मंगलाचार : शायक आलोक












शायक आलोक ने अपनी सक्रियता से इधर ध्यान खींचा है. उनमें संभावना है. कविताएँ प्रेम के इर्द गिर्द हैं, उनमें डूबती उतराती. यह एक ऐसा प्रक्षेत्र हैं जहां आवेग और संवेदना के सहारे अभिव्यक्ति की शैली अपना आकार लेती है. जो लेती दिख रही है. कुछ कविताएँ प्रचलित प्रेम परिपाटी से अलग हैं और नई भंगिमा रखती हैं. सार्थक रचनात्मकता की उम्मीद के साथ.. 



रेने माग्रित

भागी हुई लडकियां

हौव्वा नहीं होतीं 
घर से भागी हुई लड़कियां 

पहनतीं हैं पूरे कपडे 
संभाल के रखती हैं खुद को 
एक करवट में गुजारी रात के बाद 
सुबह अँधेरे पिता को प्रणाम करती है 
माँ के पैरों को देख आंसू बहाती है 
गली के आखिरी मोड़ तक मुड मुड कर देखती हैं दरवाजा 
घर के देवता को सौंप आती है मिन्नतें अपनी 

प्रेयस को देख मुस्कुराती हैं घर से भागी हुई लड़कियां 
विश्वास से कंधे पर रख देती है सर अपना 
मजबूत होने का नाटक करती 
पकडती है हथेली ऐसे 
जैसे थाम रखा हो पिता ने नन्ही कलाई उसकी 
और सड़क पार कर जाती है 

नए घर के कच्चे मुंडेर से रोज आवाज़ लगाती हैं भागी हुई लड़कियां 
वहीं रोप देती है एक तुलसी बिरवा 
रोज रोज संभालती गृहस्थी अपनी 
कौवों को फेंकती हैं रोटी 
माँ से सुख दुःख की बातें 
चिड़ियों को सुनाती है 

फफक कर रो देती हैं घर से भागी हुई लड़कियां 
घर से भागी हुई लडकियां 
हौव्वा नहीं होती ... 



प्रेमी और पिता

अपनी आवारा कल्पनाओं में एक लड़की छोड़ आती है पिता के नाम एक ख़त
'पिता मैं जा रही हूँ ..रहूंगी वहीं उसके संग.. हाँ पिता उसे प्रेम है मुझसे'
पिता चिट्ठी हवाओं को खिला देते हैं/ सांझा बाती में मगन माँ जान नहीं पाती..

आवारा लड़की प्रेमी से पिता का प्यार नहीं मांगतीं / नहीं पूछती प्रयोजन
दो पुरुषों के बीच उसे नहीं दीखता कोई विरोधाभास - दोनों हैं अलग
पिता का प्यार पिता का, प्रेमी का प्रेम वाला- समझती है खूब
कल्पनाओं में माँ को अब भी सांझा बाती में ही मगन रखती है लड़की.

अपनी आवारा कल्पनाओं में लड़की एक साथ दो बच्चों को जन्म देती है
एक का नाम पिता से पूछ कर रखती है तो दूसरे को 'प्रेम' पुकारती है
सांझा बाती से लौट आई माँ जब आँखें दिखाती है / कल्पनाओं से
बाहर आ रसोई में घुस जाती है/ देर तक चाय पकाती है आवारा लड़की.

आवारा लड़की की आवारा कल्पनाओं में तुलसी पर जलता है दीया
प्रेमी गली में होर्न बजाता रहता है, आवारा आवाजें निकालता है / वह
अनसुनी किये पिता के पैर दबाती है / देर तक माँ के जुड़े सजाती है

अपनी आवारा कल्पनाओं में आम लड़की आवारा हो जाती है रोज एक घडी
आवारा लड़की अपनी कल्पनाओं में आम लड़की हो जाती है !!

कल्पनाओं में जब टकराती हैं दोनों तो सखी बन जाती है /मन के
दुःख बाँट लेती हैं / प्रेमियों के दोष गिनाती हैं / पिता पर प्यार लुटाती हैं
सांझा बाती में मगन माँ से जब भी नजरें मिलाती हैं तो ठहठहा के
एक पल फिर आवारा बन जाती हैं.



फिन्गर्ज़ क्रोस्स्ड

तुम पर प्रेम कविता लिखना इतना आसान तो नहीं
घटनाक्रम जुड़ता ही नहीं
और शर्त यह कि नहीं हो कोई बात पुरानी
स्वाभाविक बाध्यता कि दुहराव हो 

तुमपर कविता का प्रारम्भ तुम्हारी हंसी से हो
फिर बात हो तुम्हारी हथेलियों की
इरेज कर दिया जाए तुम्हारी हथेली का शुक्र पर्वत
प्रेम को देह के दायरे से खेंच लूँ सायास
कनिष्ठा के नीचे एक गहरी लकीर खींच दूँ 

कविता में लाया जाए तुम्हारे आंसुओं का बहाव
आँखों के ठीक नीचे एक मिट्टी बाँध जोड़ दूँ
तिर्यक मोड़ से जब जब गुजरे नदी
बात तुम्हारे अल्हडपन की हो
अपने होठों में दबाकर तुम्हारे सीत्कार के शब्द 
कविता में ही हो बात उस अंगडाई की भी 

तुम पर प्रेम कविता लिखना इतना आसान तो नहीं 

इस कविता के मध्य में बादलों की बात हो 
तुम्हारे आँचल की गंध और आवश्यकता से बड़े उस चाँद का बिम्ब हो 
खूब जोर से बहाई जाये ठंडी तेज हवा 
तुम्हारे सिहरने को शब्दों में दर्ज किया जाए 
मध्य में ही लाई जाए तीन तारों की कहानी 
कम्पास से मापकर 
अक्षरों में एक समबाहु त्रिभुज बनाया जाए 
अंगुली के पोर से

अंत नहीं होगा कोई इस कविता का 
अधूरी ही रखी जाये यह पूरी अभिव्यक्ति 
अतृप्त ही रहे तमाम ख्वाहिशें 
लबों का गीलापन वाष्पित हो 
हवा में तैरने का सिलसिला शब्द जारी रखें 
प्रेम के ढाई पदचिन्ह टांकती रहे यह कविता 
''
फिन्गर्ज़ क्रोस्स्ड '' !! 

तुम पर प्रेम कविता में करूँगा 
'
भी' निपात का खुलकर प्रयोग 
तुम पर प्रेम कविता लिखना इतना आसान 'भी' नहीं.


मेरी कविता की काल्पनिक प्रेयसी

मेरी इस कविता की काल्पनिक प्रेयसी 
पहली बार प्रेम में है 
कविता की शुरुआत में ही 
भूल गयी है लड़की होने के कायदे-क़ानून 
उसकी गूंजती हंसी पर नजरें तरेरती है माँ
बिल्कुल इसी हंसी पर प्रेमी कलेजा थाम लेता है 

यह काल्पनिक प्रेयसी लिखती है चिट्ठियां 
चिट्ठियों के हर्फ़ में हैं सकुचाई सी मन की बातें
हर चिट्ठी में सूई से सिल देती है अपना एक तिल 
पहले चूमती है लिफाफे को कई कई बार 
फिर पता लिखती है 

मैंने बोला है उसे सलीका सीखने को 
कहा है कि खैर करे 
यूँ नहीं निखरना चाहिए उसके चेहरे का रंग 
छत की मुंडेरों तक कैद रखे वह अपने देह की खुशबू 
मुझे मेरी कविता के मध्य में 
मोहल्ले मैं फैली कल्पकथा नहीं चाहिए

इन दिनों चुप रहती हैं काल्पनिक प्रेयसियां 
वे नहीं भूलती अपना पहला प्रेम 
नहीं भूलेगी वह भी 
पढ़ी चिट्ठियों को दबा देगी आँगन में 
चिल्ला कर कहेगी कभी प्रेम नहीं किया उसने 
चुप्पी में कहेगी प्रेम नहीं करुँगी अब 

मेरी कविता की काल्पनिक प्रेयसी ने 
मेरी कविता के अंत में तयशुदा शादी कर ली


 ... रु... कि..

ख़त ... रुमाल
किताबें

माँ की चिट्ठी
जिसमे चिंता से ज्यादा व्याकरण दोष है
मेब्लीन का लिप्स मार्क जिसके प्रयोग की जरुरत थी
कार्डिन की कलम
जिसकी स्याही यहाँ नही मिलती
और मेरा बचा हुआ लड़कीपन

मेरे पास एक डब्बे में यह सब है

मेरे प्यार का टायटेनिक जहाज है यह डब्बा
इसी डब्बे के चारों किनारों पर
पहले प्रेम के अहसास दर्ज हैं
इसी एक किनारे
पैर लटकाए हीरो आखिरी बार हीरोइन की स्केच बनाता है
मैं खामोशी से सीना दबाये रखती हूँ

मायके से मिली
कपड़ों की बनी एक गुडिया
जिसके पूरे माथे सिन्दूर है
इसी डब्बे में रहती है

इस बार जब जोर से चलेगी मानसूनी हवा
गुडिया को समंदर में डाल दूंगी

रुमालों को धोना होगा !
किताबें मैंने बेच दी !!

 ____________________________________________
शायक आलोक 
8 जनवरी 1983, बेगूसराय (बिहार)
शिक्षा- परा-स्नातक (हिंदी साहित्य)
कविताएँ - कहानियां  पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित
सन्मार्ग और नव-बिहार दैनिक समाचार पत्र में पोलिटिकल कमेंट्री और स्तम्भ लेखन
सम्प्रति- कस्बाई समाचार चैनल 'सिटी न्यूज़' और साप्ताहिक अखबार 'बेगूसराय टाईम्स' का सम्पादन
ई पता : shayak.alok.journo@gmail.com 

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  1. Bhupinder Brar28/8/12, 10:01 am

    I like the way sharply chiseled images emerge from very unobtrusive use of language, painting pictures of adolescence and the awakening of womanhood in very ordinary small town lower middle class life.

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  2. शायक की कवितायें मुझे एकदम यथार्थ से निकली हुई लगती हैं...बहुत गहरी समझ रखते हैं स्त्री-मनोविज्ञान की शायक...अलग तरह की होती हैं इनकी कवितायें...अपनी ही शायक-शैली मे....मुझे खूब पसंद हैं इनकी प्रेम कवितायें भी और दूसरी सभी कवितायें....आजकल लोक-कथाओं की तर्ज पर अपनी ही शैली मे कुछ लघु-कथाएँ भी लिखी हैं शायक ने...वे भी बहुत सुंदर लगीं मुझे....शुक्रिया समालोचन,शुक्रिया अरुण जी....आज वाकई आपने प्रभात मंगल कर दी....:)...और शायक...तुम्हें समालोचन पर आने के लिए बहुत बहुत बधाई...अच्छा लिखते हो...अच्छा लिखते रहो....शुभकामनायें....:-)

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  3. शायक की रचनायें सभी बेहद गहन होती हैं।

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  4. शायक की कवितायें अपने अलग रंग में ..अलग अंदाज़ में कही गयी हैं ....हमेशा उन्हें पढ़ना अच्छा लगता है ...और कुछ नई सोच दे जाती हैं .... बिम्ब शब्द ..और अनछुए पहलुओं को ...आम सी भावनाओं को ..जो अक्सर नज़रंदाज़ करते हैं हम ...उन पर बखूबी लिखा है ....और स्त्री मन की तह तक पहुँच कर लिखी कवितायें ...वास्तव में अद्भुत ......!!! बहुत बहुत बधाई ....शायक को भी और समालोचन को भी .....शुभकामनाएं शायक ......यूँ ही बढते रहो ..........फिंगर क्रोस्ड .../ख..रु ...कि...../भागी हुई लडकियां .../प्रेमी और पिता ...क्या कहूँ सभी ..सभी ....एक से बढकर एक ....और फिन्गर्ज़ क्रोस्ड...मेरी पसंदीदा ...दिल के करीब .../// बधाई ....शायक ..../और समालोचन ...शुक्रिया उम्दा कवितायें पढवाने का ....और रचनाकर्म में एक उम्दा रचनाकार को शामिल करने का .....

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  5. अनाम28/8/12, 10:46 am

    घर से भागी हुई लड़कियां.....मार्मिक और अत्यंत गहन पोस्ट है.....हैट्स ऑफ इसके लिए ।

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  6. शायक को बहुत बहुत बधाई ! गहरी समझ और अभिव्यक्ति की अनूठी शैली का सुन्दर नमूना हैं ये कवितायेँ !अरुण जी का आभार !

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  7. शायक मूलत: प्रेम के कवि कहे जा सकते है, उनकी कविताओं में रूमानियत और स्त्री विमर्श साथ-साथ देखने को मिलता है |'भागी हुई लड़कियां' ...'मेरी कविता की काल्पनिक प्रेयसी' व फ़ेसबुक पर कुछ ऐसी ही कविताएं है जो अपने आप में मुकक्मल है, पढ़कर एक रोमांच पैदा करती हुई कई सवाल भी छोड़ जाती है | कवि को बधाई और प्रस्तुति के लिए अरुणजी का आभार |

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  8. gunjan shrivastava28/8/12, 1:54 pm

    शायक की कवितायेँ ...स्त्री मनोविज्ञान पर आधारित हैं ...विभिन्न परिस्थितियों में ...अलग - अलग उम्र की स्त्रियाँ क्या करती हैं ....क्या सोचती हैं ...चाहती कुछ हैं ....करती कुछ हैं ...दिखाना कुछ चाहती हैं ...''चिल्लाकर कहेगी कभी प्रेम नहीं किया उसने , चुप्पी में कहेगी प्रेम नहीं करूंगी अब ''.....गोया ख़ुद से ख़ुद को छिपाती हैं | छोटी - छोटी बातें ...नामालूम सी हरकतें ...जिन पर किसी का ध्यान भी नहीं जाता , शायक सब सामने लाकर चमत्कृत कर देते हैं | शायक की कविताओं में उनकी सकारात्मक सोच है ....जैसे ...''हौव्वा नहीं होतीं घर से भागी हुई लड़कियाँ ''....''पिता को प्यार करने वाली लड़की को उम्र की दहलीज़ पर पिता के समानांतर कोई और भी पसंद आ सकता है ''...मैं उनकी कविता पढ़कर हैरान रह जाती हूँ ...इतना तो औरत भी औरत को नहीं समझ पाती | शुक्रिया समालोचन ..:))..और शायक आपको भी बहुत - बहुत बधाई ...:))

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  9. शायक आलोक की कविताएं अपनी काव्‍य-भाषा और भंगिमा आकर्षित करती हैं - खास तौर से 'भागी हुई लड़कियां' और 'तुम पर प्रेम कविता लिखना आसान नहीं' (फिंगर्स क्रास्‍ड) में संवेदना की जो नमी झलकती है, उसे अगर शायक और ठहरकर पारिवारिक रिश्‍तों के भीतर छिपी कश्‍मकश तक ले जा पाएं तो वे अपनी कविताओं को अधिक अर्थपूर्ण और असरदार बना सकते हैं। तकनीकि रूप से ये कविताएं मुकम्मिल लगती हैं, लेकिन अनुभव की विविधता और रिश्‍तों की रिजुता को वे स्‍पर्श करके आगे बढ़ जाते हैं, इस पर थोड़ा और विचार करना बेहतर हो सकता है। शुभकामनाएं।

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  10. मंगलाचार पर शायक का स्वागत है. आपके सुंदर भविष्य की कामना के साथ ....प्रेम की इन कविताओं में युवा मन बोलता है..तो भाषा भी अपनी वय के अनुसार कहीं चपल, कहीं चंचल तो कहीं कुछ कर देने की जिजीविषा से भरी है. आशीर्वाद के साथ...

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  11. "करता है माधो जब कोई प्यार
    इतना ज्यादा प्यार कि किसी के भीतर से भी
    निकाल लेता हो कच्चे अमरुद और कपास के गुड्डे
    इतना प्यार कि कहने लगता हो कि संसार रंग-बिरंगी
    टिकटों का एक अलबम भर है
    जो चालीस साल की उम्र में
    खोज निकाले अपने स्कूल की कापी
    और उसके पन्नों से बनाये जहाज,
    इतना ज्यादा प्यार कि निगल जाये स्याही की द्वात,
    शिराओं में बजे दूसरों को न सुनाई देने वाला शंख
    इतना प्यार कि शुद्ध न रहे उच्चारण, वाक्य पूरे न हों
    तो माधो जब करता है कोई प्यार
    तो उसके हाथ से न तो उजड़ता है कोई घोंसला
    न फूटता है कोई कांच का गिलास
    न हो सकता है उसके हाथों कभी तिनके का भी अनिष्ट" ----उदय प्रकाश

    ( शायक भैया की कविताओं पर मेरी प्रिय कविता के द्वारा मेरी प्रतिक्रिया..! )

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  12. सायक की एक अन्य कविता का ये हिस्सा-
    मैंने मेरी बंद खिड़की में
    सुराख बना लिया है एक
    सुराख़ से आज छनकर जो धूप आयी है
    उसमें मुस्करा रहा है बिरवा...
    सायक द्वारा विलक्षण प्रेम भंगिमाओं की थाह को पा लेना व्यक्त करता है .
    प्रेम का बिरवा अपने मैं रोप 'घर से भागी है लड़की 'जड़ परिपाटी का विरोध ..प्यार की 'आवारा कल्पनाएँ ' हैं-जिसमे उसके पास भिन्न -भिन्न चेष्टाओं में 'सचुकाई सी मन की बातें '..परन्तु कस्बाई मध्य वर्गीय परिवार में उपजा स्नेह , नैतिकता एक बंध हैं जिससे विछोह उत्पन्न होता है, दर्द का स्वर बनता है ...लेकिन प्रेमी में पिता के से स्वरूप को पा सड़क पार कर जाती है लड़की . प्रेमी से प्रेम वाला प्यार 'तुलसी पर जलता दिया' .लेकिन कवि महाशय को तो आगे बढ़ना है '...स्वाभाविक बाध्यता कि दुहराव न हो '
    और 'फिन्गर्ज़ क्रोस्स्ड' का जोखिम ले अपने कहने को ' कम्पास से अक्षरों में एक समबाहु त्रिभुज बनाया जाए' तक ले जाते है , हिंदी में मेरे ख्याल ये प्रयोग अलग किस्म से अपने आप में अनूठा है ...सायक इस हौसले के लिए बधाई के पात्र हैं.
    लेकिन लगभग हर कविता में प्रेम की रेटारिक कल्पना अंत में अपने हथियार डाल जहाँ पहुँचती है - वह है 'तयशुदा शादी'.

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  13. मेरा ध्‍यान फेसबुक पर ही शायक आलोक की कविता की ओर गया....यहीं से उठाकर मैंने उनकी एक कविता कुछ समय पहले अनुनाद पर पोस्‍ट भी की...यह आवाज़ सुनी जानी चाहिए..ख़ुशी है कि सुनी भी जा रही है।

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  14. शायक को मैं फेसबुक पर शरुआत से पढता आया हूँ ..और मुझे सबसे ज्यादा पसंद हैं उनके विषयों की विविधता कभी वे स्त्री -पुरुष के मनोविज्ञान का काव्यात्मक विश्लेषण करते हैं और कभी इतिहास के तथ्य पकड़ कर वर्तमान स्थति पर नए सूत्र गढ़ते हैं /हालाँकि उपरोक्त कवितायेँ प्रेम पर हैं,तो यहाँ भी उनकी एक विशेषता उभर कर सामने आई हैं की वे किसी आसमानी प्रेम की बात नहीं कर रहे उनके प्रेम में पीड़ा हैं / आभाव हैं और जीने की जद्दोजहद हैं..और इन सबके बिच एक स्त्री का कोमल मन हैं!
    शायक की कवितायें बार बार पढ़े जाने की मांग करती हैं / क्यूंकि यहाँ पर कुछ सीधी और सरल भाषा मैं जीवन के जमीनी सत्य आकर ले रहे हैं जो प्रेम पर लिखी गयी बहुधा कवितायों में कम ही दिखाई देते हैं ..शायक की शैली / शिल्प / वाक्य गठन मुझे अनूठा लगता हैं या यूँ कहूँ की शायक की कवितायेँ नवोदितों का नेतृत्व करती हैं / शायक को हार्दिक शुभकामनायें और समालोचन ब्लॉग का हार्दिक आभार व्यक्त करता हूँ .. इस उभरते सितारे को अपना प्रकाश देने के लिए

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  15. आप चाहें तो इसे मेरी कमी भी कह सकते हैं , लेकिन फेसबुक पर मैं कविताओं को उतना ध्यान से नहीं पढ़ पाता .... आप वहां लम्बे समय से सक्रिय हैं , लेकिन पहली बार मैंने यहाँ ही आपको ठीक से पढ़ा है ....और सच मानिए , मुझे बहुत अच्छा लगा कि इस दौर में भी प्रेम पर इतना ठहरकर लिखा जा सकता है ...ये कवितायें भले ही हमें मुस्कुराने की स्थिति नहीं देती हैं , लेकिन उनकी तासीर बहुत मर्मस्पर्शी है ...बधाई आपको

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  16. प्रिय शायक,‘भागी हुई लड़कियाँ’ बहुत अच्छी कविता है।
    सच तो यह कि इसे पढ़ने के बाद दूसरी कविताएँ ठीक से पढ़ ही नहीं पाया।

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  17. शायक से यह रचनात्मक परिचय अच्छा लगा. मैंने पहले इनको गंभीरता से नहीं पढ़ा था. लेकिन इन कविताओं को पढकर लगा कि इनको अब गंभीरता से पढ़ना होगा. कवि से इस परिचय के लिए धन्यवाद समालोचन!

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  18. प्रेमिका के मन का वर्तमान सामाजिक परिस्थितियों से सामंजस्य बिठाता एक कवि मन...

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  19. मैं शायक को पढ़ता रहा हूं और कई बार उनकी कविताओं ने प्रभावित किया है। ये कविताएं भी बहुत अच्‍छी हैं। मैं नंद भारद्वाज जी की बातों से सहमत हूं। शायक को अपनी कविताओं को कुछ समय रखकर-ठहर कर भी देखना चाहिये। मेरी शुभकामनाएं शायक के साथ हैं।

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  20. Alok ki kavitayen apane anubhaw or kahan main idhar likhi ja rahi dher sari kavitaon main alag hain . ek alag roop-rang liye huye.achhi bat hai ki we anubhawon ki jatilata ko bhashayi jatilata main nahin fansane dete hain. kavi ki baat pathak tak pahunchati hai.....pathak ko kavita se door nahi karati hain.....is yuwa kavi ko aage abhi bahut kuchh dena hai.....swagat kiya jana chahiye is dastak ka.

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  21. शायक की कविताओं से पहली दफे रू-ब-रू हुआ. और उनकी गहराई में गोते लगाने लगा. प्यार की अद्भुत अनुभूतियाँ शायक ने अपनी कविताओं में समेटी हैं. यह सिर्फ एक स्त्री मनोविज्ञान की ही समझ नहीं अपितु सच्चे प्यार की गहरी समझ है. बधाई शायक को और अरुण जी का आभार. बेहतर के क्रम में एक और मोती प्रस्तुत करने के लिए.

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  22. शायक के सायक चले मानहुं काव्य कुलीन.....रमणीय कवितायेँ हैं शायक.विशेषकर 'फिंगर्स क्रास्ड' तो लाजवाब.नियति,संभावना और न जाने कितने प्रतीक जुड पड़े हैं इसमें.'कनिष्ठा के नीचे एक गहरी लकीर खींच दूँ'-
    को पढकर तुलसी याद आए-'उपजहिं अनत अनत छवि लह्हीं'---
    देर आयद दुरुस्त आयद.

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  23. शायक को मनोविज्ञान की अच्छी समझ है और ख़ुशी की बात यह है कि वे इस समझ को जब कविता में ढालते हैं तो वह कहीं से भी थोपा हुआ नहीं लगता. भागी हुई लड़कियां एक अद्भुत कविता है और कभी भी इसकी चमक और इसके अर्थ धूमिल नहीं पड़ने वाले...बधाई समालोचन और बधाई शायक

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  24. नए कवियों में शायक अलोक की कवितायेँ प्रभावित करती हैं . शायक की कविताओं का स्वर अलग है . इनकी कविताओं में स्त्री की सूक्ष्म संवेदनाओं को भी स्वर मिला है .कई बार आश्चर्य होता है स्त्री मनोभावों पर शायक की इतनी गहरी पकड़ देख कर ... इनकी कवितायेँ बाध्य करती हैं बार -बार खुद को पढ़े जाने के लिए ...खास कर .. भागी हुई लड़कियां , प्रेमी और पिता , फिगर्स क्रॉसस्ड ...और शायक की लोक -कथाएं भी ... एक अलग अनुभव है इन्हें पढना ..बहुत कुछ जो हमारे भीतर छूट जाता है .. उसकी अभिव्यक्ति शायक की कविताओं में होती दिखती है ..

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  25. सभी कवितायेँ अच्छी लगी ..........खासकर पहली कविता .......शायक अलोक के पास कविता कहने का अपना अलग ढंग है ....... और जो बात मुझे बेहद पसंद आई वह यह कि उनके पास अपनी बात कहने का भरपूर साहस है ..........समालोचन का आभार |

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  26. मैंने शायक को जब उनके ब्लॉग पर पढ़ा तो बिना सोचे ये सवाल कर डाला कि ये आपने लिखी हैं या अनुवादित हैं.....उसने भी मुस्कुराते चेहरे को बीच लिखा कि मेरी है पूरे तौर पर...
    मैंने शायाद यकीन नहीं किया था :-)
    मगर हां पढ़ती रही बाकयेदा....
    कमाल का लेखन...बेमिसाल कल्पनाशक्ति.....और एक उजड्डपन झलकता है किसी किसी कविता में जो मुझे बहुत भाता है...
    ढेर सारी शुभकामनाएं शायक,
    समालोचन की आभारी हूँ.
    अनु

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  27. शायक अलोक की सभी कवितायेँ अपनी बेलाग शैली के कारण
    हर किसी का ध्यान खींचती है --विविधिता लिये हुए
    इनकी कवितायेँ कई कई बार पढने की मांग करती हैं
    नारी मनोविज्ञान हो स्त्री विमर्श या सामाजिक कुरीतियाँ सभी पर इनकी
    पकड मजबूत है ---प्रेम पर लिखी हुई इनकी कविता
    खास कर --घर से भागी हुई लड़कियां --प्रेमी और पिता
    --रिश्तो की कशमकश को दोहराती हुई --मन को छू जाती हैं ----
    --कवि को बधाई ----

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  28. शायक आलोक की रचनाएँ प्रेम के स्थितियों के अंदर की मनोस्थिति का आकलन बेबाकी से करती है |सारी रचनाएँ सराहनीय है |बधाई |

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  29. Why do Minor Chords Sound Sad?

    The Theory of Musical Equilibration states that in contrast to previous hypotheses, music does not directly describe emotions: instead, it evokes processes of will which the listener identifies with.

    A major chord is something we generally identify with the message, “I want to!” The experience of listening to a minor chord can be compared to the message conveyed when someone says, "No more." If someone were to say the words "no more" slowly and quietly, they would create the impression of being sad, whereas if they were to scream it quickly and loudly, they would be come across as furious. This distinction also applies for the emotional character of a minor chord: if a minor harmony is repeated faster and at greater volume, its sad nature appears to have suddenly turned into fury.

    The Theory of Musical Equilibration applies this principle as it constructs a system which outlines and explains the emotional nature of musical harmonies. For more information you can google Theory of Musical Equilibration.

    Bernd Willimek

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