हस्तक्षेप : मेरे बच्चे.

Posted by arun dev on दिसंबर 18, 2014



पेशावर में तालिबानों द्वारा मासूम बच्चों के कत्ले-आम से पूरी दुनिया कराह उठी है, सिसक रही है. बच्चे किसी देश, किसी कौम के नहीं होते वे तो मनुष्यता के भविष्य होते हैं. ‘धर्म-राज्य’ की स्थापना के लिए धर्म और राज्य दोनों के नापक गठजोड़ से पूरी दुनिया वाकिफ है. संसार का सबसे बड़ा झूठ है ईश्वर और सबसे काल्पनिक जगह है जन्नत. इन दोनों के नाम पर पैदा हुए  मजहबों ने मनुष्य जाति पर जो ज़ुल्मों –सितम किये हैं वह भी सबके सामने है. इस हत्याकाण्ड ने सबको झकझोर कर रख दिया है. समालोचन ने बच्चों की याद में पीड़ा और  दुःख के साथ यह जनाज़ा सजाया है. काश यह जनाज़ा धर्मिक कट्टरता का होता.    

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विमल कुमार
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मैं शुरू से ही कह रहा था
ईश्वर नहीं है इस दुनिया में
अगर वो होता तो क्या
मारे जाते इतने बच्चे आज

लेकिन वो तो फलिस्तीन में भी नहीं था
जब मारे जा रहे थे बच्चे हर रोज़

दरअसल
ईश्वर कहीं नहीं होता है
जब होता है ज़ुल्म किसी पर
वो मूक दर्शक होता है
या जा चूका होता हैं वहां से
या जब उसे पता चलता है
तो वो लौटकर भी नहीं आता हैं

वो न्याय भी कहाँ करता है
वो शुरू से ही ताक़तवर लोगों के पास रहता है
इसलिए मैं कहता हूँ
कि ईश्वर कहीं नहीं है
इस दुनिया में

वो कब का मर चूका है
नीत्से की घोषणा से बहुत पहले.
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आशुतोष दुबे


स्टेशन आने से पहले
रेल की सीट के नीचे
अपनी अटैची धकियाने के बाद
ट्रेन रुकते ही जो फुर्ती से उतर गया है
उसके दिमाग में
क्या महज़ एक घड़ी की टिकटिक है
और कुछ नहीं

खुद को जीवित बम बनाकर
जो किसी के पैर छूने
या उससे गले मिलने के लिए बढ रहा है आगे
उसका अंतिम विचार क्या है?

क़्या सिर्फ एक शून्य
एक बड़ा काला विवर
जिसमें वह संसार को
किसी पत्थर की तरह फेंक देना चाहता है
जो जला देते हैं घरों को
और उनमें रहने वालों के लिए
बाहर निकलने के तमाम दरवाज़े बन्द कर देते हैं
वे भी तो कहीं लौटते होंगे

क्या लपटों की कोई आँच पहुँचती है उनकी नींद तक?
जो स्याही के किसी अनंत महासागर में
डुबो देना चाहते हैं
तमाम चमकते हुए सितारे
और दुनिया भर के खिलते हुए फूल
क्या वाकई कभी गौर से देखा होगा उन्होंने
अँकुराते हुए कोई बीज
क्या कभी कोई छोटी सी चिड़िया

चहकी होगी उनके मन की डाल पर ?

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अनवर सुहैल 


बेशक तुम नही बाँचोगे इन पंक्तियों को
बेशक तुम ऐसे जुते घोड़े हो जिसकी आँखों में पट्टियाँ बंधी हैं
बेशक तुम उतना ही सुनते हो जितना सुनने का तुम्हे हुक्म है
और महसूस करने का कोई जज्बा नही तुममे
और मुहब्बत करने वाला दिल नही है....

तुम इंसान नही एक रोबोट बना दिए गए हो
जिसपर अपना कोई बस नही
दूसरों के हुक्म सुनकर तुम दागते हो गोलियां
घोंपते खंज़र अपने भाइयों की गर्दनों पर

तुम्हारे शैतान आकाओं ने
आसमानी किताबों की पवित्र आयतों के तरजुमें
इस तरह तैयार किये हैं
कि कत्लो-गारत का ईनाम जन्नत-मुकाम है

ओ विध्वंस्कारियों
तिनका-तिनका जोड़कर
एक आशियाना बनाने का हुनर तुम क्या जानो
कब तक तुममे जिंदा रहेगा
आशियाने उजाड़कर खुश होने का भरम
क्या यही तुम्हारा मज़हब
क्या यही तुम्हारा धरम....

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तुषार धवल



मैं देखता हूँ
कुर' आन की आयतें तैर रही हैं
लहू के काले ताल पर

रस्सियों पर धूप में कपड़ों की तरह
सूखती हुई लाशें हमारे बच्चों की

हमारी अँतड़ियों में अपच से
उलझे हुए गीता के श्लोक
यहाँ वहाँ बिलबिला कर निकलते हैं
कै करते हैं हम और धर्म बन जाता है

धर्म धर्म कौन सा किसका धुआँ धुआँ तहरीक़ है
धुआँ है आदम धुआँ खुदा कमीनो
धुएँ से शर्मशार आदमजात है
बदहवास है
बदहवास है मेरी माँ
तेरी माँ
कमीनो कोख पर जो शर्मसार है
उठता है धुआँ
काँख से पसीने से लार से
डाइपर में लिपटी इस लाश पर कौन सा श्लोक पढ़ूँ --- गीता ? कहो
तुम्हारे नाम पर
किसे बदलूँ हलाक करूँ किसका कलेजा
कलेजा नहीं फटता तुम्हारा

कहाँ सलीबों पर टँगे हो
सड़ रहे हो
आओ
अगर हो तो हमारी कल्पना से अलग
आओ
धुआँ धुआँ धुआँ उठ रहा है
उठ रही है आग
आग आग आग धुएँ से उठ रहा
मन्त्रोच्चार
उच्चार उच्चार उच्चार यह उठ रहा है
किस मन्त्र का
कौन सी आयतें किसकी हैं वहशत की खुदा कौन
कौन ईश्वर जब उम्मीदें मर रही हों
निजात कौन
किसका यह सुलूक
किस फलसफे का
खुदा ! खुदा न कहे कोई
ना कहे ईश्वर
ना कहे फरिश्ते ना सपने
दोजख की खैर-ए-इन्तेहाई बहबूदियों में
मार डाला मार डाला
जिस्म था आरजू थी ख्वाब थे
एक बस्ता ही तो था भरा हुआ
अब राख है
राख है राख है राख तुम्हारे माथे पर

तुम्हारा शिव थूकता है तुम पर
थूकता हूँ मैं शिव
सूरज पर दिन पर चाँद पर
किस बेगैरत खुदा के सरमाये में कोई गिद्ध नोच गया है सूरज की आँखें
और अब धुआँ है बारूद का
किसे मलते हो कपाल पर
किसके सजदे में क्यों झुको हो
बम से बम बम बोल बम कौन से बम से बम बन रहा है काँवर की किन परखच्चियों में
कौन बनता है कौन 'बमता' है इस लाश पर
यह लाश जो मेरी गोद में सो रही है
थूक रही है
थूक रही है सलीबों पर टँगे नपुंसक मसीह

तुम्हारी आवाज सुन रहा हूँ
सुन रहा हूँ रुँधी सिसकी तुम्हारी मजबूरियों की
तुम भी सुनो
सुनो
मुनादी है यह ईश्वर का
बच्चो
वही ईश्वर जो छल गया तुम्हारे सपनों को
लज्जित है लज्जित
फिर सलीब पर नपुंसक
कह रहा है
बैर है बैर है बैर
धर्म से मेरा
बैर है
बैर है ईश्वर का
धर्म से !

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अपर्णा मनोज

"एन फ्रांक ..तुम फिर पढने जाओगी"
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एन फ्रेंक चले आये हम भी वहीँ जहाँ तुम हो
और ज़मीन छोड़ आये हैं दागदार घावों से दुखती बदरंग
एक पूरी शताब्दी मर्सिया पढने को छोड़ आये पीछे

छोड़ आये हैं अपनी सितारों वाली आँखें
छोड़ आये वे हाथ जो मुहब्बत के रिश्तों को तफसील करते
छोड़ आये अपनी हंसी
अपनी पेशानी जिसमें छूटे हैं तुम्हारी बर्बरता के निशान
छोड़ आये कर्बला ताबूत कब्रें अपनी
पर ये न समझना कि लौटेंगे हम फिर नहीं तुम तक
हमारी रूहें सलामत लेटी हैं यादघर में
हम बचेंगे किताबों के घर में
हमारे बस्ते में बसी है अब भी बस्ती
उडती हुई चिड़ियों की तस्वीरें, पहाड़ नदियों के चित्र
दुनिया के नक़्शे की सीरत भी है और मुकम्मल सूरत
हम वे सूखी हुई स्लेटें हैं तहज़ीब सिखाएंगी
हम बताएँगे कि अम्मी का बोसा है ज़न्नत का गुलाब
अब्बू की आँखें हैं गेहूं की फसल
दिलरुबा के तार हैं टूटे भी बजे
गलियों में खेल के उठते हुए शोर हैं हम
पैरों से लायी हुई मिट्टी की सुंगंध हैं हम
रस्सी पर लटके जुराबों की कसम
इल्म की वर्दियों में सिफ़ारत हैं मुहब्बत के

एन फ्रेंक तुम्हारी डायरी से गिरे पन्नों के ताज़ा शहरों के जिस्म और अक्षर
बेसलान की ज़मीन पर जो गिरा था लहू
उसकी चीखें अब भी पैबस्त चाँद -तारों में
चिड़ियों की चोंच में दबीं हैं तिनका तिनका
दास्तानें बोसीदा चमन की, शोक के दाने
तमीज़ के मलबे में जो लेटा है
हटा कर देखो
शायद इक माँ है कलपती रोती
तेज़ नाखून से अपने उसने लो काट ही ली
एक नीली सी नाल से छूटी रंग की पिचकारी
ऋतुस्राव में सौ सौ बसंत
लो खिले फूल ही फूल -सेहरा में किलकारी
सीने से लगा लो
रुबाब बजा लो
बोसा लो घर की अंगीठी का
माँ का प्यार और प्यार ......
साथ साथ कवर चढ़ाते हुए खाकी कवर पर आओ मिलकर नाम लिखें ....
जिंदगी और जिंदगी
तुम्हारे छोटे -छोटे जूते मेरे पैरों में
मुझे क्यों याद आ रहा बेतरह अपने स्कूल का वो सफ़र

एन फ्रांक ..तुम फिर पढने जाओगी
लिखोगी अपना अधूरा सबक
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अरुण देव 
(एक)
तुमने भविष्य पर गोलियाँ चलाई

कयामत आगे नहीं पीछे है
धीरे धीरे तुम वही लौट रहे हो
अपने ही लाशों के पहाड़ और खून की दरिया से होकर
तुम लौट रहे हो वीरानी के रेगिस्तान की ओर

तुम्हारे लिए इस कायनात में एक भी हरा पत्ता नहीं होगा

मुहब्बत के बोल के लिए तरसेंगे तुम्हारे कान
तुम्हारी आवाज़ से नहीं उठेगा एक भी बच्चा

तुम्हारे इस जन्नत की उम्र तुम्हारे खुदा की उम्र से भी कम होगी.

(दो)
अगर खुदा कही हैं तो आज उसे मर जाना चाहिए
शर्म से

सर्वशक्तिमान, सर्वव्यापी, दयानिधि कुछ नहीं है वह
कठपुतली है
कठपुतली पुजारियों का

पैगम्बरों ने उसके नाम पर छला है हम सब को
और उसके नए धर्माधिकारी जान ले रहे हैं हमारी
मेरे 1३4 बच्चे उसके नाम पर चलाये गए मज़हबों के वहशीपन के शिकार हुए

यह कैसा धर्म क्षेत्र बन रहा है जो मासूमों के रक्त से गीला है
जहाँ बिलखते हुए आसूं हैं
जहाँ गर्भ में ही उन्हें मार दिया जाता है
तलवार की नोंक पर जिन्हें उछाला जाता है
जिनके घरों पर गोले बरसाये जाते हैं
जहाँ छोटी छोटी बच्चियाँ ढकती हैं अपने सिर
जिससे कि बड़ी होने पर वे ढँक सके अपना वजूद
उनके मासूम हाथों में कभी हथियार थमा दिए जाते हैं कभी औज़ार
उन्हें समय से पहले ही फर्माबरदार बना दिया जाता है
यह कौन सी दुनिया है जहां बच्चे गायब होते जा रहे हैं

अब तो पवित्र पुस्तकों के नाम से रूह कांप जाती है
डरती हैं औरतें, सहम जातें हैं बच्चे
हमारी सोचने समझने की क्षमता पर बैठा दिए गए हैं पहरे

हमारे लब आज़ाद नही
हमें क़ायदे नहीं सिखाओं
हमें मजहब नहीं रटाओ
हमें खिलने दो महकने दो
इंसान
बस इंसान रहने दो हमें.
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शमशाद इलाही शम्स


कभी इस बात पर भी गौर करिए कि इस्लाम के आदमखोर बकरमुंहों की फ़ौज बिना कुछ करे धरे इतने लंबे अर्से से कैसे जिंदा है और ऐश कर रही है? आपके पास नोट होते हैं और इनके पास डालर, आपके पास पटाखे नुमा पिस्टल पर इनके पास हथियारों-बारूद का अनंत ज़खीरा..तुम बकर ईद पर एक आध जानवर काट कर खुश हो लेते हो लेकिन इनकी प्यास बेपनाह इंसानी खून से भी नहीं बुझती..ये वो राक्षसी ताकतें हैं जिन्होंने पीर बुजुर्गों की कब्रों तक में बम लगा दिए.
इन्हें पैसा तुम्ही देते हो न..ज़कात, खैरात,मस्जिदों के नाम पर चंदा, मस्जिदों में वसूले जाना वाला चंदा, इमदाद,जलसों-इजलास, इस्तमे के नाम पर.
पाकिस्तान में आज टसुये बहाने वाले अभी दो सप्ताह पहले लाल मस्जिद की लड़कियों द्वारा आइसिस का समर्थन करने पर खामोश थे..क्यों?
आपके सीनों पर तब बर्फ की सिल्ली पडी हुई थी जब सलमान तासीर की हत्या हुई? जब बेनजीर की हत्या हुई..ये फेहरिस्त बड़ी लम्बी है.
सांप को पालने के नतीजे ऐसे ही भयावह होते है, १४१लोगों (अधिकतर बच्चे) की लाशों पर मातम मत कीजिये , तुम्हारे मुल्क की बुनियाद में ही १० लाख मासूमों की लाशें आज भी सिसक रही है. तालेबान जैसे दरिंदों को गौर से देखिये ...मुझे तो उनमे आपकी ही सूरत नज़र आती है.
गैरत मंदों को चाहिए कि अपने दरवाज़े से बहार निकलने वाला वह हर कदम रोक दिया जाये जिससे इन नरभक्षी ताकतों को पहचान, राहत और समर्थन मिलता है.
भारत के मुसलमानों को भी अभी भटकल, जाकिर नायक,औवेसी आदि में अगर कोई चमक दिखाई देती है तो बेडा गर्क वहां भी जल्दी ही होगा.
के. रवीन्द्र
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