सैराट - संवाद (६) : क्या इस हत्या में आप भी शामिल हैं ?

Posted by arun dev on मई 30, 2016







सैराट अब एक फ़िल्म भर नहीं है. इसे सिर्फ सिनेमा के तत्वों से नहीं  समझा जा सकता. इसकी ‘सफलता’ की जड़ें दरअसल सदियों पुराने भारतीय समाज के विभाजन में हैं, ‘पार्थक्य’ का यह सिनेमाई संस्करण गहराई से उस विभाजन को सम्बोधित है जो तमाम तरह के बदलावों के बीच अब भी हमारी मनोरचना में विद्यमान है.  


सैराट पर संवाद की यह अगली कड़ी. 



क्या इस हत्या में आप भी  शामिल हैं ?                                  
मयंक सक्सेना



मैं इस कहानी को सैराट के आखिरी दृश्य से शुरु करना चाहता था लेकिन सच ये है कि कोई कहानी अंतिम दृश्य से शुरु नहीं हो सकती. लेकिन क्या यह भी सच नहीं कि सैराट का अंतिम दृश्य हमारे समाज की पूरी कहानी है? फिल्म देख कर आए कुछ दोस्तों (यकीनन ऊंची जातियों से) ने कहा कि अब कहां ऐसा होता है, जबकि मुझे, आप सबको और नागराज मंजुले को अच्छी तरह पता है कि ऐसा होता है. हमको ये भी पता है कि ऐसा कहां होता है. हमको ये भी पता है कि ऐसा क्यों होता है. बस ये नहीं पता कि ऐसा कब तक होता रहेगा

मैं घर आ कर अपना चेहरा धोना चाहता था, क्योंकि खून के छींटों के साथ, नन्हे आकाश के पैरों के खून-सने निशान मेरे चेहरे पर भी थे. हां, सैराट आपके ऊपर से निकलती है, आपको रौंदते हुए. आप जो मानना नहीं चाहते कि दरअसल अब भी जातीय भेदभाव, अस्पृश्यता और सवर्णों का आधिपत्य बाकी है. आप जो कि फिल्म देख कर निकलते हैं, आप अंदर से उद्वेलित होते हैं, शर्मिंदा होते हैं, सच जानते हैं और अपनी गिल्ट को छिपाने के लिए सिर हिला कर कहते हैं. 'यार, अब कहां ऐसा होता है’. तो कोई कहता है, ‘अब इतना भी नहीं होता.और कोई, ‘ऐसा भी नहीं होता. लेकिन इन तीनों वाक्यों में देखिए न कितनी स्वीकारोक्तियां छिपी हैं. पहला कि कभी ऐसा होता था. दूसरा कि अब थोड़ा कम है. तीसरा यह कि होता है, लेकिन इतना नहीं होता. सैराट आपके खोपड़े पर हथौड़ा मार कर पूछती है कि क्यों होता था?  अभी भी क्यों है?  और कम भी है, तो क्यों है.

आपकी ये भी हिम्मत नहीं कि आप ये मान सकें कि ऐसा होता है. आप ये कैसे मानेंगे कि  जाति और प्रेम एक दूसरे के रास्ते में आते हैं, तो जाति आज भी प्रेम की लाश को खून से सना छोड़ जाती है. रह जाते हैं, रोते बच्चे और शोक मनाते सामाजिक संगठन, जबकि सैराट यह जानती है और आपकी छाती पर यह सच रख देती है. आपके कमरे में सांप है और आप अंधेरा कर के कहना चाहते हैं कि सांप नहीं है. सांप कहीं नहीं गया है, सैराट उस सांप को उठाती है, चूंकि वह उसे मार नहीं सकती इसलिए आपके सीने पर रख देती है और लोटने देती है. आप अंधेरा कर देने के आदी हैं और सैराट इसी रास्त पर चलकर आप तक पहुंचती है. 

मैं नागराज की चालाकी का फैन हो गया हूं, क्योंकि वह विमर्श की इस गंभीर बात को जिस रास्ते से आप तक ले कर पहुंचे, वह कमाल है. चूंकि नागराज मंजुले जानते थे कि विमर्श की बात आते ही आप फिल्म देखते ही नहीं है. वह जानते थे कि शुरुआत से ही अगर उन्होंने सांप को आपकी छाती पर रख दिया तो आप वैचारिक रूप से इतने बेईमान हैं कि या तो पहले ही फिल्म छोड़ भागेंगे या देखने ही नहीं आएंगे. या फिर फिल्म खत्म होने तक जी को इतना कडा कर लेंगे कि सदियों के अभ्यास के मुताबिक आपका सवर्ण दिल, इस अमानवीय सामाजिक मान्यता प्राप्त मानसिकता पर प्रतिक्रिया ही नहीं देगा. इसलिए नागराज ने नया रास्ता चुना, आपको अंधेरे में नींद लेने दी और जागते ही छाती पर सांप रख दिया.

फिल्म बनाना भारत में सिर्फ विधा तो नहीं ही है, यह एक अर्थशास्त्र है, जहां अच्छी से अच्छी फिल्म के लिए आपको पैसे जुटाना मुश्किल होता है. हिट-फ्लॉप का गणित, सब कुछ बेकार कर देता है. और जैसे ही आप एलान कर देते हैं कि फिल्म गंभीर है, विमर्श की है, जाति प्रथा पर है, तो अंधेरा ओढ़ कर सो जाने के अभ्यस्त लोग, सिनेमा हॉल तक ही नहीं आते. नागराज मंजुले को इस बार, पुरस्कार के लिए फिल्म नहीं बनानी थी, आपकी आंखों में ज़बरन ड्रॉपर से सच डाल देने की थी और इस धोखे से सच की दवा को उन्होंने बखूबी निभाया. 

वह आते हैं, आपको गांव में ले जाते हैं, एक क्रिकेट मैच दिखाते हैं, नायक (जो दरअसल नायक नहीं है) को मैच जिताते हुए दिखाते हैं और हीरो की छवि गढ़ते हुए, साथ में धीरे से बता जाते हैं कि नायक की जाति क्या है. नायक क्रिकेट में अकेले दम पर टीम को मैच जिता लेता है, नायक में साहस है कि वह नायिका को देखने के लिए कुंएं में नहाती लड़कियों के बीच छलांग लगा दे,  नायक पढ़ाई में कक्षा में अव्वल है लेकिन नायक की छवि गढ़ दी जाने के बाद आप धीर-धीरे समझते हैं कि यह नायक वैसा नायक नहीं है, जो नायक हो. क्योंकि असल ज़िंदगी का कोई भी नायक सारे मोर्चों पर नायक नहीं होता, वह प्रेमपत्र देने का साहस तो प्रेम से पैदा कर लेता है, लेकिन वह चार क्या एक भी व्यक्ति से अकेला नहीं लड़ सकता.

उसके अंदर इस साहस और शारीरिक क्षमता दोनों का ही अभाव है, आप महसूस करना शुरु करते हैं कि किसी जाति में जन्म लेने का सामाजिक असर क्या होता है. चूंकि आप सदियों से उत्पीड़ित रहे हैं,  इसलिए आप दबंगई से किसी पर हाथ छोड़ना तो जाने दीजिए,  किसी को शारीरिक चोट पहुंचाने वाली भाषा में जवाब देना भी नहीं जानते. आप समझते हैं कि आप के परिवार के लिए और आपके लिए इसके परिणाम क्या हो सकते हैं,  आप सिर्फ थप्पड़ खाते हैं,  चुपचाप खाते हैं,  प्रतिवाद नहीं करते,  कई बार एक शब्द भी नहीं बोल सकते हैं. आपकी आंखों का गुस्सा आपके हाथ में नहीं उतरता है और यह सिर्फ शारीरिक क्षमता का मामला नहीं, यह सामाजिक कंडीशनिंग का मामला होता है.

लेकिन दलित नायक की मज़बूती और कमज़ोरी को गढ़ती हुई फिल्म साथ में एक नायिका की छवि दिखा रही है, एक गांव की बात कर रही है, जिसके सवर्ण मकानों के हिस्से तो कस्बे में तब्दील हो गए हैं, लेकिन दलित बस्ती में पहुंचते ही आपको गांव दिखाई देता है और वह कुरुप समाज दिखाई देता है, जो सवर्णों की देन है. नायिका सवर्ण और सशक्त परिवार में पैदा हुई है, सो जहां नायक के घर की लड़कियां घर से खेत तक काम करती हैं, वहां नायिका बुलेट चला कर कॉलेज जाती है, ट्रैक्टर चलाती हुई नायक के घर से खेतों में निकल जाती है और नायक पर हाथ उठाने वाले अपने रिश्तेदार को दबंगई से अंजाम भुगत लेने की चेतावनी भी दे देती है. आप समझ ही नहीं पाते हैं कि एक साधारण सी प्रेम कहानी दिखा रही फिल्म आपके अंदर कुछ बदल रही है, वह आपको धीरे-धीरे सामाजिक धागों में उलझा कर, फिर खुद उसे सुलझाने के लिए तैयार कर रही है. नायक को हवालात से छुड़ा लाने वाली नायिका, कितनी भी बोल्ड है, दबंग है और आज़ाद दिख रही है, अंततः उसके घर वाले उसे दी गई सारी आज़ादी छीन लेने को आमादा हो गए हैं. क्यों ? क्योंकि नायिका ने एक दलित लड़के से प्रेम कर लिया है और अंततः सारी आज़ादी के बावजूद वह एक लड़की है और कुल की इज़्ज़त बचा लेने के लिए उसका प्रेम मार दिया जाए, यही सही है.

बुलेट, ट्रैक्टर पर सवार हो कर, दबंगई से थाने में पहुंची आज़ादी को अब बुलेट से उतार कर, ट्रैक्टर के आगे फेंका जा रहा है. और अब दलित और महिला,  समाज में एक पायदान पर आ खड़े हुए हैं. समाज का वह सच,  जिसे आप समाज में होते हुए नहीं देख पाते हैं, लेकिन फिल्म उस बारे में एक संवाद कहे बिना, आपके दिमाग में धीरे से घुस रही है. कि दरअसल ब्राह्मणवाद, सिर्फ दलितों का ही नहीं, महिलाओं का भी दुश्मन है. महिलाएं जब तक आज्ञाकारी हैं, तब तक वह सवर्ण हैं. उसके अलावा वह दलित हैं. बल्कि शायद उनसे भी बदतर स्थिति में, क्योंकि वह सवर्ण हों या दलित, इससे उनकी स्थिति में खास फर्क नहीं पड़ना है. उनकी आज़ादी सिर्फ गाड़ी चलाने, पढ़ाई करने, बाहर निकलने तक सीमित है. वहीं तक, जहां तक वह आज़ाद होने का भ्रम पाल सकें, आज़ाद न हो पाएं.

लेकिन नायिका को तो प्रेम करना था और प्रेम सिर्फ आज़ाद ही कर सकता है, बंधन बर्दाश्त नहीं करता है. नायक पिट रहा होता है और नायिका हाथ में पिस्तौल लेकर अपने प्रेम को बचाने के लिए अपने परिवार पर ही फायर झोंक देती है. नायक देखता है और स्तब्ध होता है न केवल अपनी प्रेमिका के साहस पर बल्कि अपनी दयनीयता पर भी.

घर से भागे हुए एक युगल का संघर्ष,  नायिका की सुविधा सम्पन्न जीवन जीने की आदत और नए जीवन से पूरी तरह तालमेल बिठाने में मुश्किल आप देखते हैं कि नहीं, जो समझ पाते हैं, वह देख रहे होते हैं. वह देख रहे होते हैं कि पढ़ाई में अव्वल रहा नायक किस तरह, एक डोसा के ठेले पर काम करता है,  जबकि नायिका एक फैक्ट्री में. यह दरअसल सामाजिक परिवेश की कंडिशनिंग का अंतर है, एक ऐसा अंतर जिसे अगर आप फिल्म देखते हुए नहीं महसूस कर पाते हैं, तो आपको आंखें किसी से उधार लेनी होंगी. इन सब बातों से ही आरक्षण के सिर्फ आर्थिक या शैक्षिक नहीं बल्कि सामाजिक रेमेडी होने का तर्क सत्यापित होता है.

हालांकि एक आम सवर्ण दर्शक के तौर पर आपकी इसमें रुचि नहीं होनी चाहिए क्योंकि आप यह सोच रहे हैं कि फिल्म में आखिर ट्विस्ट क्या है. आपको पूरी तरह लगने लगता है कि थप्पड़ खाने और झगड़ा होने के बाद नायिका अब नायक के पास लौट कर नहीं आने वाली. आप इसमें पारिवारिक झगड़ा ही देखते हैं, जबकि यह अंततः फिर नायिका और नायक को एक साथ ला खड़ा करता है, क्योंकि दलित घर का एक युवक, जो अपनी प्रेमिका तक की रक्षा करने के लिए शारीरिक झगड़ा करने में अक्षम होता है, वह उस प्रेमिका के पत्नी हो जाने पर उस पर हाथ छोड़ने में नहीं झिझकता. हम फिर वहीं आ खड़े हैं कि महिला सवर्ण हो या दलित, वह कहां खड़ी होती है. दलितों में दलित. सवर्णों में भी दलित. मैं यहां आकर सवर्ण शब्द का प्रयोग छोड़ना चाहूंगा और दलित शब्द को तिलांजलि दे देना चाहूंगा लेकिन मुझे यह बात यहां रखने का आगे कोई भाषाई साधन सूझ नहीं पड़ता है.
नायक आत्महत्या करने की सोचता है और नायिका लौटती है. नायक के सामाजिक स्तर के प्रति संवेदना के कारण नहीं, वह सवर्ण पुरुष के पास भी ऐसे ही लौटती. वह अभिशप्त है और इसीलिए वह संतानोत्पत्ति के लिए भी अभिशप्त है. आप अभी भी ट्विस्ट का इंतज़ार कर रहे हैं क्योंकि इतना सादा और सरल, रैखिक प्लॉट आपको जम नहीं रहा है. आप दरअसल पूरी फिल्म में जगह-जगह समाज में फैली जातिवाद और ब्राह्मणवाद की दुर्गंध महसूस नहीं कर पा रहे हैं. आपको इस सड़ते समाज की छाती पर रेंगते छोटे-छोटे असंख्य कीड़े दिखाए जा चुके हैं पर आपको उस बड़ी बीमारी का इंतज़ार है, जहां से सब लाइलाज हो चले. 

निर्देशक को पता था कि आप महीन विमर्श पर तब ही सोच सकेंगे जब आप उसको मैग्नीफाइंग लेंस से देख पाएं. और इसीलिए इन छोटे-छोटे पड़ावों से लेकर निर्देशक आपको मंज़िल पर पहुंचाता है. जहां नायिका अपने घर वालों को देख फूली नहीं समा रही है,  याद रहे, वह अपनी मां के सम्पर्क में है. वह चाहती है कि उसका परिवार उसे अपना ले,  लेकिन दलित नायक का परिवार से कोई सम्पर्क नहीं है. वह बस चला आया है, जैसे उसे चले आना चाहिए था. सिर्फ एक विस्थापित वंचित सदियों से यही सब झेलते रहे मूल निवासी की तरह. नायिका के अपने भाई की आवभगत करने के उल्लास के बीच ही आप कहीं खो जाते हैं और अचानक घर से नन्हा आकाश रोते हुए लौटता है.

आपको अचानक लगता है कि फिल्म अचानक खत्म हो गई है. दरअसल फिल्म यहां से खत्म नहीं होती है, फिल्म यहां से अचानक शुरु होती है. आप माथा पोंछते हैं और एक दूसरे को देखते हैं, माथा पोंछते पर परेशान होइए क्योंकि रसोई में फैला खून आपके माथे पर भी लगा है. हालांकि आप ये मान लेते हैं कि यह पसीना है. आप को लगता है कि कोई फिल्म ऐसे कैसे कर सकती है आपके साथ. कि आपको इतने सवालों के साथ छोड़ जाए. जी, आपको सवाल चाहिए, लेकिन जवाब भी. लेकिन जवाब भी आपको खुद नहीं ढूंढने हैं. आप चाहते हैं कि लेखक, कवि, कलाकार, फिल्म निर्देशक. ये सब आपको हर सवाल का जवाब दे दें.

माफ़ कीजिएगा, किसी भी कला या साहित्य का उद्देश्य दरअसल जवाब देना नहीं है, आपको जवाब ढूंढने पर मजबूर करना है. मुंबई में जब मेरा सब्ज़ीवाला अपने मोबाइल में सैराट का पायरेटेड संस्करण देखते हुए, मुझसे कहता है कि , सैराट देखिएगा. आंख खोल देगी तो मैं उससे ये भी नहीं कह पाता कि मेरी आंखें खुली हुई थी. क्योंकि वह उसी समाज में रहता है, जो दादरी से मिर्चपुर. सूरजपुर से भगाणा. तक को अंजाम देता है. ब्रह्मेश्वर मुखिया जैसों को हीरो बनाता है. वह समाज उसे हर रोज़ यह संदेश देता है कि सवर्ण कभी समझ नहीं सकते. सदियों का यह सिलसिला कोई 6 दशक पहले, संवैधानिक अंजाम तक भले ही पहुंचा हो, मानसिक अंजाम तक आज भी नहीं पहुंचा है.

आप वैसे भी नहीं समझ सकते, अगर आप सैराट को शुरु से अंत तक बिना कहीं असहज हुए देख जाते हैं, अगर आप इसे सिर्फ अमीर और गरीब के दृष्टिकोण से देखते हैं. फिल्म के अचानक अंत से अगर आपको शिकायत है तो आप दृष्टिबाधित हो सकते हैं. सदियों से आपकी दृष्टिबाधित की गई है और अब इस दृष्टिबाधा को ही रोशनी कहने वाला निजाम है. वैसे भी हमारे पास अमूमन आंखें नहीं होती हैं, सिर्फ कान ही होते हैं, सो हम शोर तो सुन पाते हैं लेकिन सच नहीं देख पाते. बस एक सुझाव है कि एक बार पूरी फिल्म देख कर, फिल्म को पीछे से देखना शुरु कीजिए और शुरुआत तक जाइए. हर कहानी को समझने का तरीका एक ही नहीं होता है. इतिहास को भी इसी क्रम में देखिए, दलितो-वंचितों की व्यथा ऐतेहासिक है.

सैराट में उस व्यथा का उस समय में विस्तार है, जब हम गाहे-बगाहे कहते हैं कि अब जातिवाद कहां है. हम तो नहीं मानते. यह प्रश्न मैंने अपने परिवार और अपने आप से भी किया है कि क्या मेरी प्रेमिका अगर दलित होती, तो मेरे घर वाले या फिर मैं दलित होता तो मेरी प्रेमिका के घर वाले, हमारे विवाह के लिए तैयार होते?  मुझे इस एक सवाल से जातिवाद खत्म हो जाने के तर्क का हमेशा जवाब मिल जाता है. 

सैराट आपको सरल रास्तों से होकर मुश्किल अंत की ओर ले जाती है. दरअसल सरल रास्तों की परिणिति मुश्किल और वीभत्स अंत में होती है. हां, सैराट की ज़रूरत है, इसलिए कि हम जब भय या अचानक सामने आए सच ले कांपते हैं, तब ही हम सोचना शुरु करते हैं. हमें जगाने के लिए हमेशा स्तब्ध कर देने की ज़रूरत है, इतना कि हम नि:शब्द हो जाएं. 

सैराट बाबा साहेब के दिखाए रास्ते का ज्ञान नहीं देती है, सैराट ज्योतिबा और सावित्री ताई की तरह कोई सेवा नहीं करती है. सैराट किसी शाहूजी महाराज की तरह सामाजिक न्याय के विधान का स्वप्न नहीं दिखाती है. सैराट सच दिखाती है. सैराट वीभत्स सच दिखाती है. नामदेव ढसाल की तरह. जो कक्षा में अध्यापक के गाल पर सवर्ण छात्र के चांटे से छप जाते हैं.

सैराट इस मामले में अभूतपूर्व प्रयास है कि जब गंभीर विमर्श को सपाट तरीके से रख देने के सारे प्रयास विफल हो रहे हैं. नागराज मंजुले ने समझा है कि जब तक विमर्श की फिल्म, व्यवसायिक रूप से सफल नहीं होगी, उसमें मनोरंजन नहीं होगा. ज़्यादातर लोग उसे नहीं देखेंगे. मैं एक फिल्म लेखक के तौर पर उनको सही पढ़ पा रहा हूं, तो उन्होंने जानबूझ कर फिल्म के ज़्यादातर हिस्सों में विमर्श को झीना रखा है, जिससे वह आपके अंदर उतरे पर अलग से समझाया गया न हो. विमर्श को दूध में हल्दी की तरह घोलने की जगह अगर चाय में शक्कर की तरह घोला जाए, तो वह ज़्यादा कारगर है. फिल्म का क्लाइमेक्स देखने और समझने के लिए नागराज बेहद चालाकी से, धीरे-धीरे पूरी फिल्म के दौरान लोगों को तैयार करते हैं और फिर उनको वह झटका देते हैं, जिसके बाद काली स्क्रीन पर सफेद से लिखा कोई संदेश या आंकड़ा नहीं है. हां, क्योंकि उनसे कुछ नहीं बदलता है, लेकिन सैराट जैसी फिल्मों से बदलती है.

इतिहास में हर बात दर्ज होती है, और इतिहास में दर्ज होगा कि जब हिंदी की मुख्यधारा का  सिनेमा और कलाकार-निर्देशक अश्लील, महिला विरोधी, साम्प्रदायिक और फूहड़ नौटंकियां स्टेज करने, बेअर्थी फिल्में बनाने और एक साम्प्रदायिक फासीवादी, ब्राह्मणवादी सत्ता का चारण बनने में मशगूल था, मराठी सिनेमा सैराट, कोर्ट, फैंड्री, एलिजाबेथ एकादशी और किल्ला बना रहा था. इतिहास घटनाओं को सिर्फ दो तरह से दर्ज करता है, महान और शर्मनाक. मराठी सिनेमा वह सब कुछ कर रहा है, जो महान के गर्व का मानक हो सकता है और हिंदी मुख्यधारा का सिनेमा वही कर रहा है, जो वह कर सकता है. विमर्श को मारते जाना. ठीक वैसे ही जैसे वह सड़क पर गाड़ी से लोगों को कुचल कर, गरीबों की मदद का एनजीओ खोल लेता है.

अब आखिरी बात, सैराट को देख कर स्तब्ध मत होइए, सोचिए. सैराट को देख कर ये भी मत कहिए कि अब तो ऐसा नहीं होता है”, क्योंकि अब भी ऐसा होता है. सैराट को देख कर यह तो बिल्कुल मत कहिए कि, “ब इतना भी नहीं होता है.क्योंकि ये कहते ही आप ये भी मान लेते हैं कि ऐसा होता था और ये भी कि अब इतना भी नहीं होता है, लेकिन होता है. सोचिए कि यह होता है, तो क्यों होता है. तय कीजिए कि यह नहीं होना चाहिए.

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मयंक सक्सेना पत्रकारिता, टी.वी.  आदि  से जुड़े हैं. विज्ञापन तथा फिल्मों के लिये लेखन कार्य करते हैं.
mailmayanksaxena@gmail.com