कथा-गाथा : क़ातिल की बीबी : तरुण भटनागर

Posted by arun dev on मार्च 06, 2019



गुलमेहंदी की झाड़ियाँ’, ‘भूगोल के दरवाजे पर’, ‘जंगल में दर्पण’ (कहानी संग्रह), लौटती नहीं जो हंसी (उपन्यास) आदि के लेखक तरुण भटनागर आदिवासी पृष्ठभूमि पर लिखी कहानियों के लिए जाने जाते हैं. उन्हें ‘वागीश्वरी पुरस्कार’, शैलेश मटियानी आदि कथा पुरस्कारों से सम्मानित किया जा चुका है. तरुण भटनागर प्रशासनिक सेवा में हैं.

अपनी इस नई कहानी ‘क़ातिल की बीबी’ में उन्होंने पृष्ठभूमि बदली है. किसी भी कस्बे की तंगगली में यह कथानक घट सकता है.
 



क़ातिल की बीबी                     
तरुण भटनागर








रत अकेली थी. उसके आदमी का कत्ल हुए चंद रोज गुजरे थे.
       
वह कत्ल न था. वह हादसा था. पर अगर कोई हलाक हो जाये, मर जाये तो लोग ऐसे वाकये को हादसा कहने से कतराते हैं. इस तरह वह वाकया कत्ल कहलाया और वह कातिल.
          
हुआ यूँ था कि पिछले दो-एक बरसों से ज़रीना के आदमी की उसके पडोस से नहीं बन रही थी. संकरी गली में दो दरवाजे खुलते थे, एक ज़रीना का घर और दूसरा पडोसी याने राधा का. ज़रीना के आदमी के पास एक मोटरसाईकिल थी. संकरी गली में वह अपने घर के सामने मोटरसाइकिल खडा करता था. कोई और जगह न थी. घर की देहरी थोडी ऊँची थी. उससे नीचे तक तीन स्टैप वाली सीढी थी. सीढी ठीक दरवाजे के सामने थी. इसलिए मोटरसाइकिल या तो सीढी से आगे रखी जा सकती थी या पीछे. आगे रखने पर उसके आगे का पहिया पडोसी के दरवाजे के सामने आ जाता था. पीछे रखने पर पीछे का पहिया गली के बीच आ जाता था. उसका घर दो गलियों के जोड पर था. इसलिए मोटरसाइकिल को सीढियों से पीछे रखने पर उसका पीछे का पहिया जोड पर जुडने वाली दूसरी गली के बीच तक आ जाता था. यह गली बेहद संकरी थी. इतनी तंगहाल कि जब गली से साइकिल गुजरती तो साइकिल और गली के दोनों तरफ की दीवारों के बीच बस इंच भर की जगह रह जाती. गली से गुजरकर आती साइकिल को देख कोई शख़्स दूर ही खडा रहता ताकि साइकिल गुजर जाये और उसके बाद वह गुजरे. गली इतनी तंगहाल थी कि एक साइकिल और एक शख्स दोनों अगल-बगल से नहीं गुजर सकते थे.
           
ज़रीना और पडोसी याने राधा के घर के दरवाजे लगे-लगे थे. दोनों में गजब का घरोबा था. औरतें हों तो घरोबा हो ही जाता है, फिर क्या तो तंगहाल गली और क्या तो तंगदिल मिजाज़. ज़रीना के घर में दरवाजे से सटा एक कमरा था. कमरे में दो बिस्तर थे, एक के ऊपर एक, जैसे रेल्वे के डिब्बों में बर्थ होती हैं, एक के ऊपर एक ठीक वैसे ही. संकरे कमरे में नीचे वाला बिस्तर दरवाजे के बीच तक आता था. बिस्तर और दीवार के बीच की जगह इतनी कम थी कि बमुश्किल एक शख़्स इससे गुजरता संडास और चैके तक जा सकता था. घर के सामने की गली बाजू वाली गली से थोडी चौड़ी थी. इतनी चौड़ी कि साइकिल के बाद भी एक शख़्स के गुजरने लायक जगह बची रहती. गली के ऊपर गली के आकार में पसरा संकरा आसमान था, इतना तंगहाल आसमान कि उसमें बमुश्किल आधे से पौन घण्टे तक सूरज चमकने को आ पाता था. घर के सामने वाली तीन सीढियों के नीचे से पतली सी मोरी थी जिससे गली का निकास होता था.
            
ज़रीना के आदमी की पगार बढ गई थी. पिछले चार सालों से वह पैसे जमा करता रहा था. कुछ पैसे हो गये तो उसने साइकिल की जगह मोटरसाइकिल लेने की सोची. पर तब ख़याल न आया कि उसे रखेंगे कहाँ. मोटरसाइकिल एक ख़्वाब थी. ज़रीना का बेटा आफताब मोटरसाइकिल की बात पर खिल उठता. ज़रीना के गले से लग जाता. मोटरसाइकिल....मोटरसाइकिल चिल्लाता गली में दौडता. ज़रीना का आदमी मोटरसाईकिल के लिए पैसों का हिसाब लगाता. उसे पैसों का हिसाब लगाता देख ज़रीना आफताब को अपने दामन में समेट लेती. पैसों का हिसाब लगाते अपने आदमी को देख वह मुस्कुराती. ज़रीना का आदमी रात-रात भर करवटें बदलता. उसकी नींद नदारद थी. उसे तय करना था कि मोटरसाइकिल कौन से रंग की खरीदी जाये. इस तरह उसे नींद न आती थी. सारी रात बीतती जाती. ऊपर के बिस्तर पर सोते, करवट बदलते आदमी की आवाज़ से ज़रीना भी सो न पाती. वह उठ जाती. अपने आदमी के सिर पर अपना हाथ फेरती. वह उसे चूमता. इस तरह यह ख़याल न आया कि जब मोटरसाइकिल आयेगी तो उसे कहाँ टिकायेंगे.
          
ज़रीना के आदमी को लगता कि पडोसी याने राधा का आदमी उसकी मोटरसाईकिल से रश्क खाता है इसलिए उसे उसके घर के सामने से हटाने की बात कहता रहता है. दोनों का पडोस बाईस साल पुराना है. इतना घरोबा रहा है कि बेहद संकरी गली की जहालत भरी तंगहाली में भी जरा सी कोई कमी न लगती थी. प्यार हो तो हर जगह किसी खुले नख़लिस्तान सी हो जाती है और फिर रेत के दरिया में शीशे सी चमकने लगती है. दोनों घरों की औरतों याने राधा और ज़रीना ने आपस की इस मोहब्बत को और परवान चढाया था. पर अब, इधर कुछ दिनों से एक अजीब सी ख़ामोशी, एक नश्तर सा अबोलापन, एक बेदिल सा रंज, एक अजनबी सी तन्हाई....पैर पसारने लगी है. 
           
इतना बैर रखना ठीक है क्या - कभी ज़रीना अपने आदमी को कहती. कुछ बातों की वजहें समझ नहीं आतीं. वैसी ही यह बात भी थी. राधा के आदमी ने एक बार भी ज़रीना के आदमी की नई मोटरसाइकिल की ओर देखा तक नहीं था. देखना तो दूर उसकी फितरत से लगता मानो उसे पता ही न हो कि ज़रीना के आदमी ने नई मोटरसाइकिल खरीदी है. सारा मोहल्ला जानता है. फिर जो पडोस है, बरसों का आबाद और चहेता पडोस उसे भला कुछ भी पता न हो. ऐसा कैसे हो सकता है ? आखिर क्या बात है ? पहले तो लगा कि सिर्फ बेरुखी है, पर फिर उसमें से एक किस्म के रंज की बू भी आई. एक किस्म की बेदिली की धमक. कोई शिकवा शिकायत हो तो उसे जाहिर भी तो किया जा सकता है- ज़रीना अपने आदमी को कहती. इधर राधा का आदमी जो चाहता था वह मुनासिब न था. 

तंगहाल गली में मोटरसाईकिल को रखने कोई जगह न थी. ज़रीना का आदमी मोटरसाईकिल टिकाये भी तो कहाँ? एक दिन फ़साद इतना बढा कि पडोसी याने राधा के आदमी ने कह दिया कि वह ज़रीना के आदमी की मोटरसाईकिल गिरा देगा. उसे चकनाचूर कर देगा. उस दिन ज़रीना और उसका आदमी घबरा गये थे. राधा के आदमी का चेहरा लाल-पीला हो रहा था. राधा ने उसे घर के भीतर खींचा था. फिर उसे पीने को पानी दिया था. उसकी पीठ पर हाथ रखा था.
             
राधा अपने आदमी के गुस्से की ठीक-ठीक वजह जानती है. पर कहे भी तो किसे? आदमी के गुस्से की वजह कहने का शऊर भी कहाँ है ? आदमी के गुस्से की वजह का बख़ान करना बडी बेअदबी है. एक निहायत ही कमज़र्फ़ किस्म की हरकत. अब तो उसने अपने आदमी से पूछना भी छोड दिया है - कहाँ गये थे, कोई काम मिला क्या .....वह अब यह भी नहीं कहती कि देखना एक दिन सब ठीक हो जायेगा. कोई कब तक कहे कि देखना एक दिन सब ठीक हो जायेगा. राधा ने कई-कई दिनों तक कहा, पर जब पूरे दो साल बीत गये तो उसने भी कहना छोड दिया. 

उम्मीद का दामन बेहद फिसलन भरा है, उसे थामना एक किस्म की दगाबाजी करना है खुद से भी और वक्त से भी. उसने कई-कई बार कहा - सब ठीक हो जायेगा, देखना एक दिन..... एक दिन यह कहते हुए उसकी आँखें भीग आई थीं - सब ठीक हो जायेगा, देखना एक दिन....एक दिन तुम्हें काम मिल जायेगा....फिर उसने चुन्नी से अपनी नाक पोंछी और आदमी के लिए रोटी लाने को उठी तो आदमी ने उसे अपने पास खींच लिया, फिर उसकी गोद में अपना सर रख दिया मानो राधा उसकी औरत न हो उसकी माँ हो और फिर सुबक-सुबक कर रो दिया, राधा चुपचाप उसके सर पर अपना हाथ फेरती रही, आदमी का सुबकना उसे भीतर तक काट रहा था, पर वह एकदम खामोश बनी रही, किसी बुत की तरह और उसका सिर सहलाती रही....
             
उस रात ज़रीना के आदमी ने मोटरसाईकिल सीढियों के दूसरी तरफ खडी की थी. मोटरसाईकिल का पीछे का पहिया मोड वाली संकरी गली के बीच तक आ गया था. उसे एक बारगी यह भी ख़याल आया था कि सीढियों को तोड डाले. घर की देहरी इतनी ऊँची थी कि घर में घुसने के लिए वहाँ कुछ न कुछ रखना पडता. सीढी को तोडने से मोरी भी टूटती थी और इससे घर में संडास का गंदा पानी भर सकता था. संडास के गंदे पानी से घर को बचाने के लालच में वह सीढी को तोडना नहीं चाहता था. फिर उसका अंदाज़ था कि सीढी टूट जाने पर भी मोटरसाइकिल के आगे के पहिये का करीब आधा हिस्सा राधा के घर के सामने आ ही जायेगा. उसने पल भर को इधर-उधर नज़र घुमाई. हर तरफ तंगी, संकरापन, हर इंच पर एकदम कम से कमतर जगह..... ऐसा नहीं है कि उसने जगह की तलाश नहीं की. पर दूर-दूर तक कोई जगह न थी. लोग कहते कि आबादी बढ गई है सो जगह कम पडती है. दो गली छोडकर रहने वाला एक बुजुर्ग कहता कि आबादी तो उतनी ही है बस ज़मीन कम हो गई है, घरों में भी और दिलों में भी. पता नहीं क्या है कि जगह नहीं है?
                
उस रात ज़रीना का आदमी रात भर बिस्तर पर कसमसाता रहा. गली से रात बेरात जब कोई गुजरता तो जोर-जोर से चिल्लाता - अबे किसकी मोटरसाईकिल है ये, इसे हटाओ.....कोई साईकिल वाला जोर-जोर से घण्टी बजाता, कोई साइकिल सवार मोटरसाइकिल के पास अपनी साईकिल टिका मोटरसाईकिल वाले को लानत सलामत सुनाता..... ज़रीना के आदमी को रात को पंद्रह-बीस बार उठना पडा. पूरी रात जागते-जागते ही गुजरी. अगली रात भी इसी तरह गुजरी. पूरे दिन की मेहनत भरी थकान के बाद भी वह जागता रहता. कभी झपकी लग जाती तो ज़रीना उसे उठाने के लिए झकझोरती. एक बार देर रात उसने नींद के लालच में मोटरसाईकिल फिर से सीढियों के आगे याने पडोस याने राधा के घर के दरवाजे के सामने खडी कर दी. पता नहीं क्या था कि राधा का आदमी जगा हुआ था. इतनी रात को भी जगा हुआ था. 

ज़रीना के आदमी को पता न था कि पडोसी रात-रात भर जागता रहता था. उसकी नींद बेचैनियों के कब्रिस्तान में दफन हो चुकी थी. पडोसी के कान उसके दरवाजे के सामने की सीढियों पर होते. उस रात भी मोटरसाईकिल के स्टैण्ड की आवाज उसे सुनाई दे गई थी. पल भर बाद हल्ले-गुल्ले से ज़रीना के आदमी की नींद खुल गई. राधा के आदमी की तेज-तेज चिल्लाने की आवाज़ सुनाई दे रही थी. उसकी गालियाँ संकरी गली में गूँज रही थी. उसके बजबजाते लफ्जों से देर रात का आसमान कंपकंपा रहा था. बीच-बीच में राधा की आवाज़ भी आती थी. लगता था जैसे वह अपने आदमी को समझा रही हो. पर उस पर मानो रंज और बदले की भावना काबिज़ थी. वह आपे से बाहर हुआ जा रहा था. ज़रीना के आदमी ने घर का दरवाज़ा खोला, डगमगाता सा मोटरसाईकिल पर बैठा, मोटरसाईकिल स्टार्ट की और फुर्र हो गया. पडोसी की गालियाँ और ज़रीना की डबडबाई खौफज़दा आँखों ने पल भर को उसका पीछा किया. फिर मोटरसाइकिल के पीछे की लाल लाईट अंधेरे में गुम हो गई. वह उस रात घर न आया. वह अगली रात भी न आया. रात भर बिस्तर पर पडी ज़रीना करवटें बदलती. उसने घर का दरवाजा भीतर से बंद कर रखा था. दरवाज़ा बंद हो तो सुकून रहता है. उसका दिल डूबने लगता. उसे तरह-तरह के ख़याल आते.
                 
सामने की गली क्या इनके बाप की है? हर किसी का हक उसके घर के दरवाजे़ तक होता है. उसके बाहर नहीं.
              
तीसरे दिन घर लौटे ज़रीना के आदमी ने खाना खाते हुए कहा. उसने पी रखी थी. वह कम ही पीता था. पर आज टुन्न होकर आया था. वह जोर-जोर से कह रहा था- हरामी अपने को समझता क्या है. गली क्या इसके बाप की है.ज़रीना उसे चुप होने को कहती पर वह कहता जाता. गालियाँ बकता. दुश्नाम लफ्ज़ों की झडी लगा दी थी उसने. पडोसी याने राधा का आदमी बिस्तर पर कसमसा रहा था. राधा उसका हाथ पकडे उसे शांत रहने को कह रही थी. जब वह उठने को हुआ तो उसने अपने आदमी के पैर भी पकडे कि वह लेटा रहे चुपचाप. पर उसने राधा को झटक दिया और घर का दरवाज़ा खोल बाहर आ गया. ज़रीना का आदमी तीन रातों से सोया न था. पर उसे पता न था कि राधा का आदमी तो पिछले दो सालों से नहीं सो पाया था. उसके ऊपर हजारों का कर्ज आन पडा था. उसकी देहाडी जाती रही थी. कभी घर में एक वक्त के खाने के पैसे भी न होते. 


(Promotesh Das Pulak)

अक्सर उसका मन उचाट हो जाता, दिल डूबने लगता और मन एकदम से खाली हो जाता....जैसे कोई एकदम से पानी भरा बर्तन लुढका दे उसका सारा पानी बितर जाये ठीक वैसा ही खाली. उसकी औरत याने राधा उसे अपनी बाहों में भर लेती. उसे लगता उसे ठीक लगेगा पर उसकी बाहों में उसका मन और...और खाली होता जाता.....वह अपनी औरत को झटक कर खडा हो जाता. घर का दरवाजा खोलता. दरवाजे के सामने मोटरसाईकिल का पहिया टिका होता. वह मोटरसाईकिल पर थूकता, उसे अपनी लात मारता - हटा इसे नही ंतो इसे गिरा दूँगा, चकनाचूर कर दूँगा - वह चीखता सा गुर्राता. उसकी औरत उसकी बाहें पकडने की बेजान कोशिश करती - सुनो तुम अंदर आओ, रहने दो.....जाने दो - वह औरत को धक्का देता, देहरी के भीतर घुटनों पर बैठी राधा उसका चीखना, गुर्राना सुनती, तंगहाल गली बजबजाती गालियों से भर जाती, वह चीखता, धमकाता और बुरे-बुरे लफ्जों में ज़रीना के आदमी को ललकारता..... राधा डरती. वह प्रार्थना की कोई इबारत बुदबदाती. वह जानती थी कि उसका आदमी कितने ख़ौफनाक गुस्से में है. वह उस गुस्से की माकूल वजह जानती थी. उसकी घबराई आँखें फैल जातीं.  वह अपने आदमी को घर के भीतर खींचने की बेजान कोशिश करती.
        
इस तरह अक्सर झगडा होता. सारी दुनिया खुद में मगन होती और राधा का आदमी और ज़रीना का आदमी झगडते. कुछ तमाशबीन जमा हो जाते. पर झगडा ज्यादा बढ न पाता था. झगडे में ज़रीना का आदमी कमज़ोर पडता था. वह कभी अपनी मोटरसाईकिल को आगे पीछे करता, तो कभी अपने घर का दरवाज़ा भीतर से बंद कर लेता. अपने घबराये अब्बू को आफ़ताब फ़टी-फ़टी आँखों से देखता. ज़रीना आफ़ताब को सुलाने की बेजान सी कोशिश करती. गली में राधा के आदमी की चीख और गालियाँ गूँजती. गली के खिडकी दरवाजे बंद रहते. गली का सन्नाटा वैसा ही बना रहता. कभी ख़ौफ के कारण आफ़ताब की उंगलियाँ काँपती तो कभी वह ज़रीना के दामन में छिप जाता. रात बहुत मनहूस लगती. वह बहुत धीरे-धीरे गुजरती.
     
पर आज?
     
आज ज़रीना के आदमी ने पूरी बेशरमी और इत्मिनान से पडोसी के दरवाजे के सामने मोटरसाईकिल टिकाई थी और पिछले पूरे एक साल की भडास उसकी ज़बान से दहाडती हुई निकल रही थी- .....गली तेरे बाप की है बे..... ज़रीना ने उसका हाथ थाम रखा था. आफ़ताब की आँखों में ख़ौफ के आँसू थे.
      
तभी पडोसी का दरवाज़ा खुला. उसकी लात से मोटरसाईकिल गिरने की आवाज़ आई. अपने आदमी को रोकती हुई राधा का कातर स्वर सुनाई दिया. इधर ज़रीना ने भी अपने आदमी को पकड रखा था. पर वह उससे खुद को छुडाकर बाहर निकल आया. उसकी शर्ट का एक बटन टूटकर ज़रीना के हाथ में रह गया - तेरे बाप की है क्या बे. अपने आदमी का हाथ पकडे राधा की कातर चीख़ सुनाई देती थी - छोडो,छोडो....जाने दो न...जाने दो...ए जाने दो न.... पर वह उसे दीवार पर धक्का मार बाहर आ गया था. राधा के आदमी और ज़रीना के आदमी के भिडने की आवाज़ आती रही थी, मोटरसाइकिल से टकराने की, दीवार पर रगड खाने की, ज़मीन पर गिरने की, गालियों, गुर्राहटों और चीखों की आवाज़ जिसमें राधा की कातर चीख़ भी शुमार थी - अरे कोई रोको...कोई बचा लो, रोको...रोको इनको - आफ़ताब के चिल्ला-चिल्ला के रोने की आवाज़ के साथ- साथ. राधा के आदमी के हाथ में एक लोहे का सरिया था जो उसने ज़मीन पर पडे ज़रीना के आदमी के पेट के आर-पार कर दिया था. फिर उसे जोर की लात मारी और गंदी-गंदी गालियाँ देता भाग खडा हुआ. डर के मारे राधा ने घर का दरवाज़ा भीतर से बंद कर लिया.
      
शराब के नशे में धुत ज़रीना के आदमी को पहले तो कुछ समझ न आया. पर जब तक समझ आया तब तक बहुत देर हो चुकी थी. पेट में धंसे ख़ून से सने लोहे के सरिये को हाथ से पकडे वह चीख़ता रहा. उसका ख़ून सारी गली में बिखरा था. ख़ून की एक मोटी धार बहकर गंदे पानी के मोरी में गिर रही थी. उसका सिर थामे ज़रीना जोर-जोर से चीख रही थी. गली के बीच खडा आफ़ताब दहाडें मार-मार कर रो रहा था. रात के दो बजे थे. चित्कार और रोना पीटना सुनकर एक घर की खिडकी खुली थी.पल भर को और फिर बंद हो गई थी. एक घर के दरवाजे की संद से छिपकर झाँकता एक आदमी यह नज़ारा देख रहा था, चुपचाप. एक घर के अंधेरे में बैठे दो शख़्स चुपचाप रोने, बिलखने और चिल्लाने की आवाजें सुन रहे थे. एक खिडकी थोडा देर से खुली थी. उससे झाँकते शख़्स ने स्ट्रीट लाईट के नीचे खून से लथपथ आदमी और उसकी बिलखती औरत और बच्चे को पल भर को देखा था. फिर दूसरे ही पल उसने हल्की सी अंगडाई ली और धीरे से खिडकी को बंद कर दिया.
          
राधा का आदमी भाग गया था. वह फिर न लौटा.
          
राधा ने घर का दरवाजा भीतर से बंद कर लिया था. अच्छे से बंद कर लिया था. वह सारी रात दरवाजे से सटी खडी रही. वह कई दिनों तक घर से बाहर न निकली.
           
राधा को रात बे रात ज़रीना के रोने की आवाज़ें सुनाई देतीं. कभी लगता मानो ज़रीना और आफताब दोनों रो रहे हैं. दोनों के घरों के बीच बस एक दीवार थी. दोनों के घर इतने करीब थे कि राधा को कभी यह भी लगता मानो आफताब ज़रीना की छाती से लगा रो रहा है या उसने रोते-रोते आफताब को बस अभी अपनी छाती से लगा लिया है. कभी देर रात ज़रीना के सुबकने की आवाजें सुनाई देतीं. कभी अजीब सी ख़ामोशी की आवाजे़ं आतीं. कोई तन्हाई रात भर शोर करती. कभी सुबुकने, आँख-नाक पोंछने, मुँह दबाकर सिसकने, चुपके-चुपके रोने की आवाज़ें इस तरह आतीं मानो आवाजे़ं न हों कोई ख़ौफनाक सी चुप्पी हो. राधा रात-रात भर दीवार को भेदकर ज़रीना के कमरे से आती इन आवाज़ों को सुनती. दोनों घरों के बीच एक ईंट वाली एक कमज़ोर कच्ची दीवार थी जिसके आर-पार आवाज़ें आती-जाती रहती थीं. कभी दोनों घरों में ऐसी मोहब्बतें थीं कि दीवार के पार भी वे बातें कर लिया करते थे. दीवार के एक तरफ से राधा कहती और दूसरी तरफ से ज़रीना. लगता था वह दीवार बेमानी थी. उस दीवार के आर-पार इस तरह से बातचीतें हो जाती थीं कि लगता था मानो दो घर एक जान हों.
           
राधा, ज़रीना से कहना चाहती थी कि तुम यकीन करो मैंने अपने आदमी को रोका था - वह कहना चाहती थी कि तुम यकीन करो एक दिन जब वह गाली दे रहा था मैंने अपने आदमी के मुँह पर अपनी हथेली रख दी थी. मेरी ताकत उससे ज्यादा होती तो वे हथेलियाँ उसी तरह से उसके मुँह को कसे रखतीं और गालियाँ उसके मुँह से बाहर न निकल पातीं. तुम यकीन करो. पर चाहने से क्या होता है? राधा के आदमी ने ज़रीना के आदमी का कत्ल किया था. इस तरह वह ज़रीना के दर्द में शामिल न हो सकती थी.
          
तंगहाल गली में बंद राधा के घर के दरवाज़े पर लोगों की भौंहें तन जाती थीं. दो रोज पहले पुलिस का एक आदमी आया था. उसने बडे वहशियाने तरीके से उसके दरवाज़े पर दस्तक दी थी. राधा ने दरवाज़ा न खोला था. हादसे की रात को जो लोग घरों में दुबके थे, वे सब लोग बाहर आ गये थे. उनमें से एक पुलिसवाले के साथ राधा को गाली देता हुआ उसके दरवाज़े को पीट रहा था - क़ातिल की बीबी. दरवाज़ा खोल. दरवाज़ा खोल.गली के उस आदमी ने जिसने कत्ल का सारा नज़ारा देखने के बाद उस रात जम्हाई लेते हुए खिडकी बंद कर ली थी, उसी ने राधा के घर के दरवाजे पर चिल्लाते हुए एक पत्थर फेंका था. दरवाजे़ के भडभडाने, कुण्डी के बेतहाशा टिनटिनाने और भडाम-धडाम की आवाज़ से राधा का कलेजा काँप उठा. ख़ौफ से उसकी आँखें भर आईं थीं.
         
वह देर रात थी. जोर का पानी गिर रहा था. राधा चुपचाप लेटी थी. पानी का शोर था. नींद गायब थी. तभी दरवाज़े पर दस्तक हुई थी. उसी शख़्स को जिसने हादसे वाले दिन पल भर को खिडकी खोलकर बंद कर ली थी, उसे भी वह दस्तक सुनाई दे गई थी. बारिश के शोर के बाद भी उसे राधा के घर के दरवाजे पर हुई वह दस्तक सुनाई दे गई थी. राधा को इस पल का इंतज़ार था. उसका आदमी लौट आया था. उसने दरवाजा खोला और सामने खडे अपने आदमी से चिपक गई. खिडकी वाला आदमी रात के तीन बजे भी यह सब देख रहा था. राधा पल भर को अपने आदमी को पहचान न पाई थी. बिखरे बाल, धंसी आँखें, बढे नाख़ून, गले तक दाढी, पसीने की गंदी बू और चेहरे से लेकर घुटनों तक सारे शरीर को ढंका गीला कंबल. आदमी भूखा था. राधा ने चुपचाप उसके लिए खाना बनाया था. खाना बनाते समय उसकी आँखों में आँसू थे. अपने आँसू पोंछ, गर्दन घुमाकर, खाना बनाते-बनाते उसने अपने आदमी को देखा था. फिर मुस्कुराई थी. आदमी के चेहरे पर कोई भाव न था. वह काठ की तरह से चुपचाप बैठा था. जाने क्या तो उसके जेहन में चल रहा था. बाहर रह-रह कर बिजली कौंधती थी. गली में गिरते पानी के परनालांे का शोर बढ गया था.
          
खिडकी वाले शख़्स ने पुलिस को इत्तिला दे दी थी. पुलिस सुबह होने से पहले ही आ गई थी. राधा के आदमी को जब वह उठा ले गई तब वह राधा की बाहों में था. रात को राधा के जिस्म से चिपके राधा के आदमी को पल भर को लगा था मानो कहीं कुछ भी न हुआ हो और अब सबकुछ ठीक हो गया हो. राधा अपने आदमी के पीछे-पीछे पुलिस की गाडी तक गई थी, मशीन की तरह से चलती, एकदम काठ. एकदम बुत. फटी-फटी आँखों के साथ. अपलक. बहुत से घरों की खिडकियाँ खुली थीं. हर कोई इस नज़ारे को देख रहा था. अपने आदमी के हाथ में हथकडी देख राधा के भीतर एक भूचाल सा आ गया था. वह पुलिसवाले के पैरों पर गिर गई थी. जैसे कोई हरा भरा दरख़्त गिरता है, ठीक वैसे ही. रोती-बिलखती. पर जैसे कहीं कोई न था. पुलिस उसके आदमी को ले जा रही थी. वह पुलिस के पीछे-पीेछे चलती रही थी. तमाम गलियों के पार सडक पर पुलिस की गाडी खडी थी. वह फटी-फटी सी आँखों में आँसू भरे पुलिस की गाडी को जाते हुए, दूर रोड पर मुडकर रात के अंधेरे में खोता हुआ देखती रही थी.
       
ज़रीना ने भी चुपचाप दरवाजे की संद से यह नज़ारा देखा था. फिर वह बिस्तर पर आफ़ताब के पास सरक आई थी.
        
उस दिन के बाद से राधा ने अपने घर का दरवाज़ा बंद न किया था. उसके घर का दरवाज़ा अपने वक्त पर खुलता. दरवाज़ा अपने वक्त पर बंद होता.
         
ज़रीना के आदमी के कत्ल को आठ माह गुजर चुके थे. उसने मोटरसाइकिल बेच दी थी. आफ़ताब आखरी बार मोटरसाईकिल पर बैठने की ज़िद पकडे था. ज़रीना ने उसे मोटरसाईकिल पर बिठा दिया था. उसके मुस्कुराते चेहरे को देखकर वह भी मुस्कुरा उठी थी. आज से तीन साल पहले की बात होती तो राधा भी उन दोनों के पास आ खडी होती. आफ़ताब को गोदी में उठाकर चूम लेती. ज़रीना के कंधे पर अपना हाथ रख देती. पर जैसे सबकुछ एकदम से नेस्तनाबूद हो गया था. वह ज़रीना के आदमी के कातिल की बीवी थी. वह आफ़ताब के अब्बू के कातिल की बीवी थी. वह छिपकर उन दोनों को देखती रही थी.
         
उस रात ज़रीना के कमरे तक दीवार को पार करती राधा के सुबुकने की आवाज़ आती रही थी. राधा मजबूत दिल की औरत थी. ज़रीना को पता था. वह कभी भी हिम्मत न हारती. हमेशा हँसती मुस्कुराती. वह बहुत बातूनी थी. तरह-तरह की बातों का खजाना उसके पास था. सारे मुहल्ले में उसके चहकने की आवाज़ें आती रहती थीं. पर उस रात उसके कमरे से आती तन्हाईयों की आवाज़ों में एक अजीब सी ख़ामोशी सुनाई देती थी. जो बहुत बोलता रहा है, हँसता चहकता रहा है उसके कमरे से आती मनहूस सी चुप्पी की सदा न जाने कैसी तो ख़ौफनाक लगती है.
         
उस रात बहुत सी बातें उस एक ईंट वाली उस कच्ची दीवार के आर-पार दोनों के कमरों से गुजरती रहीं. तमाम पुरानी बातें. मुहब्बतों के तमाम किस्से. राधा के कोई औलाद न थी. जब आफ़ताब हुआ तो राधा ने ही उसे सबसे पहले अपनी गोद में लिया था. उन दिनों जब आफ़ताब बहुत छोटा था, तब दोनों का सारा-सारा दिन आफ़ताब के साथ गुजर जाता. करने को कुछ ख़ास न था और इस तरह करने को बहुत से काम थे. चैके से उठती कोई जतनभरी गंध थी, तो बिस्तर पर लेटकर सुनी जाती कोई गप्प. कोई चुहलभरी ठिठोली थी, तो कोई पूरे मोहल्ले को गुँजाता बहुत मासूम सा ठहाका. वक्त ऐसे गुजर जाता मानो अभी तो दिन निकला हो.....पर इससे क्या होता है ? यादें कोई ऐसा मरहम तो नहीं हैं न जो मौत का घाव भर दें. उनको याद कर तकलीफ होती है.
        
एक दिन बाजार में दोनों टकरा गईं. पता नहीं क्या था कि आफ़ताब को देखकर राधा मुस्कुरा दी. आफ़ताब ज़रीना के दामन से चिपक गया. ज़रीना ने पल भर को राधा को देखा और आफताब का हाथ पकड वहाँ से जाने लगी. जाने से पहले पल भर को दोनों की नज़रें मिलीं थीं - एक के आदमी का कत्ल हुआ था और दूसरे के आदमी को सारी जिंदगी के लिए कैद - शीशे में चेहरा देखो तो मानो दोनों के चेहरे एक से हों.
      
पर फिर भी जो था वह कुछ इस तरह था कि जाने के लिए मुडते हुए, आफताब का हाथ पकडते-पकडते ज़रीना ने उससे कहा था - अब हमारा साथ नामुमकिन है.
                    
हमारा लंबा साथ रहा है.
        
एक झिझक के साथ राधा के लफ्ज ज़रीना पर लपके थे.
                    
मैंने कहा न उस बारे में अब कोई बात नहीं.
        
राधा ने उसके सामने अपनी हथेली खोल दी थी. राधा की हथेली में कट का, घाव का एक गहरा निशान था. उसकी छोटी उंगली का एक पोरवा गायब था. ज़रीना ने पल भर को राधा की हथेली के ज़ख़्म के लंबे गहरे निशान और कटी उंगली वाली उसकी हथेली को देखा. चार साल पुराना कोई दिन होता तो वह उसकी हथेली अपने हाथों में थाम लेती. पर अब भी जैसे कुछ है जो ख़त्म नहीं होना चाहता. सब कुछ मिट भी कहाँ पाता है. ग़र घरोबा रहा हो, मोहब्बत रही हो और धडकने को आतुर कोई बेज़ार सा मन हो तो - अरे क्या हुआ ? - उसने हठात पूछा.
                      
हादसे वाली उस रात मैंने वह सरिया पकड लिया था. मुझे पता था कि मेरा आदमी बहुत गुस्से में है. वह बुरी तरह से मेरे हाथ से सरिया को छुडा रहा था. मैं सरिया को अपनी मुठ्ठी में पकडे थी. उसके सिर पर ख़ून सवार था....फिर उसने झटके से वह सरिया मेरी मुठ्ठी से खींच लिया....मैं गिर पडी थी.
        
कहते हुए राधा ने मुस्कुराने की बेजान सी कोशिश की. ज़रीना को अपनी मुठ्ठी में भिंची अपने आदमी की शर्ट का अहसास हो आया. गंदी गालियों और बजबजाते लफ्जों के साथ उसकी मुठ्ठी में उसके आदमी की शर्ट के टूटे बटन का अहसास जज़्ब हो गया. उसने झिझकते हुए राधा की हथेली पर अपनी उंगलियाँ रख दीं. उसकी कटी उंगली पर अपनी उंगली रखते उसके होंठ काँप उठे मानो अभी-अभी राधा ने चीख़ते गुर्राते गालियाँ बकते अपने आदमी के मुँह पर रख दी हो अपनी हथेली, जैसे गालियाँ देते घर से बाहर निकलते आदमी को अब भी भीतर खींचती हो ज़रीना की कमजोर बाँहें.....
                     
बात मोटरसाईकिल की नहीं थी. जिन गलियों में जगह ही न हो वहाँ जगह का क्या झगडा ज़रीना.....
         
अबकी बार उसने ज़रीना की डबडबा आई आँखों में झाँक कर कहा. उसका दिल किया कि वह यह भी कह दे कि उसका आदमी ऐसा बुरा न था. आदमी की दिहाडी अगर चली जाये. अपनी औरत को अगर वह दो जून की रोटी भी न खिला पाये तो वह ऐसा हो ही जाता है. उसने अपने आदमी को खूब प्यार किया था. पर जो गरीबी होती है वह भी भला कभी प्यार से धुल-पुंछ पाई है. पर वह यह न कह सकी. उसने इस बात को किसी और तरह से कहा - गरीब ही गरीब का कातिल हो जाता है....है न.ज़रीना ने अपनी आँखें पोंछी और उसकी बात पर हाँ में सिर हिलाया.
           
वे अक्सर टकरा जातीं. दिन बीत रहे थे. अब दोनों की बातें हो जाती थीं. घर के बाहर बाजार में वे एक दूसरे का हाल चाल पूछ लेतीं. राधा आफ़ताब के सिर पर हाथ फेरती. आफ़ताब उसे देख मुस्कुराता.
           
एक दिन राधा ने ज़रीना को कहा था - सारी दुनिया तो बेगानी ठहरी. ज़रीना को उसके आदमी के कत्ल के वक्त अपने-अपने घरों की खिडकियाँ बंद करते लोग दीख गये. उसे पल भर को वह नज़ारा दीख गया. इत्मिनान से खिडकी बंद कर घर के भीतर सो जाने वाला वह शख़्स भी उसे पल भर को दीखा.
                   
हम फिर से उन पुराने दिनों की शुरुआत कर सकते हैं.
                   
नहीं यह अब मुमकिन नहीं.
                   
 ‘ क्यों ?’
             
ज़रीना को पल भर को वह शख़्स दीखा जिसने उस दिन गुर्राते हुए गालियाँ देते हुए राधा के घर के दरवाजे पर पत्थर फेंका था. नफरत से भरे चेहरे पर रंज और गुस्से की कैसी-कैसी ख़ौफनाक लकीरें लिये वह चीखता था - कातिल की बीवी. वह कहना चाहती थी कि वे दोनों एक बेहद खतरनाक दुनिया में रहती हैं. पर उसने इस बात को किसी और तरह से कहा - लोग क्या कहेंगे ? क्या कहेंगे राधा ?
                 
क्या कहेंगे ?’
                
 ‘ यही कि मैं अपने आदमी के कातिल की बीवी की दोस्त हूँ.
                  
हम कुछ ऐसा करेंगे कि दुनिया को पता न चल पाये.
             
ज़रीना मुस्कुरा दी थी. उसे पता था कि राधा अगर कह रही है तो जरुर कुछ न कुछ वह कर जायेगी.
              
राधा के घर से चूना, रेत और ईंट के टुकडे निकलते रहे. उनका एक ढेर उसके घर के सामने जमा हो गया. गली के लोगों को पता चला कि राधा के घर में मरम्मत का कोई काम चल रहा है. उस दीवार में, उसी एक ईंट वाली कच्ची दीवार में जो उन दोनों के कमरों के बीच थी, उसी दीवार में एक दरवाजा बनता रहा, उसी दीवार में जिसके आर-पार दोनों औरतों की ख़ामोशी और रोना सुनाई देता था. दोनों इस संकरे दरवाजे़ से एक दूसरे के कमरे में आ जाया करती थीं. एक रात राधा ने ज़रीना के कंधे पर अपना सिर रखकर कहा था - कभी तुझसे लिपटकर रोने का मन करता है - ज़रीना ने उसे अपनी बाँहों में भर लिया था.
          
गली के लोगों को कभी पता नहीं चला कि ज़रीना अपने आदमी के क़ातिल की बीबी से रोज ही मिल लेती थी.
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तरुण भटनागर

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