सहजि सहजि गुन रमैं : नीलोत्पल (२)

Posted by arun dev on मई 19, 2016

Abdullah M. I. Syed







कविता में ईमान बचा रहे और कवियों में लज्जा
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हिंदी कविता के वर्तमान  में विषय की बहुलता और शिल्प की विविधता को उसका विकास ही समझना चाहिए. एक साथ कई पीढियां न केवल सक्रिय हैं बल्कि सार्थक भी बनी हुई हैं. चेतना, इति-कथाएं, नैतिकता, भावनाएं, प्रयोग, सरोकार, वंचना की पीड़ा, आक्रोश,   स्मृतिहीनता, प्रेम, व्यर्थताबोध,  आदि   की धाराएँ - उपधाराएं आपको दिख जाएँगी.

बहुत से  अलहदा कवि आपको परिदृश्य पर नहीं भी दीखते हैं, यह  उनकी नहीं हमारी समस्या है. कहा जाता है - खोटे सिक्के खरे को बाहर कर देते हैं पर कविता सिक्का नहीं है, हर कविता की अपनी अलग पहचान है. एक सजग पाठक उन्हें खोजता है और  एक सार्थक आलोचक उसकी ख़ासियत  तय करता है.

नीलोत्पल जैसे कवि अपने ईमान के साथ जब सामने आते हैं तो ख़ुशी और उम्मीद का सबब बनते हैं. वह कविता पर मिहनत करते हैं और कहते हैं

‘जो नहीं जानता स्वीकारोक्तियाँ
समय को छोटा करता है.’.


नीलोत्पल की कविताएँ                                             






कुछ संगीत सुनाई नहीं देते

संगीत कुछ नहीं
सिवाए तुम्हारे ख़्याल के

एक भरा समुद्र अपने सितार की
तसदीक़ करता है
ख़ाली समय हम समुद्र का एकांतिक संगीत
सुनते हैं

मृत्यु का संगीत
उस पतझड़ की तरह
जो चारों ओर फैल जाता है

कुछ संगीत सुनाई नहीं देते
वे बजते है कई उम्र तलक
उन चीज़ों की भी आँखें निकल आती हैं
जो पत्थरों के भीतर रहते हैं

समय की कटोरियाँ छोटी हैं
पानी की एक बूँद
सूखने से ठीक पहले आँखों में उतर जाती हैं

मैं गुनगुनाता हूँ
सारा कुछ शब्दों में क़ैद
धीरे-धीरे पिघलने लगता है

एक रास्ता कई रास्तों की नींव है
तुम अपने घर में नहीं रहती
मैं नहीं जानता तुम्हारा घर किधर है


हर बार भूलते हुए
मैं लौट आना चाहता हूँ
जैसे बीती रात की बारिश
अपना चेहरा नहीं देखती

सुबह कई तरह के फूल
तुम्हारे नाम का अंतिम अक्षर लिखते हैं.



जीवन का द्रव

कई चीज़ें समय को छोड़ देती है
कई रिश्ते अधूरे छूट जाते हैं

कोई है जो पत्थरों को
अधिक सख़्त बनाता है
कोई है जो अंत तलक नज़र नहीं आता

कोई गीत अनसुना रह जाता है
सदियों की प्रतीक्षा उसे
गीली जगहों पर रोप देती हैं

किसी चिट्ठी में क़ैद
वह आवारा प्यार
प्यानों के ऊँचे टीले पर गाता है
अंतिम मिठास कानों में घुली रह जाती है

ख़ाली वक़्त उन चीज़ों के लिए
जो अपनी ज़ेबों में जीवन का द्रव ले गए

कोई है जो ज़रूरतों के बाहर
वहाँ क़रीब जाने की कोशिश करता है

जीवन एक बच्चे का गुम खिलौना
जो अंत तक नहीं मिलता.

 


स्खलित विचार जीवन से बाहर नहीं

एक साथ कहीं नहीं पहुँचा जा सकता....

जिन्हें विश्वास नहीं
वे अंधरे में अपनी सूचक पट्टियाँ बदलते हैं
बड़े सवेरे आईने से ख़िज़ाब उतारते है

समूह जिसकी पर्देदारी में
एक असंभव चीज़ को ढोना होता है
आगे चलकर बिखर जाती है

हम एक हैं
एक नहीं होने की तरफ़ आगे बढ़ते है

स्खलित विचार जीवन से बाहर नहीं
वे नहीं गिरने की बुनियाद है
उन्हें कचराघर मत दो
समय उन्हें बाहर निकाल लेगा


कई सुविधाएँ जीवन को असम्भव बनाती हैं
छोटे प्रलाप जीवन को उघाड़ देते है

कई हैं जिनके कंधे अमरता के बोझ से दबे हैं
वे भी अपना ढोना सह नहीं पाते

एक साथ आसमान को रंगना चल जाता है
धरती पर कई उपमाएँ गढ़ी जा सकती हैं
जिन्हें प्रेम हैं वे पूरी पृथ्वी को एक कर देते है

कई व्यक्तियों का एक जगह पहुँचना
आदर्श या दर्शन नहीं
अपना-अपना अवसाद है




जो शुरू हुआ नहीं, वही अंत है
  

हम अंत से शुरू करेंगे

शुरुआती रास्तों के बीच
बने असंयत जंगलों में घूमते हुए
शिकार हो जाना आसान है

ख़ुद को शिकार होते देखने की तरह
हम शुरू करेंगे

कई भरे पन्नों की जगह
एक ख़ाली पन्ना
वही अंतिम संभावना है
जिसे पहली बार लिखते हुए
छोड़ गए थे
तुम्हें उसी जगह से शुरू करना है

रास्ते के सारे अनुभव बंद किताब है
खुली क़ब्रगाहे आकर्षित करती है
वही चीज़ें अस्पष्ट है
जिसे जीवन ने धुंधला कर दिया है

खुलना और बंद होना अंत नहीं
जीवन और मृत्यु भी अंत नहीं

जो शुरू हुआ नहीं, वही अंत है
इसरार करती तमाम चीज़ों के बीच.




निर्वासित सूचियाँ

जो तैरना नहीं जानता
वह डूबना भी नहीं जानता

वह गेंद मैदान से बाहर है
जिसे आजमाया नहीं गया

सारे चूहे धरती के एक ओर
बचे हुए कागज़ कुतर रहे है
बहुत कम कवियों के पास
बचे हैं कोरे पन्नें

इतिहास की आख़री बेंच पर
ढेर सारी आँखें नींद में पढ़ती हैं
कई सारे मतलब बेमतलब के लिए
ख़ाली रह जाते हैं

जैकेट पहना आदमी ठंड से ज़्यादा बाहर नहीं
सड़कों पर भीड़ ख़त्म नहीं होती
हर चेहरा दूसरे का प्रतिकार करता है
समावेशित होता है
अंत में कोई चेहरा नहीं बनता

जिन्हें अंत तक दफ़नाया नहीं गया
वे अपनी कथा रोज़ लिखते हैं

युद्ध और रक्त से नहीं बनता विचार
मृत्यु तफ़रीह करती है
एक बड़ा-सा पत्ता झर जाने के कई दिनों बाद भी
निर्वासित सूचियाँ बनाता है
समय उसका अनंतिम हिस्सा है
अन्य पेड़ उसे जीते हैं


सड़क पर छाया पसरी है
लोग गुज़रते हैं
छाया और गहराती है

जो नहीं जानता स्वीकारोक्तियाँ

समय को छोटा करता है.
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नीलोत्पल

जन्म: 23 जून 1975, रतलाम, मध्यप्रदेश.
शिक्षा: विज्ञान स्नातक, उज्जैन.

प्रकाशन:  पहला कविता संकलन अनाज पकने का समय भारतीय ज्ञानपीठ से वर्ष 2009 में प्रकाशित.दूसरा संग्रह  पृथ्वी को हमने जड़ें दीं’ बोधि प्रकाशन से  वर्ष 2014 में.पत्रिका समावर्तन के युवा द्वादश में कविताएं संकलित

पुरस्कार: वर्ष 2009 में विनय दुबे स्मृति सम्मान/ वर्ष 2014 में वागीश्वरी सम्मान.

सम्प्रति: दवा व्यवसाय
सम्पर्क: 173/1, अलखधाम नगर
उज्जैन, 456 010, मध्यप्रदेश
मो.:     0-94248-50594/ 0-98267-32121