शर्मा शो’. आप सबको पता ही है कि यह शो आज भी बेहद पॉपुलर है. अपने देश में ही नहीं, विदेश में भी इसके खूब दर्शक हैं. हर पीढ़ी के लोग इसे पसंद करते हैं. साथ बैठकर देखते हैं. बॉलीवुड के लोग अपनी फिल्मों के प्रमोशन के लिए हर हालत में इस शो में आना चाहते हैं. हीरो हो या हीरोइन, गायक हो या गायिका, प्रोड्यूसर हो या डायरेक्टर, क्रिकेटर हो या फुटबॉलर, सबका प्रिय शो है यह. बौद्धिक लोगों को भले ही यह शो स्तरीय न लगता हो, लेकिन सामान्य दर्शक वर्ग इस शो को मिस नहीं करता है. आप मानें या न मानें, इस शो के जरिए कपिल करोड़ों लोगों का तनाव दूर करते हैं. करोड़ों लोगों के चेहरों पर मुस्कराहट लाते हैं. उन्हें गुदगुदाते हैं. हंसाते हैं. खुशियां देते हैं. लोगों का तो यहां तक कहना है कि इस शो के एवज में उन्हें मोटी कमाई के अलावा खूब पुण्य भी हासिल होता है.... 

तो इन्हीं कपिल शर्मा के साथ पिछले दिनों एक भीषण दुर्घटना घट गई. इसे भीषण दुर्घटना ही तो कहेंगे कि अचानक ही गायब हो गई थी उनकी नैसर्गिक हंसी. हद है, करोड़ों को हंसाने वाले कपिल शर्मा की खुद की हंसी गायब हो गई!

हुआ यह कि एक दिन कपिल शर्मा अपने शो की शूटिंग करने जा रहे थे. सेट पर हमेशा की तरह हंसी-मजाक का माहौल था. शूटिंग से पहले कई घंटे रिहर्सल हुई, तो उसमें भी सभी कलाकारों ने आपस में खूब ठिठोली की. खूब हंसे. एक से बढ़कर एक पंचलाइनें बोली जा रही थीं. इन लाइनों को लिखनेवाले राइटर्स की टीम भी साथ ही थी, जो कि खुद अपनी लिखी लाइनों का लुत्फ उठा रही थी. कलाकारों की डायलॉग डिलीवरी की टाइमिंग का अपना अलग कमाल था. उन कलाकारों का तो कहना ही क्या था, जो आदमी होते हुए भी औरतों की ड्रेस और भेष में थे. हालांकि बीच-बीच में कुछ अश्लील चुटकुले भी सामने आ जा रहे थे. चूंकि सेट पर कई महिला कलाकार भी मौजूद थीं, इसलिए ये चुटकुले दबी जुबान ही थे. कई बातें सिर्फ इशारों में की जा रही थीं, लेकिन हंसने जैसी क्रिया क्या इशारों में संभव हो सकती है? कुल मिलाकर यही कि सभी खुलकर मस्ती-मजाक कर रहे थे. इन कलाकारों और लेखकों के साथ कपिल शर्मा का रिश्ता काफी करीबी है, इसलिए वह भी खूब हंस रहे थे−हंसा रहे थे. बस, थोड़ी ही देर में शूटिंग शुरू होने को थी. सभी गेस्ट कलाकार भी आ चुके थे. सब ठीक चल रहा था. लेकिन इसी बीच पता नहीं क्या हुआ कि कपिल शर्मा की हंसी गायब हो गई. हंसने को तो वह लगातार हंस रहे थे, परंतु उन्हें लग रहा था कि वह हंसी की सिर्फ मिमिक्री कर रहे हैं. उनकी यह हंसी किसी मंजे हुए अभिनेता वाली है. वह जिस तरह हंस रहे थे, वह दूसरों को हंसी लग सकती थी, लेकिन असल बात उन्हें पता थी कि वह हंसी थी ही नहीं.

क्यों नहीं थी वह हंसी! कहां चली गई थी उनकी हंसी!! कैसे लौटे अब पहले जैसी हंसी!!!

इतना नाम और दाम कमाने के बाद ऐसा पहली बार हो रहा था उनके साथ. ऐसा क्यों हो रहा था, वह समझ नहीं पा रहे थे. लगातार मंथन कर रहे थे. उन्होंने अपने बॉय को बुलाया और उसे अपना बेहद महंगा फोन देते हुए कहा कि वह दस-बारह मिनट अकेले रिहर्सल करेंगे और तब वह उनका विडियो बना ले. बॉय ने ऐसा ही किया. कपिल शर्मा ने बॉय के बनाए इस वीडियो को दसियों बार देखा, लेकिन उन्हें हर बार निराशा ही हाथ लगी. उनकी वह उत्फुल्ल हंसी पूरी तरह मिसिंग थी.

कपिल शर्मा को कुछ समझ में नहीं आया कि ऐसे में वह क्या करें. कुछ देर वह सिर पकड़कर बैठ गए. उसके बाद अचानक ही उन्होंने मेकअप रूम की ओर दौड़ लगा दी और दीवार में लगे आदमकद शीशे में अपना चेहरा देखने लगे कि कहीं कुछ सुराग तो मिले! आखिर क्यों ऐसी गड़बड़ हो रही है!! वह पसीने-पसीने थे. उन्होंने शीशे के सामने खड़े होकर कितने ही तरह के चेहरे बनाए. गाल फुलाए. नाक टेढ़ी की. होंठ फैलाए. आंख मारी. कई भद्दे और अश्लील इशारे किए. और कुछ नहीं सूझा, तो अंत में खुद अपने ही पेट में गुदगुदी करने लगे. लेकिन उनकी खनकदार हंसी तो जैसे गायब ही हो गई थी.

क्या किया जाए? वह अपनी वेनिटी वेन में चले गए. तेजी से सांस लेने और उतनी तेजी से सांस छोड़ने के बाद वह शवासन में लेट गए. थोड़ी देर के बाद फिर अनुलोम-विलोम, कपालभाति और भ्रामरी आदि पता नहीं क्या-क्या करने लगे. तभी शो का डायरेक्टर उनकी वेन में आ गया. डायरेक्टर की हंसी फूट पड़ी. वह बिंदास हंसने लगा. दरअसल उसने सोचा कि कपिल शर्मा की रिहर्सल चल रही है. लेकिन यह क्या कि कपिल शर्मा बुरी तरह भड़क पड़े- ‘मेरी हंसी गायब हो गई है और तुझे हंसी आ रही है. आउट....’

बेचारे डायरेक्टर को समझ में नहीं आया कि आखिर माजरा क्या है. ऐसा तो कपिल ने कभी नहीं किया. डायरेक्टर को क्या, किसी की समझ में नहीं आ रहा था. मेहमान कलाकारों के साथ शो की दर्शक दीर्घा में बैठे सैकड़ों जन भी शूटिंग में हो रही देरी से ऊब चुके थे. सब एक-दूसरे से पूछने लगे थे कि आखिर शूटिंग क्यों शुरू नहीं हो रही है? सबके पास सवाल ही थे, जवाब किसी के पास नहीं था. डायरेक्टर एक बार फिर कपिल से मिला. उस पर चैनल का दबाव था कि जल्द शूटिंग शुरू की जाए. इस बार उसने बड़ी संजीदगी से तबियत के बारे में पूछा, तो कपिल ने अपना वह वीडियो चालू कर दिया, जो बॉय ने मोबाइल फोन से बनाया था.

‘सर जी, शानदार. यही तो हमें चाहिए. परफेक्ट.’ डायरेक्टर हैरान था कि रिहर्सल में इतनी अच्छी परफॉरमेंस है, फिर भी कपिल को दिक्कत हो रही है. आखिर उन्हें हो क्या गया है?

डायरेक्टर ने कपिल के जवाब का इंतजार किया. कुछ देर बाद कपिल ने बहुत ठंडे स्वर में कहा, ‘तुम बहुत अच्छे डायरेक्टर हो दोस्त. हमारे शो की लोकप्रियता में तुम्हारा कम योगदान नहीं है. तुम मेरे मन को आसानी से पढ़ भी लेते हो. लेकिन आज बड़ा बारीक मामला है. मेरी बात तुम्हारे सर के ऊपर से जा रही है....’

तो उस दिन शो की शूटिंग नहीं हो सकी. उसके अगले दिन भी नहीं हुई. कई दिन तक नहीं हुई. कुछ हफ्ते बाद ही हुई और बिना किसी रुकावट के हो गई. और आज तक इस शो की शूटिंग बिना किसी टेंशन के चल रही है. आप सब कपिल को हंसते-हंसाते देख रहे हैं. आपको कपिल का अंदाज फिर से लुभा रहा है.... लोग भूल चुके हैं कि कपिल शर्मा के साथ कुछ समय पहले एक बड़ी दिक्कत हो गई थी. वह अपनी हंसी भूल गए थे.... चूंकि तब से लेकर अब तक यह शो अनवरत चल रहा है, तो सबके मन में इस जिज्ञासा का होना लाजिमी है कि आखिर कपिल की वह नैसर्गिक हंसी वापस कैसे लौटी, जिसे खोजने के लिए बहुत ज्यादा बेचैन हो गए थे और शो बंद करने की सोचने लगे थे!

आपको आश्चर्य होगा कि इस भीषण परेशानी का हल उस दिन चुटकियों में निकल आया था. अचानक शूटिंग कैंसिल करने का निर्णय लिया गया, तो सेट पर मौजूद सैकड़ों जनों के साथ ही एक बुजुर्ग मेकअप दादा भी हैरत में पड़ गए थे. उन्होंने डायरेक्टर से सारी बातें ध्यान से सुनी थी और हंस दिए थे. यहां तक कि लोगों की टेंशन की परवाह किए बिना थोड़ी देर तक हंसते रहे थे.

बात यह है कि वह कपिल को लंबे समय से जानते थे. थोड़ी देर हंस लेने के बाद फिर वह वेन में जाकर कपिल से मिले और उन्होंने बड़े स्नेह से कपिल के दोनों गालों पर हाथ फेरा. उन्होंने बड़ी धीर-गंभीर आवाज में जो सलाह दी, कपिल की आंखों में चमक आ गई. इसके बाद यह चमक उनके चेहरे तक पहुंची. कपिल पहले मुस्कराए और फिर हंसने लगे. देर तक हंसे. यह बड़ी मासूम सी हंसी थी- नैसर्गिक हंसी. इसके बाद वह रोने लगे. देर तक रोते रहे और फिर उन्होंने मेकअप दादा को गले लगा लिया.

निश्चित रूप से आपके मन में इस बात की जिज्ञासा होगी कि मेकअप दादा ने आखिर ऐसी क्या सलाह दी थी कि कपिल की हंसी न केवल लौट आई, बल्कि तब से उनके लाफ्टर शो की शूटिंग निर्बाध गति से चल रही है. शो भी सुपरहिट जा रहा है. शानदार टीआरपी है. तो बता दें कि मेकअप दादा ने इतनी सी बात कपिल से कही थी, ‘तुमने अपनी चार महीने की बिटिया को हंसते हुए देखा है? अगर देखा है, तो कितनी बार देखा है? सच-सच बताओ कि कितनी बार हंसते देखा है बिटिया को. तुम्हारे पास कोई जवाब नहीं है ना. तो अब कुछ दिन काम छोड़ो और सिर्फ नन्हीं बिटिया की हंसी का आनंद लो. देखना, तुम्हें अपनी वह हंसी वापस मिल जाएगी, जिसे तुम खोज रहे हो.’

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कवि–पत्रकार हरि मृदुल कहानियां भी लिखते हैं. 2012 में उनकी लिखी कहानी ‘हंगल साहब, जरा हंस दीजिए’ को ‘वर्तमान साहित्य’ की ओर से दिया जानेवाला ‘कमलेश्वर कहानी पुरस्कार’ मिल चुका है.  

 

संप्रति:

‘नवभारत टाइम्स’, मुंबई में सहायक संपादक.

harimridul@gmail.com

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  1. शशि कपूर, मार्मिक पल ! शायद इसी लिए देवानंद जी ने अपने अंतिम दिनों में अपने चहेतों के सामने आने से इंकार कर दिया था

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  2. Daya Shanker Sharan10/1/21, 5:35 pm

    हरि मृदुल के संस्मरणों में शशि कपूर पर लिखा गया संस्मरण काफी रोचक,मार्मिक और अविस्मरणीय है। एक लंबे अंतराल के बाद जीवन में सबकुछ पहले की तरह नहीं रहता,लेकिन मन में बसी छवि जस-की-तस रहती है। मन देश-काल की सीमाओं से नहीं बंधता। टैगोर की काबुलीवाला कहानी भी इसी संवेदना का हिस्सा है।

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  3. दीप भट्ट11/1/21, 8:41 am

    सुंदर कहानियां हैं तीनों हरि भाई। आपकी सूक्ष्म दृष्टि और सूक्ष्म विश्लेषण नज़र आता है तीनों कहानियों में। तीनों कहानियां संस्मरण सी भी लगती हैं।

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  4. हृदयेश मयंक11/1/21, 8:42 am

    बहुत सुन्दर व भाषायी प्रवाह वाले संसमरण। अंत तक उत्सुकता जगाते हुए कि क्या हुआ। पठनीय और रोचक भी। कृपया ऐसे संस्मरणों की पुस्तक भी ले आयें। बधाईयाँ स्वीकारें!

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  5. नवीन जोशी11/1/21, 8:43 am

    इन कहानियों में कवि और कथाकार दोनों का का अद्भुत संयोग हुआ है।

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  6. देवेन मेवाड़ी11/1/21, 9:12 am

    तीनों कहानियों में आपके शब्द संवेदना के अंकुर जगा देते हैं। शब्दों का आपके साथ बहुत आत्मीय और स्नेहिल संबंध है मृदुल जी।

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