सहजि सहजि गुन रमैं : तुषार धवल (३)

Posted by arun dev on जुलाई 19, 2016















तुषार धवल (जन्म: 22/8/1973, दिल्ली स्कूल आफ इकॉनामिक्स से उच्च शिक्षा) पेंटिग, फोटोग्राफी और ड्रामा में भी सक्रिय हैं. उन्होंने दिलीप चित्रे की कविताओं का हिंदी में अनुवाद किया है. ‘पहर यह बेपहर का’ तथा ‘ये आवाज़े कुछ कहती हैं शीर्षक से दो कविता संग्रह प्रकाशित  हैं. फिलहाल मुंबई में आयकर अपर आयुक्त के पद पर कार्यरत हैं. तुषार की कुछ नई कविताएँ आपके लिए. 


पेंटिग : तुषार धवल


यहाँ कोई नहीं आता

हमने ज़हर पी लिया
सच के अपने हिस्से का
फ़लसफ़े का एक टुकड़ा काटा
और वह छिटक कर वही सेब बन गया
बाग़-ए-बहिश्त का

तुमने हुस्न से जीतना चाहा जब जब
मेरी आँखें भटक गईं तुमसे
और शून्य में खोजने लगीं आकृतियाँ
वहाँ तुम नहीं थीं प्रिये प्यार भी नहीं
और सावन भी नहीं था वसन्त में भीगता हुआ

हमारी दरमियानी ख़लाएँ रद्द हो चुकी हैं
और गिरेबाँ पर लहू की जरीदार कढ़ाई है
इन ठिकानों पर अचानक
एक बियाबाँ आ मिला है
यह भीड़ और चीख का उजाड़ है
जहाँ कोई नहीं आता

कोई नहीं आता अब
इन ऊँचाइयों पर जहाँ हम खड़े हैं
न इन्सान, न सपने, न मासूम कोई उड़ान
यहाँ ख़ुदा भी नहीं आता.

 
अब तय नहीं हो पाता

 बुराइयाँ हैं दुनिया में जब तक

अच्छाइयाँ भी रहेंगी

लड़े गये युद्ध
 मिथकों से निकल कर
सड़कों पर घनघोर होते जायेंगे

अभी जो भ्रूण भी नहीं बने हैं
 वे बच्चे भी
जवानी में मार दिये जायेंगे


खून के चटखारे लगाता

हवस का शहंशाह

हिंसा का चटपटा स्वाद ले रहा होगा

न्याय और सत्य के उसके अपने फलसफ़े होंगे

जिन्हें उसकी ताकत
जनता के यकीन में बदल रही होगी




तब भी लेकिन शहादतें लिखी जा रही होंगी
उसी उफ़ान पर

मर्सिये पढ़े जा रहे होंगे




इस युद्ध में लेकिन यही तय नहीं हो पायेगा कि
अच्छा कौन और बुरा क्या है

और यह कि
मिथकों से आया वह नायक
दरअसल किस तरफ खड़ा है

और कि
देवता सभी स्वर्ग के
 किस ध्वज तले शंखनाद करेंगे



हम वही युद्ध लड़ रहे हैं

जो पहले भी लड़े गये हैं



फ़र्क बस इतना है कि

अब सच के
हजार चेहरे हैं
और
पहचानना मुश्किल कि

इनमें से कौन मेरी तरफ है
और कौन उनकी तरफ.



  
रात के विंड चाइम्स

चाँद पर
धुंध वही
जो हममें हम पर है
तिलस्मी सच सा

जब बागी नींदों के बीच
कुछ कुछ हमारी उमर की रात
एक सपना हौले से उछाल कर लोक* लेती है
रख लेती है आँखों की ओट में
समंदर खिलती उमर के जज़्बात सा

यह मैं हूँ
या रात का चाँद है
सागर है या तुम हो
कुछ कह सकोगी अभी अपनी नींद से अचानक उठ कर
हटा कर उस लट को
जो तुम्हें चूमने की बेतहाशा ज़िद में
तुम्हारे गालों तक बिखर आई है
सुनो वहीं से यह संवाद
हवा सागर और चाँद का
विंड चाइम्स के हृदय से उठती ध्वनि का
सुनो कि इन सबको ढकता यह अधेड़ बादल
कैसे रहस्य का दुर्लभ आकर्षण पैदा करता है
होने के कगार पर नहीं-सा वह
एक चौखट है और उसके पार धुंध है
उस धुंध के पार यह चाँद है
उस चाँद पर हिलोरें मारता सागर है सागर में तुम और तुम में बहती यह हवा
जो मेरे कान में साँय साँय हो रही है
मेरे गालों पर अपने नमकीन निशान लिखती हुई
निर्गुन रे मेरा मन जोगी

यह जन्म है उस क्षण का जब
मौन मात्र बच जाता है

फिर छुपा चाँद का मक्खनी रंग
फिर धूसर उत्तेजित लिपट गया वह नाग उस पर
आते आषाढ़ की इस रात में
फिर कुहक उठी नशे में हवा
और सागर बाहर भीतर खलबल है
साँसों में गंधक का सोता
उठता है
बुलबुलों सा विश्व
मायावी आखेट पर है

रात के इस
नाग केसर वन में
जिसमें मीठी धुन है घंटियों की
हज़ारों विंड चाइम्स बजते हैं
सागर में बादल में चाँद में
मुझमें और
रात के इस पहलू में जहाँ
दुनिया नहीं आ पाती है कभी
जिसके पहले और एकल बाशिंदे
मैं हूँ और तुम हो. 

(बिहार में बोली जाने वाली अंगिका भाषा में 'लोक लेने' का वही अर्थ है जो क्रिकेट के खेल में 'कैच कर लेने' का अर्थ होता है).
 

समय बदला पर 

यह ताकतवरों के हमलावर होने का समय है
और निशाना इस बार सिर पर नहीं
सोच पर है

मैं हमलों से घिरी हुई ज़ुबान का
कवि हूँ जिसके
पन्नों से घाव रिसते हैं
मेरी सोच का वर्तमान
अपनी ज़मीन पर अजनबी हो कर
अनजानी सरहदों में खो गया है
उधार की भाषा नहीं समझ पाती है मेरी बात

सदी दर सदी
वे मारते ही जाते हैं
अलग अलग तरीकों से मुझे
अपनी मुट्ठी में जकड़ लेना चाहते हैं
मेरा आकाश.

जिन्हें मिट जाने का भय है
उनकी प्यासी देवी
मेरी बलि माँगती है हर बार.

न मैं थकता हूँ
न वे
और यह खेल खेलते हुए हम
पिछली सदियों से निकल आये हैं
इस सदी में

समय बदला पर
न जीने की जिद्दी ज़ुबाँ बदली
न ताकत के तरीके.

 
मौन का नेपथ्य

बाजार हुआ कवि
पूँजी के खिलाफ लिखता है
पूँजी चुरा लेती है उसकी कविता
और वह पूँजी के हथकंडे हड़प लेता है
फिर दोनों अमरता की तरफ
साझा कदम बढ़ाते हैं
और उनके चेहरे
अपना विज्ञापन हो जाते हैं

एक स्तम्भित मौन
इन्हें देखता रहता है किसी दूरी से
इन वाचालताओं के बाद भी
कई पन्ने कोरे रह जायेंगे

जो लिखेगा अपने वाजूद का गाढ़ा लहू
अपने असंग में
वह उस मौन का नेपथ्य रचेगा

अभी समय है
अपनी पीठ तय कर लो
जब शोर थकेगा
मौन ही बचेगा
जिसमें देह गिरा कर घुला होगा
उस गाढ़े लहू का निराकार.



वह मसीहा बन गया है  
हत्या के दाग
अब उस तरह काबिज़ नहीं हैं उसके चेहरे पर
उनके सायों को अपनी दमक में
वह धुँधला चुका है
उसकी चमक में
पगी हुई हैं भक्तित उन्वानों की
आकुल कतारें
उसकी दमक में चले आ रहे सम्मोहित लोगों की
भीड़ से उठते
वशीभूत नारे
आकण्ठ उन्मत्त
स्तुतियों की दीर्घ जीवी सन्तानों का मलय गान
उसकी धरती पर बरस रहा है
काली बरसात के मेढ़कों के मदनोत्सव पर

किसी नव यौवना की अंगभूत कसक
उसका वसन्त रचती हुई
मादक कल्प में अवतरित हुई थी
ताकत की बेलगाम हवस के माथे चढ़ कर

वह रचयिता है नये धर्मों का धर्म ग्रन्थों का
उसकी कमीज़ में फिट होते फ़लसफ़ों का
सृष्टि का नियामक वह सत्ता का

एक परोसा हुआ संकट
खुद को हल करता हुआ
नये चुस्त फॅार्मुलों से
ब्रैण्ड के पुष्पक विमान से
दुनिया लाँघता फूल बरसाता यहाँ आ चुका है...

अब वह मुझमें है
तुममें है
हमसे अलग कहीं नहीं
वह विजेता है नई सदी का
गरीबों का नाम जपता
उनकी लाशों पर पनपता
मसीहा है वह
मरणशील नक्षत्रों का
जहाँ हम जीवित हैं
जीते नहीं.
 
काला कैनवस तिरछी लकीरें

वह जहाँ खड़ा है उस तक पहुँचने के सारे रास्ते
गिर गये हैं
और उसके चारों तरफ धुन्ध फैलती जा रही है
जबकि उसे खोजने मिथकों में जा रहे हैं लोग
वह एक द्वीप हो गया है
कोई भी भाषा चल कर उस तक नहीं आ सकती
अब वह अपने जैसा ही किसी को ढूँढ़ता है
सड़क बाज़ार और इन्टरनेट पर.

सिर्फ इतना कि वह काले को काला कहता है,
 ग्रे नहीं
और काले को काला कह देने लायक कोई भाषा नहीं बची
अब वह जो भी कहता है पहेली की तरह लिया जाता है
जिसमें काले का अर्थ कुछ भी हो सकता है,
 काला नहीं
अपने लोगों के बीच एक द्वीप हो जाना
जीते जी लुप्त हो जाना है और ऐसे ही कितने लोग
अकेले लुप्त हुए जा रहे हैं
जबकि आँकड़े बताते हैं कि आबादी बढ़ रही है
यह किसकी आबादी है
 ?
वह इन बेरहम फासलों से हाथ उठा उठा कर चिल्लाता है और
कुछ कहता है पर व्यस्त लोग
अपनी अपनी जुगत में उसकी बगल से निकल जाते हैं
वह एक काले कैनवास पर तिरछी लकीरें खींचता है और
बताता है यह मेरा समय है
जिसकी तिरछी लकीरें कैनवास के बाहर मिलकर
नई संरचना तैयार कर रही हैं
चित्र कैनवास के बाहर शून्य में आकार लेते हैं
उसका मन रोज एक खाई बनाता है
जिसे वह रोज पार करता है
जगत इसकी व्याख्या में उलझा रहता है.
 



पेंटिग : तुषार धवल :Prakriti-Purush :Patch up now





अधूरे में

एक दिन हम लौट गये थे

अपनी अपनी दिशाओं में

अपनी अपनी भीड़ों में डूब जाने को

तुम्हारी भीड़ तुम्हें अपने भीतर भर कर

तुम्हें मुझसे

दूर घसीटती जा रही थी

उसी भीड़ की ठेलती टाँगों के बीच से मेरी तरफ तड़प कर लपकती हुई

हवा में खिंची रह गई तुम्हारी बाँईं हथेली और उसका वह ज़र्द रंग

मैं साथ लिये चलता हूँ

चूमता हूँ हर माथे को अपने अधूरेपन में

बटन टाँकता हूँ हर दरवाज़े पर जैसे वह कोई खुली रह गई कमीज़ है
जिसे चौखट ने अधूरा ही पहन लिया हो
जैसे अधूरा अधूरेपन से साँस मिलाता है

अधूरापन त्रासदी का पूर्ण कथन है
और अधूरी त्रासदियाँ कभी पूरी नहीं होतीं
वे लौटती हैं बार बार
हर बार खुरच कर भी मन नहीं भरता

इधर जी नहीं भरता अधूरेपन से जिसे साथ लिये चलता हूँ
हवा में खिंची रह गई तुम्हारी बाँईं हथेली संग
उसी से छूता हूँ इस धरती को
उसके गर्भ को उसी से सहलाता हूँ

अपने अधूरे होठों से अधूरी हवा में चूमता हूँ तुम्हारे अधूरे चेहरे को अधूरे आकाश तले
और गजब सा लगता है
तुम्हारा प्रेम पी कर
हर कुछ से
प्रेम हो जाता है.



कई दहक हैं

 
कई दहक हैं तंग रातों के
अँटे हुए कण्ठ में.
लबालब भरी देहों का कारवाँ

आहत खीज में दरवाजे पटकता झरोखे उखाड़ता है

कोई सिरा नहीं मिलता
इस यात्रा में भोली छाँहों के छल थे

प्यास भर पानी दिखाते कुँओं में

रिझाई हुई छलाँगें लगा कर
लापता हुए चेहरों की शिनाख़्त
गैर जरूरी थी
कोई वादा नहीं था भरोसे का

कोई बात बे-वादा नहीं थी.

विकल्प के नाम पर कई जुगनू थे आँखों में

जो सितारे थे

कहीं और ही महफूज़ थे.

 
इस तरह मैंने जाना


हर कुछ का कुल योग
शून्य है.

मैंने नहीं पाया है कुछ भी
सही ऐसा
जो कभी गलत था ही नहीं
गलत भी हमेशा गलत नहीं था

था तो बस इतना ही कि
कुछ तारे थे
जो चमकने की हड़बड़ी में
चिपक गये सिर-जोड़ श्रृंखला में
तेजी से चमके और
अपनी दहक से भस्म हो कर
बुझ गये
कुछ जो अपनी आग गढ़ रहे थे
चुपचाप अपने भीतर
देर से चमके और
बुझने के बाद भी दहकते रहे

इस तरह
मैंने जाना कि
औसत की बलसंख्या
दुनिया की रातों पर चाँदनी के सच सी
छाई रहती है
और अपने ताप पर
अपनी आग गढ़ चुका
एक अकेला तारा
अटल अपने ध्रुव पर
उन रातों को
दिशा बताता रहता है.


 


इस यात्रा में

इस दूर तक पसरे बीहड़ में
मुझे रह-रह कर एक नदी मिल जाती है
तुमने नहीं देखा होगा

नमी से अघाई हवा का
बरसाती सम्वाद
बारिश नहीं लाता
उसके अघायेपन में
ऐंठी हुई मिठास होती है

अब तक जो चला हूँ
अपने भीतर ही चला हूँ
मीलों के छाले मेरे तलवों
मेरी जीभ पर भी हैं

मेरी चोटों का हिसाब
तुम्हारी अनगिनत जय कथाओं में जुड़ता होगा
इस यात्रा में लेकिन ये नक्शे हैं मेरी खातिर
उन गुफाओं तक जहाँ से निकला था मैं
इन छालों पर
मेरी शोध के निशान हैं
धूल हैं तुम्हारी यात्राओं की इनमें
सुख के दिनों में ढहने की
दास्तान है

जब पहुँचूँगा
खुद को लौटा हुआ पाऊँगा
सब कुछ गिरा कर

लौटना किसी पेड़ का
अपने बीज में
साधारण घटना नहीं
यह अजेय साहस है
पतन के विरुद्ध.

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