परख : एक और ब्रह्मांड : अरुण माहेश्वरी

Posted by arun dev on अगस्त 04, 2016





एक और ब्रह्मांडख्यात लेखक अरुण माहेश्वरी की कृति है, यह इमामी समूह के संस्थापक श्री राधेश्याम अग्रवाल के जीवन पर आधारित है. पर यह जीवनी नहीं है और इसे उपन्यास भी नहीं कहा गया है. इसे शानदार ढंग से राधाकृष्ण प्रकाशन ने प्रकाशित किया है.

हिंदी में किसी व्यावसायिक व्यक्तित्व पर यह आदमकद रचना है. यह इतना रोचक, अप्रत्याशित, और रहस्यों से भरपूर है कि इसे एक उपन्यास की तरह पढ़ा जा सकता है. अरुण माहेश्वरी ने इसे रचते हुए तमाम समकालीन विमर्शों के साथ मुठभेड़ किया है. यह कृति बौद्धिक चुनौती भी पेश करती है.

उद्योग और प्रबन्धन से अपरिचित पाठक इसे पढ़ते हुए सहजता से अपनी समझ विकसित करता चलता है. पूंजी और उत्तर पूंजीवाद के इस दौर में एक अदने से मनिहारनका भारत के २०० अमीरों में शामिल हो जाना वास्तव में एक नए ब्रह्मांड का सृजन है.

३७० पेज में फैले इस आख्यान में कोलकाता के पतनशील सामन्ती समाज और उदीयमान व्यवसायी वर्ग के संघर्ष हैं, राधेश्याम अग्रवाल का मित्र राधेश्याम गोयनका से लम्बा चला संग साथ है, इमामी समूह के विशालकाय होते जाने की कथा है. बिडला समूह से रिश्ते, हिमानी, झंडू आदि तमाम कम्पनियों के अधिग्रहण आदि के तमाम दांव पेंच हैं. आमरी (हास्पिटल) का दर्दनाक अग्निकांड है.

गरज की यह भारत में उद्यमशीलता की गाथा है. इसे जरुर पढ़ा जाना चाहिए. पूंजी को समझने के लिए भी और एक आधुनिक समाज के निर्माण में वाणिज्यक समाज के योगदान को जानने के लिए भी.

सरिता शर्मा की समीक्षा


पूंजी, पूंजीवाद और उत्तर पूंजीवाद : तलघर                                
सरिता शर्मा

साहित्य में जीवनी-लेखन की समृद्ध परंपरा रही है.  यूनानी जीवनीकार प्लूतार्क की कृति में यूनान, रोम और फारस के  विशिष्ट और यशस्वी व्यक्तियों के जीवन वृत्तांत दिये गये हैं. सुकरात की जीवनी  ‘अनाबासिस सुकरात’ उनके शिष्य जनोफोन ने लिखी. चीन में स्सु-मा चिएन ने अपने समकालीन विशिष्ट व्यक्तियों की जीवनियां लिखी. जेम्स बासवेल द्वारा लिखित सेम्युअल जान्सन की जीवनी अंग्रेजी जीवनी-साहित्य में एक महत्वपूर्ण घटना है. मशहूर डच चित्रकार वान गॉग पर इरविंग स्टोन के उपन्यास `लस्ट फार लाइफ को श्रेष्ठ माना जाता है. हाल में वाल्टर इसाक्सन द्वारा स्टीव जॉब्स पर लिखी किताब बेस्टसेलर बन गयी है. उद्योगपतियों की जीवनियों में हेनरी फोर्ड की `माइ लाइफ एंड वर्क और रॉकफेलर की जीवनी `टाइटनमशहूर हैं. भारतीय उद्योगपतियों में जमशेदजी टाटा की दो जीवनियां, डी.सी.एम समूह के श्रीराम, खुशवंत सिंह, अरुण जोशी और  जी.डी. बिड़ला की जीवनियां आई हैं. 

हिंदी में ‘कलम का सिपाही और आवारा मसीहा जैसी श्रेष्ठ जीवनियां लिखी गई हैं. अरुण माहेश्वरी की पुस्तक ‘एक और ब्रह्मांड’  इमामी और झंडू जैसी विख्यात कंपनियों के मालिक राधेश्याम अग्रवाल की जीवनी है. यह पुस्तक राधेश्याम अग्रवाल के बहाने देश में आधुनिक व्यापार और उद्योग के जन्म और विकास का दिलचस्प वृतांत प्रस्तुत करती है. राधेश्याम अग्रवाल की गिनती भारत के दो सौ सबसे अधिक अमीर लोगों में की जाती है.


उन्होंने अपनी जीवनी  हिंदी में लिखवाने के बारे में लिखा है- मैंने जो जीवनियां पढ़ी, उनमें से अधिकांश अंग्रेजी में हैं. ये जीवनियां समाज के संभ्रांत वर्ग के लिए ठीक हैं, मगर जिन्हें अंग्रेजी नहीं आती, उनके लिए बेकार हैं. हमारे देश के सत्तर प्रतिशत लोग हिंदी जानते हैं. इसलिए मैंने फैसला लिया कि मेरी जीवनी आम आदमी की भाषा में लिखी जाएगी. कई लोगों ने मेरी जीवनी लिखने में दिलचस्पी ली, पर मैं ऐसे व्यक्ति से लिखवाना चाहता था जो जीवनियां लिखता रहा हो और जिसका हिंदी भाषा पर अधिकार हो. अरूण माहेश्वरी इस कसौटी पर खरे उतरे.

पुस्तक के आरंभ में  ‘जीवनी लेखन की मेरी समझ’ में अरुण माहेश्वरी लिखते हैं- यदि हम साहित्य के इतिहास को देखें तो पाएंगे कि एक साधारण, सपाट और नीरस जीवन को भी जब उसकी द्वंद्वात्मकता के साथ गहराई से पेश किया जाता है तो वह इतने रोमांच, विस्मय और विचारों के उद्रेक का हेतु बन जाता है कि पाठक सदियों तक उसमें डूबता-उतराता, अपने को संस्कारित करता चला जाता है. किसी भी महान साहित्य के अविस्मरणीय चरित्र, जीवन के वास्तविक चरित्रों की सच्चाइयों से ही निर्मित होते हैं. लेखक की कल्पनाशीलता, उसके ज्ञान और इतिहास-बोध की भी ऐसे चरित्रों के सृजन में बड़ी भूमिका होती है.’ लेखक के लिए तटस्थ रहकर जीवनी लिखना आसान नहीं होता. अरुण महेश्वरी मानते हैं- ‘सच से सुन्दर कुछ नहीं होता. श्रेष्ठ अमर जीवनी एक जीवंत, वास्तविक और कर्मोद्दम जीवन का साहसपूर्ण आख्यान होती है. तमाम ऊंच- नीच के बीच बनती आदमियत की पहचान होती है.’
 
अरुण माहेश्वरी
     
इस पुस्तक में बीस हजार रुपए से बीस हजार करोड़ रुपए तक की पूंजी के सफर के बारे में बताया गया है. मानव जीवन के वैचारिक द्वंद्व, बंगाल में कम्युनिस्ट शासन के दौर की साम्यवादी व्यवस्था में पूंजीवाद के तालमेल और तर्क को दर्शाया गया है. राधेश्याम अग्रवाल और उनके अभिन्न मित्र और समूह के को-चेयरमैन राधेश्याम गोयनका और श्री अग्रवाल की पत्नी उषा अग्रवाल के व्यक्तित्व पर भी प्रकाश डाला गया है. उद्योगपतियों के जीवन में असुरक्षा और  कदम -कदम पर जोखिम को विशेष रूप से उभारा गया है. धज बीकानेरमें  मारवाडिय़ों के व्यवसाय कौशल को रेखांकित करते हुए रेखांकित किया गया है. राधेश्याम के पिता वंशीलाल कंदोई  के बारे में बताया गया है -‘आने के साथ ही रंग के कारोबार में हाथ लगाया और खराब रंग ने भी सोने का भाव दिया. तत्काल हार्डवेयर के आयात का काम भी शुरू हो गया.

अपने समुदाय का ध्यान ये लोग कैसे रखते हैं, इसका भी उल्लेख है—‘वंशीलाल फलाने से देनदारी की फरदी लेकर नोटों की गड्डी के साथ बैठ जाता और फलाने का देना चुकाकर उसकी लाज ढांपता. राधेश्याम में परिवारगत संस्कार तो थे ही, कमाल की व्यावसायिक सूझबूझ भी थी. राधेश्याम ने दवाई कंपनी फ्रैंकरौस को आर्थिक संकट से उबारा, तो व्यवस्था राजेंद्र कुमार के हाथ में ही रहने दी, परंतु आगाह कर दिया—‘मैं कभी नहीं चाहूंगा कि इस कंपनी में ऊंचे वेतन के कर्मचारी भरे जायें. अगर ऐसा किया गया तो इसकी छोटी-छोटी दुकानों को मुनाफे पर चलाना असंभव होगा. विज्ञापन गुरु ऐलक पद्मसी ने इमामी क्रीम, टेलकम पाउडर, बोरोप्लस और नवरत्न तेल को सफलता के शिखर पर पहुँचाया. जब राधेश्याम अग्रवाल ने पुरुषों के लिए गोरेपन की क्रीम का उत्पादन करने की बात की, तो ऐलक पद्मसी ने ‘फेयर एंड हैंडसम’ का प्रचार शाहरुख़ खान से कराकर उसे बाजार में उतार दिया. ‘पेन रिलीफ’ क्रीम का नाम बदल कर ‘फ़ास्ट रिलीफ’ करने के पीछे भी ऐलक पद्मसी का दिमाग थाअमिताभ बच्चन, माधुरी दीक्षित, रवीना टंडन, करीना कपूर ने इमामी के विज्ञापन किये. राधेश्याम अग्रवाल की राय में- ‘आम जनता तक जाना है तो सितारों को साथ लाना ही होगा.’
    
पुस्तक में राधेश्याम अग्रवाल की प्रबंधकीय कुशलता के साथ- साथ  उनके मानवीय पक्षों को भी उजागर किया गया है. बिरला समूह द्वारा राधेश्याम अग्रवाल को स्मार्ट न दिखने पर रिजेक्ट किया जाना और अंततः उनकी प्रतिभा के बूते पर न सिर्फ नियुक्त कर देना, बल्कि आदित्य बिड़ला का चेहता बन जाना राधेश्याम अग्रवाल के व्यक्तित्व की सुदृढ़ता का परिचायक है. आदित्य बिड़ला से उन्होंने कंपनियों के अभिग्रहण और विलयन की विद्या सीखी. मजदूरों की समस्याओं पर इमामी समूह में विशेष रूप से ध्यान दिया जाता है. हर माह एक बार मालिक और मजदूरों की बैठक होती है जिसमें काम की परिस्थितियों, मजदूरों के वेतन, बढ़ोतरी और सभी कानूनी अधिकारों के बारे में फैसले लिए जाते हैं. चालीस सालों में एक बार भी काम बंद नहीं हुआ है क्योंकि मजदूर ही कमेटी और उसके अध्यक्ष को चुनते हैं. मजदूरों की आमदनी में वृद्धि को अनिवार्यतः उत्पादन में वृद्धि से जोड़ा गया है.

जितना जोखिम उतना लाभ’ के सिद्धांत पर चलते हुए इमामी में विलय के बाद हिमानी के मृतप्राय कारखाने के उत्पादन को चालीस गुणा बढ़ाने वाले राधेश्याम अग्रवाल आधुनिकीकरण और श्रम संसाधनों का समुचित प्रयोग करके चमत्कार करना जानते हैं. झंडू, खाद्य तेल, इमामी ब्रांड, रीयल इस्टेट जैसे बहुआयामी उद्योगों के सफल नियंत्रक राधेश्याम संयुक्त परिवार तथा भारतीय परम्पराओं से जुड़े हैं. राधेश्याम अग्रवाल के बारे में उनके साथी  राधेश्याम गोयनका का कहना है- राधेश्याम गजब की स्मरण शक्ति का धनी, दूरदर्शी, असंभव पढ़ाकू और गहरी अंतर्दृष्टि वाला असाधारण व्यक्ति है. असंभव शब्द उसके शब्दकोश में नहीं है. चुनौतियों में रमता है और मानता है कि कोई पूर्ण नहीं होता. नशा है तो सिर्फ काम का. दूसरों से भी यही अपेक्षा रखता है. इसीलिए कुछ जिद्दी भी है.’

पुस्तक में राधेश्याम अग्रवाल के साथ -साथ उनके कारोबार इमामी की जीवनी है. राधेश्याम अग्रवाल चारटर्ड अकाउंटेंट हैं मगर विपणन और विज्ञापन में गहरी समझ और दिलचस्पी के कारण कंपनी के इन कामों को देखते हैं. राधेश्याम गोयनका बिक्री और वित्त की जिम्मेदारी संभालते हैं. अपने एक साक्षात्कार में राधेश्याम अग्रवाल और राधेश्याम गोयनका ने अपने परिवार के सब सदस्यों का उपनाम ‘इमामीवाला’ रखने की बात की है. जमीन से जुड़े रहने की खासियत उन्हें अन्य धनाढयों से अलग करती है. ‘राधेश्याम अपनी ऊंची उड़ानों कर बावजूद जमीन छोड़ने को तैयार नहीं हैं. सड़क किनारे की दुकान से कुल्हड़ की चाय आज भी उसका शगल है.’ 

अन्दर –महल’ में राधेश्याम अग्रवाल की धर्मपत्नी उषा के जीवन की झलक मिलती है. ‘हर सफल पुरुष के पीछे एक महिला का हाथ होता है.’ यह बात उषा के जीवन से चरितार्थ होती है जिसने अपने शांत और स्थिर स्वभाव से संयुक्त परिवार को जोड़ा हुआ है. अपनी धार्मिक आस्था को उन्होंने डायरी में व्यक्त किया है जिसमें उनका स्वामी राधेश्वर भारती के प्रति भक्तिभाव परिलक्षित होता है. अन्दर महल की अन्य स्त्रियां कारोबार में हाथ बंटा रही हैं. राधेश्याम की पुत्री प्रीति इमामी के नए उत्पादनों को बाजार में लाने और ब्रांडिंग का काम संभाल रही है. बेटों- भतीजों की बहुएं किताबों और कलाकृतियों के काम से जुड़ गयी हैं. ‘चिट्ठियां और द्वय रसायन पाक’ में राधेश्याम अग्रवाल द्वारा राधेश्याम गोयनका को लिखे पत्रों के अंश हैं जिनमें कहीं उलाहना तो कहीं आत्मीयता नजर आती है. कारोबार से जुड़ी समस्याओं की भी उनमें चर्चा की गयी है. कारोबार जम जाने के पश्चात् राधेश्याम अग्रवाल ने स्कूल के दिनों के दौरान साथ पढ़े दोस्तों और बिड़ला ब्रदर्स के सहयोगी मित्रों की मंडली बनाकर हर शनिवार की दोपहर किसी न किसी के घर मिलकर गपशप करते हैं और ताश खेलते हैं. परिशिष्ट में प्रमोद शाह नफीस से बातचीत  राधेश्याम अग्रवाल के विभिन्न पक्षों को उजागर करती है. नौकरों के प्रति उदारता बरतने के बारे में उषा बताती हैं- पूछते रहते हैं कि सब पर कितना ऋण है, सबका ऋण चुकता कर देते हैं.’ राधेश्याम अग्रवाल के कविता संकलन ‘भावधारा’ में उनकी अंतर्यात्रा दिखाई देती है- ‘बांटो- खुशियां बांटो/ मुस्कान बांटो / चेहरे मुस्काएं/ अंतर मुस्काए/ जो देखे/ सो मुस्काए/ अपने लिए न रखो सब बांटो.’   
    
यह पुस्तक इतिहास दृष्टि से लिखी गयी है. बंगालियों के बारे में बहुत दिलचस्प जानकारी दी गयी है कि शिक्षा और प्रचुर धन संपत्ति के बावजूद वे व्यवसाय में क्यों नहीं आये और जो आये वे टिके नहीं. राधेश्याम अग्रवाल ने कोलकाता के चोर बागान इलाके में 48 बी मकान खरीदा जिसके मालिक नीलकंठ मल्लिक का वर्णन बेहद जीवंत है- ‘बंगाल की ‘बाबू’ संस्कृति की तमाम गलाजतों का एक जीता- जागता नमूना. नीलकंठ अपनी सुन्दर पत्नी ज्योत्स्ना को हर रोज हंटर से मारता, खुद को राजा समझता.’ राधेश्याम अग्रवाल ने एक बार नीलकंठ और उसके भाई रवि को मंहगी फ्रेंच सेंट की बोतल भेंट की, तो रवि ने सेंट की पूरी बोतल को अपनी बग्घी के घोड़े की पूँछ पर उड़ेल दिया. जब नीलकंठ ने इमामी कारखाने में काम करने वाली लड़की को छेड़ा, तो राधेश्याम अग्रवाल ने उसे चेतावनी दे दी- ‘आर्डर चलाओ अपने घर में. आगे से अगर कभी ऐसी हरकत की तो ख़बरदार जो हस्र होगा, इसकी कल्पना भी नहीं कर सकते.’ 

इमामी समूह के जीवन में आमरी अस्पताल में आग लगना काला अध्याय है. ‘इसी अस्पताल में मासूम, असहाय रोगियों की मृत्यु का जो अकल्पनीय दर्दनाक दृश्य दिखाई दिया, उसने एकबारगी हिटलर के गैस चेंबर की यादों को ताजा कर दिया. आमरी अग्निकांड राधेश्याम के जीवन में किसी प्रलयंकारी विध्वंस से कम नहीं था.’ यह अस्पताल अभी तक बंद पड़ा है. राधेश्याम के परिवार के कई सदस्यों को जेल जाना पड़ा और अभी तक मुक़दमे चल रहे हैं. लेखक ने व्यापार जगत की अनिश्चितता को चिन्हित करते हुए लिखा है- ‘लालसाएं ही तो इस पूरे युग की प्रमुख चालक शक्ति है. आधुनिकता के जख्मों को भोगना ही इस युग का मूलमन्त्र है.
एक और ब्रह्मांड अत्यंत सार्थक पुस्तक है जो उद्योग-व्यवस्था के संचालन और प्रबंधन से जुड़े तकनीकी पहलुओं को भी बड़े सरल एवं दिलचस्प ढंग से प्रस्तुत करती है. दो परिवारों का मिला- जुला उद्योग स्वयं में एक मिसाल है. पुस्तक के महत्व को रेखांकित करते हुए भूमिका में गिरीश मिश्र ने लिखा है-  ‘यदि कोई आदमी यह जानना चाहे कि देश में आधुनिक व्यापार और उद्योग कैसे पनपे और उसमें जिन लोगों या समुदायों का अहम् योगदान रहा, उन्होंने किन हालात में काम किया, प्रतिकूल परिस्थितियों से कैसे सामना किया तथा डटे रहे, तो अरुण माहेश्वरी की प्रस्तुत पुस्तक पढनी चाहिए.’

आलोक मेहता के अनुसार ‘इस पुस्तक में इतिहास और दर्शन भी आया है. इसका हिंदी में लिखा जाना महत्वपूर्ण है. यह पुस्तक प्रेरणा देने वाली है. ऐसी पुस्तकों को जनसुलभ बनाने की जरूरत है.’ लेखक जगदीश्वर चतुर्वेदी ने इस पुस्तक के बारे में कहा है – ‘कोलकाता के कम्युनिस्ट गढ़ में, जहां हड़तालें आम बात थी, राधेश्याम अग्रवाल ने इमामी समूह को कैसे गढ़ा, यह विस्तार से समझने की बात है.इतिकथन  में अरुण महेश्वरी कहते हैं- ‘क्या राधेश्याम की कहानी किसी असीम अनंत की साधना की, पूंजी के उस ब्रह्म की साधना की ही कहानी नहीं है, जो अविराम गति से फैलते अपने एक और असीम, अनंत ब्रह्माण्ड की सृष्टि कर रहा है.’

पुस्तक की शैली प्रवाहपूर्ण है और लेखक की टिप्पणियां विषयवस्तु को दिलचस्प बना देती हैं. नकारात्मक पक्षों से यथासंभव बचा गया है. उद्योग को सफल बनाने के लिए समय की नब्ज को पकड़े रखने और आगे बढ़ते रहने के जैसे गुरों को सीखने में यह पुस्तक मदद करती है.
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सरिता शर्मा 
1975, सेक्टर-4, अर्बन एस्टेट,
गुड़गांव-122001
मोबाइल -9871948430.
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"कुछ दिन पूर्व एक मित्र ने मुझसे पूछा था कि वह समालोचन की मदद कैसे कर सकते हैं? मैंने उन्हें सुझाव दिया कि क्यों नहीं आप समालोचन में किसी माह प्रकाशित रचनाओं पर अपने किसी की स्मृति में मानदेय प्रदान करें.
ऐसे में जब सहित्य की बड़ी पत्रिकाएं तक अपने लेखकों को मानदेय नहीं दे पाती हैं. समालोचन की यह इच्छा क्यों कर पूरी होती.
पर एक दिन साहित्य के प्रेमी और अध्येता डॉ. दिलीप कुमार गुप्त का संदेश आया कि वह अगस्त महीनें में समालोचन में प्रकाशित सभी रचनाओं पर अपनी माता जी की स्मृति में मानदेय देना चाहते हैं.
और इस तरह से एक ऐतिहासिक शुरुआत के वह सहभागी बन गए. यह अपने तरह की अनूठी पहल है. इसमें आप भी जुड़ सकते हैं."

संपादक