सहजि सहजि गुन रमैं : खगेन्द्र ठाकुर

Posted by arun dev on नवंबर 10, 2016

(खगेन्द्र ठाकुर : फोटो मुसाफ़िर बैठा के सौजन्य से)










खगेन्द्र ठाकुर (९-सितंबर,१९३७) : 
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अविभाजित बिहार (अब झारखण्ड) के गोड्डा के एक गाँव में जन्म. प्रगतिशील लेखक संघ से जुड़ाव और राजनीतिक सक्रियता. जनशक्तिअख़बार की पत्रकारिता. देह धरे को दण्ड’, ‘ईश्वर से भेंटवार्ताजैसी व्यंग्य पुस्तकों के साथ तीन कविता संग्रह सहित आलोचना और लेखों की कोई 20-21 पुस्तकें प्रकाशित.

पर उनका कविरूप अलक्षित ही रहा है. इसका एक बड़ा कारण आलोचक के रूप में उनकी ख्याति है.

जमीन से जुड़ी, जीवट और ज़िदादिली से भरपूर ये कविताएँ हमारे अपने समय की ही कविताएँ हैं. 

सात कविताएँ आपके लिए .  

     
  



खगेन्द्र ठाकुर की कविताएँ       




वे लेखक नहीं हैं

वे लिखते हैं
लेकिन कागज पर नहीं
वे लिखते हैं धरती पर

वे लिखते हैं
लेकिन कलम से नहीं
वे लिखते हैं
हल की नोंक से.

वे धरती पर वर्णमाला नहीं
रेखाएं बनाते हैं
दिखाते हैं वे
मिट्टी को फाड़ कर
सृजन के आदिम और अनंत स्रोत

वे तय करते हैं
समय के ध्रुवांत
समय उनको नहीं काटता
समय को काटते हैं वे इस तरह कि
पसीना पोछते-पोछते
समय कब चला गया
पता ही नहीं चलता उन्हें  

वे धरती पर लिखते हैं
फाल से जीवन का अग्रलेख
वे हरियाली पैदा करते हैं
वे लाली पैदा करते हैं
वे पामाली संचित करते हैं
शब्दों के बिना
जीवन को अर्थ देते हैं
ऊर्जा देते हैं, रस देते हैं, गंध देते हैं,
रंग देते हैं, रूप देते हैं
जीवन को वे झूमना सिखाते हैं
नाचना-गाना सिखाते हैं
लेकिन वे न लेखक हैं
और न कलाकार
वे धरती पर
हल की नोक से लिखते हैं
उन्हें यह पता भी नहीं कि
लेखकों से उनका कोई रिश्ता है क्या?
उन्हें कोई सर्जक क्षमता है क्या?






ज्योति का अक्स

झरोखे के चौकोर से लगा तुम्हारा चेहरा,
और प्रतीक्षारत सजल आँखें तुम्हारी,
इधर मेरा द्विधाग्रस्त अस्तित्व
दोनों के बीच फैलता हुआ है
भयानक, खूंखार सघन जंगल.

मैं जो पगडण्डी नाप रहा हूँ
वह जंगल से होकर गुजरती है
भरा हुआ है जो हिंस्र जंतुओं से
लेकिन कोई बात नहीं चिंता की,
मुझे मालूम है
यह पगडण्डी जंगल से बाहर गयी है
जाहिर है मैं भी जाऊंगा

कदम-कदम पार करेंगे हम जंगल,
मेरे साथ है तुम्हारी आँखों की ज्योति
और उस ज्योति का अक्स मेरी चेतना में
फिर तो कोई बात नहीं.








धुआँ उठने को है

खूब उगलो ताप
ढेर-ढेर फेंको आग
ओ सूरज!
जल गये आसमानी बादल, 
तलैयों के प्राण गये,
धरती की कोख जली, 
जल-जल कर बिदक गयी
फसलों की हरी- भरी क्यारी!
और जलें, 
तुम्हें जीवन करें अर्पित सभी
पशु-पक्षी और आदमी
बराबर हैं सभी अब.
कायम करो ऐसे ही समता का राज, 
अर्पित हैं सभी तुम्हारे प्रताप को, 
सह नहीं पाते थे आग
ओ सूरज!
इनके पेट की आग
उग्रतर हैं तुम्हारे प्रताप से, 
खूब उगलो ताप, 
लाख फेंको अग्निवाण,
ये नहीं सहेंगे अब आग.
धुआँ पेट की आग का, 
धुआँ जीवन के अरमानों का
उठने को है, 
तुम्हारे प्राणघाती किरणों पर छाने को है.







हम काले हैं

हाँ, हम काले हैं
काला होता है जैसे कोयला
जब जलता है तो 
हो जाता है बिलकुल लाल
आग की तरह
गल जाता है लोहा भी
जब उसमें पड़ जाता है.
हाँ, हम काले हैं
काला होता है जैसे कोयला
जब जलता है तो 
हो जाता है बिलकुल लाल
आग की तरह
चमड़ी खींच लेता है
जब कहीं कोई भिड़ता है.
हाँ, हम काले हैं
काला होता है जैसे बादल
जब गरजता है तो 
बिजली चमक उठती है
कौंध जाती है
जिससे दुनिया की नजर.
हाँ, हम काले हैं
काली होती है जैसे चट्टान
फूटती है जिसके भीतर से
निर्झर की बेचैन धारा
जिससे दुनिया की प्यास बुझती है.
हाँ, हम काले हैं
काली होती है जैसे मिट्टी
जब खुलता है उसका दिल
तो दुनिया हरी-भरी हो उठती है.
जब जलता है तो 
हो जाता है बिलकुल लाल.





पुरानी हवेली

इस हवेली से
गाँव में आदी-गुड़ बंटे
सोहर की धुन सुने
बहुत दिन हो गए

इस हवेली से
सत्यनारायण का प्रसाद बंटे
घड़ी-घंट की आवाज सुने
बहुत दिन हो गए

इस हवेली से
किसी को कन्धा लगाए
राम नाम सत है- सुने
बहुत दिन हो गए

इस हवेली की छत पर
उग आई है बड़ी-बड़ी घास
आम, पीपल आदि उग आये हैं
पीढ़ियों की स्मृति झेलती
जर्जर हवेली का सूनापन देख
ये सब एकदम छत पर चढ़ गए हैं.

इस हरियाली के बीच
गिरगिटों, तिलचिट्टों के सिवा
कोई नहीं है, कोई नहीं है.





हिन्दू हम बन जाएंगे

सूखा पड़ गया
फसल मारी गयी
बादल निकले बेवफा
मौसम है कसूरवार.

बाढ़ आ गयी
गाँव दह गए
लहलहाती फसल बह गयी
कोई क्या कर सकता था?
नदियाँ हो गयी थीं पागल.

खाने की चीजें हो गयीं भूमिगत
महंगाई चढ़ी आसमान
लोग दौड़ते हुए परेशान
बोले देश के मंत्री प्रधान
इसके लिए है जवाबदेह आसमान

हतप्रभ है सुन कर जनता
बाग-बाग हैं अपने लोग
अटल जी हैं एकदम लाजवाब
नेता हो तो ऐसा हो
क्या कहने हैं – अजी वाह

उधर मुस्का रहा है प्याज
गदगद है जमाखोर समाज
पता नहीं कहाँ गया नमक
लापता है चेहरे की चमक
जनता करने लगी आह
अजी अटल जी वाह-वाह

कोई बात नहीं प्रधान जी
गीत भारतीय संस्कृति के गाइए
मुनाफाखोरों को कष्ट नहीं दीजिए
हम भी करते हैं प्रतिज्ञा
हिन्दू हम बन जाएँगे
प्याज नहीं खाएँगे
एकादशी हर रोज करेंगे
नमक आपसे नहीं मांगेंगे.

अटल रहे आपका व्यापार
अटल हों करें गगन-विहार
करे न कहीं कोई भी आह
अजी अटल जी वाह-वाह.



रक्त कमल परती पर

यहाँ, वहां हर तरफ
   उठे हैं अनगिनत हाथ
हर तरफ से अनगिनत कदम
   चल पड़े हैं एक साथ
ये कदम चले हैं वहां
   बीहड़ पर्वत के पार से
ये कदम चले हैं
   गहरी घाटी के अंधियार से
पहाड़ों पर दौड़ कर
   चढ़े हैं ये मजबूत कदम
धुएं की नदी पार कर के
   बढ़े हैं ये जंगजू कदम
रोशनी के बिना
   घोर जंगल है जिन्दगी जहाँ
ये कदम बना रहे हैं
   किरणों के लिए द्वार वहां
अनगिनत हाथ
   उठे हैं जंगल से ऊपर
ये हाथ उठे हैं
   पूँजी के दानव से लड़ कर
ये हाथ हैं जो
   कोयले की आग में तपे हैं
लोहे जैसा गल कर जो
   इस्पात-से ढले हैं
इन हाथों ने
   अपनी मेहनत की बूंदों से
सजाया है
   पथरीले जीवन को फूलों से
हमने देखा हर हाथ
   यहाँ एक सूरज है
हर कदम यहाँ
   अमिट इतिहास-चरण है
इन्होंने गढ़ डाला है
   एक नया सूरज धरती पर
उगाये हैं यहाँ अनगिन

   रक्त कमल परती पर.

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विकल्प की प्रक्रिया; आज का वैचारिक संघर्ष मार्क्सवाद; आलोचना के बहाने; समय, समाज व मनुष्य, कविता का वर्तमान, छायावादी काव्य भाषा का विवेचना, दिव्या का सौंदर्य, रामधारी सिंह ‘दिनकर’ : व्यक्तित्व और कृतित्व (आलोचना)
धार एक व्याकुल; रक्त कमल परती पर (कविता संग्रह)आदि  पुस्तकें प्रकाशित
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