सहजि सहजि गुन रमैं : पंकज चतुर्वेदी

Posted by arun dev on अप्रैल 06, 2016

Picasso's Guernica









कविता अपने समय के सवालों से जूझती है. वह विकट, जटिल, बदलते और निहित प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष खतरों को भी देखती है. मनुष्य विरोधी मानसिकता का प्रतिपक्ष सदैव उसके पास रहता है. उसे मनुष्यता की मातृभाषा ठीक ही कहा गया है. जब-जब चोट पडती है उसका सुर तेज़ और धारदार हो उठता है. ब्रेख्त ने कभी अपनी कविता को सम्बोधित करते हुए कहा था कि बुरे आदमी तुम्हारे पंजे देखकर डरते हैं और तुम्हारा सौष्ठव देखकर खुश होते हैं अच्छे आदमी.

कविता के पंजे तेज़ हों पर उसका सौष्ठव भी समुचित होना चाहिए. अक्सर और ऐसे विषयों पर जब कविता लिखी जाती है तो उसमें इस बात का डर रहता है. पंकज चतुर्वेदी की इन कविताओं को पढ़ते हुए आप पाते हैं कि शब्दों पर बहुत वजन नहीं डालते हुए भी अपने सौष्ठव से ये कविताएँ घना प्रभाव रखती  हैं. 



पंकज चतुर्वेदी की कविताएँ                                          





आज़ादी का मतलब
लोकतंत्र में अभिव्यक्ति की
स्वतंत्रता उन्हें है 
जो सफल हैं 

असफल लोगों से कहा जाता है 
कि आज़ादी का मतलब 
अराजकता नहीं है.
 



जहाँ तुम्हारे आँसू हैं
जहाँ तुम्हारे आँसू हैं 
वहीं उनका उल्लास मैं देखता हूँ 

प्रतिकार नहीं किया गया का मतलब 
यह नहीं है कि पीड़ा नहीं  

उससे सिर्फ़ तुम्हारी लाचारी का 
पता चलता है 
शासक की भलमनसाहत का नहीं 

तुम बच गये का मानी 
यह नहीं कि हिंसा नहीं है  

बल्कि इसलिए कि 
तुम्हारा अपमानित वजूद 
उसकी सुविधा के लिए 
अनिवार्य है   

जब कभी तुम शासक का 
पिटा हुआ चेहरा देखते हो 
तब यह नहीं कि किसी हार ने
उसे मानवीय बनाया है 

बल्कि वह अपने मौन को
अन्याय के परदे की तरह 
इस्तेमाल करता है 
और तुम्हें एक अंतराल 
जितनी राहत देता है 
जिसमें उसे अपनी 
सफलता की तलाश है 
जिसके प्राचीर पर खड़े होकर 
वह फिर से कोई 
अप्रिय बात कहेगा.
   



उजागर
पहले जब सत्ता कहती थी
कि उसका एजेंडा विकास है
तो उसमें एक नक़ली उत्साह दिखता था
जो शासन करने की इच्छा
और दृष्टि के अभाव के
संयोग से जनमता था

अब उनका अन्याय उजागर है
और वे कहते हैं विकास
तो उसमें एक कराह सुन पड़ती है
गोया वह इस एहसास से उपजी हो
कि लोग विश्वास तो ख़ैर क्या
शिकायत के योग्य भी
उन्हें नहीं मानते.




अपराधियो
आत्महत्या के लिए मजबूर हो गया मृतक
दलित शोध-छात्र रोहित वेमुला
अपने अंतिम पत्र के ज़रिए
तुम्हें मुक्त करता है
अपनी हत्या के अपराध से

अब तो ख़ुश हो जाओ
अपराधियो !



दावा
जगह-जगह दीवारों पर लिखा है :
''नामर्द मिलें''
और फिर 
एक पता दिया हुआ है 
इससे सिर्फ़ यह मालूम होता है 
कि अपमानित 
वह भी कर सकता है 
जिसके पास समस्या के 
निराकरण का दावा है 
मगर समाधान नहीं है.


व्यूह-रचना
अब मैं कहीं भी जाऊँ
अपनी बात कहने से डरता हूँ
क्योंकि लोग हमलावर हैं
और हालात ऐसे हैं
कि उनकी जाति जान लो
तो विचार जानने की
ज़रूरत नहीं रहती

धर्म जान लो तो
प्यार की आशा नहीं रहती

वर्ण अहंकार का वाहन है
धर्म सत्ता का उपकरण

साम्राज्य से जिनकी संधि थी
आज भी है
शासन उनके लिए
सिर्फ़ ग़ुलामी को
सुनिश्चित रखने की
प्रणाली है

देश, जिसे पाया गया था
साम्राज्य की मुख़ालफ़त में
अब अपनी ही जनता के विरुद्ध
एक व्यूह-रचना है.



तुम भी
माना कि शुद्धता
महज़ एक ख़याल है
उसकी माँग
व्यावहारिक नहीं

धर्म में अधर्म की
मिलावट है
ज्ञान में अज्ञान की
मनुष्य में अ-मनुष्य की

जो चीज़ मिली है
अगर वह ज़्यादा है
तो वही सच है

उसका विरोध करने में
हिचको नहीं

अगर मिलावट को तुम
ढाल बनाते हो
तो इसमें क्या शक
कि तुम भी मिले हुए हो
आततायियों से.



अब हर चीज़ 
अब हर चीज़
साबित करनी होगी

यही नहीं कि तुम
इस देश के नागरिक हो
बल्कि यह भी
कि तुम इसके
योग्य हो

तुम्हें अपराधी
सिद्ध किया जायेगा
और फिर गर्व करने को
कहा जायेगा


देश-भक्ति का मतलब है
सत्ता से सहमति
इसलिए जब तुम
अपने देश से
प्यार करने चलोगे
तब तुम्हें मालूम होगा
कि तुम आज़ाद नहीं हो.

________________


पंकज चतुर्वेदी 
सम्पर्क : हिन्दी विभाग,
डॉ. हरीसिंह गौर विश्वविद्यालय,
सागर (म.प्र.)---470003 

मोबाइल- 09425614005/ ई-मेल- cidrpankaj@gmail.com