ज्योति शोभा की कविताएँ

Posted by arun dev on अप्रैल 23, 2019





























ज्योति शोभा की कविताएँ इधर खूब पढ़ी और सराही जा रहीं हैं. पिछले वर्ष समालोचन के ‘मंगलाचार’ में वह रेखांकित हुईं थीं. इस बीच उनकी कविताओं ने अपने मूल स्वर की रक्षा करते हुए लगातार अपने को पुष्ट किया है. बांग्ला कवियों की भावुकता, मार्मिकता, सूक्ष्मकल्पनाशीलता और सांस्कृतिक समृद्धि उन्हें विरासत में मिली है.

उनकी कुछ नई  कविताएँ आपके लिए




ज्योति शोभा की कविताएँ                               






पकड़ने की कला में निपुण नहीं होती देह
 
वर्षों पुरानी हो गयी है देह
भार नहीं संभाल पाती

चुंबन गिर रहे हैं
केशों की रेखा पर रखे गए थे जो
अज्ञातवास के ईश्वर की तरह 
जो वेदों से निकल कर घूमता है 

अर्द्धरात्रि की शीतल कालिमा में 
टहक कर आये स्वेद से जैसे 
भीगा जान पड़ता है

क्षुधा गिरती है
जो अन्न में नहीं
कटे बिल्व फल की धार में रहती है
ऊँगली सराबोर कर
जो मुख भर भी नहीं आता उससे कैसी तुष्टि

कामना गिर रही है जर्जर होती देह से
बीच शहर में एक पीली बत्ती के आलोक जैसी
यों धूसर पड़ती है क्षण भर में 
ज्यों अचानक ही रस सूख गया है बाती से
कथा मान जाती है किन्तु खुली रह जाती है पोथी

पकड़ने की कला में निपुण नहीं होती देह
जैसे निपुण होती है नृत्य नाटिका में

गिरते दुःख को देखती है
गिरते परों को गिनती है
गिरते भस्म को जुटाती है
नहीं जकड़ पाती अग्नि

ऋतुओं के इतने चक्र बीतते हैं
संसार सोचता है क्यों नहीं जकड़ लेती अपनी प्रीति

किन्तु एक ही चीर है
एक ही ह्रदय
क्या कहती जीवों से जो मात्र सौंदर्य में गिरते हैं

अपने स्थान से हिली तो अनावृत ही होगी.




ईश्वर का एकांत

विषम अवस्था है उसके एकांत की
काव्य में पड़ा जैसे कोई तरल बिम्ब
क्षण भर प्रकट होता है फिर स्वयं ही में विलुप्त
एक और निषिद्ध रूप वाला प्रेमी
जोड़ लेता है घुटने पसलियों से

ताप में दग्ध झूलती है वेणी जो उसकी जंघाओं पर है
किन्तु ओझल है उद्गम
केवल वह चित्रकार जानता है
जिसने पूस के पाले में उकेरी थी मंदिर की चौथाई दीवार
कि स्वयं एक भीषण अरण्य जैसी
प्रेयसी प्रणय पश्चात गंगा में करती है प्रभात स्नान

यों तो कोई नहीं देखता किस दिशा से आलिंगन लिया है उसका जल कणिकाओं ने
केवल वट दीखता है उसके चतुर्दिक
वह भी घनघोर मेघ जैसा अब बरसा कि तब बरसा
गिरे पात से भरे हुए हैं उसके अंग
कोई अनंत राग में फूलते हुए मदार जैसी तपती है जटा
जहाँ हर तिमाहे निर्जल ही पड़ा रहता है सूर्य
वहां से पाँव नहीं उठते
मूर्छा घेर लेती है काया को
तब जी होता है सामुद्रिक से महूरत निकलवा कर
कह आऊँ -
तुम्हारे द्वार पर इतने नदी पोखर हैं
कविता पढ़ कर भी शांत नहीं होती धारा
इतना सिन्दूर है देह पर
कि झुकने से लाल पड़ जाता है सम्पूर्ण वक्ष

तुम्हारे एकांत में अडोल हो उठती है श्वास
जैसे पांचवी बार मृत्यु गंध आने पर भी नहीं हिली थी पुतली

बरस के कोई भी पखवाड़े आने से जीवन नहीं छूटता
मोह छूट जाता है अपनी काया से.




जिसे भय नहीं था यह इक्कसवीं सदी है
जिस अशांत हृदय को लिए डोल आयी पूरा भुवन
दो पैसे की पुड़िया में रखी कामना जैसी बहती रही जल में
नदी दिपदिपाती रही पीछे

खंगाल दिए काव्य और पुस्तकों से भरे ताखे
प्यासी भटकती रही लिप्सा से मुक्त बांग्ला फिल्मों में 
टकटकी लगाए जड़वत रही मछुआरों की हाँक से गूंजते नगर में 
वह निमिष भर में शिथिल हुआ तुम्हारी छाती से लगते

क्या यहीं शांत हुए थे उमड़ते ज्वालामुखी
गहन हुए थे तमाल के वन
स्वर मूक हो गए मद्धम ताप में सीझते

क्या यहीं मिट गया था अंजन !

जिसके तल में असूर्यम्पश्या श्वास का कोलाहल है
हाड़ में धूम्र भरा है बीड़ी का
जिसके निश्चेष्ट आलिंगन में अवरुद्ध होते हैं कंठ
टीके ही रहते हैं दो स्कन्धों के मध्य एक कपोत के पंख

क्या वहीं उग्रवादियों ने समर्पण किया था हथियारों के बोझ से थक कर
टोकरी रख दी थी खजूर की एक आदिवासी बाला ने
जब पृथ्वी पर मेघ उत्पात करते थे
आधी बाँध कर धोती क्या यहीं सो गयी थी वह
जिसे भय नहीं था यह इक्कसवीं सदी है
.



असीम देह पर हरीतिमा लिए

असीम देह पर हरीतिमा लिए
जिस तरह रात्रि तिमिर देखता है मुझे
बस उतना ही प्यार कर सकती हूँ मैं

"खिड़की खुली रहे तो और घना हो जाता है जीवन"
यह बात कहने को बहुत धीमी श्वास में कही थी 
किन्तु तीव्र वेग से नदी की तरह पसर गयी है 
गाढ़े कर दिए शिराओं में अरण्य

किसी जाते हुए को देखने के लिए नहीं
सांझ में कौंधते लावण्य के लिए दर्पण देखती हूँ
कौन है जो आता है पलट कर

सिर्फ ठन्डे हो रहे गुलाब हैं
सिर्फ सिकुड़े हुए तलवे हैं
और मूक केश है शय्या पर बरसों से खुले हुए

"तुम्हारी उत्कंठा में मेरे स्वप्न तैरते हैं "
यह पंक्ति कोई तीखा आघात है ब्रह्माण्ड से टूट गिरता है सुन्दर पल में
"मुझे भय है मुख के शुष्क होने का
सुरक्षित रखो जैसे वाद्य रखते हैं संगीतकार अपने "
बार-बार ही दोहराती हूँ

मेरे ही निराश्रय स्पर्श हैं
तारों को खींचते हैं पृथ्वी पर
.





आत्मा है देह के बाहर भी 

इतने गीत हैं तुम्हारी देह में
एक उठाती हूँ तो दूसरा छूट जाता है पीछे

ज्यों ठाकुर की बाड़ी जाती थी जोरासांको तो भूल जाती थी
कमरे के बाहर भी है उनकी गंध
आत्मा है देह के बाहर भी 
बरामदे में गेंदे के पुष्प से झांकती

गाइड कहता है
यह प्राचीन किताब है महत्वपूर्ण है इसकी लिपि
मुझे बुरा लगता
क्यों नहीं कहते टूरिस्ट से
इतना जल है इसमें जितनी तुम्हारी देह में नहीं

इतने अचूक मन्त्र हैं कवियों के पास
पलक झपकते अपराह्न को बदल देते हैं रात्रि में
स्पर्श के पूर्व ही मृत्यु हो जाए
ऐसे छूते हैं

मेरे समक्ष ही नाटकों में
दूसरी पंक्ति की स्त्री ने हाथ धरा था पहली पंक्ति के चित्रकार का
और वही चित्र कला-दीर्घा में टंगा था
पावस के दिवस भीषण वर्षा में
इतने कलेश हैं और इतने आलाप
एक भी नहीं कहती तो कंठ तक आ जाते हैं
तुम अपार्थिव ईश्वर को देखते हो यह मुझे
दृग खोले एकटक
अन्धकार में भी और चिलक में भी
सम्पूर्ण श्रृंगार में और अनावृत भी

सब आवेग ले रहा है मुझसे
ज्यों लेता है बाबू घाट फूलों की गंध से विचलित धारा के

इस तरह लेना भी देने का बिम्ब है
तुम आओगे और चूमोगे तो प्रतिमा हो जायेगी देह
दुर्गा जैसी
जरा भी नहीं सिहरेगी.



उजागर

इतने बड़े संसार में एक फूल नहीं छिपता
उसे भी मार देती है मृत्यु
अफ़सोस है
छुपी हुई हूँ मैं
अज्ञातवास में भी लिख रही हूँ कविता 
कर रही हूँ तुम्हें प्यार 
अकेले में.




सहा नहीं जाता इतना सुख

मध्यमा धर कर जो ले जाता है शांतिनिकेतन पौष मेले में
वही जकड़ लेता है श्यामल देह
धवल उत्तरीय छोड़ देता है ब्रह्मपुत्र के जल में

निष्कम्प है मेरी सिरहन
जो कहती है 
सहा नहीं जाता इतना सुख
कि वह नहीं देखता भुवन की ओर
देखता है तिमिर का सागर
ठीक उरों के बीच
और पूछता है
क्या कम हो जाएंगे दुःख यदि ओक भर पी ले कोई पोखर
क्या नौकाएं मरती हैं सिर्फ गल कर
क्या जल से दूर भी रहता है कोई जल !







देखो अब कौन आता है 

देखो अब कौन आता है
झोला भर बेर और मुट्ठी भर कविता लिए


चुम्बनों की तो बात ही निषिद्ध है
क्योंकि उद्यान बंद रहते हैं चैत्र की रात्रि
जिस समय चन्द्रमा पीड़ा देता है 
और टीसती है चांदनी मन को 
सोये रहते हैं हाथ रिक्शे 
ट्रामें खड़ी रहती है निःशब्द बीच सड़क 
रात रानी भी सहम कर बिखेरती है सुवास परिचित चेहरों पर

देखो, कौन जाता है बेखटके
कवि की तरह गिरे पत्तों से दोना बनाता है

पोस्टर उधड़ आये हैं लेनिन सरणी की दीवारों से
पैरों में फँसते हैं
शराब पीकर आँखें लाल हैं जिसकी वह कह रहा है
मना है किसी स्त्री को पुरुष के घर रहना कविता पढ़ने

आलिंगन करने से हज़ार खतरे हैं
बुकोवस्की की तरह नहीं है भारत के लेखक


देखो, अब कौन लाता है किताबें
जिन पर सोने से सर को आराम मिले
कौन लाता है नींद
जो कालबैशाखी के जोर से न टूटे

आखिर जीना तो है
मर तो नहीं जाते हैं लोग जब कोई प्रिय मरता है.
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