रीझि कर एक कहा प्रसंग :: गगन गिल




"बहुत साल पहले एक बच्ची थी, जो अक्सर नींद से उठकर रोने लगती थी. उसे सपने में अपने घर के सभी लोग मर गए दिखते थे. अब वह बड़ी हो गई है. आपके सामने खड़ी है. डर उसे अभी भी लग रहा है. लेकिन अब उसके डर ने चेहरा बदल लिया है. अब उसे दंगाईयों से डर लगता है. दूर कहीं किसी बस में से किसी अभागे को उतार लिए जाने से डर लगता है. बच्चों की आँखों में झाँकने से डर लगता है.

वह जब जब डरती है कविता की शरण लेती है. जैसे कविता कोई प्रार्थना हो, जैसे कविता बहुत से मुश्किल सवालों का एक मात्र जबाब हो. जैसे कविता ईश्वर का हाथ हो, जो किसी बहुत अँधेरे क्षण में उसके कंधे पर धीरे से आकर टिक जाता हो.  


ऐसे भी क्षण आए हैं, जब साहित्य से मुहं फेर कर उसने अपने लिए एक सीधी सादी लड़की की जिंदगी चाही है. लेकिन अंततः उसके पास साहित्य ही बचा है. आज की शाम आप ने उसके हाथ में सिर्फ कविता रहने दी है.  वह खुद से पूछती है- क्या इसके बाद वह एक बेहतर व्यक्ति हो सकेगी? बेहतर नहीं, तो मजबूत ही सही. कम अज़ कम ऐसा व्यक्ति जो अपने बनाए वाजिब, गैर वाजिब आतंकों के साथ रहना सीख सके.


किसी ने कहा है- सत्य महान है लेकिन सत्य के बारे में मौन वह उससे भी महान है.अभी कुछ देर बाद यह लड़की मंच की सीढियाँ उतरेगी, भीड़ में खो जाएगी. वह कोशिश करेगी कि सत्य के आसपास लिपटे इस सन्नाटे को छू सके. खुद नहीं तो कविता के दस्ताने से ही सही. और अगर उसे कभी कोई सत्य मिले, तो आपको बता सके. न भी बता सके, तो कम अज़ कम उसे जी सके. आज की शाम वह आपसे इतना करने का वादा करती है."   
 (साहित्य के लिए संस्कृति पुरस्कार लेते हुए ,१९८९)








दोस्त : पांच कविताएँ


खुशआमदीद

दोस्त के इंतज़ार में


उसने सारा शहर घूमा

शहर का सबसे सुन्दर फूल देखा

शहर की सबसे शांत सड़क सोची

एक किताब को छुआ धीरे धीरे

उसे देने के लिए


कोई भी चीज उसे

खुशआमदीद कहने के लिए

काफी न थी!



प्रेम तो नहीं है यह लड़की


प्रेम तो नहीं है यह लड़की

देखती हो हर किसी को

एक ही निगाह से

आँखों में आँखे डाल

उंडेलकर सारा मन और आत्मा

जब कि दोस्त बैठा है तुम्हारे पास


दोस्त जब पूछेगा मछली

समुंदर में कितना पानी

क्या जबाब दोगी ?

दोस्त जब पूछेगा लड़की

कोई खाली कोना है भी तुम्हारे पास

मुझे देने के लिए

क्या जवाब दोगी?


कि देखती हो जहां भी

वही वह दिखाई देता है

कि उसके पास होने का सुख

तुमसे संभले नहीं बन रहा ?


वह कैसे जानेगा लड़की

तुम्हारा सुख ?

उसकी स्मृति में तो तुम्हारा चेहरा

बहुत उदास है,

बहुत अकेला

तुम्हारे माथे में खिलती धूप

वह कैसे बूझेगा लड़की?


देखती हो हर किसी को तुम

एक ही निगाह से


प्रेम तो नहीं है यह? 



दोस्त के इंतज़ार में     

दोस्त के इंतज़ार में उसे बहुत डर लगा


स्मृति में खरोंचा उसने

धुंधलाया चेहरा उसका

निकालकर पिटारा उस रात

देखीं सब तस्वीरें

रंगों का धब्बा रह गया था दोस्त

सिर्फ रंगों का धब्बा

दोस्त के इंतज़ार में उसे बहुत डर लगा


दोस्त के इंतज़ार में

भूलकर अब तक की मनौतियां

मनाया उसने

कि दोस्त न आए,

कुछ हो जाए

और दोस्त न आए,

कि जितने भी बची है स्मृति सुख की

बच जाए,

कि उससे दूर जाकर वह कहीं भी छिप जाए

रात के अंधरे में या दिन की चकाचौंध में


दोस्त के इंतज़ार में

वह एक जगह पहुंची -

सुख दुःख से परे

स्मृति-विस्मृत से परे

इच्छा-अनिच्छा से परे

इंतज़ार के तपते हुए चेहरे के ऐन पास


घर्र-घर्र दौड़ते गाड़ी के पहिए

घर्र-घर्र घूमती पृथ्वी की धुरी

घड़ी की सुई,

उजाड स्टेशन पर टंगा

इंतज़ार करता पब्लिक टेलीफोन

घर के फोन की उलझी हुई तारें


बहुत सालो बाद

उस रात उसने देखा

धीरे धीरे उगता सूरज

बहुत सालों बाद सुना उस रात

दिन का शोर

शहर में फटता हुआ,

बहुत अरसे बाद सुनी ख़ामोशी उसने

शहर की आत्मा की


आईने के सामने जाकर उस रात

देखा उसने खुद को

बहुत दिनों बाद

कहीं वह बदल तो नहीं गई थी ?


अपने भीतर के शोर से
उसे उसे बहुत डर लगा.



शहर में उसके दुःख बसता है


शहर में उसके

दोस्त नहीं,

उसके न होने का दुःख बसता है


दोस्त तो है

किसी दूसरे शहर में

किसी दूर दराज घर में

या दफ्तर में

उसकी आँखों से दूर

उसकी धडकन से दूर

उसकी चेतना से दूर


कुछ भी हो सकता है वहां उसके साथ

रिस सकती है गैस

भडक सकते हैं दंगे

गिर सकता है दोस्त उसका

गश खा कर  यूँ ही

सरे राह,

और अगर सब ठीक चलता रहे

तो भी हो सकता है वह उदास

यूँ ही, बेवजह


पता नहीं वह कितना सुरक्षित होता

हर अनहोनी से,

अगर वह होती उसके शहर में

कितना सुखी होता ?

होता भी कि कि नहीं ?


लेकिन अगर वह होता उसके शहर में

वह देखती उसके बच्चे का मुहं

होता अगर उसके पड़ोस में

वह लगाती उसके बच्चे को सीने से


शायद होता कुछ कम इससे खालीपन

न भी होता तो

बाहर लौटती

भूली-सी एक साँस


एक बहुत मुश्किल लगनेवाले  दिन

जाती वह उसके घर

भर लती आक्सीजन

आनेवाले दिनों की


लेकिन दोस्त होता जो उसके शहर

तो कोई दिन भला

मुश्किल क्यों होता ?


पता नहीं उसके रहते भी

नींद चैन की उसे

आती कि नहीं ?


सीने में सोग था जिसका

उस बच्चे के प्रेत की

तब भी मुक्ति होती कि नहीं ?


कह पाती कि नही 
किसी-किसी शाम खुलते

सुख- दुःख के रहस्य की बात ?


शहर में उसके

दोस्त नहीं

उसका दुख बसता है.



विदा किया


विदा किया दोस्त को उसने उसके शहर

थोड़ा-सा रखा अपने लिए बचाकर


थोड़ा-सा बचाया अपने कमरे के खालीपन में

थोड़ा-सा बचाया अपने कानों की सायं-सायं में

छाया-भर बचाया भटकते खयालों में

साथ-साथ चलने को


जाने दिया उसने उसके भीतर के पिता को, प्रेमी को

जाने दिया उसके भीतर के दोस्तबाज़ को, दारूखोर को-

ख़ामोश था जो बहुत उसमें

बचाकर रखा अपने पास

गुपचुप बाते करने को !


जी भरकर चली फिर वह

बेदोस्त सड़कों  पर,

जी भरकर गुजरी फिर वह 
धुन्धभरी शामो से,

जी भरकर सेंकी उसने गुनगुनी धूप

फैलाकर उसका खयाल


खयालों में उससे शिकायतें की

जमाने भर की उसने,

खयालों में उससे लड़ी बेवजह

कितनी ही बार, यूँ ही,

रोते-रोते चुप हुई

कितनी ही बार

अपने आप

बैठकर ख्यालों में

उसके पास


नही लिखा तो बस  उसे

एक खत नहीं लिखा,

नहीं कहा उससे  तो बस

यही नहीं कहा

कि बचाकर रख लिया था उसे

दोस्ती कि तिलिस्म में

थोड़ा सा



होने दिया परेशान उसे

बेवजह दूसरे शहर में,

सूखने दिया लहू उसका

बेसिर-पैर अपनी चुप्पी से


बदला लिया इस तरह उसने

उसके भीतर के पिता से, प्रेमी से

दोस्तबाज़, दारूखोर से-

बदला लिया इस तरह उसने उसके

मन के हर उस कोने से

जहां वह नही थी


विदा किया दोस्त को उसने

थोड़ा-सा रखा अपने लिए बचाकर. 
___________________________



26/Post a Comment/Comments

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  1. कविताओं की भूमिका और उस पर चलती ये पांच कवितायेँ पञ्च तत्त्वों सी मन को सिहरा गईं . एक पूरा वजूद इनमें बनता दिखा .. एक औरत इनमें जगी .. इनमें सोई .. उठी और चल दी .. किसी तलाश में

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  2. शायद होता कुछ कम इससे खालीपनन भी होता तो बहार लौटती भूली-सी एक साँस

    एक बहुत मुश्किल लगनेवाले दिनजाती वह उसके घरभर लती आक्सीजन आनेवाले दिनों की

    ....

    बदला लिया इस तरह उसने उसके मन के हर उस कोने से जहां वह नही थी.....वाह...

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  3. पाँचों कवितायें बहुत ही गहन। सच है, डर तो अभी भी लगता है।

    जवाब देंहटाएं
  4. लेकिन अगर वह होता उसके शहर में
    वह देखती उसके बच्चे का मुहं
    होता अगर उसके पड़ोस में
    वह लगाती उसके बच्चे को सीने से

    शायद होता कुछ कम इससे खालीपन
    न भी होता तो
    बाहर लौटती
    भूली-सी एक साँस

    एक बहुत मुश्किल लगनेवाले दिन
    जाती वह उसके घर
    भर लती आक्सीजन
    आनेवाले दिनों की.....

    अरसे बाद गगन जी को पढा है..लास्ट टाइम उन्हीं सी उनकी कविताएं बीकानेर में सुनीं थी, वही गहरी अनुभूतियां वही गहरी चोट..सोचने पर मजबूर करती हुयी.. समालोचन का आभार साझा करने के लिए...

    जवाब देंहटाएं
  5. सभी रचनाएं, एक से बढकर एक।
    आभार

    जवाब देंहटाएं
  6. अनाम19/7/11, 3:16 pm

    सुंदर कवितायें.

    सादर
    आलोक
    www.raviwar.com

    जवाब देंहटाएं
  7. समय के साथ प्रेम का स्वरूप भी बदला है और उसकी अभिव्यक्ति का भी. अब यह 'प्रेम को पंथ कराल महा' जैसा भी नहीं है और 'अति सूधो स्नेह को मारग है' जैसा भी नहीं. दोनों के बीच में कहीं है. अब प्रेम के रास्ते पर चलना 'तरवारि के धार पे धावनो' जैसा भी नहीं है और यह शर्त भी नहीं है कि 'तंह साँचे चले तजि आपनपौ.' एक अजीब गड्डमड सा समय है यह, प्रेम के लिए भी और उसकी अभिव्यक्ति के लिए भी. पुरुष के लिए भी और स्त्री के लिए भी. मैं तुम पे मरता हूँ/मरती हूँ लेकिन तुम्हारे लिए मरूँगा/मरूँगी नहीं क्योंकि "और भी गम हैं ज़माने में मुहब्बत के सिवा" और खासतौर से तुम्हारी मुहब्बत के सिवा. गगन गिल की प्रेम कविताओं (यदि इन कविताओं को हम प्रेम कविता कह सकें तो)का यही भाव है लेकिन जो सबसे बड़ी खूबी है वह यह कि इस सारी गड्डमड को अपनी कविताओं के माध्यम से बड़ी आसानी के साथ, बड़े ही सहज और आम शब्दों में न केवल व्यक्त कर देती हैं बल्कि उसे समझा देती हैं.

    गगन गिल को पढता रहा हूँ. निर्मल वर्मा जी की तरह ये भी मेरी पसंदीदा रचनाकारों में से एक हैं. परन्तु सच यह है कि उनकी पद्य के बजाए उनका prose मुझे अधिक आकर्षित करता है. 'दिल्ली में उनींदे' का मैं मुरीद हूँ. मुझे लगता है कि अपनी कविताओं में गगन जी कई स्तरों पर डूबती-उतराती रहती हैं (यह एक कला भी है और खूबसूरती भी) जबकि अपनी कहानियों में वे बहुत सहज होकर बहती हैं.

    अरुण जी को धन्यवाद, गगन जी की कविताएँ पढवाने के लिए.

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  8. अनाम19/7/11, 6:48 pm

    gagan gill ki kavitaone hamesha bhaykampit karnewali duniya ke andhiyare raste ki mayus karnewali sair karai hai....bahot aachi kavita ....shridhar nandedkar from aurangabad maharashtra

    जवाब देंहटाएं
  9. बहुत प्रभावशाली कवितायें...धन्यवाद इस बेहतरीन पोस्ट के लिये

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  10. नही लिखा तो बस उसे
    एक खत नहीं लिखा,
    नहीं कहा उससे तो बस
    यही नहीं कहा
    कि बचाकर रख लिया था उसे
    दोस्ती कि तिलिस्म में
    थोड़ा सा
    doti ke nam isse sundar kavita nahi ho sakti.arun aapka aavar

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  11. अनाम20/7/11, 12:34 pm

    gagangill ne kavitawo me dil rakh diya hai

    जवाब देंहटाएं
  12. बहुत प्रभावशाली कवितायें

    जवाब देंहटाएं
  13. apne jo pAHLE PESH KIYA.....BACHHI KI BAAT...VAH HARDYA SAPARSHI THE.....LAKIN BAKI PANCHOO KAVITOOO MEADOST OR DOSTI KI MATRA JALKIYA HE SAKHYA BHAV KE SATH UDHBHUT HOTI RAHI...JABKI SAKHYAM KE SATH ATAMNIVEDANAM..OR PARAMVIGRAH KA ABHAV HAI....PARANTOO PRESENTETION KA TARIKA SHRESTH LAGA.......BHARAT PAMNANI....STATE PRESIDENT...W J A 4 YOUTH..

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  14. Paritosh Mani21/7/11, 11:11 pm

    गगन अरसे से मेरी प्रियकवयित्री रही हैं ,मुझे लगता है स्त्री अभिव्यक्ति को जितने सूक्ष्म रूप से पकड़ कर एउर उतने ही शानदार तरीके से अभिव्यक्त करने की कला गगन के पास है ,हिन्दी में अनामिका को छोड़ दे तो कम ही लोगो के पास है.

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  15. होने दिया परेशान उसे
    बेवजह दूसरे शहर में,
    सूखने दिया लहू उसका
    बेसिर-पैर अपनी चुप्पी से

    बदला लिया इस तरह उसने
    उसके भीतर के पिता से, प्रेमी से
    दोस्तबाज़, दारूखोर से- behtareen.. ek vajood vali stree ki likhi gai kavitaaye. arunji abhaar padhvane ke liye.

    जवाब देंहटाएं
  16. vimal kumar26/7/11, 9:38 am

    bahut sunder .maza aa gaya

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  17. suchitra sharma6/8/11, 7:50 am

    shabdo ka anuthha sangam atisunder laga

    जवाब देंहटाएं
  18. कोई भी चीज़ उसे
    खुशामदीद कहने के लिए
    काफी न थी
    ************
    देखती हो हर किसी को तुम
    एक ही निगाह से
    प्रेम तो नहीं है यह ?
    ************
    अपने भीतर के शोर से
    उसे बहुत डर लगा
    ************
    शहर में उसके दोस्त नहीं
    उसका दुःख बसता है
    ************
    विदा किया दोस्त को उसने
    थोडा स रखा अपने लिए बचाकर

    ये पंक्तियाँ अपने मर्म से परिपूर्ण हैं. इससे अधिक एक स्त्री और क्या कह सकती है. बहुत सुन्दर गगन जी .

    जवाब देंहटाएं
  19. "खयालों में उससे शिकायतें की
    जमाने – भर की उसने,
    "खयालों में उससे लड़ी बेवजह
    कितनी ही बार, यूँ ही,
    रोते-रोते चुप हुई
    कितनी ही बार
    अपने आप
    बैठकर ख्यालों में
    उसके पास'!!!!!!!!

    जवाब देंहटाएं
  20. Yogendra Ahuja8/1/12, 1:57 pm

    Mujhe kavitayein bahut achchhi lageen.

    जवाब देंहटाएं
  21. jab ....ek....dil.....sunega ..to...ek....dil..hi...bolega.....wah..ji.....wah....gagan.....

    जवाब देंहटाएं
  22. वाह....खुशामदीद से लेकर विदा तक दोस्त के साथ यह सागर बहुत खूब लगा....सुंदर और सरल कवितायें....धन्यवाद अरुण जी पढ़वाने का....

    जवाब देंहटाएं
  23. मन का खालीपन बेहतरीन अंदाज़ में बयां हुआ है इन कविताओं में...

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  24. गगन ने कर दिया मगन
    कविताओं में है विचार गहन
    खूबं है कहन
    कहा है सत्य बचन
    स्वप्निल

    जवाब देंहटाएं

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