मति का धीर : विजयदान देथा

Posted by arun dev on नवंबर 19, 2013
























राजस्थान के जोधपुर के 'बोरुंदा' गाँव में रहते हुए विजयदान देथा ने राजस्थानी लोक - कथाओं को आधुनिक स्वरूप दिया, उन्हें संजोया और समृद्ध  किया.  खुद उनका लेखन विपुल है. वहीं रहते हुए उन्हें अंतर्राष्ट्रीय ख्याति भी मिली.  विजयदान देथा की कुछ कहानियों पर फिल्में भी बनी हैं- उनकी 'दुविधा' कहानी पर मणि कौल ने इसी नाम से एक फ़िल्म बनाई थी बाद में इसी काहानी पर शाहरुख़ खान ने 'पहेली' बनाई. उनकी लिखी  'परिणति' कहानी को आधार बनाकर प्रकाश झा ने इसी नाम से फ़िल्म का निर्माण किया. उनकी 'चरनदास चोर' कहानी पर श्याम बेनेगल ने 'चरनदास चोर' नाम से जहाँ फ़िल्म का निर्माण किया वहीं हबीब तनवीर ने इस कहनी का इसी नाम से नाट्य रूपांतरण किया. 
उन्हें २०११ में सहित्य के नोबेल पुरस्कार के लिए नामित किया गया था, इसके साथ ही उन्हें साहित्य अकादेमी और पदम् श्री पुरस्कार मिल चुके हैं

युवा कवि - लेखक गिरिराज किराडू का विजयदान देथा पर यह केवल स्मृति लेख नहीं है, यह उनकी भूमिका और अवदान को देखता- समझता आलेख है, जो उनके लेखन को  समझने की भी गहरी अंतर्दृष्टि देता है. 
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चरणस्पर्श करने की एक विधि                                         
गिरिराज किराडू

(संध्या, चंद्रप्रकाश देवल और सबसे ज़्यादा मालचंद तिवाड़ी के लिए)





बिज्जी को याद करते हुए मेरे पास उदास होने की एक भी वजह नहीं है सिवा इसके कि वे अब नहीं हैं. उनके होने से जो सुख था, वह अब भी है.



मैंने बिज्जी पर तीन बार उनके जीवित रहते लिखा, कई बार उनसे मिला लेकिन बोरूंदा जा कर उनके साथ रहने का प्लान हर बार बन कर रह गया, बावजूद इसके कि बीच में एक साल जोधपुर रहना भी हुआ.

पहली बार ऐसा प्लान जोधपुर में ही बना था. राजस्थान साहित्य अकादेमी का आयोजन था, अशोक गहलोत भी थे उस आयोजन में. मैं आयोजन में मौजूद एक हिंदी कवि की अशोक-स्तुति से अनमना और चिढ़ा हुआ था. चंद्रप्रकाश देवल ने जब बताया कि वे, शायद उदय प्रकाश के साथ, बोरूंदा जा रहे हैं तो हर वक्त कहीं चल पड़ने को तैयार मन तुरंत राजी हो गया. लेकिन जब तक मैं अपने आप से फारिग हो पाता, वक्त के पाबंद देवल निकल चुके थे. जोधपुर रहते हुए मैं और संध्या हर दूसरे वीकेंड ये प्लान बनाते और कुछ और कर गुजरते.

संध्या का बिज्जी से मिलना कभी नहीं हुआ. हमारी शादी में, जयपुर और बीकानेर में, दोनों शहरों के ही नहीं जोधपुर के भी लेखक
मित्र आये थे लेकिन तब बिज्जी नहीं आ पाए थे. जबकि हमारी शादी से पहले बिज्जी ने जो किया था वह अब थोड़ा सर्रियल लगता है. तब भी हम दोनों जयपुर में एक ही जगह एक ही विभाग में पढ़ाते थे और हमारे बीच में कुछ ऐसा हो रहा था जो अब पीछे मुड़कर देखने पर लगता है प्रेम में ही परिणत होना था. 'पहेली' देखने के बाद (फिल्म उसे भी पसंद नहीं आई थी), वह मिली तो फिल्म के कथाकार पर फ़िदा थी - मुझे एकबारगी लगा, हद है बेरहमी की सामने एक लेखक रोज रहता है उसपे फ़िदा होने की जगह एक अनजान वृद्ध पे फ़िदा हो रही है!  पहली और आज तक आखिरी बार उसने पूछा जानते हो उनको? उनसे बात करना चाहती हूँ. मैंने कहा अपने दोस्त हैं!! बिज्जी को अगले दिन फोन लगाकर कहा, एक लड़की आपको फोन करेगी. बिज्जी ने अपने परिचित विट से कहा, खुशी की बात है. मैंने कहा, वो फिल्म देखकर कहानी पर फ़िदा हो गयी है. उन्होंने कहा, लड़की समझदार है. मैंने कहा, क्यूँ नहीं, पर आपकी बहू बन सकती है फोन करे तो आप मेरे बारे में एकाध अच्छी बातें बोल देना. लड़की के लेखकों के बारे में ख़याल अच्छे नहीं हैं, आपसे अपवाद की शुरुआत हो रही है. उन्होंने कहा, तू चिंता मत कर. फोन तो आने दे.

संध्या के बताने से पहले बिज्जी का फोन आ गया. अरे वो तेरी उस छोरी का फोन आया था. लड़की बहुत समझदार है क्या व्याख्या करी उसने मेरी कहानी की. तू उससे कुछ सीख. और तेरी तारीफ़ मैंने इतनी कर दी है कि अगर उसे तुझसे प्रेम नहीं है, तो हो जाएगा.
कभी कभी लगता है हमारा दाम्पत्य उनका भी कृतित्व है.

वे मेरे प्रेम के बारे में जानने वाले पहले अभिभावक थे. 'दुविधा' और अनेक दूसरी कहानियां पढ़ते हुए लगता है वे हमारे प्रेम के ही नहीं, प्रेम मात्र के guardian angel थे.



मैंने उनपे पहली बार लिखा था बीकानेर में एक आयोजन में, हाथ से कागज पर. बिज्जी जैसे अपनी हर किताब की भूमिका किसी के नाम एक पत्र के रूप में लिखते थे, कुछ वैसी ही पत्र शैली में. यह मेरा पहला 'आलोचनात्मक' कहा जा सकने वाला मज़मून था. पत्र में जो कहा गया था उस पर प्रतिक्रिया के बजाय प्रतिक्रिया इस बात पर हुई कि मैं इस तरह का पत्र लिख कर क्या पाने की कोशिश कर रहा हूँ? यह बहुत शिक्षाप्रद अनुभव था यह समझाने में कि आलोचना जिसे 'साहित्येतर' कहा जाता है उसके साथ अनिवार्य 'सांस्कृतिक' सम्बन्ध के बिना नहीं होती.

तब जिन मित्रों ने मुझे हैरैस किया था, उनका मैंने बाद में अनगिनत बार शुक्रिया अदा किया है अपने मन में.



उनसे पहली बार मिलना हुआ था मालचंद तिवाडी के घर 'प्रहेलिका' में. तब वे  राजस्थानी कहावत कोश बना रहे थे. उस शाम
उन्होंने हम लोगों से जिस अकुंठ सहजता से वयस्क कहावतों पर बात की थी, उससे बहुत प्रभावित और उस तरह की चीज़ों पर खुद अपने सहज ढंग से बात न कर पाने, वैसे शब्द सहजता से बोल न पाने को लेकर काफ़ी इन्फीरियर महसूस करता हुआ घर लौटा था.

तब से अब तक न जाने कितनी बार पुरुष लेखकों के साथ शाम की बैठकों में 'वयस्क' बातें हुई हैं और लगभग हर बार वे स्त्रियों/ स्त्री लेखकों के बारे में कुंठित बयान और उनके चरित्र के बारे में होपलेस बापिष्ट बकवास साबित हुई हैं.

बिज्जी जैसा अकुंठ भाव मैंने आज तक किसी भी दूसरे लेखक में नहीं देखा. शायद यही कारण है कि वे अपनी कथा में भारतीय पौरुष के अपने दमित स्त्रीत्व की ही नहीं, भारतीय स्त्री के काम्य पुरुषत्व की भी ऐसी विलक्षण खोज कर पाए हैं.



खुद बिज्जी के बारे में यह कहावत सबसे सही सिद्ध हुई है: अपना जोगी जोगड़ा, आन गाँव का सिद्ध. राजस्थान में हम इन फिजूल विवादों में अपने इतने कीमती लेखक को गंवाते रहे कि वह मौलिक लेखक है कि नहीं!! हैरानी होती है अब पलटकर वह सब याद
करने पर.

पलटकर याद करने पर लेकिन एक अफ़सोस भी होता है कि बिज्जी भारतीय भाषाओं को समर्पित 'समन्वय' जैसे महोत्सव में नहीं
आ पाए. यह महोत्सव शुरू ही तब हुआ जब उनका बाहर निकलना लगभग बंद हो गया था. 'समन्वय' में बिज्जी को बुलाने की बात हर बार उठी और एक बार भी मुझे नहीं उठानी पड़ी. कभी के. सच्चिदानंदन ने कहा तो कभी सत्यानन्द निरुपम ने तो कभी किसी और ने. 'राजस्थान रत्न' का सम्मान लेने के लिए वे जिस तरह व्हील चेयर पर जयपुर लाये गए थे और उनको जितना कष्ट हुआ था, हमने मान लिया कि वे शायद कभी नहीं आ पाएंगे.



बिज्जी के बारे में दूसरी बार लिखने का अवसर भी मालचंदजी के मार्फ़त आया, २००६ में शायद. 'लैटिन अमेरिकी और भारतीय कथा साहित्य में मिथक, जादू और इतिहास' पर साहित्य अकादेमी के एक अंतर्राष्ट्रीय सेमिनार में राजस्थानी साहित्य और बिज्जी पर अंग्रेजी में बोल सकने वाले की तलाश के दौरान उन्होंने मेरा नाम सुझा दिया था. यह मेरे जीवन का पहला 'अंतर्राष्ट्रीय' आयोजन था और उस रहस्यमय बिल्डिंग में जाने का भी पहला अवसर जिसके किस्से लेखक मित्र सुनाते थे: इण्डिया इंटरनेशनल सेंटर. जादुई यथार्थवाद मुझे तब भी एक नयी नहीं पुरातन चीज़ लगती थी और यह मैंने अपने पर्चे में कहा भी लेकिन यह देखकर दिल खुश हो गया था कि एक नौजवान स्पेनी उपन्यासकार ने अपने Ten Commandements for a Young Latin American Novelist को जादुई यथार्थवाद के खिलाफ बाक़ायदा एक घोषणापत्र की तरह पढ़ा था. मेरे पर्चे की तारीफ़ करने वालों में आलोक भल्ला और सोन्या सुरभि गुप्ता भी थे और मैं खुद तो था ही.

मैंने उत्साह से उसकी एक प्रति उतने ही उत्साहित देवलजी को दी कि बिज्जी तक पहुँच जाए.

महीनों बाद उनकी प्रतिक्रिया पता चली. "बाकी सब तो ठीक है, पर उसने उसने मेरे बारे में लिखा ही कितना थोड़ा है! वो तो अपनी बात करता है उस पर्चे में!! सी पी बन्ना आप भी कैसे कैसे लोगों की तारीफ़ करने लगते हैं!"

ये भी बड़ा शिक्षाप्रद अनुभव था - अगर लेखक आपकी लिखी आलोचना से खुश न हो तो उसे अपने हाल पर छोड़ देना चाहिए, और खुद को अपने! उसके बाद मैंने आज तक जितने भी लोगों पर लिखा है, उनसे लिखने से पहले या बाद में उसके बारे में कोई बात नहीं की है.

और इसीलिए जब बिज्जी पर भी तीसरी बार लिखा तो उनको नहीं भेजा. मुझे आज तक नहीं पता उनकी उसके बारे में क्या प्रतिक्रिया थी.



मिलान कुंडेरा के उपन्यास 'स्लोनेस' की मेरी प्रति एक यात्रा में मालचंदजी ले गए और उस दौरान बिज्जी ने भी उनसे लेकर, एक ही सिटिंग में, उसे पढ़ डाला. उन्हें पढते हुए खाली जगहों पर अपनी प्रतिक्रियाएं दर्ज करने की आदत थी. किताब देखके मुझे लगने लगा इसे दुबारा पढ़ पाना मेरे लिए मुमकिन नहीं होगा. लेकिन अरसे बाद उन रिमार्क्स को पढ़ते हुए बिज्जी के अपने सोच की
प्रक्रिया और व्यवहार (= फॉर्म, जैसा पाल वैलेरी ने कहा है - बीकानेर वालों को 'रूप' की यह परिभाषा कंठस्थ है क्यूंकि हमारे अप्रतिम 'रूपवादी' सिद्धांतकार नंदकिशोर आचार्य ने इसे अपने हर दूसरे लेख में उद्धृत किया है! आप चाहें तो एक स्माइली यहाँ जोड़ लें) को समझने में गहरी मदद मिली थी.

उन रिमार्क्स को पढ़ते हुए एक नए कोण से समझ आया कि बिज्जी की आधुनिकता बायपास आधुनिकता नहीं है, वे उस समाज और जनपद को, होने के उस ढब को गहरे से जानते हैं जिसे पूर्व-आधुनिक कहा जाता है. देखा जाय तो वही लेखक भारतीय यथार्थ को सबसे गहराई से लिख पाए हैं जिनमें आधुनिकता की एरोगेंस नहीं थी, जो प्री-मॉडर्न के अंतरंग आलोचक रहे हैं: प्रेमचंद, रेणु, रवीन्द्रनाथ, अनंतमूर्ती, तकषी शिवशंकर पिल्लई, महाश्वेता देवी, ओमप्रकाश वाल्मीकि, एम.टी. वासुदेव नायर...  



हिंदी के कुछ अर्बन लेखक बिज्जी के देसीपने का मखौल उड़ाते थे, उसे अभिनय बताते थे.  वे शायद एक दूसरे बिज्जी से ज्यादा परिचित थे. ये वो बिज्जी थे जिनकी साहित्य अकादमी में धाक चलती थी. वे राजस्थानी भाषा के कन्वीनर थे, साहित्य अकादमी की चुनावी राजनीति के प्रमुख प्लेयर माने जाते थे. यह किस्सा हमने भी सुना था कि अशोक वाजपेयी के साहित्य अकादेमी अध्यक्ष पद का चुनाव हारने के बाद  शीन काफ़ निज़ाम और नन्द किशोर आचार्य ने बिज्जी से कहा था 'दाता! ये आपने बहुत गलत किया.' (जोधपुर के ही रहने वाले निज़ाम उन्हें सम्मान से दाता ही पुकारते रहे हमेशा). किस्से में सचाई कितनी थी पता नहीं पर हम तब इसी से बड़े खुश होते थे कि राजस्थान के एक लेखक की इतनी चलती है!

बिज्जी इस बात का महत्त्व बहुत अच्छे से समझते थे कि जिस भाषा को संविधान मान्यता नहीं देता, उसे साहित्य अकादेमी मान्यता देती है. साहित्य अकादेमी ने भी उन्हें अपने सर्वोच्च सम्मान - अकादमी फेलो - से नवाज़ा. जिस राज्य के किसी भी हिंदी लेखक को, जिनमें स्वयंप्रकाश, ऋतुराज, नंदकिशोर आचार्य, विजेन्द्र, हरीश भादानी  शामिल हैं, साहित्य अकादमी पुरस्कार नहीं मिला, उस राज्य के बिज्जी का अखिल भारतीय और बाद में अंतर्राष्ट्रीय स्तर तक समादृत होना हमारे लिए न सिर्फ फ़ख्र की बात थी, राष्ट्र राज्य की तर्ज पर काम कर रहे भारतीय साहित्य के एस्टैबलिश्मेंट के सामने हमारी एक छोटी-सी जीत भी थी.



उन पर तीसरी बार लिखने का मौका तब आया जब तहलका अंग्रेजी से उसके तब के साहित्य संपादक गौरव जैन का फोन आया. मैं सब्जी खरीद रहा था, अननोन नंबर देखकर आदतन आलस आया बात न करने का लेकिन जब मैं सब्जी खरीदने या बाईक चलाने जैसा काम कर रहा होऊं तो ज़रूर उठा लेता हूँ. लगता है सुस्त ज़िंदगी में थ्रिल का मौका न खोया जाए. 'कथा' से दो खण्डों में आये उनकी कहानियों के अंग्रेजी अनुवाद की रिव्यू करनी थी.

उस रिव्यू में मैंने एक बात वही कही जो २००६ में कह चुका था कि बिज्जी शायद भारतीय लेखकों में इकलौते हैं जिनकी चेतना पर
या अपने गल्प में जो समाज वे बनाते हैं उस पर औपनिवेशिक नुक्त-ए-नज़र का न सिर्फ़ कोई असर नहीं है बल्कि अगर कभी कोई लेखक कोलोनियल और पोस्ट-कोलोनियल के दायरे से बाहर हो सकता था तो वे बिज्जी ही होने थे मानो. 'उनके लेखन में कोई कोलोनियल पैसेज नहीं है. यहाँ इतिहास अपने सातत्य में है क्यूंकि कोलोनियलिज्म प्रभावी रूप से उनके लिए लोकल सामंती शक्तियों में ही अनूदित हुआ' - मेरे ऐसा कहने में  रोर्ती का कोलोनियलिज्म और ट्रांस्लेशन वाला नुक्ता कहीं नहीं था जैसा सोन्या सुरभि को लगा था.

तहलका वाले रिव्यू में लेकिन नीचे उद्धृत वाक्य लिखते हुए मैं बिज्जी के जीवन की एक ऐसी त्रासदी से परिचित नहीं था जिसके बारे में जानने ने  मेरे लिए तब से उनके लेखन को एक नए ढंग से देखने का रास्ता तो खोल ही दिया है, उनके प्रति सम्मान इतना बढ़ा दिया है कि अब वे मिलते तो मैं पहली बार किसी लेखक के पैर छू लेता. यह लेख उनका प्रथम चरणस्पर्श करने की एक विधि है.

बिज्जी के रूप में जाति-आधारित सामंतवाद को वह अंतरंग हत्यारा और लेखक मिला जो वह डिजर्व करता था

यह वाक्य लिखते हुए मुझे नहीं पता था कि बिज्जी के पिता और पिता के दो भाइयों की हत्या सामंतों ने की थी और एक भाई को 'मरे से बदतर' कहते हुए अपंग करके छोड़ दिया था. जब बिज्जी १९ बरस के हुए तो घर-समाज ने इकट्ठे हो कर उनसे कहा कि तू अपने पुरखों का प्रतिशोध ले, यही पुरुषार्थ है. पितृहत्या का प्रतिशोध, 'पुरुषार्थ' की वही हैमलेटियन दुविधा - टू रिवेंज और नॉट टू रिवेंज! और बिज्जी ने कहा, 'व्यक्तियों से प्रतिशोध मैं नहीं ले सकता, मैं इन प्रवृतियों से प्रतिशोध लूँगा'.

बिज्जी ने जाति-आधारित सामंतवाद से जो प्रति-शोध अपने लेखन में लिया है वह केवल उनके निजी पुरखों का नहीं उस सामंतवाद के हाथों दमित और नष्ट किये गए असंख्य वंचित जनों का प्रति-शोध है.

देसी लोगों की तरह रहने वाले, इस साधारण उजबक दिखने वाले लेखक का लेखन इस तरह ताउम्र  एक तरह का अहिंसक सत्याग्रह रहा. लेखन को अहिंसा की एक प्रविधि में बदलने के उनके मार्मिक, आत्मसंघर्ष-जनित आविष्कार को हम कभी उचित सम्मान से पहचान पाएंगे?



१०
बिज्जी के आखिरी दिनों की खबरें भी मालचंदजी से ही मिलती थीं. उनसे मुझे ईर्ष्या है सच्ची, वे उनके आखिरी महीनों में लगातार बोरूंदा रहे, 'बातां री फुलवारी' के चौदह खण्डों का हिंदी अनुवाद करते हुए. बिज्जी उनसे कहते थे मालू मेरे जीते जी इसे पूरा कर देना. और पूरा होने के एक दिन बाद वे नहीं रहे. अंतिम तीन कहानियों का अनुवाद करने के लिए मालजी अपने बड़े भाई के तीसरे के अगले दिन बोरूंदा पहुंचे थे. मुझे हिंदी में राजस्थानी से ज्यादा प्यार मिला पाठक मिले, हमेशा यह कहने वाले बिज्जी शायद अपने मैग्नम ओपस के हिंदी अनुवाद को अधूरा छोड़ कर जा नहीं सकते थे.

आप निश्चिन्त रहिये दाता, आपका काम दुनिया की हर भाषा में पहुंचेगा.

बिज्जी मरते दम तक एक लेखक और मनुष्य के रूप में साथ रहेंगे. उनसे मिलके उस ओछेपन का सामना कभी नहीं करना पड़ा जो महान तो छोड़िये कुछ कायदे का अभी तक ठीक से शुरू भी कर नहीं पाये लेखकों तक में इतनी बार देखा है कि हमेशा बिज्जी का निश्छल, विटी चेहरा याद आया है - शो-ऑफ, सेल्फ-इम्पोर्टेंस और अपने अलावा कुछ न देख पाने वाली अंधता से उनका वही बैर रहा जो सामंतवाद से.

वे इतने उपलब्ध और सहज थे कि शायद हमने उन्हें थोड़ा ही सही पर टेकन-फॉर-ग्रांटेड लिया. अब जब वे नहीं हैं तो पता चल रहा है क्या चला गया है.

हमारा दोस्त, हमारा लोक-गायक, हमारा मौखिक इतिहासकार, हमारा जननायक, हमारा बिज्जी चला गया है.

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लिंक्स
१. तहलका रिव्यू 
२. साहित्य अकादेमी सेमीनार में पढ़ा पर्चा 





गिरिराज किराडू
पहला कविता संग्रह 'शामिल बाजा' 'दखल प्रकाशन' से शीघ्र प्रकाश्य
Founder & Editor, Pratilipi, Founder & MD, Pratilipi Books. Creative Director, Samanvay. Founder-Coordinator, Kavita Samay.
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