मैं कहता आँखिन देखी : सविता सिंह

Posted by arun dev on जुलाई 06, 2017





हिंदी की महत्वपूर्ण कवयित्री सविता सिंह की रचनात्मकता में नारीवाद की भूमिका और इस विमर्श की वर्तमान अर्थवत्ता को लेकर रेखा सेठी ने यह लम्बी बातचीत की है.

संवाद की यह विशेषता होती है कि वह जटिल से जटिल अवधारणा को सुगम बनाते हुए सहजता से संप्रेषित होता है.

यह संवाद वैश्चिक स्तर पर स्त्री की स्थिति और उनमें हो रहे बदलाव और उस बदलाव के दर्शन पर प्रकाश डालता है.


सविता सिंह की कविताओं को समझने का एक रास्ता भी यहाँ से आपको दिखेगा.



हमें राष्ट्रवाद के अँधेरों को भी देखना चाहिए...                    

सविता सिंह से रेखा सेठी की बातचीत




आपके निकट स्त्री-कविता का आशय क्या है?
मैं एक स्त्री हूँ और मेरी कविता में मेरी यह पहचान सम्मिलित है. मैं यह कभी भुला नहीं पाती कि मैं एक स्त्री हूँ. बहुत सारी स्त्रियाँ अक्सर यह कहती हैं कि वे साहित्यकार हैं और उनके लिए इस बात के कोई मायने नहीं हैं कि वे स्त्री हैं. मेरा प्रस्थान बिन्दु यह नहीं है. मैं मानती हूँ और बहुत शिद्दत से महसूस करती हूँ कि मेरे साथ जो कुछ भी इस जीवन में घटित हुआ है और हो रहा है वह इस वजह से ही है. अच्छा-बुरा जो कुछ भी है. ज़रूरी नहीं है कि आप स्त्री हैं तो हर दम आप पर प्रहार ही होता रहता है या आप हिंसा की शिकार होती हैं. एक ख़ास किस्म की असमानता अवश्य है, जिस पर हमारी पूरी व्यवस्था, आर्थिक-सामाजिक, आधारित है उससे आप प्रभावित होती रहती हैं. परन्तु स्त्रियों की अपनी शक्ति भी है कविता लिखना उसमें से एक ऐसी ही क्षमता है जिसे वह अपनी शक्ति के रूप में समझ सकती है. 

कविता में अपनी बात अभिव्यक्त करना उस अन्दरूनी शक्ति का इज़हार है. यह मेरे लिए अपने निकट होने जैसा है. स्त्री कविता में अपने निकट होने का एक मतलब है. कहीं न कहीं यह उसके स्वका मामला है और जो स्व है उसका आविर्भाव उसके साथ जन्म से ही होता है. हाँ उसके साथ उसका विकास हो तो उसमे और बहुत-सी बातें आ जाती हैं. यह एक .खास यात्रा है. मेरे अपने स्व का विकास. मेरे जीने के लिए यह बहुत है. मुझे अपने बारे में एक ख़ास तरह की समझ चाहिए जो मुझे सम्पन्न करे. यह सम्पन्नता कोई बाहर से महसूस न भी करे आप अपने भीतर उसे महसूस कर सकती हैं, वह एक रोशनी की तरह होती है, आपको आगे जो कदम रखने हैं उनकी दिशा दिखाती हुई. यह दिशा बहुत महत्त्वपूर्ण है क्योंकि कोई आपके भीतर से ही यह सुझा रहा होता है कि आप किधर जाएँ. यह आपका अपना फैसला होता है. जीवन का गम्भीर फैसला. दरअसल मुक्त होने का अहसास की प्रतीति यहाँ होती है.
मेरे लिए स्त्री कविता कोई अनौपचारिक उपस्थिति नहीं है. अगर मुझे कोई बात नहीं जँचती या मैं नहीं लिख सकती तो मैं नहीं लिखती. मैं जब भी लिखती हूँ, वह मेरे विकसित होने का एक तरीका होता है जो अपने आप में यूनीक या विशिष्ट है.

कुछ लोगों को स्त्री कविता जैसे अभिधान से कठिनाई है. उनका मानना है कि कविता का कोई जेंडर नहीं होता. कई लोग कहते हैं कि स्त्रीकविता का विशेषण नहीं हो सकता अर्थात् स्त्री कविता कहकर कविता को किसी परिभाषा में बाँधना ग़लत होगा. आपका क्या विचार है?
मेरा अपना मानना है कि उन लोगों की चेतना में यह बात इस तरह आई ही नहीं है. मैं किसी की आलोचना नहीं करना चाहती परन्तु, यह अवश्य कहना चाहती हूँ कि स्त्री में अगर स्त्री की चेतना नहीं है तो उसके अन्दर पुरुष की चेतना है क्योंकि ये दो ही तरह की चेतनाएँ हैं जो पूरी सृष्टि को चला रही है. आपके द्वारा पूछा गया यह सवाल पुरुष चेतना द्वारा विप्रेषित है और जो लोग इस तरह सोचते हैं उसका खामियाज़ा वे भुगतते भी हैं, यही कह सकती हूँ.

आपने अपनी काव्य यात्रा का आरम्भ इतिहास के एक विशेष दौर में किया जब हाशिये की आवाज़ों को केन्द्र में लाने की कोशिश की जा रही थी स्त्री की आवाज़ को भी हाशिये की आवाज़ की तरह ही पढ़ा गया. समय के उस बिन्दु पर आपने घोषित तौर पर स्त्रीवादीकवयित्री के रूप में अपनी पहचान बनायी. साहित्य में इस तरह का पोज़ीशनलेना कहाँ तक सम्भव है?
यह बात तो सही है कि जिस समय का आप ज़िक्र कर रही हैं, जब मैंने कविता लिखना शुरू किया, वह बहुत ज़्यादा असमंजस का समय था. स्त्री-कविता को स्त्री कविता कहा जाए या न कहा जाए, उसकी स्वीकृति होगी या नहीं, उसकी जगह बनेगी या नहीं या वह अस्वीकृत हो जाएगी, ये सारी सम्भावनाएँ थीं और संदिग्धता भी थी, लेकिन एक कवि को साहसी भी होना चाहिए. उसमें अतिक्रमण करने की आत्मशक्ति होनी चाहिए, तभी कविता नई जगह बना पाती है. और उस समय मुझे ऐसा कभी नहीं लगा कि जो स्त्रियाँ लिख रही थीं वो हाशिए की थीं. मैं सभी कवयित्रियों को बहुत ही महत्त्वपूर्ण कवि के रूप में पढ़ती थी. जब मैं अपनी कविताओं को लेकर गम्भीर हुई और मुझे लगा कि जिस समय में हम जी रहे हैं उस समय में स्त्रियों का हस्तक्षेप होना ही चाहिए. मुझे लगा कि इस असन्दिग्धता के दौर को मुझे पार करना होगा. यह हिम्मत मुझमें होनी चाहिए कि जो मैं सचमुच महसूस कर रही हूँ उसे लिख सकूँ. मुझे ज़रा भी भय नहीं था कि इसे ख़ास ढंग से लेबल कर दिया जाएगा या उसकी वजह से इस कविता को और हाशिये पर धकेल दिया जाएगा.
मुझे ऐसा लगा कि ये कविताएँ अपने समय को सम्बोधित कर रही हैं .
कोई भी अभिव्यक्ति तभी सटीक, तभी कारगर हो पाती है जब उसके पीछे यह भावना हो कि हम अपनी स्वतन्त्रता को इस तरह से ज़ाहिर कर सकते हैं. इससे पहले मैं नहीं जानती कि किसी ने कहा हो कि मैं स्त्रीवादी कविताएँ लिखती हूँ. सबने कहा कि यह स्त्रियों की कविताएँ हैं, वगैरह-वगैरह, लेकिन स्त्रीवादी रूप में अपने को पेश करना कठिन बात थी. इसके लिए विवेकपूर्ण साहस चाहिए था. इसी से मेरा पथ तैयार हुआ. मेरी कविताओं ने किया हो या न किया हो यह मैं नहीं जानती, लेकिन इस हिम्मत ने दूसरों को हिम्मत दी कि वे अपनी इच्छाओं को सही ढंग से पहचान कर उसके बारे में कुछ कह सकें. मैं यह समझती हूँ कि मेरी कविताएँ  हाशिये को केन्द्र के करीब लेकर आने की ज़द्दोजहद में लगी रही हैं और कुछ नहीं तो हाशिये को ही केन्द्र बना लेंगी.

आपके गद्य और कविता में फेमिनिस्ट पोज़ीशन और टोनमें अन्तर है, ऐसा मुझे लगता है... गद्य में स्वर काफ़ी उग्र है, परिवर्तन की बेचैनी भी अधिक है... आपने पितृसत्तात्मक संरचनाओं को प्रश्नांकित किया है... वहाँ रेडिकल फेमिनिज्म प्रमुख है, जबकि कविता इससे थोड़ा हटकर है, वहाँ एक नयी स्त्री की तलाश है जिसे विचारधारा के बद्ध मुहावरों में नहीं पढ़ा जा सकता, आप इस पर क्या कहेंगी?
कविताओं और आलोचनात्मक लेखन में जो फ़र्क है वह इन विधाओं की अपनी पुकार है, और अर्थवत्ता है. उनमें थोड़ा फ़र्क हो सकता है, लेकिन मेरे दोनों किस्म के लेखन में बात एक ही है. गद्य में आप बहुत सारी चीज़ें कह सकते हैं कविता नफीस चीज़ है, कविता आप जिस चीज़ को जैसा जानते हैं वह उसके पार ले जाकर आपको छूती है, इसलिए कविताओं की संरचना या उसका टोन अलग है. चेतना के बहुत सारे स्तर ऐसे हैं जो हमारे भीतर होते हैं, लेकिन हम उन तक खुद आसानी से नहीं पहुँच पाते. मेरा अपना मानना है कि कविताएँ वहाँ बहुत हद तक दुबकी रहती हैं, इसलिए प्रयास कर हमें वहाँ जाना चाहिए. मैं समझती हूँ कि कविताओं में, अभिव्यक्ति में एक ख़ास तरह का परिवर्तन, संयम और एक वयस्कता होनी चाहिए लेकिन कविता हो या गद्य दोनों जगह उद्देश्य एक ही है कि हम जिस समाज में रहते हैं उसको बदलें, उसको ज़्यादा सच्चा और सह्य बनाएँ जिसमें सभी लोग न्यायपूर्ण ढंग से रह सकें. यह सुन्दर समाज बनाने की शुरूआती शर्त है.

स्त्री होना आपकी कविता को कैसे प्रभावित करता है ?
जैसा मैंने अभी कहा कि मेरे भीतर का स्त्री-आलोक मुझे दिशा देता है. इसका एक दूसरा पक्ष भी है, कविता और आपका द्वन्द्वात्मक सम्बन्ध. आप और कविता एक दूसरे को बनाते चलते हो. इस प्रक्रिया को मैं पहचानती हूँ. कविता के इस सच को मैंने अपनी कविताओं में परखा है और उसे ज़ाहिर भी किया है. कविता का जीवन’, ‘कहाँ लिए जा रही हो मुझे मेरी कविता’, ‘कृतज्ञ हूँ मेरी कविताआदि अनेक ऐसी कविताएँ हैं जिनमें यह प्रक्रिया देखी जा सकती है. यह प्रक्रिया बहुत जीवन्त हैमनुष्य के दूसरे स्वकी तरह ही, उससे बहुत मिलती-जुलती. मेरी उसके प्रति कृतज्ञता भी है, सवाल भी हैं और झगड़े भी. कविता के साथ मेरा बहुत ही घनिष्ट एवं आत्मीय सम्बन्ध है.

आप कहना चाहती हैं कि स्त्री होना ही कविता को प्रभावित नहीं करता, कविता भी स्त्रीत्व को प्रभावित करती है ?
निश्चित तौर पर यह एक द्वन्द्वात्मक सम्बन्ध है और दोनों एक-दूसरे को प्रफुल्लित-विकसित करते हैं. कविता स्त्री को मुक्त करेगी यह एक सशक्त धारणा है जो लगातार स्त्री को  में चिन्तनशील रखती है.
अभी तक आपके तीन काव्य संग्रह प्रकाशित हुए हैं, तीनों का केन्द्र स्त्री है पर दृष्टिबोध बदला हुआ है. आप इसे कैसे देखती हैं?
तीनों संग्रह में कवयित्री तो एक ही है आपने सही कहा, और वह एक स्त्री है जो धीरे-धीरे समाज में रहने, उसमें अपनी रिहाईश की शर्तों को पहचानने, उन्हें बदलने तथा उन्हें पूरी तरह से पितृसत्ता से मुक्त करने की कोशिश में जुटी हुई हैं. यह एक प्रक्रिया है- लगातार आगे बढ़ती हुई और पैनी होती हुई. ऐसे में कविता अपने साथ रूप-रंग, मकसद पहचानती, बदलती हुई अग्रसर है. इसी ढंग से उसमें बदलाव आते गए हैं. व्यक्तिगत स्तर पर उसे संकुचित नहीं किया मैंने. हमें ऐसी कविताएँ सिर्फ़ इसलिए नहीं लिखनी चाहिए, क्योंकि उनकी मान्यता है या उनकी पहचान बन गयी है. कविता को कोशिश करनी चाहिए कि उसकी जो पहचान स्थिर हो रही है और उसके स्थिर होने के कारण पितृसत्ता का प्रभाव फिर से उस पर स्थापित हो रहा है वह उसके पार जाए. उसके पार उतरने के लिए मेरी कविताएँ संघर्ष करती रही हैं. भाषा के स्तर पर तथा कथ्य के स्तर पर उसे लगातार संघर्ष करना है. जो बिम्ब हैं, जैसे रात, अँधेरा, प्रकाश, स्वप्न, नीला रंगइसमें और भी बहुत सारे रंग आते हैं या राग हैं, वे सब मेरी कविता में लगातार आवाजाही करते रहे हैं, क्योंकि मैं संगीत या चित्र-कला को कविता के लिए उतना ही महत्त्वपूर्ण मानती हूँ जितना शब्द को. रंग और शब्द जब आपस में मिलते हैं तब नयी चीज़ें पैदा करते हैं.
कविता की जो चुनौतियाँ हैं उनको आरम्भ में ही मैंने स्वीकार कर लिया था और इसलिए आप पाएँगी कि मेरे तीनों संग्रहों में कविता अपना रूप, अपना कथ्य, अपनी संरचना और अपना उद्देश्य काफ़ी हद तक बदलती चली गयी है. अपने जैसा जीवन में जो स्त्री कहती है कि मैं किसी की औरत नहीं हूँ या जो विलाप कर रही है, रोती है सुप्रिया, विमला की यात्रा ये सारी कविताएँ स्त्रियों के नाम लेकर लिखी गयी हैं, क्योंकि ये स्त्रियाँ हमारे आस-पास हैं जीवन में गूँथी हुई. आप उन्हें बहुत आसानी से पहचान सकती हैं. जब हम नींद थी और रात थी में आते हैं तब वहाँ भाषा के स्तर पर या संवेदना के स्तर पर उनकी बारीकियों में जाती हूँ. उसमें भाषा बहुत महीन हो गयी है, अभिव्यक्ति की अप्रत्यक्षता में लगभग समाई हुई, और स्वप्न समय में कविता का एक नैरेटिव आता है. स्वप्न, रात, जंगलइन सबका बहुत बड़ा एक कैनवस है. उन लोगों के नेरेटिवस हैं जिन्हें मैंने काफी देर तक अपनी कविताओं में रखने की कोशिश की है. जो हमारा पाठक है, वह भी उसका हिस्सा है. देखना था कि जो लोग आपको पढ़ते हैं, उनको कितनी देर तक आप अपने साथ रख सकती हैं और उनको प्रभावित कर सकती हैं. बहुत सारी चीज़ें थी, बहुत सारे उद्देश्य थे जो बदलते रहे हैं और एक उद्देश्य तो है ही कि कविता में हम उन्नत हों, फूल की तरह खिल सकें. आ.िखर, कविता की पूरी दुनिया ही तो कायनात है. उसमें बार-बार यह कायनात सम्भव होती है, बदल-बदलकर, बेहतर होकर. उसमें वह सभी जीव हैं जिन्हें हम जानते हैं, वे सभी जातियाँ जिनसे हम मिलते हैं, वे मनुष्य जिन्हें हम बेहतर बनाना चाहते हैं.

क्या यह आवश्यक है कि स्त्री-कविता की अपनी अलग पहचान हो?
यह सब सवाल इस बात से जुड़े हुए हैं कि स्त्री कविता है क्या? अगर किसी की मेटाफिजीकल प्रेजेंस है, उसकी उपस्थिति है तो हम कौन हैं जो कह दें कि यह उपस्थित नहीं है या इसकी पहचान नहीं होनी चाहिए. यह सारे सवाल लैंगिक राजनीति के बड़े सवाल से जुड़े हुए हैं. लेखन का कोई और रूप हो, चाहे कविता या पेंटिंग की दुनिया तो उसमें जो पहचान उभर कर आती है उसे स्वीकार करना होगा. अगर वह पहचान न स्वीकार करें तो कहीं न कहीं उसकी अपनी चेतना में कोई समस्या है क्योंकि इस दुनिया में हर चीज़ यदि मनुष्य के दृष्टिकोण से देखी जाए तो उसकी सारी ज़द्दोजहद पहचान के लिए ही होती है और उसी से अस्मिता तय होती है. अगर मैं स्त्री कवि हूँ और मैं मानती हूँ कि मेरी कविता स्त्रीत्व से जुड़ी है तो निश्चित तौर पर मैं चाहूँगी कि उन कविताओं को स्त्री कविता के रूप में पहचाना जाए. स्त्री सच हैमेरी ही एक कविता है, ‘नींद थी और रात थीमें. यहाँ सत्य का कविताकरण और राजनीतिकरण दोनों होता है.

स्त्री-कविता जैसा अभिधान क्या केवल पाश्चात्य सन्दर्भों से अनुप्रेरित है या भारतीय दृष्टि भी उसके निर्माण का आधार है?
यह सवाल एक तरह से प्रच्छन्न किस्म का है. बहुत से लोग स्त्रीवाद पर हमला करते हैं और कहते हैं कि वह पाश्चात्य से आया है या फिर अवतरित हुआ है. मैं भी मानती हूँ कि इसमें पाश्चात्य, से उदय होने के कारण एक दृष्टिकोण है, लेकिन हमें यह भी नज़रअन्दाज़ नहीं करना चाहिए कि अगर दुनिया में कहीं भी मनुष्य का कोई समूह (स्त्री तो छोड़ो) दुनिया को बदलने के लिए संघर्ष कर रहा है और उसका कोई परिणाम निकल रहा है तो हम क्यों उससे मुतासिर न हों, हम क्यों उसे स्वीकार न करें या उससे अपनी पहचान न जोड़ें? यहाँ पाश्चात्य का सवाल बीच में आ जाने से इसका सम्बन्ध औपनिवेशिक संस्कृति से जोड़ दिया जाता है, जिससे सांस्कृतिक दासता की ध्वनि आती है. यह सारी बातें हाइपर नेशनलिज्म या उग्र राष्ट्रवाद के सन्दर्भ से उभर कर आती हैं. बिना किसी धुँधलके के मैं यह कहना चाहती हूँ कि हमारा अपना जो राष्ट्रवाद है उसने हमारे लिए एक नये पितृसत्तात्मक समाज का निर्माण भी किया, क्योंकि इस राष्ट्रीय व्यवस्था में स्त्री और पुरुष बराबर नहीं हैं. पितृसतात्मक व्यवस्था उसमें गुँथी हुई है, इसलिए यह बहुत ज़रूरी है कि हम दुनिया की उन बहनों के साथ एक बहनापा स्थापित करें जिन्होंने विवेक के स्तर पर या जीवन के स्तर पर अपने यहाँ के पुरुषों से संघर्ष कर कुछ हासिल किया है.
1960 के आसपास अमरीका में जिस रेडिकल फेमिनिज्म की शुरुआत होती है या उससे भी पहले जब स्त्रीवादी चेतना उभरने लगी, मेरी वालस्टोनक्राफ्ट ने जब लिखना शुरू किया, (1870) या फिर सोशलिस्ट स्त्रीवादियों ने स्त्री श्रम की पड़ताल शुरू कीइनको भी हम अपने संघर्ष से जोडक़र देखते हैं. कम्युनिस्ट मूवमेंट में जो स्त्रियाँ रहीं उन सबका इतिहास हमारा इतिहास है. हमारे लिए इतिहास का अर्थ केवल राष्ट्र का इतिहास नहीं है, स्त्री संघर्ष का इतिहास है. हालाँकि यहाँ भी राष्ट्रीय आन्दोलन में स्त्रियों की बहुत बड़ी भूमिका रही है, लेकिन उसका प्रतिफल क्या हुआ? यह हमारे सामने है कि सरोजिनी नायडू, राजकुमारी अमृत कौर तथा अन्य स्त्रियाँ जो स्वतन्त्रता संघर्ष में शामिल थीं वे पुरुषवादी विवेक से प्रभावित रहीं. 

1932-33 में जब स्त्री के प्रतिनिधित्व का सवाल उठा तो उनके द्वारा रखे गए विचार असमंजस में डालने वाले लगते हैं. वे राष्ट्रवादी होने के कारण ही अपनी योजना एवं लक्ष्य में पुरुषवादी लगते हैं. स्त्री-प्रतिनिधित्व के विषय में इन्होंने कहा कि स्त्रियों को कोई आरक्षण नहीं चाहिए बस उनकी मनुष्यता को पहचाना जाए. कितना बड़ा अन्तर्विरोध है इस कथन में, क्योंकि एक तरफ़ यह कहा जा रहा है कि स्त्रियाँ बहुत सशक्त हैं, उन्हें विशेष दर्जा नहीं चाहिए, साथ ही उनकी, मनुष्यता को नहीं पहचाना जा रहा, इसका भी स्वीकार है. कहीं बहुत बड़ी फाँक है यहाँ. आप अपनी मनुष्यता की पहचान कराना चाहती हैं तो उसके लिए संघर्ष करने की ज़रूरत है. 1973-74 में जब टुवर्ड्स इक्वालिटी रिपोर्ट आई तो स्थिति साफ हो गयी. हिन्दुस्तान की औरतों की स्थिति कितनी ख़राब और दयनीय थी, चाहे उनकी शिक्षा का प्रश्न हो या स्वास्थ्य, सब जगह उनकी स्थिति मिट्टी के बराबर थी. उसके बाद ही यह चेतना आई कि इसे बदलने के लिए विशेष यत्न करने होंगे. उनके उत्थान के लिए सरकारी नीतियाँ गम्भीरता से बनाने की शुरुआत होती है.
(At Jamia Milia Islamia University. Seminar on Gender issues.)

बाबा साहेब अम्बेडकर इस पर पहले बात कर चुके थे और मैं उनके योगदान को महत्त्वपूर्ण मानती हूँ कि उन्होंने उन लोगों के लिए संविधान में विशेष प्रोविज़न किए जिन्हें दलित या अस्पृश्य माना गया था. स्त्री की स्थिति में सुधार लाने के लिए भी बाबा साहेब ने हिन्दू कोड बिल में परिवर्तन लाने की कोशिश की. कम से कम उन्होंने इस आवश्यकता को राजनीतिक स्तर पर पहचाना तो सही. मेरे कहने का मतलब है कि हम राष्ट्रवाद को आँख मूँद कर स्वीकार नहीं कर सकते. हमें राष्ट्रवाद के अँधेरों को भी देखना चाहिए. औरतों के लिए उसकी अपनी मुसीबतें हैं. हमें यह बहस नहीं करनी चाहिए कि हम इसको पाश्चात्य मानें या भारतीय? और अगर पाश्चात्य है भी तो हम जैसे पश्चिम के उपनिवेशवाद को स्वीकार नहीं करते, लेकिन उनके यहाँ जो प्रगतिशील आन्दोलन हुए हैं, उनको हम स्वीकार करते हैं. उसी तरह हमारे यहाँ जो राष्ट्रवादी चेतना है उसमें जो प्रगतिशील अवयव है, उसको हम स्वीकार करते हैं और जो प्रतिगामी हैं, जो हमें पीछे धकेलते हैं, पितृसत्ता के अधीन करते हैं; जो आपको परम्परा में व्याप्त प्रतिगामी मूल्यों की तरफ वापस धकेलता है उसको हम अस्वीकार करते हैं. उन्हें हम राष्ट्रवाद के नाम पर आत्मसात नहीं कर सकते.

आपकी दृष्टि में स्त्री कविता के मूल मुद्दे क्या हैं?
स्त्री कविता के मूल मुद्दे वही हैं जो दुनिया में आज तक स्त्रियों के मूल मुद्दे रहे हैं और जिन पर स्त्रियों ने लिखा भी है. मेरा यह मानना है कि स्त्री कविता तमाम सामाजिक संरचनाओं में जो असमानता व्याप्त है, चाहे वो स्त्री को लेकर हो चाहे दूसरे ऐसे समूहों को लेकर, उन सब के प्रति संघर्ष को जायज़ ठहरती है. वह संसार को हर तरह की कुरूपताओं से मुक्त करना चाहती है. वह पितृसत्ता की भयावहता से मनुष्य को निजात दिलाना चाहती है. इसके लिए वह सुन्दर की पहचान करना चाहता है, इसका बिम्ब के माध्यम से, कथ्य के माध्यम से एवं नैरेटिव के सहारे सृजन करती है. मैंने भी यह कोशिश की है कि जिन असमानताओं से हमारा समाज प्रभावित है उसके दर्द और अँधेरों को सामने लाऊँ. स्त्री-कविता भी लगातार इस चिन्ता में डूबी हुई है कि वह समाज को कैसे बदल सकती है. सामानान्तर स्तर पर ऐसी सभ्यता के विकास में सम्मिलित होऊँ जिसमें अन्तत: जो भी हमारी भिन्नताएँ हैं वह हमारे शोषण के लिए इस्तेमाल न होकर हमारी उन्नति के लिए हों, जिससे हम कह सकें कि एक सामूहिक, विनम्र, विश्व समुदाय बनाने में हमारी कविताओं का योगदान रहा है. हमरी कविताओं को पढ़ते हुए लोगों को लगे कि वे वयस्क स्त्री नागरिक की कविताएँ हैं. यह एक उपलब्धि होगी.

जैसा आपने कहा कि आपकी कविताओं को लोगों ने वयस्क स्त्री नागरिक की कविता के रूप में पढ़ा, लेकिन सामान्यत: परम्पराओं के अन्तर्विरोध तथा निजता व पितृसत्ता के विरोध का स्वर ही स्त्री साहित्य में ज्यादा जगह घेरता है. ये मुद्दे ही प्राथमिक हो जाते हैं और बाक़ी मुद्दे छूट जाते हैं या पीछे रह जाते हैं. 

निश्चित तौर पर मेरी कविताएँ पितृसत्ता से लड़ती हैं, क्योंकि पितृसत्ता ने ही स्त्री को वह स्त्री बनाया जो हम आज हैं. हमारी लैंगिकता को संकुचित कर हमारे स्त्रीत्व को परिभाषित किया जिसकी वजह से हम यह महसूस करते हैं कि हम शक्तिहीन हैं. हिन्दी में इस दौर की स्त्री कविता जिस तरह पितृसत्ता से संघर्ष कर रही है, या जिस तरह उसके विरुद्ध संघर्षरत है, यह उसकी कोई बड़ी खामी या दोष नहीं है बल्कि यह उसका प्रस्थान बिन्दु है. इस कविता को इससे बहुत आगे जाना है. मैं अपनी कविताओं में भी यह कोशिश करती हूँ. मेरे तीसरे काव्य संग्रह स्वप्न समय में कुछ लम्बी कविताएँ हैं जिनमें सभ्यता के बदलते विमर्शों, केन्द्र्र में आती स्त्री कविता का बखान मिलेगा. यह एक पूरी यात्रा है जो भाषा, ज्ञान व चेतना, सभी को लेकर आगे बढ़ती है. मेरा यह मानना है कि अगर आज अधिकांश कवयित्रियाँ पितृसत्ता पर प्रहार कर रही हैं तो यह इसलिए कि यह कविता अभी अपने प्रारम्भिक दौर में है. आगे चलकर उनकी कविताओं का विकास सम्भवत: उधर ही होगा जिधर मेरी कविताएँ अब मुझे ले जा रही हैंएक संयमित सोच की तरफ़ कि हम एक सुन्दर जीवन को कैसे जी सके.

आपकी कविताओं का ग्राफ एक नयी दिशा की ओर इशारा करता है, क्या आप उस दिशा को पहचानती हैं. आपके मन में कोई साफ़ तस्वीर है?
साफ़ तस्वीर नहीं कह सकते, लेकिन एक धुँधली-सी छवि तो उसकी है. इसीलिए वह रहस्यमयी दिखती है क्योंकि उसे साफ़ - साफ़ बता नहीं पातेअभी. मेरा अपना ख्याल है कि स्वप्न समयकी जो अन्तिम कविता है नीला विस्तारउसमें यह बात है...
बस कुछ और दूर चलकर
छूट जायगा हमारा साथ मेरी कविता
तुम्हें जाना होगा वहाँ
जहाँ समुद्र लहरा रहा होगा
जहाँ स्वप्न जाग रहे होंगे
जहाँ एक स्त्री लाँघ रही होगी एक अलंघ्य प्यास

वहाँ पहुँचकर मुड़ना होगा मेरी तरफ़ तुम्हें
कम से कम एक बार
बताना होगा क्या स्वप्न और स्त्री एक ही हैं
रात के दो फूल
दो दीप अन्धकार के
जिनके जलने से तारे रोशनी पाते हैं
आकाश सजता है जिनसे हर रात
बताना क्या रिश्ता है उनका आपस में
क्या स्त्री सचमुच रात है
जैसा मैं जानती हूँ
या रात में स्वप्न है वह

एक नीला विस्तार
अज्ञात है जिसका ज़्यादातर हिस्सा

तो जो आपने सवाल किया है उसकी इसमें काफ़ी सारी बातें हैं. अभी जो स्त्री विमर्श है पश्चिम में, ख़ासकर फ्रांस में, उसमें स्त्रियाँ कह रही हैं कि समाज में वह जगह स्त्रियों को प्राप्त नहीं हो पायी, स्त्रियाँ वो जगह नहीं बना पाईं हैं जो उनके अवचेतन में है और इसके लिए इतिहास में जाने के बजाए उन्हें अपने सब कांशियस और अनकांशियस को तलाशना है. मनोवैज्ञानिक सिद्धान्त में स्त्री चिन्तकों ने अपनी चिन्ताएँ भी जोड़ दी हैं. यह सिद्धान्त कहता है कि वे तमाम पहचाना अपहचाना दमन कहीं जाता नहीं, वह हमारे सबकांशियस में जाकर बैठ जाता है. इसमें आपकी पीड़ा, अपमान, आपके साथ जो हिंसा हुई या जो हिंसा स्वयं आपने अपने ऊपर की, ये तमाम दुखदायी पीड़ाएँ और इनसे मुक्ति का रास्ता भी हमें हमारे सबकांशियस में मिल सकता है. मैं यह मानती हूँ कि कविता में कांशियस, अनकांशियस और सबकांशिय सब में आवाजाही आसानी से हो सकती है, क्योंकि हम यहाँ पर यथार्थ, अतियथार्थ और उसकी और भी जो अन्य परतें हैं उन सबसे एक साथ जुड़ते हैं और अपनी अपंगतता (दिफोर्मिटी)को पहचानने लगते हैं, तब उसका चित्रण अप्रत्यक्ष सत्ता की तर.फ जाता है, क्योंकि पहचान का यह रास्ता दुरूह और मुश्किल है. कविता तब निश्चित तौर पर प्रत्यक्ष किस्म का चित्र नहीं खींचती. उसको उस हद तक रहस्यमयी होना ही होगा, लेकिन ऐसा रहस्य जिसमें जाकर हम अपनी ठोस स्थिति को देख सके. यह एक तरह की सामाजिक-मानसिक यात्रा है, जब आप सबकांशियस स्तर पर जाकर उन चीज़ों को नये सिरे से पहचान सकें जो दरअसल आपके यथार्थ में हैं.

जैसे आप कह रही हैं कि कविता में वह गुंजाइश बनती है कि आप चेतन अवचेतन के बीच इस तरह की आवाजाही कर सके, लेकिन आप इसको कैसे साधती रहीं?
यह एक बौद्धिक प्रक्रिया के समान है, लेकिन यह भाषिक भी है. आप जब जूलिया क्रिस्टेवा को पढ़ेंगी तो पाएँगी कि लगातार वह एक समानान्तर यात्रा करती रहती हैं भाषा में जहाँ यथार्थ शब्दबद्ध है. एक तो हमारा ठोस यथार्थ है और एक वह जो इस यथार्थ को समझने में मदद करता है. हमारे पास यथार्थ को समझने की कुछ हिकमतें ऐसी हैं जो हमें विचार देती हैं, लेकिन कुछ ऐसी हैं जो उपलब्ध नहीं हैं. जैसे एक स्थिति यह हो सकती है कि एक कविता है जो आपके दर्द के बारे में है और उसे अभिव्यक्त करती है और एक कविता है जो उस दर्द को समझने के लिए आपके स्व को अभिव्यक्त करती है. जिसे आप महसूस कर रही हैं उसे आपका दूसरा सेल्फ अलग से देखता है और उसके लिए एक अलग मेटा लैंग्वेज चाहिए, वह एक मेटा रियलिटी है यानी एक यथार्थ पर दूसरा यथार्थ प्रत्क्षेपण के ज़रिए अवस्थित है. कविता एक ख़ास किस्म का अतिक्रमण कर सकती है. आपके विचारों का अतिक्रमण, आपकी समझ का अतिक्रमण. इसीलिए मैं बार-बार कविता में जाती हूँ. वह इतनी आसानी से आपको हासिल नहीं है जैसे मेरी कविता में सपनों का बहुत जि़क्र है लेकिन आप यह तय नहीं करते कि आप क्या सपना देखेंगी. बहुत सारे कवियों के यहाँ आप पाएँगी कि सपनों का जि़क्र आता है और यथार्थ का भी जि़क्र है जैसे किसी चीज़ को देखते-देखते आप कुछ और देखने लगती हैं. आपके दूसरे अनुभव जागृत हो जाते हैं. चित्रकारों के साथ भी यह बहुत हुआ है खासकर फ्रैंच चित्रकारों के यहाँ अगर आप देखेंगी तो लैंड स्कैप पेंट करते-करते वे अति यथार्थवादी हो जाते हैं. ऐसी चीज़ों को भी पेंट कर देते हैं जो उस लैंड स्केप में नहीं हैं. मेरा ख्याल है कि कविता भी यह सब काम करती है, जो थोड़ी रहस्यमयी-सी लगती है लेकिन मैं यथार्थ को कभी नहीं छोड़ती वह हमेशा मेरे विश्लेषण का हिस्सा बना रहता है. वही ज़मीन है जिस पर मैं खड़ी रहती हूँ. अपने को इधर-उधर फेंकती हुई, देखती हूँ, विस्तारित करती हूँ.

स्त्री की बात करते ही इतिहास, परम्परा और मिथक के कई पन्ने एक-साथ खुल जाते हैं यानी स्त्री-अनुभव बहुत ही पेचीदा और संश्लिष्ट होता है. कविता में इसे साधना कितना श्रम साध्य है?
श्रम साध्य से ज़्यादा एक विशेष प्रकार की सजगता चाहिए. आपको सोचने-समझने के कई संकेत मिलते रहते हैं. और आपका दिमाग सोचता है कि ऐसा क्यों हुआ, परन्तु उसके बाद उसे छोड़ देता है. एक कवि जो कविता को साध रहा है या साध रही है वह उन संकेतों को एक चौकन्नेपन से स्वीकार कर उस पर विचार करने लगती है. आपमें इतनी संवेदनशीलता हो कि वे चीज़ें जो एक बिम्ब, विचार और एक झलक दिखलाकर चली गयी हैं, आपसे छूटें नहीं. आपको बहुत सारे लोगों ने कहा होगा कि कविता आ जाती है और अगर उस वक्त आपने उसे नहीं लिखा, तो वह चली जाती है, आप दोबारा उसको पकड़ नहीं सकते. मेरे साथ भी कई बार ऐसा हुआ है. मैं उन कविताओं को दोबारा नहीं लिख पाई, इसका मुझे बेहद अफसोस रहता है. वह कैसे आती हैं, जैसे सुबह जागते-जागते कुछ पंक्तिआ जाती है. क्यूँ आई इसका तो पता प्रत्यक्षत: नहीं है, लेकिन वह आती है. अगर आपको एक पंक्ति भी आ गयी है तो पूरी कविता आ गयी. आप सजगता से उसे बना सकते हैं, श्रम से ज्यादा आपको हर वक्त प्रतीक्षारत रहना होता है कविता को पाने के लिए. आपको एक प्रक्रिया में रहना होता है. कवि का जीवन कविता का ही जीवन होता है. उसके सुख-दु:ख, हताशाएँ-निराशाएँ, सुख-आह्लाद सब एक साथ उसे जीना होता है. जो कुछ भी आश्चर्यजनक है, विस्मयकारी है, जो आपको एकदम आउट ऑ.फदिस वल्र्ड लगता है. अविस्मरणीय वह सब गम्भीर रूप से स्वीकारने की चीज़ें होनी चाहिए. मेरे जीवन में बहुत सारी कविताएँ इस तरह से ही आई हैं. बहुत विस्मयकारी ढंग से. विस्मयकारी अनुभवों को भी मैंने अपने गले से लगाया, अपनी भाषा में उन्हें ले आई, अपने शब्दों के साथ उनको बैठाया और एक रूप दिया. अनुभव के कई-कई क्षेत्र हैं, कई-कई परतें हैं जहाँ से विचार और कल्पना सब आते हैं, इतिहास, मिथक परम्परा, सभी स्रोतों से विचार हवा की तरह आते हैं, लेकिन हम उन्हें अपने वर्तमान में तभी अपना पाते हैं जब समय को उनहें दोबारा गढऩे की आज़ादी देते हैं. इसमें संघर्ष लगता है, आपनी चिन्ताएँ सामाजिक और वैश्विक एक साथ होनी चाहिए.

क्या आपको कभी लगा कि स्त्री विमर्श कविता की सम्भावनाएँ तलाशने की अपेक्षा उसके लिए एक सीमा बन गया, क्योंकि यह जिस तरह कविता को एक विशेष दृष्टिबोध से देखने का आग्रह करता है उससे कविता के अन्य पक्ष चर्चा के केन्द्र में आ ही नहीं पाते?
मैं विमर्श को पुन: परिभाषित करना चाहूँगी, क्योंकि स्त्री विमर्श किसी यथार्थ को संकुचित करने के लिए नहीं है. स्त्री विमर्श है ही इसीलिए कि वह जीवन की तमाम परतों को खोल सके और स्त्री विमर्श के भीतर जो कविताएँ लिखी जा रही हैं, मैं नहीं मानती कि वे सीमित हैं, क्योंकि विमर्श एक जगह स्थिर होकर नहीं रहता. विमर्श के इतिहास की अपनी यात्रा है. अगर स्त्री विमर्श की बात करें तो यह विमर्श वह नहीं है जहाँ 1960 में था. आज हम स्त्री विमर्श के तीसरे दौर से भी आगे निकल चुके  हैं बल्कि, विमर्श के इस फेज़ में या पड़ाव पर हैं जहाँ स्त्रियाँ लगातार पुरानी बातों को निरस्त कर रही हैं, उसमें नया जोड़ रही है, बिल्कुल नया यथार्थ भी हासिल कर रही हैं. वो ख़ुद अपनी ज़मीन तलाश कर उसे उर्वर बनाकर, उसमें जो भी फसल उगानी थी, उगाकर, काटकर उस जगह आ गयी हैं जहाँ पर वे दार्शनिक स्तर पर मानुष के मनुष्यत्व को पहचान रही हैं. स्त्री विमर्श विकास की ओर अग्रसर है और ऐसे मुकाम पर पहुँचा हुआ है जहाँ चाहे कला हो, साहित्य या अलग से स्त्रियों पर कविता, उसे संकुचित करने के बजाए उसके लिए नयी ज़मीन तैयार कर रहा है. अब आप पर है कि आप स्त्री विमर्श को कैसे समझती हैं. आप किस स्तर पर उससे जुड़ी हैं. आप स्त्री विमर्श के पहले चरण में, दूसरे या फिर तीसरे उससे आगे के विमर्शों में हैं या फिर उससे भी आगे बिल्कुल अलग. मेरा मानना है कि आजकल ज्यादा पढ़ी-लिखी महिलाएँ जो एब्सट्रेक्ट विचारों के खित्ते में काम कर रही हैं सब तीसरे चरण में हैं, क्योंकि वे अपने आत्म-संघर्ष से यहाँ तक पहुँची हैं. किसी ने उनको पहुँचाया नहीं है. उन्होंने स्वयं देखा, जाँचा-परखा, सबको पढ़ा है. बहुत सी स्त्री सिद्धान्तकार हैं जिन्होंने मार्क्स के बाद फ्रायड, उसके बाद बल्कि फूको को महत्त्वपूर्ण माना है और उनसे प्रेरित हुईं. बहुत सारी स्त्रियाँ हैं जिन्होंने लकां के काम को बहुत महत्वपूर्ण माना है. फ्रायड की उन्होंने लकां के ज़रिए कठोर आलोचना की. वे पुरुष के ज़रिए पुरुष को रिप्लेस कर रही हैं, विस्थापित कर रही हैं.
(friends and comrades joined the protest
against rape and violence against women in India,
IGNOU campus, Maidan Garhi, New Delhi on first January 2013.)

आजकल मैं फ्रेंच फेमिनिज्म से बहुत मुतासिर हूँ. उनके काम में जूलिया क्रिस्टोवा हों या हेलेन सिक्सू, इन लोगों के काम में आपको वो उन्नति दिखती है जिसको आप संकुचित अर्थ में स्त्री विमर्श नहीं कह सकती. वह एक सभ्यता विमर्श है जिसमें स्त्रियाँ अपना विकास कर चुकी हैं और इतने प्रगतिशील ढंग से सोच रही हैं जैसा पुरुषों ने भी नहीं सोचा होगा. इनका जो नया इलाका है उसमें अपने दायरे से बाहर निकलकर सोचने समझने की कोशिश हो रही है. यह संघर्ष बहुत बड़ा है. यह कभी भी कविता या किसी अन्य चीज़ को संकुचित कर ही नहीं सकता. यहाँ एक नया सिम्बोलिक ऑर्डर यानी व्यवस्था बनाने का अथक प्रयास चल रहा हैजिसमें अर्थव्यवस्था का भी रूपान्तरण हो जाना चाहिए.

आपकी शिक्षा और शिक्षण का दायरा राजनीति और जेंडर से जुड़ा हुआ है. आपकी सोच को दिशा देने में उसकी क्या भूमिका रही ?
बहुत हद तक इन विषयों ने दिशा दी है क्योंकि उससे आपको एक ख़ास किस्म की विशेषता मिलती है और चौकन्नापन भी. आपकी चेतना एक सामूहिक चेतना का हिस्सा बन जाती है, लेकिन जब आप रचना करने चलते हैं तो उस सामूहिक ज्ञान का इस्तेमाल करते हुए भी आपको उससे आगे की स्थितियों का अनुसन्धान करना पड़ता है. कविता में भाषा का, भाषा में गद्य का, चित्रकला में रंग का, संगीत में ध्वनि का, वगैरह वगैरह क्योंकि बिना राग को जाने हुए संगीतकार कोई नया राग नहीं बना सकता. 

राजनीति आधुनिक चिन्तन की उपज भी है और उसकी सबसे बड़ी कसौटी भी. समकालीन स्त्री-अनुभव में वह शामिल है लेकिन स्त्री-कविता में उसे कितना स्पेस मिला है?
विश्व स्तर पर जो स्त्री कविता है उसमें लगातार उन्नति होती रही है. सिल्विया प्लाथ पर मैंने कविता लिखी हैं. इसी तरह की बहुत सारी कवयित्रियाँ हैं जिन्हें पढक़र मैं चकित होती रहती हूँ. हमारी अपनी हिन्दी में मेरा यह मानना है कि स्त्री-कविता तेज़ी से विकसित हो रही है और हिन्दी साहित्य को समृद्ध कर रही है. मैं ऐसा नहीं मानती कि वह केवल किसी विमर्श के दायरे में बँधी हुई है. विमर्श में उसकी हिस्सेदारी है और उससे वह लाभान्वित भी हो रही है, लेकिन कविता कभी स्त्री विमर्श का हिस्सा बनकर अपने को प्राप्त नहीं कर सकती. उसे अपनी विशिष्ट विकासशील यात्रा करनी होगी. उसे समाज, देश और सभ्यताओं को विकसित करना होगा. वह नये-नये विमर्श बनाएगी-चिन्तन का दायरा, फलक विस्तार पाएगा यह हमारी सामाजिक आर्थिक मनोवैज्ञानिक यथास्थितियों को बदल कर ही रुकेगा. राजनीति की समझ भी इससे बदलेगी. स्त्री एक नागरिक है, सिर्फ़ पत्नी या दोस्त नहीं यह तभी हो सकेगा जब उसे एक स्वतन्त्र व्यक्ति के रूप में मान्यता मिलेगी. कविता लिखना उसी दिशा में एक उपक्रम है.

अभी जैसे आपने कहा कि कवि को सजग रहना है तो आपकी कविता में सजगता तो दिखाई पड़ती है. आपके यहाँ भावना की गहराई भी है और विचार की ऊर्जा भी लेकिन सबसे महत्त्वपूर्ण है आपकी भाषा एक-एक शब्द जैसे साभिप्राय प्रयुक्त होता है और वाक्य में शब्द का स्थान एक विस्तृत रूपक रच देता है. यह काव्य-साधना, शब्द-साधना स्वयं-सिद्धा है या कठिन अभ्यास से अर्जित हुई है? अपनी काव्य-प्रेरणा और रचना-प्रक्रिया के विषय में कुछ बताइये?
रेखा, यह सबसे महत्त्वपूर्ण और सबसे बड़ा सवाल है. बहुत सारे लोग अपनी रचना प्रक्रिया के बारे में बताते हैं. मानिए पीला रंग, जब एक पेंटर पीले रंग को कैनवस पर ले आता है, या आती है तो अनुभव और संवेदना के स्तर पर वो एक ख़ास किस्म का पीला रंग होता है, उस चित्रकार का पीला रंग. उससे वह जुड़ी हुई होती है. पीला रंग कोई एक रंग नहीं है, उसमें न जाने कितने रंग है इसीलिए जब मैं नीले रंग के बारे में बात करती हूँ तो मैं बताती हूँ कि नीला कोई एक रंग नहीं है. रात का रंग सिर्फ़ काला नहीं होता. काला भी कोई एक रंग नहीं. यानी सब हमारे देखने की दृष्टि से संचालित एवं आबद्ध है. यथार्थ में जो अनुस्यूत भिन्नताएँ होती हैं उसे हमारी संवेदनात्मक दृष्टि कैसे देखती है यह सब उसी पर निर्भर है. उससे हमारा और हमारे शब्दों का क्या सम्बन्ध है? जब हम शब्दों का चयन करते हैं तो हमारा आन्तरिक अनुभव उसी समय विस्तृत हो जाता है. 
(One day seminar on Savita Singh's poetry)

यह लगातार चलनेवाली एक प्रक्रिया है. हमें कोशिश करनी पड़ती है कि उस समय जो महसूस किया जा रहा है उसे अभिव्यक्त कैसे करना है. कविता में अनुभव के आधार पर भी शब्दों का चुनाव किया जाता है. वे शब्द इतने सटीक होने चाहिए कि पाठक को भी यह भ्रम होने लगे  कि यह उसके अनुभव का हिस्सा है. कविता एकदम आपके भीतर तभी उतरती है और जब उसमें बहुत सारी और चीज़ें दिखने लगती हैं. कभी-कभी एक परत पर आप टिककर कुछ कह रहे होते हैं और पाठक के मन में दूसरी, तीसरी, चौथी कोई और परत खुल जाती है. इस तरह कविता की प्रक्रिया सि.र्फ व्यक्तिगत प्रक्रिया नहीं है जो आपके भीतर चल रही है. आपके पाठक, आपका समाज, आपकी भाषा का इतिहास सब एक-साथ काम कर रहे होते हैं. बहुत सारी चीज़ों को तो वह कहती भी नहीं है केवल इंगित करके छोड़ देती है. बाकी सब तो बाकी लोग कहते हैं और यही कविता की शक्ति भी हैं कि वह दूसरों को भी बोलने के लिए प्रेरित करे, दूसरों की अभिव्यक्ति में उन्हें अभिव्यक्त कर दे. कविता सामूहिक मुक्ति का संघर्षरत स्वप्न है जिसमें सभी लोग बेझिझक शामिल रहते हैहो सकते हैं. यहाँ लैंगिकता की राजनीति और भी उत्कृष्ट ढंग से चलती रहती हैलगातार हम अपनी संकीर्णताओं को चीरते हुए व्यापक जीवन की तर.फ बढ़ते हैं. स्त्री में यह विशेषता हैवह सर्जक है और इस अर्थ में समावेशी भी.

समकालीन कविता की परम्परा में, अपने युग के अन्य कवियों की तुलना में स्त्री रचनाकारों की कविता का मूल्यांकन आप कैसे करेंगी?
मैं जब अन्य कवियों को पढ़ती हूँ तो मेरे सामने कई चित्र अपने बिम्बों के ज़रिए उभरने लगते हैंकई आईने आने लगते हैं जिनमें मैं अपना चेहरा और अपनी स्थिति देखती हूँ. मेरे लिए यह बहुत ही अन्तरंग अनुभव होता है. जैसे जब आप महादेवी को पढ़ते हैं तो शुरू में उनकी आलोचना इस तरह हुई कि उनके यहाँ संघर्ष से ज्यादा व्यक्तिगत सन्ताप है, लेकिन उस सन्ताप-विलाप का स्वर इतना करूण है कि वह स्त्री को ज़्यादा छूता है या पुरुष को यह भी समझने की बात है. किसी भी कविता का पाठ एक राजनीतिक मसला भी है. आप स्त्री कवि को कहाँ से पढ़ रहे हैं, उससे यह बात सा.फ हो जाती है कि आपका पाठ कैसा होगा. मैं जब स्त्री कवि को पढती हूँ, गगन गिल पर मैंने इधर लिखा भी है, उसमें से मुझे एक ऐसी गूँजती हुई आवाज़ आती है जो अपनी ही छूटी हुई आवाज़ लगती है. मेरा ख्याल है कि स्त्री कविता चाहे वो जिस दौर में लिखी गयी हो, मीरा की कविता हो या अक्क महादेवी की, उन सबको पढ़ते हुए लगता है कि यह मेरी अपनी ही कविताएँ हैं, मेरी छूटी हुई आवाज़ जिसे सहज ही अपना लेने को जी चाहता है.

समकालीन कविता से मेरा आशय कविता की उस धारा से था जिसमें स्त्री और पुरुष दोनों हैं और उसमें यदि हम स्त्री-कविता को अलग से न देखना चाहें तो उसमें उसे कैसे प्लेस करेंगे?
निर्भर करता है कि यह कौन कर रहा है. यह राजनीति है रेखा, कौन उस कविता को पढ़ रहा, कौन किसको आगे बढ़ा रहा है, कौन किसको पीछे धकेल रहा है, इसको समझना ही पड़ेगा. कविता आपके सच की आवाज़ है, जब आप ऐसी किसी विधा में लिख रही होती हैं तो यह आवश्यक है कि आपके अन्दर एक स्वच्छता हो, सच्चाई हो उसकी आभा हो कम से कम उसे पढ़ते हुए और परिभाषित करते हुए भी हमें चाहिए कि कविता इसके अपने इतिहास और भूमिका के सन्दर्भ में पढ़ें, लेकिन ऐसा नहीं हो रहा. यही चिन्ता का विषय है. जो लोग इस समय सक्रिय हैं यह उन लोगों की कमी है कि वे उन चीज़ों पर बात नहीं कर रहे. कोई एक अच्छी स्त्री कविता किसी भी पुरुष को पसन्द आनी चाहिए और कोई अच्छी कविता जो किसी पुरुष द्वारा लिखी गयी है वह स्त्रियों को पसन्द आनी चाहिए, इसमें कोई मुश्किल नहीं है, लेकिन उसका समय पर बहस और विश्लेषण भी होना चाहिए. पंकज सिंह की स्त्री पर लिखी कविताएँ किसे पसन्द नहीं आएँगी या फिर विष्णु नागर की माँ पर लिखी कविता बेमिसाल लगती है. कुमार अम्बुज की बहनों पर लिखी कविता भी एक ऐसा ही उदाहरण है. मंगलेश जी के यहाँ भी माँ पर एक कविता है जो ज़ेहन में रहती है. असद ज़ैदी की अधिकतर कविताओं की मैं अच्छी पाठिका हूँ. विजय कुमार की एक कविता मार खाई हुई औरतया फिर लीलाधर मंडलोई की माँ पर कविताएँ इतनी करुणा हैं कि आप यहाँ ज्यादा फ़र्क नहीं कर सकते, स्त्री-पुरुष भावना में. हमारे सीनियर पुरुष कवियों की कविताएँ अपनी विलक्षणता में हम सबको भाती हैं, कुँवर हों, केदार जी, अशोक वाजपेयी या फिर विनोदकुमार शुक्ल और प्रभात त्रिपाठी या फिर विष्णु खरे. वैसे ही अनीता वर्मा, निर्मला गर्ग, कात्यायनी, नीलेश, सविता भार्गव, विपिन चौधरीसबके यहाँ सामान्य सामाजिक चेतना पर लिखी कविताएँ पुरुष कवियों को खूब भाती हैं. यहाँ स्त्री विमर्श की तलाश वे नहीं करते, लेकिन जहाँ स्त्रियों का संसार अपनी स्व-चेतना में कविताओं में खुलता है, उसकी चमक ही विशेष होती है.

क्या आपको लगता है कि हिन्दी आलोचना ने स्त्री-रचनाकारों को साहित्य की मुख्यधारा में उचित स्थान नहीं दिया?
निश्चित तौर पर उचित स्थान नहीं मिला, उसकी आलोचनात्मक प्रवृत्ति नहीं है जिससे उसे समझें. आलोचना बातचीत के लिए एक आधार देती है जिस पर आप सभी सहमत हो सकते हैं कि यह कविता यह कह रही है. अगर आप अभी समकालीन स्त्रियों को पढ़ें तो लगेगा कि उसमें एक स्वर है जो उनका है, क्योंकि वो उनके अनुभवों से आ रहा है और वे अनुभव सार्वभौमिक भी हैं क्योंकि स्त्री कहीं भी हो किसी भी वर्ग की, किसी भी धर्म की, उसे पितृसत्ता दमित करती है. इसलिए स्त्रियों का अनुभव एक स्तर पर एक किस्म का अनुभव होता है. लेकिन उसके बाद उसमें बहुत सी भिन्नताएँ भी हैं. अगर यह सत्य कोई मिस कर जाए तो कविता समझने में दिक्कत होगी. यदि किसी स्त्री कवि को यह कहा जाए कि उसकी कविता तो पुरुषों की तरह है या सामान्य साहित्य की तरह तो इस बात को शाबाशी की तरह थोड़े ही लेना चाहिए. इसको इस तरह से लेना चाहिए कि कहीं आलोचना ने अपना काम नहीं किया और आपको वह भाषा और वह समझ नहीं दी जिससे आप पहला कदम या दूसरा कदम पार कर सकें और दूसरे स्तर पर जाकर बहस करें. मेरा अपना मानना है कि स्त्रियों की कविताओं की बहुत ज्यादा चिन्ता इस आलोचना में नहीं रही है, लेकिन मैं यह भी मानती हूँ की अब जो आलोचना हो रही है उसमें यह चिन्ता भी है, संवेदना भी और समझने की कोशिश भी. इसलिए निराश होने की कोई ज़रूरत नहीं है. 

आपने साहित्य आलोचना के क्षेत्र में भी सक्रिय हस्तक्षेप किया है और कुछ रचनाओं का स्त्री-पाठ कर उसे एक नये जेंडर लेंस से देखने की कोशिश की है? क्या इस तरह के पाठ आलोचना के नये प्रतिमान बन पाएँगे?
इधर मैंने एक बहुत छोटी कोशिश की है और उसकी सराहना हुई है जिससे पता चलता है कि ऐसी आलोचना की कमी है हिन्दी में. मैंने जो कोशिश की, जो आलोचनात्मक टिप्पणियाँ अब तक स्त्री कवियों पर की गयी हैं उनसे अलग कुछ देखूँ, जैसे नीलेश की ज़्यादातर कविताओं को जो प्रशंसा मिली वह उसके वर्ग विश्लेषण के कारण. नीलेश एक ख़ास वर्ग से आती हैं और उस अनुभव को उन्होंने कविता में पिरोया, लेकिन मैंने उनकी कविताओं में उस स्वर को ढूँढ़ा जिसे स्त्री स्वर कह सकते हैं. अगर आप उन्हें पढऩा चाहते हैं तो उनकी स्त्री को आप अनुपस्थित नहीं कर सकते. इसी तरह गगन गिल के बारे में मैंने लगातार देखा कि लोग उनकी आलोचना करते हैं कि वे अँधेरे में चली गयी. बुद्ध की ओर चली गयी हैं और यथार्थवादी जीवन से उनका सम्बन्धविच्छेद-सा हो गया है. लेकिन जब मैं उन्हें पढ़ती हूँ या उनका पाठ करती हूँ तो पाती हूँ कि वे कहीं नहीं गयी हैं. अपने ही स्पेस में हैं. एक स्त्री के स्पेस में. उनका जीवन जो उनकी वेदना का स्रोत है वो उनके स्त्री होने को लेकर ही है. सन्तान न होने का भयानक दु:ख उनके भीतर है और उनकी कविताओं में भी अभिव्यक्त होता है. कोई भी स्त्री उस स्वर को समझ सकती है और उसके बाद वे देखतीं हैं कि इस दु:ख से निजात पाने के लिए उन्हें एक दूसरी कॉस्मोलोजी का ही सृजन करना होगा. उस तलाश में वे बुद्ध के पास जाती हैं क्योंकि उन्हें लगता है कि दुख को पहचानने की एक दार्शनिक दृष्टि यहाँ है. इसलिए यह पाठ बहुत अलग है. आप इस विषय को बिना समझे उनकी आलोचना करके उनको खारिज करते रहिए तो आप उनकी कविताओं को नहीं पढ़ सकेंगे. आप उन कविताओं को भी खारिज कर देंगे जो महत्त्वपूर्ण कविताएँ हैं. स्त्री चेतना के लिए यह उसकी अपनी दिशा है. उसे समझने के लिए आपको इस तरह के पाठ से मदद मिलेगी.

कविता या साहित्य को जेंडर लेंस से देखने के क्या लाभ हैं और उसकी क्या सीमाएँ हैं ?
लाभ यह है कि आप सत्य के थोड़ा करीब होंगे और आपकी समझ आपके पाठ को अन्तर्दृष्टि से सम्पन्न करेगी. उसकी सीमा यह इसलिए नहीं बन सकता क्योंकि यह उसको स्त्री विमर्श में कैद करने के लिए नहीं किया गया, किया गया है पाठ को खोलने के लिए. इसको एम्पेथेटिक रीडिंग या सहानुभूतिपरक पाठ कहते हैं जो मैंने किया है. स्त्रियाँ ज्यादा आसानी से ऐसा पाठ कर सकती हैं (पुरुष भी चाहें तो ऐसा पाठ कर सकते हैं लेकिन इसके लिए उन्हें अपने को थोड़ा बदलना पड़ेगा) मैं यह मानती हूँ कि यह पाठ मैंने यह स्थापित करने के लिए किया कि स्त्रियों द्वारा लिखी गयी कविताओं का पाठ थोड़े अलग ढंग से होना चाहिए, क्योंकि जिस चेतना की वे उपज हैं उसमें उसका स्त्री होना केन्द्र में है. अगर आप इसको नदारद कर देंगे तो आप उसके आसपास तो पहुँच सकते हैं, लेकिन बहुत करीब नहीं जा सकते और पाठ को खोलना बहुत ज़रूरी है. .खासकर आज आलोचना की जो स्थिति है वह स्त्रीवादी नहीं है उसमें स्त्री के प्रति वह संवेदना नहीं है. मेरा .खयाल है कि जब इस तरह के कुछ और पाठ होंगे तो पाठ करने का जो यह ढंग है वह हिन्दी आलोचना में ज़रूरी तौर पर शामिल हो जाएगा और इस अर्थ में यह हो सकता है कि यह प्रतिमान बने.  लेकिन उसकी मुझे ज्यादा चिन्ता नहीं है. मुझे केवल इस बात में रूचि है कि जब हम इन कविताओं को पढ़ते हैं तो उन्हें थोड़ा करीब जाकर पढ़ सकें.

स्त्री कविता की सबसे बड़ी उपलब्धि क्या हो सकती है? क्या हमारा समाज जेंडर सेंसेटिवहोने की जगह कभी जेंडर न्यूट्रलहो सकेगा यानी आप स्त्री हैं या पुरुष इससे कोई अन्तर न आये और आपकी पहचान व्यक्ति रूप में हो?
पहला कदम तो हमारा होना चाहिए जेंडर संवेदनशीलता का यानी कि एक संवेदना होनी चाहिए जिससे यह समझा जाए, कि दो लैंगिक समुदायों के बीच सम्बन्ध ठीक-ठाक नहीं हैं. इनको ठीक करने के लिए जेंडर सेंसिटाईज़ेशन ज़रूरी है. आज बहुत सारा लेखन जो हम कर रहे हैं वह उस संवेदना को पैदा कर रहा है, लेकिन जेंडर न्यूट्रल होना एक बहुत बृहत किस्म की ऐतिहासिक-सामाजिक प्राप्ति होगी. जेंडर न्यूट्रल यानी जेंडर अन्ध या निरपेक्ष वही समाज हो सकता है जहाँ जेंडर की असमानताएँ समाप्त हो चुकी हों. स्वीडन वगैरह .खास कर नॉरडीक देशों में जेंडर निरपेक्ष नीतियाँ बन रही हैं. यह बहुत ही प्रसन्न करनेवाली बात है क्योंकि जेंडर के स्तर पर उनके समाज में जो असमानताएँ थीं उन्हें उन्होंने .खत्म करने की कोशिश की है. कैसे? औरतों के लिए सबसे बड़ी मुसीबत यह है कि पितृसत्ता ने हमारे समाज को श्रम विभाजन के आधार पर विभाजित किया है. बहुत ही ठोस ढंग से स्त्री और पुरुष को असमान बनाया है. हम कौन से काम करते हैं उससे निश्चित होता है कि समाज में हमारी भूमिका क्या होगी. अगर स्त्री जानवरों से भी ज्यादा काम करती है हमारे देश में (जिसके लिए आँकड़े भी है) और वो काम इतने भारी काम हैं कि अगर वे न किये जाएँ तो दूसरे काम भी नहीं हो सकते तो इससे क्या असमानताएँ पैदा हो रही हैं, इसे तो समझना ही पड़ेगा. 

बात यह है कि इसके बावजूद उसके श्रम का मूल्य नहीं. स्वीडन जैसे देशों में आप पाएँगे कि जेंडर के आधार पर इस तरह के विभाजन को समाप्त करने की कोशिश की गयी है. वहाँ पर वेल बीइंग की बात होती है यानी हम कैसे स्वच्छ जीवन जिएँ, घरेलू काम कौन करेगा इत्यादि? वह किस तरह बँटेगा, सरकार सिर्फ स्त्रियों को ही प्रसूति के लिए छुट्टी देगी या पुरुषों को भी छुट्टी देगी. अगर बच्चे हैं तो पिता को भी छुट्टी मिलनी चाहिए. एक दिन में कितने घंटे काम किया जाना चाहिए जिससे कि आपकी मनुष्यता विकसित हो. जब आप इस तरह से विचार करने लगेंगे, जब सारा समाज ऐसे सोचेगा तब वहाँ अर्थव्यवस्था या पितृसत्ता पर टिकी असमानताएँ सुलझने लगती हैं. हमारे देखते-देखते यह हुआ है कि जेंडर निरपेक्ष नीतियाँ बन रही हैं. इसीलिए जेंडर निरपेक्षता को हासिल किया जा सकता है. अगर हम जुट जाएँ कि हम उन चीज़ों को अपने समाज से दूर करें, निकाल बाहर करें जो हमें असमान बनाती हैं तब हम एक साथ गरिमापूर्ण समाज में गरिमा के साथ जीने वाले स्त्री-पुरुष बना ही सकेंगे.

आपकी सभी रचनाओं पर आपको पाठकों से बहुत प्यार मिला, उन्होंने आपकी कविता से एक साझेदारी महसूस की और आलोचकों ने भी इस कविता में विश्वास व्यक्त किया, इससे आपके रचनाकार मानस की कितनी तुष्टि होती है? इतने सब प्यार और सम्मान के बाद भी क्या आपको कभी ऐसा लगा कि साहित्यिक जगत में स्त्री रचनाकार होने के नाते असमानता का दंश झेलना पड़ा हो?
मैंने जो अपना प्रस्थान बिन्दु चुना था उसे घोषित तौर पर मैंने स्त्रीवादी कहा था, कि मैं एक स्त्रीवादी कवयित्री हूँ और मुझे उसी तरह पढ़ा जाना चाहिए. उसकी वजह से लोगों ने गम्भीरता से पढऩे की कोशिश की इसलिए एक विशेष दृष्टि मुझ पर पड़ी. मैं शुरू से यह माँग करती रही, खासकर जिस तरह मैं लिखती रही. एक नयेपन के साथ ठोस ढंग से अपनी बात कहती रही उसे प्रशंसा मिली है. शुरू से ही इतना तो मुझे ज़रूर मिला है और इसीलिए मैं अपनी आलोचना में सकारात्मक ढंग से ही पहल करती रही हूँ. अपने पहले काव्य संग्रह अपने जैसा जीवन पर सुधीश पचौरी जी ने जो लिखा उसे तो मैं कभी भूल ही नहीं सकती. वह मेरे लिए बहुत महत्त्वपूर्ण रहा. केदार जी ने भी लिखा, नामवर जी भी बोले, हालाँकि नामवर जी इस बात पर अटके कि मुक्ति का प्रश्न स्त्री के लिए क्यों महत्त्वपूर्ण है पुरुषों के लिए क्यों नहीं? मैं मानती हूँ कि मुक्ति का प्रश्न पूरी मनुष्यता के लिए है लेकिन स्त्री के लिए यह और भी महत्त्वपूर्ण है क्योंकि लैंगिक आधार पर वह दमित हैं, और इसे समाप्त करने के लिए वह संघर्ष करती है. मैंने इस प्रश्न को बार-बार उठाया है तो यह सही है कि अपने पहले संग्रह से ही मुझे बहुत सम्मान, .खास किस्म का रेकॉगनिशन मिला जिससे मैं उत्साहित भी हुई कि मैं इस दिशा में और लिखूँ. अगर मुझे आलोचना भी मिलती तो भी मैं लिखती रहती लेकिन तब शायद मेरी कविता और मेरे स्व का विकास इस रूप में नहीं हो पाता. आलोचना होती है तो आप उसका जवाब देने की सोचते हैं. लेकिन मुझे लगातार प्रशंसा मिली. मेरा दूसरा संग्रह नींद थी और रात थीजब आया तो उसकी भाषा को चिह्नित किया गया. 

मुझ पर बहुत ज्यादा धयान दिया गया तो तुष्टि तो क्या कहूँ लेकिन यह ज़रूर है कि हिन्दी कविता में स्त्री कविता के लिए यह आह्लादित करने वाली बात है. इसीलिए मैं डिसक्रिमिनेटिड तो नहीं महसूस करती हाँ, यह ज़रूर है कि मेरे वर्ग को लेकर या मेरे विदेशी अनुभवों को लेकर हिन्दी में थोड़ी असहजता प्रकट की गयी है. लेकिन जैसा मेरा मनना है कि मैं हिन्दी में सिर्फ़ हिन्दी की ही बातें क्यों लिखूँ? यह तो भाषा का ही अपमान है. इस भाषा में हर तरह के अनुभव आने चाहिएँ अगर यह हिन्दी कवयित्री का अनुभव है. वह अपने अनुभव को अवश्य प्रकट करेगी यदि यह उसका अनुभव है. भाषा उससे उन्नत होगी. अगर हम अपने विविध अनुभवों को न लाएँ तो भाषा उससे संकुचित होगी. यह एक इलाका है जिसको ध्यान में रखते हुए अशोक पांडेय ने लिखा है, प्रांजल ने, अविनाश मिश्र आशुतोष सबने बहुत बढिय़ा लिखा है कि स्वप्न क्या है, अँधेरा क्या है? उसकी पूरी राजनीति को खोलकर उन्होंने सामने रखा है. इस तरह वरिष्ठ कवियों-आलोचकों से लेकर जो नए कवि और आलोचक हैं उन्होंने मेरी कविताओं पर आलोचनात्मक टिप्पणियाँ की और उनका प्यार और सम्मान मुझे मिला इसलिए मैं असन्तुष्ट कैसे हो सकती हूँ. मुझे लगता है कि ठीक-ठाक यात्रा हो रही है.   

एक कवि की हैसियत से आपकी क्या इच्छा होगी कि आपकी कविताओं को कैसे याद किया जाए किसी अस्मिता से जोडक़र या फिर विशुद्ध साहित्यिक रचना के रूप में ?
नहीं, मैं चाहूँगी कि मुझे एक स्त्री के रूप में याद किया जाए. मेरी कविताओं को स्त्री कविता के रूप में पहचान मिले क्योंकि मैं उसी तरह लिख रही हूँ. मैं कभी नहीं भूलती कि मैं एक स्त्री हूँ और एक ऐसे समाज में रह रही हूँ जहाँ असमानता की गज़ब-गज़ब किस्म की प्रविधियाँ हैं. मतलब कि इस समाज ने नयी-नयी किस्म की असमानताओं का अनुसंधान किया है. .खासकर हमारे यहाँ जो जातिवाद है वह हमारी सोच को संकटग्रस्त करता है. मैं अभी कुछ पढ़ रही थी तो उसमें एक जगह यह बात आती है कि अमेरिका में एक शोध के दौरान श्वेत और अश्वेत स्त्रियों को एक प्रश्न दिया गया कि जब वे आईने में अपने आप को देखती हैं तो क्या देखती हैं? ज़्यादातर श्वेत स्त्रियों ने कहा कि वे एक स्त्री को देखती हैं जबकि अश्वेत स्त्रियों ने कहा कि वे एक अश्वेत स्त्री को देखती हैं. तो यह जो भिन्नताएँ है उनको अपनाते हुए उनके दर्द को अपने में समाहित करते हुए मैं यह कहना चाहती हूँ कि जो मैं अपने को एक स्त्री कवि के रूप में देखती हूँ, चाहती हूँ कि मुझे एक स्त्री होने के कारण जिन स्त्रियों से रू-ब-रू होना पड़ता है उनके दर्द को भी समझा जाए. मैं चाहूँगी कि मुझे स्त्री कवि के रूप में ही याद किया जाए जो सवर्ण जाति से होती हुई भी अपनी संवेदना में उन स्त्रियों की संवेदनाओं को शामिल करके चलती है जो जाति या वर्ण के कारण बहुत ज्यादा शोषित और अपमानित हुई हैं. मैं चाहूँगी कि मुझे इसी रूप में याद किया जाए.  

सामाजिक परिवर्तन की दृष्टि से आने वाले समय में स्त्री कविता क्या भूमिका निभाएगी ?
सामाजिक परिवर्तन में स्त्री कविता अपनी भूमिका निभाएगी क्या, वह निभा रही है. वह सबके बीच यह चेतना स्थापित कर रही है कि हर मनुष्य चाहे वह कहीं हो वह चाहता है कि उसकी गरिमा हो. उसे न्याय मिले, उसके निम्नतर होने की चेतना को निरस्त किया जाए. 

बहुत सारी स्थितियाँ जो हमारे लिए तकलीफदेह हैंहिकारत, असामनता, हिंसा, अन्याय, इन सबमें परिवर्तन लाने का काम हिन्दी की स्त्री कविता कर रही है और सि.र्फ राजनीतिक ढंग से ही नहीं, दर्शन और सभ्यता विमर्श के तहत भी वह उस काम को कर रही है.मुझे अपने समकालीन स्त्री कवियों से बहुत उम्मीदें हैं और उन्हें मैं बहुत प्यार से पढ़ती हूँ.
(यह बातचीत नया ज्ञानोदय के नए अंक में प्रकाशित है.)
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रेखा सेठी
एसोसिएट प्रोफेसर (इन्द्रप्रस्थ कॉलेज, नई दिल्ली)  
ई-मेलः reksethi@gmail.com