परख : ज़िंदगी लाइव (प्रियदर्शन)

Posted by arun dev on अप्रैल 02, 2017






















प्रियदर्शन NDTV में कार्यरत वरिष्ठ  पत्रकार हैं. हिंदी के लेखक और कवि हैं. कुछ महत्वपूर्ण कृतियों के अनुवाद भी उनके नाम है - आधी रात की संतानें (सलमान रुश्दी), बहुजन हिताय (अरुंधति रॉय), कत्लगाह (रॉबर्ट पेन) आदि.
‘उसके हिस्से का जादू’ उनका कहानी संग्रह है. उनके नए उपन्यास ‘ज़िंदगी लाइव’ की इधर खूब चर्चा है.  यह उपन्यास मुंबई पर आतंकवादी हमले (26/11) को केंद्र में रख कर लिखा गया है.
इस उपन्यास पर विस्तार से चर्चा कर रहे हैं आदित्य कुमार गिरि .




तंत्र में फँसे लोककी आत्मरक्षा की लाइव रिपोर्टिंग’                        
आदित्य कुमार गिरि









प्रियदर्शनहिन्दी उपन्यास में नया नाम है और जिन्दगी लाइवउसकी पहली धमक. उनतालिस सब-चैप्टर्स में बँटे इस उपन्यास को एक बैठकी में पढ जाना बेहद सरल होगा लेकिन इस सरलता को हल्कापन या अगंभीरता समझना एक भूल होगी. यह उपन्यास पाठ के लिए गंभीरता और सब्र की माँग इसलिए भी करता है क्योंकि यह रियल-टाइमघटना पर आधारित तो है ही लेकिन साथ ही कमेंट्रीशैली में रचित है. दूसरे, उपन्यास की कथा बेहद कम-तीन दिनों के-समय को कवर करते हुए एक बडी समस्या को चित्रित करती है. इसकी यह संरचना और गति ही पाठकों को भ्रम में डाल सकती है. अतः इसका पाठ सूक्ष्मता की माँग करता है. उपन्यास पहला है और हिन्दी उपन्यासों के सेट-पैटर्नसे विपरीत इसलिए इसपर आरोप भी लगने शुरु हो गए हैं. मसलन,



1.यह एक लुग्दी उपन्यास है. 
2.सनसनीखेज कथा संयोजन है.
3.जासूसी उपन्यासों की शैली में पाठक को चौंकाने की प्रवृत्ति है. 
4.उपन्यास का फोकस गलत है.
5.कथा के विस्तार में आतंकवाद की जगह छोटी मोटी गुंडागर्दी और किडनैपिंग को महत्त्व दिया गया है जिससे उपन्यास का उद्देश्य भटक जाता है.

6.कथा काम्पैक्ट नहीं है.
7.उपन्यासकार राजनीतिक दृष्टि से उपनी निष्ठा{पसंदगी-नापसंन्दगी) प्रकट कर देता है.जो उसे निर्दोष और निष्पक्ष नहीं रहने देता.
8.उपन्यासकार अपनी पसंद के पात्रों के साथ डिफेंसिव है जबकि विरोधी पात्रों के विरुद्ध निर्मम,अर्थात यह उपन्यास संवाद करने की जगह अपने विचार थोपती नजर आती है.
9.उपन्यास का एंड बचकाना है.
10.उपन्यास का एंड भ्रामक है.
11.कथा हैप्पीज एंडिंग का भ्रम पैदा करती एक दुःखांत रचना है.
12.उपन्यास स्पष्ट नहीं है.

आदि आदि बीसियों आरोप लग गए हैं. यकीनन उपरोक्त आरोप रिजेक्शन का प्रकटीकरण है. इसे यूँ कहना चाहिए कि जिन्दगी लाइवएक्सेपेटेड रचना नहीं है.
वजह ?

वजह इसका शिल्प. इसका विषय और नए तरीके से विषय और शिल्प का बर्ताव.

हिन्दी में रियल-टाइम समस्याओं पर लेखन न के बराबर है और उसकी स्वीकार्यता तो सिरे से गायब है. जिन्दगी लाइवअपवाद कैसे हो जाती.

यह उपन्यास 26/11 की घटना की पृष्ठभूमि पर रचा गया है. प्रथम दृष्ट्या यह रचना 26/11 की घटना की रिपोर्टिंग और पडताल करती दिखती है लेकिन धीरे धीरे इसके गूढार्थ खुलते जाते हैं. उपन्यासकार ने आतंकवादी हमले को लेकर कोई सनसनी नहीं बनाई है वे उसे उतना ही जानते हैं जितना टीवी चैनलों के माध्यम से देश की जनता ने जाना था. बल्कि यह हमला, उसकी रिपोर्टिंग पृष्ठभूमि में है, मूल फोकस कहीं और है. प्रियदर्शन ने पत्रकारों को माध्यम के रूप में इसलिए चुना है क्योंकि इस घटना की पहली सूचना न्यूज चैनल्स से ही मिली थी.उपन्यासकार पत्रकारों के द्वारा घटना का नैरेटिव तैयार करता है.

वे जानबूझकर आतंकवाद की डिटेलिंग या कारणों पर समय खर्च नहीं करते. वे उक्त घटना को एक बडे सिस्टमका एक काममानते हैं ठीक वैसे ही जैसे बच्चे की किडनैपिंग या किसानों की जमीनें हथियाकर उसपर बडी बडी बिल्डिंगें बनाना अथवा चैनल्स खोलकर सत्य का मैनुपुलेशन करना, अपराधी से न्यायाधीश बन जाना. प्रियदर्शन अपराध की किसी एक घटना के नाटकीय वर्णन और उसकी परिणति में अपराधी को सजा दिलाना उद्देश्य नहीं समझते. वे पूरे उस सिस्टम, उस व्यवस्था को टारगेट करना चाहते हैं. वह सिस्टम एक दुनिया है, समानांतर दुनिया. पैसे और पूँजी के काकटेल ने दुनिया को लूटते रहने के लिए एक समानांतर दुनिया बनाई है जिससे आमजन लड नहीं सकता. आमजन केवल अपने हिस्से की लडाई लड सकता है. बुनियाद या दीवार हिलाना, बदलना उसके बूते नहीं.

प्रियदर्शन किसी फिल्मी संसार से कथा को ट्रीट नहीं करना चाहते. वे वास्तविकता के करीब ही रहना चाहते रहे होंगे. वे जानते हैं मुम्बई के हमले और दिल्ली के विकासके पीछे के अपराध और सुलभा के बच्चे की किडनैपिंग सब कहीं न कहीं एक ही तार से जुडे हैं. वे इस मसले में स्पष्ट हैं कि जो शक्तियाँ मुम्बई में या अमेरिका में या पेरिस में आतंकवादी भेज रही हैं,वे ही किसी और रूप में किसी और तरीके सैनी से लोगों को जन्म दे रही हैं.सुलभा या विशाल या प्रशांत का जोर सैनी की गिरफ्तारी पर जो एकदम नहीं है उसकी वजह भी यही है कि वे जानते हैं सैनी सिर्फ एक मछली है.वे कन्फर्म हैं कि सैनी छूट जाएगा और वे इसको लेकर भी कन्फर्म हैं कि वे लोग सैनी को सजा नहीं दिला पाएँगे.


वे उन राष्ट्रवादियों से भी नहीं हैं जिनका राष्ट्रप्रेम पकडे गए आतंकवादी की सिर्फ सजा में दिलचस्पी लेता हो और जिसकी दिलचस्पी सजा के बाद खत्म भी हो जाती हो, बल्कि उन्होंने तो उस हमले को पृष्ठभूमि के रूप में इस्तेमाल किया है, उनका मुख्य फोकस आतंकवाद और क्राइम के पीछे की शक्तियों पर बहस का है. वे किसी फिल्म से हीरोइक एंड की जगह एक संघर्ष, डिटरमिनेशन में एंड खोजते हैं. सुलभा या विशाल या प्रशांत की चिंता सैनी की सजा में नहीं बल्कि सैनियों के जन्म में है. उनके सिस्टम को अपनी गिरफ्त में ले लेने के बाद जन्मी हेल्पलेसनेसके वर्णन में हैं.





उपन्यास की बुनावट हिन्दी के पारंपरिक उपन्यासों से भिन्न है,न सिर्फ शिल्प के स्तर पर बल्कि अन्तर्वस्तु के स्तर पर भी.


सबसे पहले इस उपन्यास के फोकस का प्रश्न है. मसलन यह उपन्यास आतंकवाद पर है, किसी यह उपन्यास एक आतंकवादी घटना की लाइव रिपोर्टिंग है अथवा महानगरों में पनप रहे माफिया कल्चर पर. प्रियदर्शन ने यहीं खेलकिया है.उपन्यास पर लग रहे तमाम आरोप असल में इसी बिंदु की अस्पष्टताके कारण है. प्रियदर्शन लुग्दी नहीं रच रहे थे, न ही कोई जासूसी कथा लिख रहे थे,वे सुचिंतित तरीके से हिंसा और अपराध के तंत्र को कुछ घटनाओं के माध्यम से डी-कोडकरने की कोशिश कर रहे थे.वे पत्रकार जगत की प्रवृत्ति के अनुरूप आतंकवाद की भर्त्सना करना, उसे पाकिस्तान से जोडने भर से अपने कर्म की इतिश्री करने वाले जीव नहीं.वे इस आतंकवाद और महानगरों के माफिया तंत्र के स्रोतों को एक्सपोजकरते हैं. उन्होंने जानबूझकर ताज होटल या उसमें पकडे गए आतंकवादियों या पाकिस्तान आदि पर पन्ने खर्च नहीं किए हैं.प्रियदर्शन मुम्बई के अपराध और सैनी के अपराध को अलग-अलग नहीं देखना चाहते.बल्कि पत्रकारिता को भी वे उसी काकटेल की एक कडी के रूप में देख रहे हैं.

वे ही शक्तियाँ कहीं अपराध करवा रही हैं, कहीं उसको परिभाषित करवा रही हैं, कहीं उसके लिए विरोध और कहीं संसाधन उपलब्ध करवा रही हैं. ऐसे में सुलभा, अभि, तन्मय, विशाल, चारू, अमित, रग्घू, शीला, सोना, सीमा आदि लोग फँसते हैं और मजे की बात यह है कि इन फँसे लोगों को बचाने कोई नहीं आता. अपनी लडाई ये खुद ही लडते हैं और इन्हीं के संघर्ष से जीने की आस्था का जन्म होता है. एक षडयंत्रकारी समय में जब केवल निराश हुआ जा सकता है वैसे में बेहद आमलोग, उपेक्षित लोग अपनी लडाई से आस्था को जन्म देते हैं. प्रशांत कहता है  

दरअसल इस देश को इसके अमीर लोग नहीं, इसके गरीब लोग बचाएँगे. यह सोना बचाएगी, ये सीमाजी बचाएँगी. अभि को भी तो इन्हीं लोगों ने बचाया है.1

प्रियदर्शन को मालूम है उनके एंड (क्लाइमैक्स को लेकर तमाम शंकाएँ हैं. पात्रों का फोकस अपराधी पर नहीं, 26/11 के मुद्दे पर कोई धमाकेदार प्रतिक्रिया नहीं, जिसकी एक पारंपरिक उपन्यास के पाठक को उम्मीद होती है.) को लेकर सवाल होंगे, उनके दृष्टिकोण पर लोगों को आपत्ति होगी. लोग उनसे पाप पर पुण्य की विजयटाइप एंड की उम्मीद कर रहे होंगे. उपन्यास का अंतिम चैप्टर तो जैसे उसी संदेह या सवाल को संबोधित है. प्रशांत, सुलभा, विशाल आदि की बातचीत में वे जैसे जवाब दे रहे हों. उपन्यास के एंड का ठंडापन असल में ठंडापन नहीं, एक गंभीर समयबोध से उपजा जीवनबोध है. इस षडयंत्रकारी, खतरनाक समय में लोक से मिली जीवनदृष्टि. प्रियदर्शन का एंड कहता है  

चीजें बदलेंगी. यह निरा आशावाद हो तो हो सही. फिलहाल यही उसकी पूँजी है, यही उसकी ताकत.2

सुलभा अभि के भविष्य और परवरिश की चिंता के बहाने पाठकों को जैसे सूत्र देती है.खौफ भरी दुनिया में अभियों के जीने का सूत्र. सुलभाओं के रवैयों का सूत्र. खौफ और अपराध के ककटेल को डील करने, प्रकट करने का सूत्र. उसकी चिंता असल में पाठकों के लिए है.प्रियदर्शन अभि के लिए किए चिंतन को पाठकों से किया प्रश्न बना देते हैं. सुलभा अभि को 

शरीफ बनाए या ताकतवर ? या उसकी शराफत ही उसकी ताकत होगी ? अभि जब बडा हो जाएगा तो उसे सारा किस्सा सुनाएगी.बताएगी कि कैसे जब स्याह हाथों ने अभि को उससे छीन लिया था तो उसे कुछ बहुत ही मामूली लोगों की मदद से बचाया जा सका था.फिलहाल उसे उस इतना समझ में आ रहा था उसके आसपास एक पूरा तंत्र उसके खिलाफ खडा है जो उसका इस्तेमाल भी कर रहा है और उसके साथ खेल भी कर रहा है.कल से वह फिर अपने चैनल पर होगी और दुनिया के साथ आँखमिचौली का खेल शुरु कर देगी.3

उपन्यास में बार बार उस स्रोत की ओर इशारा किया गया है जिसने समय को खौफ के साए तले रख दिया है. सुलभा जब अपने बारे में सोचती है, आतंकवादियों के बारे में सोचती है, तब असल में वह उन्हीं चीजों की ओर इशारा करती है. वे लोग पैसे और पावर के खेल में फँसे युग में जी रहे पात्र हैं. वे मशीन हो चुके हैं, सुलभा तो उन आतंकवादियों तक को मशीन मानती है जो किन्हीं शक्तियों के कहने पर हथियार लेकर मासूम, बेबस, निर्दोष लोगों को मार रहे हैं. प्रियदर्शन नैरेट करते हैं   

सिर्फ तीन दिन पहले एक रात वह इन सबसे बेखबर न्यूज पढ रही थी. बिल्कुल मशीन की तरह.उसे फिर ख्याल आया. उसे किसने ऐसी मशीन में बदल डाला है ? और वह जो गोलियाँ चला रहा था सीएसटी के ऊपर-वह भी तो बिल्कुल मशीन लग रहा था. पैदा तो वह भी किसी अभि की तरह हुआ होगा. किसने उसके हाथ में ये गोले बारूद थमा दिए, किसने उसके दिमाग में जहर भरा, किसने उसे इंसान से ऐसा रोबोट बना दिया जिसका काम बस कत्ल करना और एक बार मारा जाना था ? क्या वे लोग कभी पकडे जाएँगे ? हो सकता है, उन्हीं में से कुछ लोग इस आतंकवाद की निंदा कर रहे हों और इस निंदा की खबर वह आने वाले दिनों में पढेगी.4

प्रियदर्शन की पीडा कितनी बडी है इसे उपर्युक्त पैरे से समझा जा सकता है. वे उस अज्ञात शक्ति की विराटता’(भयंकरता के अर्थ में) को ही सामने लाना चाहते हैं. विशाल और तन्मय इस बात पर खुश होते हैं कि हरजिंदर सैनी पकडा गया वर्ना कल को यह आदमी एक न्यूज चैनल का मालिक हो जाता लेकिन प्रशांत कहता है 

 हमारे बीच कई हरजिंदर सैनी हैं जो अखबार निकाल रहे हैं और टीवी चैनल चला रहे हैं. उनका काला पैसा उजला हो रहा है. और मान लो, वह टीवी चैनल न भी चला रहा हो तो क्या फर्क पडता है. ये जो गुडगाँव,  गाजियाबाद, फरादाबाद, नोएडा और ग्रेटर नोएडा की चमक-दमक देख रहे हो, वह कहाँ से आ रही है ?तुम लोग स्विस बैंकों में काला पैसा खोजते हो, उन्हें ठीक से देखना है तो इन पाश इलाकों की सोसाइटीज में जाओ. पता चलेगा कि कितने कितने लोगों ने अपनी हैसियत से कई गुमा बडा निवेश कर रखा है. और तुम क्या समझते हो. ये जो एफएम रेडियो के चैनल सब हैं, जहाँ तरह तरह के आशियानों के विज्ञापन आते रहते हैं, उनका पैसा कहाँ से आता है ? इस हरजिंदर सैनी टाइप के लोगों का ही पैसा है न जो हमारे तुम्हारे साथियों की सैलरी के खाते में पहुँचता है.5


इसलिए तो वे किसी एक घटना पर सजा दिलाने को निर्णायक और मारक दृष्टि नहीं मानते. वे जानते हैं एक आदमी या दो आदमियों से जन्मा यह कोई फिल्मी अपराध नहीं बल्कि यह एक उद्योग है जिसे व्यवस्था ने ही जन्माया है. जिसे एक समानानंतर व्यवस्था की तरह विकसित किया गया है. इसकी गिरफ्त से वे तबतक ही सुरक्षित हैं जबतक उसकी नजर उनपर नहीं पडी है. उपन्यास के अंत में अभि के मिलने के बाद का संवाद असल में इसीलिए इतना ठंडा है क्योंकि वे जानते हैं सैनी अंतिम शत्रु नहीं,और जो शत्रु है उसे सजा दिलाना फिलहाल असंभव है, इसलिए अपने हिस्से की लडाई लड वे आगे की जिन्दगी जीने लगते हैं, जीना चाहते हैं.

सवाल उठ सकता है कि उपन्यासकार मीडिया और आतंकवाद की चर्चा एक ही संदर्भ में क्यों करता है. मीडिया के रवैये या उसकी भूमिका पर विचार करने के लिए उपन्यासकार को आतंकवाद की पृष्ठभूमि की ही आवश्यकता क्यों पडी.

असल में अपराध के लिए लिटरेचर पैदा करने वाले माध्यमों को सामने रखकर जब तक नहीं देखा जाएगा जब तक चीजें साफ नहीं होंगी. वे कौन लोग हैं जो हर घटना का नैरेशन तैयार करते हैं.क्या लोगों का समस्याओं को देखने और उसके हल तक का नजरिया उन्हीं नैरेशन्स से तय नहीं हो रहा ? बडे से बडे अपराध पर प्रतिक्रियाएँ नैरेट की जा रही हैं. पूरा देश, समाज नैरेशन्स से संचालित किया जा रहा है. तब जब अगर नैरेटर पूर्वग्रह रखता हो अथवा किन्हीं खास बिन्दुओं पर चीजों को रखना चाहता हो, तो चीजें कितनी बुरी हो सकती हैं अथवा किन दिशाओं की ओर जा सकती हैं, यह आसानी से समझा जा सकता है. मीडिया क्रांतिकारी भूमिका में है ? नहीं. उसमें काम करने वाले लोगों और परोसी जा रही खबरों में तारतम्यता है ? दर्शकों तक खबरें पहुँचाने वाले पत्रकार विशेषज्ञ हैं ? घटनाओं का प्रस्तुतिकरण या उसका नैरेशन निर्दोष होता है ? प्रियदर्शन इन सवालों से जूझते हैं. वे पत्रकारों की निजी समस्याओं और उनके मानसिक दबावों पर भी लिखते हैं.

प्रियदर्शन ने विस्तार से मीडिया के अंतर्विरोधों को प्रकट किया है. उन्होंने मीडिया की कमियाँ बताई हैं तो साथ ही मीडियाकर्मियों के पक्ष को भी सामने रखा है. सुलभा का न्यूज पढते वक्त न्यूज पर सोचना, घटना को बिना जाने लिखित को मशीन की तरह पढ जाने पर सोचना, अपनी अभिव्यक्ति, अपना पक्ष आदि के झूठ पर सोचना, घर परिवार की चिंता  किए बगैर काम करते रहने की मजबूरी बल्कि कहना चाहिए आवश्यकता पर सोचना,कई सारे पक्ष हैं जहां उपन्यास ने मीडिया जगत के पर्दे उतारे हैं, उनको लेकर बने मिथ को तोडा है,  उनका दर्द भी बयाँ किया है.

प्रशांत के साथ चैनल में हो रही समीर पाठक की बातचीत से प्रियदर्शन ने चैनलों के एक राष्ट्रवादी पक्ष को भी सामने किया है, जिसे उपन्यास में कट्टरहिन्दू वादी कहा गया है. आतंकवाद पर बहस के दौरान प्रशांत से दोनों बार पाठक सरनेमका व्यक्ति बहस करता है और वह पाठक घटना पर प्रतिक्रिया देते वक्त पाकिस्तान और प्रकारांतर से मुसलमानों पर दोषारोपण करता है. 

हालांकि मुसलमान शब्द का कहीं प्रयोग नहीं किया गया है लेकिन समीर पाठक का बीजेपी का पक्षधर होना बहुत कुछ कहता है. समीर 2/11 पर प्रतिक्रिया देते हुए बीजेपी सरकार को सोल्यूशन के रूप में देखता है. यह एक बडे वर्ग की मानसिकता का प्रतीकात्मक प्रोजेक्शन है. प्रियदर्शन समीर पाठक के माध्यम से उस राष्ट्रवाद और प्रकारांतर से बीजेपी को सभी समस्याओं का हल सोचने वालों के पक्ष को सामने रखा है और उसी क्षण प्रशांत से उस समझ की हवा भी निकलवा देता है. जब प्रशांत वाजपेयी सरकार के समय के आतंकवादी हमलों-अक्षरधाम और संसद पर हमले- को कोट करता है. 

पाठक जी, वाजपेयी जी के समय पार्लियामेंट पर हमला किसने किया था ? अक्षरधाम और रघुनाथ मंदिर पर हमला हुआ था. और वाजपेयी जी के विदेश मंत्री आतंकवादियों को कंधार छोडने गए थे. सब भुला गए ?” 6

प्रियदर्शन ने बीजेपी को सवर्णवादी राष्ट्रवाद के प्रतीक की तरह दिखाया है. मंडल कमीशन की सिफारिशें लागू करने वाले नेता पूर्व प्रधानमंत्री वीपी सिंह की मृत्यु पर मीडिया के रवैये के माध्यम से भी प्रियदर्शन ने सवर्णवादी मीडिया को एक्सपोज किया है. मायावती की सरकार को उपन्यासकार ने कई जगहों पर अच्छा कहा है. यह उसकी पक्षधरता का प्रकटीकरण है. मायावती सरकार के प्रति नरम रवैये को दोष के रूप में देखने की जगह अगर उसे वीपी सिंह की खबर पर चैनलों की ठंडी प्रतिक्रिया के आलोक में देखा जाए तो एक बडे शून्य की भरपाई की कोशिश की मंशा से उपजी मानसिकता के रूप में देखा जा सकता है. सर्वत्र सवर्णवाद रहेगा तो उसका विलोम तो पैदा होगा ही. मीडिया में सबकुछ ठीक नहीं है. बाहर से दिखने वाला उसका सजा धजा रूप असल में कई स्याह पक्षों को समाए हुए है. बिना सच जाने विश्वास के साथ एंकर्स का एक विचार, एक मत का प्रचार करना, आरोपी को आतंकवादी अज्यूमकर लेना और उसी के अनंनतर प्रोजेक्ट करना, मीडिया के स्याह पक्ष हैं. बाटला हाउस प्रसंग पर इफ्तिखार के साथ चैनल का बर्ताव किस तरह उसे तोडता है. उसका हृदय उस बडी आबादी के दबाव में बनाई समझ से छलनी होता है. 

बाटला हाउस पर इफ्तिखार के स्टैंड पर चैनल के रवैये से इफ्तिखार की उपजी मनःस्थिति के बहाने उपन्यासकार चैनल्स के भीतर के माहौल पर एक जगह लिखता है-  इफ्तिखार की आँख बार-बार भर आ रही थी. उसे अपनी दुनिया से बहुत शिकायत रही थी. उसके चैनल ने उसे कई बार अकेला छोड दिया था.बटला हाउस में तो उसकी पत्रकारिता पर सवाल खडे कर दिए गए,उसके मुसलमान होने को शक की नजर से देखा गया. वह बिल्कुल नौकरी छोडने जा रहा था कि उसे चैनल हेड विवान ने अपने कमरे में बुलाकर समझाया था. उससे कहा था कि उसे अपनी राय रखने का पूरा हक है.यह हक उसे संविधान ने दिया है, जिसे कोई नहीं छीन सकता.यही नहीं, विवान ने कहा था कि खुद वह भी इफ्तिखार की तरह सोचता है.मैं और तुम बस अलग अलग पोजीशन में खडे हैं इफ्तिखार. ठीक है कि मुझे हिंदू होने की वजह से तुमसे कुछ ज्यादा छूट मिल जाती है, लेकिन उनके निशाने पर मैं भी हूँ. उनके से विवान का आशय दफ्तर में काम कर रहे हिंदू कट्टरपंथि्यों से था.इफ्तिखार ने इस्तीफा नहीं दिया था,लेकिन उसकी मुश्किलें भी कम नहीं हुई थीं.कुछ चर्चों पर हमले हुए थे और अचानक सिमी और बजरंगदल की बात चल पडी थी. इफ्तिखार मानता था कि दोनों एक जैसे संगठन हैं जिसपर दफ्तर के सरोज पाठक भडक गए थे.7


(प्रियदर्शन)




कुल मिलाकर एक तरफ तो मृत्यु और हत्याओं पर चैनल्स का कैजुअल रवैया वहीं दूसरी तरफ प्रिंस के गडढे में गिरने की नानसेंस खबर पर चौबीसों घंटे की कवरेज प्रियदर्शन मीडिया जगत की इस विडंबना को भी सुन्दर ढंग से प्रकट करते हैं. मानसिक रूप से परेशान इफ्तिखार का परिस्थितवश रेवा के करीब जाना मीडियाकर्मियों के एक अन्य पक्ष को प्रकट करता है.इसी के अनंनतर सुलभा से चारू की चिढ को भी देख सकते हैं.ऐसे प्रसंगों के माध्यम से उपन्यासकार उस दुनिया की सजीवता को ही दर्शाता है.वहाँ भी मनुष्य ही काम करते हैं. उनके अंदर भी राग, द्वेष, कुंठा, प्रेम, सेक्स, चिढ, क्रोध आदि होते हैं. वे भी नार्मल लोग हैं जिन्हें दुनियायवी समस्याएँ होती हैं, जिनकी दुनियायवी जरूरतें होती हैं. और वे लोग काम के प्रेशर में अपनी सुद-बुध तक खो बैठते हैं, इस हद तक कि उन्हें अपने नवजात बच्चे तक की परवाह नहीं रहती. 

मीडिया जगत में कामकाजी स्त्रियों के जहन्नुम की ओर संकेत करना भी प्रियदर्शन नहीं भूलते. सैनी और उसके गुंडों का स्त्री एंकर्स के नाम पर लार टपकाना हो अथवा पुलिस वालों का शीला के साथ बदतमीजी प्रियदर्शन ने पुंसवादी समाज में स्त्रियों के जहन्नुम को सशरीर प्रकट किया है. शीला जैसी स्त्रियों के पतियों का पुंसवादी नजरिया हो या पुलिस वालों की उसे लेकर लपलपाती जीभ असल में चैनलों में काम करती स्त्रियों की आसान दिखती जिन्दगी के पीछे के सच को उजागर करता है. इस समाज ने अबतक स्त्रियों को कामकाजी, नौकरी करती ईकाई के रूप में देखना और स्वीकारना नहीं सीखा है. 


दूसरी ओर, आधुनिक और मजबूत दिखती स्त्रियों के अनदेखे पक्ष पर भी लेखनी चलाई है. उन स्त्रियों में रेवा और चारू मुख्य हैं. रेवा एक एक्स्ट्रीम पर है तो चारू दूसरे.चारू को बच्चा चाहिए,रेवा को पुरुष मुक्त स्वच्छंदता. दोनों ही अपनी चाहत के विलोम में जा फँसती हैं.रेवा कितनी मजबूती से निकलती है इसे ऐसे समझे जा सकता है.  

तो क्या हुआ अगर इफ्तिखार ने उसे छू लिया. क्या हुआ अगर उसने किसकर लिया ? क्या हुआ अगर उसने उसे न्यूडदेख लिया ? रेवा अपने आप से लगातार, असुविधाजनक सवाल पूछना चाहती थी-जैसे बिल्कुल आँख मिलाकर उस सच को समझ सके,जिसने उसे एक अस्पताल के इस बेड पर ला पटका है. लडकी की देह उसकी अपनी संपत्ति है- इस बात की वह हमेशा से वकालत करती रही. यह उसका हक है कि वह कैसे इसे इस्तेमाल करे. फिर फाँस कहाँ है ? औरत  और मर्द के रिश्तों पर उसने कितनी सारी बहसें की हैं. औरतों पर होने वाली छींटाकशी पर कितना लडी है. उसे याद आया, औरत और मर्द के रिश्तों पर चल रही एक बहस में प्रशांत सर ने राम मनोहर लोहिया को कोट किया था-जोर जबरदस्ती और धोखाधडी के अलावा औरत और मर्द के बीच का हर रिश्ता जायज है’-और यह जानकर हँस पडे थे कि समाजवादियों के बीच के इस बेहद मशहूर जुमले से वह अनजान है. प्रशांत सर ने हँसते हँसते कहा था-समाजवादी लोग इसी सूत्र के दम पर हर रिश्ता एक्सप्लोर करने में लगे रहते हैं और बाद में उसे जस्टीफाई करने में. लेकिन वह न एक्सप्लोर कर रही थी न जस्टीफाई कर रही थी. उसके और इफ्तिखार के बीच जो कुछ हुआ,उसमें न धोखा शामिल था न जबरदस्ती,फिर वह कौन सी चीज है जो उसे खाए जा रही है ?”8

रेवा के मन पर बोझ है. वह इफ्तिखार की पत्नी को धोखा दे रही है, इफ्तिखार की बेटी गुल को धोखा दे रही है .

धोखा है, धोखा तो है ही. बल्कि दो दो धोखे हैं. उसे अब जाकर अपनी पाँस का पता चला. दो लोगों के बीच के रिश्ते सिर्फ दो लोगों के नहीं होते,नहीं हो सकते. उनमें तीसरे का भी एक कंटेक्स्ट होता है.यह तीसरा कोई इन्डिविडुअल भी हो सकता है और पूरी सोसाइटी भी.यह बात उसी बहस में प्रशामंत सर ने कही थी.

रेवा सबा से अपनी बातों को याद करते हुए उन्हीं जख्मों को कुरेदती है जिसके कारण वह अस्पताल में है और जिससे उसे मुक्त होना है. वह रिश्तों की एकनिष्ठता और सेकेंड वुमेन वाली गाली के प्रसंग को भी सोचती है.रेवा और इफ्तिखार और सबा के बहाने आधुनिक स्त्री और परिवार रिश्तों आदि की एकनिष्ठता पर प्रियदर्शन कलम चलाते हैं.यकीनन वे ऐसे रिश्तों के पक्ष में नहीं तभी इफ्तिखार को सबा से माफी माँगने का अवसर तक नहीं देते और कथा में सबा की मौत करा देते हैं. ताकी इफ्तिखार सबा से धोखे की आग में जलता रहे.सबा की मौत उसी आतंकवादी घटना में होती है जिसे पृष्ठभूमि के रूप में प्रयोग में लाया गया है. सबा की मौत और इफ्तिखार का गम आतंकी हमले में मिलकर एक बडे दुख की सृष्टि करता है.

रेवा अपने हिस्से की सजा काटकर लेकिन उस अपराधबोध से जल्द ही निकल भी जाती है और फिर कभी उस तरह के संबंधकी कोई गुजाइश नहीं छोडती.अभि के मिलजाने पर सुलभा के घर पत्रकार मित्रों की बैठकी में वह ऐसे संकेत दे देती है.उसकी नजर इफ्तिखार से मिली और उसने जिस ढंग से उसे देखा, उसी से इख्तिखार को समझ में आ गया कि रेवा आगे यह रिश्ता नहीं रखेगी.9

प्रियदर्शन की इस मायने में तारीफ इसलिए भी करनी होगी क्योंकि उन्होंने स्त्रियों को न सिर्फ संघर्षशील बल्कि जीतता हुआ भी दिखाया है.प्रियदर्शन की स्त्रियों में परिस्थितियों के कारण निराशा भा आती है लेकिन वे जूझती हैं,लडती हैं, जीतती हैं.

न्यूज चैनल्स किसी बडे आदर्श का निर्माण नहीं कर रहे.क्या यह अचानक है कि प्रयदर्शन पूरे उपन्यास में इस प्रश्न से जूझते रहते हैं.सुलभा के पिता का अखबार युग से चैनलों की तुलना करना क्या अचानक आया प्रसंग है.क्या अपनी बेटी से बहस के दौरान उसकी अल्पज्ञता को सामने रखना अचनाक हुआ.प्रियदर्शन सुलभा की अल्पज्ञता को कई छोरों पर विकसित करते हैं.एक एंकर जिसकी कही बातें दर्शकों के लिए ब्रह्म वाक्य सा हो जाता होगा वह एक अखबार पढने वाले बूढे व्यक्ति से हर बहस में हार जाती है.वह जिसे हर विषय का जानकार और एक्सपर्ट समझा जाता है वह किसी भी विषय पर एक अक्षर का ज्ञान नहीं रखती.सुलभा के पिता सिन्हा साहब का बेटी से मीडिया जगत और उसके चरित्र को लेकर हो रही बहस का मूल उद्देश्य यही है.प्रियदर्शन विषयों पर फैसलों की तरह स्टैंड लेते पत्रकारों की सीमाओं को दिखाना चाहते हैं.

सिन्हा साहब न्यूज देखने की जगह अखबार पढने में ज्यादा सुकुन पाते हैं.बेटी से बात करते वक्त वे ज्यादा ठहराव लिए एक गंभीर व्यक्ति दिख भी रहे हैं.उपन्यासकार न्यूज चैनल्स की भागती लेकिन अगंभीर दुनिया को सामने लाता है.

सुलभा पुलिस वालों के साथ जब अभि की खोज में जाती है तब उसे कई सारी जमीनी सच्चाईयों का पता चलता है जिनपर संवाददाता के रूप में वह बिना जाने ही एक्सपर्ट की तरह राय देती,फैसले सुनाती.शीला के पति को बिना बात पीटता पुलिस वाला सैनी के सामने हाथ बाँधे खडा रहता है.सुलभा का पत्रकार हृदय इस मुद्दे पर तिलमिला जाता है.वह लेकिन चुप रहना उचित समझता है क्योंकि फिलहाल अभि की तलाश करनी है और ये पुलिसवाले ही सहायता कर सकते हैं.
चैनलों के कर्ता धर्ता, उसके मालिक, चैनल की विचारधारा, उसके अपराधियों से साठगाँठ आदि बीसियों विषय हैं जिन्हें प्रियदर्शन ने गंभीरता से डील किया है. एक जगह प्रियदर्शन नैरेट करते हैं-
"इनके यहाँ भव्य शादियाँ होती हैं. इनकी भव्य अट्टालिकाओं की चर्चा होती है. लेकिन इस बात की चर्चा नहीं होती कि ये लोग कितने सारे कानून तोडते हैं और मिलेनियर बन जाते हैं.

विशाल और तन्मय ने फिर एक दूसरे को देखा. फफूंद की तरह उगते टीवी चैनलों से वे खूब परिचित थे. पेट्रोल पंप के मालिक,चिटफंड वाले, बिल्डर सब स्कूल और टीवी चैनल खोल रहे हैं. उन्हें मालूम है चैनल खोल देने के बाद उनके काले धंधों पर कोई सवाल नहीं उठाएगा. विशाल को प्रशांत का एक लेख याद आया...प्रशांत ने लिखा था कि पिछले दो दशकों में भारत का औद्योगिक विकास उसका अपराधिक विकास भी है. सारे संदिग्ध और दुस्साहसी किस्म के लोग नेताओं और अफसरों से गठजोड कर, पुलिस और प्रशासन को साथ लेकर तरह तरह के धंधों, ठेकों, सौदों में लगे हुए हैं और अमीर हुए जा रहे हैं. यह अमीरी अब पैसे से पैसा बना रही है. यही बदमाश लोग अब सिखा रहे हैं कि देश तरक्की कैसे करेगा,बीसवीं सदी की ताकत कैसे बनेगा.

प्रियदर्शन उपन्यास में प्रशांत को प्रतिनिधि की तरह प्रस्तुत करते हैं.प्रशांत मीडिया बल्कि कहना चाहिए इस नव मीडिया का क्रिटिक है.वह मूल्यवादी युग का व्यक्ति है जो बाजारवादी, जातिवादी युग में जीने को अभिशप्त है.चैनल के सारे पत्रकार,संवाददाता और एंकर्स उसकी पनाह में मानसिक शांति पाते हैं. यकीनन उपन्यास का पाठक भी नव मीडिया के भागते चरित्र से इतना तंग आ गया है कि उसे भी प्रशांत में एक छाँह दिखती होगी. प्रशांत हमेशा घबडाए वक्त को अपनी समझ और दूरदृष्टि से परिभाषित करता है, रास्ता दिखाता है. 
प्रशांत हल्के से मुस्कुराए, तन्मय, इस देश का पूरा यथार्थ-माफ करना मैं एक पिटे हुए पत्रकार की तरह बोल रहा हूँ. तुमलोग जिसे डाउन मार्केट कहते हो-तो इस देश का पूरा यथार्थ इतना नाटकीय है है कि उस पर विश्वास नहीं हो सकता.... ...जो बहुत चमचमाती हुई दुनिया है,उसके पीछे एक बजबजाता हुआ संसार है. दोनों दुनियाओं का काम एक दूसरे के बिना नहीं चलता....और दोनों दुनियाएँ एक-दूसरे के अपराधों से परिचित रहती हैं,लेकिन खामोश रहती हैं-बल्कि कई बार एक-दूसरे की मददगार होती हैं... ...और तुमको तो पता ही नहीं चलेगा कि तुम किस दुनिया में हो, कि इस चमचमाति हुई दुनिया का एक साफ-सुथरा किरदार दरअसल उस बजबजाती दुनिया को नियंत्रित करता है,बल्कि उसे वैसा ही बनाए रखता है.....10


मीडिया के लिए टीआरपी ज्यादा जरूरी है, समाज या संवेदनशीलता नहीं. भारत टीवीइस खेल को खूब समझता था. बाकी बात बेकार है. याद है, दो साल पहले प्रिंस जब गडढे में गिरा था और जी न्यूज उसके पीछे खडा हो गया था,तब उस हफ्ते वो टीआरपी में चौथे से पहले नंबर पर चला आया था.11


प्रशांत मीडिया की बडी जिम्मेदारी में विश्वास करने वालों में है. वह कहता हैदूसरी कंपनियों में पैसा लगाने वाले आमतौर पर कंपनियों के प्रोडक्ट के चरित्र को बदलने की कोशिश नहीं करते.लेकिन मीडिया में जो पैसा लगाता है,वह चाहता है, मीडिया उसकी जरूरतों के हिसाब से चले. उसके हितों की रक्षा करे. इसके अलावा पत्रकारिता को वह अपनी कंपनी की पीआर एक्सरसाइज की तरह इस्तेमाल करना चाहता है. कभी नौकरी की मजबूरी में, कभी आगे बढने की महत्त्वाकांक्षा में,या कभी किसी और दबाव या प्रलोभन में पत्रकार भी जाने अनजाने दलाल बन जाते हैं.12

सुलभा विशाल से कहती हैजानते हो विशाल, जब मैं उस रात न्यूज पढ रही थी-मुंबई वाली खबर आई ही थी-उसी के बीच, मेरे दिल में अजीब सा ख्याल आया था. हम जो खबरें दिखाते हैं, उसके पीछे कौन होता है ?दरअसल मैं न्यूज पढते हुए एक ट्रिक आजमाती हूँ.जब कोई बहुत इमोशनल बना देने वाली खबर आती है जब लगता है रोने लगूँगी तो अचानक मैं मशीन बन जाती हूँ.सोचना बंद कर देती हूँ और जो लिखा हुआ मिलता है,उसके मायने भूल बोलती चली जाती हूँ. अगर न करूँ तो न्यूज ही न पढ पाऊँ.तो उस दिन न्यूज पढते-पढते मुझे लगा था कि जो सासाएटी में गोलियाँ चला लरहा है,वह आदमी नहीं है,मशीन है.वह भी मशीन है और मैं भी मशीन हूँ.फिर मैंने सोचा कि हम दोनों को कौन चला रहा है ?और कौन जाने हमें जो चला रहा है वह भी मशीन हो ?और ये भी ख्याल आया कि पता नहीं हम दोनों के पीछे कौन सी ताकतें हैं और क्या पता...13

प्रशांत भी सुलभा से सहमत होते हुए पूँजी और अपराध के तंत्र पर अपनी राय रखता है  
“.....जो अमेरिका तालिबान को खडा करता है,वही पाकिस्तान को उससे लडने के लिए पैसे भी देता है.जो पाकिस्तान अमेरिका के पैसों पर तालिबान से लडने की बात करता है वहीं से भारत में टेरेरिस्ट भी दाखिल होते हैं.तुमको पता है,इस हमले में कई अमेरिकी भी मारे गए हैं ? कुल मिलाकर यह अजीब सा खेल है जिसमें किसकी डोर किसके हाथ में बँधी है,यह समझना आसान नहीं है.14

उपन्यास पर यह भी आरोप है कि वह आतंकवाद के मसले पर बोल्ड नहीं,प्रियदर्शन का पात्र प्रशांत डंके की चोट पर अमेरिका को तालिबान को खडा करने वाला कहता है लेकिन पाकिस्तान को आतंकवाद को खडा करने वाला न कहकर पाकिस्तान से भारत में टेरेरिस्ट दाखिल होते हैं’,वाक्य का प्रयोग करता है.एक खास तरह की मानसिकता के लिए बीजेपी को तो दोष देता है लेकिन भारतीय राजनीति में कोई घोषित मानक के बगैर मायावती की बार बार तारीफ करता है.

हो सकता है कि भारत में राष्ट्रवादी चिंतन का इनदिनों इतना दबाव है कि उसकी बोल्ड लाइन्स को उक्त चिंतन अपने हक में प्रयोग में न ला दे इसके डर से वे बोल्ड नहीं हो रहे हों.वे जानते हैं भारत में देशभक्ति और राष्ट्रवाद के पक्षधर एंटी मुस्लिम या एंटी दलित होने के बहाने खोजते रहते हैं.प्रियदर्शन मीडिया में मौजूद सवर्णवादी मानसिकता को काउंटर कर रहे हैं इसलिए उनका वैसा रुख जायज लग सकता है.वे अमेरिका की तरह पाकिस्तान का नाम नहीं ले सकते क्योंकि यहाँ पाकिस्तान के नाम को अलग संदर्भों में लिया जा सकता है,बाटला हाउस एनकाउंटर प्रसंग की चर्चा जानबूझकर की गई है,उस सन्दर्भ में इफ्तिखारनाम की चर्चा जानबूझकर की गई है.

लेकिन मुद्दा यह है कि आतंकवाद पर हो रही तमाम बहसों को केवल पाकिस्तान तक सीमित करने वाली विचारसरणी क्या आतंकवाद का हल चाहती है ? क्या उपन्यास में पाकिस्तान को विलेन के रूप में प्रस्तुत कर देने भर से उपन्यासकार की निष्ठा निर्दोष दिखने लग जाती ? क्या एक रचनाकार अपनी विराट प्रतिबद्धताओं के आलोक में देखे जाने की जगह किन्हीं कट्टर मानकों के आधार पर रिजेक्ट किया जाना चाहिए ? प्रियदर्शन देश की राजनीति से परिचित हैं और उस राजनीतिक सन्दर्भ में उनके किसी कथन का कैसा अर्थ निकाला जा सकता है उससे भी.इसलिए उनके प्रयोग सटीक हैं.वे भारतीय सन्दर्भों में उपन्यास रच रहे थे,उन्हें ज्यादा सचेत होने की आवश्यकता थी,वे सचेत हैं भी.

उपन्यास स्त्री और कमजोर वर्ग की स्थिति का भी चित्रण करता है

प्रियदर्शन का मूल उद्देश्य ही दूसरा है. वे आज के समय को व्यापक तौर पर प्रकट करना चाहते हैं.वे किसी 26/11 पर कोई सनसनीखेज लुग्दी नहीं लिख रहे थे.वे परवर्ती पूँजीवादी समय की उलझनों को पाठकों के समक्ष खोलना चाहते हैं.वे 26/11 की पृष्ठभूमि का इस्तेमाल कर असल में समाज की कलई खोलते हैं.वे चैनलों पर तेज तर्रार और मजबूत दिखने वाली स्त्रियों की असल स्थिति दिखाना चाहते हैं.पुंसवादी व्यवस्था में शीला और सुलभा कैसे एक ही बर्ताव को जीती हैं और चारू या रेवा की मनःस्थितियाँ हों या शबा की त्रासदी,उन्होंने इस नए नौकरीशुदा युग में जब स्त्री की आजादे के नारे आम हैं,में स्त्री को लेकर बोले जा रहे झूठोंका पर्दाफाश किया है.स्त्री के लिए लोकतंत्र की तलाश अभी हुई नहीं है.स्त्रियाँ नारों के स्तर पर जो दिखाई जा रही हैं असल में उससे कोसों दूर हैं. असल जिन्दगी में वे जहन्नुम जी रही होती हैं. स्त्री का एकमात्र शेल्टर सामंती सेटअप है. अपनी हर समस्या के बाद नौकरी छोड घर में बैठ जाऊँगीजैसे वाक्य सुलभा भी बोलती है, शीला भी. यह सिचुएशन की भयंकरता से त्रस्त स्त्रीका रिएक्शन है. वे समस्याओं से लडने की जगह बार बा घर बैठ जाने की सोच इसलिए लाती हैं क्योंकि पुंसवादी समाज सार्वजनिक जगहों और जीवन को स्त्रियों के सहज स्थिति उत्पन्न नहीं करा पाता.अपने लिए असहजता के कारण ही वे सामंती सेटअप की ओर भागना चाहती हैं.यह पुंसवाद का प्रेशर है.

शीला के साथ पुलिस वाले रेप करना चाहते थे.अगर शीला ने मुस्तैदी नहीं दिखाई होती,तो शायद उसका रेप हो जाता.यादव अपने पुलिसिया रौब के कारण सुलभा की बातों से अपमानित महसूस करता है.वह एक स्त्री से डाँटे जाने को बर्दाश्त नहीं कर सकता.चारू का चुलबुलापन हो या सुलभा का तेज व्यक्तित्व विलोम में खडे वर्ग को नहीं भाता.उन्हें स्त्री कुचलने, मसलने वाली वस्तुलगती है. सुलभा का बोल्ड चरित्र, समस्याओं से निकलकर दिप्त करता चरित्र सत्य लगता है. सुलभा पत्थर की बनी पात्र नहीं, वह एक मिट्टी की बनी, पुंसवादी समाज में जन्मी, पली बढी एक स्त्री है जो लडकर अपना हक लेना जानती है.

कुलमिलाकर प्रियदर्शन एक ऐसा नैरेटिव रच रहे थे जो शहरों की नई अपराध जिन्दगी के बीच जीवन की तलाश करते आमलोगों की जीवटता को प्रकट कर सके.जिन आमलोगों में आशा है,उम्मीद है और जो बडी से बडी व्यवस्था के साए में अपने लिए जीवन की रोशनी ढूँढ लेते हैं.नया समाज एक अपराधी व्यवस्था है.पुलिस,पत्रकार,बिल्डर,नेता सब उस बडे अपराध की कडी हैं और जिन्दगी-लाइवउस अपराध का मेटा नैरेटिव.यह उपन्यास पढा जाना चाहिए.
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सन्दर्भ
1.प्रियदर्शन,’जिन्दगी-लाइव’,प्रथम संस्करण,2016,जगरनाट बुक्स,नई दिल्ली पृ 245
2.वही, पृ245
3.वही, पृ245
4.वही, पृ245
5.वही, पृ217
6.वही, पृ75
7.वही,पृ222
8.वही, पृ186
9.वही, पृ246
10.वही, पृ216
11.वही, पृ83
12.वही, पृ217
13.वही, पृ217-218
14.वही, पृ218
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आदित्य कुमार गिरि
पीएचडी शोधार्थी,कलकत्ता विश्वविद्यालय
जूनो इनक्लेव, फर्स्ट फ्लोर,फ्लैट नम्बर-1डी,
118,डीपीजेएम रोड,बजबज, कोलकाता-7000137
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